नैनी झील के बारे में कुछ चिंतित करने वाले तथ्य

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Sukhatal, Rarely Filled with Water in Nainital
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लगातार सिकुड़ रही है नैनी झील, 2100 वर्ष ही बची है उपयोगी आयु

जी हां, नैनी झील लगातार सिकुड़ रही है। एक रिपोर्ट के आधार पर कुमाऊं विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय के अध्यक्ष एवं भूविज्ञान विभाग के अध्यक्ष भूगर्भ वेत्ता प्रो.सीसी पंत ने बताया कि नैनी झील की तलहटी में मलवा-मिट्टी के जमाव (Segmentation) की दर 1963-64 में तल्लीताल कोटर में 0.79 सेमी से 0.03 कम या अधिक मल्लीताल कोटर में 0.69 सेमी से 0.03 कम या अधिक थी जो कि 1993-94 में तल्लीताल कोटर में 0.6 से 0.07 कम या अधिक, बीच में 0.7 से 0.03 कम या अधिक तथा मल्लीताल कोटर में 1.35 से 0.05 कम या अधिक हो गई। इस प्रकार औसतन झील के सिकुड़ने की दर प्रति वर्ष 0.86 सेमी से 0.03 सेमी कम मानी गई है। दूसरे तरीके से समझंे तो झील की अधिकतम गहराई जो 1872 में 93 फीट थी वह 1899 में ही घटकर 87 फीट रह गई थी और वर्तमान में झील की अधिकतम गहराई हालांकि वर्षों से मापी नहीं गई है, लेकिन माना जाता है कि वर्तमान में इसकी गहराई करीब 75 फीट ही रह गई है। इस आधार पर वैज्ञानिक यह कहने से संकोच नहीं करते कि नैनी झील की उपयोगी आयु (Useful life of the Lake) 2100 वर्ष आंकी जा रही है। 

झील की गहराई के बारे में यह भी जान लें कि झील के 10.03 प्रतिशत क्षेत्रफल की गहराई शून्य से 25 फीट, 17.9 प्रतिशत क्षेत्रफल की गहराई 25 से 35 फीट, 37.91 प्रतिषत की गहराई 50 से 75 तथा 34.15 प्रतिशत क्षेत्रफल की गहराई 75 प्रतिशत से अधिक है।
वहीं भूगोल विभाग के प्रो.जी.एल.साह द्वारा किये गये अध्ययन के अनुसार 1872 में किये गये तत्कालीन नैनी स्टेट के रेवन्यू सर्वे में नैनी झील का क्षेत्रफल 120 एकड़ यानी करीब 48.6 हैक्टेयर रिकार्ड किया गया।
आगे 1899 में सर्वे आफ इंडिया द्वारा तैयार किये गये क्षेत्रफल में मापे जाने पर झील का क्षेत्रफल घटकर 47.77 हैक्टेयर ही पाया गया, इसका कारण 1880 में नगर में आये भयंकर भूस्खलन को जिम्मेदार माना जा सकता है। आगे 1936 के सर्वे आफ इंडिया के नये नक्शे में झील का क्षेत्रफल करीब 45 हैक्टेयर ही रह गया। प्रो. साह इस कमी का कारण इस दौरान झील

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किनारे बढ़े विकास कार्यों, झील किनारे सड़कों और रिटेनिंग वाल को जिम्मेदार मानते हैं। अलबत्ता उनका मानना है कि वर्तमान में भी झील का क्षेत्रफल 45 हैक्टेयर के बराबर ही होगा। इसके अलावा प्रो. साह 1872 में नैनी झील की अधिकतम गहराई 93 फीट, 1899 में 87.3 फीट एवं 1970-80 के दशक में 27.3 मीटर यानी करीब 82 मीटर मानते हैं।
इसके साथ ही प्रो.साह ने भूगोल विज्ञान के विद्यार्थियों के साथ जून-2012 में नैनी झील के घटे जल स्तर के बाबत अध्ययन किया। पाया कि नैनी झील में 60 स्थानों पर डेल्टा उभर आये थे। इन डेल्टा के अध्ययन में पाया गया कि इस वर्ष 13 जून को झील में उपलब्ध पानी का क्षेत्रफल मात्र 43.83 हैक्टेयर पाया गया, यानी इस वर्ष झील के करीब एक हैक्टेयर क्षेत्रफल में पानी सूख कर बड़े डेल्टा बन गये थे।

एमबीटी के बड़े प्रभाव क्षेत्र में है नैनीताल
नैनीताल एमबीटी यानी मेन बाउड्री थ्रस्ट नाम के बड़े थ्रस्ट के प्रभाव में है। थ्रस्ट उस स्थिति को कहते हैं जिसमें एक चट्टान दूसरी अपनी जगह पर स्थिर चट्टान के सापेक्ष ऊपर जाती है, इसके उलट यदि चट्टान नीचे की ओर जाती है तो उसे फाल्ट कहते हैं।
प्रो.सीसी पंत बताते हैं कि बल्दियाखान के पास शिवालिक पर लघु हिमालय की चट्टान के चढ़ने के रूप में नैनीताल थ्रस्ट गुजरता है। इस कारण इस क्षेत्र में कई छोटे-छोटे टियर फाल्ट यहां बन गये। ऐसा ही एक छोटा फाल्ट ज्योलीकोट से कंुजखड़क को जोड़ता है, इसकी टियर लाइन नैनी झील को तल्लीताल डांठ के पास से झील के बीचों-बीच से गुजरते हुऐ चीना पहाड़ी पर सत्यनारायण मंदिर के पास नैना टॉल बैरियर से गुजरता है। इस फाल्ट लाइन से नैनीताल नगर दो भागों में बांट देता है। जिसके अयारपाटा की ओर स्लेट, लाइमस्टोन व डोलोमाइट की यानी अधिक चूने वाली चट्टानें हैं। यह अपेक्षाकृत नई चट्टानें हैं, जो पानी को सोखती हैं, लिहाजा इस पहाड़ी पर अधिक नमी रहती है, लिहाजा इस ओर वनस्पतियां भी खूब होती हैं। जबकि दूसरी ओर शेर का डांडा व लड़ियाकांठा की ओर की पहाड़ी पर बालू, क्वार्टजाइट व सेल यानी चूरा-चूरा होने वाले भंगुर पत्थर की चट्टानें हैं। पहले इस पहाड़ी पर लोग यहीं बालू पैदा किये करते थे।
बहरहाल, भूगर्भीय हलचलों से उभरे इस फाल्ट के कारण शेर का डांडा पहाड़ी के ऊपर उठने से डांठ पर नदी का प्रवाह अवरुद्ध होने से यहां झील का निर्माण हो गया। इस प्रकार नैनी झील को विवर्तनिक (Tectonic) झील भी कहते हैं।
 
सीवर से 10 से 15 गुना तक बढ़ जाती है झील में कोलीफार्म बैक्टीरिया व दूषित तत्वों की मात्रा
विश्व प्रसिद्ध नैनी झील के संरक्षण को किये जा रहे अनेक प्रयासों के बीच एक क्षेत्र ऐसा है, जिस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। इस कारण झील में टनों की मात्रा में गंदगी पहुंच रही है। यह कारण है सीवर का उफनना। सीवर के उफनने से झील में मानव मल में पाये जाने वाले खतरनाक कोलीफार्म बैक्टीरिया व नाइट्रोजन की मात्रा में 10 से 15 गुना तक की वृद्धि हो जाती है, जबकि फास्फोरस की मात्रा तीन गुने तक बढ़ जाती है। इस कारण झील में पारिस्थितिकी सुधार के लिये किये जा रहे कार्यों को भी गहरा झटका लग रहा है।
मानव मल में मौजूद कोलीफार्म बैक्टीरिया तथा फास्फोरस व नाइट्रोजन जैसे तत्व किसी भी जल राशि को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। शुद्ध जल में कोलीफार्म बैक्टीरिया की मौजूदगी रहती है तो यह पीलिया जैसे अनेक जल जनित संक्रामक रोगों का कारण बनता है, जबकि नैनी झील जैसी खुली जल राशियों में अधिकतम 500 एमपीएन (मोस्ट प्रोबेबल नंबर) यानी एक लीटर पानी में अधिकतम मात्रा हो तो ऐसे पानी को छूना व इसमें तैरना बेद खतरनाक हो सकता है। लेकिन नैनी झील में कोलीफार्म बैक्टीरिया की मात्रा कई बार आठ से 10 हजार एमपीएन तक देखी गई है, जोकि झील में चल रहे एरियेशन व बायो मैन्युपुलेशन के कार्यों के बाद सामान्यतया दो से तीन हजार एमपीएन तक नियंत्रित करने में सफलता पाई गई है। लेकिन बरसात के दिनों में उफनने वाली सीवर लाइनें इन प्रयासों को पलीता लगा रही हैं। नैनी झील के जल व पारिस्थितिकी पर शोधरत कुमाऊं विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. पीके गुप्ता बताते हैं कि झील का जल स्तर कम होने पर सीवर उफनती है तो झील में कोलीफार्म बैक्टीरिया की संख्या 10 से 15 गुना तक बढ़ जाती है। बरसात के दिनों में जबकि झील में पानी कुछ हद तक बढ़ने लगा है, बावजूद बीते दिनों बारिश के दौरान माल रोड सहित अन्य स्थानों पर सीवर लाइनें उफनीं तो कोलीफार्म की मात्रा में तीन गुने तक की वृद्धि देखी गई। इसी तरह नाइट्रोजन की मात्रा 0.3 मिलीग्राम प्रति लीटर से तीन गुना बढ़कर 0.8 से 0.9 मिलीग्राम प्रति लीटर तक एवं फास्फोरस तत्व की मात्रा 20 से 25 मिलीग्राम प्रति लीटर से 10 गुना तक बढ़कर 200 से 250 मिलीग्राम प्रति लीटर तक बढ़ती देखी गई है। प्रो। गुप्ता ऐसी स्थितियों में किसी भी तरह सीवर की गंदगी को झील में रोके जाने की आवश्यकता जताते हैं। वहीं जल निगम के अधिशासी अभियंता एके सक्सेना का कहना है कि नगर में सामान्य जरूरत से अधिक क्षमता की सीवर लाइन बनाई गई थी, लेकिन नगर के घरों व किचन तथा बरसाती नालियों के पानी को भी लोगों ने सीवर लाइन से जोड़ दिया है, इस कारण सीवर लाइन उफनती है, इसे रोके जाने के लिये नालियों को सीवर लाइन से अलग किया जाना जरूरी है।
 
72 फीसद लोग जाते हैं खुले में शौच
यह आंकड़ा वाकई चौंकाने वाला लगता है, लेकिन भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान रुड़की की अगस्त 2002 की रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि नगर में 72 फीसद लोग खुले में शौच करते हैं, जिनकी मल-मूत्र की गंदगी नगर के हृदय कही जाने वाली नैनी झील में जाती है। गौरतलब है कि नगर के कमजोर तबके के लोगों के साथ ही सैलानियों के साथ आने वाले वान चालकों, बाहरी नेपाली व बिहारी मजदूरों का खुले में शौच जाना आम बात है। झील विकास प्राधिकरण ने नगर में सुलभ शौचालय बनाये हैं पर उनमें हर बार तीन रुपये देने होते हैं, इस कारण गरीब तबका उनका उपयोग कम ही कर पा रहा है। बारिश आने पर ऐसी समस्त गंदगी नैनी झील में आ जाती है।
 
फास्फोरस निकालने को मछलियां निकालना जरूरी
प्रो. पीके गुप्ता के अनुसार नैनी झील में भारी मात्रा में जमा हो रहे फास्फोरस तत्व को निकालने को एकमात्र तरीका झील में पल रही मछलियों को निकालना है। प्रो. गुप्ता के अनुसार फास्फोरस मछलियों का भोजन है। यदि प्रौढ़ व अपनी उम्र पूरी कर चुकी बढ़ी व बिग हेड सरीखी मछलियों को झील से निकाला जाऐ तो उनके जरिये फास्फोरस बाहर निकाली जा सकती है। अन्यथा उनके झील में स्वतः मरने की स्थिति में उनके द्वारा खाई गई फास्फोरस झील में ही मिल जाऐगी।
 
पार्किंग समस्या के आगे प्रशासन भी लाचार
पर्वतीय पर्यटन नगरी नैनीताल में प्रशासन की सीजन से पूर्व की गई तैयारियां खासकर वाहनों की पार्किंग के मामले में सीजन शुरू होते ही पूरी तर ध्वस्त हो जाती हैं। नियमानुसार नगर की सभी पार्किंग के भरने के बाद ही फ्लैट मैदान में वाहन खड़े करने का प्राविधान है, लेकिन फ्लैट मैदान में सीजन के दौरान चलने वाली ऐतिहासिक अखिल भारतीय टेªड्स कप हॉकी प्रतियोगिता के दौरान ही, जबकि नगर की मेट्रोपोल व सूखाताल पार्किंगें खाली रहती हैं, बावजूद हॉकी कोर्ट तक मैदान वाहनों से भर जाता है। दूसरी ओर पार्किंग में बड़ी आकार की कारों को बड़ा वाहन मानकर बसों जैसे बड़े वाहनों के लिये तय दोगुना किराया वसूला जाता है, और नगर पालिका को आधा किराया और संख्या भी आधी गिनकर हर रोज करीब डेढ़ से दो लाख रुपये की आमदनी की जाती है, और नगर पालिका को महज कुछ हजार रुपये ही जबकि मैदान पर खेल गतिविधियां आयोजित करने वाले डीएसए (जिसके अध्यक्ष जिलाधिकारी होते हैं) को एक रुपया भी नहीं मिलता है। सीजन से पहले जिला प्रशासन ने हर हाल में सूखाताल की केएमवीएन की बहुमंजिला करीब 280 वाहनों की क्षमता वाली पार्किंग को भरने का वादा किया था। इस हेतु सूखाताल की पार्किंग से होटलों तक शटल टैक्सी चलाने का वायदा किया गया था, जिसे निभाने में प्रशासन पूरी तरह अक्षम रहा है। नगर में पिछले एक दशक में जहां वाहनों की संख्या कई गुना बढ़ गई है, वहीं पार्किंग क्षमता में कुछ सौ की बढ़ोत्तरी भी नहीं हुई है। और ऐसी स्थिति से फ्लैट मैदान का बुरा हाल हो गया है।
 
झील सूख जाऐ तो नैनी ही रह जाने का है खतरा
सरोवरनगरी में वर्ष  2012 गर्मियों में तापमान अधिकतम 31 डिग्री व न्यूनतम 21 डिग्री तक ही पहुंचा, बावजूद नैनी झील के चारों छोरों-तल्लीताल बोट स्टेंड, फांसी गधेरा व मल्लीताल नंदा-सुनंदा पार्क व बोट हाउस क्लब बोट स्टेंड के पास उभरे डेल्टा इतने बढ़े मैदानों तक फैल गये कि उनमें हॉकी, फुटबाल, क्रिकेट या समुंदर के बीच पर खेले जाने वाले बीच बॉलीबाल जैसा कोई खेल भी खेला जा सकता था। नैनी झील की ऐसी हालत लंबे समय बाद हुई। ऐसे में इसी दौरान पांच जून को आये विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर कमोबेश हर नगर वासी के माथे पर इस बात को लेकर चिंता की लकीरें थीं कि कहीं झीलों का यह शहर नैनीताल से मात्र नैनी बनकर ही न रह जाऐ।
नैनीताल झील इस वैश्विक पचान वाले शहर का हृदय व जीवन रेखा कही जाती है। झील है तो यह शहर और यहां की समस्त गतिविधियां हैं, और इस पर बहुत हद तक शहर ही नहीं देश व प्रदेश का पर्यटन और विदेशी सैलानियों के जरिये विदेशी पूंजी अर्जित करने का दायित्व भी है। लेकिन इधर झील के चारों छोरों पर जिस तरह कमोबेस हर तरह के खेल खेलने लायक मैदान उभर आये, उससे नगर का हर निवासी तो चिंतित था ही, यहा आने वाले सैलानी भी चिंता जताये बिना नहीं रह पा रहे थे। इन परिस्थितियों का तात्कालिक कारण तो सर्दियों के बाद से वर्षा न होना बताया गया, साथ ही इसके प्राकृतिक जल श्रोतों में बेतहाशा निर्माण होना भी प्रमुख कारण रहा।
इतिहासकार व पर्यावरणविद् डा.अजय रावत के अनुसार 19वीं शताब्दी में झील के जलागम क्षेत्र में 321 जल श्रोत मिलने के प्रमाण हैं, इनमें सूखाताल झील प्रमुख थी, लेकिन सभी जगह वैध-अवैध निर्माणों की बाढ़ ने जल श्रोत सुखा दिये हैं। डा. रावत के अनुसार अब पूरे जलागम क्षेत्र में 10 फीसद श्रोत भी नहीं बचे होंगे। दूसरी ओर नगर में र ओर कंक्रीट की स़कें बारिश के दौरान पानी को धरती में सोखने के बजाय नहर की तरह सीधे शहर से बाहर ले जाने का कार्य करती हैं। यही कार्य सीवर लाइन भी करती है, जिसमें शहर की नालियां जोड़ दी गई हैं। वहीं झील की धमनियां कहे जाने वाले अंग्रेजों के द्वारा निर्मित नाले झील में पानी की जगह मलवा लाने का कार्य कर रहे हैं। तीसरी ओर सीजन में जबकि बारिश नहीं हुई है, वहीं जल संस्थान की ओर से प्रतिदिन 17.5 मीट्रिक लीटर पर डे (एमएलडी) यानी प्रतिदिन करीब 17.5 लाख लीटर पानी पेयजल के रूप में उपयोग किया जा रहा है। राजभवन, सेना के कैंट क्षेत्र सहित अन्य कई जगह भी नैनी झील के पानी की आपूर्ति अलग से होती है। ऐसे में नैनी झील की वर्तमान हालत हर किसी को कचोट रही है।
 
गांधी जी के चरणों में पड़ता है शहर भर का कूड़ा
1929 में जिस स्थान पर गांधी जी खड़े हुऐ थे, और उनके एक कौल पर नगर वासियों ने उन्हें उनके ‘हरिजन उद्धार’ कार्यक्रम के लिये तत्काल एकत्र कर 24 हजार (आज के हिसाब से करोड़ों) रुपये और स्वर्णाभूषण दे दिये थे, उसी स्थान पर आज मूर्ति रूप में खड़े गांधी जी के चरणों में उसी शहर के लोग ऊपर तो कभी-कभार ही फूल चढ़ाने का अभिनय करते हैं, जबकि नीचे शहर भर का कूढ़ा डाल रहे हैं। जिला व मंडल मुख्यालय में तमाम अफसरों की नाक के नीचे और झील पर करोड़ों रुपये खर्चने व सफाई के कई अभियान चलाने के बावजूद यहां गांधी मूर्ति के नीचे डांठ में कई ट्रकों के हिसाब से कूड़ा, कचरा व प्लास्टिक इकट्ठा हो गया है।
सर्वविदित तथ्य है कि गांधी जी 1929 में अपने कुमाऊं भ्रमण के दौरान 14 जून को नैनीताल आये थे। तब डांठ पर उनका काफिला करीब उसी स्थान पर रुका था, जहां आज उनकी आदमकद  मूर्ति खड़ी है। इस स्थान पर गांधी जी ने अपने हरिजन उद्धार कार्यक्रम के लिये नगर वासियों से अनुग्रह की मांग की थी, जिस पर नगर वासियों ने उन्हें 24 हजार रुपये की धनराशि इकट्ठा करके दी थी। यह राशि आज के हिसाब से करोड़ों रुपये में होती। इस पर गदगद होकर गांधी जी ने कहा था कि अपनी विपन्न आर्थिक स्थिति के बावजूद यहां के लोगों ने उन्हें जो मान और सम्मान दिया है वह उनके जीवन की अमूल्य पूंजी होगी। लेकिन आज उनकी मूर्ति का स्थल, जोकि इस पर्यअन नगरी का प्रवेश द्वार भी है। यहां से देश-दुनिया के सैलानी, राज्य व केंद्र सरकार के वरिष्ठ नौकरशाह, मंत्री आदि कमोबेश रोज ही गुजरते हैं, और उस दुर्गंध को महसूस करते हैं, जो गांधी जी की मूर्ति के ठीक नीचे एकत्र की गई टनों गंदगी के सढ़ने से आ रही होती है।
दरअसल, नगर की प्राणदायिनी नैनी झील में नगर भर के कूढ़े के जाने का सिलसिला तमाम प्रयासों, करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने और झील की सफाई के नाम पर अखबारों में फोटो छपवाने के नाटकों के बावजूद बदस्तूर जारी है। खासकर बारिश होने पर नैनी झील, नगर की सफाई व्यवस्था की पोल तो खोलती ही है, नगर भर के विष को गंदगी के रूप में पी भी जाती है, यह गंदगी आखिर में हवाओं के साथ तल्लीताल सिरे पर गांधी मूर्ति के निकट आ जाती है। इसे उठाने के लिये नगर पालिका व लोनिवि के द्वारा मजदूर लगाये जाते हैं, पर सच्चाई मूर्ति के नीचे का नजारा देखकर और वहां से उठने वाली दुर्गंध से साफ हो जाती है। मजदूरों पर जिम्मेदार विभागीय अधिकारी नजर नहीं रखते, फलस्वरूप मजदूर गंदगी उठाने के बजाय मूर्ति के नीचे सरका देते हैं। यही गंदगी गर्मी बढ़ने पर दुर्गंध से बजबजा उठती है, पर किसी जिम्मेदार विभाग का ध्यान इस ओर नहीं जाता है। इस बारे में सामाजिक कार्यकर्ता हनुमान प्रसाद कहते हैं कि राष्ट्रपिता गांधी पर बातें तो बहुत होती हैं, परंतु उनके विचार कार्य रूप में परिणत नीं होते। गांधी जी के सपनों का स्वराज तो मिला पर सुराज नहीं, जिसकी परिणति यहां साफ दिखाई देती है।
 
केवल पांच-छः फीसद की दर से ही बड़ रहा है नैनीताल का पर्यटन
जी हां, नैनीताल में भले सीजन में पर्यटकों की जितनी बड़ी संख्या, भीड़-भाड दिखाई देती हो, पर पर्यटन विभाग के आंकड़ों को सही मानें तो प्रकृति के स्वर्ग कहे जाने वाले विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी में अपार संभावनाओं के बावजूद केवल पांच से छः फीसद की दर से ही पर्यटन बढ़ रहा है, जबकि विभाग भी आठ से 10 फीसद की दर से पर्यटन बढ़ने की उम्मीद जताता रहा है।
उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश कहा जाता है, तो इसमें निस्संदेह बड़ी भूमिका सरोवरनगरी नैनीताल नगर की है। लेकिन सरकारी उदासीनता के चलते राज्य बनने के बाद पर्यटन विभाग का ठीक से ढांचा तक न बन पाने जैसे कारण राज्य एवं नैनीताल का पर्यटन सैलानियों की संख्या में वृद्धि के बावजूद गर्त की ओर ही जाता नजर आ रहा है। सरोवरनगरी में सैकड़ों की संख्या में होटल व गेस्ट हाउस मौजूद हैं, इनमें से 144 तो सराय एक्ट में ही पंजीकृत हैं, लेकिन इनमें से केवल 72 होटल व 55 पेइंग गेस्ट ही पर्यटन विभाग को अपने यहां ठहरने वाले सैलानियों के आंकड़े उपलब्ध कराते हैं। इस आधार पर पर्यटन विभाग को मिलने वाले सैलानियों संबंधी आंकड़ों को सही मानें तो वर्ष 2010 में 2009 के मुकाबले 37,149 सैलानी अधिक आये जो कि 4.9 फीसद अधिक थे। इसी तरह बीते वर्ष 2011 में 2010 के मुकाबले छह फीसद के साथ 47,700 सैलानियों की वृद्धि हुई। यह स्थिति तब है जबकि नगर में पर्यटन सुविधाओं के नाम पर कोई वृद्धि नहीं हुई। इस अवधि में न तो नगर में एक भी अतिरिक्त वाहन पार्किंग बनी और न नगर से बाहरी शहरों से ‘कनेक्टिविटी’ के लिहाज से टेªनों में कोई वृद्धि हुई। नगर स्थित पर्यटन सूचना केंद्र के अधिकारी बीसी त्रिवेदी मानते हैं कि नगर में आने वाले सैलानियों की वास्तविक संख्या पांच गुना तक भी हो सकती है। उत्तराखंड होटल ऐसोसिऐशन के महासचिव प्रवीण शर्मा का मानना है कि नगर में बेहतर सुविधाऐं, मुंबई, पंजाब व पश्चिम बंगाल से बेहतर आवागमन के साधन हों तो नगर के पर्यटन को पंख लग सकते हैं। पर्यटन व्यवसायी नगर में होटलों की किराया दरें तय न होने, मनोरंजन के लिये फिल्म थियेटर तक न होने जैसे कारणों को भी नगर की पर्यटन विस्तार की रफ्तार के कम रहने का प्रमुख कारण मानते हैं।
 
नैनीताल में वर्षवार आये सैलानियों की संख्याः
वर्ष      देशी सैलानी    विदेशी सैलानी       कुल
2009 7,49,556     5,722          7,55,278
2010 7,86,705     7,123          7,93,828
2011 8,34,405     9,410          8,43,815
 
‘जंक फूड’ खाकर ‘मुटा’ रही हैं नैनी झील की परियां
जी हां, भले देश की आधी आबादी को आज भी रोटी के लिये कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा हो, पर देश-दुनिया की मशहूर नैनी झील की परियां कही जाने वाली मछलियां ब्रेड-बिस्कुट जैसा ‘जंक फूड’ डकार रही हैं। आसानी से मिल रहे इस लजीज भोजन का स्वाद मछलियों की जीभ पर ऐसा चढ़ा है कि वह अपने परंपरागत ‘जू प्लेंकन’, काई, छोटी मछलियांे व अपने अंडों जैसे परंपरागत भोजन की तलाश में झील में घूमने के रूप में तनिक भी वर्जिश करने की जहमत उठाना नहीं चाहतीं। ऐसे में वह इतनी मोटी व भारी भरकम हो गई हैं कि कल तक अपनी दुश्मन मानी जाने वाली बतखों को आंखें दिखाने लगी हैं। लेकिन विशेषज्ञ इस स्थिति को बेहद अस्थाई बताते हुऐ खुद इन मछलियों के जीवन तथा झील के पारिस्थितिकी के लिये बड़ा खतरा मान रहे हैं।
नैनी झील देश-दुनिया का एक ख्याति प्राप्त सरोवर है, और किसी भी अन्य जलराशि की तरह इसका भी अपना एक पारिस्थितिकी तंत्र है, किंतु सरोवरनगरी की इस प्राणदायिनी झील में स्थानीय लोगों व सैलानियों के यहां पलने वाली मछलियों के प्रति दर्शाऐ जाने वाले प्रेम के अतिरेक के कारण झील के पारिस्थितिकी तंत्र के साथ ही इनकी अपनी जिंदगी पर खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। लोग अपने मनोरंजन तथा धार्मिक मान्यताओं के चलते स्वयं के लाभ के लिये इन्हें दिन भर खासकर तल्लीताल गांधी मूर्ति के पास से ब्रेड और बिस्कुट खिलाते रहते हैं। तल्लीताल में बकायदा झील किनारे ब्रेड-बंद व परमल आदि की दुकान खुल गई है, जहां से रोज हजारों रुपये की सामग्री मछलियों को खिलाई जा रही है, जबकि बगल में ही प्रशासन ने खानापूर्ति करते हुऐ मछलियों को भोजन खिलाना प्रतिबंधित बताता हुआ बोर्ड लगा रखा है। यह लजीज भोजन चूंकि इन्हें बेहद आसानी से मिल जाता है, इसलिये हजारों की संख्या में पूरे झील की मछलियां इस स्थान पर एकत्र हो जाती हैं। इससे जहां वह झील में मौजूद भोजन न खाकर झील के पारिस्थितिकी तंत्र में अपना योगदान नहीं दे पा रहे हैं, वहीं उनकी भोजन की तलाश में वर्जिश भी नहीं हो पा रही, इससे वह मोटी होती जा रही हैं। भारत रत्न पं. गोविंद वल्लभ पंत उच्च स्थलीय प्राणि उद्यान के वरिष्ठ जंतु चिकित्सक डा. एलके सनवाल इस स्थिति को बेहद खतरनाक मानते हैं। उनके अनुसार मनुष्य की तरह ही जीव-जंतुओं में भी अपने परंपरागत भोजन के बजाय ‘जंक फूड’ खाने से शरीर को एकमात्र तत्व प्रोटीन मिलता है, जिससे वह मोेटी हो जाती हैं। परिणामस्वरूप उन्हें अनेक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता घट सकती है तथा जल्दी मृत्यु हो सकती है। डा. सनवाल को आशंका है कि आगे दो-तीन पीढ़ियों के बाद उनमें मनुष्य की भांति ही ‘स्पर्म’ बनने कम हो जाऐंगे, जिससे वह नयी संतानोत्पत्ति भी नहीं कर पाऐंगी, उनके अंडों से बच्चे उत्पन्न नहीं होंगे, अथवा उनके बच्चों में कोई परेशानी आ जाऐगी। वह झील की सफाई का अपना परंपरागत कार्य पूरी तरह बंद कर देंगे। ब्रेड-बंद खिलाने से उनका प्राकृतिक ‘हैबीटेट’ भी प्रभावित हो गया है। इससे उनके अवैध शिकार को भी प्रोत्साहन मिल रहा है, कई लोग एक स्थान पर इकट्ठी मिलने वाली इन मछलियों को आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं। मछलियां चूंकि ब्रेड-बंद के लिये तल्लीताल में बड़ी संख्या में एकत्र होती हैं, लिहाजा बरसात के दिनों में झील के गेट खुलने पर वह बलियानाले में बहकर जान गंवा बैठती हैं। वह इस समस्या से निदान के लिये झील के तल्लीताल शिरे पर ऊंची लोहे की जाली लगाने की आवश्यकता जताते हैं, ताकि लोग इस तरह उन्हें ब्रेड-बंद न खिला पाऐं।
हालांकि एक अन्य वर्ग भी है जो नगर में पर्यटन के दृट्ठिकोण से मछलियों को सीमित मात्रा में बाहरी भोजन खिलाऐ जाने का पक्षधर भी है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के डा. ललित तिवारी कते हैं कि मछलियों को चारा खिलाने से एक आनंद की अनुभूति होती है। सैलानियों के लिये यह एक आकर्षण है, साथ ही धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मछलियों को भोजन खिलाने से चित्त शांत होता है। बहरहाल, वह भी सीमित मात्रा की ही हिमायत करते हैं। जबकि झील विकास प्राधिकरण के अधिकारी इस स्थिति को गंभीर मानते हैं। उनका मानना है कि मछलियों को लगाई जा रही जंक फूड की लत गत वर्षों से दुबारा कृत्रिम आक्सीजन के जरिये जिलाई जा रही नैनी झील के लिये बेहद खतरनाक हो सकता है।
2012 में इतिहास में सर्वाधिक गिरा गर्मियों में जल स्तर
पूरी बरसात के बाद भी नहीं खुल पाये झील के गेट
किसी भी जल राशि के लिए ‘पानी बदल’ कर ‘रिफ्रेश’ यानी तरोताजा होना जरूरी होता है। मूतातः पूरी तरह बारिश पर निर्भर नैनी झील को तरोताजा होने का मौका वर्ष में केवल वर्षा काल में मिलता है। इस वर्ष सावन के बाद भादौ माह भी बीतने को है, बावजूद अभी झील का जलस्तर आठ फीट भी नहीं पहुंचा है, जो कि इस माह की जरूरत के स्तर 11 फीट से तीन फीट से अधिक कम है। इधर जिस तरह बारिश का मौसम थमने का इशारा कर रहा है, ऐसे में चिंता जताई जाने लगी है कि इस वर्ष झील के गेट नहीं खोले जा सकेंगे। परिणामस्वरूप झील ‘रिफ्रेश’ नहीं हो पायेगी। भू वैज्ञानिक प्रो. सीसी पंत के अनुसार नैनी झील का निर्माण करीब 40 हजार वर्ष पूर्व तब की एक नदी के बीचों-बीच फाल्ट उभरने के कारण वर्तमान शेर का डांडा पहाड़ी के अयारपाटा की ओर की पहाड़ी के सापेक्ष ऊपर उठ जाने से तल्लीताल डांठ की जगह पर नदी का प्रवाह रुक जाने से हुआ था। इस प्रकार नैनी झील हमेशा से बारिश के दौरान भरती और इसी दौरान एक निर्धारित से अधिक जल स्तर होने पर अतिरिक्त पानी के बाहर बलियानाला में निकलने से साफ व तरोताजा होती है। अंग्रेजी दौर में तल्लीताल में झील के शिरे पर गेट लगाकर झील के पानी को नियंत्रित करने का प्रबंध हुआ, जिसे स्थानीय तौर पर डांठ कहा जाता है। गेट कब खोले जाऐंगे, इसका बकायदा कलेंडर बना, जिसका आज भी पालन किया जाता है। इसके अनुसार जून में 7.5, जुलाई में 8.5, सितंबर में 11 तथा 15 अक्टूबर तक 12 फीट जल स्तर होने पर ही गेट खोले जाते हैं। गत वर्ष 2011 से बात शुरू करें तो इस वर्ष नगर में सर्वाधिक रिकार्ड 4,183 मिमी बारिश हुई थी। झील का जल स्तर तीन मई से एक जुलाई के बीच शून्य से नीचे रहा था, और 29 जुलाई को ही जल स्तर 8.7 फीट पहुंच गया था, जिस कारण गेट खोलने पड़े थे। इसके बाद 16 सितंबर तक कमोबेश लगातार गेट अधिकतम 15 इंच तक भी (15 अगस्त को) खोले गये। जबकि इस वर्ष गर्मियों में 30 अप्रेल से 17 जुलाई तक जल स्तर शून्य से नीचे (अधिकतम माइनस 2.6 फीट तक) रहा था, जिसका प्रभाव अब भी देखने को मिल रहा है। अब तक नगर में 2,863.85 मिमी बारिश हो चुकी है, जो कि नगर की औसत वर्षा 2500 मिमी से अधिक ही है, बावजूद चार सितंबर तक जल स्तर 7.8 फीट ही पहुंच पाया है। स्पष्ट है कि गेट खोले जाने के लिये अभी भी इस माह की 15 तारीख तक 3.2 फीट और 15 अक्टूबर तक 4.2 फीट की जरूरत है, जो वर्तमान हालातों में आसान नहीं लगता। साफ है कि झील का इस वर्ष ‘रिफ्रेश’ होना मुश्किल है। नैनी झील पर शोधरत कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रो.पीके गुप्ता भी झील से पानी निकाले जाने को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार झील के गेट खुलते हैं तो इससे झील की एक तरह से ‘फ्लशिंग’ हो जाती है। झील से काफी मात्रा में प्रदूषण के कारक ‘न्यूट्रिएंट्स’ निकल जाते हैं। वहीं राज्य मौसम विज्ञान केंद्र के आनंद शर्मा ने बताया कि नैनीताल जनपद में इस वर्ष औसत 1,227 मिमी बारिश हुई है जो कि औसत 1,152 मिमी से छह फीसद कम है।
 
लुटती जा रही है, कुछ पाती नहीं है नैनी झील
  • रोज निकाला जाता है 25 एमएलडी से अधिक पानी, आता है सिर्फ बारिश के दिनों में
  • सबसे बढ़ा श्रोत सूखाताल सहित जलागम क्षेत्र का बढ़ा हिस्सा कंक्रीट के जंगल में तब्दील
देश-दुनिया की सुंदरतम प्राकृतिक झीलों में शुमार और प्रदेश की विरासत नैनी झील की खूबसूरती दिन-ब-दिन लुटती चली जा रही है। झील का जीवन रूपी जल बढ़ते मानवीय उपयोग व प्राकृतिक रिसाव के साथ दिन-प्रतिदिन घटता चला जा रहा है। विभिन्न विभाग, नगरवासी, सैलानी, पर्यटन व्यवसायी अनेकों राष्ट्रीय व प्रदेश सरकार की योजनाओं व सैलानियों से झील से प्रतिदिन करोड़ों रुपये की आय तथा करीब हर रोज करीब 25 एमएलडी पानी तक प्रतिदिन प्राप्त करते हैं, पर झील को पानी की भरपाई के लिये भी बारिश का इंतजार करना पड़ता है, और पानी भी उसे पूरे शहर के मलवे, कीचड़ व सीवर की गंदगी के बिना नहीं मिल पाता है। झील में खर्च के नाम पर कुछ हो रहा है तो सिर्फ एयरेशन और बायो मैन्युपुलेशन, जिसके जरिये झील मानो डायलिसिस पर पढ़ी झील को कृत्रिम सांसें दी जा रही हैं।
नैनीताल का ताल देश-दुनिया को प्रकृति की सबसे अनमोल धरोहर कहा जाता है। जल ही जीवन है का सूत्र यहां भी काम करता है। जल है तो ताल है, और ताल है तो ही नैनी ताल है। अपने इसी ताल और खूबसूरती के बल पर यह नगर अंग्रेजी शासनकाल में छोटी बिलायत तक कहा गया, और नार्थ प्रोविंस की राजधानी भी रहा। देश की नदियों के संरक्षण के लिये चलने वाली परियोजना कश्मीर की डल झील से भी पहले व कमोबेश देश में पहली बार इस छोटी सी झील के संरक्षण के लिये स्वीकृत हुई, जिसके तहत यहां 60 करोड़ रुपये की झील संरक्षण परियोजना के कार्य हुऐ, जिसमें से वास्तविक अर्थों में झील के संरक्षण हेतु केवल 4.9 करोड़ की प्रारंभिक लागत और करीब तीन लाख रुपये वार्षिक खर्च से एयरेशन का कार्य किया जा रहा है, और सही मायनों में धनाभाव की मार झेलता हुआ बमुश्किल चल पा रहा है। इसके अलावा नैनी झील का ही प्रभाव रहा कि नगर के लिये शुरू में 360 करोड़ रुपये तक की प्रचारित की गई जएनएनयूआरएम योजना के तहत 4.68 करोड़ रुपये मलीन बस्तियों के पुनरुद्धार, ठोस कूड़ा अपशिट्ठ प्रबंधन, पेयजल प्रबंधन आदि कार्यों के लिये स्वीकृत हुऐ हैं। इसके अलावा पेयजल पुर्नगठन के लिये एडीबी से पहले चरण में 39.58 करोड़ व द्वितीय चरण में जल वितरण के लिये 3.27 करोड़ रुपये की परियोजनाऐं चल रही हैं। लेकिन मजेदार बात यह है कि इनमें से कोई भी परियोजना वास्तवित तौर पर नैनी झील के संरक्षण के लिये कुछ भी दीर्घकालीन हित का कार्य नहीं करने जा रही है। नैनी झील के सबसे बढ़े रिजर्वायर (मुख्य जल संरक्षक) के रूप में पहचानी जाने वाली सूखाताल झील को जल संरक्षित करने योग्य बनाने के लिये तक कुछ नहीं किया जा रहा, उल्टे यहां से रिस कर आने वाले जल को वहीं नलकूप बनाया कर निकाला जा रहा है, बरसातों में झील के भरने से झील में बने घरों को बचाने के नाम पर पानी को झील से जल्दी निकालने के लिये पाइप लाइनें डालने का कार्य शुरू होने वाला है। नगर के आम लोग बताते हैं कि 1990 के दशक तक सूखाताल झील में वर्ष में तीन-चार माह तक नौकायन होता था, और यह लंबे समय तक नैनी झील को धीरे-धीरे रिसाव के जरिये पानी उपलब्ध कराती थी। बाद के वर्षों में सूखाताल झील अतिक्रमण की चपेट में आ गई। बरसात में इसके भरने से इसमें बने घरों को पानी से बचाने के लिये पानी पंप लगाकर बार निकाला जाने लगा। नगर के कंक्रीट की सड़कें बारिश के दौरान पानी के रिसाव का क्षेत्र सीमित करने के साथ पानी को किसी नहर की तरह सीधे बहाकर झील में लाने लगी। नालियों को सीवर लाइन से जोड़ दिया गया, परिणामस्वरूप सीवर लाइनें उफनकर गंदगी झील में प्रवाहित करने लगी और सीवर लाइन के जरिये बारिश का पानी सीधे नगर से बाहर जाने लगा। झील भर भी गई तो गेट खोलकर उसका पानी भी बाहर निकाल दिया गया। दूसरी ओर 17.5 एमएलडी पानी नगर में और करीब 7.5 एमएलडी पानी निकटवर्ती बल्दियाखान, बेलुवाखान, एरीज, मनोरा आदि गांवों से लेकर एयरफोर्स भवाली व लड़ियाकांठा तक को पेयजल के लिये तथा शेष ग्रांड होटल सहित अन्य स्थानों से रिसकर झील से बाहर निकल जाता है। इसलिये झील बरसात में लबालब भरने के बावजूद जल्द ही खाली हो जाती है। नगर पालिका के पूर्व उपाध्यक्ष किशन पांडे कहते हैं कि यदि एक वर्ष किसी कारण पानी न बरसे तो झील पूरी तरह सूख सकती है। वह झील के संरक्षण हेतु सूखाताल झील को विकसित किये जाने, नगर में नया डेªनेज सिस्टम विकसित किये जाने तथा पेयजल की राशनिंग किये जाने की भी आवश्यकता जताते हैं। वहीं वरिष्ठ पत्रकार प्रयाग पांडे कहते हैं कि नैनी झील प्रदेश का बड़ा पर्यटन उत्पाद भी है, जिसे सभी लूट रहे हैं, पर इसके संरक्षण के लिये कोई कुछ नहीं कर रा है।
 
कोई एक जिम्मेदार विभाग नहीं
नैनी सरोवर से जल संस्थान करीब 19 लाख लीटर पेयजल प्रतिवर्ष निकालकर करोड़ों रुपये अर्जित करता है। झील विकास प्राधिकरण विभिन्न शुल्कों के माध्यम से, नगर पालिका झील में नौकायन कराकर तथा नगर के पर्यटन व्यवसायी परोक्ष व सीधे तौर पर नैनी झील से करोड़ों रुपये का विदोहन करते हैं। लोनिवि, पालिका सहित विभिन्न विभाग झील के नाम पर करोड़ों रुपये की योजनाऐं ले आते हैं, पूर्व में झील के जल पर सिंचाई विभाग नियंत्रण करता था, लेकिन इधर समस्त विभाग झील की जिम्मेदारी के नाम पर पीछे हो जाते हैं। ऐसे में पूर्व कुमाऊं आयुक्त एस राजू को कहना पढ़ा था कि झील यदि किसी की नहीं है तो मेरी (सरकार की) है, क्योंकि मैं सरकार का प्रतिनिधि हूं। ऐसे में झील के प्रति चिंतित लोग झील की जिम्मेदारी किसी भी एक विभाग को दिये जाने की आवश्यकता जताते हैं।
 
गहन शोध तो दूर, नैनी झील का जल स्तर मापने का ही पूरा प्रबंध नहीं
प्रदेश के प्रमुख पर्यटन केंद्र विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल के साथ ही राज्य के बड़े तराई-भावर क्षेत्र के भू-जल स्तर को प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से प्रभावित करने वाली नैनी झील मानो भगवान भरोसे ही है। केवल झील के जल स्तर की ही बात करें तो महज इतना कह दिया जाता है कि नगर में बढ़ते सीमेंट-कंक्रीटीकरण, सूर्य की गरमी से कम-ज्यादा होने वाला वाष्पीकरण, नालों के 1गंदगी से पटने, झील की तलहटी में कचरा पटने से प्राकृतिक जल श्रोतों का न फूटना तथा मानवीय गतिविधियों के साथ जल के बढ़ती मांग प्रमुख कारण है। गाहे-बगाहे झील से बड़ी मात्रा में पानी के रिसने के कयास भी लगाये जाते हैं, लेकिन इस बारे में कोई भी बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती, क्योंकि इस बारे में लंबे समय से कोई औपचारिक शोध नहीं हो रहे हैं। ऐसे में देश-प्रदेश की इस बड़ी धरोहर का कभी किसी अंजान कारण से पूरी तर क्षरण हो जाऐ तो आश्चर्य न होगा।
नैनी झील के घटते-बढ़ते जल स्तर को झील नियंत्रण कक्ष में दर्ज झील के जलागम क्षेत्र में होने वाली बारिश-बर्फवारी के सापेक्ष देखें तो यह किसी अबूझ पहेली से कम नहीं लगता। कई बार ऐसा होता है कि बारिश अधिक होती है, तो भी झील का जल स्तर नीचे गिरता जाता है, और कभी कम बारिश के बावजूद भी जल स्तर अधिक दिखता है। वर्ष में कभी झील का जल स्तर माल रोड तक आ जाता है, और इसके गेट खोलने की नौबत आती है तो ऐसे मौके भी आये हैं जब लोग झील के इस कदर खाली हो जाना देखने की दावे करते हैं कि वहां भुट्टे आदि की दुकानें लग गई थीं। इस वर्ष हुऐ हालातों को भी ऐतिहासिक बताते हुऐ कहा गया कि इतना जल स्तर कभी नहीं गिरा था।
आंकड़ों को यदि देखें तो जहां फरवरी माह में झील का जल स्तर 1980 में 114.5 मिमी बारिश होने के बावजूद 4.8 फीट रहा था तो 1985 में मात्र 6.4 मिमी बारिश होने के बावजूद 3.1 फीट रहा, जो अब तक का फरवरी माह का न्यूनतम जल स्तर भी है। वहीं फरवरी माह में ही झील का जल स्तर 1989 में 10.07 फीट व 91 में 10.34 फीट भी रहा है, जबकि इस वर्ष 18 फरवरी को 4.9 फीट तक गिर गया जो कि बीते तीन वर्षों में इस तिथि को न्यूनतम रहा, अलबत्ता वर्ष 2009 में इस तिथि को जल स्तर 4.8 फीट था। 
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