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March 2, 2024

Nainital Samagra : ‘प्रकृति के स्वर्ग’ नैनीताल में जाम और समस्याओं के अलावा भी इतना कुछ है जो दुनिया के किसी दूसरे हिल स्टेशन में नहीं…

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Nainital Samagra

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-क्या नहीं…क्या-क्या नहीं, यह भी…वह भी, यानी “सचमुच स्वर्ग”: ‘छोटी बिलायत´ हो या `नैनीताल´, हमेशा रही वैश्विक पहचान (Nainital Samagra)

प्रकृति का स्वर्ग कही जाने वाली सरोवर नगरी नैनीताल हालांकि आदि-अनादि काल से, ‘त्रिऋषि सरोवर’ के रूप में आदि शक्ति माता नयना की नगरी के रूप में पहचान रखती है, लेकिन आधुनिक दौर में 18 नवंबर 1841 को पहली बार पीटर बैरन नाम के पहले अंग्रेज के इस स्थान पर आने का दावा किया जाता है, हालांकि इस दावे को यह तथ्य काट देता है कि 1823 के आसपास कुमाऊं के पहले कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल कुमाऊं का पहला लेंड सैटलमेंट करने के दौरान यहां आये थे। बहरहाल, कुछ लोग 18 नवंबर को नैनीताल का ‘बर्थ डे’ यानी ‘जन्म दिन’ भी मनाते हैं। इस मौके पर जानें नैनीताल के बारे में कई जाने-अनजाने तथ्य….. संपादक

डॉ. नवीन जोशी, नैनीताल (Nainital Samagra)। सरोवर नगरी नैनीताल को कभी विश्व भर में अंग्रेजों के घर `छोटी बिलायत´ के रूप में जाना जाता था, और अब नैनीताल के रूप में भी इस नगर की वैश्विक पहचान है। इसका श्रेय केवल नगर की अतुलनीय, नयनाभिराम, अद्भुत, अलौकिक जैसे शब्दों से भी परे यहां की प्राकृतिक सुन्दरता को दिया जाऐ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह भी पढ़ें : गर्मी से परेशान हो दिल्ली-एनसीआर व उत्तरी भारत से एक-दो दिन की छुट्टी में घूमने की सोच रहे हैं तो यह हिल स्टेशन हो सकता है पहली पसंद

नैनीताल नगर का पहला उल्लेख “त्रि-ऋषि सरोवर” के नाम से स्कंद पुराण के मानस खंड में मिलता है, कहा जाता है कि अत्रि, पुलस्त्य व पुलह नाम के तीन ऋषि कैलास मानसरोवर झील की यात्रा के मार्ग में इस स्थान से गुजर रहे थे कि उन्हें जोरों की प्यास लग गयी। इस पर उन्होंने अपने तपोबल से यहीं मानसरोवर का स्मरण करते हुए एक गड्ढा खोदा और उसमें मानसरोवर झील का पवित्र जल भर दिया।

इस प्रकार नैनी झील का धार्मिक महात्म्य मानसरोवर झील के तुल्य ही माना जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार नैनी झील को देश के 64 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव जब माता सती के दग्ध शरीर को आकाश मार्ग से कैलाश पर्वत की ओर ले जा रहे थे, इस दौरान भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर को विभक्त कर दिया था। 

तभी माता सती की बांयी आँख (नैन या नयन) यहाँ (तथा दांयी आँख हिमांचल प्रदेश के नैना देवी नाम के स्थान पर) गिरी थी, जिस कारण इसे नयनताल, नयनीताल व कालान्तर में नैनीताल कहा गया. यहाँ नयना देवी का पवित्र मंदिर स्थित है।

समुद्र स्तर से 1938 मीटर (6358 फीट) की ऊंचाई पर स्थित नैनीताल करीब दो किमी की परिधि की 1434 मीटर लंबी, 463 मीटर चौड़ाई व अधिकतम 28 मीटर गहराई व 464 हेक्टेयर में फैली की नाशपाती के आकार का झील के गिर्द नैना (2,615 मीटर (8,579 फुट), देवपाटा (2,438 मीटर (7,999 फुट)) तथा अल्मा, हांड़ी-बांडी, लड़िया-कांटा और अयारपाटा (2,278 मीटर (7,474 फुट) की सात पहाड़ियों से घिरा हुआ बेहद खूबसूरत पहाडी शहर है। 

जिला गजट के अनुसार नैनीताल 29 डिग्री 38′ उत्तरी अक्षांश और 79 डिग्री 45′ पूर्वी देशांतर पर स्थित है ।

Places to visit nearby:

Sr.

Place to Visit

Height

Distance

How to reach

Places to sightseeing

1.

Tiffin Top

2292 Mtrs

4Kms

2Kms thru Jeep / Walk or Horse Ride

Himalayas & Nainital City

2.

Lands end

2100 Mtrs

2Kms

1Kms thru Jeep / Walk or Horse Ride

Jungle View / Khurpatal Village View

3.

Him Darshan

2275 Mtrs

3Kms

Jeep / Walk / Horse

Mid-Himalayan Range

4.

Snow View

2270 Mtrs

3.5Kms

3Kms thru Jeep / Walk or Horse Ride or Rope Way

Himalayan Peaks (Nanda Devi, Trishul, Nandakhaat, Pindari, etc)

5.

Nayana Peak (China Peak)

2611 Mtrs

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Highest point in Nainital. See Himalayan Range and Nainital city.

6.

Camels Back

2500 Mtrs

3Kms

Trek / Horse Ride

Nainital City

7.

Hanuman Garhi

1950 Mtrs

4Kms

Jeep / Bus / Walk

Hanuman Temple, Sunset View, Observatory nearby

8.

Zoo

2100 Mtrs

3Kms

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Hilly environ animals & birds

9.

Kilburi

 

8Kms

Jeep / Bus / Walk

Flora n Fauna, Himalayan Range

10.

Khurpataal

 

7Kms

Jeep / Bus / Walk

Lake, Village environ

11.

Bhimtal, Saattaal, Naukuchiyataal, Ghorakhaal, Bhowali

 

22Kms

Bus / Jeep

Lakes visit, Golu Devta’s temple, Fruit Market

 12.

One day trip

 

60Kms

Bus / Jeep

Ranikhet

Head Qtrs to Kumaon Regiment, Kalka Temple, Chubatiya Apple Garden, Chiliyanaula

 13.

One day trip

 

64Kms

Bus / Jeep

Almora

District Head Qtrs., Himalayan Range, Chittai temple, Jageshwa

 14.

Two day trip

 

125Kms

Bus / Jeep

Kausani

Beautiful himalayan range

नैनीताल (Nainital Samagra) और नैनी झील के कई जाने-अनजाने पहलू

कहा जाता है कि एक अंग्रेज व्यवसायी पीटर बैरन ने 18 नवम्बर 1841 को नगर की खोज की थी। यह भी कहा जाता है कि नैनीताल की खोज यूं ही नहीं, वरन तत्कालीन विश्व राजनीति की रणनीति के तहत सोची-समझी रणनीति एवं तत्कालीन विश्व राजनीति के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण थी। 

1842 में सर्वप्रथम आगरा अखबार में बैरन के हवाले से इस नगर के बारे में समाचार छपा, जिसके बाद 1850 तक यह नगर “छोटी बिलायत” के रूप में देश-दुनियां में प्रसिद्ध हो गया।1843 में ही  नैनीताल जिमखाना की स्थापना के साथ यहाँ खेलों की शुरुआत हो गयी थी, जिससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिलने लगा।  

1844 में नगर में पहले “सेंट जोन्स इन विल्डरनेस” चर्च की स्थापना और 1847 में यहाँ पुलिस व्यस्था शुरू हुई। 1854 में कुमाऊँ मंडल का मुख्यालय बना और 1862 में यह नगर गर्मियों की छुट्टियां बिताने के लिए प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बन गया था, और तत्कालीन (उत्तर प्रान्त) नोर्थ प्रोविंस की ग्रीष्मकालीन राजधानी के  साथ ही लार्ड साहब का मुख्यालय भी बना दिया गया। साथ ही 1896 में सेना की उत्तरी कमांड का एवं 1906 से 1926 तक पश्चिमी कमांड का मुख्यालय रहा।

1881 में यहाँ ग्रामीणों को बेहतर शिक्षा के लिए डिस्ट्रिक्ट बोर्ड व 1892 में रेगुलर इलेक्टेड बोर्ड बनाए गए । 1872 में नैनीताल सेटलमेंट किया गया। 1880 में ड्रेनेज सिस्टम बनाया गया। 1892 में ही विद्युत् चालित स्वचालित पम्पों की मदद से यहाँ पेयजल आपूर्ति होने लगी। 1889 में 300 रुपये प्रतिमाह के डोनेशन से नगर में पहला भारतीय कॉल्विन क्लब राजा बलरामपुर ने शुरू किया। 

कुमाऊँ में कुली बेगार आन्दोलनों के दिनों में 1921 में इसे पुलिस मुख्यालय भी बनाया गया। वर्तमान में यह कुमाऊँ मंडल का मुख्यालय है, साथ ही यहीं उत्तराखंड राज्य का उच्च न्यायालय भी है।

वहीं, एक खोजकर्ता Lynne Williams के अनुसार 1823 में सर्वप्रथम नैनीताल पहुंचे पहले अंग्रेज कुमाऊं के दूसरे कमिशनर जॉर्ज विलियम ट्रेल थे। उन्होंने 1828  में इस स्थान के लिए बेहद पवित्र नागनी ताल (Nagni Tal) शब्द का प्रयोग किया था।

यह भी एक रोचक तथ्य है कि अपनी स्थापना के समय सरकारी दस्तावेजों में 1841 से यह नगर नायनीटाल (Nynee Tal)आगे Nynee और Nainee दोनों तथा 1881 से NAINI TAL (नैनीताल) तथा इससे पूर्व 1823 में यहाँ सर्वप्रथम पहुंचे पहले कुमाऊं कमिश्नर जी डब्लू ट्रेल द्वारा 1828 में नागनी ताल (Nagni Tal) भी लिखा गया।

2001 की भारतीय जनगणना के अनुसार नैनीताल की जनसंख्या 38,559 थी। जिसमें पुरुषों और महिलाओं की जनसंख्या क्रमशः 46 व 54 प्रतिशत और औसत साक्षरता दर 81 प्रतिशत थी, जो राष्ट्रीय औसत  59.5 प्रतिशत से अधिक है। इसमें भी पुरुष साक्षरता दर 86 प्रतिशत और महिला साक्षरता 76 प्रतिशत थी। (इससे पूर्व 1901 में यहाँ की जनसँख्या 6,903, 1951 में 12,350, 1981 में 24,835 व 1991 में 26,831 थी। )।

2011 की जनगणना के अनुसार जनसँख्या :

Population 2011 Census Persons Males Females    
Total 41,377 21,648 19,729    
In the age group 0-6 years 3,946 2,079 1,867    
Scheduled Castes (SC) 11,583 6,018 5,565    
Scheduled Tribes (ST) 280 139 141    
Literates 34,786 18,804 15,982    
Illiterate 6,591 2,844 3,747    
Total Worker 13,385 10,753 2,632    
Main Worker 12,129 9,800 2,329    
Main Worker – Cultivator 42 35 7    
Main Worker – Agricultural Labourers 23 19 4    
Main Worker – Household Industries 173 146 27    
Main Worker – Other 11,891 9,600 2,291    
Marginal Worker 1,256 953 303    
Marginal Worker – Cultivator 22 13 9    
Marginal Worker – Agriculture Labourers 3 1 2    
Marginal Worker – Household Industries 53 33 20    
Marginal Workers – Other 1,178 906 272    
Marginal Worker (3-6 Months) 1,168 889 279    
Marginal Worker – Cultivator (3-6 Months) 22 13 9    
Marginal Worker – Agriculture Laborers (3-6 Months) 3 1 2    
Marginal Worker – Household Industries (3-6 Months) 49 30 19    
Marginal Worker – Other (3-6 Months) 1,094 845 249    
Marginal Worker (0-3 Months) 88 64 24    
Marginal Worker – Cultivator (0-3 Months) 0 0 0    
Marginal Worker – Agriculture Laborers (0-3 Months) 0 0 0    
Marginal Worker – Household Industries (0-3 Months) 4 3 1    
Marginal Worker – Other Workers (0-3 Months) 84 61 23    
Non Worker 27,992 10,895 17,097    
 

इधर 2011 की ताजा जनगणना के अनुसार नैनीताल नगर में 9329 परिवारों की कुल जनसंख्या 21648 पुरुष व 19729 महिला मिलाकर 41,377 हो गई है। इनमें 2079 बालक व 1867 बालिकाएं मिलाकर कुल 3946 छह वर्ष तक के बच्चे हैं। जनसंख्या में 11583 अनुसूचित जाति के तथा 280 अनुसूचित जनजाति के हैं। 34786 लोग शिक्षित एवं शेष 6591 अशिक्षित हैं। दिलचस्प तथ्य है कि शहर की कुल जनसंख्या में से 13385 लोग कोई रोजगार करते हैं, जबकि शेष 27992 बेरोजगार हैं।

नैनीताल का पौराणिक संदर्भः 

पौराणिक इतिहासकारों के अनुसार मानसखंड के अध्याय 40 से 51 तक नैनीताल क्षेत्र के पुण्य स्थलों, नदी, नालों और पर्वत श्रृंखलाओं का 219 श्लोकों में वर्णन मिलता है। मानसखंड में नैनीताल और कोटाबाग के बीच के पर्वत को शेषगिरि पर्वत कहा गया है, जिसके एक छोर पर सीतावनी स्थित है। कहा जाता है कि सीतावनी में भगवान राम व सीता जी ने कुछ समय बिताया है।

जनश्रुति है कि सीता सीतावनी में ही अपने पुत्रों लव व कुश के साथ राम द्वारा वनवास दिये जाने के दिनों में रही थीं। सीतावनी के आगे देवकी नदी बताई गई है, जिसे वर्तमान में दाबका नदी कहा जाता है। महाभारत के वन पर्व में इसे आपगा नदी कहा गया है।

आगे बताया गया है कि गर्गांचल (वर्तमान गागर) पर्वतमाला के आसपास 66 ताल थे। इन्हीं में से एक त्रिऋषि सरोवर (वर्तमान नैनीताल) कहा जाता था, जिसे भद्रवट (चित्रशिला घाट-रानीबाग) से कैलास मानसरोवर की ओर जाते समय चढ़ाई चढ़ने में थके अत्रि, पुलह व पुलस्त्य नाम के तीन ऋषियों ने मानसरोवर का ध्यान कर उत्पन्न किया था। इस सरोवर में महेंद्र परमेश्वरी (नैना देवी) का वास था।

सरोवर के बगल में सुभद्रा नाला (बलिया नाला) बताया गया है, इसी तरह भीमताल के पास के नाले को पुष्पभद्रा नाला कहा गया है, दोनों नाले भद्रवट यानी रानीबाग में मिलते थे। कहा गया है कि एक बार सुतपा ऋषि के अनुग्रह पर त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु व महेश चित्रशिला पर आकर बैठ गये और प्रसन्नतापूर्वक ऋषि को विमान में बैठाकर स्वर्ग ले गये। गौला को गार्गी नदी कहा गया है।

भीम सरोवर (भीमताल) महाबली भीम के गदा के प्रहार तथा उनके द्वारा अंजलि से भरे गंगा जल से उत्पन्न हुआ था। पास की कोसी नदी को कौशिकी, नौकुचियाताल को नवकोण सरोवर, गरुड़ताल को सिद्ध सरोवर व नल सरोवर आदि का भी उल्लेख है। क्षेत्र का छःखाता या शष्ठिखाता भी कहा जाता था, जिसका अर्थ है, यहां 60 ताल थे।

मानसखंड में कहा गया है कि यह सभी सरोवर कीट-पतंगों, मच्छरों आदि तक को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। इतिहासकार एवं लोक चित्रकार पद्मश्री डा. यशोधर मठपाल मानसखंड को पूर्व मान्यताओं के अनुसार स्कंद पुराण का हिस्सा तो नहीं मानते, अलबत्ता मानते हैं कि मानसखंड करीब 10वीं-11वीं सदी के आसपास लिखा गया एक धार्मिक ग्रंथ है।

कहते हैं कि नैनीताल नगर का पहला उल्लेख त्रिषि-सरोवर (त्रि-ऋृषि सरोवर) के नाम से स्कंद पुराण के मानस खंड में बताया जाता है। कहा जाता है कि अत्रि, पुलस्त्य व पुलह नाम के तीन ऋृषि कैलास मानसरोवर झील की यात्रा के मार्ग में इस स्थान से गुजर रहे थे कि उन्हें जोरों की प्यास लग गयी। इस पर उन्होंने अपने तपोबल से यहीं मानसरोवर का स्मरण करते हुए एक गड्ढा खोदा और उसमें मानसरोवर झील का पवित्र जल भर दिया। इस प्रकार नैनी झील का धार्मिक महात्म्य मानसरोवर झील के तुल्य ही माना जाता है।

वहीं एक अन्य मान्यता के अनुसार नैनी झील को देश के 64 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव जब माता सती के दग्ध शरीर को आकाश मार्ग से कैलाश पर्वत की ओर ले जा रहे थे, इस दौरान भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर को विभक्त कर दिया था। तभी माता सती की बांयी आँख (नैन या नयन) यहाँ (तथा दांयी आँख हिमांचल प्रदेश के नैना देवी नाम के स्थान पर) गिरी थी, जिस कारण इसे नयनताल, नयनीताल व कालान्तर में नैनीताल कहा गया। यहाँ नयना देवी का पवित्र मंदिर स्थित है।

भौगोलिक संदर्भः 

समुद्र स्तर से 1938 मीटर (6358 फीट) की ऊंचाई (तल्लीताल डांठ पर) पर स्थित नैनीताल करीब तीन किमी की परिधि की 1434 मीटर लंबी, 463 मीटर चौड़ाई व अधिकतम 28 मीटर गहराई व 44.838 हेक्टेयर यानी 0.448 वर्ग किमी में फैली नाशपाती के आकार की झील के गिर्द नैना (2,615 मीटर (8,579 फुट), देवपाटा (2,438 मीटर (7,999 फुट)) तथा अल्मा, हांड़ी-बांडी, लड़िया-कांटा और अयारपाटा (2,278 मीटर (7,474 फुट) की सात पहाड़ियों से घिरा हुआ बेहद खूबसूरत पहाडी शहर है।

जिला गजट के अनुसार नैनीताल 29 डिग्री 38 अंश उत्तरी अक्षांश और 79 डिग्री 45 अंश पूर्वी देशांतर पर स्थित है। नैनीताल नगर का विस्तार पालिका मानचित्र के अनुसार सबसे निचला स्थान कृष्णापुर गाड़ व बलियानाला के संगम पर पिलर नंबर 22 (1,406 मीटर यानी 4,610 फीट) से नैना पीक (2,613 मीटर यानी 8,579 फीट) के बीच 1,207 मीटर यानी करीब सवा किमी की सीधी ऊंचाई तक है।

इस लिहाज से भी यह दुनिया का अपनी तरह का इकलौता और अनूठा छोटा सा नगर है, जहां इतना अधिक ग्रेडिऐंट मिलता है। नगर का क्षेत्रफल नगर पालिका के 11.66 वर्ग किमी व कैंटोनमेंट के 2.57 वर्ग किमी मिलाकर कुल 17.32 वर्ग किमी है। इसमें से नैनी झील का जलागम क्षेत्र 5.66 वर्ग किमी है, जबकि कैंट सहित कुल नगर क्षेत्र में से 5.87 वर्ग किमी क्षेत्र वनाच्छादित है।

नदी के रुकने से 40 हजार वर्ष पूर्व हुआ था नैनी झील का निर्माण

कुमाऊं विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय एवं भूविज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष भूगर्भ वेत्ता प्रो.सीसी पंत ने देश के सुप्रसिद्ध भूवेत्ता प्रो. खड़ग सिंह वल्दिया की पुस्तक Geology and Natural Environment of Nainital Hills, Kumaon Himalaaya के आधार पर बताया कि नैनीताल कभी नदी घाटी रहा होगा। नैना पीक चोटी इस नदी का उद्गम स्थल था।

जनपद की अन्य झीलें भी इसी नदी घाटी का हिस्सा थीं, और इसी कारण उन झीलों का निर्माण भी हुआ होगा। इसमें उभरा नैनीताल फाल्ट नैनी झील की उत्पत्ति का कारण बना, जिसके कारण नदी का उत्तर पूर्वी भाग, दक्षिण पश्चिमी भाग के सापेक्ष ऊपर उठ गया।

प्रो. पंत बताते हैं कि नैनीताल की चट्टानें चूना पत्थर की बनी हुई हैं। चूना पत्थर के लगातार पानी में घुलते जाने से विशाल पत्थरों के अंदर गुफानुमा आकृतियां बन जाती हैं, जिसे नगर में देखा जा सकता है। वहीं कई बार गुुफाओं के धंस जाने से भी झील बन जाती हैं। प्रो. पंत बताते हैं कि खुर्पाताल झील इसी प्रकार गुफाओं के धंसने से बनी है।

वहीं कुछ पुराने वैज्ञानिक नैनी झील की कारक प्राचीन नदी का हिमनदों से उद्गम भी मानते हैं, पर प्रो. पंत कहते हैं कि यहां हिमनदों के कभी होने की पुष्टि नहीं होती है। लेकिन प्रो. पंत यह दावा जरूर करते हैं कि यहां की सभी झीलें भ्रंशों के कारण ही बनी हैं।

एक अरब रुपये का मनोरंजन मूल्य है नैनी झील का

जी हां, देश-विदेश में विख्यात नैनी झील की मनोरंजन कीमत (Recreational Value)100 करोड़ यानी एक अरब रुपये वार्षिक आंकी गई है। कुमाऊं विश्व विद्यालय में प्राध्यापक रहे एवं हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर के पूर्व कुलपति एवं वनस्पति शास्त्री प्रो. एस.पी.सिंह ने वर्तमान स्थिति में यह दावा किया है।

गौरतलब है कि प्रो. सिंह ने वर्ष 1995 में इस बाबत बकायदा शोध किया था, और तब नैनी झील का मनोरंजन मूल्य तीन से चार करोड़ रुपये आंका गया था। प्रो. सिंह बताते हैं कि मनोरंजन मूल्य लोगों व यहां आने वाले सैलानियों द्वारा नैनी झील से मिलने वाले मनोरंजन के बदले खर्च की जाने वाली धनराशि को प्रकट करता है। इसमें नाव, घोड़े, रिक्शा, होटल, टैक्सी सहित हर तरह की पर्यटन से जुड़ी गतिविधियों से अर्जित की जाने वाली धनराशि शामिल हैं।

इसे नगर के पर्यटन का कुल कारोबार भी कहा जा सकता है। प्रो. सिंह कहते हैं कि यह मनोरंजन मूल्य चूंकि 0.448 वर्ग किमी यानी करीब 45 हैक्टेयर वाली झील का है, लिहाजा नैनी झील का प्रति हैक्टेयर मनोरंजन मूल्य करीब दो करोड़ रुपये से अधिक है, जबकि इसके संरक्षण के लिये इस धनराशि के सापेक्ष कहीं कम धनराशि खर्च की जाती है।

पूरी तरह मौसम पर निर्भर है नैनी झील

कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के प्राध्यापक प्रो. जी.एल. साह नैनी झील को पूरी तरह मौसम पर निर्भर प्राकृतिक झील मानते हैं। उनके अनुसार इसमें पानी वर्ष भर मौसम के अनुसार पानी घटता, बढ़ता रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे Intermittent Drainage Lake यानी आंतरायिक जल निकास प्रणाली वाली झील है। उनके अनुसार इसमें वर्ष भर पानी आता भी नहीं है और वर्ष भर जाता भी नहीं है। उनके अनुसार नैनी झील में चार श्रोतों से पानी आता है।

1. अपने प्राकृतिक भू-जल श्रोतों से,2. आसपास के सूखाताल जैसे रिचार्ज व जलागम क्षेत्र से रिसकर 3. धरातलीय प्रवाह से एवं 4. सीधे बारिश से। और यह चारों क्षेत्र कहीं न कहीं मौसम पर ही निर्भर करते हैं।

सूखाताल से आता है नैनी झील में 77 प्रतिशत पानी

आईआईटीआर रुड़की के अल्टरनेट हाइड्रो इनर्जी सेंटर (एएचईसी) द्वारा वर्ष 1994 से 2001 के बीच किये गये अध्ययनों के आधार पर की 2002 में आई रिपोर्ट के अनुसार नैनीताल झील में सर्वाधिक 53 प्रतिशत पानी सूखाताल झील से जमीन के भीतर से होकर तथा 24 प्रतिशत सतह पर बहते हुऐ (यानी कुल मिलाकर 77 प्रतिशत) नैनी झील में आता है।

इसके अलावा 13 प्रतिशत पानी बारिश से एवं शेष 10 प्रतिशत नालों से होकर आता है। वहीं झील से पानी के बाहर जाने की बात की जाऐ तो झील से सर्वाधिक 56 फीसद पानी तल्लीताल डांठ को खोले जाने से बाहर निकलता है, 26 फीसद पानी पंपों की मदद से पेयजल आपूर्ति के लिये निकाला जाता है, 10 फीसद पानी झील के अंदर से बाहरी जल श्रोतों की ओर रिस जाता है, जबकि शेष आठ फीसद पानी सूर्य की गरमी से वाष्पीकृत होकर नष्ट होता है।

वहीं इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट फॉर डेवलपमेंटल रिसर्च मुंबई द्वारा वर्ष 1994 से 1995 के बीच नैनी झील में आये कुल 4,636 हजार घन मीटर पानी में से सर्वाधिक 42.6 प्रतिशत यानी 1,986,500 घन मीटर पानी सूखाताल झील से, 25 प्रतिशत यानी 1,159 हजार घन मीटर पानी अन्य सतह से भरकर, 16.7 प्रतिशत यानी 772 हजार घन मीटर पानी नालों से बहकर तथा शेष 15.5 प्रतिशत यानी 718,500 घन मीटर पानी बारिश के दौरान तेजी से बहकर पहुंचता है।

वहीं झील से जाने वाले कुल 4,687 हजार घन मीटर पानी में से सर्वाधिक 1,787,500 घन मीटर यानी 38.4 प्रतिशत यानी डांठ के गेट खोले जाने से निकलता है। 1,537 हजार घन मीटर यानी 32.8 प्रतिशत पानी पंपों के माध्यम से बाहर निकाला जाता है, 783 हजार घन मीटर यानी 16.7 प्रतिशत पानी झील से रिसकर निकल जाता है, वहीं 569,500 घन मीटर यानी 12.2 प्रतिशत पानी वाष्पीकृत हो जाता है।

दुनिया की सर्वाधिक बोझ वाली झील है नैनी झील

नैनी झील का कुल क्षेत्रफल 44.838 हैक्टेयर यानी 0.448 वर्ग किमी यानी आधे वर्ग किमी से भी कम है। इसमें 5.66 वर्ग किमी जलागम क्षेत्र से पानी (और गंदगी भी) आती है। जबकि इस छोटी सी झील पर नगर पालिका के 11.68 वर्ग किमी और केंटोनमेंट बोर्ड के 2.57 वर्ग किमी मिलाकर 14.25 वर्ग किमी क्षेत्रफल की जिम्मेदारी है। इसमें से भी प्रो. साह बताते हैं कि नगर की 80 फीसद जनसंख्या इसके जलागम क्षेत्र यानी 5.66 वर्ग किमी क्षेत्र में ही रहती है।

यानी नगर के 14.25 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैले शहर की 80 प्रतिशत जनंसख्या इसके जलागम क्षेत्र 5.66 वर्ग किमी में रहती है, इसमें सीजन में हर रोज एक लाख से अधिक लोग पर्यटकों के रूप में भी आते हैं, और यह समस्त जनसंख्या किसी न किसी तरह से मात्र 0.448 वर्ग किमी क्षेत्रफल में फैली झील पर निर्भर रहती है। प्रो. साह कहते हैं कि इतने बड़े बोझ को झेल रही यह दुनिया की अपनी तरह की इकलौती झील है।

झील में प्रदूषण के बावजूद शुद्धतम पेयजल देती है नैनी झील

हाईड्रोलॉजिकल जर्नल-2008 में प्रकाशित भारत के आरआर दास, आई मेहरोत्रा व पी कुमार तथा जर्मनी के टी ग्रिश्चेक द्वारा नगर में नैनी झील किनारे लगाये गये पांच नलकूपों से निकलने वाले पानी पर वर्ष 1997 से 2006 के बीच किये गये शोध में नैनी झील के जल को शुद्धतम जल करार दिया गया है।

कहा गया कि नगर में झील से 100 मीटर की दूरी पर 22.6 से 36.7 मीटर तक गहरे लगाये गये नलकूपों का पानी अन्यत्र पानी के फिल्ट्रेशन के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले रेत और दबाव वाले कृत्रिम फिल्टरों के मुकाबले कहीं बेहतर पानी देते हैं। इनसे निकलने वाले पानी को पेयजल के लिये उपयोगी बनाने के लिये क्लोरीनेशन करने से पूर्व अतिरिक्त उपचार करने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

समान परिस्थितियों में किये गये अध्ययन में जहां फिल्टरों से गुजारने के बावजूद नैनी झील में 2300 एमपीएन कोलीफार्म बैक्टीरिया प्रति 100 मिली पानी में मिले, जोकि क्लोरीनेशन के लिये उपयुक्त 50 एमपीएन से कहीं अधिक थे, जबकि नलकूपों से प्राप्त पानी में कोलीफार्म बैक्टीरिया मिले ही नहीं।

इसका कारण यह माना गया कि इन नलकूपों में झील से बिना किसी दबाव के पानी आता है, जबकि कृत्रिम फिल्टरों में पानी को दबाव के साथ गुजारा जाता है, जिसमें कई खतरनाक बैक्टीरिया भी गुजर आते हैं। इसीलिये यहां के प्रयोग को दोहराते हुऐ देश में रिवर बैंक फिल्टरेशन तकनीक शुरू की गई। इन नलकूपों के प्राकृतिक तरीके से शोधित पानी में बड़े फिल्टरों के मुकाबले कम बैक्टीरिया पाये गये।

मल्ली-तल्ली के बीच सात फीट झुकी है नैनी झील

जी हां, मल्लीताल और तल्लीताल के बीच नैनी झील सात फीट झुकी हुई है। झील से पानी बाहर निकाले जाने की पूरी तरह भरी स्थिति में झील की तल्लीताल शिरे पर जब झील की सतह की समुद्र सतह से ऊंचाई 6,357 फीट होती है, तब मल्लीताल शिरे पर झील की सतह की समुद्र सतह ऊंचाई 6,364 फीट होती है। यानी झील के मल्लीताल व तल्लीताल शिरे पर झील की समुद्र सतह से ऊंचाई में सात फीट का अंतर रहता है।

प्राकृतिक वनों का अनूठा शहर है नैनीताल

नैनीताल नगर का एक खूबसूरत पहलू यह भी है कि यह नगर प्राकृतिक वनों का शहर है। वनस्पति विज्ञानी प्रो. एस.पी. सिंह के अनुसार नगर की नैना पीक चोटी में साइप्रस यानी सुरई का घना जंगल है। यह जंगल पूरी तरह प्राकृतिक जंगल है, यानी इसमें पेड़ लगाये नहीं गये हैं, खुद-ब-खुद उगे हैं। नगर के निकट किलबरी का जंगल दुनिया के पारिस्थितिकीय तौर पर दुनिया के समृद्धतम जंगलों में शुमार है। नैनी झील का जलागम क्षेत्र बांज, तिलोंज व बुरांश आदि के सुंदर जंगलों से सुशोभित है।

नगर की इस खाशियत का भी इस शहर को अप्रतिम बनाने में बड़ा योगदान है। प्रो. सिंह नगर की खूबसूरती के इस कारण को रेखांकित करते हुऐ बताते हैं कि इसी कारण नैनीताल नगर के आगे जनपद की सातताल, भीमताल, नौकुचियाताल और खुर्पाताल आदि झीलें खूबसूरती, पर्यटन व मनोरजन मूल्य सही किसी भी मायने में कहीं नहीं ठहरती हैं। इसके अलावा नैनीताल की और एक विशेषता यह है कि यहां कृषि योग्य भूमि नगण्य है, हालांकि राजभवन, पालिका गार्डन, कैनेडी पार्क व कंपनी बाग सहित अनेक बाग-बगीचे हैं।

‘वाकिंग पैराडाइज’ भी कहलाता है नैनीताल

नैनीताल नगर ‘वाकिंग पैराडाइज’ यानी पैदल घूमने के लिये भी स्वर्ग कहा जाता है। क्योंकि यहां कमोबेस हर मौसम में, मूसलाधार बारिश को छोड़कर, दिन में किसी भी वक्त घूमा जा सकता है। जबकि मैदानी क्षेत्रों में सुबह दिन चढ़ने और सूर्यास्त से पहले गर्मी एवं सड़कों में भारी भीड़-भाड़ के कारण घूमना संभव नहीं होता है। जबकि यहां नैनीताल में वर्ष भर मौसम खुशनुमा रहता है, व अधिक भीड़ भी नहीं रहती।

नगर की माल रोड के साथ ही ठंडी सड़क में घूमने का मजा ही अलग होता है। वहीं वर्ष 2010 से नगर में अगस्त माह के आखिरी रविवार को नैनीताल माउंटेन मानसून मैराथन दौड़ भी नगर की पहचान बनने लगी है, इस दौरान किसी खास तय नेक उद्देश्य के लिये ‘रन फार फन’ वाक या दौड़ भी आयोजित की जाती है, जो अब मानूसन के दौरान नगर का एक प्रमुख आकर्षण बनता जा रहा है।

नैनीताल में है अमेरिकी मिशनरियों द्वारा बनाया गया एशिया का पहला मैथोडिस्ट चर्च

सरोवरनगरी को सर्वधर्म की नगरी भी कहा जाता है। यहां मल्लीताल स्थित ऐतिहासिक फ्लैट्स मैदान के चारों ओर सभी धर्मों के धार्मिक स्थल एक तरह से एक-दूसरे की बांहें थामे साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश दिखाई देते हैं। यह स्थल हैं नगर की आराध्य देवी माता नयना का मंदिर, गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा, जामा मस्जिद, आर्य समाज मंदिर और मैथोडिस्ट चर्च।

इनमें खास है मैथोडिस्ट चर्च, जिसके बारे में बाहर के कम ही लोग जानते होंगे कि देश-प्रदेश के इस छोटे से पर्वतीय नगर में देश ही नहीं एशिया का पहला अमेरिकी मिशनरियों द्वारा निर्मित मैथोडिस्ट चर्च स्थित है। नगर के मल्लीताल में बोट हाउस क्लब के पास माल रोड स्थित मैथोडिस्ट चर्च को यह गौरव हासिल है। इस चर्च की स्थापना और इसके अमेरिकी मिशनरियों द्वारा एशिया में सबसे पहले स्थापित किए जाने की कहानी भी बड़ी रोचक है।

Nainital Samagra 8 Best Places In Nainital From The Colonial Period | So Nainitalयह वह दौर था जब देश में 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम की क्रांति हो रही थी। मेरठ अमर सेनानी मंगल पांडे के नेतृत्व में इस क्रांति का अगुवा था, जबकि समूचे रुहेलखंड क्षेत्र में रुहेले सरदार अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट हो रहे थे। इसी दौर में बरेली में शिक्षा के उन्नयन के उद्देश्य से अमेरिकी मिशनरी रेवरन बटलर पहुंचे।

कहा जाता है कि रुहेले सरदारों ने उन्हें भी देश पर राज करने की नीयत से आए अंग्रेज समझकर उनके परिवार पर जुल्म ढाने शुरू किये। इससे बचकर बटलर अपनी पत्नी क्लेमेंटीना बटलर के साथ 1841 से शहर के रूप में विकसित होना प्रारंभ हो रहे नैनीताल आ गये। और यहां उन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिये 1858 में नगर के पहले स्कूल के रूप में हम्फ्री कालेज (वर्तमान सीआरएसटी स्कूल) की स्थापना की, और इसके परिसर में ही बच्चों एवं स्कूल कर्मियों के लिये प्रार्थनाघर के रूप में चर्च की स्थापना की।

तब तक अमेरिकी मिशनरी एशिया में कहीं और इस तरह चर्च की स्थापना नहीं कर पाऐ थे। इसलिए यह एशिया का पहला अमेरिकी मिशनरियों द्वारा स्थापित किया गया चर्च हो पाया।

बताते हैं कि तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नरी हेनरी रैमजे ने 20 अगस्त 1858 को चर्च के निर्माण हेतु एक दर्जन अंग्रेज अधिकारियों के साथ बैठक की थी। चर्च हेतु हेनरी रैमजे के साथ रेवरन बटलर व हैम्फ्री ने मिलकर 1650 डॉलर में 25 एकड़ जमीन खरीदी, तथा इस पर 25 दिसंबर 1858 को चर्च की नींव रखी गई। चर्च का निर्माण अक्टूबर 1860 में पूर्ण हुआ। इसके साथ ही नैनीताल उस दौर में देश में ईसाई मिशनरियों के शिक्षा के प्रचार-प्रसार का प्रमुख केंद्र बन गया।

अंग्रेजी लेखक जॉन एन शालिस्टर की 1956 में लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक ‘द सेंचुरी ऑफ मैथोडिस्ट चर्च इन सदर्न एशिया’ में भी नैनीताल के इस चर्च को एशिया का पहला चर्च कहा गया है। बताया जाता है कि रेवरन बटलर ने नैनीताल के बाद पहले यूपी के बदायूं तथा फिर बरेली में 1870 में चर्च की स्थापना की। उनका बरेली स्थित आवास बटलर हाउस वर्तमान में बटलर प्लाजा के रूप में बड़ा बाजार बन चुका है, जबकि देरादून का क्लेमेंट टाउन क्षेत्र का नाम भी संभवतया उनकी पत्नी क्लेमेंटीना के नाम पर ही है।

सेंट जॉन्स इन द विल्डरनेस: नैनीताल का सबसे पुराना चर्च

सेंट जॉन्स इन द विल्डरनेस चर्च नैनीताल का सबसे पुराना सूखाताल क्षेत्र में स्थित चर्च है। 1841 में नैनीताल में बसासत से शुरू होते ही नगर में अंग्रेजों के पूजास्थल के रूप में इस चर्च की स्थापना के प्रयास प्रारंभ हो गए थे। इस हेतु कुमाऊं के वरिष्ठ सहायक कमिश्नर जॉन हैलिट बैटन ने चर्च बनाने के लिए सूखाताल के पास इस स्थान को चुना।

मार्च 1844 में कोलकाता के बिशप डेनियल विल्सन एक पादरी के साथ नैनीताल आए। विशप को चर्च के लिए चुनी गई इस जगह पर ले जाया गया तो उन्हें पहली नजर में यह जगह इतनी पसंद आ गई कि उन्हें यह जगह जन्नत जैसी लगी, इसलिए बिशप ने इस चर्च को नाम दिया ‘सेंट जॉन इन द विल्डरनेस, यानी ‘जंगल के बीच ईश्वर का घर’।

कुमाऊं के तत्कालीन कमिश्नर जीटी लूसिंगटन के आदेश पर अधिशासी अभियंता कैप्टन यंग ने चर्च की इमारत का नक्शा बनाया। अक्टूबर 1846 में चर्च का नक्शा पास हुआ और विशप के कार्यकाल के 13 वर्ष पूरे होने के मौके पर 13 अक्टूबर 1846 को चर्च की इमारत का शिलान्यास हुआ। चर्च के शिलान्यास की पूरी कहानी एक कांच की बोतल में लिखकर बोतल को इमारत की बुनियाद में रख दिया गया।

आगे चर्च की इमारत तो दिसंबर 1856 में बन कर तैयार हुई, परंतु इससे पहले ही 2 अप्रैल 1848 को निर्माणाधीन चर्च को पहले ही प्रार्थना के लिए खोल दिया गया। चर्च के निर्माण में 15 हजार रुपए खर्च हुए। यह धनराशि 1807 में चंदे के रूप में जुटाई गई वहां मौजूद कमरों के किराए से जुटाई गई। चंदे से जुटाए गए 360 रुपए से रुड़की के कैनाल फाउंड्री से चर्च के लिए पीतल का घंटा भी बनवाया गया, जिसमें लिखा गया-एक आवाज-शून्य में चिल्लाना।

18 सितंबर 1880 को नैनीताल में हुए प्रलयंकारी भूस्खलन में 43 यूरोपियन सहित 151 लोग मारे गए। इनमें से कुछ को चर्च में लगे कब्रिस्तान में दफनाया गया और इस भूस्खलन में मौत के मुंह में समा गए यूरोपियन नागरिकों की याद में चर्च मे एक पीतल की पट्टी पर सभी यूरोपियन मृतकों के नामों का उल्लेख किया गया, जिसे आज भी यहां देखा जा सकता है।

1890 में हुई पाल नौकायन की शुरुआत, विश्व का सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित है याट क्लब

1890 में नैनीताल में विश्व के सर्वाधिक 1938 मीटर (6358 फीट) की ऊंचाई पर याट (पाल नौका, सेलिंग-राकटा) क्लब (वर्तमान बोट हाउस क्लब) की स्थापना हुई। एक अंग्रेज लिंकन होप ने यहाँ की परिस्थितियों के हिसाब से विशिष्ट पाल नौकाएं बनाईं, जिन्हें ‘हौपमैन हाफ राफ्टर’ कहा जाता है, इन नावों के साथ इसी वर्ष सेलिंग क्लब ने नैनी सरोवर में सर्व प्रथम पाल नौकायन की शुरुआत भी की। यही नावें आज भी यहाँ चलती हैं। 1891 में नैनीताल याट क्लब (NTYC) की स्थापना हुई। बोट हाउस क्लब वर्तमान स्वरुप में 1897 में स्थापित हुआ।

शरदोत्सव / नैनीताल विंटर कार्निवाल के बारे में : देश-प्रदेश भर में शरदोत्सव आयोजनों का प्रणेता रहा है नैनीताल

देश-प्रदेश के विभिन्न शहरों में गंगा महोत्सव, दून उत्सव व बनारस उत्सव जैसे जितने भी आयोजन होते हैं, सरोवरनगरी नैनीताल उनकी प्रणेता रही है। यहां अंग्रेजी दौर में 1890 में ही ऐसे कार्यक्रमों की शुरुआत हो गई थी, जो आज भी परिष्कृत स्वरूप में आज भी जारी है। 19वीं सदी का वह आखिरी दशक था, तब तक अंग्रेजों के खिलाफ पहले स्वतंत्रता संग्राम (1857) की आग कुछ हद तक ठंडी पड़ चुकी थी।

वैसे भी देश के अन्य भू-भागों से इतर बेहद दमनकारी गोर्खा राज झेल चुके पहाड़ पर अंग्रेजों के खिलाफ जन मानस में गुस्सा काफी कम था। ऐसे में नैनीताल में, जिसे अंग्रेजों ने अपने घर ‘छोटी बिलायत’ के रूप में बसाया था, उन्होंने मनोरंजन के अवसर खोज निकालने प्रारंभ कर दिये। 1890 में तत्कालीन म्युनिसिपल कमिश्नर (तब नगर पालिका सभासदों के लिए प्रयुक्त पदनाम) जिम कार्बेट (अंतरराष्ट्रीय शिकारी) ने झील किनारे वर्तमान बेंड स्टैंड की स्थापना की, जहां अंग्रेज बेंड का आनंद लेते थे।

इसी वर्ष नगर में ‘मीट्स एंड स्पेशल वीक’ के नाम से फ्लैट्स मैदान में मनोरंजक आयोजन शुरू किये गये। तब इन कार्यक्रमों में इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी व इटली के लोक-नृत्य होते थे, तथा केवल अंग्रेज आर्मी व आईसीएस अधिकारी ही भाग लेते थे। 1895 में हाल में बंद हुए कैपिटोल सिनेमा की कैपिटोल नाच घर के रूप में तथा फ्लैट मैदान में पोलो खेलने की शुरुआत हुई।

6 सितम्बर 1900 में शरदोत्सव जैसे आयोजनों को ‘वीक्स’ और ‘मीट्स’ नाम देकर इनके आयोजन को तिथियां नियत कर दी गईं, ताकि इन तय तिथियों पर फ्लैट्स मैदान में अन्य आयोजन तय न कर दिये जाऐं। 1925 में इस आयोजन को नये ‘रानीखेत वीक’ और ‘सितम्बर वीक’ नाम दिए गए। 1937 तक यह आयोजन वर्ष में दो बार जून माह में ‘रानीखेत वीक’ व सितम्बर-अक्टूबर में ‘आईसीएस वीक’ के रूप में होने लगे, इस दौरान थ्री-ए-साइड पोलो प्रतियोगिता भी होती थी।

इन्हीं ‘वीक्स‘ में हवा के बड़े गुब्बारे भी उडाये जाते थे। इस दौरान डांडी रेस, घोडा रेस व रिक्शा दौड़ तथा इंग्लॅण्ड, फ्रांस व होलैंड आदि देशों के लोक नृत्य व लोक गायन के कार्यक्रम वेलेजली गर्ल्स, रैमनी (वर्तमान सेंट मेरी कान्वेंट) कालेजों की छात्राओं व अंग्रेजों द्वारा होते थे, इनमें भारतीयों की भूमिका केवल दर्शकों के रूप में तालियाँ बजाने तक ही सीमित होती थी।

स्वतंत्रता के बाद नैनीताल पालिका के प्रथम पालिकाध्यक्ष राय बहादुर जसौद सिंह बिष्ट ने तीन सितम्बर 1952 को पालिका में बकायदा प्रस्ताव पारित कर ‘सितम्बर वीक’ की जगह ‘शरदोत्सव’ मनाने का निर्णय लिया, जो विगत दो वर्षों के अंतराल को छोड़कर अनवरत जारी रहा। अलबत्ता 1999 के बाद आयोजन में पालिका के साथ जिला प्रशाशन व पर्यटन विभाग भी सहयोग देने लगा।

जबकि इधर 2015 से तत्कालीन डीएम दीपक रावत की पहल पर शरदोत्सव को बंद कर इसकी जगह स्थानीय विधायक की अध्यक्षता में ‘नैनीताल महोत्सव समिति’ गठित कर इसके माध्यम से 25 से 30 दिसंबर के बीच ‘नैनीताल विंटर कार्निवाल’ का आयोजन शुरू किया गया। कोरोना काल से यह आयोजन अब नहीं हो रहा है। 

नैना देवी मंदिर के बारे में नयना देवी मंदिर का इतिहास

कहा जाता है कि नैनीताल में नगर की स्थापना से पूर्व भी माता नयना देवी का मंदिर वर्तमान बोट हाउस क्लब व फव्वारे के बीच के स्थान पर कहीं था। अमर उदय ट्रस्ट के अध्यक्ष राजीव लोचन साह ने बताया कि 1815 से 1830 के बीच पहले कुमाऊं कमिश्नर रहे जीडब्लू ट्रेल ने इस मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए अल्मोड़ा के गुज्जे शाह को कहा।

उनकी जगह उनके पुत्र मोती राम शाह ने, जो मूल रूप से नेपाल के निवासी तथा उस दौर में अल्मोड़ा के प्रमुख व्यवसायी, अग्रेज सरकार बहादुर के बैंकर और तत्कालीन बड़े ठेकेदार थे। वे ही नैनीताल में शुरूआती वर्षों में बने सभी बंगलों व अनेक सार्वजनिक उपयोग के भवनों के शिल्पी और ठेकेदार और नैनीताल में बसने वाले पहले हिंदुस्तानी भी थे। उन्होंने ही पीटर बैरन के लिए नगर का पहला घर पिलग्रिम हाउस का निर्माण भी उन्होंने ही कराया था, इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया।

यह मंदिर 18 सितम्बर 1880 को आऐ विनाशकारी भूस्खलन में ध्वस्त हो गया। कहा जाता है कि 1882 में इसके अवशेष वर्तमान मन्दिर के करीब स्वप्न में मिले संकेतों के आधार पर मिले। इस पर अंग्रेजों ने मंदिर के लिए पूर्व के स्थान बदले वर्तमान स्थान पर लगभग सवा एकड़ भूमि हस्तांतरित की। इस पर 1883 में तब तक दिवंगत हो चुके मोती राम शाह जी के ज्येष्ठ पुत्र स्वर्गीय अमर नाथ शाह ने माँ नयना देवी का मौजूदा मंदिर बनवाया।

मंदिर के लिए मां की मूर्ति काले पत्थर से नेपाली मूर्तिकारों से बनवाई, और उसकी स्थापना 1883 में मां आदि शक्ति के जन्म दिन मानी जाने वाली ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को की। तभी से इसी तिथि को मां नयना देवी का मंदिर का स्थापना दिवस मनाया जाता है, और इसे मां का जन्मोत्सव भी कहा जाता है।

मंदिर की व्यस्था वर्तमान में मां नयना देवी अमर-उदय ट्रस्ट द्वारा की जाती है, और ट्रस्ट की ‘डीड’ की शर्तों के अनुसार इस परिवार के वंशजों को वर्ष में केवल इसी दिन मन्दिर के गर्भगृह में जाने की अनुमति होती है।

बताते हैं कि शुरू में मंदिर परिसर में केवल तीन मन्दिर ही थे, इनमें से मां नयना देवी व भैरव मन्दिर में नेपाली एवं पैगोडा मूर्तिकला की छाप बताई जाती है, वहीं इसके झरोखों में अंग्रेजों की गौथिक शैली का प्रभाव भी नजर आता है। तीसरा नवग्रह मन्दिर ग्वालियर शैली में बना है। इसका निर्माण विशेष तरीके से पत्थरों को आपस में फंसाकर किया गया और इसमें गारे व मिट्टी का प्रयोग नहीं हुआ।

यह भी पढ़ें : यूं ही नहीं, तत्कालीन विश्व राजनीति की रणनीति के तहत अंग्रेजों ने बसासा था नैनीताल

-रूस को भारत आने से रोकने और पहले स्वतंत्रता आंदोलन का बिगुल फूंक चुके रुहेलों से बचने के लिए अंग्रेजों ने बसाया था नैनीताल
-नैनीताल के प्राकृतिक सौंदर्य ने भी खूब लुभाया था अंग्रेजों को

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 18 नवंबर 2022। ऐसा माना जाता है कि 18 नवम्बर 1841 को एक अंग्रेज शराब व्यवसायी पीटर बैरन नैनीताल आया और उसने इस स्थान के थोकदार नर सिंह को नाव से झील के बीच ले जाकर डुबो देने की धमकी दी और शहर को कंपनी बहादुर के नाम करवा दिया था। यह अनायास नहीं था कि एक अंग्रेज इस स्थान पर आया और उसकी खूबसूरती पर फिदा होने के बाद इस शहर को ‘छोटी विलायत’ के रूप में बसाया। यह भी पढ़ें : नैनीताल से संबंधित आलेख 

यह अलग बात है कि इससे पूर्व 1821 में ही तत्कालीन कमिश्नर जीडब्लू ट्रेल इस स्थान पर आ चुके थे, और इंग्लेंड के स्कॉटलेंड यानी पर्वतीय मूल के होने के कारण नैनीताल के बारे में यहां के मूल-स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यताओं के कारण उन्होंने इस स्थान को अंग्रेजों को नहीं बताया, अलबत्ता उन्होंने इस बारे में 1828 में प्रकाशित ‘एसियाटिक रिसर्च्स ऑर ट्रांसेक्सन्स ऑफ द सोसायटी..’ के 16वें वाल्यूम में ‘स्टेटिस्टिकल स्केच ऑफ कुमाऊ टिल 1823’ नाम से बड़ा आलेख लिखा था। 

सर्वविदित है कि नैनीताल अनादिकाल काल से त्रिऋषि सरोवर के रूप में अस्तित्व में रहा स्थान है। अंग्रेजों के यहां आने से पूर्व यह स्थान थोकदार नर सिंह की मिल्कियत थी। तब निचले क्षेत्रों से ग्रामीण इस स्थान को बेहद पवित्र मानते थे, लिहाजा सूर्य की पौ फटने के बाद ही यहां आने और शाम को सूर्यास्त से पहले यहां से लौट जाने की धार्मिक मान्यता थी।

कहते हैं 1815 से 1830 के बीच कुमाऊं के दूसरे कमिश्नर रहे जीडब्ल्यू ट्रेल यहां से होकर ही अल्मोड़ा के लिए गुजरे और उनके मन में भी इस शहर की खूबसूरत छवि बैठ गई, लेकिन उन्होंने इस स्थान की धार्मिक मान्यताओं की मर्यादा का सम्मान रखा। यह भी पढ़ें : पक्षियों के भी पर्यटन स्थल के रूप में नैनीताल-कुमाऊं

दिसम्बर 1839 में पीटर बैरन ट्रेल के आलेख ‘स्टेटिस्टिकल स्केच ऑफ कुमाऊ टिल 1823’ को पढ़कर यहां आया और इसके सम्मोहन से बच न सका। व्यवसायी होने की वजह से उसके भीतर इस स्थान को अपना बनाने और अंग्रेजी उपनिवेश बनाने की हसरत भी जागी और 18 नवम्बर 1841 को वह पूरी तैयारी के साथ दुबारा यहां लौटा। यह भी पढ़ें : विश्व प्रसिद्ध नैनी झील

इतिहासकार डॉ. अजय रावत के अनुसार, इसके अलावा नैनीताल को बसाये जाने के अन्य कारण भी थे। चूंकि वह औपनिवेशिक वैश्विकवाद व साम्राज्यवाद का दौर था। नए उपनिवेशों की तलाश व वहां साम्राज्य फैलाने के लिए फ्रांस, इंग्लैंड व पुर्तगाल जैसे यूरोपीय देश समुद्री मार्ग से भारत आ चुके थे, जबकि रूस स्वयं को इस दौड़ में पीछे महसूस कर रहा था। यह भी पढ़ें : नैनीताल की पुरानी तस्वीरों का समग्र

कारण, उसकी उत्तरी समुद्री सीमा में स्थित वाल्टिक सागर व उत्तरी महासागर सर्दियों में जम जाते थे। तब स्वेज नहर भी नहीं थी। ऐसे में उसने काला सागर या भूमध्य सागर के रास्ते भारत आने के प्रयास किये, जिसका फ्रांस व तुर्की ने विरोध किया। यह भी पढ़ें : पर्यटन नगरी के रूप में नैनीताल

इस कारण 1854 से 1856 तक दोनों खेमों के बीच क्रोमिया का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ। इस युद्ध में रूस पराजित हुआ, जिसके फलस्वरूप 1856 में हुई पेरिस की संधि में यूरोपीय देशों ने रूस पर काला सागर व भूमध्य सागर की ओर से सामरिक विस्तार न करने का प्रतिबंध लगा दिया। ऐसे में रूस के भारत आने के अन्य मार्ग बंद हो गऐ थे और वह केवल तिब्बत की ओर के मार्गों से ही भारत आ सकता था। तिब्बत से उत्तराखंड के लिपुलेख, नीति, माणा व जौहार घाटी के पहाड़ी दर्रे से आने के मार्ग भी बहुत पहले से प्रचलित थे। 

ऐसे में अंग्रेज रूस को यहां आने से रोकने के लिए पर्वतीय क्षेत्र में अपनी सुरक्षित बस्ती बसाना चाहते थे। दूसरी ओर भारत में पहले स्वाधीनता संग्राम की शुरूआत हो रही थी। मैदानों में खासकर रुहेले सरदार अंग्रेजों के दुश्मन बने हुऐ थे। मेरठ गदर का गढ़ था ही। ऐसे में मैदानों के सबसे करीब और कठिन दरे के संकरे मार्ग से आगे का बेहद सुंदर स्थान नैनीताल ही नजर आया, जहां वह अपने परिवारों के साथ अपने घर की तरह सुरक्षित रह सकते थे।

ऐसा हुआ भी। हल्द्वानी में अंग्रेजों व रुहेलों के बीच संघर्ष हुआ, जिसके खिलाफ तत्कालीन कमिश्नर रैमजे नैनीताल से रणनीति बनाते हुए हल्द्वानी में हुऐ संघर्ष में 100 से अधिक रुहेले सरदारों को मार गिराने में सफल रहे। रुहेले दर्रे पार कर नैनीताल नहीं पहुंच पाये और यहां अंग्रेजों के परिवार सुरक्षित रहे। यह भी पढ़ें : नैनीताल के प्रतीक

कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में अमेरिकी मिशनरी रेवरन बटलर जैसे लोग भी बचते-बचाते नैनीताल पहुंचे। कहा जाता है कि रुहेले सरदारों ने उन्हें भी देश पर राज करने की नीयत से आए अंग्रेज समझकर उनके परिवार पर भी बरेली में जुल्म करने शुरू किये थे। इससे बचकर बटलर अपनी पत्नी क्लेमेंटीना बटलर के साथ 1841 से शहर के रूप में विकसित होना प्रारंभ हो रहे नैनीताल आ गये।

यहां उन्होंने शिक्षा के प्रसार के लिये 1858 में नगर के पहले स्कूल के रूप में हम्फ्री कालेज (वर्तमान सीआरएसटी स्कूल) की स्थापना की, और इसके परिसर में ही बच्चों एवं स्कूल कर्मियों के लिये प्रार्थनाघर के रूप में वर्तमान मैथोडिस्ट चर्च की स्थापना की, जिसे एशिया का पहला अमेरिकी मिशनरियों द्वारा स्थापित किया गया चर्च कहा जाता है। यह भी पढ़ें : शिक्षा नगरी के रूप में नैनीताल

इसके बाद ही नैनीताल को अंग्रेजों ने अपने घर ‘छोटी बिलायत’ की तरह बसाया और यहां अपनी सुरक्षा व सुविधा के लिए अब तक नगर को सुरक्षित रखने वाल नाले, राजभवन, कलेक्ट्रेट, कमिश्नरी, सचिवालय (वर्तमान उत्तराखंड हाईकोर्ट) तथा सेंट जॉन्स, सेंट निकोलस व लेक चर्च सहित अनेकों मजबूत व खूबसूरत इमारतें बनवायीं। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : पीटर बैरन ने नहीं ट्रेल ने खोजा था नैनीताल

-बैरन (18 नवंबर 1841) से पहले ही 1823 में नैनीताल आ चुके थे कमिश्नर ट्रेल

Nainital Samagra -नैनीताल की आज के स्वरूप में स्थापना और खोज को लेकर ऐतिहासिक भ्रम की स्थिति

डॉ.नवीन जोशी, नैनीताल। इतिहास जैसा लिख दिया जाए, वही सच माना जाता है, और उसमें कोई झूठ हो तो उस झूठ को छुपाने के लिए एक के बाद एक कई झूठ बोलने पड़ते हैं। प्रकृति के स्वर्ग नैनीताल के साथ भी ऐसा ही है।

युग-युगों पूर्व स्कंद पुराण के मानस खंड में त्रिऋषि सरोवर के रूप में वर्णित इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि सर्वप्रथम पीटर बैरन नाम का अंग्रेज व्यापारी 18 नवंबर 1841 को यहां पहुंचा, और नगर में अपना पहला घर-पिलग्रिम लॉज बनाकर नगर को वर्तमान स्वरूप में बसाना प्रारंभ किया। लेकिन अंग्रेजी दौर के अन्य दस्तावेज भी इसे सही नहीं मानते। यह भी पढ़ें : नैनीताल में पर्यटन

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 1823 में ही कुमाऊं के दूसरे कमिश्नर जॉर्ज विलियम ट्रेल यहां पहुंच चुके थे और इसकी प्राकृतिक सुन्दरता देखकर अभिभूत थे, लेकिन उन्होंने इस स्थान की सुंदरता और स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यताओं के मद्देनजर इसे न केवल अंग्रेज कंपनी बहादुर की नजरों से छुपाकर रखा, वरन स्थानीय लोगों से भी इस स्थान के बारे में किसी अंग्रेज को न बताने की ताकीद की थी। इसके अलावा भी बैरन के 1841 की जगह 1839 में पहले भी नैनीताल आने की बात भी कही जाती है। यह भी पढ़ें : नैनीताल पैनोरमा

मिस्टर ट्रेल ने नैनीताल के बारे में किसी को कुछ क्यों नहीं बताया, इस बाबत इतिहासकारों का मत है कि शायद उन्हें डर था कि मनुष्य की यहाँ आवक बड़ी तो यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता पर दाग लग जायेंगे, और इस स्थान की पवित्रता को ठेस पहुंचेगी। ट्रेल के बारे में कहा जाता है कि वह कुमाउनी संस्कृति के बड़े प्रशंसक थे।

उन्होंने रानीखेत की कुमाउनी युवती से ही विवाह किया था, और वह अच्छी कुमाउनी भी जानते थे। उन्हें 1834 में हल्द्वानी को बसाने का श्रेय भी दिया जाता है। उन्होंने ही 1830 में भारत-तिब्बत के बीच 5,212 मीटर की ऊंचाई पर एक दर्रे की खोज की थी, जिसे उनके नाम पर ही ट्रेल’स पास कहा जाता है।

बताया जाता है कि उस दौर में निचले क्षेत्रों से लोग पशुचारण के लिए यहां सूर्य निकलने के बाद ही आते थे, और धार्मिक मान्यता के मद्देनजर सूर्य छुपने से पहले लौट जाया करते थे। यही कारण था कि ट्रेल ने इस स्थान की सुंदरता और स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यताओं के मद्देनजर इसे न केवल अंग्रेज कंपनी बहादुर की नजरों से छुपाकर रखा, वरन स्थानीय लोगों से भी इस स्थान के बारे में किसी अंग्रेज को न बताने की ताकीद की थी।

इसी कारण 18 नवंबर 1841 में जब शहर के खोजकर्ता के रूप में पहचाने जाने वाले रोजा-शाहजहांपुर के अंग्रेज शराब व्यवसायी पीटर बैरन जब इस स्थान की ओर आ रहे थे तो किसी ने उन्हें इस स्थान की जानकारी नहीं दी। इस पर बैरन को नैंन सिंह नाम के व्यक्ति (उसके दो पुत्र राम सिंह व जय सिंह थे।) के सिर में भारी पत्थर रखवाना पड़ा।

उसे आदेश दिया गया, ‘इस पत्थर को नैनीताल नाम की जगह पर ही सिर से उतारने की इजाजत दी जाऐगी”। इस पर मजबूरन नैन सिंह बैरन को तत्कालीन आर्मी विंग केसीवी के कैप्टन सी व कुमाऊँ वर्क्स डिपार्टमेंट के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर कप्तान वीलर के साथ सैंट लू गोर्ज (वर्तमान बिडला चुंगी) के रास्ते नैनीताल लेकर आया।

यह भी उल्लेख मिलता है कि बैरन ने यहाँ के तत्कालीन स्वामी, थोकदार नर सिंह को डरा-धमका कर, यहाँ तक कि उन्हें पहली बार लाई गयी नाव से नैनी झील के बीच में ले जाकर डुबोने की धमकी देकर इस स्थान का स्वामित्व कंपनी बहादुर के नाम जबरन कराया था। हालांकि अंतरराष्ट्रीय शिकारी जिम कार्बेट व ‘कुमाऊं का इतिहास” के लेखक बद्री दत्त पांडे के अनुसार बैरन दिसंबर 1839 में भी नैनीताल को देख कर लौट गया था, और 1841 में पूरी तैयारी के साथ वापस लौटा।

बैरन को बिलायत से भी सुंदर लगा था नैनीताल

नैनीताल। नैनीताल आने के बाद बैरन ने 1842 में आगरा अखबार में नैनीताल के बारे में पहला लेख लिखा। जिसमें लिखा था, ‘अल्मोड़ा के पास एक सुन्दर झील व वनों से आच्छादित स्थान है जो विलायत के स्थानों से भी अधिक सुन्दर है”। हालांकि यह भी यही कारण है कि अंग्रेजों ने नैनीताल को अपने घर बिलायत की तरह ही ‘छोटी बिलायत” के रूप में बसाया, और इसके पर्यावरण और इसकी सुरक्षा के भी पूरे प्रबंध किए।

1840 में (स्थापना से पहले से) स्थापित (!) दुकान भी थी शहर में

नैनीताल। दिलचस्प तथ्य यह भी रहा कि जिस शहर की अंग्रेजों द्वारा खोज व बसासत की तिथि 18 नवंबर 1841 बताई जाती है, वहां 1840 में स्थापित बताने वाली दुकान भी मौजूद रही। तल्लीताल बाजार में ‘शाम लाल एंड संस” नाम की इस दुकान के स्वामी राकेश लाल साह ने बताया कि उनके परदादा शाम (श्याम का अपभ्रंश) लाल साह ने मंडलसेरा बागेश्वर से आकर यहां 1840 में दुकान स्थापित की थी।

शुरू में यहां राशन का गोदाम था, जिससे अंग्रेजों को आपूर्ति होती थी। वह अंग्रेजों को उनके पोलो खेलने के लिए प्रशिक्षित घोड़े भी उपलब्ध करवाते थे। 1842-43 में गोदाम कपड़े की दुकान में परिवर्तित हो गई। तभी से दुकान के बाहर इसकी स्थापना का वर्ष लिखा है, जिसे समय-समय पर केवल ऊपर से पेंट कर दिया जाता है। उनके पास दुकान से संबंधित कई पुराने प्रपत्र भी हैं। इस दुकान के पास उस दौर में इंग्लेंड से सीधे कपड़े आयात व निर्यात करने का लाइसेंस भी था।

यहां इंग्लेंड का हैरिस कंपनी का ट्वीड का कपड़ा भी मिलता था। बताया कि अगल-बगल वर्तमान मटरू शॉप में गोविंद एंड कंपनी वाइन शॉप तथा वर्तमान बिदास संस में पॉलसन बटर शॉप भी समकालीन थीं। अंग्रेजी दौर के बहुत बाद के वर्षों तक तल्लीताल बाजार में यहाँ से आगे के बाजार में अंग्रेज सैनिकों, अधिकारियों का जाना प्रतिबंधित था। वहां केवल भारतीय ही खरीददारी कर सकते थे। वहां नाच-गाना भी होता था।

1823 के मानचित्र में प्रदर्शित है नैनीताल

India 1823
India 1823

हम इस मानचित्र की सत्यता का दावा नहीं करते, परंतु 1823 में प्रकाशित बताए गए एटलस में भारत के इस मानचित्र में नैनीताल भी दर्शाया गया है। इस मानचित्र में उत्तराखंड का नैनीताल के अलावा केवल एक ही अन्य नगर-अल्मोड़ा प्रदर्शित किया गया है। यह मानचित्र विश्वसनीय विकीपीडिया की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है, तथा इसे वर्ष 2005 की नगर पालिका नैनीताल द्वारा शरदोत्सव पर प्रकाषित स्मारिका-शरदनंदा में भी प्रकाषित किया गया था।

यदि इस मानचित्र पर इसके प्रकाषन का वर्ष 1823 सही लिखा है तो यह सोचने वाली बात होगी कि 18 नवंबर 1841 को अंग्रेजों द्वारा पहली बार खोजा गया बताया जाने वाला नैनीताल 1823 में कोई छोटा स्थान नहीं, अपितु नामचीन स्थान रहा होगा। कम से कम इतना ख्याति प्राप्त कि इस मानचित्र के निर्माता का ध्यान जब उत्तराखंड के स्थानों का नाम लिखने की ओर गया होगा तो उसे अल्मोड़ा के अलावा केवल नैनीताल नाम ही याद आया होगा। उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष यानी 1823 में ही जॉर्ज विलियम ट्रेल के नैनीताल आने की बात भी कही जाती है। 

अंग्रेजों ने नैनीताल को बसाया, संवारा और बचाया भी

नैनीताल ही शायद दुनिया का ऐसा इकलौता नगर हो, जिसे इसके अंग्रेज निर्माताओं ने न केवल खोजा और बसाया ही वरन इसकी सुरक्षा के प्रबंध भी किऐ। नगर की स्थापना के प्रारंभिक दौर में 1842-43 में कप्तान एमोर्ड, असिस्टेंट कमिश्नर बैरन, कप्तान बी यंग, टोंकी तथा पीटर बैरन को लीज पर जमीनों का आवंटन हुआ। बैरन ने पिलग्रिम लोज के रूप में नगर में पहला भवन बनाया।

जेएम किले की पुस्तक में 1928 में नगर के तत्कालीन व पहले पदेन पालिकाध्यक्ष व कुमाऊं के चौथे कमिश्नर लूसिंग्टन के द्वारा भी नगर में एक भवन के निर्माण की बात लिखी गयी है, किन्तु अन्य दस्तावेज इसकी पुष्टि नहीं करते। 1845 में लूसिंग्टन ने इस नगर में स्कूल, कालेज जैसे सार्वजनिक हित के कार्यों के अतिरिक्त भूमि लीज पर दिऐ जाने की व्यवस्था समाप्त कर दी थी। लूसिंग्टन की मृत्यु केवल 42 वर्ष की आयु में यहीं हुई, उनकी कब्र अब भी नैनीताल में धूल-धूसरित अवस्था में मौजूद है। उन्होंने नगर में पेड़ों के काटने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था।

नैनीताल में कई बार लोग पूछने लगते हैं कि अंग्रेज इतने ही बेहतर थे तो उन्हें देश से भगाया ही क्यों जा रहा था। इस प्रश्न का उत्तर है नैनीताल उन्हें अपने घर जैसा लगा था, और इसी लिऐ वह इसे अपने घर की तरह ही सहेज कर रखते थे। इसीलिऐ इसे ‘छोटी बिलायत’ भी कहा जाता था, पर अफसोस कि यह नगर इस शहर के निवासियों का भी है, और वह इस नगर के लिए शायद उतना नहीं कर पा रहे हैं।

और वह मनहूस दिन…

लेकिन कम-कम करके भी 1880 तक नगर में उस दौर के लिहाज से काफी निर्माण हो चुके थे और नगर की जनसंख्या लगभग ढाई हजार के आसपास पहुँच गयी थी, ऐसे में 18 सितम्बर का वह मनहूस दिन आ गया जब केवल 40 घंटे में हुयी 35 इंच यानी 889 मिमी बारिश के बाद आठ सेकेण्ड के भीतर नगर में वर्तमान रोप-वे के पास ऐसा विनाशकारी भूस्खलन हुआ कि 151 लोग (108 भारतीय और 43 ब्रितानी नागरिक), उस जमाने का नगर का सबसे विशाल ‘विक्टोरिया होटल´ और मि. बेल के बिसातखाने की दुकान व तत्कालीन बोट हाउस क्लब के पास स्थित वास्तविक नैनादेवी मन्दिर जमींदोज हो गऐ।

यह अलग बात है कि इस विनाश ने नगर को वर्तमान फ्लैट मैदान के रूप में अनोखा तोहफा दिया। वैसे इससे पूर्व भी वर्तमान स्थान पर घास के हरा मैदान होने और 1843 में ही यहाँ नैनीताल जिमखाना की स्थापना होने को जिक्र मिलता है। इससे पूर्व 1866 व 1879 में भी नगर की आल्मा पहाड़ी पर बड़े भूस्खलन हुये थे, जिनके कारण तत्कालीन सेंट लू गोर्ज स्थित राजभवन की दीवारों में दरारें आ गयी थीं।

समस्या के निदान को बने नाले

बहरहाल, अंग्रेज इस घटना से बेहद डर गऐ थे और उन्होंने तुरन्त पूर्व में आ चुके विचार को कार्य रूप में परिणत करते हुए नगर की कमजोर भौगौलिक संरचना के दृष्टिगत समस्या के निदान व भूगर्भीय सर्वेक्षण को बेरजफोर्ड कमेटी का गठन किया। अंग्रेज सरकार ने पहले चरण में सबसे खतरनाक शेर-का-डंडा, चीना (वर्तमान नैना), अयारपाटा, लेक बेसिन व बड़ा नाला (बलिया नाला) का निर्माण दो लाख रुपये में किया। बाद में 80 के अंतिम व 90 के शुरुआती दशक में नगर पालिका ने तीन लाख रुपये से अन्य नाले बनाए।

1898 में आयी तेज बारिश ने लोंग्डेल व इंडक्लिफ क्षेत्र में ताजा बने नालों को नुक्सान पहुंचाया, जिसके बाद यह कार्य पालिका से हटाकर पीडब्लूडी को दे दिए गए। 23 सितम्बर 1898 को इंजीनियर वाइल्ड ब्लड्स द्वारा बनाए नक्शों से 35 से अधिक नाले बनाए गए। 1901 तक कैचपिट युक्त 50 नालों (लम्बाई 77,292 फिट) व 100 शाखाओं का निर्माण (कुल लम्बाई 1,06499 फिट) कर लिया गया।

बारिश में भरते ही कैचपिट में भरा मलवा हटा लिया जाता था। अंग्रेजों ने ही नगर के आधार बलियानाले में भी सुरक्षा कार्य करवाऐ, जो आज भी बिना एक इंच हिले नगर को थामे हुऐ हैं, जबकि कुछ वर्ष पूर्व ही हमारे द्वारा बलियानाला में किये गए कार्य लगातार दरकते जा रहे हैं।

सड़क से पहले रेल लाने की थी कोशिश

अंग्रेजों ने नैनीताल में ‘माउंटेन ट्रेन’ लाने की योजना तभी बना ली थी। 1883-84 में बरेली से हल्द्वानी को रेल लाइन से जोड़ा गया था और 1885 में काठगोदाम तक रेल लाइन बिछाई गई। 24 अप्रैल 1884 को पहली ट्रेन हल्द्वानी पहुंची थी। 1889 में काठगोदाम से नैनीताल के लिए शिमला व दार्जिलिंग की तर्ज पर मेजर जनरल सीएम थॉमसन द्वारा काठगोदाम से रानीबाग, दोगांव, गजरीकोट, ज्योलीकोट व बेलुवाखान होते हुऐ रेल लाइन बिछाकर यहां ‘माउंटेन ट्रेन’ लाने की योजना बनाई गई।

अंग्रेजों ने नगर के पास ही स्थित खुर्पाताल में रेल की पटरियां बनाने के लिए लोहा गलाने का कारखाना भी स्थापित कर दिया था, लेकिन नगर की कमजोर भौगौलिक स्थिति इसमें आड़े आ गयी। इसके बाद 1887 में ब्रेवरी से रोप-वे बनाने की योजना बनायी गई। 1890 में इस हेतु ब्रेवरी में जमीन खरीदी गयी और पालिका से 1.8 लाख रुपये मांगे गए, तब पालिका की वार्षिक आय महज 25 हजार रुपये सालाना थी।

1891 में नगर को यातायात के लिए सड़क के अंतिम विकल्प पर कार्य हुआ, बेलुवाखान, बल्दियाखान व नैना गाँव होते हुए बैलगाड़ी की सड़क (कार्ट रोड) बनायी गयी, जो हनुमानगड़ी के पास वर्तमान में पैदल पगडंडी के रूप में दिखाई देती है. इसके पश्चात 1899 में भवाली को नैनीताल से पहले सड़क से जोड़ा गया, और फिर 1915 में (गर्भगृह में नैनीताल के अनुसार) ज्योलीकोट से नैनीताल की वर्तमान सड़क बनी। हाँ, इससे पूर्व 1848 में माल रोड बन चुकी थी।

जब माल रोड पर गवर्नर का चालन हुआ था…

कहते हैं कि धन की कमी से नैनीताल आने के लिए रोप वे की योजना भी परवान न चढ़ सकी तब आंखिरी विकल्प के रूप में सड़क बनायी गयी। 14 फरवरी 1917 को नगर पालिका ने पहली बार नगर में वाहनों के परिचालन के लिए उपनियम (बाई-लाज) जारी कर दिए गए, जिनके अनुसार देश व राज्य के विशिष्ट जनों के अलावा किसी को भी माल रोड पर बिना पालिका अध्यक्ष की अनुमति के पशुओं या मोटर से खींचे जाने वाले भवन नहीं चलाये जा सकते थे।

माल रोड पर वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित करने के लिए जीप-कार को 10 व बसों-ट्रकों को 20 रुपये चुंगी पड़ती थी, 1 अप्रेल से 15 नवम्बर तक सीजन होता था, जिस दौरान शाम 4 से 9 बजे तक चुंगी दोगुनी हो जाती थी। नियमों के उल्लंघन पर तब 500 रुपये के दंड का प्राविधान था। नियम तोड़ने की किसी को इजातात न थी, और पालिका अध्यक्षों का बड़ा प्रभाव होता था ।

बताते हैं कि एक बार गवर्नर के वाहन में लेडी गवर्नर बिना इजाजत के (टैक्स दिए बिना) मॉल रोड से गुजर गईं, इस पर तत्कालीन पालिकाध्यक्ष जसौत सिंह बिष्ट ने लेडी गवर्नर का 10 रुपये का चालान कर दिया था। 1925 में प्रकाशित नगर के डिस्ट्रिक्ट गजट आफ आगरा एंड अवध के अनुसार तब तक तल्लीताल डांठ पर 88 गाड़ियों की नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट कंपनी स्थापित हो गयी थी, जिसकी लारियों में काठगोदाम से ब्रवेरी का किराया 1 .8 व नैनीताल का 3 रूपया था। किराए की टैक्सियाँ भी चलने लगीं थीं।

1922 में मुफ्त में मनाई गई थी दिवाली

1919 में रोप-वे के लिए ब्रेवरी के निकट कृष्णापुर में बिजलीघर स्थापित कर लिया गया था, किन्तु रोप-वे का कार्य शुरू न हो सका, अलबत्ता 1 सितम्बर 1922 को बिजली के बल्बों से जगमगाकर नैनीताल प्रदेश का बिजली से जगमगाने वाला पहला शहर जरूर बन गया। यहाँ नैनी झील से ही लेजाये गए पानी से 303 केवीए की बिजली बनती थी। 1916 में इसका निर्माण पूर्ण हुआ। लेकिन नगरवासी बिजली के संयोजन नहीं ले रहे थे, कहते हैं कि इस पर ’22 में दिवाली पर मुफ्त में नगर को रोशन किया गया, जिसके बाद लोग स्वयं संयोजन लेने को प्रेरित हुए। 

1892 में शुरू होने लगा इलाज

नगर में चिकित्सा व्यवस्था की शुरुआत 1892 में रैमजे हॉस्पिटल की स्थापना के साथ हुयी। दो वर्ष बाद बी. डी. पाण्डे जिला चिकित्सालय की आधारशिला नोर्थ-वेस्ट प्रोविंस के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर चार्ल्स एच. टी. क्रोस्थ्वेट ने 17 अक्टूबर 1894 को रखी थी।

कार्बेट की मां ने की थी पर्यटन की शुरुआत

नगर में पर्यटन की शुरुआत का श्रेय एक अंग्रेज महिला मेरी जेन कार्बेट को जाता है, जिन्होंने सबसे पहले अपना घर किराए पर दिया था। वह प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय शिकारी जिम कार्बेट की मां थीं। उनके बाद ही 1870-72 में मेयो होटल के नाम से टॉम मुरे ने नगर के पहले होटल (वर्तमान ग्रांड होटल) का निर्माण कराया। जेन की मृत्यु 16 मई 1924 को हुयी, उन्हें सैंट जोर्ज कब्रस्तान में लूसिंग्टन के करीब ही दफनाया गया था। आज इन कब्रों में नाम इत्यादि लिखने में प्रयुक्त धातु भी उखाड़ कर चुरा ली गयी है। उनका 1881 में बना घर गर्नी हाउस आज भी आल्मा पहाड़ी पर मौजूद है।

कार्बेट ने बनाया था बेंड स्टेंड, राम सिंह ने की बेंड की शुरुवात

सरोवरनगरी के ऐतिहासिक बैंड हाउस के निर्माण का श्रेय नगर के तत्कालीन म्युनिसिपल कमिश्नर अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणविद व सुप्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट को जाता है। कहते हैं कि उन्होंने स्वयं के चार हजार रुपये से यहां पर लकड़ी का बैंड स्टैंड बनाया था। 1960 के दशक से तत्कालीन पालिका अध्यक्ष मनोहर लाल साह ने इसका जीर्णोद्धार कर इसे वर्तमान स्वरूप दिलाया। 

तभी से आजाद हिंद फौज में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के करीबी रहे कैप्टन राम सिंह ने यहां सीजन के दिनों में बैंडवादन की शुरूआत की। करीब ढाई दशक पूर्व तक वह यहां हर वर्ष नियमित रूप से सीजन के दौरान बैंडवादन करते रहे। इसके बाद से बीच-बीच में कई बार बैंड वादन होता और छूटता रहा। इधर कुछ वर्षों से यह परंपरा एक बार पुनः चल पड़ी हैं।

इस तरह बना नैनीताल का नगर पालिका पुस्तकालय

नैनीताल नगर के दुर्गा लाल साह नगर पालिका पुस्तकालय की स्थापना की घटना अपने आप में एक रोचक प्रसंग है। स्व. मोहन लाल साह को नैनीताल जैसी जगह में पुस्तकालय न होने का अफसोस था और उन्हें यह कमी बार-बार अखरती रहती थी। वर्ष 1933-34 के लगभग उन्होंने नैनीताल में पुस्तकालय बनवाने का प्रस्ताव नगरपालिका में रखा।

उस समय नैनीताल नगरपालिका के अध्यक्ष मि. बुशर ने इस प्रस्ताव को यह कह कर स्वीकार नहीं किया कि इस समय पालिका के पास इतना पैसा नहीं है कि पुस्तकालय का खर्च वहन किया जा सके। उन्होंने पालिका के सदस्यों को बताया कि पुस्तकालय के निर्माण में लगभग 5,000 रुपयों का खर्च आयेगा जो पालिका वहन नहीं कर सकती है इसलिये इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस पर मोहन लाल साह जी ने अपनी ओर से 5,000 रुपये पुस्तकालय निर्माण के लिये देने की पेशकश की और कहा, उनकी सिर्फ इतनी सी शर्त है कि पुस्तकालय का नाम उनके पिताजी के नाम पर दुर्गा लाल साह म्युनिसिपल पब्लिक लाइब्रेरी रखा जाये। उनकी इस शर्त को मान लिया गया और नैनीताल में पुस्तकालय की स्थापना हो गई। यह पुस्तकालय बाद में उत्तर भारत के प्रमुख पुस्तकालयों में शामिल रहा।

आसान पहुंच में है नैनीताल

नैनीताल पहुँचाने के लिए पन्तनगर (72 किमी) तक हवाई सेवा से भी आ सकते हैं। काठगोदाम (34 किमी) देश के विभिन्न शहरों से रेलगाड़ी से जुड़ा है, यहां से बस या टैक्सी से आया जा सकता है। नैनीताल देश की राजधानी दिल्ली से 304 और लखनऊ से 388 किमी दूर है।

बहुत कुछ है देखने को

नैनी सरोवर में नौकायन व मालरोड पर सैर का आनन्द जीवन भर याद रखने योग्य है। इसके अलावा नैना पीक (2610 मी.), स्नो भ्यू (2270 मी.), टिफिन टॉप (2292 मी.) से नगर एवं तराई क्षेत्रों के ‘बर्ड आई व्यू’ लिए जा सकते हैं तो हिमालय दर्शन (9 किमी) से मौसम साफ होने पर उम्मीद से कहीं अधिक 365 किमी की हिमालय की अटूट पर्वत श्रृंखलाओं का नयनाभिराम दृश्य एक नजर में देखा जा सकता है।

नगर से करीब तीन किमी की पैदल ट्रेकिंग कर नैना पीक पहुँच कर हिमालय के दर्शन करना अनूठा अनुभव देता है। जहां से पर्वतराज हिमालय की अटूट श्वेत-धवल क्षृंखलाओं में प्रदेश के कुमाऊं व गढ़वाल अंचलों के साथ पड़ोसी राष्ट्र नेपाल की सीमाओं को एकाकार होते हुऐ देखना एक शानदार अनुभव होता है।

यहां से पोरबंदी, केदारनाथ, कर्छकुंड, चौखम्भा, नीलकंठ, कामेत, गौरी पर्वत, हाथी पर्वत, नन्दाघुंटी, त्रिशूल, मैकतोली (त्रिशूल ईस्ट), पिण्डारी, सुन्दरढुंगा ग्लेशियर, नन्दादेवी, नन्दाकोट, राजरम्भा, लास्पाधूरा, रालाम्पा, नौल्पू व पंचाचूली होते हुऐ नेपाल के एपी नेम्फा की एक, दो व तीन सहित अन्य चोटियों की 365 किमी से अधिक लंबी पर्वत श्रृंखला को एक साथ इतने करीब से देखने का जो मौका मिलता है, वह हिमालय पर जाकर भी सम्भव नहीं। 

इसके अलावा सैकड़ों किमी दूर के हल्द्वानी, नानकमत्ता, बहेड़ी, रामनगर, काशीपुर तक के मैदानी स्थलों को यहां से देखा जा सकता है। इसके अलावा सरोवरनगरी का यहां से ‘बर्ड आई व्यू’ भी लिया जा सकता है।

किलबरी व पंगोठ (20 किमी) में प्रकृति का उसके वास्तविक रूप् में दर्शन, मां नयना देवी मन्दिर, गुरुद्वारा श्री गुरुसिंघ सभा, जामा मस्जिद व उत्तरी एशिया के पहली मैथोडिस्ट गिरिजाघर के बीच सर्वधर्म संभाव स्थल के रूप् में ऐतिहासिक फ्लैट क्षेत्र, एशिया के सर्वाधिक ऊंचाई वाले चिड़ियाघरों में शुमार नैनीताल जू (2100 मी.), 120 एकड़ भूमि में फैला ब्रिटेन के बकिंघम पैलेस की गौथिक शैली में बनी प्रतिमूर्ति राजभवन, 18 होल वाला गोल्फ ग्राउण्ड, झण्डीधार जहां आजादी के दौर में स्थानीय दीवानों ने तिरंगा फहराया था।

रोप-वे की सवारी, रोमांच पैदा करने वाला केव गार्डन, प्रेमियों के स्थल ´लवर्स प्वाइंट´ व डौर्थी सीट, कई फिल्मों में दिखाए गए लेक व्यू प्वाइंट, हनुमानगढ़ी मन्दिर आदि स्थानों पर घूमा जा सकता है। निकटवर्ती एरीज से अनन्त ब्रह्माण्ड में असंख्य तारों व आकाशगंगाओं को खुली आंखों से निहारा जा सकता है, जो सामान्यतया बड़े शहरों से ‘प्रकाश प्रदूषण´ के कारण नहीं देखे जा सकते हैं।

नजदीकी स्थल भी जैसे हार में नगीना

नैनीताल जितना खूबसूरत है, उसके नजदीकी स्थल भी जैसे हार में नगीना हैं. हिमालय दर्शन से छोड़ा आगे निकलें तो किलवरी (‘वरी’ यानी चिन्ताओं को ‘किल’ करने का स्थान) नामक स्थान से हिमालय को और अधिक करीब से निहारा जा सकता है। यहां से कुमाऊँ की अन्य पर्वतीय स्थलों द्वाराहाट, रानीखेत, अल्मोड़ा व कौसानी आदि की पहाड़ियां भी दिखाई देती हैं।

वातावरण की स्वच्छता में लगभग 4 किमी दूर स्थित ‘लेक व्यू प्वाइंट’ से सरोवरनगरी को ‘बर्ड आई व्यू’ से देखने का अनुभव भी अलौकिक होता है। खगोल विज्ञान एवं अन्तरिक्ष में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी नैनीताल उत्कृष्ट है। निकटवर्ती स्थल पंगोठ, भूमियाधार, ज्योलीकोट व गेठिया में ‘विलेज टूरिज्म’ के साथ दुनिया भर के अबूझे पंछियों से मुलाकात, रामगढ़ व मुक्तेश्वर की फल घाटी में ताजे फलों का स्वाद, सातताल, भीमताल, नौकुचियाताल, सरिताताल व खुर्पाताल में जल प्रकृति के अनूठे दर्शन मानव मन में नई हिलोरें भर देते हैं।

कुमाऊं के अन्य रमणीक पर्यटक स्थलों अल्मोड़ा, रानीखेत, कौसानी, बैजनाथ, कटारमल, बागेश्वर, पिण्डारी, सुन्दरढूंगा, काफनी व मिलम ग्लेशियरों, जागेश्वर, पिथौरागढ़ व हिमनगरी मुनस्यारी के लिए भी नैनीताल प्रवेश द्वार है।

शिक्षा नगरी के रूप में भी जाना जाता है नैनीताल

नैनीताल को शिक्षा नगरी के रूप में भी जाना जाता है। दरअसल, इसके अंग्रेज निर्माताओं ने यहां की शीतल व शांत जलवायु को देखते हुऐ इसे विकसित ही इसी प्रकार किया। नैनीताल अंग्रेजों को अपने घर जैसा लगा था, और उन्होंने इसे ‘छोटी बिलायत’ के रूप में बसाया। सर्वप्रथम 1857 में अमेरिकी मिशनरियों के आने से यहां शिक्षा का सूत्रपात हुआ।

उन्होंने मल्लीताल में ऐशिया का अमेरिकन मिशनरियों का पहला मैथोडिस्ट चर्च बनाया, तथा इसके पीछे ही नगर के पहले हम्फ्री हाईस्कूल की आधारशिला रखी, जो वर्तमान में सीआरएसटी इंटर कॉलेज के रूप में नऐ गौरव के साथ मौजूद है। 1869 में यूरोपियन डायसन बॉइज स्कूल के रूप में वर्तमान के शेरवुड कालेज और लड़कियों के लिए यूरोपियन डायसन गर्ल्स स्कूल खोले गए, जो वर्तमान में ऑल सेंट्स कालेज के रूप में विद्यमान है। पूर्व मिस इण्डिया निहारिका सिंह सहित न जाने कितनी हस्तियां इस स्कूल से निकली हैं।

इसके अलावा 1877 में ओक ओपनिंग हाइस्कूल के रूप में वर्तमान बिड़ला विद्या मन्दिर, 1878 में वेलेजली गर्ल्स हाइस्कूल के रूप में वर्तमान कुमाऊं विश्व विद्यालय का डीएसबी परिसर व सेंट मेरी’ज कान्वेंट हाई स्कूल, 1886 में सेंट एन्थनी कान्वेंट ज्योलीकोट तथा 1888 में सेंट जोजफ सेमीनरी के रूप में वर्तमान सेंट जोजफ कालेज की स्थापना हुई। इस दौर में यहां रहने वाले अंग्रेजों के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ते थे, और उन्हें अपने देश से बाहर होने या कमतर शिक्षा लेने का अहसास नहीं होता था।

इस प्रकार आजादी के बाद 20वीं सदी के आने से पहले ही यह नगर शिक्षा नगरी के रूप में अपनी पहचान बना चुका था। खास बात यह भी रही कि यहां के स्कूलों ने आजादी के बाद भी अपना स्तर न केवल बनाऐ रखा, वरन ‘गुरु गोविन्द दोउं खड़े, काके लागूं पांय, बलिहारी गुरु आपने जिन गोविन्द बताय’ की विवशता यहां से निकले छात्र-छात्राओं में कभी भी नहीं दिखाई दी। आज भी दशकों पूर्व यहां से निकले बच्चे वृद्धों के रूप में जब यहां घूमने भी आते हैं तो नऐ शिक्षकों में अपने शिक्षकों की छवि देखते हुऐ उनके पैर छू लेते हैं।

हर मौसम में सैलानियों का स्वर्ग

पहाड़ों का रुख यूँ सैलानी आम तौर पर गर्मियों में करते हैं। लेकिन इसके बाद भी, जब देश मानसून का इंतजार कर रहा होता है, यहां लोकल मानसून झूम के बरसने लगता है। इस दौरान यहां एक नया आकर्षण नजर आता है, जिसे नगर के अंग्रेज निर्माताओं ने अपने घर इंग्लैंड को याद कर ‘लंदन फॉग’ और ‘ब्राउन फॉग ऑफ इंग्लैंड’ नाम दिये थे। नगर की विश्व प्रसिद्ध नैनी सरोवर के ऊपर उठता और सरोवर को छूने के लिए नीचे उतरते खूबसूरत बादलों को ‘लंदन फॉग’ कहा जाता है।

इन्हें देखकर हर दिल अनायास ही गा उठता है-‘आसमां जमीं पर झुक रहा है जमीं पर’, और ‘लो झुक गया आसमां भी…’। सरोवरनगरी नैनीताल सर्दियों के दिनों यानी ‘ऑफ सीजन’ में भी सैलानियों का स्वर्ग बनी रहती है। यहां इन दिनों मौसम उम्मीद से कहीं अधिक खुशगवार, खुला व गुनगुनी धूप युक्त होता है, नैनीताल हर मौसम में आया जा सकता है। यहां की हर चीज लाजबाब है, जिसके आकर्षण में देश विदेश के लाखों पर्यटक पूरे वर्ष यहां खिंचे चले आते हैं।

सर्दियों में यहां होने वाली बर्फवारी के साथ गुनगुनी धूप भी पर्यटकों को आकर्षित करती है,इस दौरान यहां राज्य वृक्ष लाल बुरांश को खिले देखने का नजारा भी बेहद आकर्षित होता है। यहां की सर्वाधिक ऊंची चोटी नैना पीक (2611 मीटर) पर तो इन दिनों ‘दुनिया की छत’ पर खड़े होने का अनुभव अद्वितीय होता है। फिजाएं एकदम साफ खुली हुई, वातावरण में दूर दूर तक धुंध का नाम नहीं, ऐसे में सैकड़ों किमी दूर तक बिना किसी उपकरण, लेंस आदि के देख पाने का अनूठा अनुभव लिया जा सकता है।

तब यहां न तो बेहद भीड़-भाड़ व होटल न मिलने जैसी तमाम दिक्कतें ही होती हैं, सो ऐसे में यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य का पूरा आनन्द लेना सम्भव होता है। इन दिनों यहाँ एक साथ कई आकर्षण सैलानियों को अपनी पूरी नैसर्गिक सुन्दरता का दीदार कराने के लिए जैसे तैयार होकर बैठे रहते हैं। कई दिनों तक आसमान में बादलों का एक कतरा तक मौजूद नहीं रहता। 

बरसातों में कोहरे की चादर में शहर का लिपटना और उसके बीच स्वयं भी छुप जाने, बादलों को छूने व बरसात में भीगने का अनुभव अलौकिक होता है। गर्मियों की तो बात ही निराली होती है, मैदानी की झुलसाती गर्मी के बीच यहां प्रकृति ´एयरकण्डीशण्ड´ अनुभव दिलाती है। नैनी सरोवर में नौकायन के बीच पानी को छूना तो जैसे स्वर्गिक आनन्द देता है तो मालरोड पर सैर का मजा तो पर्यटकों के लिए अविस्मरणीय होता है।

स्विट्जरलेंड-मसूरी की तरह नजर आती है ‘विंटर लाइन’

इस दौरान यहाँ कुदरत का अजूबा कही जाने वाली ‘विंटर लाइन’ नैनीताल से भी यह वर्षो से नजर आती है लेकिन अब तक इसे नगर व प्रदेश के पर्यटन कैलेंडर और पर्यटन व्यवसायियों से मान्यता नहीं मिल पाई है। कुदरत की इस अनूठी नेमत के बारे में कहा जाता है कि दुनियां में स्विट्जरलेंड की बॉन वैली और उत्तराखंड में मसूरी के लाल टिब्बा से ही नजर आती है।

प्रकृति प्रेमियों के अनुसार ‘विंटर लाइन’ की स्थिति सर्दियों में मैदानों में कोहरा छाने और ऊपर से सूर्य की रोशनी पड़ने के परिणामस्वरूप शाम ढलते सैकड़ों किमी लंबी सुर्ख लाल व गुलाबी रंग की रेखा के रूप में नजर आती है। नैनीताल में इसका सबसे शानदार नजारा हनुमानगढ़ी क्षेत्र से लिया जा सकता है, लेकिन नगर के चिड़ियाघर क्षेत्र से भी इसे देखा जा सकता है।

सुबह सूर्योदय से पूर्व भी इसे हल्के स्वरूप में देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि हनुमानगढ़ी से सूर्यास्त के भी अनूठे नजारे देखने को मिलते हैं। प्रकृति प्रेमी बताते हैं कि इस दौरान डूबते हुए सूर्य में कभी घड़ा तो कभी सुराही जैसे अनेक आकार प्रतिबिंबित होते हैं। पूर्व में इन्हें देखने के लिये यहां बकायदा व्यू प्वाइंट स्थापित थे, जो बीते वर्षो में हटा दिये गये हैं।

नेपाली फिल्म ‘विरासत’ में भी दिखती है नैनीताल की विंटर लाइन
देश-प्रदेश के पर्यटन विभाग और पर्यटन व्यवसायी भले विंटरलाइन की खूबसूरती का नगर के पर्यटन उद्योग को बढ़ाने में उपयोग न कर रहे हों लेकिन गत वर्ष नगर में इन्हीं दिनों फिल्माई गई नेपाली फिल्मों के निर्देशक गोविंद गौतम की नायक समर थापा व नायिका सोनिया खड़का अभिनीत फिल्म विरासत में नैनीताल की विंटरलाइन को फिल्माया गया है। इस फिल्म के एक गीत में नायकनाियका के बीच हनुमानगढ़ी के पास विंटर लाइन को दिखाते हुए प्रणय दृश्य फिल्माए गए हैं।

मसूरी व नैनीताल हैं देश की प्राचीनतम नगर पालिकाऐं

मसूरी व नैनीताल देश की प्राचीनतम नगर पालिकाऐं हैं। मसूरी में 1842 और नैनीताल में 1845 में पालिका बनाने की कवायद शुरू हुयी। बसने के चार वर्ष के भीतर ही नैनीताल देश की दूसरी पालिका बन गया था। 3 अक्टूबर 1850 को यहाँ औपचारिक रूप से तत्कालीन कमिश्नर लूसिंग्टन की अध्यक्षता तथा मेजर जनरल सर डब्ल्यू रिचर्ड, मेजर एचएच आर्नोल्ड, कप्तान डब्ल्यूपी वा व पीटर बैरन की सदस्यता में पहली पालिका बोर्ड का गठन हुआ।

लिहाजा मसूरी को तत्कालीन नोर्थ प्रोविंस की प्रथम एवं नैनीताल को दूसरी नगरपालिका होने का गौरव हासिल है। इससे पूर्व 1688 में प्रेसीडेंसी एक्ट के तहत मद्रास, कलकत्ता व मुम्बई जैसे नगर प्रेसीडेंसी के अन्तर्गत आते थे। तत्कालीन ईस्ट इण्डिया कंपनी उस दौर में 1857 के गदर एवं अन्य कई युद्धों के कारण आर्थिक रूप से कमजोर हो गई थी, लिहाजा उसका उद्देश्य स्थानीय सरकारों के माध्यम से जनता से अधिक कर वसूलना था।

गांधी जी की यादें भी संग्रहीत हैं यहाँ

नैनीताल एवं कुमाऊं के लोग इस बात पर फख्र कर सकते हैं कि महात्मा गांधी जी ने यहां अपने जीवन के 21 खास दिन बिताऐ थे। वह अपने इस खास प्रवास के दौरान 13 जून 1929 से तीन जुलाई तक 21 दिन के कुमाऊं प्रवास पर रहे थे। इस दौरान वह 14 जून को नैनीताल, 15 को भवाली, 16 को ताड़ीखेत तथा इसके बाद 18 को अल्मोड़ा, बागेश्वर व कौसानी होते हुए हरिद्वार, दून व मसूरी गए थे, और इस दौरान उन्होंने यहां 26 जनसभाएं की थीं।

कुमाऊं के लोगों ने भी अपने प्यारे बापू को उनके ‘हरिजन उद्धार’ के मिशन के लिए 24 हजार रुपए दान एकत्र कर दिये थे। तब इतनी धनराशि आज के करोड़ों रुपऐ से भी अधिक थी। इस पर गदगद् गांधीजी ने कहा था विपन्न आर्थिक स्थिति के बावजूद कुमाऊं के लोगों ने उन्हें जो मान और सम्मान दिया है, यह उनके जीवन की अमूल्य पूंजी होगी। 14 जून का नैनीताल में सभा के दौरान उन्होंने निकटवर्ती ताकुला गांव में स्व. गोबिन्द लाल साह के मोती भवन में रात्रि विश्राम किया था।

इस स्थान पर उन्होंने गांधी आश्रम की स्थापना की, यहाँ आज भी उनकी कई यादें संग्रहीत हैं। इसी दिन शाम और 15 को पुनः उन्होंने नैनीताल में सभा की। यहाँ उन्होंने कहा, ‘‘मैंने आप लोगों के कष्टों की गाथा यहां आने से पहले से सुन रखी थी। किंतु उसका उपाय तो आप लोगों के हाथ में है। यह उपाय है आत्म शुद्धि।’’ यह भाषण उन्होंने ताड़ीखेत में भी दिया था। 15 को ही उन्होंने भवाली में भी सभा कर खादी अपनाने पर जोर दिया।

16 को वह ताड़ीखेत के प्रेम विद्यालय पहुंचे और वहां भी एक बड़ी सभा में आत्म शुद्धि व खादी का संदेश दिया। 18 को वह अल्मोड़ा पहुंचे, जहां नगर पालिका की ओर से उन्हें सम्मान पत्र दिया गया। इसके बाद उन्होंने 15 दिन कौसानी में बिताए। कौसानी की खूबसूरती से मुग्ध होकर उसे भारत का स्विट्जरलैंड नाम दिया। 22 जून को कुली उतार आन्दोलन में अग्रणी रहे बागेश्वर का भ्रमण किया। यहां स्वतन्त्रता सेनानी शांति लाल त्रिवेद्वी, बद्रीदत्त पांडे, देवदास गांधी, देवकीनदंन पांडे व मोहन जोशी से मंत्रणा की।

15 दिन प्रवास के दौरान उन्होंने कौसानी में गीता का अनुवाद भी किया। गांधी जी दूसरी बार 18 जून 1931 को नैनीताल पहुंचे और पांच दिन के प्रवास के दौरान उन्होंने कई सभाएं की। इस दौरान उन्होंने संयुक्त प्रांत के गवर्नर सर मेलकम हैली से राजभवन में मुलाकात कर जनता की समस्याओं का निराकरण कराया। उनसे प्रांत के जमीदार व ताल्लुकेदारों ने भी मुलाकात की और गांधी के समक्ष अपना पक्ष रखा। इस यात्रा के बाद उत्तर प्रदेश व कुमाऊं में आन्दोलन तेज हो गया।

पृथक उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में भी सक्रिय भूमिका रही नैनीताल की

पृथक उत्तराखण्ड राज्य का आन्दोलन पहली बार एक सितम्बर 1994 को तब हिंसक हो उठा था, जब खटीमा में स्थानीय लोग राज्य की मांग पर शांतिपूर्वक जुलूस निकाल रहे थे। जलियांवाला बाग की घटना से भी अधिक वीभत्स कृत्य करते हुए तत्कालीन यूपी की अपनी सरकार ने केवल घंटे भर के जुलूस के दौरान जल्दबाजी और गैरजिम्मेदाराना तरीके से जुलूस पर गोलियां चला दीं, जिसमें सर्वधर्म के प्रतीक प्रताप सिंह, भुवन सिंह, सलीम और परमजीत सिंह शहीद हो गए।

यहीं नहीं उनकी लाशें भी सम्भवतया इतिहास में पहली बार परिजनों को सौंपने की बजाय पुलिस ने ‘बुक´ कर दीं। यह राज्य आन्दोलन का पहला शहीदी दिवस था। इसके ठीक एक दिन बाद मसूरी में यही कहानी दोहराई गई, जिसमें महिला आन्दोलनकारियों हंसा धनाई व बेलमती चौहान के अलावा अन्य चार लोग राम सिंह बंगारी, धनपत सिंह, मदन मोहन ममंगई तथा बलबीर सिंह शहीद हुए। एक पुलिस अधिकारी उमा शंकर त्रिपाठी को भी जान गंवानी पड़ी।

इससे यहां नैनीताल में भी आन्दोलन उग्र हो उठा। यहां प्रतिदिन शाम को आन्दोलनात्मक गतिविधियों को ‘नैनीताल बुलेटिन´ जारी होने लगा। रैपिड एक्शन फोर्स बुला ली गई और कर्फ्यू लगा दिया गया। इसी दौरान यहां एक होटल कर्मी प्रताप सिंह आरपीएफ की गोली से शहीद हो गया। इसकी अगली कड़ी में दो अक्टूबर को दिल्ली कूच रहे राज्य आन्दोलनकारियों के साथ मुरादाबाद और मुजफ्फरनगर में ज्यादतियां की गईं, जिसमें कई लोगों को जान और महिलाओं को अस्मत गंवानी पड़ी।

नैनीताल से पढ़ा था बांग्लादेश के नायक ने अनुशासन का पाठ

1971 में पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश को अलग राज्य की मान्यता दिलाने के लिए लड़ी गई लड़ाई के नायक फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ ने नैनीताल से अनुशासन का पाठ पढ़ा था। यह वह जगह है, जहां के शेरवुड कालेज से सैम नाम का यह बालक पांचवी से सीनियर कैंब्रिज (11वीं) तक पढ़ा। अपने मृत्यु से पूर्व शायद वही सबसे बुजुर्ग शेरवुडियन भी थे। उनका नैनीताल से हमेशा गहरा रिश्ता रहा। नैनीताल भी हमेशा उनके लिए शुभ रहा।

सैम नैनीताल के शेरवुड कालेज में वर्ष 1921 में पांचवी कक्षा में भर्ती हुए थे। शुरू से पढ़ाई में मेधावी होने के साथ खेल कूद एवं अन्य शिक्षणेत्तर गतिविधियों में भी वह अव्वल रहते थे, जिसकी तारीफ स्कूल के तत्कालीन प्रधानाचार्य सीएच डिक्कन द्वारा हर मौके पर खूब की जाती थी। वर्ष 1928 में सीनियर कैंब्रिज कर वह लौट गए थे, लेकिन इस नगर और स्कूल को नहीं भूले।

बताते हैं कि यहां से जाने के तुरन्त बाद उनका आईएमए में चयन हो गया था। स्कूल से जाने के बाद मानेकशॉ 1969 में एक बार पुन: शेरवुड के ऐतिहासिक स्थापना की स्वर्ण जयन्ती पर मनाए गए विशेष वार्षिकोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि वापस लौटे। इस दौरान वह यहां के बच्चों से खुलकर मिले, और उन्हें अनुशासन व मेहनत के बल पर जीवन में सदैव आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। इसे संयोग कहें या कुछ और लेकिन नैनीताल ने इसी दौरान उन्हें एक बार फिर उनके साथ सुखद समाचार दिलाया।

वह समाचार था उनके देश का थल सेनाध्यक्ष बनने का। इसके बाद ही पाकिस्तान से हुए 1971 के युद्ध में वह भारत की जीत के नायक बने और विश्व मानचित्र पर बाग्लादेश के नाम से एक नए देश का प्रादुर्भाव हुआ। उनके जीवन में आए चरमोत्कर्ष में नैनीताल और यहां के शेरवुड कालेज की महत्ता को भी निसन्देह स्वीकार किया जाता है।

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भी इसी स्कूल के छात्र रहे। इधर अपने ब्लॉग में अमिताभ ने स्वीकार किया कि नैनीताल के शेरवुड में प्राचार्य की ‘स्टिक’ से पडी मार से ही अनुशासन सीख वह इस मुकाम पर पहुंचे। बॉलीवुड व हॉलीवुड सहित तीन महाद्वीपों में अपने अभिनय का जलवा बिखेर चुके अभिनेता कबीर बेदी और अमिताभ के भाई अजिताभ भी यहीं (शेरवुड) के छात्र रहे।

यहीं का था ‘एजे कार्बेट फ्रॉम नैनीताल’

जिम कार्बेट का जन्म 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन नैनीताल के अयारपाटा स्थित गर्नी हाउस और कालाढुंगी स्थित ‘छोटी हल्द्वानी’ में बिताया। जिम कार्बेट के पिता पहले ‘मैथ्यू एण्ड सन्स’ नामक भवन बनाने वाली कम्पनी में हिस्सेदार थे, तथा नैनीताल के ‘द हाइव’ नाम के भवन में चलने वाले पोस्ट आफिस में पोस्टमास्टर के रूप में भी कार्य करते थे।

स्वयं भी आजीवन कुंवारे रहे जिम अपनी अविवाहित बड़ी बहन मैगी के साथ 1945 तक गर्नी हाऊस में रहे। सर्दियों में उनका परिवार कालाढूंगी के छोटी हल्द्वानी वाले अपने मकान में चले जाते थे, जो अब संग्रहालय के रूप में मौजूद है। वह जहाँ अचूक निशानेबाज और कुशल शिकारी थे वहीं वन्य पशुओं के प्रेमी तथा प्रभावशाली लेखक भी थे। भारत सरकार ने उनकी लोकप्रियता को समझते हुए उनके नाम पर ‘जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान और ब्याघ्र अभयारण्य’ का नाम रखा।

कहते हैं कि नैनीताल एवं उत्तराखण्ड से गहरा रिश्ता रखने वाले जिम को एक अंग्रेज होते हुए भी उनमें भारत-प्रेम उनका इतना अधिक था कि वे उसके यशगान में लग रहते थे। कुमाऊँ और गढ़वाल तथा खासकर नैनीताल उन्हें बहुत प्रिय था। उन्होंने 1947 में देश विभाजन की पीड़ा से आहत होकर एवं अपनी अविवाहित बहन मैगी की चिन्ता के कारण देश छोड़ा, और कीनिया के तत्कालीन गांव और वर्तमान में बड़े शहर नियरी में अपने भतीजे टॉम कार्बेट के माध्यम से इसलिए बसे कि वहां का माहौल व परंपराएं भी भारत और विशेषकर इस भूभाग से मिलती जुलती थी।

जिम वहां विश्व स्काउट के जन्मदाता लार्ड बेडेन पावेल के घर के पास ’पैक्सटू’ नाम के घर में अपनी बहन के साथ रहे, और वहीं 19 अप्रैल 1955 को उन्होंने 80 वर्ष की आयु में आखरी सांस ली। घर के पास में ही स्थित कब्र में उन्हें पावेल की आलीशान कब्र के पास ही दफनाया गया, खास बात यह थी कि उनकी कब्र पर परंपरा से हटकर उनके मातृभूमि भारत व नैनीताल प्रेम को देखते हुए कब्र पर नैनीताल का नाम भी खोदा गया।

उनके नैनीताल प्रेम को इस तरह और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है कि नियरी के पास ही स्थित वन्य जीवन दर्शन के लिहाज से विश्व के सर्वश्रेष्ठ व अद्भुत ‘ट्री टॉप होटल’ में उन्होंने सात पुस्तकें पूर्णागिरि मन्दिर पर ‘टेम्पल टाइगर एण्ड मोर मैन ईटर्स ऑफ कुमाऊं’,‘माई इण्डिया’, ‘जंगल लोर’,‘मैन ईटिंग लैपर्ड आफ रुद्रप्रयाग’ तथा ‘ट्री टॉप’ पुस्तकें लिखीं। इस होटल में जिम जब भी जाते थे, आवश्यक रूप से होटल के रिसेप्सन पर अपना परिचय ‘एजे कार्बेट फ्रॉम नैनीताल’ लिखा करते थे, जिसे आज भी वहां देखा जा सकता है।

गत वर्ष कीनिया में जिम कार्बेट के आखिरी दिनों की पड़ताल कर लौटे नैनीताल निवासी भारतीय सांस्कृतिक निधि ‘इंटेक’ की राज्य शाखा के सहालकार परिषद अध्यक्ष पद्मश्री रंजीत भार्गव इसकी पुष्टि करते हैं। वह बताते हैं जिस प्रकार नैनीताल में जिम का पैतृक घर गर्नी हाउस और छोटी हल्द्वानी सरकार की ओर से उपेक्षित हैं, उसी तरह नियरी में उनकी कब्र भी धूल धूसरित स्थिति में है।

तीसरी कोशिश में बन पाया था बकिंघम पैलेस जैसा नैनीताल राजभवन

लंदन के बकिंघम पैलेस की प्रतिकृति के रूप में गौथिक शैली में बने नैनीताल राजभवन का नाम अपने अद्भुद शिल्प के लिये न केवल नगर की प्रसिद्ध इमारतों में सबसे ऊपर आता है, वरन इसकी गिनती देश ही नहीं दुनिया की सबसे सुंदर और बेजोड़ इमारतों में की जाती है, अपने कुल करीब 220 एकड़ क्षेत्रफल में से आठ एकड़ क्षेत्रफल में बने इसके मुख्य भवन के साथ 50 एकड़ क्षेत्रफल में फैला विश्व का सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित 18 होल का गोल्फ मैदान और गोल्फ क्लब तथा शेष 160 एकड़ भूमि पर घना खूबसूरत जंगल भी है।

इसका निर्माण गहन भूगर्भीय जांचों के उपरांत बड़ी मजबूती के साथ किया गया, क्योंकि इससे पूर्व नैनीताल में दो और राजभवन बनाए गए थे, जिनमें नगर और उनके स्थानों की कमजोर भूगर्भीय स्थितियों की वजह से की बहुत कम समय में ही दरारें आने लगीं। लिहाजा यह तीसरी कोशिश में बन पाया।

नैनीताल स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व तत्कालीन संयुक्त प्रान्त की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी। उस दौर में सबसे पहले वर्ष 1854 में उस समय के गवर्नर के ग्रीष्मकालीन प्रवास के लिये शेर का डांडा में अस्थायी रूप से गर्वनर हाउस किराये पर लिया गया। बाद में वर्ष 1865 में गर्वनर ई ड्रमेड ने राजभवन के लिए ‘माल्डन इस्टेट’ नाम के भवन का निर्माण किया और बाद में उसके स्थान की कमजोर भूगर्भीय स्थिति को देखते हुए जल्द ही इसे बेच दिया।

कुछ समय पश्चात नए गवर्नर जॉर्ज कूपर ने नया गर्वनर हाउस सेंट लू गौर्ज के नजदीक बनवाया पर वर्ष 1880 में आये भूस्खलन में इस भवन के टूट जाने के बाद उन्होंने फिर से शेर का डांडा में ही गर्वनर हाउस का निर्माण किया। इस गर्वनर हाउस में उस समय के दो गर्वनर एल्फोर्ड तथा चार्ल्स क्रासवेट रहे थे।

कुछ समय पश्चात इस गर्वनर हाउस में भी दरारें आने लगी थी और कभी भी इसके क्षतिग्रस्त हो जाने के संदेह के चलते गर्वनर एन्टोनी मैक्डोनल ने इस इमारत को तुड़वा दिया और नये गर्वनर हाउस के लिये जमीन की तलाश की जाने लगी। इस बार इमारत बनवाने से पहले सभी भौगोलिक स्थितियों की अच्छे से जांच की गई जिसके चलते वर्तमान गर्वनर हाउस अस्तित्व में आया, और फलस्वरूप आज भी अपनी पूरी शानो-शौकत के साथ नैनीताल का गौरव बढ़ा रहा है।

नैनीताल राजभवन (तत्कालीन गवर्नमेंट हाउस) इमारत का निर्माण आठ एकड़ क्षेत्रफल में करीब साढ़े सात लाख रुपए खर्च कर मुख्य अभियंता एचडी वाइल्डबल्ड की देखरेख में रूपरेखाकार आर्किटेक्ट स्टीवंेस और अधिशासी एफओडब्लू ऑरटेर द्वारा तैयार किए गए अंग्रेजी के ‘ई’ आकार के डिजाइन के आधार पर किया गया। निर्माण में स्थानीय स्तर पर ही जुटाए गए विभिन्न प्रजातियों की लकड़ी, मुख्यतः बर्मा टीक और स्थानीय पत्थरों तथा इंग्लेंड से लाए गए शीशे और टाइलों का इस्तेमाल करके ‘एशलर फिनिंसिंग’ के साथ परिसज्जित किया गया है।

निर्माण कार्य 27 अप्रैल 1897 को शुरू हुए और भवन मार्च 1900 में बनकर तैयार हुआ। ब्रिटिश गर्वनर सर एंटोनी मैक्डोनाल्ड यहां रहने वाले पहले गवर्नर थे। उनके बाद सर जेम्स, सर जान मिस्टन व सर हरबर्ट बटलर आदि गवर्नर भी यहां रहे, जबकि यूपी की प्रथम राज्यपाल सरोजनी नायडू यहां रहने वाली पहली भारतीय गर्वनर थीं। 115 कमरों के दोमंजिले राजभवन में स्वीमिंग पूल, टेनिस ग्राउंड, अपनी प्रेस, फूलों के बगीचे आदि भी इसकी खूबसूरती बढ़ाते हैं।

यह वर्तमान में 10वीं व 20वीं सदी के हथियार, हाथी दांत, एन्टीक फर्नीचर, ट्रॉफियां व मेडल्स का दर्शनीय संग्रहालय भी है। पास में झंडीधार (जहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बांके लाल कंसल ने गुलामी के दौर में राष्ट्रध्वज फहरा दिया था), मोदी हाइट्स और मुंशी हाइट्स भी दर्शनीय हैं। यहां दो अप्रैल 2013 और पूर्व में वर्ष 1970 में डायनिंग हॉल में अग्निकांड भी हुए, जिससे इसे मामूली नुकसान हुआ।

नैनीताल का गोल्फ मैदान

वर्ष 1926 में राजभवन के पास ही समुद्र सतह से 6475 फीट की ऊँचाई पर यूनाइटेड प्रोविसेंस के तत्कालीन गर्वनर जनरल मैलकम हैली के प्रयासों से ब्रिटिश आर्मी के इंजीनियरों द्वारा तैयार डिजाइन पर बेहद सुंदर और अद्भुद गोल्फ मैदान निर्मित कर गोल्फ खेल की शुरुआत की गई। गोल्फ कोर्स में 18 होल या 18 टी पर ब्रिटिश काल में सर्वाधिक 24 अंक हासिल करने का रिकार्ड 1927 में ब्रिटिश अधिकारी एच एलीना के नाम बना।

देश की आजादी से पूर्व यह गोल्फ मैदान सप्ताह में केवल मंगल, बृहस्पति और रविवार को ही खुलता था। वर्ष 1994 में तत्कालीन राज्यपाल मोती लाल बोरा ने इसे सभी लागों के लिये खुलवा दिया। यह देश के प्राचीनतम गोल्फ कोर्स में शामिल है तथा भारतीय गोल्फ यूनियन (आईजीयू) से सम्बद्ध है। इसमें पर्यटक मामूली शुल्क (ग्रीन फीस) का भुगतान करके गोल्फ खेलने का आनन्द उठा सकते हैं।

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सरोवरनगरी नैनीताल की ऋतुराज जैसी खूबसूरती आप ने पहले कम ही देखी होगी… फूलों-कलियों से रक्तिम हुई सरोवरनगरी की छटा

नवीन समाचार, नैनीताल, 30 मार्च 2019। सरोवरनगरी की छटा ऋतुराज बसंत के आगमन के साथ निखर जाती है। नैनी झील किनारे पांगर एवं चिनार के पेड़ों पर नई कोपलें खिलने के साथ ही ऊपरी क्षेत्रों में राज्य वृक्ष बुरांश के पेड़ एकदम लाल फूलों से लकदक खिल जाते हैं। ऐसे में जहां पर बुरांश के एक साथ कई पेड़ हैं वहां पूरा जंगल ही लाल रंग में रंगा हुआ एवं ऐसा लगता है मानो प्रकृति के घाघरे में बुरांश के लाल बूटे सजे हुए हों।

सैलानियों के लिए भी बुरांश के पेड़ व फूल आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। नैनी झील के साथ भी बुरांश के खिले फूल अद्भुत दृश्य उत्पन्न करते हैं। नगर की आराध्य देवी नयना देवी मंदिर के ठीक ऊपर राजभवन रोड पर भी बुरांश के फूलों से लदा एक पेड़ मानो माता पर स्वयं को न्यौछावर करता है। इधर नगर में बुरांश के फूलों का जूश बनाने में ही स्थानीय लोगों में खासा चाव नजर आता है।

ऐसा भी लगता है कि प्रकृति जैसे आगामी ग्रीष्मकालीन पर्यटन सीजन के लिए स्वयं ही सजने-संवरने लगी है। नगर की शान व पहचान नैनी सरोवर किनारे अफगानी चिनार, पांगर एवं पॉपुलर के पेड़ों पर नई लाल कोपलें झांकने लगी हैं वहीं पद्म प्रजाति के आड़ू-खुमानी व पुलम आदि के पेड़ों पर नये गुलाबी फूल गजब की सुंदरता बढ़ा रहे हैं। ऐसे में नगर की छटा बेहद निखरी हुई है।

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नैनीताल : दिल के सबसे करीब, सचमुच धरती पर प्रकृति का स्वर्ग नैनीताल के चुनिंदा होटल्स, जहां आप जरूर ठहरना चाहेंगे… नैनीताल आयें तो क्या जरूर खरीदें.. नैनीताल आयें तो इन 10 स्वादों को लेना न भूलें
नये वर्ष के स्वागत के लिये सर्वश्रेष्ठ हैं यह 13 डेस्टिनेशन आपके सबसे करीब, सबसे अच्छे, सबसे खूबसूरत एवं सबसे रोमांटिक 10 हनीमून डेस्टिनेशन सर्दियों के इस मौसम में जरूर जायें इन 10 स्थानों की सैर पर… इस मौसम में घूमने निकलने की सोच रहे हों तो यहां जाएं, यहां बरसात भी होती है लाजवाब नैनीताल में सिर्फ नैनी ताल नहीं, इतनी झीलें हैं, 8वीं, 9वीं, 10वीं आपने शायद ही देखी हो…
नैनीताल : दिल के सबसे करीब, सचमुच धरती पर प्रकृति का स्वर्ग नैनीताल के चुनिंदा होटल्स, जहां आप जरूर ठहरना चाहेंगे… नैनीताल आयें तो क्या जरूर खरीदें.. नैनीताल आयें तो इन 10 स्वादों को लेना न भूलें
नये वर्ष के स्वागत के लिये सर्वश्रेष्ठ हैं यह 13 डेस्टिनेशन आपके सबसे करीब, सबसे अच्छे, सबसे खूबसूरत एवं सबसे रोमांटिक 10 हनीमून डेस्टिनेशन सर्दियों के इस मौसम में जरूर जायें इन 10 स्थानों की सैर पर… इस मौसम में घूमने निकलने की सोच रहे हों तो यहां जाएं, यहां बरसात भी होती है लाजवाब नैनीताल में सिर्फ नैनी ताल नहीं, इतनी झीलें हैं, 8वीं, 9वीं, 10वीं आपने शायद ही देखी हो…
नये वर्ष के स्वागत के लिये सर्वश्रेष्ठ हैं यह 13 डेस्टिनेशन आपके सबसे करीब, सबसे अच्छे, सबसे खूबसूरत एवं सबसे रोमांटिक 10 हनीमून डेस्टिनेशन सर्दियों के इस मौसम में जरूर जायें इन 10 स्थानों की सैर पर… इस मौसम में घूमने निकलने की सोच रहे हों तो यहां जाएं, यहां बरसात भी होती है लाजवाब नैनीताल में सिर्फ नैनी ताल नहीं, इतनी झीलें हैं, 8वीं, 9वीं, 10वीं आपने शायद ही देखी हो… नैनीताल आयें तो जरूर देखें उत्तराखंड की एक बेटी बनेंगी सुपरस्टार की दुल्हन उत्तराखंड के आज 9 जून 2023 के ‘नवीन समाचार’ बाबा नीब करौरी के बारे में यह जान लें, निश्चित ही बरसेगी कृपा नैनीताल के चुनिंदा होटल्स, जहां आप जरूर ठहरना चाहेंगे… नैनीताल आयें तो इन 10 स्वादों को लेना न भूलें बालासोर का दु:खद ट्रेन हादसा तस्वीरों में नैनीताल आयें तो क्या जरूर खरीदें.. उत्तराखंड की बेटी उर्वशी रौतेला ने मुंबई में खरीदा 190 करोड़ का लक्जरी बंगला नैनीताल : दिल के सबसे करीब, सचमुच धरती पर प्रकृति का स्वर्ग