-प्रयोगांक संस्था के कलाकारों ने दिखाई गजब की प्रतिभा, अपने पुराने नाटकों को नाटक में शामिल करने का प्रयोग भी रहा दिलचस्प
नैनीताल, 10 अगस्त 2018। कला व थियेटर की नगरी भी कहे जाने वाली सरोवरनगरी नैनीताल का नाम सात समुंदर पार कांस फिल्म फेस्टिवल में, एक पुरुष कलाकार होते हुए ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री’ का अद्वितीय पुरस्कार जीतने वाले दिवंगत सिने अभिनेता निर्मल पांडे को उनके 56वें जन्म दिवस पर अलग तरह से याद किया गया। निर्मल के बड़े भाई साहब मिथिलेश पांडे ने अपने ठीक एक दिन बाद होने वाले जन्म दिन की तैयारियों को भुलाकर निर्मल का जन्म दिन प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े भाई साहब’ पर आधारित नाटक का मंचन करके मनाया। प्रयोगांक संस्था के कलाकारों ने इस सुप्रसिद्ध कहानी में अपने पुराने नाटकों-उरुभंगम और निठल्ले की डायरी के दृश्यों को पिरोकर दिलचस्प प्रयोग किया। वहीं नाटक में खासकर मुख्य पात्र व निर्देशक तथा प्रयोगांक के अध्यक्ष मदन मेहरा ने कहानी के बीसियों वाक्यों के लंबे संवादों को कमोबेश बिना गलती के मंचित कर अपनी प्रतिभा का अच्छा प्रदर्शन किया, वहीं बड़े भाई साहब के रूप में अनवर रजा व कलाकार के नये प्रयोग रूप में कौशल साह जगाती ने नाटक को अपने मंचन से चार चांद लगा दिये। नाटक के दौरान रंगकर्मी पूर्व शिक्षक केपी साह, पूर्व विधायक डा. नारायण सिंह जंतवाल, डीके शर्मा व मंजूर हुसैन ने निर्मल को अपने-अपने अंदाज में श्रद्धांजलि देकर माहौल को भावुक भी कर दिया। इस अवसर पर उमेश कांडपाल, मुकेश धस्माना, डा. मोहित सनवाल, महेश जोशी व राजेश आर्य सहित अनेक अन्य रंगकर्मी भी मौजूद रहे।

दिवंगत सिने अभिनेता निर्मल पांडे के जन्म दिन पर उनके चित्र पर दीप प्रज्वलित करते पूर्व विधायक डा. एनएस जंतवाल व अन्य।

मिथिलेश व कला प्रेमियों का दर्द भी उभरा

नैनीताल। नाटक बड़े भाई साहब का मंचन सीआरएसटी इंटर कॉलेज के सभागार में किया गया। इस पर निर्मल पांडे के बड़े भाई मिथिलेश पांडे सहित अन्य कला प्रेमियों का दर्द इस रूप में उभरा कि हाईकोर्ट के आदेशों और कई मुख्यमंत्रियों की निर्मल के नाम से ऑडिटोरियम निर्माण की घोषणाओं के बावजूद नगर में नाटकों के मंचन के लिए कोई स्थान-ऑडिटोरियम नहीं है। निर्मल पांडे स्वयं नगर में ऑडिटोरियम के लिए प्रयासरत थे। उल्टे इधर नगर के नाटकों के मंचन स्थल शैले हॉल का किराया 600 रुपए से 25 गुना बढ़ाकर 15 हजार रुपए कर दिया गया है।

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वाह, कितना सुंदर है अपना यह नैनीताल नगर। पर्यटन नगरी, सरोवरनगरी के रूप में है इसकी वैश्विक पहचान। आज से नहीं, 18 नवंबर 1841 को अंग्रेज व्यापारी पीटर बैरन के द्वारा दुनिया के सामने लाए जाने और उससे भी पहले अंग्रेज कमिश्नर जी.डब्ल्यू. ट्रेल द्वारा देखे जाने से ही शताब्दियों पहले, जब कहा जाता है कि माता सती के दांये नेत्र के यहां गिरने अथवा तीन ऋृषियों अत्रि, पुलस्य और पुलह द्वारा पवित्र मानसरोवर झील के जल के आह्वान से इस झील और स्थान का निर्माण हुआ होगा।
खैर, आज मैंने बहुत सैर-तफरीह की इस खूबसूरत शहर की, तल्ली से मल्ली, मल्ली से तल्ली, फ्लैट्स, और नैनी झील में चांदनी रात में नौकायन। वाह मजा आ गया। इस शहर की स्मृतियों को मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा। नींद बहुत आ रही है। चलो सो जाऊं। (सुबह उठते हुए)
बड़ी गर्मी है। यह कहां हूं मैं ? यह ए.सी., पंखा, कूलर क्यों नहीं चल रहे ? गर्मी से दम घुटा जा रहा है। बिजली नहीं है शायद। (खिड़की से बाहर की ओर देखकर) ओह! मैं दिल्ली में हूं। कौन सी तारीख है आज ? (सामने कलेंडर की ओर देखकर) जून 2050। बड़ी गर्मी है। कैसे इस गर्मी से बचूं ? क्यों ना किसी हिल स्टेशन की सैर पर निकलूं। कहां जाऊं।
(फोन मिलाता है)
हलो, टूर ऑपरेटर। किसी हिल स्टेशन के लिए आज ही बुकिंग करो बाबा। यहां तो गर्मी से दम घुंटा जा रहा है।
(उधर से हल्की आवाज) कहां चलेंगे सर। एक नया हिल स्टेशन बना है-नैनी। वहां चलेंगे ?
कहीं भी ले चलो यार, और यह नाम तो कुछ सुना-सुना सा भी लग रहा है। बताओ, कहां पहुंचना है ? तुरंत ले चलो।
(उधर से हल्की आवाज) एयरपोर्ट पहुंचिए सर।
ओ.के.। (फोन रखता है)
(हवाई जहाज में) चलिए सर, हवाई जहाज की पेटियां बांध लीजिए, हम नैनी की ओर उड़ रहे हैं।
(थोड़ी देर में) पेटियां फिर बांध लीजिए सर, हम नैनी पहुंच रहे हैं। वह देखिए, वह विशाल मैदान, वहीं नैनी का दुनिया का पहाड़ों पर स्थित सबसे बड़ा एयरपोर्ट है। इस शहर की हमेशा से यह खाशियत है यहां हमेशा से जो भी होता रहा है, दुनिया भर से अनूठा, सबसे बड़ा-सबसे अलग ही होता रहा है। यहां कभी बहुत छोटा सा फ्लैट मैदान हुआ करता था। वह भी बेहद पथरीला था, बावजूद वहां आस-पास के शहरों की छोटी-मोटी खेल या सांस्कृतिक प्रतियोगिताऐं भी होती थीं तो एक-दो बाहर की टीमों को शामिल कर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय से कम के स्तर की नहीं होती थीं। लेकिन, अब तो इस शहर में इतना बड़ा मैदान जो है। पहले यहां ऐसे हवाई जहाज से नहीं, टूटी-फूटी सड़कों से उल्टियां करते हुए आना पड़ता था। और यहां, इस छोर को तल्लीताल और उस ऊपर वाले सिरे को मल्लीताल कहा जाता था। टूरिस्ट इस तल्ली-मल्ली के चक्कर में बड़ा कन्फ्यूज होते थे। इस गफलत में बड़ा सिर दर्द होता था। अब आप चिंता न कीजिए सर, कोई टेंशन नहीं। मजे से जहां चाहे घूमिए।
 
 

-ठीक है भाई, लौटते हुए मिलता हूं।
(आगे बढ़ता है) लेकिन घूमूं कहां ? हर ओर भीड़-भाड़, पैदल चलने को भी जगह नहीं, शोर-शराबा, ऊपर-नीचे, चारों ओर ऊंचे-नीचे मकानों का जंगल। (सोचता है, मन ही मन में) इससे अपना दिल्ली ही क्या अलग है ? ऐसी भीड़-भाड़, शोर-शराबा, ऊंची बिल्डिंग-झुग्गियां ही देखनी थीं तो अपनी दिल्ली ही क्या बुरी थी ?
(सामने हवाई जहाज वाला व्यक्ति ही आता दिख जाता है। उसे रोककर) अरे भाई, ये मुझे किस नरक में लेकर आ गए, मैं तो किसी स्वर्ग की कल्पना में यहां आया था।
कभी स्वर्ग ही था सर यह शहर, यह जिस बड़े झुग्गियों युक्त बड़े हैलीपैड पर हम उतरे हैं, यहां कभी एक बड़ा ताल होता था। इस शहर को प्रकृति का स्वर्ग नैनीताल कहा जाता था। कहते थे-तालों में नैनीताल, बांकी सब तलैया। इस हवाई जहाज को आप टाइम मशीन ही मानिए। और चलिए, मैं आपको कुछ पीछे के नैनीताल में लिए चलता हूं।
-चलो।
(दोनों वापस हवाई जहाज में बैठते हैं, और इस बार उतरते हैं गंदगी-दुर्गंध से बजबजाते एक पहाड़ी शहर में, वहां हर कोई नीचे स्थित ताल को गंदगी से भरने में लगा हुआ है)
-अरे भाई यह क्या कर रहे हों, क्यों इस सुंदर ताल में यह कूड़ा-करकट डाल रहे हो।
-यह कूड़ा इसी झील से निकाला गया है, बिल का भुगतान हो गया है। आगे अगला बिल बनाने के लिए कहां से गंदगी ढूंढूं ? इसलिए इसे वापस झील में डाल रहा हूं।
-(दूसरी ओर एक महिला घर की गंदगी सड़क पर फेंक रहीं है, उसे रोकते हुए) अरे बहन जी, यह क्या कर रही हैं ? क्यों गंदगी सड़क किनारे फेंक रही हैं ?

महिला- तो क्या करूं ? कहां फेंकूं कूड़ा ? यूं तो यहां कूड़ा घर से ले जाने की व्यवस्था भी है। पर बड़ी अजीब व्यवस्था है। उन्हें कूड़ा भी दो , और (जोर देकर) पच्चीस रुपये भी दो। ऊपर से इतनी महंगाई ! (आंखें और हाथ प्रश्न की मुद्रा में नचाकर) रुपये क्या पेड़ पर उगते हैं ?
-नहीं जी, रुपये पेड़ पर तो नहीं उगते। पर आप खुद ही बता रही हैं कि बड़ी महंगाई है। इतनी महंगाई में क्या अपने स्वर्ग सरीखे घर के साथ अपने स्वर्ग सरीखे ही शहर को साफ रखने के लिए क्या पच्चीस रुपये इतने अधिक हैं ?
महिला- चलिए जी चलिए आप, आप जैसे पता नहीं कितने आए और गए हमें समझा कर। हम ऐसे नहीं समझने वाले।
(उधर पहाड़ी पर जेसीबी चलाकर खुदाई चल रही है) अरे भाई यह क्या कर रहे हो ? मैंने सुना है जोन चार में हैं यह शहर। क्यों पहाड़ सरीखी मशीन से इसकी नींव को हिला रहे हो ?
-चलिए जी, बड़े आए समझाने वाले। करोड़ों रुपए देकर जमीन खरीदी है तो जंगल उगाने के लिए नहीं खरीदी है। और लाखों देकर नक्शा पास करवाया है यहां बहुमंजिला भवन बनाने को।
-भैया, खरीदी होगी करोड़ों में आपने जमीन और लाखों में ली होगी भवन बनाने की इजाजत। पर क्या यह पहाड़ सरीखी मशीन चलाने की इजाजत भी ली है ? पहाड़ का सीना चीर कर क्यों अपने साथ इस स्वर्ग के वासियों को जीते जी स्वर्गवासी बनाने पर तुले हो ?
-चलिए जी, अपना रास्ता नापिए। हम नहीं सुनने वाले, और आप की सुन कर इतने बड़े प्रोजेक्ट को मैन्युअली करके हम वर्षों में नहीं खींच सकते।
-टूर ऑपरेटर-सर जी, उधर तो देखिए। वहां लोग खुदाई में निकले मलवे को नाले के पास इकट्ठा किए हुए हैं।
-ऐसा क्यों ?
-चलिए उन्हीं से पूछते हैं।
(वहां जाकर) अरे भाई, यह क्या कर रहे हो, क्यों मलवे को नाले के किनारे इकट्ठा कर रहे हो ? ऐसे तो यह बारिश आते ही नाले ही बह जाएगा, और झील को पाट डालेगा……
-(ठेकेदार बीच में ही रोककर) अरे साहब, नाले में खुद-ब-खुद बहे ना बहे, नाले में बहाने के लिए ही इसे यहां इकट्ठा किया जा रहा है। जब पास में नाला है तो क्यों हजारों रुपए इसे शहर से बाहर फिंकवाने में खर्च किए जाएं। अपने शहर का माल अपने शहर में ही रहना चाहिए कि नहीं ?
-लेकिन इससे तो झील भर जाएगी ?
ठेकेदार- फिकर नॉट सर। इतने सालों से मलवा इसमें डाला जा रहा, तब से नहीं भरी। इतने शहर भर के लोग इसमें मलवा डाल रहे हैं, तब नहीं भरा तो क्या हमारे डालने से ही भरेगा।
टूर ऑपरेटर-यही सोच कर तो सब डाले जा रहे हैं झील में मलवा, कोई मानने वाला नहीं है सर। चलिए बहुत हुआ, चलिए कुछ चाय-वाय ही पी लें।
-चलो।
(चाय वाले से) भैया दो चाय बनाना।
-अभी लीजिए सर।
-ओफ्फोह, कितनी गंदगी है, (चाय वाले से, चाय लेकर पीते हुए) चाय तो अच्छी बनी है, पर भैया, ये तुम्हारी गंदगी तो सीधे झील में जा रही है, तुम खयाल नहीं रखते ?
चाय वाला- खयाल रखते हैं साहब (धीरे से) इसी गंदगी के कारण तो चाय टेस्टी बनती है….
-क्या कहा ?
-(अचकचाकर) कुछ नहीं साहब। मैंने कहा, चाय बनाएं, या गंदगी साफ करें।
-लेकिन इसी झील से तो तुम्हारी जीवन नैया चलती होगी।
चाय वाला- हमारी तो जीवन नैया चलती है, (झील में चलती नौकाओं की ओर इशारा कर) उनकी तो नैया ही चलती है, वह करें ना झील की फिक्र।
-(नाव वालों के पास जाकर, वह नावों की मरम्मत कर रहे हैं) अरे भाई यह क्या कर रहे हो ?
नाव वाला- देखते नहीं, नावों की मरम्मत चल रही है।
-वह तो मैं भी देख रहा हूं। पर यह क्या, यह नावों की सतह को घिस-घिस कर उनका रेजिन, गंदगी झील में ही डाल रहे हो। तुम्हें तो झील के पास की गंदगी भी साफ करनी चाहिए।
नाव वाला-आप भी हमें ही टोकिए। यही चलन है। समरथ को नहीं दोष गुसांई। हम तो नावों में भी कूड़ेदान रखते हैं। वहां देखिए, उन में से कई होटलों का सीवर सीधे झील में आता है, कहो तो उसे भी हम ही साफ करें। ये नगर पालिका, पीडब्लूडी वाले हैं, इन्हें तो तनख्वाह मिलती है सफाई करने के लिए, फिर भी नहीं करते हैं। लोग बड़े-बड़े घर बनाते हैं, और मलवा झील में डालते हैं। मकान बनाने के लिए जंगल काट डाले हैं, और कंक्रीट का जंगल बना डाला है।
दूसरा नाव वाला-वहां सूखाताल झील को तो सुखा ही चुके हैं ये लोग शहर भर की गंदगी और मलवा डालकर, अब नैनी झील को सुखाने की कोशिश में लगे हैं। सुना है वहां तो एक विभाग ने सूखाताल में मलवा डालने का बकायदा टेंडर भी करवाया था।
-वाह भाई, तुम लोग तो बड़े जागरूक लगते हो शहर के बारे में।
भीड़ में से एक व्यक्ति-यह शहर ही जागरूक लोगों का है सर। यहां हर कोई बड़ी जागरूकता की बातें करता है। आप जिससे बात करेंगे वहीं बड़ी जागरूकता की बातें करेगा, लेकिन सिर्फ बातें ही करेगा। लेकिन जब कुछ करने की बात कहोगे, कहेगा दूसरे शुरू करेंगे-तब करेगा।
-तो क्या होना चाहिए, कुछ सुझाव तो दीजिए।
भीड़ में से दूसरा व्यक्ति-यह अच्छी कही सर आपने, जितने चाहिए, उतने लीजिए सुझाव। सब से बढ़िया तो इस शहर को खाली कराकर वापस उन अंग्रेजों को सोंप दीजिए, जिन्होंने इसे बसाया, सजाया और संवारा था। और अपना शहर कहीं बाहर खुर्पाताल, गेठिया, मेहरागांव या भवाली में बसा लीजिए।
तीसरा व्यक्ति-शहर में एक सिरे से शुरू कर दूसरे सिरे तक एक-एक घर को जांचिए, और जो भी नियम विरुद्ध बना है, उसे ढहा दीजिए।
चौथा-पुराने निर्माण ढहाने से तो मुसीबत हो जाएगी, जितने बने हैं, उन्हें छोड़ दीजिए, और आज से एक भी ना बनने दीजिए।
पांचवां-मैं तो कहता हूं साहब इसी तरह एक अवैध घर मुझे भी बनाने दीजिए, उसके बाद जो मर्जी चाहे कीजिए।
टूर ऑपरेटर- चलिए सर, आगे चलते हैं। आप भी क्या सुझाव लेने लगे। मैं बताता हूं। ये जो दूसरे शख्श थे, बाहर शहर बसाओ कहने वाले, सुना है ये बिल्डर हैं, और इनकी बाहरी क्षेत्रों में काफी जमीनें हैं। और वो तीसरा व्यक्ति, सारे अवैध घरों को ढहाने का सुझाव देने वाला, ऊंची पहुंच वाला है। उसका खुद का घर भी अवैध तरीके से बना है, लेकिन उसे पता है, कुछ नहीं होने वाला है। वह चौथा व्यक्ति, उसकी पहुंच ऊंची नहीं है, उसे डर है उसका अवैध निर्माण गिरा दिया जाएगा, इसलिए अब तक के निर्माणों को बख्श दिए जाने की सलाह दे रहा है, और उस पांचवे व्यक्ति ने तो अपनी मंशा खुद ही साफ कर दी है।
यार, हमें कुछ करना चाहिए। इस तरह तो यह शहर बर्बाद हो जाएगा, हमें इसे बचाने के लिए कुछ करना चाहिए, लोगों को जागरूक करना चाहिए।
टूर ऑपरेटर-छोड़िए सर, आप यहां आनंद लेने आए हैं, जितना हो सकता है, मजे लीजिए, क्यों खुद के लिए मुसीबत मोल लेते हैं ?
नहीं यार, हमें कुछ करना चाहिए (जनता के बीच जाकर) भाइयो, और बहनो……
टूर ऑपरेटर-भाई साहब, मैं फिर कहता हूं, दूसरों की फटी में टांग ना अड़ाइए….
लोग-(भाषण पर तालियां बजा रहे हैं….)
एक-बहुत खूब कहा सर, हम आज से ही स्कूल-स्कूल जाकर आपकी बातों को बच्चों के बीच ले जाएंगे, क्योंकि वही तो हमारा भविष्य हैं, एक बच्चा भी जाग गया तो समझो पूरी एक पीढ़ी जाग गई….
दूसरा-हम आज ही मीडिया को खबर कर देते हैं, और कल से ही शहर में अवैध निर्माणों, कूड़े, पॉलीथीन, झील की सफाई आदि के बारे में अभियान चलाते हैं। सुनिश्चित करते हैं कि इस अभियान की मीडिया में अच्छी कवरेज आए…. (दबी जुबान में) जो काम कभी पूरा न करना हो, उसके लिए अभियान ही चलाए जाते हैं जनाब…चलिए इस बहाने कुछ दिन अपनी फोटो तो अखबारों में देखने को मिलेगी…बहुत खर्चा होता है रोज-रोज की अखबारी तलब में, कुछ तो खर्चा वसूलेगा।
टूर ऑपरेटर-सर, मैं फिर कहता हूं, इस शहर के लोग सिर्फ बातें करते हैं, और अच्छे कार्यों के लिए वह खुद की भी नहीं सुनते। हां, बाहर वालों ने बसाया है ना ये सफर, इसलिए कभी सुनते हैं तो सिर्फ बाहर वालों की, इसलिए शायद आपकी भी सुन रहे हैं। पर याद रखिए, ठंडी आबो-हवा वाला है यह शहर, शायद इसीलिए इस शहर के लोग बहुत देर से जागते हैं, और जल्दी सो भी जाते हैं…..
(तभी पुलिस की एक टुकड़ी वहां आती है) पुलिस का अधिकारी-क्या चल रहा है भई यहां, क्यों तमाशा मचा रखा है ? कौन है यह नया नमूना, क्या सिखा-पढ़ाकर शहर के लोगों को शासन-प्रशासन के खिलाफ भड़का रहा है।
(पकड़ लेते हैं, भीड़-तितर-बितर हो जाती है, खूब पिटाई करने लगते हैं) अरे भाई, मुझे छोड़ो, मुझे क्यों बेवजह मार रहे हो ?
पुलिस का अधिकारी-बेवजह ? ऊपर से आदेश हैं, सीधे जंगल में ले जाकर इनकाउंटर करने के। बताया गया है कोई आतंकवादी हो। मैंने भी देखा है शहर वालों को भड़काकर आतंक ही फैला रहे हो….(खींच कर ले जाते हैं)
टूर ऑपरेटर-साहब मैंने पहले ही कहा था, दूसरों की फटी में…..
बचाओ-बचाओ, अरे कोई तो बचाओ……ये लोग तो मुझे मार ही डालेंगे…..
(बिस्तर पर सोया हुआ है, अचकचाकर उठते हुए….) बचाओ-बचाओ, अरे कोई तो बचाओ……ये लोग तो मुझे मार ही डालेंगे…..
हुं… मैं कहां हूं, (बाहर देखता है, सामने नैनी झील है, कलेंडर देखता है 2014 का कलेंडर लटका है, माथा पीटता है )
                                                                                       :नवीन जोशी, नैनीताल
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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है।

यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….।

मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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