News

पिया मिलन में कोरोना की बाधा, नई नवेली दुल्हन को होम क्वारन्टाइन में भेजा, पति सहित परिजनों को भी ऐहतियात के निर्देश

यहाँ से दोस्तों को भी शेयर करके पढ़ाइये
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

नवीन समाचार, रुड़की, 16 मई 2020। कोरोना नई-नई परेशानियां खड़ा कर रहा है। इसकी वजह शादी के तत्काल बाद अपनी ससुराल आई नई नवेली दुल्हन को होम क्वारंटाइन होना पड़ा है। जिस कारण विवाह के बाद मिलन की आस लगाये नवदंपत्ति को एक घर में होते हुए भी अलग रहना पड़ रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार निकटवर्ती ग्राम जलालपुर में यूपी के मुजफ्फरनगर से ब्याहकर लाई गई नई नवेली दुल्हन की तबीयत खराब होने पर परिजन उसको सिविल अस्पताल लाये, जहां चिकित्सकों ने उसे स्वास्थ्य परीक्षण कर घर में क्वारंटाइन होने के निर्देश दिए हैं। चिकित्सकों नई दुल्हन के साथ ही उसके पति व परिजनों से भी होम क्वारंटाइन के नियमों का पूरी तरह से अनुपालन करने के लिए भी कहा है।

यह भी पढ़ें : जर्मन दूल्हा-कुमाउनी मेम, पारंपरिक कुमाउनी तरीके से हुई पैट्रिक और शिवानी की शादी

नवीन समाचार, हल्द्वानी, 12 मार्च 2020। दुनिया में जब कोरोना वायरस के महामारी बने संक्रमण के बीच लोग एक-दूसरे से हाथ मिलाने से भी डर रहे हैं वहीं ऐसे में उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल की संस्कृति व खासकर परंपरागत शादी का जलवा देखने को मिला है। यहां हल्द्वानी की एक युवती व जर्मनी के युवक के बीच न केवल दिल मिले, वरन दोनों ने वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच कुमाउनी रीति-रिवाज से सात जन्म तक एक-दूसरे का होने के लिए पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर एक साथ सात फेरे लिए हैं। इस मौके पर बाकायदा भगवान गणेश के चित्र युक्त मुकुट पहले जर्मन दूल्हे और कुमाउनी रंग्वाली पिछौड़े में सजी दुल्हन को देखकर हर कुमाउनी ने अपना सीना गर्व से ऊंचा महसूस किया।
इस कहानी की शुरुआत वास्तव में करीब पांच वर्ष पहले हवा में हुई, जब कतर एयरवेज के एक जहाज में पायलट पैट्रिक और एयर हॉस्टेस शिवानी आर्या के बीच साथ काम करते हुए दोस्ती प्यार में बदल गई। पैट्रिक जर्मनी के और शिवानी हल्द्वानी के निकट चौहानपाटा रानीबाग की निवासी है। दोनों ने आपस में शादी करने का निर्णय भी ले लिया। बात शादी की आई तो शिवानी ने डसल को धूलिअर्घ्य, दुल्हन के पिता द्वारा दूल्हे के पैर धोने, कन्यादान, शैया दान व ध्रुव तारे के दर्शन आदि विधि-विधानों युक्त परंपरागत कुमाउनी शादी के बारे में बताया। डसल शादी के इस परंपरागत रीति-निवाज से ऐसे प्रभावित हुए कि उन्होंने शिवानी से कुमाउनी तरीके से ही शादी करने की इच्छा व्यक्त की। इस पर पैट्रिक अपने पूरे परिवार के साथ हल्द्वानी आ गए और उन्होंने पूरे कुमाउनी विधि विधान से शिवानी से शादी कर ली है।

यह भी पढ़ें : छोटी बिलायत में दुहराया गया इतिहास ! एक-दूजे के हुए ‘इंग्लिश बाबू-देशी मेम’

-सात समुंदर पार से आई हल्द्वानी की सिम्पी की बारात

विश्व गुरु बनने को उद्यत भारतीय संस्कृति वैश्विक विमर्श के साथ ही आकर्षण का केंद्र भी बनी
नवीन जोशी, नैनीताल, 13 मार्च 2018 । अंग्रेजी दौर की ‘छोटी बिलायत’ में जो न जाने कितनी बार हुआ हो, वही इतिहास एक नए रूप में मंगलवार को यहाँ फिर लिखा गया। बताया जाता है कि कुमाऊँ के दूसरे कमिश्नर जीडब्लू ट्रेल ने भी यहीं, रानीखेत की युवती से विवाह किया था। कुछ इसी तर्ज पर मंगलवार को यहां एक ‘इंग्लिश बाबू’ न्यू यॉर्क निवासी जे माइकल स्टेहेन पुत्र चार्ल्स स्टेहेनऔर ‘देशी मेम’ हल्द्वानी निवासी सिम्पी वर्मा पुत्री सेंचुरी पेपर मिल लालकुआ के सेवानिवृत्त कर्मी एसके वर्मा भारतीय विवाह पद्धति के जरिये एक-दूसरे के साथ ‘सात फेरे’ लेकर एक-दूजे के हो गये। यहां देशी मेम यानी सिम्पी की मेंहदी की रस्म हुई और वह बेहद सुरुचिपूर्ण तरीके से सजे मंडप में घाघरा-चोली में शरमाती-शकुचाती अपने दूल्हे का इंतजार करती रही। उधर इंग्लिश बाबू माइकल बाकायदा घोड़ी पर चढ़े। उनके करीब तीन दर्जन परिजनों-दोस्तों ने पगड़ियां पहनकर भारतीय नृत्य किये। दोनों का ‘जयमाल’ हुआ, जिसमें दोनों ने एक-दूसरे का फूल माला पहनकर वरण किया और हिंदू रीति रिवाज के तहत पूरे विधि-विधान के साथ यह विवाह संपन्न हुआ।

यह भी पढ़ें : 

मौका था सोमवार को नगर के मनु महारानी होटल में हुए विवाह समारोह का। इस विवाह के लिए अमेरिका से दूल्हे माइकल के परिजनों सहित करीब तीन-दर्जन विदेशी मेहमान यहां दो दिन पहले ही पहुंच गये थे। रविवार को दोनों की मेंहदी की रस्म हुई, जबकि सोमवार को दोनों परिणय सूत्र में बंध गये। यूं यह भी था कि माइकल भारत से अमेरिका जाकर वहीं प्रसिद्ध वार्नर ब्रदर्स फिल्म कम्पनी में कार्य करने वाली सिम्पी से पहले ही पिछले फरवरी माह में न्यूयॉर्क में कोर्ट मैरिज कर चुके थे। लेकिन जब उन्हें सिम्पी से भारतीय समृद्ध संस्कृति और परंपराओं व खासकर विवाह पद्धति के बारे में पता चला तो उन्होंने एक बार फिर भारत आकर भारतीय विवाह पद्धति से विवाह करने का निर्णय लिया। विवाह के बाद सभी बाराती नैनीताल के पर्यटन स्थलों का भी भ्रमण कर रहे हैं। आगे उनका मंगलवार को जिम कार्बेट पार्क रामनगर की सैर करने और बुधवार को वहां से वापस लौटने का कार्यक्रम है। मनुमहारानी होटल के उप महाप्रबंधक प्रमोद बिष्ट ने कहा कि इस तरह भारतीय संस्कृति का प्रसार तो हो ही रहा है, नैनीताल जैसे छोटे भारतीय शहर भी विदेशी दूल्हों के लिए शादी करने के पसंदीदा स्थल यानी ‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ के रूप में खासे पसंद किये जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि कि उत्तराखंड के हरिद्वार में इस तरह के कई विवाह अक्सर होते रहते हैं, जबकि नैनीताल में यह अपनी तरह का पहला आयोजन है।

यह भी पढ़ें : इमरान के निकाह में ‘रिद्धि सिद्धि संग निमंत्रित हैं गौरी पुत्र गणेश और ब्रह्मा, विष्णु, महेश’, आप भी आकर दीजिएगा ‘आशीष’

इमरान (मध्य में) अपनी शादी का कार्ड दिखाते हुए।
इमरान (मध्य में) अपनी शादी का कार्ड दिखाते हुए।

नवीन समाचार, किच्छा (ऊधमसिंह नगर), 4 मार्च 2020। दिल्ली में दो धर्मों के लोगों को दंगों की आग में जलाने की कोशिश के बीच किच्छा दोनों धर्मों के दिलों को जोड़ने और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को मजबूत करने वाला समाचार है। यहां हिंदुओं के घरों में निकटवर्ती ग्राम सैजना निवासी इमरान हुसैन सुपुत्र फरियाद हुसैन के इमराना बी सुपुत्री जान मोहम्मद निवासी गुलहिया मो. हुसैन तहसील बहेड़ी जिला बरेली यूपी परिणय बंधन का निमंत्रण देता कार्ड आया है। कार्ड की शुरुआत में लिखा गया है-रिद्धि सिद्धि सहित पधारो, गौरी पुत्र गणेश। कुटुंब सहित सब देव पधारो ब्रह्मा, विष्णु, महेश।। विघ्न हरण मंगल करण श्री गणपति महाराज, प्रथम निमंत्रण आपको, पूरण कीजै काज।।’ बीच में बाकायदा गणेश जी की फोटो भी बनी है। आगे नवयुगल को सस्नेह आशीष प्रदान करने हेतु आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय भी बताई गई है। वहीं बारात के कार्यक्रम के अनुसार पांच मार्च को सुबह 9 बजे सेहराबंदी, 11 बजे बारात प्रस्थान, शाम चार बजे शुभ विवाह एवं शाम पांच बजे बारात वापसी है। ऐसे निमंत्रण के बाद ऐसी खास शादी में जाना तो बनता है।
बताया गया है कि दूल्हे इमरान के पिता कम पढ़े-लिखे हैं, परंतु इस कार्ड के जरिये उन्होंने देश के कथित धर्म निरपेक्ष कहलाकर दोनों धर्मों को लड़ाकर सियासत की रोटी सेंकने वाले सियासतदानों को बड़ा पाठ पढ़ाया है। उनका कहना है उनके चार बेटों-इमरान, उस्मान, जीशान व फैजान में इमरान सबसे बड़ा है। उन्होने इमरान के निकाह के लिए अपने हिंदू मित्रों के लिए यह खास कार्ड छपवाया है। उनका कहना है, हिंदू-मुसलमान आपस में भाई हैं। उनकी इस पहल से यह रिश्ता दोनों कौमों के लिए और मजबूत है, इसी सोच से यह कार्ड छपवाए गए हैं।

यह भी पढ़ें : वट-पीपल बंधे विवाह बंधन में, गांव वाले बने बाराती

  • धूमधाम से हुआ बरगद व पीपल के पेड़ों का विवाह
  • हल्द्वानी रोड चील चक्कर के पास स्थित शिवालय में हुआ आयोजन
  • पुरानी चुंगी से बैंड बाजे के साथ निकली बारात, कुमाउनी परिधानों में ताकुला व रूसी की महिलाओं ने निकाली कलशयात्रा
  • मानव स्वरूप में किये गये विवाह संस्कार के साथ इन्हें कभी न काटे जाने का के संकल्प के साथ यह विवाह पेड़-पौधों के संरक्षण की अनूठी पहल भी है
बरगद एवं पीपल के विवाह समारोह में शगुन आखर, मंगलगान गाती महिलाएं।

नैनीताल। जी हां, धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध देवभूमि उत्तराखंड में युवा वट यानी बरगद और पीपल के वृक्षों ने आपस में ब्याह रचा लिया है। नगर के समीपवर्ती हल्द्वानी रोड चील चक्कर के पास स्थित शिवालय में लोग एक अनोखे विवाह समारोह के साक्षी बने। यह विवाह था मंदिर में लगे करीब 6 वर्ष की उम्र के वर के रूप में पीपल एवं करीब 4 वर्ष के कन्या के रूप में बट यानी बरगद के वृक्षों के बीच। 11 फ़रवरी को आयोजित हुए इस अनोखे विवाह में बाराती बने ताकुला और रूसी गांव के लोग, जिन्होंने न केवल बैंड बाजे पर युवक-युवतियों, बच्चों ने कुमाउनी नृत्य के साथ पुरानी चुंगी से मंदिर तक बारात निकाली तथा महिलाओं ने पारंपरिक कुमाउनी परिधानों में कलश यात्रा निकाली, वहीं हल्द्वानी मार्ग से गुजरते लोगों, सैलानियो जिसने भी इस अनूठे विवाह के बारे में सुना, ठिठक गया। इस प्रकार सैकड़ो लोग इस अनूठे विवाह के साक्षी बने। खास बात यह भी है कि इस धार्मिक आयोजन के बाद बरगद व पीपल के मंदिर में लगे धार्मिक आयोजनों, पूजा आदि के योग्य हो गये हैं, तथा इस प्रकार इन्हें मानव स्वरूप में किये गये विवाह संस्कार के साथ कभी न काटे जाने का संकल्प भी लिया गया है, जिसके साथ यह विवाह आयोजन पेड़-पौधों के संरक्षण का भी एक उपक्रम है।

Gamaraयह भी पढ़ें :  गौरा-महेश को बेटी-जवांई के रूप में विवाह-बंधन में बांधने का पर्व: सातूं-आठूं (गंवरा या गमरा) कुछ अंश : गौरा से यहां की पर्वत पुत्रियों ने बेटी का रिश्ता बना लिया हैं, तो देवों के देव जगत्पिता महादेव का उनसे विवाह कराकर वह उनसे जवांई यानी दामाद का रिश्ता बना लेती हैं। यहां बकायदा वर्षाकालीन भाद्रपद मास में अमुक्ताभरण सप्तमी को सातूं, और दूर्बाष्टमी को आठूं का लोकपर्व मना कर (गंवरा या गमरा) गौरा-पार्वती…

बरगद व पीपल के विवाह में नृत्य करती महिलाएं

बारात में बकायदा कुमाउनी विवाहों की धूलिअर्घ्य, शगुन आंखर व मंगलगान गाने, कन्या दान व फेरे सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान एवं भोज का आयोजन हुआ। वर पीपल के माता-पिता की भूमिका दीपा जोशी व पूरन जोशी ने, जबकि जबकि कन्या बरगद के माता पिता की भूमिका जानकी जोशी व सतीश जोशी ने निभा। आचार्य कैलाश चंद्र सुयाल ने मंत्रोच्चारण के साथ विवाह की सभी रस्में पूरी कराईं। आयोजन में नीरज जोशी, पान सिंह खनी, कैलाश जोशी, भगवती सुयाल, पान सिंह परिहार, अमन जोशी, गोविंद सिंह, चन्दन सिंह, हितेश, भाष्कर, चेतन, महेंद्र रावत, देवेश मेहरा, नवीन शर्मा, पान सिंह सिजवाली, महेश जोशी, विशाल व चन्दन बिष्ट सहित सैकड़ों ग्रामीणों ने भागीदारी की।

विवाह आयोजन के आचार्य पंडित कैलाश चन्द्र सुयाल ने बताया की उम्र में बड़े वृक्ष को वर एवं छोटे की कन्या के रूप में प्रतिष्ठा की जाती है। इसके बाद एक व्यक्ति वर एवं दूसरे कन्या के पिता के रूप में आयोजन को संपन्न कराते हैं, बाकायदा कन्या के पिता कन्यादान की परम्परा का निर्वाह भी करते हैं। यह पूरा आयोजन प्रकृति के अंगों को मानव स्वरुप में संरक्षित करने की भी पहल है। बरगद और पीपल के पेड़ों को काटे जाने की धार्मिक मनाही भी है।

बरगद व पीपल के विवाह में लिए गए प्रतीकात्मक फेरे.

इस आयोजन के लिए क्षेत्रवासी पखवाड़े भर पूर्व से ही पूर्ण विधि-विधान के साथ इस आयोजन की तैयारियों में उत्साहपूर्वक जुटे थे। नैनीताल के निकटवर्ती गांधी ग्राम ताकुला के युवा सामाजिक कार्यकर्ता नीरज कुमार जोशी ने बताया कि क्षेत्र में इस तरह का आयोजन पहली बार किया गया।  आयोजन की तैयारियों में आदि ग्रामीण जुटे हुए हैं।

बरगद एवं पीपल का धार्मिक महत्व
उल्लेखनीय है कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद एवं पीपल के वृक्षों का धार्मिक महत्व व पर्यावरण की दृष्टि से विशेष महत्व है। बरगद को ब्रह्मा समान माना जाता है। वट-सावित्री सहित अनेक व्रत व त्यौहारों में वटवृक्ष की पूजा की जाती है। वहीं पीपल के वृक्ष में देवताओं का वास बताया जाता है। गीता में भगवान कृष्ण ने पीपल को स्वयं अपना स्वरूप बताया है। जबकि स्कंदपुराण में पीपल की विशेषता और उसके धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए इसके मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में हरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत देवों का निवास बताया गया है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मनुश्य के अंतिम संस्कार पीपल के वृक्ष के नीचे किए जाते हैं ताकि आत्मा को मुक्ति मिले और वह बिना किसी भटकाव के अपने गंतव्य स्थान तक पहुंच जाए।

 

नवीन समाचार, हल्द्वानी, 12 मार्च 2020। दुनिया में जब कोरोना वायरस के महामारी बने संक्रमण के बीच लोग एक-दूसरे से हाथ मिलाने से भी डर रहे हैं वहीं ऐसे में उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल की संस्कृति व खासकर परंपरागत शादी का जलवा देखने को मिला है। यहां हल्द्वानी की एक युवती व जर्मनी के युवक के बीच न केवल दिल मिले, वरन दोनों ने वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच कुमाउनी रीति-रिवाज से सात जन्म तक एक-दूसरे का होने के लिए पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर एक साथ सात फेरे लिए हैं। इस मौके पर बाकायदा भगवान गणेश के चित्र युक्त मुकुट पहले जर्मन दूल्हे और कुमाउनी रंग्वाली पिछौड़े में सजी दुल्हन को देखकर हर कुमाउनी ने अपना सीना गर्व से ऊंचा महसूस किया।
इस कहानी की शुरुआत वास्तव में करीब पांच वर्ष पहले हवा में हुई, जब कतर एयरवेज के एक जहाज में पायलट पैट्रिक और एयर हॉस्टेस शिवानी आर्या के बीच साथ काम करते हुए दोस्ती प्यार में बदल गई। पैट्रिक जर्मनी के और शिवानी हल्द्वानी के निकट चौहानपाटा रानीबाग की निवासी है। दोनों ने आपस में शादी करने का निर्णय भी ले लिया। बात शादी की आई तो शिवानी ने डसल को धूलिअर्घ्य, दुल्हन के पिता द्वारा दूल्हे के पैर धोने, कन्यादान, शैया दान व ध्रुव तारे के दर्शन आदि विधि-विधानों युक्त परंपरागत कुमाउनी शादी के बारे में बताया। डसल शादी के इस परंपरागत रीति-निवाज से ऐसे प्रभावित हुए कि उन्होंने शिवानी से कुमाउनी तरीके से ही शादी करने की इच्छा व्यक्त की। इस पर पैट्रिक अपने पूरे परिवार के साथ हल्द्वानी आ गए और उन्होंने पूरे कुमाउनी विधि विधान से शिवानी से शादी कर ली है।

यह भी पढ़ें : छोटी बिलायत में दुहराया गया इतिहास ! एक-दूजे के हुए ‘इंग्लिश बाबू-देशी मेम’

-सात समुंदर पार से आई हल्द्वानी की सिम्पी की बारात

विश्व गुरु बनने को उद्यत भारतीय संस्कृति वैश्विक विमर्श के साथ ही आकर्षण का केंद्र भी बनी
नवीन जोशी, नैनीताल, 13 मार्च 2018 । अंग्रेजी दौर की ‘छोटी बिलायत’ में जो न जाने कितनी बार हुआ हो, वही इतिहास एक नए रूप में मंगलवार को यहाँ फिर लिखा गया। बताया जाता है कि कुमाऊँ के दूसरे कमिश्नर जीडब्लू ट्रेल ने भी यहीं, रानीखेत की युवती से विवाह किया था। कुछ इसी तर्ज पर मंगलवार को यहां एक ‘इंग्लिश बाबू’ न्यू यॉर्क निवासी जे माइकल स्टेहेन पुत्र चार्ल्स स्टेहेनऔर ‘देशी मेम’ हल्द्वानी निवासी सिम्पी वर्मा पुत्री सेंचुरी पेपर मिल लालकुआ के सेवानिवृत्त कर्मी एसके वर्मा भारतीय विवाह पद्धति के जरिये एक-दूसरे के साथ ‘सात फेरे’ लेकर एक-दूजे के हो गये। यहां देशी मेम यानी सिम्पी की मेंहदी की रस्म हुई और वह बेहद सुरुचिपूर्ण तरीके से सजे मंडप में घाघरा-चोली में शरमाती-शकुचाती अपने दूल्हे का इंतजार करती रही। उधर इंग्लिश बाबू माइकल बाकायदा घोड़ी पर चढ़े। उनके करीब तीन दर्जन परिजनों-दोस्तों ने पगड़ियां पहनकर भारतीय नृत्य किये। दोनों का ‘जयमाल’ हुआ, जिसमें दोनों ने एक-दूसरे का फूल माला पहनकर वरण किया और हिंदू रीति रिवाज के तहत पूरे विधि-विधान के साथ यह विवाह संपन्न हुआ।

यह भी पढ़ें : 

मौका था सोमवार को नगर के मनु महारानी होटल में हुए विवाह समारोह का। इस विवाह के लिए अमेरिका से दूल्हे माइकल के परिजनों सहित करीब तीन-दर्जन विदेशी मेहमान यहां दो दिन पहले ही पहुंच गये थे। रविवार को दोनों की मेंहदी की रस्म हुई, जबकि सोमवार को दोनों परिणय सूत्र में बंध गये। यूं यह भी था कि माइकल भारत से अमेरिका जाकर वहीं प्रसिद्ध वार्नर ब्रदर्स फिल्म कम्पनी में कार्य करने वाली सिम्पी से पहले ही पिछले फरवरी माह में न्यूयॉर्क में कोर्ट मैरिज कर चुके थे। लेकिन जब उन्हें सिम्पी से भारतीय समृद्ध संस्कृति और परंपराओं व खासकर विवाह पद्धति के बारे में पता चला तो उन्होंने एक बार फिर भारत आकर भारतीय विवाह पद्धति से विवाह करने का निर्णय लिया। विवाह के बाद सभी बाराती नैनीताल के पर्यटन स्थलों का भी भ्रमण कर रहे हैं। आगे उनका मंगलवार को जिम कार्बेट पार्क रामनगर की सैर करने और बुधवार को वहां से वापस लौटने का कार्यक्रम है। मनुमहारानी होटल के उप महाप्रबंधक प्रमोद बिष्ट ने कहा कि इस तरह भारतीय संस्कृति का प्रसार तो हो ही रहा है, नैनीताल जैसे छोटे भारतीय शहर भी विदेशी दूल्हों के लिए शादी करने के पसंदीदा स्थल यानी ‘वेडिंग डेस्टिनेशन’ के रूप में खासे पसंद किये जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि कि उत्तराखंड के हरिद्वार में इस तरह के कई विवाह अक्सर होते रहते हैं, जबकि नैनीताल में यह अपनी तरह का पहला आयोजन है।

यह भी पढ़ें : इमरान के निकाह में ‘रिद्धि सिद्धि संग निमंत्रित हैं गौरी पुत्र गणेश और ब्रह्मा, विष्णु, महेश’, आप भी आकर दीजिएगा ‘आशीष’

इमरान (मध्य में) अपनी शादी का कार्ड दिखाते हुए।
इमरान (मध्य में) अपनी शादी का कार्ड दिखाते हुए।

नवीन समाचार, किच्छा (ऊधमसिंह नगर), 4 मार्च 2020। दिल्ली में दो धर्मों के लोगों को दंगों की आग में जलाने की कोशिश के बीच किच्छा दोनों धर्मों के दिलों को जोड़ने और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को मजबूत करने वाला समाचार है। यहां हिंदुओं के घरों में निकटवर्ती ग्राम सैजना निवासी इमरान हुसैन सुपुत्र फरियाद हुसैन के इमराना बी सुपुत्री जान मोहम्मद निवासी गुलहिया मो. हुसैन तहसील बहेड़ी जिला बरेली यूपी परिणय बंधन का निमंत्रण देता कार्ड आया है। कार्ड की शुरुआत में लिखा गया है-रिद्धि सिद्धि सहित पधारो, गौरी पुत्र गणेश। कुटुंब सहित सब देव पधारो ब्रह्मा, विष्णु, महेश।। विघ्न हरण मंगल करण श्री गणपति महाराज, प्रथम निमंत्रण आपको, पूरण कीजै काज।।’ बीच में बाकायदा गणेश जी की फोटो भी बनी है। आगे नवयुगल को सस्नेह आशीष प्रदान करने हेतु आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय भी बताई गई है। वहीं बारात के कार्यक्रम के अनुसार पांच मार्च को सुबह 9 बजे सेहराबंदी, 11 बजे बारात प्रस्थान, शाम चार बजे शुभ विवाह एवं शाम पांच बजे बारात वापसी है। ऐसे निमंत्रण के बाद ऐसी खास शादी में जाना तो बनता है।
बताया गया है कि दूल्हे इमरान के पिता कम पढ़े-लिखे हैं, परंतु इस कार्ड के जरिये उन्होंने देश के कथित धर्म निरपेक्ष कहलाकर दोनों धर्मों को लड़ाकर सियासत की रोटी सेंकने वाले सियासतदानों को बड़ा पाठ पढ़ाया है। उनका कहना है उनके चार बेटों-इमरान, उस्मान, जीशान व फैजान में इमरान सबसे बड़ा है। उन्होने इमरान के निकाह के लिए अपने हिंदू मित्रों के लिए यह खास कार्ड छपवाया है। उनका कहना है, हिंदू-मुसलमान आपस में भाई हैं। उनकी इस पहल से यह रिश्ता दोनों कौमों के लिए और मजबूत है, इसी सोच से यह कार्ड छपवाए गए हैं।

यह भी पढ़ें : वट-पीपल बंधे विवाह बंधन में, गांव वाले बने बाराती

  • धूमधाम से हुआ बरगद व पीपल के पेड़ों का विवाह
  • हल्द्वानी रोड चील चक्कर के पास स्थित शिवालय में हुआ आयोजन
  • पुरानी चुंगी से बैंड बाजे के साथ निकली बारात, कुमाउनी परिधानों में ताकुला व रूसी की महिलाओं ने निकाली कलशयात्रा
  • मानव स्वरूप में किये गये विवाह संस्कार के साथ इन्हें कभी न काटे जाने का के संकल्प के साथ यह विवाह पेड़-पौधों के संरक्षण की अनूठी पहल भी है
बरगद एवं पीपल के विवाह समारोह में शगुन आखर, मंगलगान गाती महिलाएं।

नैनीताल। जी हां, धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध देवभूमि उत्तराखंड में युवा वट यानी बरगद और पीपल के वृक्षों ने आपस में ब्याह रचा लिया है। नगर के समीपवर्ती हल्द्वानी रोड चील चक्कर के पास स्थित शिवालय में लोग एक अनोखे विवाह समारोह के साक्षी बने। यह विवाह था मंदिर में लगे करीब 6 वर्ष की उम्र के वर के रूप में पीपल एवं करीब 4 वर्ष के कन्या के रूप में बट यानी बरगद के वृक्षों के बीच। 11 फ़रवरी को आयोजित हुए इस अनोखे विवाह में बाराती बने ताकुला और रूसी गांव के लोग, जिन्होंने न केवल बैंड बाजे पर युवक-युवतियों, बच्चों ने कुमाउनी नृत्य के साथ पुरानी चुंगी से मंदिर तक बारात निकाली तथा महिलाओं ने पारंपरिक कुमाउनी परिधानों में कलश यात्रा निकाली, वहीं हल्द्वानी मार्ग से गुजरते लोगों, सैलानियो जिसने भी इस अनूठे विवाह के बारे में सुना, ठिठक गया। इस प्रकार सैकड़ो लोग इस अनूठे विवाह के साक्षी बने। खास बात यह भी है कि इस धार्मिक आयोजन के बाद बरगद व पीपल के मंदिर में लगे धार्मिक आयोजनों, पूजा आदि के योग्य हो गये हैं, तथा इस प्रकार इन्हें मानव स्वरूप में किये गये विवाह संस्कार के साथ कभी न काटे जाने का संकल्प भी लिया गया है, जिसके साथ यह विवाह आयोजन पेड़-पौधों के संरक्षण का भी एक उपक्रम है।

Gamaraयह भी पढ़ें :  गौरा-महेश को बेटी-जवांई के रूप में विवाह-बंधन में बांधने का पर्व: सातूं-आठूं (गंवरा या गमरा) कुछ अंश : गौरा से यहां की पर्वत पुत्रियों ने बेटी का रिश्ता बना लिया हैं, तो देवों के देव जगत्पिता महादेव का उनसे विवाह कराकर वह उनसे जवांई यानी दामाद का रिश्ता बना लेती हैं। यहां बकायदा वर्षाकालीन भाद्रपद मास में अमुक्ताभरण सप्तमी को सातूं, और दूर्बाष्टमी को आठूं का लोकपर्व मना कर (गंवरा या गमरा) गौरा-पार्वती…

बरगद व पीपल के विवाह में नृत्य करती महिलाएं

बारात में बकायदा कुमाउनी विवाहों की धूलिअर्घ्य, शगुन आंखर व मंगलगान गाने, कन्या दान व फेरे सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान एवं भोज का आयोजन हुआ। वर पीपल के माता-पिता की भूमिका दीपा जोशी व पूरन जोशी ने, जबकि जबकि कन्या बरगद के माता पिता की भूमिका जानकी जोशी व सतीश जोशी ने निभा। आचार्य कैलाश चंद्र सुयाल ने मंत्रोच्चारण के साथ विवाह की सभी रस्में पूरी कराईं। आयोजन में नीरज जोशी, पान सिंह खनी, कैलाश जोशी, भगवती सुयाल, पान सिंह परिहार, अमन जोशी, गोविंद सिंह, चन्दन सिंह, हितेश, भाष्कर, चेतन, महेंद्र रावत, देवेश मेहरा, नवीन शर्मा, पान सिंह सिजवाली, महेश जोशी, विशाल व चन्दन बिष्ट सहित सैकड़ों ग्रामीणों ने भागीदारी की।

विवाह आयोजन के आचार्य पंडित कैलाश चन्द्र सुयाल ने बताया की उम्र में बड़े वृक्ष को वर एवं छोटे की कन्या के रूप में प्रतिष्ठा की जाती है। इसके बाद एक व्यक्ति वर एवं दूसरे कन्या के पिता के रूप में आयोजन को संपन्न कराते हैं, बाकायदा कन्या के पिता कन्यादान की परम्परा का निर्वाह भी करते हैं। यह पूरा आयोजन प्रकृति के अंगों को मानव स्वरुप में संरक्षित करने की भी पहल है। बरगद और पीपल के पेड़ों को काटे जाने की धार्मिक मनाही भी है।

बरगद व पीपल के विवाह में लिए गए प्रतीकात्मक फेरे.

इस आयोजन के लिए क्षेत्रवासी पखवाड़े भर पूर्व से ही पूर्ण विधि-विधान के साथ इस आयोजन की तैयारियों में उत्साहपूर्वक जुटे थे। नैनीताल के निकटवर्ती गांधी ग्राम ताकुला के युवा सामाजिक कार्यकर्ता नीरज कुमार जोशी ने बताया कि क्षेत्र में इस तरह का आयोजन पहली बार किया गया।  आयोजन की तैयारियों में आदि ग्रामीण जुटे हुए हैं।

बरगद एवं पीपल का धार्मिक महत्व
उल्लेखनीय है कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद एवं पीपल के वृक्षों का धार्मिक महत्व व पर्यावरण की दृष्टि से विशेष महत्व है। बरगद को ब्रह्मा समान माना जाता है। वट-सावित्री सहित अनेक व्रत व त्यौहारों में वटवृक्ष की पूजा की जाती है। वहीं पीपल के वृक्ष में देवताओं का वास बताया जाता है। गीता में भगवान कृष्ण ने पीपल को स्वयं अपना स्वरूप बताया है। जबकि स्कंदपुराण में पीपल की विशेषता और उसके धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए इसके मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में हरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत देवों का निवास बताया गया है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मनुश्य के अंतिम संस्कार पीपल के वृक्ष के नीचे किए जाते हैं ताकि आत्मा को मुक्ति मिले और वह बिना किसी भटकाव के अपने गंतव्य स्थान तक पहुंच जाए।

नवीन समाचार
मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड
https://navinsamachar.com

Leave a Reply

loading...