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महत्वपूर्ण: हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से की अब तक की सबसे बड़ी मांग, उप राष्ट्रपति एवं अटॉर्नी जनरल के वक्तव्यों को बनाया आधार..

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-देहरादून में सर्वाेच्च न्यायालय की उत्तर भारतीय राज्यों की बेंच का दावा
-गत दिवस उप राष्ट्रपति वेंकया नायडू एवं अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल के देश में चार अपीलीय बेंच स्थापित करने के वक्तव्यों के बाद उठाई उत्तरी भारत के लिए बेंच की मांग
नवीन समाचार, नैनीताल, 28 अगस्त 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के हाईकोर्ट बार एसोसिएशन व बार काउंसिल से जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने देहरादून में उत्तरी भारत के राज्यों की सर्वोच्च न्यायालय की अपीली कोर्ट-बेंच (कोर्ट ऑफ अपील) स्थापित करने की मांग की है। उनका यह दावा गत दिवस उप राष्ट्रपति वेंकया नायडू एवं अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल के देश में चार अपीलीय बेंच स्थापित करने के वक्तव्यों के आलोक में आया है। इस संबंध में उच्च न्यायालय की बार एसोसिएशन राज्य एवं केंद्र सरकार तथा उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय को प्रेषित कर सकते हैं।

देहरादून में सुप्रीम कोर्ट की बेंच स्थापित किये जाने की मांग करते उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ता।

बुधवार को हाईकोर्ट बार एसोसिएशन सभागार में आयोजित पत्रकार वार्ता में उत्तराखंड बार काउंसिल व हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं बार काउंसिल के वर्तमान सदस्य व पूर्व सांसद डा. महेंद्र पाल की अगुवाई में बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एमसी पंत व सैयद नदीम मून आदि ने यह मांग उठाई। उन्होंने बताया कि गत 11 अगस्त को देश के उप राष्ट्रपति वेंकया नायडू ने अपनी पुस्तक ‘लिसनिंग, लर्निंग एवं रीडिंग’ के विमोचन कार्यक्रम में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ को नई दिल्ली में यथावत रखते हुए देश के चार बड़े शहरों में चार अपीलीय बंेच (कोर्ट ऑफ अपील) स्थापित करने की बात कही थी। इसके चार दिन बाद देश के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में उप राष्ट्रपति वेंकया नायडू की बात का समर्थन किया। बताया कि पूर्व में ‘लॉ कमीशन’ भी ‘नेशनल कोर्ट ऑफ अपील’ की संस्तुति कर चुका है। राज्य के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा कि चार में से तीन अपीलीय बेंच देश के तीन ‘चार्टर्ड हाइकोर्ट’ कहे जाने वाले मुंबई, कोलकाता व चेन्नई में स्थापित हो सकते हैं, जबकि चौथे के लिए कहा गया है कि यह सर्वोच्च न्यायालय के पास कहीं स्थापित किया जा सकता है। उन्होंने इस चौथे अपीलीय कोर्ट पर उत्तराखंड का दावा करते हुए कहा कि देहरादून दिल्ली से करीब भी है, और सभी उत्तर भारतीय राज्यों से सुगम दूरी पर है। यहां उत्तर भारतीय राज्यों एवं पर्वतीय राज्यों की अपीलीय कोर्ट स्थापित किया जाना सभी के हित में होगा। इस मौके पर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्रुति जोशी तिवारी, भुवनेश जोशी, योगेश पचौलिया व कमलेश तिवारी सहित कई अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता मौजूद रहे।

यह भी पढ़ें : केवल एक अवैध कब्जेदार के लिए है सुप्रीम कोर्ट का पालिका आवास खाली करने का ताज़ा आदेश !

-कब्जेदार मसरूर को 1990 से 11 लाख रुपये किराया भरकर खाली करना होगा पालिका आवास, अन्य पर फिलहाल परेशानी नहीं 
-सर्वोच्च न्यायालय ने कब्जेदार की विशेष अपील ठुकराई, पालिका की ओर से आवंटन संबंधी कोई प्रपत्र प्रस्तुत नहीं कर पाये
नवीन समाचार, नैनीताल, 5 दिसंबर 2018। सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे व न्यायमूर्ति इंदु मलहोत्रा की पीठ ने नगर पालिका नैनीताल के वेभरली कंपाउंड-गोपाला सदन में क्वार्टर संख्या 6 में जून 1990 से काबिज मसरूर अहमद खान की याचिका को खारिज करते हुए तीन माह के भीतर आवास खाली करने के आदेश दिये हैं। साथ ही पालिका आवास का जून 1990 से आवास खाली करने तक का प्रति माह 3000 रुपये की दर से यानी करीब 11 लाख रुपये भी जमा करने को कहा है। यह आदेश खान द्वारा पालिका की ओर से आवंटन संबंधी कोई प्रपत्र न्यायालय में प्रस्तुत न करने के बाद सुनाया गया। न्यायालय ने उन्हें पूरी तरह से अवैध कब्जेदार माना।

देखें याचिका इस लिंक पर 

हालांकि याचिका में खान ने कहा था कि 1990 में नगर पालिका ने गोपाला सदन के अपने आवास संख्या 6 एवं 7 की नीलामी के लिये विज्ञापन दिया था। खान ने आवास संख्या 6 के लिए सर्वाधिक बोली लगाई और जून 1990 से इस आवास में रहने लगे। आगे 18 जुलाई 2001 को पालिका बोर्ड ने इस आवास की सेल डीड उनके पक्ष में करने की जगह इसके साथ ही अन्य आवासों के लिए भी नीलामी करने का प्रस्ताव पारित किया। इस पर खान ने अपने पक्ष में सेल डीड करने का प्रार्थना पत्र दिया। इस पर 21 जुलाई 2006 को आयुक्त नैनीताल ने पालिका को खान के पक्ष में सेल डीड करने के आदेश दिये, किंतु पालिका इसके खिलाफ उत्तराखंड उच्च न्यायालय चली गयी। इसके बाद से यह मामला उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में चल रहा था। लेकिन इधर सर्वोच्च न्यायालय में वे इस संबंध में आवंटन संबंधी कोई पत्र प्रस्तुत नहीं कर पाये, जिस पर न्यायालय ने उन्हें अवैध कब्जेदार माना और बीती तीन दिसंबर को खान की याचिका को निस्तारित करते हुए आवास खाली करने और किराया चुकाने का आदेश सुनाया।

पालिका आवासों के अन्य कब्जेदारों को है फिलहाल गैरजरूरी संशय

नैनीताल। उल्लेखनीय है कि नगर पालिका के नगर में करीब 547 आवास बताये गये हैं, इनमें से करीब आधे वर्तमान नगर पालिका कर्मी हैं, जबकि अन्य 250 से अधिक आवास सेवानिवृत्त कर्मियों तथा कई उनके द्वारा भी आगे हस्तांतरित कर दिये गये हैं। पिछले विधानसभा चुनाव से पूर्व से ही इन आवासों का मामला काफी चर्चा में रहा। पिछली सरकार इन आवासों के संबंध में शासनादेश भी लायी, जिसमें स्थानीय राजस्व दरों के हिसाब से आवासों को उनके कब्जेदारों को आवंटित करने के आदेश दिये। इस शासनादेश को कुछ पालिका कर्मियों के द्वारा उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी, तब से यह मामला उच्च न्यायालय में लंबित है। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय का आदेश फिलहाल एक ही अवैध कब्जेदार के लिए आया हुआ लगता है। वहीं पूछे जाने पर नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी रोहिताश शर्मा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशा का अध्ययन किया जा रहा है, एवं आदेश का पूर्णतया पालन सुनिश्चित कराया जाएगा।

यह भी पढ़ें : सर्वोच्च न्यायालय ने लगाई हाईकोर्ट के नजूल भूमि संबंधी आदेश पर रोक

नई दिल्ली, 10 अक्तूबर 2018। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के नजूल भूमि के संबंध में दिए गए निर्णय पर रोक लगाते हुए स्थगनादेश जारी कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता सुनीता की अपील पर यह स्थगनादेश जारी करते हुए सरकार से जवाब मांगा है।

हाईकोर्ट ने पूर्व में अपने आदेश में उत्तराखंड सरकार की 2009 की नजूल नीति के उस प्रावधान को निरस्त कर दिया था, जिसके तहत अवैध कब्जेदारों के पक्ष में नजूल भूमि को फ्री होल्ड करने की व्यवस्था थी। हाईकोर्ट ने सरकार की इस नीति को असंवैधानिक व गैर कानूनी मानते हुए सरकार पर पांच लाख का जुर्माना भी लगाया था। यह जुर्माना राष्ट्रीय विधि विवि के खाते में जमा होना था। कोर्ट ने कहा था कि नजूल भूमि सार्वजनिक संपत्ति है, इसको सरकार किसी अतिक्रमणकारी के पक्ष में फ्री होल्ड नहीं कर सकती और यह भूमि सार्वजनिक उपयोग की है। रुद्रपुर के पूर्व सभासद रामबाबू व उत्तराखंड हाईकोर्ट के अधिवक्ता रवि जोशी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर सरकार की एक मार्च 2009 की नजूल नीति के विभिन्न उपबंधों को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया था कि राज्य सरकार नजूल भूमि को अवैध रूप से कब्जा कर रहे लोगों के पक्ष में फ्री होल्ड कर रही है जो कि असंवैधानिक, नियमविरूद्घ व मनमानीपूर्ण है। हाईकोर्ट ने भी इस पर संज्ञान लेते हुए मामले को ‘इन दि मैटर ऑफ रिफ्रेंस ऑफ नजूल पॉलिसी फॉर डिस्पोजिंग एंड मैनेजमेंट नजूल लैंड के नाम से जनहित याचिका के रूप में लिया था।

यह भी पढ़ें : सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद 6 वर्ष से नियुक्ति को भटक रहे युवा

नैनीताल, 1 अक्टूबर 2018। उत्तराखंड की नौकरशाही की कार्यप्रणाली का एक अजब मामला प्रकाश में आया है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद सहायक अभियोजन अधिकारी पद पर चयनित अभ्यर्थी पिछले नौ वर्षों से नियुक्ति के लिए भटक रहे हैं। मामला शासन स्तर पर लटका हुआ है। इधर उन्होंने पुनः मुख्यमंत्री को अपनी नियुक्ति के बाबत अनुस्मारक भेजा है।
विदित हो कि उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के द्वारा 19 सितंबर 2009 को जारी विज्ञापन के जरिये सहायक अभियोजन अधिकारी के 71 पदों के लिए 31 अक्टूबर 2010 को प्रारंभिक स्क्रीनिंग परीक्षा आयोजित की गयी, और 4 व 5 जून 2011 को आयोजित साक्षात्कारों के आधार पर 18 फरवरी 2012 को 71 अभ्यर्थियों का गृह विभाग उत्तराखंड शासन के अंतर्गत श्रेष्ठता के क्रम में चयन परिणाम घोषित कर दिया गया। इस परिणाम के विरुद्ध रवि मोहन एवं अन्य अभ्यर्थियों ने उच्च न्यायालय में पूर्व में 38 पदों के लिये विज्ञप्ति जारी करने का हवाला देते हुए याचिका दायर की। इस पर उच्च न्यायालय ने 10 मई 2012 को पूर्व के 38 पदों पर ही नियुक्ति करने एवं 25 फीसद अतिरिक्त पद प्रतीक्षा सूची में रखने एवं शेष पदों के लिए अलग से चयन प्रक्रिया करने के आदेश दिये। इस पर उत्तराखंड लोक सेवा आयोग ने 28 जून 2012 को 37 पदों पर चयनित अभ्यर्थियों की पुनरीक्षित सूची जारी कर दी। इन 37 में से 6 अभ्यर्थियों ने अपना योगदान नहीं दिया, यानी यह पद रिक्त रह गये। इस बीच उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ नियुक्ति से छूट गये अन्य चयनित 34 पदों के लिये चयनित अभ्यर्थियों ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा। बावजूद शेष रिक्त पद 25 फीसद अतिरिक्त प्रतीक्षा सूची से अब तक नहीं भरे गये हैं। इस संबंध में 25 फीसद की प्रतीक्षा सूची में शामिल भानु प्रताप सिंह, ललित कुमार व तनवीर आलम तभी से अपनी नियुक्ति के लिए शासन में प्रयास जारी रखे हुए हैं, बावजूद उनकी नियुक्ति चयन के 6 वर्षों के बाद भी लटकी हुई है।

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