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डा. रावल ने बताया पहाड़ के बंजर खेतों से बिन मेहनत भी लाखों कमाने का तरीका…

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बताया-औषधीय पौधों के उत्पादन से बदल सकती है उत्तराखंड एवं हिमालयी क्षेत्र की आर्थिक तकदीर
-शोध संस्थाओं को औषधीय पौधों के उत्पादन की संभावनाओं पर भी शोध करने, सरकार व फार्मा कंपनियों को उत्पादन में मदद करने व किसानों को एमएसपी देने तथा पारंपरिक ज्ञान का लाभ देने से बदल सकती है तस्वीर

डॉ. आरएस रावल।

डॉ. नवीन जोशी नवीन समाचार, नैनीताल, 7 मार्च 2021। गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान कोसी कटारमल के निदेशक डा. आरएस रावल ने कहा कि औषधीय पौधे उत्तराखंड एवं हिमालयी क्षेत्र की आर्थिक तकदीर बदल सकते हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि पहाड़ के जिन बिखरे हुए खेतों में वर्ष भर मेहनत कर मुट्ठी भर अनाज उत्पन्न नहीं हो पाता, उनमें औषधीय पौधे उगाकर सैकड़ों से हजारों रुपए प्रति किलोग्राम मूल्य की पहाड़ों पर प्राकृतिक तौर पर बिना मेहनत उगने वाली औषधियां उगाकर लाखों रुपए कमाए जा सकते हैं।
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि इसके लिए जैव विविधता के संरक्षण के लिए मनःस्थिति को बदलने की आवश्यकता है। केवल पौधों का दोहन करने पर रोक लगाने से पौधों का संरक्षण नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए संरक्षित किए जाने वाले पौधों की मानव के लिए उपयोगिता को बढ़ाये जाने की सोच विकसित करने की आवश्यकता है। मनुष्य केवल उसी को बचाता है जो उसके लिए उपयोगी होता है। उन्होंने कहा कि पहाड़ की बिखरी हुई खेती जहां परंपरागत खेती से क्षेत्रवासियों का भरण-पोषण नहीं हो पा रहा है, ऐसे में यदि उन्हें औषधीय पौधों की खेती करना सिखाया जाए और उनके उत्पादों की ‘एमएसपी’ घोषित हो व पूरे दाम मिलें तो इससे उत्तराखंड ही नहीं पूरे हिमालयी क्षेत्र की आर्थिक तकदीर बदल सकती है।
कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में डॉ. रावल ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों के पास न केवल औषधीय पौधों, वरन इनके औषधीय गुणों के बारे में भी पारंपारिक ज्ञान का भंडार है। अभी दवा कंपनियां व लोग केवल जंगलों में उगने वाले औषधीय पौधों पर निर्भर हैं, और उनका दोहन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शोध संस्थाओं के लिए केवल पौधों में औषधीय गुणों की खोज करने के साथ ही उनकी मात्रा एवं खेतों में उत्पादन का भी पता लगाने, सरकार की ओर से क्षेत्रीय लोगों को औषधीय पौधों की पौध उपलब्ध कराने सहित अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने व उन्हें खरीदने के लिए एमएसपी घोषित करने तथा दवा कंपनियों की ओर से प्रयोग किये जा रहे पारंपारिक ज्ञान का लाभ उस ज्ञान के मूल स्रोतों को भी पहुंचाने व ग्रामीणों को औषधीय पौधों के उत्पादन में मदद करने की आवश्यकता है।

हिमालयी क्षेत्रों में औषधीय पौधों से आजीविका की अपार संभावनाएं
नैनीताल। डा. रावल ने बताया कि दुनिया में पाये जाने वाले कुल वनस्पतियों में से केवल 17.8 फीसद, जबकि भारत में पाई जाई जाने वाली कुल वनस्पतियों की 44 फीसद व उत्तराखंड में पाई जाने वाली कुल वनस्पतियों की कुल 22 फीसद वनस्पतियों में औषधीय गुणों की पहचान हुई है। जबकि हर पौधे में कुछ न कुछ औषधीय गुण जरूर होते हैं। इसका अर्थ यह है कि शेष सभी पौधों में औषधीय गुणों का अध्ययन भी किया जाना शेष है। वहीं हिमालयी क्षेत्र में पाये जाने वाले 1748 प्रजातियों के पौधों में 542 प्रजातियां मूलतः यहीं के पौधे हैं और इनमें से 15.4 फीसद पौधे केवल यहीं मिलते हैं। यदि इन 15.4 फीसद पौधों के औषधीय गुणों का उपयोग कर लिया जाए तो इनके अध्ययन में ‘ग्लोबल लीडर’ बना जा सकता है। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि बड़ी फार्मा कंपनियां अभी केवल 10 फीसद पौधों का ही उपयोग कर रही हैं। साफ है कि इस क्षेत्र में कार्य करने की अपार संभावनाएं हैं।

तेजी से घट रही हिमालयी क्षेत्र की जनसंख्या और बढ़ रहा शहरीकरण
नैनीताल। देश-दुनिया में जहां जनसंख्या का बढ़ना चिंता का विषय है, वहीं उत्तराखंड सहित हिमालयी क्षेत्रों में जनसंख्या का घटना चिंता का विषय है। यहां केवल 20 फीसद क्षेत्रफल में ही अधिक जनसंख्या निवास करती है जबकि शेष 80 फीसद क्षेत्रफल की जनसंख्या नगण्य है। वहीं 1991 से 2001 के बीच यहां हुई जनसंख्या वृद्धि 21.3 फीसद के सापेक्ष 2001-11 के बीच केवल 17.3 फीसद फीसद की वृद्धि हुई है। यहां चिंताजनक है। दूसरी ओर पिछले 10 वर्षों में शहरीकरण देश के 31.8 फीसद से कहीं अधिक पूरे हिमालयी क्षेत्रों में 48.4 फीसद व उत्तराखंड में 42 फीसद की दर से बढ़ा है। इस कारण ही उत्तराखंड के कुल 16793 गांवों में से 1053 यानी 9 फीसद गांव भुतहा यानी जनसंख्या शून्य हो चुके हैं, जबकि अन्य 405 गांवों में 10 से कम लोग निवास कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें : स्वरोजगार अपनाकर आत्मनिर्भर होने का संदेश दे रहा पंकज का ‘द पहाड़ी सैलून’

नवीन समाचार, नैनीताल, 22 फरवरी 2021। कोरोना काल में जहां एक ओर कई युवक बेरोजगारी का रोना भर रोते दिखते हैं, वहीं कुछ युवक स्वरोजगार कर आत्मनिर्भर होने की अनुकरणीय मिसाल भी पेश कर रहे हैं। ऐसा ही कुछ बेतालघाट के युवक पंकज टम्टा ने भी किया है।

उन्होंने बेतालघाट में ’द पहाड़ी सैलून’ नाम का सैलून खोलकर न केवल स्वरोजगार अपनाया है, बल्कि अपने सैलून में कुमाउनी भाषा में अन्य युवकों को भी स्वरोजगार की ओर प्रेरित करने के संदेश लिखकर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। पंकज की इस पहल पर क्षेत्रीय विधायक संजीव आर्य भी उसका हौसला बढ़ाने तथा उत्साहित करने हेतु बेतालघाट पहुंचे। उन्होंने कहा कि पंकज ने यहां पहाड़ी सैलून खोल कर, रोजगार के क्षेत्र मेंएक सार्थक एवं सराहनीय पहल की गई है, जो कि अन्य युवकों के लिए भी प्रेरणादायक है।

यह भी पढ़ें : गजब की अनुकरणीय मिसाल: लॉक डाउन में स्कूटी से ‘आत्मनिर्भर’ बने हल्द्वानी के परम

नवीन समाचार, नैनीताल, 21 फरवरी 2021। हवा के विपरीत उड़ने वाली पतंगें ही आसमान में ऊंची उड़ती हैं। काम करने वाले अवसरों की तलाश नहीं करते, बल्कि बुरे से बुरे वक्त को भी अवसर बना लेते हैं। ऐसा ही कुछ किया है हल्द्वानी के रहने वाले युवक परम सिंह ने। परम कोरोना काल में बेरोजगार होने के बाद आज जो कर रहे हैं, वह युवाओं के लिए अनुकरणीय मिसाल है।
परम बीएससी करने के बाद गोवा में अपना रोजगार कर रहे थे, लेकिन देश-दुनिया में हुए कोरोना के प्रकोप के दौरान लॉक डाउन लागू होने पर उन्हें हल्द्वानी आना पड़ा। पहले उन्होंने सोचा कि मात्र 21 दिन के लॉक डाउन पर घर आ रहे हैं। किंतु लॉक डाउन लंबा खिंचा तो उनकी जमा पूंजी खत्म हो गई। इस पर परम ने रोने या दूसरों की मदद लेने की जगह अपनी मदद खुद करने, इस समास्या से बाहर निकलने की अपनी राह खुद बनाने की ठानी। संसाधन नहीं थे तो अपनी पुरानी स्कूटी को ही रेस्टोरेंट बना डाला। इसमें वह रामपुर रोड पर अपने ग्राहकों को मात्र 30 रुपए में भरपेट स्वादिष्ट राजमा-चावल, कड़ी-चावल, छोले-चावल व पहाड़ी भोजन बनाकर बेचने लगे और इससे ही उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाने के साथ ही अपने रोजगार का पूरा प्रबंध कर लिया है। लोग अब उनके स्वादिष्ट व सस्ते भोजन का इंतजार करते हैं।

यह भी पढ़ें : क्षेत्र पंचायत सदस्य ने की स्वरोजगार की अनुपम पहल, पर्यावरण मित्र लघु उद्योग शुरू किया

-क्षेत्र पंचायत प्रमुख ने किया क्षेत्र पंचायत सदस्य के लघु उद्योग का शुभारंभ
-बताया स्वरोजगार, आत्मनिर्भरता व रोजगार के लिए ऐसे ही प्रयासों की आवश्यकता

लघु उद्योग का शुभारंभ करते क्षेत्र पंचायत प्रमुख डा. हरीश बिष्ट।

नवीन समाचार, नैनीताल, 05 फरवरी 2021। भीमताल विकास खंड के अल्चौना की क्षेत्र पंचायत सदस्य अनीता पांडे ने की स्वरोजगार की अनुपम पहल करते हुए पर्यावरण मित्र तकनीक से डिस्पोजल कप, प्लेट, कटोरी व ग्लास आदि बनाने वाला लघु उद्योग शुरू किया है। भीमताल के क्षेत्र पंचायत प्रमुख डा. हरीश बिष्ट ने शुक्रवार को ग्राम पंचायत अल्चौना के पांडे छोड़ में इस शादी-समारोहों में प्रयोग होने वाले इन उपयोगी उत्पादों के लघु उद्योग का शुभारंभ किया। इस अवसर पर डा. बिष्ट ने कहा कि ऐसे उद्योग स्वरोजगार के साथ लोगों को रोजगार दिलाने व आत्मनिर्भर बनाने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। आगे यह प्रधानमंत्री मोदी की ‘वोकल फॉर लोकल’ की मुहिम से भी जुड़ सकते हैं, और अन्य युवाओं के लिए भी प्रेरणादायी हो सकते हैं। इस मौके पर चांफी के प्रधान पवन बेलवाल, गिरीश चंद्र, यशपाल, खीमराम व दुर्गा दत्त पलड़िया आदि लोग भी मौजूद रहे।

यह भी पढ़ें : नैनीताल-वेबीनार में बोले उद्यमी: ‘पीएम मोदी के 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनामी के लक्ष्य से भी आगे जा सकती है देश की अर्थव्यवस्था’

-भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फील्ड आउटरीच ब्यूरो नैनीताल के द्वारा ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ योजना के अंतर्गत स्थानीय उत्पाद की महत्ता पर आयोजित हुआ वेबीनार
नवीन समाचार, नैनीताल, 24 नवम्बर 2020। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत फील्ड आउटरीच ब्यूरो नैनीताल के द्वारा ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ योजना के अंतर्गत स्थानीय उत्पाद की महत्ता पर मंगलवार को एक वेबीनार का आयोजन किया गया। वेबीनार में हिमालयन वुलेंस अल्मोड़ा और रामलाल ब्रदर्स नैनीताल के प्रबंध निदेशक व उद्यमी पुनीत टंडन ने इस बात पर जोर दिया कि अगर स्थानीय उत्पादकों को अंतरराष्ट्रीय मंडी उपलब्ध कराने में भारत सरकार की मानक संस्थाएं, पैकेजिंग तथा प्रोडक्ट विजीबिलिटी में मदद करें, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनामी के लक्ष्य से भी आगे भारत की अर्थव्यवस्था को ले जाया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्थानीय उत्पादों की आवश्यकता के अनुरूप सरकारी योजनाएं बनाकर कर्तव्यनिष्ठ अफसरों की टीम को 5 साल का टास्क दिए जाने चाहिए।
वेबीनार में उद्यमी व एंटरप्रेन्योर ट्रेनर मनोज रावत ने भी कहा कि उत्तराखंड में स्थानीय उत्पादकों के लिए वैल्यू एडिशन का काम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड से प्राप्त होने वाला 70 प्रतिशत ऊनया तो बर्बाद हो जाता है या औने-पौने दामों में स्थानीय बाजार में बेच दिया जाता है। हिमालयन देवभूमि संस्थान ट्रस्ट के महासचिव बच्चन सिंह रावत ने भी विचार रखे।

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