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बाजपुर में मिलीं प्राचीन मूर्तियां, हो सकती हैं 17वीं सदी के चंद राजा बाजबहादुर चंद के दौर की

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नवीन समाचार, बाजपुर, 23 फरवरी 2019। कुमाऊं के प्रसिद्ध चंद राजवंश के सबसे सुप्रसिद्ध राजा बाजबहादुर चन्द (शासनकाल 1638 से 1678 ईसवी) के द्वारा मुगल बादशाह शाहजहां के दौर में अपने नाम से बसाये गये बाजपुर कस्बे में प्राचीन मूर्तियां मिली हैं। यह प्राचीन मंदिर के संबंधित बतायी जा रही हैं।

बताया गया है कि शनिवार को नगर के निकट स्थित ग्राम बैंतखेड़ी निवासी दलजीत सिंह पुत्र बिरसा सिंह के दाबका नदी के किनारे गोबरा नंबर आठ स्थित खेत में अवैध खनन चुगान के दौरान प्राचीन और दुर्लभ मूर्तियां मिली हैं। सूचना पर पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया है, और पुलिस ने संबंधित स्थान को अपने कब्जे से ले लिया है। जानकारी के अनुसार शनिवार की सुबह पीएसी कर्मी संजय नेगी, अजय रावत, दुर्गेश सिंह और रविंदर सिंह को रूटीन गश्त के दौरान सतह से  करीब सात मीटर नीचे प्राचीन मूर्तियां, पीलर व शिलापट नजर आए। उन्होंने इसकी जानकारी निकट की बन्नाखेड़ा पुलिस एवं स्थानीय प्रशासन को दी। इसके बाद एसडीएम विवेक प्रकाश, सीओ एमसी बिंजोला, कोतवाल जीबी जोशी, एसएसआइ नासिर हुसैन आदि पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और गहनता पूर्वक क्षेत्र का अध्ययन करने के बाद मूर्तियों की सुरक्षा के लिए पुलिस तैनात कर दी। एसडीएम विवेक प्रकाश के अनुसार मूर्तियां पूर्व में यहां मौजूद किसी पूजा स्थल की हो सकती हैं। पुरातत्व विभाग से इसकी जांच कराई जाएगी।

महाप्रतापी राजा थे बाज बहादुर चंद, न्यूयॉर्क के संग्रहालय में मौजूद है उनका चित्र

नैनीताल। बाजपुर नगर को बसाने वाले चंद राजवंश के राजा बाज बहादुर चंद के बारे में कहा जाता है कि वे महाप्रतापी, दयालु एवं वीर थे। मुगल शासक शाहजहां ने उनकी वीरता को देखकर उन्हें ‘बहादुर’ नाम दिया था। उनके वंशज अब भी बहादुर उपनाम लगाते हैं। उनकी प्रसिद्धि का अंदाजा इस बात से लगता है कि उनका चित्र अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के ब्रूकलिन संग्रहालय में संग्रहीत करके रखा गया है।

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उत्तराखण्ड में अंग्रेजों का आगमन बिहार के सिघौली में 1815 में अंग्रेजों एवं गोर्खाओं के बीच हुई संधि के बाद हुआ। इससे पूर्व चन्द राजाओं के पतन के बाद गोर्खाओं के राज (कुमाऊं में 1790 से 1815 और गढ़वाल में 1804 से 1815 तक) में यहां के लोग खासे परेशान थे। गोर्खाली राज शासकीय जुल्मों का बेहद ही काला अध्याय रहा। इस दौर में कढ़ाई दीप व पाथर दान के मूर्खतापूर्ण तरीकों से दण्ड देने के प्राविधान थे। किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का शक भी होता, तो उसका `पाथर दान´ के तहत पत्थरों से वजन लिया जाता और एक माह तक उसे बिना भोजन, केवल पानी देकर गुफा में रखा जाता। एक माह बाद उसका पुन: वजन लिया जाता, जो निश्चित ही भोजन न मिलने से पहले से कम होता, और इस आधार पर उसे दोषी मान लिया जाता व कड़ी सजा दी जाती। इसी प्रकार `कढ़ाई दीप´ के तहत शक होने पर व्यक्ति के हाथ खौलते घी में डाले जाते और जलने पर उसे दोषी मान लिया जाता। इस कारण हर्ष देव जोशी, जो कि पूर्व में चन्द वंशीय राजाओं के अन्तिम दीवान थे, अंग्रेजों को यहां लेकर आऐ। अंग्रेजों के इस पर्वतीय भूभाग में आने के कारण यहां की प्राकृतिक सुन्दरता से अभिभूत होने के साथ ही व्यापारिक भी थे। उन दिनों भारत का तिब्बत व नेपाल से बड़ा व्यापारिक लेन-देन होता था। यहां जौलजीवी, बागेश्वर, गोपेश्वर व हल्द्वानी आदि में बड़े व्यापारिक मेले होते थे। 19वीं शताब्दी का वह समय औपनिवेशिक वैश्विकवाद व साम्राज्यवाद का दौर था। नऐ उपनिवेशों की तलाश व वहां साम्राज्य फैलाने के लिए फ्रांस, इंग्लैण्ड व पुर्तगाल जैसे यूरोपीय देश समुद्री मार्ग से भारत आ चुके थे, जबकि रूस स्वयं को इस दौड़ में पीछे रहता महसूस कर रहा था। कारण, उसकी उत्तरी समुद्री सीमा में स्थित वाल्टिक सागर व उत्तरी महासागर सर्दियों में जम जाते थे। तब स्वेज नहर भी नहीं थी। ऐसे में उसने काला सागर या भूमध्य सागर के रास्ते भारत आने के प्रयास किऐ, जिसका फ्रांस व तुर्की ने विरोध किया। इस कारण 1854 से 1856 तक दोनों खेमों के बीच क्रोमिया का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ। इस युद्ध में रूस पराजित हुआ, जिसके फलस्वरूप 1856 में हुई पेरिस की संधि में यूरोपीय देशों ने रूस पर काला सागर व भूमध्य सागर की ओर से सामरिक विस्तार न करने का प्रतिबंध लगा दिया। ऐसे में भारत आने के लिए उत्सुक रूस के भारत आने के अन्य मार्ग बन्द हो गऐ थे, और वह केवल तिब्बत की ओर के मार्गों से ही भारत आ सकता था। तिब्बत से उत्तराखण्ड के लिपुलेख, नीति, माणा व जौहार घाटी के पहाड़ी दर्रों से आने के मार्ग बहुत पहले से प्रचलित थे। यूरोपीय देशों को इन रास्तों की जानकारी कमोबेश 1624 से थी। 1624 में आण्ड्रा डे नाम के यूरोपीय ने श्रीनगर गढ़वाल के रास्ते ही शापरांग तिब्बत जाकर वहां चर्च बनाया था। इसलिए कंपनी सरकार ने रूस की उत्तराखण्ड के रास्ते भारत आने की संभावना को भांप लिया, लिहाजा उसके लिए `जियो पालिटिकल´ यानी भौगोलिक व राजनीतिक कारणों से उत्तराखण्ड बेहद महत्वपूर्ण हो गया था।

अंग्रेजों ने इन्हीं `जियो पालिटिकल´ कारणों के कारण यहां स्काटलेण्ड के अधिकारियों को कमिश्नर जैसे बड़े पदों पर रखा। स्काटलेण्ड इंग्लेण्ड का उत्तराखण्ड की तरह का ही पर्वतीय इलाका है, लिहाजा वहां के मूल निवासी अधिकारी यहां के पहाड़ों के हालातों को भी बेहतर समझ सकते थे। कुमाऊं कमिश्नर हैनरी रैमजे, जीडब्ल्यू ट्रेल, लूसिंग्टन आदि सभी स्काटलेण्ड के थे। इनमें से रैमजे कुमाउनीं में बातें करते थे, उन्होंने यहां कई सुधार कार्य किऐ, बल्कि उन्हें यदा-कदा लोग `राम जी´ भी कह दिया करते थे। ट्रेल ने एक अन्य यात्रा मार्ग ट्रेलपास की खोज की, नैनीताल की खोज का भी उन्हें श्रेय दिया जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने इस क्षेत्र से लोगों की धार्मिक भावनाओं का जुड़ाव व अप्रतिम सुन्दरता को अंग्रेजों की नज़रों से भी बचाने का प्रयास किया, और क्षेत्रीय लोगों से भी इस स्थान पर अंग्रेजों को न लाने को प्रेरित किया। लूसिंग्टन नैनीताल की बसासत के दौरान कमिश्नर थे। उन्होंने यहां सार्वजनिक हित के अलावा व्यक्तिगत कार्यों के लिए भूमि के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था, और यहां स्वयं का घर भी नहीं बनाया। उनकी कब्र आज भी नैनीताल में मौजूद है। इसका अर्थ यह हुआ कि उस दौर की कंपनी सरकार पहाड़ों के प्रति बेहद संवेदनशील थी।

शायद यही कारण रहा कि 1857 में जब देश कंपनी सरकार के खिलाफ उबल रहा था, पहाड़ में एकमात्र काली कुमाऊं में कालू महर व उनके साथियों ने ही रूहेलों से मिलकर आन्दोलन किऐ, हल्द्वानी से रुहेलों के पहाड़ की ओर बढ़ने के दौरान हुआ युद्ध व अल्मोड़ा जेल आदि में अंग्रेजों के खिलाफ छिटपुट आन्दोलन ही हो पाऐ। और जो आन्दोलन हुऐ उन्हें जनता का समर्थन हासिल नहीं हुआ। हल्द्वानी में 100 से अधिक रुहेले मारे गऐ। कालू महर व उनके साथियों को फांसी पर लटका दिया गया। 

शायद इसीलिए 1857 में जब देश में कंपनी सरकार की जगह `महारानी का राज´ कायम हुआ, अंग्रेज पहाड़ों के प्रति और अधिक उदार हो गऐ। उन्होंने यहां कई सुधार कार्य प्रारंभ किऐ, जिन्हें पूरे देश से इतर पहाड़ों पर अंग्रेजों द्वारा किऐ गऐ निर्माणों के रूप में भी देखा जा सकता है।

लेकिन इस कवायद में उनसे कुछ बड़ी गलतियां हो गईं। मसलन, उन्होंने पीने के पानी के अतिरिक्त शेष जल, जंगल, जमीन को अपने नियन्त्रण में ले लिया। इस वजह से यहां भी अंग्रेजों के खिलाफ नाराजगी शुरू होने लगी, जिसकी अभिव्यक्ति देश के अन्य हिस्सों से कहीं देर में पहली बार 1920 में देश में चल रहे `असहयोग आन्दोलन´ के दौरान देखने को मिली। इस दौरान गांधी जी की अगुवाई में आजादी की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस पार्टी यहां के लोगों को यह समझाने में पहली बार सफल रही कि अंग्रेजों ने उनके प्राकृतिक संसाधनों पर अपना अधिकार जमा लिया है। कांग्रेस का कहना था कि वन संपदा से जुड़े जनजातीय व ऐसे क्षेत्रों के अधिकार क्षेत्रवासियों को मिलने चाहिऐ। इसकी परिणति यह हुई कि स्थानीय लोगों ने जंगलों को अंग्रेजों की संपत्ति मानते हुऐ 1920 में 84,000 हैक्टेयर भूभाग के जंगल जला दिऐ। इसमें नैनीताल के आस पास के 112 हैक्टेयर जंगल भी शामिल थे। इस दौरान गठित कुमाऊं परिशद के हर अधिवेशन में भी जंगलों की ही बात होती थी, लिहाजा जंगल जलते रहे। सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान 1930-31 के दौरान और 1942 तक भी यही स्थिति चलती रही, तब भी यहां बड़े पैमाने पर जंगल जलाऐ गऐ। कुली बेगार जो कि वास्तव में गोर्खाली शासनकाल की ही देन थी, यह कुप्रथा हालांकि अंग्रेजों के दौरान कुछ शिथिल भी पड़ी थी। इतिहासकार पद्मश्री शेखर पाठक के अनुसार इसे समाप्त करने के लिए अंग्रेजों ने खच्चर सेना का गठन भी किया था। इस कुप्रथा के खिलाफ जरूर पहाड़ पर बड़ा आन्दोलन हुआ, जिससे पहाड़वासियों ने कुमाऊं परिषद के संस्थापक बद्री दत्त पाण्डे, हरिगोविन्द पन्त तथा चिरंजीवी लाल आदि के नेतृत्व में 14 जनवरी 1921 को उत्तरायणी के पर्व पर बागेश्वर में पीछा छुड़ाकर ही दम लिया। गढ़वाल में बैरिस्टर मुकुन्दी लाल के नेतृत्व में 30 जनवरी 21 को इसी तरह आगे से `कुली बेगार´ न देने की शपथ ली गई। सातवीं शताब्दी में कत्यूरी शासनकाल में भी बेगार का प्रसंग मिलता है। कहते हैं कि अत्याचारी कत्यूरी राजा वीर देव ने अपनी डोली पहाड़ी पगडण्डियों पर हिंचकोले न खाऐ, इसलिए कहारों के कंधों में हुकनुमा कीलें फंसा दी थी। कहते हैं कि इसी दौरान कुमाऊं का प्रसिद्ध गीत `तीलै धारो बोला…´ सृजित हुआ था। गोरखों के शासनकाल में खजाने का भार ढोने से लोगों के सिरों से बाल गायब हो गऐ थे। कुमाउनीं के आदि कवि गुमानी पन्त की कविता `दिन दिन खजाना का भार बोकना लै, शिब-शिब चूली में न बाल एकै कैका…´ कविता लिखी गई। 

                        (इतिहासविद् प्रो. अजय रावत से बातचीत के आधार पर)

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 महा पाषाण शवागारों से उत्तराखंड में आर्यों के आने की पुष्टि 

´ब्रिटिश कुमाऊं´ में भी गूंजे थे जंगे आजादी के `गदर में विद्रोह के स्वर

नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के पहाड़ों की भौगोलिक परिस्थितियां 1857 में देश के प्रथम स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान अंग्रेजों से विद्रोह के अधिक अनुकूल नहीं थीं। सच्चाई यह भी थी कि अंग्रेजों के 1815 में आगमन से पूर्व यहां के लोग गोरखों का बेहद दमनात्मक राज झेल रहे थे, वरन उन्हें ब्रिटिश राज में कष्टों से कुछ राहत ही मिली थी। इसके बावजूद यहां भी जंगे आजादी के पहले ‘गदर’ के दौरान विद्रोह के स्वर काफी मुखरता से गूंजे थे। 

  • नैनीताल व अल्मोड़ा में फांसी पर लटकाए गए कई साधु वेशधारी क्रांतिकारी 
  • इनमें तात्या टोपे के होने की भी संभावना 
  • हल्द्वानी में शहीद हुए थे 114  क्रांतिकारी रुहेले 
  • काली कुमाऊं में बिश्ना कठायत व कालू महर ने थामी थी क्रान्ति की मशाल

इतिहासकारों के अनुसार ´ब्रिटिश कुमाऊं´ कहे जाने वाले बृहद कुमाऊं में वर्तमान कुमाऊं मण्डल के छ: जिलों के अलावा गढ़वाल मण्डल के चमोली व पौड़ी जिले तथा रुद्रप्रयाग जिले का मन्दाकिनी नदी से पूर्व के भाग भी शामिल थे। 1856 में जब ब्रितानी ईस्ट इण्डिया कंपनी के विरुद्ध देश भर में विद्रोह होने प्रारंभ हो रहे थे, यह भाग कुछ हद तक अपनी भौगोलिक दुर्गमताओं के कारण इससे अलग थलग भी रहा। 1815 में कंपनी सरकार यहां आई, जिससे पूर्व पूर्व तक पहाड़वासी बेहद दमनकारी गोरखों को शासन झेल रहे थे, जिनके बारे में कुमाऊं के आदि कवि ´गुमानी´ ने लिखा था ´दिन दिन खजाना का भार बोकना लै, शिब शिब चूली में का बाल न एकै कैका´ यानि गोरखे इतना शासकीय भार जनता के सिर पर थोपते थे, कि किसी के सिर में बाल ही नहीं उग पाते थे। लेकिन कंपनी सरकार को उर्वरता के लिहाज से कमजोर इस क्षेत्रा से विशेश राजस्व वसूली की उम्मीद नहीं थी, और वह इंग्लेण्ड के समान जलवायु व सुन्दरता के कारण यहां जुल्म ढाने की बजाय अपनी बस्तियां बसाकर घर जैसा माहौल बनाना चाहते थे। इतिहासकार पद्मश्री डा. शेखर पाठक बताते हैं कि इसी कड़ी में अंग्रेजों ने जनता को पहले से चल रही कुली बेगार प्रथा से निजात दिलाने की भी कुछ हद तक पहल की। इसके लिए 1822 में ग्लिन नाम के अंग्रेज अधिकारी ने लोगों के विस्तृत आर्थिक सर्वेक्षण भी कराए। उसने इसके विकल्प के रूप में खच्चर सेना गठित करने का प्रस्ताव भी दिया था। इससे लोग कहीं न कहीं अंग्रेजों को गोरखों से बेहतर मानने लगे थे, लेकिन कई बार स्वाभिमान को चोट पहुंचने पर उन्होंने खुलकर इसका विरोध भी किया। कुमाउंनी कवि गुमानी व मौला राम की कविताओं में भी यह विरोध व्यापकता के साथ रहा। इधर 1857 में रुहेलखण्ड के रूहेले सरदार अंग्रेजों की बस्ती के रूप में विकसित हो चुकी `छोटी बिलायत´ कहे जाने वाले नैनीताल को अंग्रेजों से मुक्त कराना चाहते थे, पर 17 सितम्बर 1857 को तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर हेनरी रैमजे ने अपनी कूटनीतिक चालों से उन्हें हल्द्वानी के बमौरी दर्रे व कालाढुंगी से आगे नहीं बढ़ने दिया। इस कवायद में 114 स्वतंत्रता सेनानी क्रान्तिकारी रुहेले हल्द्वानी में शहीद हुए। इसके अलावा 1857 में ही रैमजे ने नैनीताल में तीन से अधिक व अल्मोड़ा में भी कुछ साधु वेशधारी क्रान्तिकारियों को फांसी पर लटका दिया गया। नैनीताल का फांसी गधेरा (तत्कालीन हैंग मैन्स वे) आज भी इसका गवाह है। प्रो. पाठक इन साधुवेश धारियों में मशहूर क्रांतिकारी तात्या टोपे के भी शामिल होने की संभावना जताते हैं, पर दस्तावेज न होने के कारण इसकी पुष्टि नहीं हो पाती।

इसी दौरान पैदा हुआ उत्तराखंड का पहला नोबल पुरस्कार विजेता

एक ओर जहां देश की आजादी के लिए पहले स्वतन्त्रता संग्राम चल रहा था, ऐसे में रत्नगर्भा कुमाऊं की धरती एक महान अंग्रेज वैज्ञानिक को जन्म दे रही थी। 1857 में मैदानी क्षेत्रों में फैले गदर के दौरान कई अंग्रेज अफसर जान बचाने के लिए कुमाऊं के पहाड़ों की ओर भागे थे। इनमें एक गर्भवती ब्रिटिश महिला भी शामिल थी, जिसने अल्मोड़ा में एक बच्चे को जन्म दिया। रोनाल्ड रॉस नाम के इस बच्चे ने ही बड़ा होकर   मलेरिया के परजीवी प्लास्मोडियम के जीवन चक्र  की खोज की, जिसके लिए उसे चिकित्सा का नोबल भी पुरस्कार प्राप्त हुआ।

उधर `काली कुमाऊं´ में बिश्ना कठायत व आनन्द सिंह फर्त्याल को अंग्रेजों ने विरोध करने पर फांसी पर चढ़ा दिया, जबकि प्रसिद्ध  क्रांतिकारी कालू महर को जेल में डाल दिया गया। ब्रिटिश कुमाऊं के ही हिस्सा रहे श्रीनगर में अलकनन्दा नदी के बीच पत्थर पर खड़ा कर कई क्रान्तिकारियों को गोली मार दी गई। 1858 में देश में ईस्ट इण्डिया कंपनी की जगह ब्रिटिश महारानी की सरकार बन जाने से पूर्व अल्मोड़ा कैंट स्थित आर्टिलरी सेना में भी विद्रोह के लक्षण देखे गए, जिसे समय से जानकारी मिलने के कारण दबा दिया गया। कई सैनिकों को सजा भी दी गईं। अंग्रेजों के शासकीय दस्तावेजों में यह घटनाएं दर्ज मिलती हैं, पर खास बात यह रही कि अंग्रेजों ने दस्तावेजों में कहीं उन क्रान्तिकारियों का नाम दर्ज करना तक उचित नहीं समझा, जिससे वह अनाम ही रह गऐ।

यह भी पढ़ें : इतिहास के झरोखे से कुछ महान उत्तराखंडियों के नाम-उपनाम व एतिहासिक घटनायें

 टिंचरी माई

  • वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली – पेशावर कांड के नायक
  • इन्द्र मणि बडोनी: उत्तराखंड का गाँधी
  • देवकी नंदन पांडे: कुमाऊँ का गाँधी
  • अनुसुया प्रसाद बहुगुणा: गढ़ केसरी
  • बद्री दत्त पांडे: कुमाऊँ केसरी ( कुमाऊं का इतिहास पुस्तक के लेखक)
  • बद्री दत्त पांडे: कुली बेगार आन्दोलन के नायक
  • पं. हर्ष देव जोशी (हरक देव जोशी) : कुमाऊं का चाणक्य, कुमाऊं का शिवाजी
  • हर्ष देव ओली: काली कुमाऊं का शेर
  • विश्वेश्वर दत्त सकलानी: वृक्ष मानव
  • शिव प्रसाद डबराल: चारण, इन्साइक्लोपीडिया ऑफ उत्तराखंड
  • मौला राम: गढ़वाली चित्रकला के जन्मदाता
  • पंडित नैन सिंह रावत: भारतीय राज्यों का साथी, मौलिक पंडित
  • गुमानी पंत: कुमाऊं साहित्य के प्रथम कवि,
  • लोकरत्न गौरी दत्त पांडे: गौर्दा
  • हेमवंती नंदन बहुगुणा: धरती पुत्र, हिमालय पुत्र
  • रानी कर्णावती: नाक कटी रानी
  • गौरा देवी: चिपको वुमन (चिपको आन्दोलन की जन्मदात्री)
  • दीपा देवी: टिंचरी माई, ठगुली देवी
  • आइरिन पंत: अल्मोड़ा की बेटी, पाकिस्तान की बहू
  • फेड्रिक विल्सन: पहाड़ी विल्सन
  • तीलू रौतेली: उत्तराखंड की झाँसी की रानी
  • मोहन लाल उनियाल: श्रीमन्त
  • गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ : जनकवि
  • कल्याण सिंह रावत: मैती आंदोलन के जन्मदाता
  • कुंवर सिंह नेगी: गढ़वाल का हातिमताई
  • कालू महर: उत्तराखण्ड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी
  • जिया रानी: कुमाऊं की लक्ष्मीबाई
  • बच्चू लाल भट्ट -गढ़वाली
  • महिधर शर्मा डंगवाल: धर्माधिकारी

    उत्तराखंड के कुछ और व्यक्तित्वों के बारे में पढने के लिए यहाँ क्लिक करें 

यह भी पढ़ें :

उत्तराखण्ड की इतिहास के झरोखे से कुछ एतिहासिक घटनायें :
    • 1635 : उत्तराखंड में आगे बढ़ रही शाहजहाँ की नवाजत खान के नेतृत्व वाली रॉयल मुग़ल सेना को रानी कर्णावती की सेना से हार कर गढ़वाल वापस लौटना पड़ा ।
    • 1743-45 : कुमाऊँ  पर रुहेलों का आक्रमण।
    • 1803: गढवाल में गोरखाओं का शासन प्रारम्भ।
    • 1813 : कुमाऊं रेजिमेंट की स्थापना।
    • 1815: सिंगोली संधि से कुमाऊं में अंग्रेजों का आगमन, पवांर नरेश द्वारा टिहरी की स्थापना।
    • 1815: 24 अप्रैल को अलमोड़ा में 1/3 गोरखा राइफल्स (आरंभ में कुमाऊं स्थानीय बटालियन नाम, अब गोरखा रेजिमेंट) की स्थापना।
    • 1815 : 28 दिसंबर को गढ़वाल के तत्कालीन महाराजा सुदर्शन शाह ने पवार राजवंश की तीसरी और आखिरी राजधानी टिहरी की स्थापना की, जो अब डूब चुकी है।
    • 1816: सिंगोली संधि के अनुसार टिहरी के अलावा शेष गढ़वाल में अंग्रेजों का आगमन।
    • 1834: अंग्रेज अधिकारी ट्रेल ने हल्द्वानी नगर बसाया।
    • 1840: देहरादून में चाय के बगान का प्रारम्भ।
    • 1841: 18 नवम्बर को नैनीताल नगर की स्थापना।
    • 1842 : उत्तरी भारत के पहले ‘द हिल्स’ (अंग्रेजी भाषा में) नामक समाचार पत्र का प्रकाशन मसूरी के सेमेनरी स्कूल परिसर स्थित प्रिंटिंग प्रेस से प्रारंभ। 
    • 1847: रुड़की इन्जीनियरिंग कालेज की स्थापना।
    • 1850: नैनीताल में प्रथम मिशनरी स्कूल-वर्तमान सीआरएसटी इंटर कॉलेज खुला।
    • 1852: रुड़की मे सैनिक छावनी का निर्माण।
    • 1854: रुड़की गंग नहर में सिंचाई हेतु जल छोडा गया।
    • 1857: टिहरी नरेश सुदर्शन शाह ने काशी विश्वनाथ  मंदिर का जीर्णोंद्धार किया गया।
    • 1860: देहरादून में अशोक शिलालेख की खोज, नैनीताल बनी ग्रीष्मकालीन राजधानी।
    • 1861: देहरादून, सर्वे आफ़ इंडिया की स्थापना।
    • 1865: देहरादून में तार सेवा प्रारम्भ।
    • 1868 : नैनीताल से उत्तराखंड के पहले देशी (हिन्दी-उर्दू) ‘समय विनोद’ नामक पाक्षिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ।
    • 1874: अल्मोडा नगर में पेयजल व्यवस्था का प्रारम्भ।
    • 1877: महाराजा द्वारा प्रतापनगर की स्थापना।
    • 1878: गढ़वाल के बीर सैनिक बलभद्र सिंह को ‘आर्डर आफ़ मेरिट’ प्रदान किया गया।
    • 1880: 18 सितंबर को नैनीताल में महाविनाशकारी भूस्खलन; 53 यूरेशियन सहित 151 लोग हुए जिन्दा दफ़्न ।
    • 1887: लैन्सडाउन में गढवाल राइफ़ल रेजिमेंट का गठन।
    • 1888: नैनीताल में सेंट जोजेफ़ कालेज की स्थापना।
    • 1891: हरिद्वार – देहरादून रेल मार्ग का निर्माण।
    • 1894: गोहना ताल टूटने से श्रीनगर में क्षति।
    • 1896: महाराजा कीर्ति शाह ने कीर्तिनगर का निर्माण।
    • 1897: कोटद्वार-नजीबाबाद रेल सेवा प्रारम्भ।
    • 1899: काठगोदाम रेलसेवा से जुडा।
    • 1900: हरिद्वार-देहरादून रेलसेवा प्रारम्भ।
    • 1903: टिहरी नगर में विद्युत ब्यवस्था।
    • 1905: देहरादून एयरफ़ोर्स आफ़िस में एक्स-रे संस्थान की स्थापना।
    • 1912: भवाली में क्षय रोग अस्पताल की स्थापना, मंसूरी में विद्युत योजना।
    • 1914: गढवाली बीर, दरवान सिंह नेगी को विक्टोरिया क्रास प्रदान किया गया।
    • 1918: सेठ सूरजमल द्वारा ऋषिकेश में ‘लक्षमण झूला’ का निर्माण।
    • 1922: गढवाल राइफ़ल्स को ‘रायल’ से सम्मानित किया गया, नैनीताल विद्युत प्रकाश में नहाया।
    • 1926: हेमकुंड साहब की खोज।
    • 1930: चन्द्रशेखर आजाद का दुगड्डा में अपने साथियों के साथ शस्त्र प्रशिक्षण हेतु आगमन, देहरादून में नमक सत्याग्रह, मंसूरी मोटर मार्ग प्रारम्भ।
    • 1932: देहरादून मे “इंडियन मिलिटरी एकेडमी ‘की स्थापना।
    • 1935: ऋषिकेश-देवप्रयाग मोटर मार्ग का निर्माण।
    • 1938: हरिद्वार-गोचर हवाई यात्रा ‘हिमालयन एयरवेज कम्पनी’ ने शुरू की।
    • 1942: 7 वीं गढवाल रेजिमेंट की स्थापना।
    • 1945: हैदराबाद रेजिमेंट का नाम बदलकर “कुमाऊं रेजिमेंट” रखा गया।
    • 1946: डीएवी कालेज देहरादून में कक्षाएं शुरू हुई।
    • 1948: रुड़की इन्जीनियरिंग कालेज-विश्वविद्यालय में रूपांतरित किया गया।
    • 1949: अगस्त में टिहरी राज्य का  भारतीय गणतन्त्र में, अल्मोडा कालेज की स्थापना।
    • 1953: बंगाल सैपर्स की स्थापना रुड़की में की गई, उत्तराखंड का पहला हिंदी दैनिक अखबार ‘पर्वतीय’ नैनीताल से प्रकाशित।
    • 1954: हैली नेशनल पार्क का नाम बदलकर जिम कार्बेट नेशनल पार्क रखा गया।
    • 1958: मंसूरी में डिग्री कालेज की स्थापना।
    • 1960: पंतनगर में कृषि एवम प्राद्यौगिकी विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी गई।
    • 1973: गढवाल एवम कुमांऊ विश्वविद्यालय की घोषणा की गई। 1 मार्च को गोपेश्वर से ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुवात।
    • 1975: देहरादून प्रशाशनिक रूप से गढ्वाल में सम्मिल्लित किया गया, चमोली जनपद में 87 किमी में फ़ैली फ़ूलों की घाटी को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
    • 1983 : प्रथम उत्तराखंडी (गढ़वाली) फिल्म  ‘जग्वाल’ प्रदर्शित (निर्माता : पाराशर गौड़)।
    • 1986: पिथौरागढ जनपद के 600 वर्ग किमी में फ़ैले अस्कोट वन्य जीव विहार की घोषणा की गई। गढ़वाली फिल्म ‘घर जवें’, ‘प्यारो रुमाल’, ‘कौथिक’ व ‘उदंकार’ प्रदर्शित।
    • 1987: पौडी गढ़वाल में 301 वर्ग किमी में फ़ैले सोना-चांदी वन्य जीव विहार की घोषणा की गई। कुमाउनी भाषा की प्रथम फिल्म ‘मेघा आ’ प्रदर्शित (निर्माता : जीवन बिष्ट)।
    • 1988: अल्मोडा बनभूमि के क्षेत्र बिनसर वन्य जीव विहार की घोषणा की गई।
    • 1991: 20 अक्तूबर को भूकम्प में 1500 ब्यक्तियों की मौत।
    • 1992: उत्तरकाशी में गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान तथा गोविंद राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना।
    • 1994: उधमसिंह नगर जिले का गठन, पृथक उत्तराखण्ड राज्य की मांग का आंदोलन- खटीमा में गोली चली, मुजफ़्फ़रनगर काण्ड, अनेक लोग शहीद हुए।
    • 1995: श्रीनगर में आंदोलनकारियों पर गोली चली।
    • 1996: रूद्रप्रयाग, चम्पावत, बागेश्वर व ऊधमसिंह नगर, चार नये जनपद बनाये गये।
    • 1999: चमोली में भूकम्प, 110 ब्यक्तियों की मौत।
    • 2000: 9 नबम्बर-उत्तरांचल राज्य की स्थापना।
    • 2007: 1 जनवरी  से राज्य का नाम ‘उत्तरांचल’ से बदलकर ‘उत्तराखंड ‘
    • 2009 :15 जनवरी को हेमवती नंदन बहुगुणा को मिला उत्तराखंड में पहले केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा
  • 2013: 15-16 जून को केदारनाथ में भीषण जल प्रलय।
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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….।मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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