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धर्म-आस्था : क्या MP के CM बनने जा रहे कमलनाथ का कार्यकाल पूर्ण होगा ?? कुंडली में है शंका !

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ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त

अंक 15 : क्या कमलनाथ का कार्यकाल पूर्ण होगा ??

प्रिय मित्रों/पाठकों, मध्यप्रदेश के नवोदित/नामित मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ 17 दिसंबर 2018 (सोमवार) को दोपहर करीब डेढ़ बजे के बाद शपथ लेकर मुख्यमंत्री घोषित होंगे, तब वो पंचक ओर खरमास (मलमास) में शपथ लेंगे।

ज्योतिष के हिसाब से 16 तारीख से ही मलमास शुरु हो जाएगा ऐसे में इस काल में कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार कमलनाथ को 1 बजकर 04 मिनट से 1 बजकर 44 मिनट (विजय मुहूर्त) के बीच शपथ लेना चाहिए क्योंकि इस दौरान लग्न बर्गोत्तर होकर कांग्रेस सरकार के लिए भी शुभ रहेगा। इस दौरान चौघड़िया भी चर का रहेगा ओर मेष लग्न रहेगा। उस दिन विक्रम सम्वत 2075 के मार्गशीर्ष माह को शुक्ल पक्षीय नवमी तिथि पश्चात दशमी तिथि रहेगी। चन्द्रमा, मीन राशि मे रहेगा और रेवती नक्षत्र रहेगा।

कांग्रेस की कुंडली में शुक्र की दशा के कारण पार्टी में विवाद जारी रहेंगे तो वहीं गुरु की कृपा से सरकार की छवि सुधरेगी।

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ऐसी हें कमलनाथ की कुंडली—

गूगल पर उपलब्ध जानकारी अनुसार मध्यप्रदेश के नए(मनोनीत ) मुख्यमंत्री कमलनाथ का जन्म (सोमवार) 18 नवम्बर 1946 को कानपुर (उप्र) में दोपहर में लगभग 12 बजे हुआ था । उनका जन्म सूर्य की महादशा में हुआ जिसका भोग्यकाल 3 वर्ष 1 माह 10 दिन रहा। इस प्रकार का जातक सम्मानित पद पर विराजमान होता है (चंद्र कुंडली अनुसार) एवं सरकार (राजा) द्वारा सम्मानित होता है।

जिस समय कमलनाथ जन्मे उस समय जो चंद्रमा विराजमान था, उसकी स्थिति अनुसार भी जातक उच्च सम्मान को प्राप्त करता है।उनकी राशि कन्या बनती है।

कमलनाथ की राशि पर वर्तमान में शनि की महादशा चल रही है। जो 02 फरवरी 2002 से प्रारंभ हुई थी। यह पूरे 17 वर्ष रहकर 02 फरवरी 2021 को समाप्त होगी।फिलहाल शनि की महादशा मे गुरु की अंतर्दशा ओर शनि की प्रत्यन्तर दशा चल रही हैं(23 नवम्बर 2018 से 18 अप्रेल 2019 तक)।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार मुख्यमंत्री कमलनाथ की कुंडली मकर लग्न की है, इसलिए वे राजयोगकारी सिद्ध हुई है। कुंडली में राहु राजयोग कारी होकर नवांश में स्थित है इसलिए वे कार्यकाल पूरा कर पाएं इसमें शंका है. लेकिन, जितने समय वे मुख्यमंत्री रहेंगे उस दौरान उनका कार्यकाल उल्लेखनीय होगा।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया को गूगल पर उपलब्ध कमलनाथ की कुण्डली विवरण अनुसार उनकी कुण्डली में 11वें भाव में पंचग्रही योग बना हुआ है जहां वृश्चिक राशि मे सूर्य, बुध, मंगल और शुक्र, केतु के स्थिति हें।
इसके कारण बुधादित्य योग, ग्रहण दौष के साथ साथ कला से भी सम्बन्ध बन रहा हैं।

पंचम भाव मे राहु है, वृषभ राशि मे।

भाग्य स्थान (8वें भाव में) चंद्रमा ,मीन राशि में स्थित है।

गुरु तथा शुक्र का प्रभाव से ही कमलनाथ पर किसी का रुष्ट होना या मनाना, इसका असर नहीं पड़ता है। ईष्ट मित्रों से मनमुटाव हो सकता है। आपको संयम रखना होगा। अन्यथा कटु आलोचना होगी।

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार कमलनाथ को स्वास्थ्य, पारिवारिक चिंता बनी रहेगी। कृपया उस पर ध्यान दें। उच्च स्तर से मनमुटाव की स्थिति बन सकती है। अप्रिय समाचार चिंता ग्रस्त करें, इससे पहले विवेक से काम करें। सावधान रहें। कोई भी निर्णय लेने के पहले विचार करें।
हम आपके उत्तम ओर उज्ज्वल मंगलमय भविष्य को कामना करते है।
।।शुभमस्तु।।

अंक 14 : आज जानें एक मंत्र, जिसके पाठ से पूरी कर लें बड़ी से बड़ी इच्छा-मृत संजीवनी मन्त्र…
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प्रिय मित्रों/पाठकों, हिंदू धर्म में दो मंत्रों महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र की बड़ी भारी महिमा बताई गई हैं। कहा जाता है कि इन दोनों मंत्रों में किसी भी एक मंत्र का सवा लाख जाप करके जीवन की बड़ी से बड़ी इच्छा को पूरा किया जा सकता है चाहे वो दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनने की इच्छा हो या अपना पूरा भाग्य ही बदलना हो।

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय ऋषि-मुनियों ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र महामृत्युंजय गायत्री मंत्र अथवा मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है। इस मंत्र के जाप से मुर्दा को भी जिंदा करना संभव है बशर्ते गुरू से इसका सही प्रयोग सीख लिया जाए। हालांकि भारतीय ऋषि-मुनि इस मंत्र के जाप के लिए स्पष्ट रूप से मना भी करते हैं।

👉🏻👉🏻 महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का प्रसिद्ध और सिद्ध मंत्र है। सहज मंत्र ओम है तो सारी बाधाओं से मुक्ति का महामंत्र महामृत्युंजय मंत्र है।

👉🏻👉🏻यह मृत संजीवनी है। ऋषि मार्कण्डेय को इसी मंत्र ने अल्पायु से जीवन संजीवनी दी थी। यमराज भी उनके द्वार से वापस चले गए थे।

👉🏻👉🏻इस मंत्र के जाप से साधक की अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।
👉🏻👉🏻यदि आपकी कुंडली में किसी भी तरह से मृत्यु दोष या मारकेश है तो इस मंत्र का जाप करें तो उस दोष का प्रभाव कम हो जाएगा।
👉🏻👉🏻कुछ अनिष्ट होने का भय या आशंका हो तो इस मंत्र का जाप कर आप उस अनिष्ट को टाल सकते हैं।
👉🏻👉🏻रोगों से छुटकारा और जीवन में प्रसन्नता की प्राप्ति करने के लिए भी इस मंत्र के जाप से अच्छा कुछ और नहीं है।
👉🏻👉🏻इस मंत्र का जाप आर्थिक परेशानी या आपके व्यापार में घाटा की स्थिति में भी कर सकते हैं।
👉🏻👉🏻किसी भी तरह की महामारी और पारिवारिक कलह, संपत्ति विवाद आदि से बचने के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का एक श्लोक है।शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित ये महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है.स्वयं या परिवार में किसी अन्य व्यक्ति के अस्वस्थ होने पर मेरे पास अक्सर बहुत से लोग इस मन्त्र की और इसके जप विधि की जानकारी प्राप्त करने के लिए आते हैं. इस महामंत्र के बारे में जहांतक मेरी जानकारी है,वो मैं पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ—
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|| महा मृत्‍युंजय मंत्र ||

ॐ त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धन्म। उर्वारुकमिव बन्धनामृत्येर्मुक्षीय मामृतात् !!
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||संपुटयुक्त महा मृत्‍युंजय मंत्र ||

ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!

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||लघु मृत्‍युंजय मंत्र ||

ॐ जूं स माम् पालय पालय स: जूं ॐ। किसी दुसरे के लिए जप करना हो तो-ॐ जूं स (उस व्यक्ति का नाम जिसके लिए अनुष्ठान हो रहा हो) पालय पालय स: जूं ॐ
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कालजयी मंत्र: —

ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥ ( समस्त गृहस्थों के लिए। विशेषकर रोगों से और कष्टों से मुक्ति के लिए)
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रोगों से मुक्ति के लिए बीज मंत्र—

रोगों से मुक्ति के लिए यूं तो महामृत्युंजय मंत्र विस्तृत है लेकिन आप बीज मंत्र के स्वस्वर जाप करके रोगों से मुक्ति पा सकते हैं। इस बीज मंत्र को जितना तेजी से बोलेंगे आपके शरीर में कंपन होगा और यही औषधि रामबाण होगी। जाप के बाद शिवलिंग पर काले तिल और सरसो का तेल ( तीन बूंद) चढाएं।

ॐ हौं जूं सः ( तीन माला) …
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क्या है महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र–

ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ ˜यंबकंयजामहे
ऊँ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ऊँ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम
ऊँ भर्गोदेवस्य धीमहि ऊँ उर्वारूकमिव बंधनान
ऊँ धियो योन: प्रचोदयात ऊँ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात
ऊँ स्व: ऊँ भुव: ऊँ भू: ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ..

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ऋषि शुक्राचार्य ने इस मंत्र की आराधना निम्न रूप में की थी जिसके प्रभाव से वह देव-दानव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए दानवों को सहज ही जीवित कर सकें।

महामृत्युंजय मंत्र में जहां हिंदू धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ऊँ) की शक्तियां शामिल हैं वहीं गायत्री मंत्र प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है। विधिवत रूप से संजीवनी मंत्र की साधना करने से इन दोनों मंत्रों के संयुक्त प्रभाव से व्यक्ति में कुछ ही समय में विलक्षण शक्तियां उत्पन्न हो जाती है। यदि वह नियमित रूप से इस मंत्र का जाप करता रहे तो उसे अष्ट सिदि्धयां, नव निधियां मिलती हैं तथा मृत्यु के बाद उसका मोक्ष हो जाता है।
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संजीवनी मंत्र के जाप में निम्न बातों का ध्यान रखें–

(1) जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं।
(2) मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
(3) इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए।
(4) मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए।
(5) जपकाल के दौरान व्यक्ति को मांस, शराब, सेक्स तथा अन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए। उसे पूर्ण ब्रहमचर्य के साथ रहते हुए अपनी पूजा करनी चाहिए।
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जानिए क्यों नहीं करना चाहिए महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप–

आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। नतीजतन आदमी या तो कुछ सौ जाप करने में ही पागल हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि इसीलिए इसे गुरू के सान्निध्य में सीखा जाता है और धीरे-धीरे अभ्यास के साथ बढ़ाया जाता है। इसके साथ कुछ विशेष प्राणायाम और अन्य यौगिक क्रियाएं भी सिखनी होती है ताकि मंत्र से पैदा हुई असीम ऊर्जा को संभाला जा सके। इसीलिए इन सभी चीजों से बचने के लिए इस मंत्र की साधना किसी अनुभवी गुरू के दिशा- निर्देश में ही करनी चाहिए।
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|| जानिए महा मृत्‍युंजय जप की विधि ||

महा मृत्युंजय मंत्र का पुरश्चरण सवा लाख है और लघु मृत्युंजय मंत्र की 11 लाख है.मेरे विचार से तो कोई भी मन्त्र जपें,पुरश्चरण सवा लाख करें.इस मंत्र का जप रुद्राक्ष की माला पर सोमवार से शुरू किया जाता है.जप सुबह १२ बजे से पहले होना चाहिए,क्योंकि ऐसी मान्यता है की दोपहर १२ बजे के बाद इस मंत्र के जप का फल नहीं प्राप्त होता है.आप अपने घर पर महामृत्युंजय यन्त्र या किसी भी शिवलिंग का पूजन कर जप शुरू करें या फिर सुबह के समय किसी शिवमंदिर में जाकर शिवलिंग का पूजन करें और फिर घर आकर घी का दीपक जलाकर मंत्र का ११ माला जप कम से कम ९० दिन तक रोज करें या एक लाख पूरा होने तक जप करते रहें. अंत में हवन हो सके तो श्रेष्ठ अन्यथा २५ हजार जप और करें.ग्रहबाधा, ग्रहपीड़ा, रोग, जमीन-जायदाद का विवाद, हानि की सम्भावना या धन-हानि हो रही हो, वर-वधू के मेलापक दोष, घर में कलह, सजा का भय या सजा होने पर, कोई धार्मिक अपराध होने पर और अपने समस्त पापों के नाश के लिए महामृत्युंजय या लघु मृत्युंजय मंत्र का जाप किया या कराया जा सकता है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि इस अद्भुत मंत्र का जाप शुभ मुहुर्त में शुरू करना चाहिए। इसके लिए महाशिवरात्रि, श्रावणी सोमवार, प्रदोष (सोम प्रदोश अधिक शुभ है), सर्वार्थ या अमृत सिद्धि योग, मासिक शिवरात्रि (कृष्ण पक्ष चतुर्दशी) अथवा अति आवश्यक होने पर शुभ लाभ या अमृत चौघड़िया में किसी भी दिन शुभ माना जाता है। घातक व जटिल स्थिति में भी यह मंत्र आपकी परेशानियों को समाप्त करता है। इस मंत्र का जाप पूरी श्रद्धा व पवित्र हृदय से करना चाहिए। महामृत्युंजय जप अनुष्ठान शास्त्रीय विधि-विधान से करना चाहिए। मनमाने ढंग से करना या कराना हानिप्रद हो सकता है।
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|| यह हें महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ ||

त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वालायजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देयसुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधितपुष्टि = एक सुपोषित स्थिति,फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णतावर्धनम = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है,स्वास्थ्य, धन, सुख में वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है, और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा मालीउर्वारुकम= ककड़ीइव= जैसे, इस तरहबंधना= तनामृत्युर = मृत्यु सेमुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति देंमा= नअमृतात= अमरता, मोक्ष
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||जानिए महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ ||

समस्‍त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव की हम अराधना करते हैं। विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्‍यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।|| इस मंत्र का विस्तृत रूप से अर्थ ||हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं,उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए.जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं, तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं.
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|| क्या होता हैं महामृत्युंजय मंत्र का प्रभाव ||

मेरे विचार से महामृत्युंजय मंत्र शोक,मृत्यु भय,अनिश्चता,रोग,दोष का प्रभाव कम करने में,पापों का सर्वनाश करने में अत्यंत लाभकारी है.महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना या करवाना सबके लिए और सदैव मंगलकारी है,परन्तु ज्यादातर तो यही देखने में आता है कि परिवार में किसी को असाध्य रोग होने पर अथवा जब किसी बड़ी बीमारी से उसके बचने की सम्भावना बहुत कम होती है,तब लोग इस मंत्र का जप अनुष्ठान कराते हैं.महामृत्युंजय मंत्र का जाप अनुष्ठान होने के बाद यदि रोगी जीवित नहीं बचता है तो लोग निराश होकर पछताने लगे हैं कि बेकार ही इतना खर्च किया।

यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि मेरे विचार से तो इस मंत्र का मूल अर्थ ही यही है कि हे महादेव..या तो रोगी को ठीक कर दो या तो फिर उसे जीवन मरण के बंधनों से मुक्त कर दो.अत: इच्छानुसार फल नहीं मिलने पर पछताना या कोसना नहीं चाहिए.अंत में एक बात और कहूँगा कि महामृत्युंजय मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण न करें और महा मृत्युंजय मन्त्र जपने के बाद में इक्कीस बार गायत्री मन्त्र का जाप करें ताकि महामृत्युंजय मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण होने पर भी पर अनिष्ट होने का भय न रहे.जगत के स्वामी बाबा भोलेनाथ और माता पार्वती आप सबकी मनोकामना पूर्ण करें।
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जानिए क्या रखें महामृत्युंजय मंत्र में रखें सावधानी ….

  1. महामंत्र का उच्चारण शुद्ध रखें
  2. एक निश्चित संख्या में जप करें।
  3. मंत्र का मानसिक जाप करें।
  4. पूरे विधि-विधान और धूप-दीप के साथ जाप करें
  5. रुद्राक्ष की माला पर ही जप करें।
  6. माला को गोमुखी में रखें।
  7. जप काल में महामृत्युंजय यंत्र की पूजा करें।
  8. महामृत्युंजय के जप कुशा के आसन पर बैठकर करें।
  9. जप काल में दुग्ध मिले जल से शिवजी का अभिषेक करते रहें।
  10. महामृत्युंजय मंत्र का जाप पूर्व दिशा की तरफ मुख करके ही करें।

अंक 13 : आज जानें सर्दियों में बेहतर स्वास्थ्य के लिए क्या खाएं, क्या न खाएं

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सर्दियों में जरूर खाएं इन चीजों को, शरीर को देते है ऊर्जा (गर्मी)…
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प्रिय मित्रों/पाठकों, आजकल चल रहे ठंड के मौसम में सर्दी के असर से बचने के लिए लोग गर्म कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन शरीर को चाहे कितने ही गर्म कपड़ों से ढक लिया जाए ठंड से लड़ने के लिए बॉडी में अंदरूनी गर्मी होनी चाहिए। इस मौसम में आप की हड्डियों को गरमाहट देने, आप को सर्दीजुकाम से बचाने और आप के परिवार की प्रतिरक्षण क्षमता बढ़ाने के लिए बहुत से मौसमी फल और सब्जियां उपलब्ध हैं, जिन का सही तरीके से उपयोग कर आप स्वस्थ व फिट भी रह सकते हैं। सर्दी सेहत बनाने का मौसम है। खूब सारे फल आते हैं, पाचन-शक्ति अच्छी होती है और खूब भूख भी लगती है। कहा जाता है कि इस मौसम में पत्थर भी पचाए जा सकते हैं।

शरीर में यदि अंदर से खुद को मौसम के हिसाब से ढालने की क्षमता हो तो ठंड कम लगेगी और कई बीमारियां भी नहीं होंगी। यही कारण है कि ठंड में खानपान पर विशेष रूप से ध्यान देने को आयुर्वेद में बहुत महत्व दिया गया है। सर्दियों में यदि खानपान पर विशेष ध्यान दिया जाए तो शरीर संतुलित रहता है और सर्दी कम लगती है।

👉🏻👉🏻तिल–
सर्दियों के मौसम में तिल खाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है। तिल के तेल की मालिश करने से ठंड से बचाव होता है। तिल और मिश्री का काढ़ा बनाकर खांसी में पीने से जमा हुआ कफ निकल जाता है। तिल में कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं जैसे, प्रोटीन, कैल्शियम, बी कॉम्प्लेक्स और कार्बोहाइट्रेड आदि। प्राचीन समय से खूबसूरती बनाए रखने के लिए तिल का उपयोग किया जाता रहा है।तिल्ली और गुड़ के लड्डू सर्दी से बचाव के लिए बेहतरीन उपाय माना जाता है। ठंड के मौसम में सूखे मेवे, बादाम आदि का सेवन भी लाभदायक होता है। या तो इन्हें भिगोकर खाएं या दूध में मिलाकर या फिर सूखे मेवों का दरदरा पावडर-सा बना लें और इसे दूध में मिलाकर प्रोटीन शेक-सा बना लें।

👉🏻👉🏻👉🏻 बादाम—
बादाम कई गुणों से भरपूर होते हैं। इसका नियमित सेवन अनेक बीमारियों से बचाव में मददगार है।अक्सर माना जाता है कि बादाम खाने से याददाश्त बढ़ती है, लेकिन यह ड्राय फ्रूट अन्य कई रोगों से हमारी रक्षा भी करता है। इसके सेवन से कब्ज की समस्या दूर हो जाती है, जो सर्दियों में सबसे बड़ी दिक्कत होती है। बादाम में डायबिटीज को निंयत्रित करने का गुण होता है। इसमें विटामिन – ई भरपूर मात्रा में होता है।

👉🏻👉🏻 अदरक–
क्या आप जानते हैं कि रोजाना के खाने में अदरक शामिल कर बहुत सी छोटी-बड़ी बीमारियों से बचा जा सकता है। सर्दियों में इसका किसी भी तरह से सेवन करने पर बहुत लाभ मिलता हैै। इससे शरीर को गर्मी मिलती है और डाइजेशन भी सही रहता है।

👉🏻👉🏻शहद–
शरीर को स्वस्थ, निरोग और उर्जावान बनाए रखने के लिए शहद को आयुर्वेद में अमृत भी कहा गया है। यूं तो सभी मौसमों में शहद का सेवन लाभकारी है, लेकिन सर्दियों में तो शहद का उपयोग विशेष लाभकारी होता है। इन दिनों में अपने भोजन में शहद को जरूर शामिल करें। इससे पाचन क्रिया में सुधार होगा और इम्यून सिस्टम पर भी असर पड़ेगा।

👉🏻👉🏻👉🏻आधिकाँश घरों में पारंपरिक तौर पर सर्दियों के लिए मेवे के लड्डू बनाए जाते हैं। आटे, बेसन या फिर उड़द या मूंग की दाल के आटे से लड्डू बनाए जाते हैं। गुजरात में उड़द की दाल के आटे से बने लड्डुओं को अड़दिया कहा जाता है, जबकि पंजाब में इन्हें दाल की पिन्नियों के नाम से जाना जाता है।
👉🏻👉🏻ओमेगा 3 फैटी एसिड–
सर्दियों में ओमेगा – 3 फैटी एसिड सबसे अच्छा फूड होता है। यह मुख्य रूप से मछलियों में पाया जाता है। सर्दियों में दिनों में मछली का सेवन करें, इससे शरीर को गर्मी मिलती है। इसमें जिंक भरपूर मात्रा में होता है है। इसलिए यह शरीर का इम्युनिटी पॉवर बढ़ाता है व बीमारियों को दूर रखता है।

👉🏻👉🏻👉🏻 मूंगफली—
100 ग्राम मूंगफली के भीतर ये तत्व मौजूद होते हैं: प्रोटीन- 25.3 ग्राम, नमी- 3 ग्राम, फैट्स- 40.1 ग्राम, मिनरल्स- 2.4 ग्राम, फाइबर- 3.1 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट- 26.1 ग्राम, ऊर्जा- 567 कैलोरी, कैल्शियम – 90 मिलीग्राम, फॉस्फोरस 350 मिलीग्राम, आयरन-2.5 मिलीग्राम, कैरोटीन- 37 मिलीग्राम, थाइमिन- 0.90 मिलीग्राम, फोलिक एसिड- 20मिलीग्राम। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन, मिनिरल्स आदि तत्व इसे बेहद फायदेमंद बनाते हैं। यकीनन इसके गुणों को जानने के बाद आप कम से कम इस सर्दियों में मूंगफली से टाइमपास करने का टाइम तो निकाल ही लेंगे।
👉🏻👉🏻👉🏻डाइट एक्सपर्ट यह मानते हैं कि सर्दियों में देशी घी का उपयोग किया जाना चाहिए।
👉🏻👉🏻👉🏻मधुमेह के रोगियों को चीनी का सेवन नियंत्रित रूप से करना चाहिए. उन्हें रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट के सेवन से बचना चाहिए और कौंप्लैक्स कार्बोहाइड्रेट का सेवन करना चाहिए. यानी साबूत गेहूं, जई और मल्टीग्रेन आटे का इस्तेमाल करना उन की सेहत के लिए फायदेमंद होता है।

👉🏻👉🏻👉🏻 सब्जियां—
अपनी खुराक में हरी सब्जियों का सेवन करें। सब्जियां, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है और गर्मी प्रदान करती है। सर्दियों के दिनों में मेथी, गाजर, चुकंदर, पालक, लहसुन बथुआ आदि का सेवन करें। इनसे इम्यून सिस्टम मजबूत होता है।

👉🏻👉🏻 रसीले फल न खाएं–
सर्दियों के दिनों में रसीले फलों का सेवन न करें। संतरा, रसभरी या मौसमी आपके शरीर को ठंडक देते है। जिससे आपको सर्दी या जुकाम जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
👉🏻👉🏻सर्दियों में हरी सब्जियों व अन्य फलों और सब्जियों के सेवन से शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर भी सही मात्रा में बना रहता है.

👉🏻👉🏻पानी और तरल पदार्थों का सेवन पर्याप्त मात्रा में करना चाहिए और बच्चों व बुजुर्गों को ठंडी चीजों जैसे आइसक्रीम आदि के सेवन से बचना चाहिए.

👉🏻👉🏻👉🏻जो लोग सर्दियों में वजन कम करना चाहते हैं, उन्हें वसा और तेल युक्त पदार्थों जैसे परांठों का सेवन नहीं करना चाहिए. उन के आहार में फाइबर, फलों, सलाद और तरल पदार्थों की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए. अनाज, मल्टीग्रेन आटा, ब्राउन ब्रैड और उच्च फाइबर से युक्त बिस्कुट भी वजन कम करने में मददगार होते हैं.

👉🏻👉🏻अमरूद, गाजर, सेब, हरी पत्तेदार सब्जियां, कच्चे फल, संतरा और खीरा फायदेमंद होते हैं और घर में बने टमाटर, मिलीजुली सब्जियों और हरी पत्तेदार सब्जियों के सूप हमेशा बाजार में मिलने वाले पैक्ड सूप से बेहतर होते हैं.

👉🏻👉🏻 बाजरा—
कुछ अनाज शरीर को सबसे ज्यादा गर्मी देते है। बाजरा एक ऐसा ही अनाज है। सर्दी के दिनों में बाजरे की रोटी बनाकर खाएं। छोटे बच्चों को बाजरा की रोटी जरूर खाना चाहिए। इसमें कई स्वास्थ्यवर्धक गुण भी होते है। दूसरे अनाजों की अपेक्षा बाजरा में सबसे ज्यादा प्रोटीन की मात्रा होती है। इसमें वह सभी गुण होते हैं, जिससे स्वास्थ्य ठीक रहता है। ग्रामीण इलाकों में बाजरा से बनी रोटी व टिक्की को सबसे ज्यादा जाड़ो में पसंद किया जाता है। बाजरा में शरीर के लिए आवश्यक तत्व जैसे मैग्नीशियम,कैल्शियम,मैग्नीज, ट्रिप्टोफेन, फाइबर, विटामिन- बी, एंटीऑक्सीडेंट आदि भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
👉🏻👉🏻ठंड के मौसम में अपने खाने में आंवले को शामिल करें। सीधे नहीं खा सकते हैं तो या तो मुरब्बे के तौर पर या फिर किसी और तरह से हर दिन के खान-पान में इस्तेमाल करें। यदि आप डाइट चार्ट का पालन कर रहे हैं तो फिर आंवला मुरब्बा लेने की बजाय किसी और रूप में लें।

इसके साथ ही अजवाइन भी शरीर को गर्मी देने का अच्छा स्रोत है। इससे भी आप कोल्ड एंड फ्लू से बचाव कर सकते हैं। गुड़ और शहद भी सर्दियों के दिनों में अच्छा माना जाता है।

👉🏻👉🏻विशेष सावधानी रखें खाने में —
(क्या न खाएं)

आप को नमक एवं चीनी का ज्यादा सेवन करने के साथ साथ तेल एवं मसाले युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन से भी बचना चाहिए. अपने आहार की योजना कुछ इस तरीके से बनाएं कि अगर आप कुछ हैवी या स्पैशल खाना चाहते हैं, तो उसे दोपहर के भोजन के समय खाएं ताकि दिन की गतिविधियों के दौरान अतिरिक्त कैलोरीज बर्न हो जाएं. उस दिन नाश्ते को हलका और रात के भोजन में जहां तक हो सके कम कैलोरीज का सेवन करें।

अंक 12 : जानिए कब मिलेगा आपको वाहन सुख ?
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प्रिय मित्रों/पाठकों, ज्योतिषीय दृष्टि से विचार करें तो जन्म के समय जिस भाव, राशि एवं स्थिति में ग्रह जन्म कुण्डली में विराजते हैं उसी आधार पर यह निर्धारित होता है कि व्यक्ति को कब और किस श्रेणी का वाहन सुख मिलेगा।
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि किसी भी जातक की जन्म कुण्डली में चतुर्थ भाव से वाहन-कार, मोटरगाड़ी आदि के बारे में विचार किया जाता है।
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चतुर्थ भाव को सुख का स्थान माना जाता है। वाहन का कारक ग्रह शुक्र है। किसी व्यक्ति को वाहन सुख मिलेगा अथवा नहीं उसमें शुक्र, चतुर्थ भाव एवं चैथे घर के स्वामी ग्रह की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। चतुर्थ भाव के कारक ग्रह चन्द्र एवं बुध हैं। यदि इनकी स्थिति भी कुण्डली में अच्छी हो सोने पर सुहागा-अर्थात् उत्तम शुभ फल की प्राप्ति होती है। भाग्य भाव एवं आय भाव भी इस संदर्भ में विचारणीय होते हैं।
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पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी जातक को वाहन सुख तभी सम्भव है जब जातक की जन्म कुण्डली में एकादश भाव में चतुर्थेश बैठा हो एवं लग्न में शुभ ग्रह विराजमान हो तो लगभग 12 से 15 वर्ष के पश्चात वाहन सुख पाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यही फल तब भी मिलता है ।
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जब चतुर्थ भाव का स्वामी नीच राशि में बैठा हो एवं लग्न में शुभ ग्रह की स्थिति हो। ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जब चतुर्थेश उच्च राशि में शुक्र के साथ हो तथा चैथे भाव में सूर्य विराजमान हो तब 30 वर्ष के पश्चात वाहन सुख मिलने की संभावना रहती है।

👉🏻👉🏻लग्नेश तथा चतुर्थेश एक साथ लग्न, चतुर्थ या नवम भाव में हों तो इन्हीं ग्रहों की दशा अथवा अंतर्दशा में वाहन की प्राप्ति होती है।

👉🏻👉🏻जिन लोगों की जन्म कुण्डली में दशम भाव का स्वामी चतुर्थ के साथ युति बनाता है और दशमेश अपने नवमांश में उच्च का होता है उन्हें देर से वाहन सुख पाने का सौभाग्य मिलता है।

👉🏻👉🏻जब चतुर्थेश कुण्डली में स्वराशि में हो, मित्र राशि मे हो, मूल त्रिकोण में हो अथवा उच्च राशि मे हों तथा चतुर्थ भाव पाप प्रभाव से मुक्त हो तब चतुर्थेश अथवा शुक्र में जो बलवान होगा वह गोचर में जब लग्न अथवा त्रिकोण में भ्रमण करेगा तब प्रयास करने पर वाहन सुख प्राप्त किया जा सकता है।

👉🏻👉🏻पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि चतुर्थेश छठवें, आठवें अथवा बारहवें भाव में बैठा हो या अस्त या शत्रु ग्रहों या नीच राशिगत हो तो जातक के वाहन में स्थिरता नहीं होती, वाहन बिगड़ता रहता है।

👉🏻👉🏻जन्म कुण्डली में यदि चतुर्थेश लग्नेश के घर में हो तथा लग्नेश चतुर्थेश के घर में तो इन दोनों के बीच राशि परिवर्तन योग बनता है। इस योग के शुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को वाहन सुख की प्राप्ति होती है। चैथे घर का स्वामी ग्रह तथा नवम भाव का स्वामी ग्रह लग्न स्थान में युति बनाएं तो इस योग को वाहन सुख के लिए अच्छा माना जाता है। यह ग्रह स्थिति व्यक्ति के भाग्य को प्रबल बनाती है और उसे वाहन सुख मिलता है।
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पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यद्यपि चतुर्थ भाव सुख का भाव होता है और शुक्र सांसारिक सुख प्रदान वाला ग्रह माना जाता है, तथापि चतुर्थेश एवं शुक्र की युति चतुर्थ भाव में होने पर अच्छा परिणाम प्राप्त नहीं होता है। इस स्थिति में व्यक्ति सामान्य श्रेणी की बाईक अथवा छोटी कार से ही संतुष्ट होना पड़ता है।

शुक्र एवं चतुर्थेश के इस सम्बन्ध पर यदि पाप ग्रह की दृष्टि हो अथवा किसी प्रकार प्रभावित कर रहे हो तो वाहन सुख का अभाव भी हो सकता है।

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जब द्वितीयेश लग्न में हो दशमेश धनभाव में हो और चतुर्थ भाव में उच्च राशि का ग्रह हो तो उत्तम वाहन मिलता है।

जब लग्नेश, चतुर्थेश तथा नवमेश के परस्पर केन्द्र में रहने से वाहन सुख मिलता है।
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जब कुण्डली में नवम, दशम अथवा एकादश भाव में शुक्र के साथ चतुर्थेश की युति होने पर बहुत ही अच्छा वाहन प्राप्त होता है। वाहन सुख मिलने में इन ग्रहों की भूमिका बहुत प्रभावी होती है।

यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि चतुर्थेश का सम्बन्ध शनि के साथ हो अथवा शनि शुक्र की युति हो तो वाहन सुख प्राप्ति हेतु अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है अथवा शारीरिक मेहनत से चलने वाला वाहन ही मिलता है।

👉🏻👉🏻चतुर्थेश की दशा-अंतर्दशा में भी वाहन सुख का योग बनता है। यदि चतुर्थेश बली हो, तो व्यक्ति के कार खरीदने के योग बनते हैं।

👉🏻👉🏻 जब लग्नेश का संबंध चतुर्थ भाव एवं चतुर्थेश से हो, तो उसकी दशा-अंतर्दशा में वाहन सुख प्राप्त होता है।

👉🏻👉🏻जब चतुर्थेश उच्च राशि में हो, तो उसकी महादशा में अनेक वाहनों की प्राप्ति होती है।

👉🏻👉🏻 जब चतुर्थेश बली हो, तो चतुर्थेश के नक्षत्र में स्थित ग्रह की दशाओं में वाहन सुख का पूर्ण योग बनता है। जैसे कुंभ लग्न की कुंडली में चतुर्थेश शुक्र चतुर्थ भाव में स्वराशि में स्थित हो तथा शनि यदि शुक्र के नक्षत्र में हो, तो शनि की दशाओं में जातक को वाहन सुख अवश्य मिलता हें।
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जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव को सुख का स्थान माना जाता है और शुक्र को वाहन सुख का कारक। किसी व्यक्ति को वाहन सुख मिलेगा या नहीं, यह जानने के लिए शुक्र और चौथे भाव के स्वामी ग्रह की स्थिति का अध्ययन किया जाता है। भाग्य एवं आय भाव भी वाहन सुख के लिए महत्वपूर्ण हैं।
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ग्रहों की स्थिति और वाहन सुख कुंडली में यदि चतुर्थेश (चतुर्थ भाव का स्वामी) लग्न में हो तथा लग्नेश (लग्न भाव का स्वामी) चतुर्थ भाव में हो तो इन दोनों के बीच राशि परिवर्तन योग बनेगा। इस योग के शुभ प्रभाव से व्यक्ति को मनचाहे वाहन का सुख मिलता है।
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चौथे घर का स्वामी और नवम भाव का स्वामी लग्न में युति बनाएं तो यह वाहन सुख के लिए इस अच्छा योग माना जाता है। इस ग्रह स्थिति में व्यक्ति का भाग्य प्रबल होता है, जो उसे वाहन सुख दिलाता है।
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ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रचलित ज्योतिषीय मान्यता है कि गोचर में जब कभी चैथे भाव का स्वामी, नवम, दशम अथवा एकादश भाव के स्वामी के साथ चर राशि में युति सम्बन्ध बनाता है, उस समय वाहन सुख की प्राप्ति आवश्यक रूप से होती है। लेकिन इस शुभ ग्रह स्थिति को पाप ग्रह किसी प्रकार प्रभावित कर रहे हों अथवा उनकी दृष्टि पड़ रही हो तो वाहन सुख मिलना कठिन हो जाता है।
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जब चतुर्थेश, शनि, गुरू एवं शुक्र के साथ नवम भाव में हो तथा नवमेश किसी केन्द्र या त्रिकोण में हो तो बहुवाहन का योग होता है।

👉🏻👉🏻जब लग्नेश चतुर्थ-नवम या एकादश भाव में हो तो जातक अनेक वाहनों का स्वामी होता है।

👉🏻👉🏻चतुर्थेश तथा नवमेश लाभ भाव में हों या इन दोनों की दृष्टि चतुर्थ भाव पर हो तो जातक को कई वाहनों का सुख प्राप्त होता है।

👉🏻👉🏻 इनके अलावा निम्न स्थितियों में भी वाहन सुख संभव होता है—
(क) चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हो तथा चन्द्र से तृतीय शुक्र हो।
(ख) चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हो तथा शुक्र से तृतीय चन्द्र हो।
(ग) चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हो तथा चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो।
(घ) चतुर्थ स्थान पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तथा चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो।

अंक 11 : आज जानिए कुंडली में राहू (RAHU ) ग्रह से बनने वाले 21 विशेष शुभ अशुभ योग और प्रभावों के बारे मेें

राहु एक विच्छेदात्मक ग्रह है, जब इसका प्रभाव सप्तम भाव से संबंधित बातों पर पड़ता है यथा, सप्तम भाव, सप्तमभाव के स्वामी व शुक्र पर पड़ता है तो, यह प्रभाव जातक के विवाह में विलम्ब, जात्येतर सम्बन्ध, अलगाव, व तलाक की और संकेत करता है। यदि राहू के साथ शनि और सूर्य का प्रभाव भी सप्तम भाव से संबंधित घटकों पर हो अशुभ फलों में और तीव्रता आ जाती है। यदि किसी कुंडली में राहू , शनि की युति होतो शनि का प्रभाव दुगना हो जाता है।
१. यदि मेष, वृषभ, या कर्क राशि का राहू तीसरे, षष्ठ अथवा एकादश भाव मे हो तो, यह राहू अनेक अशुभ फलों का नाश कर देता है।
२. यदि राहू केंद्र , त्रिकोण १, ४, ७, १०, ५, ९ वे भाव में हो और केन्द्रेश या त्रिकोणेश से सम्बन्ध रखता हो तो यह राज योग प्रदान कर देता है।
३. यदि १० वे भाव में राहू होतो, यह राहू नेतृत्व शक्ति प्रदान करता है।
४. यदि सूर्य, चन्द्र के साथ राहू होतो, यह राहू इनकी शक्ति को कम करता है।
६. जिस जातिका के पंचम भाव में राहू होता है , उस जातिका का मासिक धर्म अनियमित होता है, जिस कारण से जातिका को संतान होने में परेशानी हो सकती है।
७. यदि पंचम भाव में कर्क, वृश्चिक अथवा मीन राशि हो और उसमे राहू, शुक्र की युति होतो, वह जातिका प्रेम जाल में फंस जाती है।
८. य़दि पंचम भाव में राहू, शुक्र की युति हो तो, वह जातिका यौन रोग , अथवा प्रसव सम्बंधित रोगों से ग्रसित होती है।
९. यदि अष्टम भाव में मेष, कर्क, वृश्चिक, या मीन राशि हो और उसमे राहू स्थित होतो, जातिका की शल्य क्रिया अवश्य होती है।
१०. सप्तम भाव में राहू, शनि, तथा मंगल की युति होतो, दाम्पत्य जीवन कष्टमय होता है।
११. यदि ८ वे भाव में शनि, राहू, व मंगल होतो, उस जातिका/ जातक के ८०%तलाक की संभावना होती है। अथवा जीवन भर वैचारिक मतभेद रहते है।
१२. यदि मेष, या वृश्चिक राशि में ८ वे भाव में या २ रे भाव में राहू पाप ग्रह से युत अथवा दृष्ट होतो, जातिका का दाम्पत्य जीवन कष्टमय होता है।
१३. यदि पंचम भाव में राहू मेष या वृश्चिक राशि का हो अथवा मंगल की दृष्टि हो तो , उस जातिका की संतान की हानि होती है।
१४. यदि राहू , गुरू की युति होतो, जातिका का एक बार गर्भपात होता है।
१५. सप्तम भाव में स्थित राहू दाम्पत्य जीवन को कष्टमय कर देता है।
१६. यदि २ रे भाव में धनु राशि का राहू होतो, जातिका धनवान हो जाती है।
१७. एकादश भाव में राहू , शुक्र की युति हो तो जातिका का दाम्पत्य जीवन बहुत दुःखी होता है।
१८. यदि शुक्र अथवा गुरू पर राहू की दृष्टि होतो, जातिका अंतर्जातीय एवं प्रेम विवाह करती है।
१९. यदि २ रे या पंचम भाव में राहू होतो , उस जातिका का विवाह बहुत कठिनाई से होता है।
२० यदि ८ वे भाव या ११ वे भाव में राहू होतो, उस जातिका का विवाह तो हो जाता है , किन्तु दाम्पत्य जीवन कष्टप्रद होता है। अथवा अलगाव/तलाक की आशंका अधिक होती है।
२१. राहू की दृष्टि सप्तम भाव , सप्तमेश, मंगल, व शुक्र पर होतो, ऐसी जातिका अंतर्जातीय विवाह करती है।

अंक 10 : आज शनिवार को जानिए आखिर क्यों चढ़ाया जाता हैं सरसों का तेल ही, शनिदेव को ?

प्रिय मित्रों/पाठकों, हमारे धर्म शास्त्रों में शनि ग्रह को अति क्रूर कहा गया है। अशुभ शनि व्यक्ति का जीवन दुखों व असफलताओं से भर देता है। ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शनि के कुप्रभाव से बचने के लिए हनुमान साधना को श्रेष्ठ कहा गया है। ग्रहों में शनिदेव को कर्मों का फल देना वाला ग्रह माना गया है। शनिदेव एकमात्र ऐसे देव हैं जिनकी पूजा लोग डर की वजह से करते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है शनि देव न्‍याय के देवता हैं जो इंसान को उसके कर्म के हिसाब से फल देते हैं।

शनिवार का दिन शनि देव को समर्पित होता है। इस दिन हर जगह शनि देव की विशेष पूजा का विधान है। हिंदू धर्म में शनि देव को प्रसन्‍न करने के लिए सबसे शुभ दिन शनिवार का ही माना जाता है। शनिवार के दिन शनि देव का प्रसन्‍न करने के लिए मंदिरों में और जगह-जगह पर शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाया जाता है। आपने देखा होगा कि एक बाल्‍टी में शनि देव की तस्‍वीर को सरसों के तेल में आधी डुबोकर रखा जाता है।

शनिवार के दिन शनिदेव को तेल चढ़ाने के लिए मंदिर के बाहर लंबी लाइन देखने को मिलती है।

मान्‍यता है कि शनि देव को तेल चढ़ाने से उनकी पीड़ा कम हो जाती है और फिर वे अपने भक्‍त की पीड़ा को भी कम कर देते हैं। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि शनि देव को तेल चढ़ाने से जीवन की सभी परेशानियों से छुटकारा मिलता है। आर्थिक समस्‍याओं से जूझ रहे लोगों को भी शनिवार के दिन शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाना चाहिए।

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि कोई व्‍यक्‍ति शनि की साढ़ेसाती अथवा ढैय्या से गुज़र रहा है तो उसे भी शनिवार के दिन शनि देव की पूजा करनी चाहिए और उन्‍हें शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाना चाहिए।

शनिदेव को न्याय का देवता माना जाता है। शनिदेव की कृपा से रंक भी राजा बन जाता है, और उन्हीं की दृष्टि से राजा को रंक बनते ज़रा भी देर नहीं लगती। श्रद्धालु शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के उपाय और पूजा-अर्चना करते हैं। अपने विभिन्न प्रयत्नों से सभी शनिदेव को प्रसन्न व शांत रखने का प्रयास करते हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शनिदेव पीपल के वृक्ष के नीचे वास करना पसंद करते हैं, यदि वजह है कि आपको शनिदेव के अधिकांश मंदिर पीपल के पेड़ नीचे ही मिलेंगे।

क्या आप यह जानते हैं कि शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाने की परंपरा कब से शुरु हुई।
आइए जानें शनिदेव को तेल चढ़ाने का कारण और इसकी कथा…

पहली कथा का संबंध है रावण—

प्राचीन कथा के अनुसार रावण ने शनिदेव को कैद कर रखा था। जब हनुमान जी देवी सीता को ढूंढते हुए लंका गए तो उन्होंने वहां शनिदेव को रावण की कैद में देखा। रामभक्त हनुमान को देखकर शनिदेव ने उन्हें रावण की कैद से आजाद करवाने की प्रार्थना की। शनिदेव की प्रार्थना सुनकर हनुमान जी ने उन्हें लंका से कहीं दूर फेंक दिया ताकि शनिदेव कहीं सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाएं। जब हनुमान जी ने शनिदेव को फेंका तो उन्हें बहुत सारे घाव हो गए। शनिदेव की पीड़ा को देखते हुए हनुमान जी ने उनके घावों पर सरसों का तेल लगाया। जिससे उन्हें काफी आराम मिला और कुछ ही देर में उनका दर्द खत्म हो गया। तब से शनिदेव को तेल चढ़ाने की परंपरा शुरु हो गई।
दूसरी कथा के अनुसार शनिदेव और हनुमानजी में हुआ था युद्ध–

एक बार शनि देव को अपने बल और पराक्रम पर घमंड हो गया था. लेकिन उस काल में भगवान हनुमान के बल और पराक्रम की कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई थी. जब शनि देव को भगवान हनुमान के बारे में पता चला तो वह भगवान हनुमान से युद्ध करने के लिए निकल पड़े. जब भगवान शनि हनुमानजी के पास पहुंचे तो देखा कि रुद्रावतार भगवान हनुमान एक शांत स्थान पर अपने स्वामी श्रीराम की भक्ति में लीन बैठे है।
तभी घमंड से भरे शनि देव ने हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारा। शनि की चुनौती का विनम्रता से जवाब देते हुए हनुमान जी ने श्री राम की साधना में व्यस्त होने का तर्क दिया। जिससे शनि क्रोधित होकर हनुमान से युद्ध करने की जिद पर अड़ गए। इस पर हनुमान जी ने शनि देव को अपनी पूंछ में लपेटकर बांध दिया। शनि के प्रहार करने पर पवन पुत्र ने शनिदेव को पत्थरों पर पटक कर घायल करके उन्हें परास्त किया। शनिदेव ने हनुमान जी से माफी मांग कर प्रणाम किया।

हनुमान जी ने शनिदेव का दर्द दूर करने के लिए उनके घावों पर तेल लगाया। शनि ने हनुमान जी को उनके भक्त को परेशान न करने का वचन दिया।
विशेष सावधानी—

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की गलती से भी शनिवार के दिन सरसों का तेल कभी नहीं खरीदना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार शनिवार के दिन तेल व सरसों का दान किया जाता है। इसलिए सरसों का तेल खरीदना शुभ नहीं माना जाता। शनिवार को कुछ लोग शनि मंदिर के सामने दुकान लगाए लोगों से तेल का दीपक खरीदते हैं और उसे शनिदेव के आगे जलाकर उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जाने-अंजाने में ही सही लेकिन शनिवार को सरसों का तेल खरीद लेते हैं। जो कि हमारे लिए शुभ नहीं होता और हमारे लिए परेशानी का कारण बन सकता है। यदि आपको मंदिर में दीपक लगाना है तो घर से ही तेल का दीपक लेकर जाएं।
आजकल ज्यादातर लोग मंदिर के बाहर से ही तेल खरीद कर शनिदेव को अर्पित करते हैं और मानते हैं कि ऐसा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं, लेकिन पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ऐसा करना बहुत गलत है और इससे शनिदेव की कृपा मिलने के बजाए विपरीत प्रभाव पड़ सकते हैं। तो चलिए, एक नज़र डालते हैं कुछ ऐसी ही चीजों पर जो हम अनजाने में कर जाते हैं, लेकिन वह किसी भी प्रकार से शुभ फल देने वाले नहीं होते हैं।

गलती से नही खरीदें शनिवार के दिन को इन वस्तुओं (चीजों) को…

👉🏻👉🏻👉🏻शनिवार को नमक खरीदने से कर्ज चढ़ने या फिर बढ़ने की संभावना रहती है। अगर आपको नमक खरीदना है तो बेहतर होगा शनिवार के बजाय किसी और दिन खरीदें।
👉🏻👉🏻👉🏻शनिवार को काले तिल कभी न खरीदें इस दिन काले तिल खरीदने से कार्यों में बाधा आती है। इसके बजाए एक दिन पहले काले तिल खरिद कर रख लें क्योंकि काले तिल चढ़ाने से शनिदेव प्रसन्‍न होते हैं और कई विपत्तियों से भी निकालते हैं।
👉🏻👉🏻👉🏻पढ़ाई-लिखाई से संबंधीत चीजें, जैसे कागज, पेन और इंक पॉट आदि खरीदने के लिए भी शनिवार का दिन शुभ नहीं माना जाता। विशेष तौर पर शनिवार को स्याही न खरीदें, यह मनुष्य को अपयश का भागी बनाती है।
👉🏻👉🏻👉🏻शनिवार के दिन कैंची कभी नहीं खरीदना चाहिए। इस दिन खरीदी गई कैंची रिश्तों में तनाव लाती है। शनिवार के अलावा किसी भी दिन आप कैंची खरीद सकते हैं।

👉🏻👉🏻👉🏻 अगर आपको काले रंग के जूते खरीदने हैं तो शनिवार को न खरीदें। माना जाता है कि शनिवार को खरीदे गए काले जूते पहनने वाले को कार्य में असफलता प्राप्त होती है।
👉🏻👉🏻👉🏻शनिवार को किसी गरीब का अपमान न करें। शनिदेव गरीबों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस कारण जो लोग गरीबों का अपमान करते हैं, गरीबों को परेशान करते हैं, शनि उनके जीवन में परेशानियां बढ़ा देता है।
👉🏻👉🏻👉🏻ध्यान रखें किसी बाहरी व्यक्ति से जूते-चप्पल उपहार में न लें। शनिवार को जूते-चप्पल का दान किसी गरीब को करेंगे तो शनि के दोष दूर हो सकते हैं।
👉🏻👉🏻👉🏻शनिवार को घर में लोहा या लोहे से बनी चीज लेकर नहीं आना चाहिए। इस दिन लोहे की चीजों का दान करना चाहिए।
👉🏻👉🏻👉🏻जिन लोगों के कर्म गलत होते हैं, उनके लिए शनि अशुभ हो जाता है। शनि के अशुभ होने से किसी भी काम में आसानी से सफलता नहीं मिल पाती है, साथ ही घर-परिवार में परेशानियां बढ़ सकती हैं। शनिवार का कारक शनि है और विशेष रूप से इस दिन ऐसे कामों से बचना चाहिए, जिनसे कुंडली में शनि अशुभ हो सकता है।

अंक 9 : घर में लगाएं दौड़ते हुए घोड़ों की फोटो ? जानें क्या है वास्तु अनुसार बहुत हैं इसके लाभ

प्रिय मित्रों/पाठकों, आज के प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर कोई सफलता पाना चाहता है, लेकिन मेहनत के बाद भी सफल नहीं हो पाता है। इसका ये अर्थ नहीं होता है कि उस व्यक्ति की मेहनत में किसी तरह की कमी है।
जीवन में सफलता हासिल करने के लिए सबसे जरूरी होता है इंसान को ऊर्जावान होना. स्वस्थ होना।

अगर आप ऊर्जा से भरपूर हैं और आपमें कार्य करने की क्षमता प्रबल है तो सफलता आपके कदम चूमेगी, इसमें कोई दो राय नहीं।वास्तुशास्त्र में बुरी शक्तियों को नकारात्मक उर्जा और अच्छी शक्ति को सकारात्मक उर्जा के रुप में देखा जाता है। उर्जा का प्रवाह जिस तरह से व्यक्ति और उसके घर पर होता है उसका असर व्यक्ति के स्वास्थ्य, सुख और धन पर भी होता है। वास्तुविज्ञान में कुछ ऐसे नियम हैं जिनका पालन किया जाए तो हम नकारात्मक उर्जा के प्रभाव को अपने से दूर करके सकारात्मक उर्जा से लाभ उठा सकते हैं।

कभी-कभी किसी ग्रह नक्षत्र और वास्तु ठीक ना होने के कारण में किसी क्षेत्र में सफलता नहीं मिल पाती है इसलिए वास्तुशास्त्र और ज्योतिष शास्त्र में कुछ उपाय दिए गए हैं जिन्हें अपनाने से जीवन में और करियर के क्षेत्र में मेहनत के साथ सफलता भी मिलने लगती है। इसके लिए आज हम आपके लिए वास्तु का एक उपाय लेकर आए हैं जिसे अपनाने से करियर में सफल होने लगते हैं।

👉🏻वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि वास्तु के अनुसार अगर आप अपने घर या दफ्तर में दौड़ते हुए घोड़े की तस्वीर लगाते हैं, तो यह आपके कार्य में गति प्रदान करता है. दौड़ते हुए घोड़े सफलता, प्रगति और ताकत के प्रतीक होते हैं. खासकर 7 दौड़ते हुए घोड़े व्यवसाय की प्रगति का सूचक माने गए हैं, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार 7 अंक सार्वभौमिक है, प्राकृतिक है।

👉🏻👉🏻वास्तुविद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ध्यान देने वाली बात है कि इंद्रधनुष के रंग 7 होते हैं, सप्त ऋषि, शादी में सात फेरे, सात जन्म इत्यादि इसलिए 7 नंबर को प्रकृतिक और सार्वभौमिक माना गया है।

👉🏻👉🏻इसलिए सात घोड़ों की तस्वीर को सर्वोतम माना गया है।

👉🏻👉🏻अगर सात घोड़े के रथ पर सवार सूर्य देव हों तब यह तस्वीर और भी शुभ फलदायी होती होती है। इन तस्वीरों के घर में कहीं भी लगाने से आपको शुभ फल नहीं मिलता है।घोड़े की तस्वीर लगाने के लिए पूर्व दिशा को शुभ माना गया है।

👉🏻👉🏻दौड़ते हुए घोड़ों की तस्वीर, पोस्टर या कोई मूर्ति घर की उत्तर दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। इसे लगाने से ही प्रोमोशन जल्दी होता है। इसके साथ ही जीवन में धन लाभ के योग बनने लगते हैं।
👉🏻👉🏻इसके साथ ही अगर जीवन में नाम, यश और सम्मान पाना चाहते हैं तो घर की दक्षिण दिशा में दौड़ते हुए घोड़ों की तस्वीर लगा सकते हैं। इसके साथ सकारात्मकता आती है और इसके बाद जीवन में भी तरक्की आती है और किसी काम के लिए तारीफ मिल सकती है। यदि घर में किसी कारण से दक्षिण दिशा में घोड़ों की मूर्ति नहीं रख पा रहें हैं तो घर की खिड़की के सामने दौड़ते हुए घोड़े की मूर्ति या तस्वीर रखें। मूर्ति को ऐसे रखें कि घोड़े का मुंह खिड़की से बाहर देख रहा हो। इससे नाम,यश और मान-सम्मान की प्राप्ति होने लगेगी।

👉🏻👉🏻आपके घर में यदि पहले से ही दौड़ते घोड़ों की तस्वीर या मूर्ति है तो इसके लिए एक बात हमेशा अपने ध्यान में रखें कि इन घोड़ों पर किसी तरह की रस्सी ना बंधी हो। यदि इस तरह से आपके घर में पोस्टर या तस्वीर है तो इससे घर में आने वाले धन-धान्य पर रोक लगती है। इसके साथ एक बात ध्यान रखें कि कभी किसी एक घोडे़ की फोटो या तस्वीर ना लगाएं, ये आपके घर में धन आने से रोकता है।

👉🏻👉🏻वास्तुविद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दौड़ते हुए घोड़े की तस्वीर बहुत शुभ मानी जाती है। ये तस्वीर करियर में ग्रोथ लाती है और आपकी एनर्जी को बढ़ाती है।
👉🏻👉🏻इन तस्वीरों को लगाते हुए इस बात का ध्यान रखें कि घोड़ों का मुंह ऑफिस के अंदर की ओर आते हुए होना चाहिए और दक्षिण दीवार पर तस्वीर लगानी चाहिए। दौड़ते हुए घोड़े प्रगति के प्रतीक होते हैं।
👉🏻👉🏻अगर आप कर्ज से परेशान है तो आप पश्चिमी दिशा में आर्टिफिशियल घोड़े का जोड़ा रखे। वो आप को किसी भी गिफ्ट शॉप पे आसानी से मिलेगा। इससे घर में सुख समृद्धि और लक्ष्मि का हमेशा वास रहता है। ये घोड़े आपके कार्य में गति प्रदान कर सफलता दिलाने में मददगार साबित होंगे।
👉🏻👉🏻घोड़े की तस्वीर खरीदते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि घोड़े का चेहरा प्रसन्नचित मुद्रा में हो, ना कि आक्रोशित हो।
👉🏻👉🏻विशेषकर सफेद घोड़े सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक होते हैं. इसलिए घर और ऑफिस की नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा को लाने के लिए सफेद 7 घोड़े की तस्वीर लगानी चाहिए।
👉🏻👉🏻विशेष ध्यान रखने वाली बात यह है कि कभी भी टूटी फूटी तस्वीर घर में ना रखें। या धुंधली तस्वीर भी ना रखें। जिस तस्वीर में अलग-अलग दिशा में घोड़े दौड़ते नजर आए वह तस्वीर ना लगाएं।

अंक 8 : जानें क्या रत्नों का प्रभाव वास्तव में होता हैं ? हां, तो कौन सा रत्न है आपके लिए उपयोगी और क्यों ?

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री

प्रिय मित्रों/पाठकों, आम तौर पर जो नगीने अंगूठी और लॉकेट में ज्योतिषीय सलाह के अनुसार पहने जाते हैं ,उसे रत्न कहते हैं । इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि नगीने का नीचे का हिस्सा शरीर से स्पर्श करता रहता है । ये नगीने कई रंगों के होते हैं ।वास्तव में ये रत्न नौ ग्रहों के किरणों के संवाहक होते हैं और किसी खास ग्रह की किरण को अवशोषित करते हैं ।

रत्नों को धारण करने के पीछे मात्र उनकी चमक प्रमुख कारण नहीं है बल्कि अपने लक्ष्य के अनुसार उनका लाभ प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि ये रत्न जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य करते किस प्रकार हैं।

हम अपने आस-पास व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न रत्न पहने हुए देखते हैं। ये रत्न वास्तव में कार्य कैसे करते हैं और हमारी जन्मकुंडली में बैठे ग्रहों पर क्या प्रभाव डालते हैं और किस व्यक्ति को कौन से विशेष रत्न धारण करने चाहिये, ये सब बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
रत्नों का प्रभाव-
रत्नों में एक प्रकार की दिव्य शक्ति होती है। वास्तव में रत्नों का जो हम पर प्रभाव पड़ता है वह ग्रहों के रंग व उनके प्रकाश की किरणों के कंपन के द्वारा पड़ता है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने अपने प्रयोगों, अनुभव व दिव्यदृष्टि से ग्रहों के रंग को जान लिया था और उसी के अनुरूप उन्होंने ग्रहों के रत्न निर्धारित किए।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जब हम कोई रत्न धारण करते हैं तो वह रत्न अपने ग्रह द्वारा प्रस्फुटित प्रकाश किरणों को आकर्षित करके हमारे शरीर तक पहुंचा देता है और अनावश्यक व हानिकारक किरणों के कंपन को अपने भीतर सोख लेता है। अत: रत्न ग्रह के द्वारा ब्रह्मांड में फैली उसकी विशेष किरणों की ऊर्जा को मनुष्य को प्राप्त कराने में एक विशेष फिल्टर का कार्य करते हैं।

जितने भी रत्न या उपरत्न है वे सब किसी न किसी प्रकार के पत्थर है। चाहे वे पारदर्शी हो, या अपारदर्शी, सघन घनत्व के हो या विरल घनत्व के, रंगीन हो या सादेङ्घ। और ये जितने भी पत्थर है वे सब किसी न किसी रासायनिक पदार्थों के किसी आनुपातिक संयोग से बने हैं। विविध भारतीय एवं विदेशी तथा हिन्दू एवं गैर हिन्दू धर्म ग्रंथों में इनका वर्णन मिलता है।

आधुनिक विज्ञान ने अभी तक मात्र शुद्ध एवं एकल 128 तत्वों को पहचानने में सफलता प्राप्त की है। जिसका वर्णन मेंडलीफ की आधुनिक आवर्त सारणी में किया गया है। किन्तु ये एकल तत्व है अर्थात् इनमें किसी दूसरे तत्व या पदार्थ का मिश्रण नहीं प्राप्त होता है। किन्तु एक बात अवश्य है कि इनमें कुछ एक को समस्थानिक के नाम से जाना जाता है।

वैज्ञानिक भी मानते हैं कि हमारे शरीर के चारों ओर एक आभामण्डल होता है, जिसे वे अवफअ कहते हैं। ये आभामण्डल सभी जीवित वस्तुओं के आसपास मौजूद होता है। मनुष्य शरीर में इसका आकार लगभग 2 फीट की दूरी तक रहता है।

यह आभामण्डल अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करता है। हर व्यक्ति का आभामण्डल कुछ लोगों को सकारात्मक और कुछ लोगों को नकारात्मक प्रभाव होता है, जो कि परस्पर एकदूसरे की प्रकृति पर निर्भर होता है। विभिन्न मशीनें इस आभामण्डल को अलग अलग रंगों के रूप में दिखाती हैं।

वैज्ञानिकों ने रंगों का विश्लेषण करके पाया कि हर रंग का अपना विशिष्ट कंपन या स्पंदन होता है। यह स्पन्दन हमारे शरीर के आभामण्डल, हमारी भावनाओं, विचारों, कार्यकलाप के तरीके, किसी भी घटना पर हमारी प्रतिक्रिया, हमारी अभिव्यक्तियों आदि को सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करते है।

वैज्ञानिकों के अनुसार हर रत्न में अलग क्रियात्मक स्पन्दन होता है। इस स्पन्दन के कारण ही रत्न अपना विशिष्ट प्रभाव मानव शरीर पर छोड़ते हैं।

प्राचीन संहिता ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है, उसमें एकल तत्व मात्र 108 ही बताए गए हैं। इनसे बनने वाले यौगिकों एवं पदार्थों की संख्या 39000 से भी ऊपर बताई गई हैं। इनमें कुछ एक आज तक या तो चिह्नित नहीं हो पाए है, या फिर अनुपलब्ध हैं। इनका विवरण, रत्नाकर प्रकाश, तत्वमेरू, रत्न वलय, रत्नगर्भा वसुंधरा, रत्नोदधि आदि उदित एवं अनुदित ग्रंथों में दिया गया है।
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि आपका शरीर बहुत अधिक सेंसेटिव है। यह यादों का बहुत बड़ा संग्रह है। अगर आपने इम्यूनोलॉजी/ immunology को study किया है या नहीं भी किया तब भी आप यह साधारण सी बात जानते होंगे कि हमारे शरीर विभिन्न प्रकार के cells जो हमें इम्यूनिटी/immunity प्रोवाइड/provide करते हैं उनमें कुछ मेमोरी / memory cells भी होते हैं। मतलब यह कि अगर आप किसी बीमारी से इस समय ग्रस्त हुए और ठीक हो गए और आने वाले कई वर्षों में आपको यह स्वास्थ्य संबंधी परेशानी दोबारा नहीं हुई लेकिन यह memory cells तब भी आपके शरीर में बने रहें गए ताकि भविष्य में कभी आप अगर इस बीमारी से फिर से ग्रसित हुए तो यह एकदम अपना काम कर पाए।

➡इसके अलावा किसी एक हल्का सा स्पर्श, आपके द्वारा किया गया भोजन, आपका सबकॉन्शियस माइंड इन सब चीजों को याद रखता है।

➡अपने Human Psychology का वह तथ्य तो जानते ही होंगे जिसमें यह कहा जाता है कि जब आपको कोई व्यक्ति घूर रहा होता है तब आपको अचानक से यह इनट्यूशन कैसे आती है कि आपको ऊपर देखना चाहिए कुछ अटपटा सा लग रहा है। आप इसे ऐसे समझ सकते हैं कि आप जब ध्यान नहीं भी दे रहे होते हैं तब भी आपकी ज्ञान इंद्रियां चीज़ों को रजिस्टर कर रही होती है।

➡इसके अलावा हम अन्य ग्रहों की बात ना करते हुए यहां पर सिर्फ सूर्य और चंद्रमा की बात करना चाहेंगे। जिनका प्रभाव अपने शरीर पर देखा ही होगा। जब इनके प्रभाव से सागर में इतनी उथल-पुथल हो सकती है तो आप समझ ही सकते हैं कि आपके शरीर में 70% वॉटर है।

इन सब उदाहरणों के माध्यम से हम सिर्फ आपको यह बताना चाहते हैं कि आपका शरीर इतना अधिक सजग है। आपके आसपास के वातावरण और गतिविधियों के लिए। तो आप इससे क्या समझते हैं ?? कि आपके द्वारा धारण किया गई (कॉन्शसनेस mind) कोई वस्तु या आपके शरीर के साथ स्पर्श में लाएगी गई कोई अन्य चीज़ आपके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं दिखाएगी??

नोट:- इस संदर्भ में कुछ बातें ध्यान देने योग्य जैसे कि जो भी रत्न आप इस्तेमाल में रहे हैं वह अच्छी क्वालिटी का ही हो। क्योंकि मार्केट में नकली रत्नों की भरमार है। इसके अलावा आप रत्नों के समय की अवधि का भी ध्यान रखिए। समय के साथ इन रत्नों का प्रभाव आपके शरीर पर कम हो जाता है। यदि आप अपने शरीर के प्रति कॉन्शियस है तो आप इन रत्नों के प्रभाव को अपने शरीर और जीवन पर आसानी से देख सकेंगे।
जन्म कुंडली के अनुसार रत्नों का निर्णय
लग्न भाव ग्रह रत्न

मेष — लग्नेश —– मंगल — मूंगा
पंचमेश —– सूर्य — माणिक्य

नवमेश — गुरु — पुखराज

वृष — लग्नेश — शुक्र — हीरा
पंचमेश — बुध — पन्ना

नवमेश — शनि — नीलम

मिथुन — लग्नेश — बुध — पन्ना
पंचमेश — शुक्र — हीरा

नवमेश — शनि — नीलम

कर्क — लग्नेश — चंद्र — मोती
पंचमेश —- मंगल — मूंगा

नवमेश — गुरु — पुखराज

सिंह — लग्नेश — सूर्य — माणिक्य
पंचमेश — गुरु — पुखराज

नवमेश — मंगल — मूंगा

कन्या — लग्नेश — बुध — पन्ना
पंचमेश — शनि — नीलम

नवमेश — शुक्र —- हीरा

तुला — लग्नेश — शुक्र — हीरा
पंचमेश — शनि — नीलम

नवमेश — बुध — पन्ना

वृश्चिक — लग्नेश — मंगल — मूंगा

पंचमेश — गुरु — पुखराज

नवमेश — चंद्र —- मोती

धनु — लग्नेश — गुरु — पुखराज

पंचमेश — मंगल — मूंगा

नवमेश — सूर्य — माणिक्य

मकर — लग्नेश — शनि — नीलम
पंचमेश — शुक्र — हीरा

नवमेश — बुध — पन्ना

कुम्भ — लग्नेश — शनि — नीलम

पंचमेश — बुध — पन्ना

नवमेश — शुक्र — हीरा

मीन — लग्नेश — गुरु — पुखराज

पंचमेश — चंद्र —- मोती

नवमेश — मंगल — मूंगा

7 ग्रहों को 2 गुटों में विभक्त किया गया है . पहला गुट सूर्य गुट है ,जिसमें सूर्य ,चंद्र ,मंगल और गुरु हैं . दूसरा शनि गुट है ,जिसमें बुध ,शुक्र और शनि हैं .इसी को लग्नों में देखें .

1 . सूर्य गुट के लग्न – मेष लग्न ,कर्क लग्न ,सिंह लग्न ,वृश्चिक लग्न ,धनु लग्न और मीन लग्न .कुल 6 लग्न .

2 . शनि गुट के लग्न – वृष लग्न ,मिथुन लग्न , कन्या लग्न ,तुला लग्न ,मकर लग्न और कुम्भ लग्न . कुल 6 लग्न .

ध्यान रहे कि सूर्य गुट और शनि गुट आपस में शत्रुता रखते हैं . इसलिए दोनों गुट के रत्न एक साथ नहीं पहने जाते हैं .
चंद्र राशि के अनुसार रत्न का निर्णय
राशि ग्रह रत्न

1 . मेष —— मंगल —– मूंगा

2 . वृष — शुक्र —- हीरा

  1. मिथुन —- बुध — पन्ना

4 . कर्क — चंद्र — मोती

5 . सिंह — सूर्य — माणिक्य

6 . कन्या — बुध — पन्ना

7 . तुला — शुक्र —- हीरा

8 . वृश्चिक — मंगल —- मूंगा

9 . धनु — गुरु —— पुखराज

10 . मकर — शनि —— नीलम

11 . कुम्भ — शनि —- नीलम

12 . मीन —- गुरु ——- पुखराज

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नौ ग्रह रत्न
1 . माणिक्य (रूबी) – माणिक्य सूर्य का रत्न है .यह एक खनिज है . इसे तराश कर अंगूठी या लॉकेट में जड़ने योग्य बनाया जाता है .यह गुलाबी रंग का होता है .
भौतिक गुण :– कठोरता – 9, आपेक्षिक घनत्व – 4.03 ,वर्तनांक –1.716 , दुहरा वर्तन – 0.008 , द्विवर्णिता –तीव्र .

रासायनिक रचना –एलुमिनियम ऑक्साइड .

2 . मोती (पर्ल ) – मोती चंद्र का रत्न है . जल में रहने वाले सीप के अन्दर इसका निर्माण होता है .यह पत्थर या खनिज नही है . मटर के गोल दाने की तरह यह पाया जाता है .

भौतिक गुण – आपेक्षिक घनत्व – 2.65 से 2.89 तक . कठोरता – 3.8 –4 .

रासायनिक गुण – कैल्सियम कार्बोनेट .

मूंगा (कोरल ) – मूंगा मंगल ग्रह का रत्न है .यह पत्थर नही है .समुद्र के अन्दर खास जंतुओं के द्वारा इसका निर्माण होता है .
रासायनिक गुण –यह भी मोती की तरह कैल्शियम कार्बोनेट है .

पन्ना (एमराल्ड ) – पन्ना बुध ग्रह का रत्न है .यह एक खनिज है .यह एक खनिज है .यह हरे रंग का होता है .
भौतिक गुण – कठोरता –7.75 . आपेक्षिक घनत्व –2.69 –2.8 , वर्तनांक –1.57 , अपकिरण – 0.014 .

5 . पुखराज (टोपाज ) – पुखराज गुरु ग्रह का रत्न है .यह पीले रंग का होता है .यह एक खनिज है .

भौतिक गुण –कठोरता – 8 , आपेक्षिक घनत्व – 6.53 ,वर्तनांक –1.61 ,दुहरा वर्तन – 0.008 ,और अपकिरण – 0.014होता है .

6 .हीरा (डायमंड ) – हीरा शुक्र ग्रह का रत्न है . यह पारदर्शी होता है . यह खनिज रत्न है . भौतिक गुण – कठोरता – 10 , आपेक्षिक घनत्व 3.4 , वर्तनांक – 2.417 ,अपकिरण – 0.44 ,रासायनिक गुण – यह कार्बन का शुद्ध रूप है .

7 .नीलम (सेफायर ) –नीलम शनि ग्रह का रत्न है .यह एक खनिज रत्न है . यह बहुत जल्द असर करता है .

भौतिक गुण –कठोरता – 9, आपेक्षिक घनत्व – 4 .03 ,वर्तनांक – 1 .76 , दुहरा वर्तन – 0.008.

8 .गोमेद (जिर्कोनी ) –गोमेद राहु का रत्न है .यह एक खनिज रत्न है . यह गो मूत्र के रंग का होता है .

भौतिक गुण –कठोरता – 7.5 , आपेक्षिक घनत्व – 4.65. वर्तनांक— 1.93 –1.98. दुहरा वर्तन – 0.006 , अपकिरण – 0.048.

9 .लहसुनिया (कैट्स आई ) – लहसुनिया या वैदूर्य केतु का रत्न है .यह खनिज रत्न है .यह बिल्ली के आंख की तरह चमकता है .

भौतिक गुण –आपेक्षिक घनत्व – 3 .68 से 3 .78 तक .कठोरता –8.5. वर्तनांक –1.75 .दुहरा वर्तन – 0 .01 , अपकिरण – 0 .015 .
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अंक 7 : जानिए क्या ओर कैसा रहेगा 7 दिसम्बर 2018 को विधानसभा के चुनावों का परिणाम..

प्रिय मित्रों/पाठकों, आकाश में विचरण करने वाले ग्रह, नक्षत्र और सितारे हमेशा से मानव जीवन को प्रभावित करते आये हैं। हिन्दू ज्योतिष में कर्म की प्रधानता के साथ-साथ ग्रह गोचर और नक्षत्रों के प्रभाव को भी मनुष्य की भाग्य उन्नति के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़- ओर तेलंगाना में क्या होगा चुनाव परिणाम-

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार तीन राज्‍यो में कांग्रेस और एक राज्य तेलंगाना में सत्तारूढ पार्टी टीआरएस सत्ता में लौट रही है जो बाद में बीजेपी के साथ लोकसभा चुनाव लडेगी- और कौन बनेगा मुख्यमंत्री इन राज्यो में-
राजस्थान में 7 दिसंबर 2018 को विधान सभा का चुनाव होने जा रहा है। इसी दिन अस्त गुरु उदित हो रहे हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्योतिषशास्त्र के नियम के अनुसार जब जन्म नक्षत्र पर गुरु का गोचर होता है तो यह समय व्यक्ति के जीवन में काफी उथल-पुथल लाता है।

पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि बीजेपी का जन्म 6 अप्रैल 1980 में हुआ है। इसके तहत बीजेपी की कुंडली बनायी जाए तो मिथुन लग्र वृश्चिम राशि की कुंडली है। बीजेपी की कुंडली में अक्टूबर 2012 से सूर्य की महादशा आरंभ हुई है। सूर्य की महादशा में बीजेपी को लाभ होना शुरू हुआ। इसके बाद ही बीजेपी ने गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेन्द्र मोदी को पीएम पद का प्रत्याशी बनाया गया। उस समय पीएम मोदी की कुंडली में अच्छा समय था। जिसकी वजह से बीजेपी और पीएम मोदी की कुंडली दोनों के ग्रह योग के चलने के साथ ही पहली बार केंद्र में बहुमत की सरकार बनी। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि सूर्य की महादशा छहः साल के लिए होती है। जिसके चलते बीजेपी ने कई राज्यों में चुनाव जीता।

इस समय राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की कुंडली में जन्म नक्षत्र अनुराधा पर अतिचारी गुरु का गोचर हो हो रहा है जो शुभ दशा नहीं है।
8 मार्च 1953 को शाम 4 बजकर 45 मिनट पर पर मुंबई में जन्मी वसुंधरा राजे की कुंडली कर्क लग्न और वृश्चिक राशि की है। वसुंधरा राजे की कुंडली में नवमेश गुरु और दशमेश मंगल के स्थान परिवर्तन राजयोग ने उनको दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनवाया और जबरदस्त लोकप्रियता दी। कुंडली के कर्म स्थान (दशम भाव) में बैठे गुरु और और शुक्र के योग के कारण वसुंधरा राजे ने शिक्षा और महिला एवं बल कल्याण के क्षेत्र में राजस्थान में बेहद अच्छा काम किया। किन्तु साल 2015 में शनि की साढ़ेसाती के कारण ललित मोदी कांड में नाम आने पर वसुंधरा राजे की लोकप्रियता में गिरावट आने लगी। वर्तमान में चल रही राहु में गुरु की दशा छिद्र और जन्म-नक्षत् पर गोचर के गुरु के कारण उनको राजस्थान विधानसभा चुनावों में प्रतिकूल परिणाम मिलने के ज्योतिषीय संकेत दिख रहे हैं।

फ़िलहाल राजस्थान कांग्रेस ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं कि उनकी ओर से मुख्यमंत्री प्रत्याशी कौन होगा लेकिन पहले 2 बार राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कुंडली को देखने से ऐसा लगता है कि इनकी कुंडली में इन दिनों ग्रहों के अच्छे योग बने हुए हैं। लग्न से छठे भाव में गुरु का गोचर और सप्तम में चल रहा शनि का गोचर उनको अच्छी सफलता दिला सकते हैं।
योगकारक मंगल की महादशा में इस समय सूर्य की अंतर्दशा चल रही चल रही है, जो कि लाभ भाव में होकर उनको ‘राज्य -लाभ’ का का ज्योतिषीय संकेत दे रहे हैं।

राजस्थान कांग्रेस के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट की कुंडली में बन रहा ‘शूल योग’ जहां उनको एक तेज़तर्रार वक्त बनता है तो वहीं दूसरी ओर यह योग उनको उनकी ही पार्टी के भीतर गुटबाजी से परेशान होने का संकेत भी दे रहा है।

राजस्थान विधानसभा चुनावों में कांग्रेस जीत सकती है लेकिन सूर्य उनकी कुंडली में नवांश में नीच राशि में हैं इसलिए अभी इनके लिए मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना कठिन है।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को फिर एक बार सत्ता की चाबी मिल सकती है। इनकी कुंडली में इन दिनों ग्रहों के अच्छे योग बने हुए हैं।

धनु राशि में गोचर कर रहे शनि देव, मध्यप्रदेश की कुंडली में ‘ढैय्या’ और छत्तीसगढ़ की कुंडली में ‘साढ़ेसती’ का प्रभाव लेकर चल रहे हैं तो ऐसे में इस बात की आशंका दिख रही है कि इन दोनों राज्यों में शनि महाराज सत्ता परिवर्तन करवा सकते हैं

मध्य प्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं। इन 230 सीटों में 35 सीट अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक कुल पांच करोड़ तीन लाख 34 हजार दो सौ साठ मतदाता हैं जो अलग अलग दलों के उम्मीदवारों की किस्मक का फैसला करेंगे।

मध्य प्रदेश की कुंडली 1 नवंबर 1956 मध्य रात्रि भोपाल की है, जहां कर्क लग्न उदय हो रहा है। इस राज्य की राशि कन्या है।

धनु राशि में गोचर कर रहे शनि कन्या से चतुर्थ भाव में होकर ‘कंटक-शनि’ के गोचर का निर्माण कर रहे हैं जो मेदिनी ज्योतिष के अनुसार सत्ता परिवर्तन का योग है।

मध्य प्रदेश की कर्क लग्न की कुंडली में पिछले सितंबर महीने से दश स्थान यानी (हानि स्थान) के स्वामी बुध की महादशा शुरू हो चुकी है जिससे सत्ता परिवर्तन का योग बन रहा है।

इस दफा शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है। किसानों के आंदोलन, एससी-एसटी एक्ट का मामला शिवराज सिंह चौहान के लिए मुश्किल साबित हो सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष इस चुनाव में स्थानीय मुद्दों से ज्यादा राष्ट्रीय मुद्दों को महत्व दे रहे हैं। कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है जैसे जैसे मतदान की तारीख करीब आएगी बीजेपी चुनावों का ध्रूवीकरण कर सकती है लिहाजा कांग्रेस अध्यक्ष आक्रामक भूमिका में हैं।
क्या कहते हैं शिवराज सिंह के सितारे?

भाजपा के शिवराज सिंह का जन्म 05 मार्च सन् 1959 को मध्यान्ह 12 बजे हुआ था। उस समय क्षिमिज पर वृष लग्न उदित हो रही थी। वृष लग्न एक स्थिर व सौम्य स्वभाव वाली राशि है। आप गंभीर, विचारशील, शान्तप्रिय और दयालु प्रकृति होंगे। आपमें प्रबल शारीरिक व मानसिक सहनशक्ति एंव सहिष्णुता होगी जिसके फलस्वरूप आप कार्यो के प्रति धैर्य व लग्न के साथ समर्पित रहेंगे।

230 सीटों वाले मध्यप्रदेश की कमान लम्बे समय से शिवराज सिंह संभाल रहे है। आपकी पत्री में शनि की दशा में बुध का अन्तर चल रहा है और 10 नवम्बर से राहु का प्रत्यन्तर प्रारम्भ हो जायेग। शनि आपकी कुण्डली में भाग्येश व दशमेश होकर अष्टम भाव में बैठा है। बुध पंचमेश व द्वतीयेश होकर लाभ में बैठकर जनता के कारक भाव पंचम को सप्तम नजर से देख रहा है। अतः शिवराज मध्यप्रदेश की जनता के लोकप्रिय नेता बने रहेंगे। आपकी पत्री में गुरू सातवें भाव में वृश्चिक राशि में बैठा है। 12 अक्टूबर से गुरू वृश्चिक राशि में भ्रमण करना शुरू कर देगा। यह आपके लिए एक बहुत शुभ संयोग है। वृश्चिक एक स्थिर राशि है यानि राज्य में भाजपा की स्थिरता बनी रहेगी। अतः आपके जनाधार में भले ही कमी आये किन्तु आप एक बार फिर से पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब होंगे।
मध्यप्रदेश के युवा कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का जन्म 1 जनवरी 1971 को सुबह 9 बजकर 40 मिनट पर मुंबई में था। उनका मुख्यमंत्री बन पाना कठिन है।
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कांग्रेस के खेवनहार कमलनाथ
मध्यप्रदेश में कांग्रेस के खेवनहार कमल नाथ है। कमलनाथ का जन्म 18 नवम्बर सन् 1946 ई0 को 12 बजे कानपुर में हुआ था। आपका जन्म मकर लग्न में हुआ है। वर्तमान में आपकी पत्री में बृहस्पति की दशा में शनि का अन्तर चल रहा है और 22 नवम्बर से शनि का ही प्रत्यन्तर शुरू हो जायेगा। शनि आपकी पत्री में लग्नेश व द्वितीयेश होकर लाभ भाव में बैठकर सातवीं दृष्टि से पंचम भाव को देख रहा है। शनि ग्रह सम अवस्था में इसीलिए अच्छा फल दे पाने में सक्षम नहीं है। गुरू द्वादशेश तृतीयेश होकर दशम भाव में बैठा है। दशम भाव सत्ता का कारक होता है, लेकिन इसकी मूल त्रिकोण राशि 12 वें भाव में पड़ रही है, जो अशुभ है। अतः आप सत्ता के करीब-करीब आते दूर हो जायेंगे।
(संभावित) निष्कर्ष मध्यप्रदेश चुनावों का :
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को लगभग 122 सीटें तथा कांग्रेस को 95 के आसपास सीटें पाकर ही संतोष करना पड़ेगा। बसपा को 04 सीटें और अन्य दलों को मिलाकर 04 सीटें मिलने के संकेत नजर आ रहें है।
छत्तीसगढ़ राज्य की कुंडली 1 नवंबर 2000 को मध्य रात्रि में रायपुर की है जहां कर्क लग्न और धनु राशि का प्रभाव है। धनु राशि में इन दिनों शनि महाराज चल रहे हैं जो सत्ता परिवर्तन का योग बना रहे हैं।
तेलंगाना में विधान सभा का चुनाव 7 दिसंबर 2018 को होने जा रहा है। ज्योतिषशास्त्र की गणना बताती है कि इस समय तेलंगाना के वर्तमान मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव की कुंडली में सितारे इतने मजबूत हैं कि फिर से सत्ता में लौट सकते हैं।

दक्षिण भारत में तमिलनाडु के प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार जन्म नक्षत्र में गुरु यानि बृहस्पति ग्रह का गोचर जातक को मानसिक कष्ट के साथ-साथ बड़े बदलावों से होकर गुजरने पर विवश करता है। इन तमिल ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान राम के जन्म नक्षत्र में गोचर के गुरु चल रहे थे तब सीता का हरण रावण के द्वारा किया गया था और राम, सीता की खोज में वन-वन भटकने को विवश हो गए थे। द्वापर युग में दुर्योधन के जन्म नक्षत्र पर जब गुरु का गोचर में भ्रमण हुआ तब वह अपने भाइयों सहित महाभारत के युद्ध में मारे गए। इन ज्योतिष के ग्रंथों के अनुसार, जन्म राशि और नक्षत्र में गुरु का गोचर जातक को उन परिस्थतियों में अधिक कष्ट देता है जब कुंडली में दशा अशुभ हो तथा शनि का गोचर भी प्रतिकूल चल चल रहा हो ।

ठीक ऐसी ही स्थिति इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की जन्म-कुंडली में बन रही है क्योंकि दोनों का ही जन्म नक्षत्र अनुराधा है, जहां गोचर में गुरु अतिचारी होकर चल रहे हैं और दोनों की जन्म राशि वृश्चिक है, जो कि शनि की साढ़ेसाती के प्रभाव में है।
17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी की कुंडली वृश्चिक लग्न और वृश्चिक राशि की है। प्रधानमंत्री मोदी का चंद्रमा अनुराधा नक्षत्र का है, जिस पर अतिचारी गुरु का गोचर तथा धनु में चल रहे शनि की साढ़ेसाती का अशुभ प्रभाव पड़ रहा है। राफेल मामले, सीबीआई विवाद और देश में बढ़ रही बेरोजगारी की की समस्या केंद्र की मोदी सरकार के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। चंद्र में शुक्र की दशा में चल रहे प्रधानमंत्री मोदी को पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी की हार का सामना करना पड़ सकता है।

लेकिन 3 मार्च 2019 के बाद पीएम मोदी के आएंगे अच्छे दिन, यानी 2019 में फिर  मोदी सरकार !

पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि पीएम मोदी की कुंडली वृश्चिक लग्न वृश्चिक राशि की है। साथ ही पीएम मोदी की कुंडली में चंद्रमा की महादशा चल रही है। जो वर्ष 2021 तक चलेगी। पीएम मोदी की कुंडली में चन्द्रमा की महादशा में बुध का अंतर चल रहा है, यह स्थिति 3 मार्च 2019 तक रहेगी। इसके ठीक बाद कुंडली में केतु का असर आयेगा। पीएम मोदी के लिए केतु भाग्य बदलने वाला साबित हो सकता है। पीएम मोदी की कुंडली वृश्चिक लग्न की है और इस लगन में केतु लाभकारी होता है। इसके अतिरिक्त वृश्चिक लग्र के लिए बृहस्पति पंचमेश में होता है। यह स्थिति बहुत अच्छी मानी गई है। तो बता दें कि, मार्च के शुरूआत से ही पीएम मोदी का फिर से अच्छे दिन वाले हैं। यानी अच्छा समय शुरू हो जाएगा। जिसका फायदा पीएम मोदी को 2019 चुनाव में होगा और एक बार पीएम नरेन्द्र मोदी के चलते बीजेपी को बहुमत या फिर सबसे अधिक सीट मिल सकती है।
फ़िलहाल राजस्थान कांग्रेस ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं कि उनकी ओर से मुख्यमंत्री प्रत्याशी कौन होगा लेकिन पहले 2 बार राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कुंडली को देखने से ऐसा लगता है कि इनकी कुंडली में इन दिनों ग्रहों के अच्छे योग बने हुए हैं। लग्न से छठे भाव में गुरु का गोचर और सप्तम में चल रहा शनि का गोचर उनको अच्छी सफलता दिला सकते हैं।
योगकारक मंगल की महादशा में इस समय सूर्य की अंतर्दशा चल रही चल रही है, जो कि लाभ भाव में होकर उनको ‘राज्य -लाभ’ का का ज्योतिषीय संकेत दे रहे हैं।

अंक 6 : ज्योतिष के अनुसार इनकी तीसरी बार हो सकती है राजस्थान में ताजपोशी

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p style=”text-align: justify;”>👉एक नजर राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018 पर 👈

*🌏जन्म नक्षत्र में गोचर कर रहे गुरु बढ़ाएंगे वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की मुश्किलें!🌏*

🌹 ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार, जन्म नक्षत्र में गुरु यानि बृहस्पति ग्रह का गोचर जातक को मानसिक कष्ट के साथ-साथ बड़े बदलावों से होकर गुजरने पर विवश करता है।
👉 ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान राम के जन्म नक्षत्र में गोचर के गुरु चल रहे थे तब सीता का हरण रावण के द्वारा किया गया था और राम, सीता की खोज में वन-वन भटकने को विवश हो गए थे।
👉 द्वापर युग में दुर्योधन के जन्म नक्षत्र पर जब गुरु का गोचर में भ्रमण हुआ तब वह अपने भाइयों सहित महाभारत के युद्ध में मारे गए।
👉ज्योतिष के ग्रंथों के अनुसार, जन्म राशि और नक्षत्र में गुरु का गोचर जातक को उन परिस्थतियों में अधिक कष्ट देता है जब कुंडली में दशा अशुभ हो तथा शनि का गोचर भी प्रतिकूल चल रहा हो ।
👉ठीक ऐसी ही स्थिति इस समय राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की जन्म-कुंडलियों में बन रही है क्योंकि उनका जन्म नक्षत्र अनुराधा है, जहां गोचर में गुरु अतिचारी होकर चल रहे हैं और दोनों की जन्म राशि वृश्चिक है, जो कि शनि की साढ़ेसाती के प्रभाव में है।

👉🏻👉🏻 गुगल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार 8 मार्च 1953 को शाम 4 बज कर 45 मिनट्स पर मुंबई में जन्मी वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की कुंडली कर्क लग्न और वृश्चिक राशि की है।
👉👉🏻मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की जन्म कुंडली में नवमेश गुरु और दशमेश मंगल के स्थान परिवर्तन राजयोग ने उनको दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनवाया और जबरदस्त लोकप्रियता दी।
👉कुंडली के कर्म स्थान (दशम भाव) में बैठे गुरु और शुक्र के योग के कारण वसुंधरा राजे ने शिक्षा और महिला एवं बल कल्याण के क्षेत्र में राजस्थान में बेहद अच्छा काम किया।
👉किन्तु साल 2015 में शनि की साढ़ेसाती के कारण ललित मोदी कांड में नाम आने पर वसुंधरा राजे की लोकप्रियता में गिरावट आने लगी।
👉वर्तमान में चल रही राहु में गुरु की दशा छिद्र और जन्म-नक्षत्र पर गोचर के गुरु के प्रभाव के कारण उनको राजस्थान विधानसभा चुनावों में प्रतिकूल परिणाम मिलने के ज्योतिषीय संकेत दिख रहे हैं।

कुछ स्थानों पर राजस्थान की वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का जन्म 08 मार्च 1953 ई0 को मध्यान्ह 12 बजे मुम्बई में हुआ था। उपलब्ध जानकारी अनुसार वसुन्धरा राजे की जन्म कुण्डली के प्रथम भाव में वृषभ लग्न की है।

वृषभ राशि एक स्थिर राशि है, जिसके कारण आप में प्रबल शारीरिक व मानसिक सहनशक्ति एंव सहिष्णुता होगी।

आप स्वभाव से हठी एंव योजनाओं को पूर्ण करने की योग्यता रखेंगी।
क्या कहते हैं वसुंधरा राजे सिंधिया के सितारे?

वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की कुण्डली में इस समय राहु की दशा में राहु का अन्तर और गुरू का प्रत्यन्तर चल रहा है। राहु आपके भाग्य में बैठकर पंचम दृष्टि से लग्न को देख रहा है, इसलिए आप चिन्ताग्रस्त रहेगी व नवम दृष्टि से जनता के संकेतक भाव पंचम को देख रहा है, जिस कारण आपकी जनता में लोकप्रियता कमी आयेगी। गुरू अष्टमेश होकर द्वादश भाव में बैठकर अशुभ फल देगा। अतः वसुंधरा राजे को दोबरा से मुख्यमंन्त्री बन पाना मुश्किल है। शनि उच्च का है एंव वक्री भी है। शनि वंसुधरा राजे को एक बार फिर मुख्यमन्त्री की कुर्सी पर आसीन होने का सुनहरा अवसर देगा किन्तु बुध नीच का होकर अपनी सप्तम नजर पंचम भाव पर डाल रहा है, इसलिए बहुमत पाकर सरकार बना पाना मुश्किल है, क्योंकि राजस्थान में भाजपा को लगभग 80 से 85 सीटें पाने के संकेत नजर आ रहें है।

श्री अशोक गहलोत (पूर्व मुख्य मंत्री-राजस्थान)
(नोट:-जन्म की तारीख गूगल सर्च से जैसी प्राप्त हुई है.उसी के अनुसार कुंडली का निर्माण किया है। मेरा उद्दयेश्य सिर्फ़ इतना ही है कि सफल लोगो की कुंडली के शुभ योगों की चर्चा करना है)

जन्म तारीख- 03.05.1951
समय 09.30 बजे सुबह
स्थान-जोधपुर
वार-गुरुवार
जन्म लग्न-मिथुन
जन्म राशी-मीन
जन्म नक्षत्र-उत्तराभाद्रपद
शुभ योग —

(1)गुरु और चन्द्रमा 10 वे भाव मे युति=गज केशरी योग-अदभुत योग है,जातक यशस्वी,धनवान,सरकार का मुखिया,समाज द्वारा पूजित होगा।

(2)लग्नेश बुध11 वे भाव मे सूर्य के साथ है,यह बुधादित्य योग का निर्माण कर रहा है।जातक की वाणी प्रभावशाली होगी ओर कई विद्याओ का जानकर होगा।

(3)गुरु केंद्र(10वे भाव मे) में है। यह बहुत शुभ योग है।शास्त्र बताते है कि केंद्र में गुरु कुंडली के 1000 दोष दूर करता है।

(4)शुक्र 12 वे भाव मे स्वराशिस्थ-जातक घर से अधिक बाहर विकास करेगा ओर अतुलनीय सुख प्राप्त पड़ेगा।

(5)गुरु केंद्र में स्वयं की राशि मे-“हंस योग” का निर्माण कर रहा है। जातक विद्ववान ओर अवार्ड प्राप्त करने वाला होगा.

(6)राहु 9 वे भाव मे है- अपनी चतुरता से लोगो को प्रभावित करेगा।

(7)केतु 3 रे भाव(पराक्रम भाव) मे है अपने समस्त शत्रुओ का नाश करेगा।

महादशा:- 12.05.2016 से 12.11.2019 तक समय शानदार है।

वर्तमान में इसका प्रबल राजयोग बन रहा है । शनिदेव के प्रबल गजकेसरी योग से गुरु का केंद्र में होने से छठे स्थान पर राहु तीसरे स्थान पर केतु होना चाहिए,जो अद्भुत योग बनता है गुरु और चंद्रमा की युति से सरकार के मुखिया बनने का योग नवंबर 2019 तक है यह योग अशोक गहलोत का है। ये हम नही कह रहे यह कहना है उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री का, जिन्होंने वर्ष 1997 में भी गहलोत के मुख्यमंत्री बनने को लेकर भविष्यवाणी की थी और वह भविष्यवाणी भी सही साबित हुई थी।

श्री अशोक गहलोत का लग्न मिथुन, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, मीन राशि हैं।

वर्ष 1998 से 2019 तक अशोक गहलोत के राज योग प्रबल हैं राजनीति के हर क्षेत्र में माहिर तीसरा केतु होने से वाक चातुर्य से काम बनाने की क्षमता, शत्रुओं का नाश करने की कला, नवे राहु गुरु केंद्र में होने से सभी दोष भी माफ माने जाते हैं।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि नवंबर 2019 तक समय श्रेष्ठ रहेगा इनका बुद्ध ग्यारहवें भाव में प्रभावशाली होकर प्रशासनिक पावर प्रदान कर्ता है कुल मिलाकर अशोक गहलोत के राज योग प्रबल हैं । उन्होंने बताया कि राहुल गांधी के राजयोग नहीं है गठबंधन सरकार अगर आती है तो सर्वमान्य प्रधानमंत्री उम्मीदवार अशोक गहलोत हो सकते हैं और उनकी जीत प्रबल होगी।

शनि देव की दशा गहलोत के लिए श्रेष्ठ राज योग कारक —
गहलोत की कुंडली प्रबल जीत के आसार बनाती है बृहस्पति की दशा शनि देव की दशा गहलोत के लिए श्रेष्ठ राज कारक है कुल मिलाकर नेतृत्व पर निर्भर है कि वह अपने तुरूप के पत्ते को इस्तेमाल करते हैं या नहीं बाकी अशोक गहलोत का भविष्य उज्जवल है। गुरु और चंद्रमा दसवें भाव में गजकेसरी योग अद्भुत योग सरकार का मुखिया बनने का योग बनता है लग्नेश बुध ग्यारहवें भाव में सूर्य के साथ बुधादित्य योग का निर्माण करता है।।

जातक की वाणी प्रभावशाली और कई विद्याओं का जानकार होता है गुरु केंद्र में दसवें भाव में शुभ योग है।। केंद्र में गुरु कुंडली के सभी दोष दूर करते हैं शुक्र बारहवें भाव में मीन राशि में स्थित है।।

खूब प्रसिद्धि प्राप्त होगी गुरु केंद्र में स्वयं की राशि में अच्छा योग बनाता है प्रधानमंत्री पद प्राप्त कर सकते हैं राहु नौवें भाव में अपनी चतुर प्रति लोगों को प्रभावित करते हैं कुल मिलाकर सर्वश्रेष्ठ योग चल रहे हैं।

कांग्रेस के अशोक गहलोत का जन्म 03 मई सन् 1951 को सुबह 9:30 मि. पर जोधपुर में हुआ था। उस काल में क्षितिज पर मिथुन लग्न उदित हो रही थी। मिथुन राशि एक द्विस्वभाव राशि है, जिसके फलस्वरूप गहलोत के स्वभाव में दोहरापन पाया जायेगा, कभी धीर गम्भीर तो कभी चंचल और वाचाल रहेंगे। आपके सोचने का तरीका वैज्ञानिक व तर्कसंगत होगा।

इस समय आपकी कुण्डली में मंगल की दशा में राहु की अन्तर एंव केतु की प्रत्यन्तर दशा चल रही है। षष्ठेश और लाभेश होकर मंगल अपनी मेष राशि में लाभ भाव में राजा सूर्य के साथ संग्रस्थ है। मंगल और सूर्य की सप्तम नजर जनता के कारक पंचम भाव पर पड़ रही है।

यह स्थिति शुभ कही जा सकती है। राहु भाग्य भाव में स्वराशि का होकर गुरू के नक्षत्र पूर्वाभाद्रपद पर कब्जा किये हुये है। गुरू सप्तमेश होकर दशम भाव में बैठा है। सप्तम भाव परिवर्तन का कारक एंव दशम स्थान राज्य का संकेतक है।

पूर्व सीएम अशोक गहलोत की कुण्डली में इस वक्त मंगल की दशा चल रही है व 6 दिसम्बर से सूर्य की अन्तर दशा प्रारम्भ होने वाली है। मंगल लाभेश होकर लाभ भाव में बैठकर सप्तम नजर से पंचम भाव को देख रहा है।

सूर्य तृतीयेश होकर लाभ पर कब्जा जमाकर पंचम भाव को देख रहा है। सूर्य व मंगल दोनों की जनता के संकेतक भाव पर दृष्टि पड़ रही है।

योगकारक मंगल की महादशा में इस समय सूर्य की अंतर्दशा चल रही है, जो कि लाभ भाव में होकर उनको ‘राज्य -लाभ’ का ज्योतिषीय योग दे रही है।
👉अशोक गहलोत यदि तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बन जाएं तो ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कोई आश्चर्य नहीं होगा।
गहलोत के लिए शुभ हैं संकेत..

6 अक्टूबर से गुरू वृश्चिक में गोचर करेगा जो आपके छठें भाव में रहेगा जिसकी पंचम दृष्टि सत्ता के कारक दशम भाव पर पड़ रही है। यह एक बहुत ही शुभ संकेत है। आपके लिए अंक 8 भी विशेष फलदायी है क्योंकि आप 1998 में पहली बार सीएम बने थे। दूसरी बार सन् 2008 में सीएम बने और इस बार भी सन् 2018 में अंतिम अंक 8 है।

इन सभी कारणो को देखते हुये निष्कर्ष यह निकलता है कि भाजपा और कांग्रेस में कांटे की टक्कर रहेगी। भाजपा को 80 से 85 सीटें मिल सकती है। वहीं काग्रेस 100 से 110 सीटें प्राप्त करके सरकार बनाने में कामयाब होगी।
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🌎बीजेपी होगी कमजोर, कांग्रेस की पकड़ बढ़ेगी🌍

🌹देश के तीन बड़े राज्यों में महीने पता चल जाएगा कि 2019 में पीएम मोदी को चुनाव जीतने के लिए कितना कठिन परिश्रम करना होगा।
👉राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अभी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है।
👉यदि यहां पर किसी भी तरह से सत्ता का परिवर्तन होता है, तो पांच महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान हो सकता है।
👉भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, इस पर सीधी बात करना मुश्किल है, लेकिन चाल समझकर सितारों के इशारों को समझा जा सकता है।

🌎बीजेपी -कांग्रेस दोनों की कुंडली का अध्ययन 🌍

🌹बीजेपी -कांग्रेस दोनों की कुंडली का अध्ययन करने के बाद यह निकलकर आता है कि कांग्रेस अभी बृहस्पति की महादशा में है।
👉कांग्रेस के लिए बृहस्पति की दशा फायदे वाली रहेगी।
👉जिसमें से शुक्र का अंतर चल रहा है।
👉अभी शनि कुंडली में स्थित सूर्य पर से गुजर रहा है।
👉वहीं हाल ही वृश्चिक राशि में गया बृहस्पति कुंडली के आधार पर बुध के ऊपर से गुजर रहा है।
👉वहीं बीजेपी की बात करें तो चंद्रमा की दशा में 👉चंद्रमा का अंतर चल रहा है।
👉चंद्रमा में चंद्रमा की अंतर्दशा बीजेपी के लिए थोड़ी मुश्किल पैदा करने वाली है।
👉बृहस्पति का वृश्चिक राशि में पारगमन भी बीजेपी की कुंडली के अनुसार फायदा देने वाला नहीं है।
👉वहीं साढ़े साती भी आखिरी चरण में है।
👉साढ़े साती का आखिरी चरण भी बीजेपी को परेशानी में डालने वाला है।
👉वृश्चिक राशि में गया बृहस्पति चंद्रमा के ऊपर से गुजर रहा है।
👉वोटिंग के दिन यानी कि 7 दिसंबर 2018 को चंद्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र में सूर्य के साथ युति कर सकता है।
👉वोटिंग वाले दिन केतु का चंद्रमा के साथ संयोजन सत्ता पक्ष के लिए अच्छा नहीं माना जाता।
👉बहुत सी सीटों पर किसी एक तरफा वोटिंग देखने को मिल सकती है।
👉परिणाम वाले दिन चंद्रमा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र से गुजरते हुए केतु के साथ संयोजन में रहेगा।
👉कुल मिलाकर यदि सितारों की बात सुनें तो आने वाले दिनों में बीजेपी को मेहनत का फल कम ही मिलेगा,
👉हालांकि बृहस्पति में शुक्र की अंतर्दशा आपसी झगड़ों को बढ़ा सकती है।
👉वहीं कांग्रेस यदि आंतरिक झगड़ों से मुक्त हो पाई, तो फायदे में रहेगी।
👉अभी वृश्चिक राशि में बृहस्पति का परिभ्रमण कांग्रेस के लिए फायदेमंद रह सकता है।

अंक 5 : जानिए किसी कन्या जातक का विवाह कब, कहाँ ओर किस दिशा में होगा??
सुसराल ओर पति कैसा मिलेगा??

प्रिय पाठकों/मित्रों, हमारे यहाँ कहावत है कि जोड़े स्वर्ग से तय होकर आते हैं और उनका मिलन पृथ्वी पर निर्धारित समय में विवाह-संस्कार से होता है अर्थात सब कुछ विधि के विधान के अनुसार तय होने के बावजूद जब बेटी की उम्र 20-21 के पार हो जाती है तो मां-बाप की चिंताएं बढ़ने लगती है| दिन-रात उन्हें यही सवाल सालने लगता है कि हमारी लाडली के हाथ पीले कब होंगे?

उसे पति (वर) कैसा मिलेगा? ससुराल कैसी और कहां होंगी आदि।

चिंता मत करिए, ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिष शास्त्र में आपके इन सवालों का जवाब है और आप खुद थोड़ी मेहनत करके इन बातों का जवाब जान सकते हैं।

ज्योतिष में लग्न कुंडली का प्रथम भाव जातक का स्वयं का होता है और इसके ठीक सामने वाला सातवां भाव जीवनसाथी का होता है। इस भाव से प्रमुख रूप से विवाह का विचार किया जाता है। इसके अलावा यह भी पता कर सकते हैं कि जीवनसाथी का स्वभाव कैसा होगा?

उसका चरित्र कैसा होगा, ससुराल कैसी मिलेगी और वर-वधू में आपसी मित्रता कैसी रहेगी ??

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी कन्या लड़की की जन्म लग्न कुंडली से उसके होने वाले पति एवं ससुराल के विषय में सब कुछ स्पष्टत: पता चल सकता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्योतिष विज्ञान में फलित शास्त्र के अनुसार लड़की की जन्म लग्न कुंडली में लग्न से सप्तम भाव उसके जीवन, पति, दाम्पत्य जीवन तथा वैवाहिक संबंधों का भाव है। इस भाव से उसके होने वाले पति का कद, रंग, रूप, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय या कार्यक्षेत्र परिवार से संबंध आदि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यहां सप्तम भाव के आधार पर कन्या के विवाह से संबंधित विभिन्न तथ्यों का विश्लेषण प्रस्तुत है।

ससुराल की दूरी :

सप्तम भाव में अगर वृष, सिंह, वृश्चिक या कुंभ राशि स्थित हो तो लड़की की शादी उसके जन्म स्थान से 90 किलोमीटर के अंदर ही होगी।

यदि सप्तम भाव में चंद्र, शुक्र तथा गुरु हों तो लड़की की शादी जन्म स्थान के समीप होगी।

यदि सप्तम भाव में चर राशि मेष, कर्क, तुला या मकर हो तो विवाह उसके जन्म स्थान से 200 किलोमीटर के अंदर होगा।

अगर सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि स्थित हो तो विवाह जन्म स्थान से 80 से 100 किलोमीटर की दूरी पर होगा। यदि सप्तमेश सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य हो तो विवाह विदेश में होगा या लड़का शादी करके लड़की को अपने साथ लेकर विदेश चला जाएगा।

शादी की आयु :

यदि जातक या जातक की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में सप्तमेश बुध हो और वह पाप ग्रह से प्रभावित न हो तो शादी 13 से 18 वर्ष की आयु सीमा में होती है। सप्तम भाव में सप्तमेश मंगल पापी ग्रह से प्रभावित हो तो शादी 18 वर्ष के अंदर होगी। शुक्र ग्रह युवा अवस्था का द्योतक है। सप्तमेश शुक्र पापी ग्रह से प्रभावित हो तो 25 वर्ष की आयु में विवाह होगा। चंद्रमा सप्तमेश होकर पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो विवाह 22 वर्ष की आयु में होगा। बृहस्पति सप्तम भाव में सप्तमेश होकर पापी ग्रहों से प्रभावित न हो तो शादी 27-28वें वर्ष में होगी। सप्तम भाव को सभी ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तथा सप्तम भाव में शुभ ग्रह से युक्त होकर चर राशि हो तो जातक का विवाह उचित आयु में सम्पन्न हो जाता है। यदि किसी लड़की या लड़की की जन्म कुंडली में बुध स्वर राशि मिथुन या कन्या का होकर सप्तम भाव में बैठा हो तो विवाह बाल्यावस्था में होगा।

विवाह वर्ष :

आयु के जिस वर्ष में गोचरस्थ गुरु लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव में आता है, उस वर्ष शादी होना निश्चित समझें परंतु शनि की दृष्टि सप्तम भाव या लग्न पर न हो। लग्न या सप्तम में बृहस्पति की स्थिति होने पर उस वर्ष शादी होती है।

विवाह कब होगा ??

यह जानने की दो विधियां यहां प्रस्तुत हैं। जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में स्थित राशि अंक में 10 जोड़ दें। योग फल विवाह का वर्ष होगा। सप्तम भाव पर जितने पापी ग्रहों की दृष्टि हो, उनमें प्रत्येक की दृष्टि के लिए 4-4 वर्ष जोड़ योग फल विवाह का वर्ष होगा।

विवाह की दिशा :

किसी भी कन्या जातक की जन्मांक में सप्तम भाव में स्थित राशि के आधार पर शादी की दिशा ज्ञात की जाती है। उक्त भाव में मेष, सिंह या धनु राशि एवं सूर्य और शुक्र ग्रह होने पर पूर्व दिशा वृष, कन्या या मकर राशि और चंद्र, शनि ग्रह होने पर दक्षिण दिशा, मिथुन, तुला या कुंभ राशि और मंगल, राहु, केतु ग्रह होने पर पश्चिम दिशा, कर्क, वृश्चिक, मीन या राशि और बुध और गुरु होने पर उत्तर दिशा की ओर शादी होगी। अगर जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस भाव पर अन्य ग्रह की दृष्टि न हो, तो बलवान ग्रह की स्थिति राशि में शादी की दिशा समझें।

पति कैसा मिलेगा :

ज्योतिष विज्ञान में सप्तमेश अगर शुभ ग्रह (चंद्रमा, बुध, गुरु या शुक्र) हो या सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तम भाव को देख रहा हो, तो लड़की का पति सम आयु या दो-चार वर्ष के अंतर का, गौरांग और सुंदर होना चाहिए। अगर सप्तम भाव पर या सप्तम भाव में पापी ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु या केतु का प्रभाव हो तो बड़ी आयु वाला अर्थात लड़की की उम्र से 5 वर्ष बड़ी आयु का होगा।

सूर्य का प्रभाव हो तो गौरांग, आकर्षक चेहरे वाला, मंगल का प्रभाव हो तो लाल चेहरे वाला होगा। शनि अगर अपनी राशि का उच्च न हो तो वर काला या कुरूप तथा लड़की की उम्र से काफी बड़ी आयु वाला होगा। अगर शनि उच्च राशि का हो तो पतले शरीर वाला गोरा तथा उम्र में लड़की से 12 वर्ष बड़ा होगा।

सप्तमेश अगर सूर्य हो तो पति गोल मुख तथा तेज ललाट वाला, आकर्षक, गोरा सुंदर, यशस्वी एवं राज कर्मचारी होगा। चंद्रमा अगर सप्तमेश हो, तो पति शांत चित्त वाला गौर वर्ण का, मध्यम कद तथा सुडौल शरीर वाला होगा। मंगल सप्तमेश हो, तो पति का शरीर बलवान होगा। वह क्रोधी स्वभाव वाला, नियम का पालन करने वाला, सत्यवादी, छोटे कद वाला, शूरवीर, विद्वान तथा भ्रातृ प्रेमी होगा तथा सेना, पुलिस या सरकारी सेवा में कार्यरत होगा।

पति कितने भाई बहनों वाला होगा :

लड़की की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव से तृतीय भाव अर्थात नवम भाव उसके पति के भाई-बहन का स्थान होता है। उक्त भाव में स्थित ग्रह तथा उस पर दृष्टि डालने वाले ग्रह की संख्या से 2 बहन, मंगल से 1 भाई व 2 बहन बुध से 2 भाई 2 बहन वाला कहना चाहिए।

लड़की की जन्मकुंडली में पंचम भाव उसके पति के बड़े भाई-बहन का स्थान है। पंचम भाव में स्थित ग्रह तथा दृष्टि डालने वाला ग्रहों की कुल संख्या उसके पति के बड़े भाई-बहन की संख्या होगी। पुरुष ग्रह से भाई तथा स्त्री ग्रह से बहन समझना चाहिए।

पति का मकान :

लड़की की जन्म लग्न कुंडली में उसके लग्न भाव से तृतीय भाव पति का भाग्य स्थान होता है। इसके स्वामी के स्वक्षेत्री या मित्रक्षेत्री होने से पंचम और राशि से या तृतीयेश से पंचम जो राशि हो, उसी राशि का श्वसुर का गांव या नगर होगा।
प्रत्येक राशि में 9 अक्षर होते हैं। राशि स्वामी यदि शत्रुक्षेत्री हो, तो प्रथम, द्वितीय अक्षर, सम राशि का हो, तो तृतीय, चतुर्थ अक्षर मित्रक्षेत्री हो, तो पंचम, षष्ठम अक्षर, अपनी ही राशि का हो तो सप्तम, अष्टम अक्षर, उच्च क्षेत्री हो तो नवम अक्षर प्रसिद्ध नाम होगा। तृतीयेश के शत्रुक्षेत्री होने से जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि ससुराल या भवन की होगी।

यदि तृतीय भाव से शत्रु राशि में हो और तृतीय भाव में शत्रु राशि में पड़ा हो तो दसवीं राशि ससुर के गांव की होगी। लड़की की कुंडली में दसवां भाव उसके पति का भाव होता है। दशम भाव अगर शुभ ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो, या दशमेश से युक्त या दुष्ट हो तो पति का अपना मकान होता है। राहु, केतु, शनि से भवन बहुत पुराना होगा। मंगल ग्रह में मकान टूटा होगा। सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु एवं शुक्र से भवन सुंदर, सीमैंट का बहुमंजिला होगा। अगर दशम स्थान में शनि बलवान हो तो मकान बहुत विशाल होगा।

पति की नौकरी :

लड़की की जन्म लग्न कुंडली में चतुर्थ भाव पति का राज्य भाव होता है। अगर चतुर्थ भाव बलयुक्त हो और चतुर्थेश की स्थिति या दृष्टि से युक्त सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र की स्थिति या चंद्रमा की स्थिति उत्तम हो तो नौकरी का योग बनता है।

पति की आयु :

लड़की के जन्म लग्न में द्वितीय भाव उसके पति की आयु भाव है। अगर द्वितीयेश शुभ स्थिति में हो या अपने स्थान से द्वितीय स्थान को देख रहा हो तो पति दीर्घायु होता है। अगर द्वितीय भाव में शनि स्थित हो या गुरु सप्तम भाव, द्वितीय भाव को देख रहा हो तो भी पति की आयु 75 वर्ष की होती है।

अंक 4 : जानिए ज्योतिष और खांसी रोग का सम्बंध(कारण)…

प्रिय मित्रों/पाठकों, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहों के द्वारा ही व्यक्ति के शरीर का संचालन होता है। कुंडली न केवल व्यक्ति का आइना है बल्कि यह इस बात को दर्शाता है कि कौन सा ग्रह किस समय आपको शारीरिक कष्ट, लंबी और भयंकर बीमारी देकर जाएगा।

कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार मानव के शरीर का वर्गीकरण कुंडली के द्वादश भाव और नवग्रह के आधार पर किया गया है। सर्दी आते ही अमूमन लोग सर्दी, खांसी और जुकाम से पीड़ित हो जाते हैं।

ग्रह शरीर को बीमारियों का घर भी बना सकते हैं और आजीवन चुस्त-दुरुस्त भी रखते हैं।

आयुर्वेद में खांसी को कास रोग भी कहा जाता है। खांसी होने ये पहले रोगी को गले में खरखरापन, खराश, खुजली आदि होती है और गले में कुछ भरा हुआ-सा महसूस होता है। कभी-कभी मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है और भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है।

कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो एलर्जी के कारण अथवा अपनी दैनिक जीवन-शैली और आस-पास के रहन-सहन से प्रभावित होकर दमे से पीड़ित हो जाते हैं। सर्दी, खांसी और दमे का सीधा संबंध कुंडली के चौथे भाव से होता है। ये भाव छाती को संबोधित करता है। शास्त्रों ने चन्द्रमा को चौथे भाव का कारक माना है क्योंकि चौथा भाव उस माता को संबोधित करता है जो अपने शिशु को स्तनपान करवाती है। कुंडली में दूषित चन्द्रमा अथवा चन्द्रमा का पाप करती (कैंची) योग के बीच छुपना छाती संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं को न्यौता देता है।

नजला-खांसी, जुकाम और दमा चन्द्रमा एवं बुध के द्वंद योग के कारण भी उन्नत होता है। ज्योतिष की चिकित्सा प्रणाली के अनुसार चन्द्रमा को चौथे भाव को पुन: स्थापित करके छाती संबंधित समस्याओं से राहत पाई जा सकती है।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार हर बीमारी का संबंध किसी न किसी ग्रह से है, जो आपकी कुंडली में या तो कमजोर है, या फिर दूसरे ग्रहों से बुरी तरह पीड़ित है। इसी प्रकार काल पुरुष की कुंडली में मनुष्य शरीर के सभी अंगों को 12 भावों में बांटा गया है। इन 12 भावों में कालपुरुष की 12 राशियां आती हैं जिनके स्वामी 7 ग्रह हैं तथा छाया ग्रहों राहु-केतु के प्रभाव भी अति महत्वपूर्ण हैं। साथ ही 27 नक्षत्रों का प्रभाव भी मनुष्य शरीर के सभी अंगों पर बराबर बना रहता है। इनके स्वामी ग्रह भी ये ही 7 ग्रह हैं अर्थात् सारांश रूप से यह कह सकते हैं कि शरीर के सभी अंगों को 12 भाव/राशियां, 9 ग्रह व 27 नक्षत्र संचालित करते हैं।

यदि चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से देखें तो इसमें भी शरीर के सारे अंग आ जाते हैं जिनका चिकित्सा की दृष्टि से दवाई द्वारा उपचार करना है जबकि कुंडली में अंगों का उपचार औषधि की बजाय ज्योतिष से होता है। इन दोनों में सामंजस्य बैठाना ही काल पुरूष की कुंडली का चिकित्सा विज्ञान में प्रयोग करना कहते हैं।
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खांसी की बीमारी में ज्योतिष के इन उपाय से मिलेगी राहत–

👉🏻👉🏻👉🏻खाकी धागे में चांदी का चौकोर सिक्का पिरोकर धारण करें।

👉🏻👉🏻👉🏻सफेद रंग के अंत वस्त्र न पहनें।

👉🏻👉🏻सफेदे के पेड़ की पत्तियों को जलाकर घर में धूप करें।

👉🏻👉🏻सफेद गाय के शुद्ध घी में लौंग मिलाकर छाती पर लगाएं।
🌹🌹✍🏻✍🏻🌷🌷🙏🏻🙏🏻🌺🌺👉🏻👉🏻👉🏻
घरेलू इलाज
1. सूखी खांसी में दो कप पानी में आधा चम्मच मुलहठी चूर्ण डालकर उबालें। जब पानी आधा कप बचे तब उतारकर ठंडा करके छान लें। इसे सोते समय पीने से 4-5 दिन में अंदर जमा हुआ कफ ढीला होकर निकल जाता है और खांसी में आराम हो जाता है।

2. गीली खांसी के रोगी गिलोय, पीपल व कण्टकारी, तीनों को मोटा-मोटा कूटकर शीशी में भर लें। एक गिलास पानी में तीन चम्मच यह चूर्ण डालकर उबालें। जब पानी आधा रह जाए तब उतारकर बिलकुल ठंडा कर लें और 1-2 चम्मच शहद या मिश्री पीसकर डाल दें। इसे दिन में दो बार सुबह-शाम आराम होने तक पीना चाहिए।
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आयुर्वेदिक चिकित्सा
श्रंगराभ्र रस, लक्ष्मी विलास रस अभ्रकयुक्त और चन्द्रामृत रस, तीनों 10-10 ग्राम तथा सितोपलादि चूर्ण 50 ग्राम। सबको पीसकर एक जान कर लें और इसकी 30 पुड़िया बना लें। सुबह-शाम 1-1 पुड़िया, एक चम्मच वासावलेह में मिलाकर चाट लें। दिन में तीन बार, सुबह, दोपहर व शाम को, ‘हर्बल वसाका कफ सीरप’ या ‘वासा कफ सायरप’ आधा कप कुनकुने गर्म पानी में डालकर पिएँ। साथ में खदिरादिवटी 2-2 गोली चूस लिया करें। छोटे बच्चों को सभी दवाएँ आधी मात्रा में दें। प्रतिदिन दिन में कम से कम 4 बार, एक गिलास कुनकुने गर्म पानी में एक चम्मच नमक डालकर आवाज करते हुए गरारे करें।
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जानिए क्या रखें सावधानी :—

1 खांसी के रोगी को कुनकुना गर्म पानी पीना चाहिए और स्नान भी कुनकुने गर्म पानी से करना चाहिए। कफ ज्यादा से ज्यादा निकल जाए इसके लिए जब-जब गले में कफ आए तब-तब थूकते रहना चाहिए।

2 मीठा, क्षारीय, कड़वा और गर्म पदार्थों का सामान्य सेवन करना चाहिए। मीठे में मिश्री, पुराना गुड़, मुलहठी और शहद, क्षारीय चीजों में यवक्षार, नवसादर और सुहागा, द्रव्यों में सोंठ, पीपल और काली मिर्च तथा गर्म पदार्थों में गर्म पानी, लहसुन, अदरक आदि-आदि पदार्थों का सेवन करना लाभकारी होता है।

3 खांसी होने पर खटाई, चिकनाई, अधि‍क मिठाई, तेल के तले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा ठंड, ठंडी हवा और ठंडी प्रकृति के पदार्थों का सेवन करने से परहेज करना चाहिए।
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जानिए खांसी के प्रकार —

1. वातज खांसी : वात के कारण होने वाली खांसी में कफ सूख जाता है, इसलिए इसमें कफ बहुत कम निकलता है या निकलता ही नहीं है। कफ न निकल पाने के कारण, खांसी लगातार और तेजी से आती है, ताकि कफ निकल जाए। इस तरह की खांसी में पेट, पसली, आंतों, छाती, कनपटी, गले और सिर में दर्द भी होने लगता है।

2. पित्तज खांसी : पित्त के कारण होने वाली खांसी में कफ निकलता है, जो कि पीले रंग का कड़वा होता है। वमन द्वारा पीला व कड़वा पित्त निकलना, मुंह से गर्म बफारे निकलना, गले, छाती व पेट में जलन होना, मुंह सूखना, मुंह का स्वाद कड़वा रहना, प्यास लगती रहना, शरीर में गर्माहट या जलने का अनुभव होना और खांसी चलना, पित्तज खांसी के प्रमुख लक्षण हैं।

3. कफज खांसी : कफ के कारण होने वाली खांसी में कफ बहुत निकलता है। इसमें जरा-सा खांसते ही कफ आसानी से निकल आता है। कफज खांसी के लक्षणों में गले व मुंह का कफ से बार-बार भर जाना, सिर में भारीपन व दर्द होना, शरीर में भारीपन व आलस्य, मुंह का स्वाद खराब होना, भोजन में अरुचि और भूख में कमी के साथ ही गले में खराश व खुजली और खांसने पर बार-बार गाढ़ा व चीठा कफ निकलना शामिल है।

4. क्षतज खांसी : यह खांसी वात, पित्त, कफ, तीनों कारणों से होती है और तीनों से अधिक गंभीर भी। अधि‍क भोग-विलास (मैथुन) करने, भारी-भरकम बोझा उठाने, बहुत ज्यादा चलने, लड़ाई-झगड़ा करते रहने और बलपूर्वक किसी वस्तु की गति को रोकने आदि से रूक्ष शरीर वाले व्यक्ति के गले में घाव हो जाते हैं और खांसी हो जाती है।इस तरह की खांसी में पहले सूखी खांसी होती है, फिर रक्त के साथ कफ निकलता है।

5. क्षयज खांसी : यह खांसी क्षतज खांसी से भी अधिक गंभीर, तकलीफदेह और हानिकारक होती है। गलत खानपान, बहुत अधि‍क भोग-विलास, घृणा और शोक के के कारण शरीर की जठराग्नि मंद हो जाती है और इनके कारण कफ के साथ खांसी हो जाती है। इस तरह की खांसी में शरीर में दर्द, बुखार, गर्माहट होती है और कभी-कभी कमजोरी भी हो जाती है। ऐसे में सूखी खांसी चलती है, खांसी के साथ पस और खून के साथ बलगम निकलता है। क्षयज खांसी विशेष तौर से टीबी यानि (तपेदिक) रोग की प्रारंभिक अवस्था हो सकती है, इसलिए इसे अनदेखा बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।
चन्द्रमा के कारण होती है–सर्दी – खांसी, फेफड़ों में परेशानी, नजला, जुकाम, क्षय रोग, श्वास सम्बन्धी रोग एवं मानसिक रोगों के लिए चन्द्र उत्तरदायी होता है। चंद्रमा को शांति का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिषियों के मुताबिक दिमाग और खून से जुड़ी बीमारियों का संबंध चंद्रमा की दशा से है। चंद्रमा कर्क राशि का स्वामी है।

उपचार स्थिति–

प्रश्न कुण्डली में प्रथम, पंचम, सप्तम एवं अष्टम भाव में पाप ग्रह हों और चन्द्रमा कमज़ोर या पाप पीड़ित हों तो रोग का उपचार कठिन होता है जबकि चन्द्रमा बलवान हो और 1, 5, 7 एवं 8 भाव में शुभ ग्रह हों तो उपचार से रोग का ईलाज संभव हो पाता है.पत्रिका में तृतीय, षष्टम, नवम एवं एकादश भाव में शुभ ग्रह हों तो उपचार के उपरान्त रोग से मुक्ति मिलती है.सप्तम भाव में शुभ ग्रह हों और सप्तमांश बलवान हों तो रोग का निदान संभव होता है.चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह की स्थिति से ज्ञात होता है कि रोगी को दवाईयों से अपेक्षित लाभ प्राप्त होगा. इसके आलावा अलग अलग ग्रहों के उपचार के साथ साथ रोगो से बचने के लिये महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

-ऊँ नम: शिवाय मंत्र का सतत जाप करें।

-ऊँ हूँ जूँ स: इन बीज मंत्रो का चौबीसो घंटे जाप करे।

-शिव का अभिषेक करें।
जन्मजात रोग-प्रतिरोधात्मक क्षमता—-

सूर्य चन्द्रमा और लग्न– जन्मपत्रिका में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अच्छे स्वास्थ्य के लिए इन तीनों का बली होना अत्यंत आवश्यक है। यदि ये तीनों बली हो तो व्यक्ति आदिव्याधि से बचा रहता है। अष्टम भाव आयु का भाव है, इसलिए अष्टम भाव और अष्टमेश का भी बली होना आवश्यक है। जन्मजात रोग प्रतिरोधक क्षमता निम्न स्थितियों में अच्छी रहती है :—

1. बली लग्र एवं लग्नेश

2. लग्न एवं लग्नेश का शुभ कतृरि में होना

3. 3,6,11 में अशुभ ग्रह एवं गुलिक

4. केन्द्र-त्रिकोण में शुभ ग्रह होना

5. अष्टम भाव में शनि होना।

6. बली अष्टमेश

7. बली आत्मकारक

8. लग्न व अष्टम भाव में अधिक अष्टक वर्ग बिन्दु होना

जन्म पत्रिका में लग्र, सूर्य, चंद्र के चक्र बिंदुओ से शरीर के बाहरी, भीतरी रोग को आसानी से समझा जा सकता है। लग्र बाहर के रोगो का, तथा सूर्य भीतर के रोग, तेज, प्रकृति का तथा चंद्रमा मन उदर का प्रतिनिधी होता है। इन तीनों ग्रहों का अन्य ग्रहों से पारस्परिक संबध या शत्रुता ही शरीर के विभिन्न रोगो को जन्म देती है।

रक्तचाप के लिए चन्द्र, मंगल और शनि ग्रह को अधिक उत्तरदायी माना गया है। शनि ग्रह और साढ़े साती से व्याप्त भय तथा विनाश की चर्चा अक्सर की जाती है, हजारों उपाय भी किये जाए हैं। लेखक ने भी ऐसी ग्रह दशा से पीड़ित लोगों को रक्तचाप से ग्रसित होना बताया है। रक्तचाप की भांति मुधमेह भी आम रोग हो गया है। मानसिक तनाव और अनियमित खान-पान को इसका कारण बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बताया गया है कि सूर्य-चन्द्र द्वादश भाव में स्थित हों, राहु और सूर्य सप्तम स्थान में हों, शनि और मंगल के साथ चन्द्रमा छठे, आठवें और बारहवें स्थान में स्थित हों तो व्यक्ति नेत्रहीन होगा।

किसी भी जन्म पत्रिका का षष्ठ भाव रोग का स्थान होता है। शरीर में कब, कहां, कौन सा रोग होगा वह इसी से निर्धारित होता है। यहां पर स्थित क्रूर ग्रह पीड़ा उतपन्न करता है। उस पर यदि शुभ ग्रहो की दृष्टि न हो तो यह अधिक कष्टकारी हो जाता है।
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चिकित्सा ज्योतिष (मेडिकल एस्ट्रोलॉजी) के संबंध में कुछ नियम वेद-पुराणों में भी दिये गये हैं—

विष्णु पुराण तृतीय खंड अध्याय-11 के श्लोक 78 में आदेश है कि भोजन करते समय अपना मुख पूर्व दिशा, उत्तर दिशा में रखें । उससे पाचन क्रिया उत्तम रहती है और शरीर स्वस्थ रहता है।

इसी प्रकार विष्णु पुराण तृतीय अंश अध्याय-11 के श्लोक 111 में उल्लेख है कि शयन करते समय अपना सिर पूर्व दिशा में, या दक्षिण दिशा में रख कर सोवें। इससे स्वास्थ्य उत्तम रहता है।

उत्तर दिशा में सिर रख कर कभी नहीं सोवें, क्योंकि उत्तर दिशा में पृथ्वी का चुंबक नार्थ उत्तरी ध्रुव है और मानव शरीर का चुंबक सिर है। अतः 2 चुंबक एक दिशा में होने से असंतुलन होगा और नींद ठीक से नहीं आएगी तथा स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ेगा। उच्च रक्तचाप हो जाएगा। शायद इसी कारण भारतवर्ष में मृत शरीर का सिर उत्तर में रखते हैं।

कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि क्या ज्योतिषी डॉक्टर की भूमिका निभा सकते हैं? इसका उत्तर यह है कि ज्योतिषी डॉक्टर की भूमिका नहीं निभाते, परंतु जन्मपत्रिका, या हस्तरेखा के आधार पर ज्योतिषी यह बताने का प्रयत्न करते हैं कि उक्त व्यक्ति को भविष्य में कौन सी बीमारी होने की संभावना है, जैसे जन्मपत्रिका में तुला लग्न, या राशि पीड़ित हो, तो व्यक्ति को कमर के निचले वाले भाग में समस्या होने की संभावना रहती है। जन्मपत्रिका में बीमारी का घर छठवां स्थान माना जाता है और अष्टम स्थान आयु स्थान है।

तृतीय स्थान अष्टम से अष्टम होने से यह स्थान भी बीमारी के प्रकार की ओर इंगित करता है, जैसे तृतीय स्थान में चंद्र पीड़ित हो, तो टी.बी. की बीमारी की संभावना रहती है और तृतीय स्थान में शुक्र पीड़ित हो, तो शर्करा की बीमारी ‘मधुमेह’ की संभावना रहती है। शनि, या राहु तृतीय स्थान में पीड़ित होने पर जहर खाना, पानी में डूबना, ऊंचाई से गिरना और जलने से घाव होना आदि की संभावना बनती है।

बात केवल मनुष्य की नहीं है, उस क्षण में जन्मने वाले मिट्टी, पत्थर, मकान- दुकान, कुत्ता, बिल्ली, वृक्ष-वनस्पति सभी का सच एक ही है। यही कारण है कि ज्योतिष के मर्मज्ञ व विशेषज्ञ प्रत्येक जड़ या चेतन का ऊर्जा चक्र या कुण्डली तैयार करते हैं। यह चक्र प्रायः ब्रह्माण्डीय ऊर्जा की नव मूल धाराओं या नवग्रह एवं बारह विशिष्ट शक्तिधाराओं या राशियों को लेकर होता है। यदि गणना सही ढंग से की गई है तो इन ऊर्जा धाराओं के सांयोगिक प्रभाव इन पर देखने को मिलते हैं।
जानिए आपकी राशि (लग्न) अनुसार संभावित रोग और उनके उपचार—-
1. मेष : सिर दर्द, मानसिक तनाव, मतिभ्रम, पागलपन, उन्माद, अनिद्रा, मुख रोग, मेरूदंड के रोग, अग्नि जनित रोग।

उपाय : मेष राशि वाले जातक को प्रतिदिन रात को त्रिफला चूर्ण भिगोकर रखें। सुबह उसे छानकर निराहार पियें और लाल रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रात को पियें।

2. वृष : कान, नाक और दांत के रोग, खांसी, टॉन्सिल्स, थायराइड, सायनस।

उपाय : वृषभ राशि वाले जातक भी त्रिफला चूर्ण रात को भिगोकर रखें। सुबह उसे छानकर निराहार पियें। सफेद रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रात को पियें।

3. मिथुन : श्वास व गले के रोग, हाथ व कंधे में फ्रैक्चर, लकवा, तंत्रिका तंत्र रोग, पक्षाघात, मिर्गी, टीबी, फेफड़ों में संक्रमण, मज्जा के रोग, अस्थमा।

उपाय : मिथुन राशि के जातक प्रतिदिन भोजन करने के बाद आंवला चूर्ण में कुछ मात्रा में काली मिर्च चूर्ण मिलाकार सेवन करें हरे रंग की बोतल पानी भरकर धूप में 3-4 घंटे रखें और रात्रि में सेवन करें।

4. कर्क : हृदय रोग, रक्त विकार, स्तन कैंसर (गांठ), फेफड़ों व पसलियों के रोग, खांसी, जुकाम, छाती में दर्द, ज्वर, मानसिक रोग व तनाव।

उपाय : कर्क राशि वाले काली मिर्च, दालचीनी, सोंठ बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। प्रतिदिन रात के भोजन के बाद सेवन करें और सफेद बोतल में पानी भरकर धूप में दिन भर रखें और रात को सेवन करें।

5. सिंह : रक्त, उदर, वायु विकार, मेद वृद्धि, ल्यूकेमिया, एनीमिया, रक्तचाप (बी. पी.), अस्थि रोग (पीठ, कमर, जोड़ों व घुटनों के दर्द आदि), पेट दर्द, तिल्ली रोग, बुखार, हृदय रोग।

उपाय : सिंह राशि वाले मेष राशि वालों की तरह ही प्रतिदिन रात को त्रिफला चूर्ण भिगोकर रखें। सुबह उसे छानकर निराहार पियें और लाल रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रात को पियें।

6. कन्या : किडनी रोग, कमर दर्द, अपच, मंदाग्नि, जिगर रोग, आंतों के रोग, अमाशय के रोग, उदर रोग, अनिद्रा, रक्तचाप।

उपाय : कन्या राशि वाले प्रतिदिन रात्री के भोजन के एक घंटे बाद आंवले का चूर्ण का गुनगुने पानी के साथ सेवन करें। हरे रंग की बोतल में पानी भरकर धूप में 3-4 घंटे रखें और रात्रि में सेवन करें।

7. तुला : मूत्राशय रोग, मधुमेह, मूत्रकृच्छ, बहुमूत्र, प्रदर, मूत्रवाहिनी एवं मूत्र उत्सर्जन संबंधी रोग।

उपाय : तुला राशि वाले काली मिर्च, दालचीनी, सोंठ बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें और प्रतिदिन रात्री के भोजन के बाद सेवन करें। सफेद बोतल में पानी भरकर धूप में दिनभर रखें और रात को सेवन करें।

8. वृश्चिक : मलाशय व गुदा रोग, गुप्त रोग, जननेन्द्रिय रोग, अंडकोश व संसर्ग रोग, गर्भाशय रोग।

उपाय : वृश्चिक राशि वाले सिंह राशि और मेष राशि वालों की तरह ही प्रतिदिन रात को त्रिफला चूर्ण भिगोकर रखें। सुबह उसे छानकर निराहार पियें और लाल रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रात को पियें।

9. धनु : कूल्हे, जांघ के रोग, हड्डियां टूटना, मांसपेशियां खिंचना, चर्मरोग, जुकाम, यकृत दोष, ऋतु विकार।

उपाय : धनु राशि वाले काली मिर्च, दालचीनी, सोंठ बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें। प्रतिदिन रात्री के भोजन के बाद सेवन करें और पीली कांच की बोतल में पानी भरकर धूप में दिन भर रखें और रात को सेवन करें।

10. मकर : घुटनों के रोग, पिंडली रोग, चर्मरोग, वात व शीत रोग, रक्तचाप रोग।

उपाय : मकर राशि वाले अन्य राशि वालों की तरह ही प्रतिदिन रात को त्रिफला चूर्ण भिगो रखें। सुबह उसे छानकर निराहार पियें। नीले रंग की कांच की बोतल में पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रात को पियें।

11. कुंभ : मानसिक व जलोदर रोग, ऐंठन, गर्मी रोग, टखना हड्डी रोग, संक्रामक रोग।

उपाय : कुंभ राशि वाले सुबह-सुबह 2-3 लोंग का सेवन अवश्य करें। नीले रंग की कांच की बोतल को पानी भरकर 5-7 घंटे धूप में रखें और ये पानी रातभर पियें।

12. मीन : मूत्र उत्सर्जन, पेशाब में जलन, रुक-रुक कर आना, साफ न आना या बहुमूत्रता, किडनी रोग, पैर, पंजे, तलवे व एड़ी के रोग जैसे-एड़ी में पानी भर जाना, मानसिक तनाव, अनिद्रा, एलर्जी, चर्म रोग, रक्तविकार, आमवात, ग्रंथि रोग, गठिया रोग।

उपाय : मीन राशि वाले मेथी दाना,अजवाइन, जीरा और सूखा आंवला 1-1 ग्राम कांच के बर्तन में गलाकर रात भर रखें और सुबह छानकर उसका पानी निराहार पियें। पीली कांच की बोतल में पानी भरकर धूप में दिन भर रखें और रात को सेवन करें।

अंक 3 : जानिए कैसे बदलें अपने सिग्नेचर(हस्ताक्षर) से अपना भाग्य (किस्मत)…

प्रिय मित्रों/पाठकों, हस्ताक्षर (दस्तखत /सिग्नेचर) किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का संपूर्ण आइना होता है अत: व्यक्ति के हस्ताक्षर में उसके व्यक्तित्व की सभी बातें पूर्ण रूप से दिखाई देती है।

इस प्रकार हस्ताक्षर एक दर्पण है जिसमें व्यक्तित्व की परछाई स्पष्ट रूप से झलकती है।
हर व्यक्ति की लिखावट के अनुसार उसके हस्ताक्षर भी बहुत कुछ बताते है। जिन लोगों के दस्तखत के अक्षर ऊपर की तरफ जाते हैं, उनका स्वभाव महत्वाकांक्षी तथा उत्साही होता है। यह व्यक्ति सकारात्मक दृष्टि रखने वाले होते हैं। जिनके हस्ताक्षर सीधी लाइन पर जाते हैं, ऐसे व्यक्ति हर काम सुनियोजित रूप से करते हैं। यह व्यक्ति परिपक्व और जल्दी फैसला लेने वाले होते हैं।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार लिखावट व्यक्तित्व का दर्पण होती है। इससे हम व्यक्ति का रहन-सहन, व्यवहार, विचारधारा आदि जान सकते हैं क्योंकि लिखावट अनजाने में की गई अभिव्यक्ति होती है। समय के साथ-साथ जैसे-जैसे व्यक्ति के विचार, भावनाएं, क्रिया कलाप आदि परिवर्तित होते जाते हैं, उसकी लिखावट भी अपना रूप बदलती जाती है। किंतु अधिक बार लिखावट बदलना उसकी मनःस्थिति के लिए अच्छा नहीं माना जाता। लिखावट सब कुछ बताती है। इसके कुछ विशेष गुण हं- उतार-चढ़ाव, प्रकार, हाशिया, दबाव, गति, शब्दों और पंक्तियों के बीच दूरी आदि।

हमारे मन एवं मस्तिष्क में सोच, विचार, स्वभाव, व्यक्तित्व, अंत:करण, मित्रता, शत्रुता, दुख, सुख, संयम, परिश्रम की मिली-जुली स्थितियां निर्मित होती हैं, जिनकी अभिव्यक्ति हमारे बाह्य शारीरिक अंगों से प्रदर्शित क्रिया से पता चलती है। हस्ताक्षर भी ‍‍मस्तिष्क के आदेश से ही अंगुलियों द्वारा संपादित होता है। इस वजह से इस माध्यम से व्यक्ति मनोवृत्ति का पता लगाया जा सकता है।

जिस प्रकार संसार में किन्हीं दो व्यक्तियों के साथ की रेखाएँ एक-सी नहीं होतीं, उसी प्रकार किन्हीं दो व्यक्तियों के हस्ताक्षर भी एक-से नहीं हो सकते। कोई अक्षरों पर सीधी लाइन खींचता है तो कोई बिना लाइन के ही अक्षर लिखता चला जाता है। किसी के अक्षरों पर टूटती हुई लाईन बढ़ती चली जाती है तो किसी के अक्षरों पर लहरियेदार पंक्ति बनती चली जाती है।

विश्व के सभी व्यक्तियों के अंगूठे भिन्न-भिन्न तरह के होते हैं। जितने प्रकार के या जितने लोग हैं, उतने ही अंगूठे हैं। यही कारण है कि प्राचीन काल से अभी तक प्रमाण के लिए अंगूठे का छाप ही लिया जाता रहा है। संभावनाओं की दृष्टि से इन अंगूठों पर शोध करने की संभावनाएं असीमित हो सकती है। किन्तु पतली कैपिलरीज रेखाओं को ध्यान से देखा जाए, तो अंगूठे में बननेवाले चिन्ह शंख चक्र या सीपी ही होते हैं। इन मुख्य चिन्हों की बनावट विभिन्न हाथों में भिन्न-भिन्न प्रकार की होती है।

इस कारण ही एक व्यक्ति के अंगूठे की छाप देखकर यह तय करना निश्चित होता है कि यह किस अंगूठे का चिन्ह है, किन्तु केवल अंगूठे के चिह्न को देखकर ही उसके संपूर्ण चरित्र को उद्घोषित करना बहुत ही कठिन काम है। जब पूरी हथेली के चिन्हों और रेखाओं से ही जीवन में घटित होनेवाली संपूर्ण घटनाओं की जानकारी प्राप्त कर पाना संभव नहीं है, तो सिर्फ अंगूठे से ही कितना कुछ बताया जा पाएगा, यह सोंचनेवाली बात हो सकती है।
पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार हस्ताक्षर बनाने में भी अंगूठे की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अन्य कई उंगलियों का सहयोग भी प्राप्त करना होता है। किसी व्यक्ति का हस्ताक्षर भी दूसरे व्यक्ति से भिन्न ही होता है। किसी ऑफिस या बैंक में व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण उसका हस्ताक्षर ही होता है। हस्ताक्षर के विशेषज्ञ किसी के मात्र हस्ताक्षर को देखकर ही उसके चरित्र का विश्लेषण करने का दावा करते हैं। जैसे- व्यक्ति कल्पनाशील है या व्यावहारिक ? यदि कल्पनाशील है, तो उसमें सृजनात्मक शक्ति है या नहीं ? व्यावहारिक है, तो उसमें संगठनात्मक शक्ति है या नहीं ? वह व्यक्ति महत्वपूर्ण है या उसके कार्यक्रम ? प्रारंभ से अंत तक विचारों का तालमेल है या बीच में कहीं भटकाव है ? आदि तथ्यों पर प्रकाश डालने के लिए, हो सकता है,किसी व्यक्ति का मात्र हस्ताक्षर ही काफी होता है, किन्तु केवल हस्ताक्षर से ही व्यक्ति के दशाकाल की चर्चा करना, किस वर्ष किस प्रकार की घटना घटेगी, किस समय धन की प्राप्ति होगी, संपत्ति की प्राप्ति होगी, किसी समस्या का अंत होगा, इन सब बातों की चर्चा कर पाना मुश्किल ही नहीं असंभव भी है।
जीवन के बहुआयामी पहलू और व्यक्ति की सभी विशेषताओं पर प्रकाश डालना किसी हस्ताक्षर से संभव नहीं हो सकता। हस्ताक्षर विज्ञान की सीमाएं बहुत छोटी है। हस्ताक्षर विज्ञान से संबंधित किसी पुस्तक को पढ़ें, तो यह ज्ञात होगा कि इसके अद्यतन विकास के बावजूद किसी भी व्यक्ति के हस्ताक्षर के फल को लिखने के लिए कुछ पंक्तियॉ ही पर्याप्त होंगी।
व्यक्ति के हस्ताक्षर उसके अन्तर्बाह्वा का सजीव प्रतिबिम्ब है, कागज़ पर अंकित उसका व्यक्तित्व है, जो चिरस्थाई है, अमिट है और अपने आप में उसके जीवन का सम्पूर्ण इतिवृत्त समेटे हुए है।हस्ताक्षर (सिग्नेचर) विज्ञान के अनुसार हर इंसान की लिखावट उसका आइना होती है। लिखावट में अक्षरों की बनावट और लिखने का तरिका आपकी सोच विचार, चरित्र और व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ बताता है।
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हर व्यक्ति की लिखावट के अनुसार उसके हस्ताक्षर भी बहुत कुछ बताते है।
आइए जाने व्यक्ति के हस्ताक्षर से उसके स्वभाव के बारे में –

जो लोग हस्ताक्षर का पहला अक्षर बड़ा लिखते हैं वे विलक्षण प्रतिभा के धनी होते हैं। ऐसे लोग किसी भी कार्य को अपने ही अलग अंदाज से पूरा करते हैं। पहला अक्षर बड़ा बनाने के बाद अन्य अक्षर छोटे-छोटे और सुंदर दिखाई देते हों तो व्यक्ति धीरे-धीरे किसी खास मुकाम पर पहुंच जाता है। ऐसे लोगों को जीवन में सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त हो जाती हैं। कुछ लोग हस्ताक्षर के नीचे दो लाइन खींचते हैं। जो ऐसे सिग्नेचर करते हैं उनमें असुरक्षा की भावना अधिक होती है। ऐसे लोग किसी भी कार्य में सफलता को लेकर संशय में रहते हैं। खर्च करने में इन्हें काफी बुरा महसूस होता है अर्थात् ये लोग कंजूस भी हो सकते हैं।
जिस व्यक्ति के सिग्नेचर में अक्षर नीचे से ऊपर की ओर जाते हैं तो वह ईश्वर पर आस्था रखने एवं आशावादी होता है।
ऊपर से नीचे की ओर सिग्नेचर करने वाले नकारात्मक विचारों वाले एवं अव्यावहारिक होते हैं। इनकी मित्रता कम लोगों से रहती है।
सरल रेखा में हस्ताक्षर करने वाले सरल स्वभाव और साफ दिल के रहते हैं, लेकिन इनका स्वभाव तार्किक रहता है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि जिन लोगों के हस्ताक्षर नीचे की तरफ मुड़ते हैं, ऐसे व्यक्तियों में कुछ भावनात्मक समस्या होती है तथा इनमें आत्मविश्वास और उत्साह की कमी होती है। ऐसे व्यक्ति जीवन के प्रति नकारात्मक नजरिया रखते हैं। इसी तरह लिखावट से भी व्यक्ति का स्वभाव पहचाना जा सकता है। बड़े अक्षरवाली व्यक्ति काफी उत्साहित, सृजनशील तथा बातें करने में माहिर होते हैं। छोटे अक्षर लिखने वाले व्यक्ति बुद्धिजीवी, आदर्शवाद में विश्वास रखने वाले, अपना काम पूरा ध्यान केंद्रित करके पूरा करने वाले होते हैं।

अंत में डॉट या डेश लगाने वाले व्यक्ति डरपोक, शंकालु प्रवृत्ति के होते हैं।

पेन पर जोर देकर लिखने वाले भावुक, उत्तेजक, हठी और स्पष्टवादी होते हैं।
बिना पेन उठाए एक ही बार में पूरा शब्द लिखने वाले रहस्यवादी, गुप्त प्रवृत्ति एवं ‍वाद-विवादकर्ता होते हैं।
वहीँ जो लोग बुरी तरह से जल्दी से हस्ताक्षर करते हैं जो पढने में भी न आये वे लोग जीवन में कई प्रकार की परेशानियों का सामना करते हैं। ऐसे लोग सुखी जीवन नहीं जी पाते हैं। हालांकि ऐसे लोगों में कामयाब होने की चाहत बहुत अधिक होती है और इसके लिए वे श्रम भी करते हैं। ये लोग किसी को धोखा भी दे सकते हैं। जिन लोगों के हस्ताक्षर एक जैसे लयबद्ध नहीं दिखाई देते हैं वे मानसिक रूप से अस्थिर होते होते हैं। इन्हें मानिकस कार्यों में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वहीँ, जिन लोगों के हस्ताक्षर सामान्यरूप से कटे हुए दिखाई देते हैं वे नकारात्मक विचारों वाले होते हैं। इन्हें किसी भी कार्य में असफलता पहले नजर आती है।
अवरोधक चिह्न लगाने वाले व्यक्ति कुंठाग्रस्त, सामाजिकता व नैतिकता की देते हैं एवं आलसी प्रवृत्ति के होते हैं।
जल्दी से हस्ताक्षर करने वाले कार्य को गति से हल करने व तीव्र तात्कालिक बुद्धि वाले होते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति हस्ताक्षर करने के साथ ही कुछ निश्चित चित्रों का प्रयोग भी करता ही है जैसे हस्ताक्षर करने के बाद आड़ी तिरछी एक या दो रेखाएं खींचना, बिंदु का प्रयोग अथवा (’) इत्यादि का प्रयोग करना। ये चिह्न एवं इस प्रकार किये हस्ताक्षर व्यक्ति के व्यक्तित्व, मनोव एवं चारित्रिक गुणों को अपने में समाहित किये रहते हैं।
शिरो रेखा से हस्ताक्षर जागरूक, सजग एवं बुद्धि का सही उपयोग करने वाले होते हैं।
स्पष्ट सिग्नेचर करने वाले खुले मन के, विचारवान तथा पारदर्शी प्रवृत्ति कार्य करने वाले होते हैं।
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“हस्ताक्षर” दो शब्दों हस्त+अक्षर से निर्मित शब्द है जिसका अर्थ है हाथों से लिखित अक्षर। वैसे तो वर्णमाला के सभी अक्षरों को लिखने के लिए हाथों का प्रयोग किया जाता है परंतु ‘हस्ताक्षर’ शब्द का प्रयोग प्रमुखतः अपने नाम को संक्षिप्त एवं कलात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए ही होता है। हस्ताक्षर को अंग्रेजी भाषा में’ sign’ या ‘Signature’ कहते हैं जिसका अर्थ है “A mark or object to represent one’s name or a person’s name signed by himself”

देखने में साधारणतया ‘हस्ताक्षर’ एक बहुत ही छोटा सा शब्द है किंतु हस्ताक्षर का प्रत्येक वर्ण एवं प्रत्येक चिह्न कुछ न कुछ अवश्य कहता है। यदि गहराई से किसी भी व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित वर्णों का अध्ययन किया जाए तो उस व्यक्ति विशेष की चारित्रिक विशेषताएं एवं भविष्य का ज्ञान भी सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ज्योतिष शास्त्र में नौ ग्रहों एवं बारह भावों को सर्वसम्मति से मान्यता प्राप्त है। ये नौ ग्रह व्यक्ति की चारित्रिक विशेषताओं के स्पष्ट दर्पण एवं भविष्य की घटनाओं के निपुण वक्ता होते हैं। इन ग्रहों का संबंध भी व्यक्ति की लिखावट, लेखन शैली एवं हस्तलिखित अक्षरों से अवश्य ही होता है।

सूर्य ग्रह और हस्ताक्षर – जिन जातकों की कुंडली में सूर्य बलवान एवं शुभ अवस्था में होता है, उनके हस्ताक्षर सरल, सीधे व स्पष्ट होते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने नामांकित अक्षरों को स्पष्ट रूप से लिखना पसंद करते हैं। ऐसे व्यक्ति सरल स्वभाव व विशाल हृदय के स्वामी होते हैं। ज्योतिष में सूर्य ग्रह को सम्मान, पद, प्रतिष्ठा, आत्मा इत्यादि का कारक माना गया है। अतः जब किसी की कंडली में सूर्य शुभ स्थिति में होगा तो वह ऐसे ही हस्ताक्षर करेगा एवं समाज में प्रतिष्ठित पद भी प्राप्त करेगा। ऐसा व्यक्ति उच्च स्तरीय ज्ञान का स्वामी एवं अच्छा संगठन कर्ता भी होगा।

चंद्र ग्रह एवं हस्ताक्षर – जन्म कुंडली में चंद्रमा यदि शुभ स्थिति में केंद्र व त्रिकोणस्थ होगा तो जातक के हस्ताक्षरों में स्पष्टता एवं अंत में एक बिंदु रखने की प्रवृ होती है। चंद्रमा को ज्योतिष में मन का कारक माना गया है। शुभ चंद्रमा वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर सजावटी, सुंदर और गोल-गोल होते हैं। ऐसा व्यक्ति जो कार्य प्रारंभ करता है, उसे कुशलता पूर्वक पूर्ण भी करता है। यदि चंद्रमा पर दूषित प्रभाव है अथवा ‘ग्रहण योग’ की स्थिति कुंडली में बन रही है तो ऐसा जातक हस्ताक्षर के नीचे दो लाइनें खींचता है। ये चिह्न जातक के मन में असुरक्षा की भावना एवं अत्यधिक भावुकता एवं कोमल मन को परिलक्षित करते हैं। ऐसे हस्ताक्षर के व्यक्ति पर नकारात्मक सोच का प्रभाव भी अत्यधिक होता है।

मंगल ग्रह और हस्ताक्षर – जन्म कुंडली में मंगल ग्रह की स्थिति भी हस्ताक्षरों के संबंध में बहुत कुछ कहती है। लग्न कुंडली में यदि मंगल ग्रह बलवान एवं शुभ होगा तो सामान्यतया देखा गया है कि ऐसे जातक हस्ताक्षरों के नीचे पूरी लाईन खींचते हैं। चूंकि मंगल ग्रह पराक्रम, साहस, क्रोध, इत्यादि का कारक है तो ऐसे हस्ताक्षर वाले जातक अत्यधिक पराक्रमी एवं साहसी होते हैं। आत्म निर्भरता इनमें कूट-कूट कर भरी होती है। अपने साहसी स्वभाव एवं प्रतियोगी शक्ति के आधार पर ऐसे व्यक्ति सामाजिक कार्यों में अग्रणी रहते हैं और यदि दशम भाव भी बलवान है तो इन्हें ख्याति भी खूब मिलती है।

बुध ग्रह एवं हस्ताक्षर – बुध ग्रह को ज्योतिष में लेखन क्षमता, तर्क शक्ति, ज्ञान एवं लेखन का कारक माना गया है। अतः जब भी कोई जातक ऐसे हस्ताक्षर करें जो स्पष्ट एवं गोलाकर बिंदु के रूप में हों तो ऐसे जातक अच्छे चिंतक, विचारक, लेखक एवं सम्पादक होते हैं।
ऐसे हस्ताक्षरों वाले जातक, ज्ञानी, विद्वान, शिक्षक, त्याग एवं परोपकार की भावना से पूर्ण होते हैं। उनके जीवन के निश्चित आदर्श एवं लक्ष्य होते हैं और उन्हें प्राप्त करने में उन्हें सफलता भी मिलती है।

गुरु ग्रह एवं हस्ताक्षर – जैसा कि विदित है कि गुरु ग्रह को ज्योतिष शास्त्र में विवेक, बुद्धिमत्ता एवं दार्शनिकता का कारक माना गया है, तो जिसकी जन्म पत्रिका में गुरु ग्रह शुभ स्थिति में होगा ऐसा जातक हस्ताक्षर करते समय पहला अक्षर बड़ा बनायेगा और हस्ताक्षर नीचे से ऊपर की ओर करेगा। गुरु ग्रह शुभ होने के साथ-साथ भी नवम भाव भी शुभ दृष्टि एवं शुभ प्रभाव में है तो ऐसे हस्ताक्षर वाले जातक महत्वाकांक्षी एवं ईश्वर तथा वृद्ध जनों के प्रति पूर्ण आस्था रखने वाले होते हैं। चूंकि नवम् भाव एवं गुरु ग्रह दोनों ही ईश्वर के प्रति आस्था को दर्शाते हैं तो यदि गुरु ग्रह पर नकारात्मक प्रभाव है तो ऐसे जातक के हस्ताक्षर सदैव ऊपर से नीचे की ओर होंगे जो जातक की संकीर्ण मानसिकता एवं ईश्वर में अविश्वासी प्रवृ को भी परिलक्षित करेंगे।

शुक्र ग्रह एवं हस्ताक्षर – सुंदर, कलात्मक एवं हस्ताक्षर के नीचे एक गोलाकर स्वरूप लिए हुए एक छोटी पंक्ति दर्शाती है कि जातक का व्यक्तित्व एवं जीवन शुक्र ग्रह से पूर्ण प्रभावी है।
ऐसे व्यक्ति मीडिया, फिल्म लाईन, वस्त्र उद्योग एवं कलात्मक क्षेत्र में अत्यंत सफल होते हैं। साथ ही यदि चतुर्थ भाव पर शुभ प्रभाव होगा तो हस्ताक्षर और भी सुंदर एवं कलात्मक होंगे तथा ऐसे जातकों का पारिवारिक जीवन भी पूर्ण सुखी एवं प्रत्येक प्रकार की सुख सुविधा एवं भोग-विलास से युक्त होगा।

शनि ग्रह एवं हस्ताक्षर – कुंडली में शनि ग्रह का प्रभाव हो तो हस्ताक्षर के नीचे दो रेखाएं खींचने की प्रवृ होती है। शनि ग्रह के स्वामित्व वाले व्यक्ति अन्वेषक प्रवृ के होते हैं। अतः ऐसे व्यक्ति कुछ न कुछ नवीन कार्य एवं शोध करते रहते हैं और यदि भाग्य साथ दे एवं स्वर्णिम अवसरों की प्राप्ति भी हो तो जीवन में इलेक्ट्रानिक, पेट्रोलियम एवं ज्योतिष के क्षेत्र में उच्चस्तरीय सफलता भी प्राप्त करते हैं।
राहु-केतु एवं हस्ताक्षर – कुछ लोगों के हस्ताक्षर बहुत छोटे हें। यदि अक्षर बहुत छोटे हैं तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है जन्म कुंडली में केतु का प्रभाव बहुत ज्यादा है। पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ऐसा जातक गुप्त विद्याओं में रुचि रखेगा, चालाक, धूत्र्त होगा तथा अपनी कुटिल प्रवति के कारण दूसरों को नुकसान पहुंचाना चाहेगा (ऐसा तभी होगा जब केतु ग्रह पर और भी अशुभ ग्रहों का प्रभाव आ जाये)। किंतु यदि केतु पर गुरु ग्रह का प्रभाव है तो हस्ताक्षर भले ही छोटे हों किंतु उनमंल भी एक स्पष्टता होगी जो कि जातक की पारदर्शी मानसिकता एवं विवेक शक्ति की परिचायक होगी।
यदि जन्मपत्रिका में सूर्य, शनि एवं राहु-केतु आदि सभी क्रूर ग्रह और भी अधिक पाप प्रभाव में हों तो प्रायः देखने में आया है कि जातक के हस्ताक्षर भी शब्दों को घुमाकर, तोड़ मरोड़ कर, दूर-दूर एवं अस्पष्ट होंगे। अतः ऐसे जातक जीवन में निराशा, नकारात्मक एवं अलगाववादी प्रव के स्वामित्व वाले होते हैं। ऐसी परिस्थिति में यदि अष्टम भाव भी पीड़ित है तो जातक के प्रत्येक कार्य में व्यवधान भी आते हैं, उन्नति भी देर से होती है।
पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जो व्यक्ति अपने हस्ताक्षर स्पष्ट लिखते हैं तथा हस्ताक्षर के अंतिम शब्द की लाइन या मात्रा को इस प्रकार खींच देते हैं जो ऊपर की तरफ जाती हुई दिखाई देती हे, ऎसे व्यक्ति लेखक, शिक्षक, विद्वान, बहुत ही तेज दिमाग के शातिर अपराघी होते हैं। ऎसे व्यक्ति दिल के बहुत साफ होते हैं हरेक के साथ सहयोग करने के लिए तैयार रहते हैं। मिलनसार, मृदुभाषी, समाज सेवक, परोपकारी होते हैं। यह व्यक्ति कभी किसी का बुरा नहीं सोचते हैं, सामने वाला व्यक्ति कैसा भी क्यों न हो हमेशा उसे सम्मान देते हैं। सर्वगुण संपन्न होने के बावजूद भी आपको समाज में सम्मान घीरे-घीरे प्राप्त होता है। जीवन के उत्तरार्द्ध में आपको काफी पैसा व पूर्ण सम्मान प्राप्त होता है। जीवन में इच्छाएं सीमित होने के कारण इन्हें जो भी घन व प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। उससे यह काफी संतुष्ट रहते हैं।
जिन लोगों के दस्तखत के अक्षर ऊपर की तरफ जाते हैं, उनका स्वभाव महत्वाकांक्षी तथा उत्साही होता है। यह व्यक्ति सकारात्मक दृष्टि रखने वाले होते हैं। जिनके हस्ताक्षर सीधी लाइन पर जाते हैं, ऐसे व्यक्ति हर काम सुनियोजित रूप से करते हैं। यह व्यक्ति परिपक्व और जल्दी फैसला लेने वाले होते हैं।
जिनके हस्ताक्षर नीचे की तरफ मुड़ते हैं, ऐसे व्यक्तियों में कुछ भावनात्मक समस्या होती है तथा इनमें आत्मविश्वास और उत्साह की कमी होती है। ऐसे व्यक्ति जीवन के प्रति नकारात्मक नजरिया रखते हैं।
किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर या लेखन से उसके स्वभाव का पता चलता है। इसके लिए थोड़े अध्ययन की जरूरत है। कई हस्ताक्षरों और अक्षरों के परीक्षण करने के बाद आप भी हस्ताक्षर से स्वभाव की परख करने की इस कला को सीख सकते हैं। हस्ताक्षर या लिखावट से हमारा सीघा संबंघ मानसिक विचारों से होता है, यानि हम जो सोचते हैं करते हैं। जो व्यवहार मे लाते हैं वह सब अवचेतन रूप में कागज पर अपनी लिखावट व हस्ताक्षर के द्वारा प्रदर्शित कर देते हैं।हस्ताक्षर के अघ्ययन से व्यक्ति अपने भविष्य व व्यक्तित्व के बारे में जानकारी कर सकते हैं और हस्ताक्षर में दिखाई देने वाली कमियों को दूर करते हुए अच्छे हस्ताक्षर के साथ-साथ अपना भविष्य व व्यक्तित्व भी बदल सकते हैं।
✍🏻✍🏻 पं. दयानन्द शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, उज्जैन।

अंक 2 : श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र : जानिए इस चमत्कारिक यंत्र से अपनी समस्याओं का समाधान

हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो में कई तरह के यंत्रों के बारे में बताया गया है जैसे हनुमान प्रश्नावली चक्र, नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र, राम श्लोकी प्रश्नावली, श्रीगणेश प्रश्नावली चक्र आदि। इन यंत्रों की सहायता से हम अपने मन में उठ रहे सवाल, हमारे जीवन में आने वाली कठिनाइयों आदि का समाधान पा सकते है। इन्ही में से एक श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के बारे में हम आज आपको बता रहे है।

हिंदू धर्म में भगवान श्रीगणेश को प्रथम पूज्य माना गया है अर्थात सभी मांगलिक कार्यों में सबसे पहले श्रीगणेश की ही पूजा की जाती है। श्रीगणेश की पूजा के बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। श्रीगणेश प्रश्नावली यंत्र के माध्यम से आप अपने जीवन की परेशानियों व सवालों का हल आसानी से पा सकते हैं। यह बहुत ही चमत्कारी यंत्र है।

उपयोग विधि
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जिसे भी अपने सवालों का जवाब या परेशानियों का हल जानना है वो पहले पांच बार ऊँ नम: शिवाय: मंत्र का जप करने के बाद 11 बार ऊँ गं गणपतयै नम: मंत्र का जप करें। इसके बाद आंखें बंद करके अपना सवाल पूछें और भगवान श्रीगणेश का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर कर्सर घुमाते हुए रोक दें। जिस कोष्ठक(खाने) पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक के फलादेश को ही अपने अपने प्रश्न का उत्तर समझें।

1- आप जब भी समय मिले राम नाम का जप करें। आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।

2- आप जो कार्य करना चाह रहे हैं, उसमें हानि होने की संभावना है। कोई दूसरा कार्य करने के बारे में विचार करें। गाय को चारा खिलाएं।

3- आपकी चिंता दूर होने का समय आ गया है। कष्ट मिटेंगे और सफलता मिलेगी। आप रोज पीपल की पूजा करें।

4- आपको लाभ प्राप्त होगा। परिवार में वृद्धि होगी। सुख संपत्ति प्राप्त होने के योग भी बन रहे हैं। आप कुल देवता की पूजा करें।

5- आप शनिदेव की आराधना करें। व्यापारिक यात्रा पर जाना पड़े तो घबराएं नहीं। लाभ ही होगा।

6- रोज सुबह भगवान श्रीगणेश की पूजा करें। महीने के अंत तक आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी।

7- पैसों की तंगी शीघ्र ही दूर होगी। परिवार में वृद्धि होगी। स्त्री से धन प्राप्त होगा।

8- आपको धन और संतान दोनों की प्राप्ति के योग बन रहे हैं। शनिवार को शनिदेव की पूजा करने से आपको लाभ होगा।

9- आपकी ग्रह दिशा अनुकूल चल रही है। जो वस्तु आपसे दूर चली गई है वह पुन: प्राप्त होगी।

10- शीघ्र ही आपको कोई प्रसन्नता का समाचार मिलने वाला है। आपकी मनोकामना भी पूरी होगी। प्रतिदिन पूजन करें।

11- यदि आपको व्यापार में हानि हो रही है तो कोई दूसरा व्यापार करें। पीपल पर रोज जल चढ़ाएं। सफलता मिलेगी।

12- राज्य की ओर से लाभ मिलेगा। पूर्व दिशा आपके लिए शुभ है। इस दिशा में यात्रा का योग बन सकता है। मान-सम्मान प्राप्त होगा।

13- कुछ ही दिनों बाद आपका श्रेष्ठ समय आने वाला है। कपड़े का व्यवसाय करेंगे तो बेहतर रहेगा। सब कुछ अनुकूल रहेगा।

14- जो इच्छा आपके मन में है वह पूरी होगी। राज्य की ओर से लाभ प्राप्ति का योग बन रहा है। मित्र या भाई से मिलाप होगा।

15- आपके सपने में स्वयं को गांव जाता देंखे तो शुभ समाचार मिलेगा। पुत्र से लाभ मिलेगा। धन प्राप्ति के योग भी बन रहे हैं।

16- आप देवी मां पूजा करें। मां ही सपने में आकर आपका मार्गदर्शन करेंगी। सफलता मिलेगी।

17- आपको अच्छा समय आ गया है। चिंता दूर होगी। धन एवं सुख प्राप्त होगा।

18- यात्रा पर जा सकते हैं। यात्रा मंगल, सुखद व लाभकारी रहेगी। कुलदेवी का पूजन करें।

19- आपके समस्या दूर होने में अभी करीब डेढ़ साल का समय शेष है। जो कार्य करें माता-पिता से पूछकर करें। कुल देवता व ब्राह्मण की सेवा करें।

20- शनिवार को शनिदेव का पूजन करें। गुम हुई वस्तु मिल जाएगी। धन संबंधी समस्या भी दूर हो जाएगी।

21- आप जो भी कार्य करेंगे उसमें सफलता मिलेगी। विदेश यात्रा के योग भी बन रहे हैं। आप श्रीगणेश का पूजन करें।

22- यदि आपके घर में क्लेश रहता है तो रोज भगवान की पूजा करें तथा माता-पिता की सेवा करें। आपको शांति का अनुभव होगा।

23- आपकी समस्याएं शीघ्र ही दूर होंगी। आप सिर्फ आपके काम में मन लगाएं और भगवान शंकर की पूजा करें।

24- आपके ग्रह अनुकूल नहीं है इसलिए आप रोज नवग्रहों की पूजा करें। इससे आपकी समस्याएं कम होंगी और लाभ मिलेगा।

25- पैसों की तंगी के कारण आपके घर में क्लेश हो रहा है। कुछ दिनों बाद आपकी यह समस्या दूर जाएगी। आप मां लक्ष्मी का पूजन रोज करें।

26- यदि आपके मन में नकारात्मक विचार आ रहे हैं तो उनका त्याग करें और घर में भगवान सत्यनारायण का कथा करवाएं। लाभ मिलेगा।

27- आप जो कार्य इस समय कर रहे हैं वह आपके लिए बेहतर नहीं है इसलिए किसी दूसरे कार्य के बारे में विचार करें। कुलदेवता का पूजन करें।

28- आप पीपल के वृक्ष की पूजा करें व दीपक लगाएं। आपके घर में तनाव नहीं होगा और धन लाभ भी होगा।

29- आप प्रतिदिन भगवान विष्णु, शंकर व ब्रह्मा की पूजा करें। इससे आपको मनचाही सफलता मिलेगी और घर में सुख-शांति रहेगी।

30- रविवार का व्रत एवं सूर्य पूजा करने से लाभ मिलेगा। व्यापार या नौकरी में थोड़ी सावधानी बरतें। आपको सफलता मिलेगी।

31- आपको व्यापार में लाभ होगा। घर में खुशहाली का माहौल रहेगा और सबकुछ भी ठीक रहेगा। आप छोटे बच्चों को मिठाई बांटें।

32- आप व्यर्थ की चिंता कर रहे हैं। सब कुछ ठीक हो रहा है। आपकी चिंता दूर होगी। गाय को चारा खिलाएं।

33- माता-पिता की सेवा करें, ब्राह्मण को भोजन कराएं व भगवान श्रीराम की पूजा करें। आपकी हर अभिलाषा पूरी होगी।

34- मनोकामनाएं पूरी होंगी। धन-धान्य एवं परिवार में वृद्धि होगी। कुत्ते को तेल चुपड़ी रोटी खिलाएं।

35- परिस्थितियां आपके अनुकूल नहीं है। जो भी करें सोच-समझ कर और अपने बुजुर्गो की राय लेकर ही करें। आप भगवान दत्तात्रेय का पूजन करें।

36- आप रोज भगवान श्रीगणेश को दुर्वा चढ़ाएं और पूजन करें। आपकी हर मुश्किल दूर हो जाएंगी। धैर्य बनाएं रखें।

37- आप जो कार्य कर रहे हैं वह जारी रखें। आगे जाकर आपको इसी में लाभ प्राप्त होगा। भगवान विष्णु का पूजन करें।

38- लगातार धन हानि से चिंता हो रही है तो घबराइए मत। कुछ ही दिनों में आपके लिए अनुकूल समय आने वाला है। मंगलवार को हनुमानजी को सिंदूर अर्पित करें।

39- आप भगवान सत्यनारायण की कथा करवाएं तभी आपके कष्टों का निवारण संभव है। आपको सफलता भी मिलेगी।

40- आपके लिए हनुमानजी का पूजन करना श्रेष्ठ रहेगा। खेती और व्यापार में लाभ होगा तथा हर क्षेत्र में सफलता मिलेगी।

41- आपको धन की प्राप्ति होगी। कुटुंब में वृद्धि होगी एवं चिंताएं दूर होंगी। कुलदेवी का पूजन करें।

42- आपको शीघ्र सफलता मिलने वाली है। माता-पिता व मित्रों का सहयोग मिलेगा। खर्च कम करें और गरीबों का दान करें।

43- रुका हुआ कार्य पूरा होगा। धन संबंधी समस्याएं दूर होंगी। मित्रों का सहयोग मिलेगा। सोच-समझकर फैसला लें। श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएं।

44- धार्मिक कार्यों में मन लगाएं तथा प्रतिदिन पूजा करें। इससे आपको लाभ होगा और बिगड़ते काम बन जाएंगे।

45- धैर्य बनाएं रखें। बेकार की चिंता में समय न गवाएं। आपको मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी। ईश्वर का चिंतन करें।

46- धार्मिक यात्रा पर जाना पड़ सकता है। इसमें लाभ मिलने की संभावना है। रोज गायत्री मंत्र का जप करें।

47- प्रतिदिन सूर्य को अध्र्य दें और पूजन करें। आपको शत्रुओं का भय नहीं सताएगा। आपकी मनोकामना पूरी होगी।

48- आप जो कार्य कर रहे हैं वही करते रहें। पुराने मित्रों से मुलाकात होगी जो आपके लिए फायदेमंद रहेगी। पीपल को रोज जल चढ़ाएं।

49- अगर आपकी समस्या आर्थिक है तो आप रोज श्रीसूक्त का पाठ करें और लक्ष्मीजी का पूजा करें। आपकी समस्या दूर होगी।

50- आपका हक आपको जरुर मिलेगा। आप घबराएं नहीं बस मन लगाकर अपना काम करें। रोज पूजा अवश्य करें।

51- आप जो व्यापार करना चाहते हैं उसी में सफलता मिलेगी। पैसों के लिए कोई गलत कार्य न करें। आप रोज जरुरतमंद लोगों को दान-पुण्य करें।

52- एक महीने के अंदर ही आपकी मुसीबतें कम हो जाएंगी और सफलता मिलने लगेगी। आप कन्याओं को भोजन कराएं।

53- यदि आप विदेश जाने के बारे में सोच रहे हैं तो अवश्य जाएं। इसी में आपको सफलता मिलेगी। आप श्रीगणेश का आराधना करें।

54- आप जो भी कार्य करें किसी से पुछ कर करें अन्यथा हानि हो सकती है। विपरीत परिस्थिति से घबराएं नहीं। सफलता अवश्य मिलेगी।

55- आप मंदिर में रोज दीपक जलाएं, इससे आपको लाभ मिलेगा और मनोकामना पूरी होगी।

56- परिजनों की बीमारी के कारण चिंतित हैं तो रोज महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। कुछ ही दिनों में आपकी यह समस्या दूर हो जाएगी।

57- आपके लिए समय अनुकूल नहीं है। अपने कार्य पर ध्यान दें। प्रमोशन के लिए रोज गाय को रोटी खिलाएं।

58- आपके भाग्य में धन-संपत्ति आदि सभी सुविधाएं हैं। थोड़ा धैर्य रखें व भगवान में आस्था रखकर लक्ष्मीजी को नारियल चढ़ाएं।

59- जो आप सोच रहे हैं वह काम जरुर पूरा होगा लेकिन इसमें किसी का सहयोग लेना पड़ सकता है। आप शनिदेव की उपासना करें।

60- आप अपने परिजनों से मनमुटाव न रखें तो ही आपको सफलता मिलेगी। रोज हनुमानजी के मंदिर में चौमुखी दीपक लगाएं।

61- यदि आप अपने करियर को लेकर चिंतित हैं तो श्रीगणेश की पूजा करने से आपको लाभ मिलेगा।

62- आप रोज शिवजी के मंदिर में जाकर एक लोटा जल चढ़ाएं और दीपक लगाएं। आपके रुके हुए काम हो जाएंगे।

63- आप जिस कार्य के बारे में जानना चाहते हैं वह शुभ नहीं है उसके बारे में सोचना बंद कर दें। नवग्रह की पूजा करने से आपको सफलता मिलेगी।

64- आप रोज आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाएं। आपकी हर समस्या का निदान स्वत: ही हो जाएगा।
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अंक -1 : (29 नवम्बर 2018 ) : आज मनायी जाएगी कालभैरव अष्टमी, जानें इस विशेष दिन क्या करें, क्या न करें…

प्रिय मित्रों, पाठकों, वैदिक हिन्दू धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव अष्टमी का पर्व मनाया जाता है।

मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने कालभैरव का अवतार लिया था। इसलिए इस पर्व को कालभैरव जयंती को रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व आज 29 नवंबर 2018, (गुरुवार) को है।

भगवान कालभैरव को तंत्र का देवता माना गया है। तंत्र शास्त्र के अनुसार,किसी भी सिद्धि के लिए भैरव की पूजा अनिवार्य है। इनकी कृपा के बिना तंत्र साधना अधूरी रहती है। इनके 52 रूप माने जाते हैं। इनकी कृपा प्राप्त करके भक्त निर्भय और सभी कष्टों से मुक्त हो जाते हैं। कालभैरव जयंती पर कुछ आसान उपाय कर आप भगवान कालभैरव को प्रसन्न कर सकते हैं।

आज 29 नवंबर, गुरुवार को भैरव अष्टमी का पर्व है। यह दिन भगवान भैरव और उनके सभी रूपों के समर्पित होता है। भगवान भैरव को भगवान शिव का ही एक रूप माना जाता है, इनकी पूजा-अर्चना करने का विशेष महत्व माना जाता है।
भगवान भैरव को कई रूपों में पूजा जाता है। भगवान भैरव के मुख्य 8 रूप माने जाते हैं। उन रूपों की पूजा करने से भगवान अपने सभी भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें अलग-अलग फल प्रदान करते हैं।

➡ जानिए भगवान भैरव के 8 रूप को एवम कौन-सी मनोकामना के लिए करें किसकी पूजा ???

1 कपाल भैरव
इस रूप में भगवान का शरीर चमकीला है, उनकी सवारी हाथी है । कपाल भैरव एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में तलवार तीसरे में शस्त्र और चौथे में पात्र पकड़े हैं। भैरव के इन रुप की पूजा अर्चना करने से कानूनी कारवाइयां बंद हो जाती है। अटके हुए कार्य पूरे होते हैं।
2 क्रोध भैरव
क्रोध भैरव गहरे नीले रंग के शरीर वाले हैं और उनकी तीन आंखें हैं। भगवान के इस रुप का वाहन गरुण हैं और ये दक्षिण-पश्चिम दिशा के स्वामी माने जाते हैं। क्रोध भैरव की पूजा-अर्चना करने से सभी परेशानियों और बुरे वक्त से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।
3 असितांग भैरव
असितांग भैरव ने गले में सफेद कपालों की माला पहन रखी है और हाथ में भी एक कपाल धारण किए हैं। तीन आंखों वाले असितांग भैरव की सवारी हंस है। भगवान भैरव के इस रुप की पूजा-अर्चना करने से मनुष्य में कलात्मक क्षमताएं बढ़ती है।
4 चंद भैरव
इस रुप में भगवान की तीन आंखें हैं और सवारी मोर है। चंद भैरव एक हाथ में तलवार और दूसरे में पात्र, तीसरे में तीर और चौथे हाथ में धनुष लिए हुए है। चंद भैरव की पूजा करने से शत्रुओं पर विजय मिलता हैं और हर बुरी परिस्थिति से लड़ने की क्षमता आती है ।
5 गुरू भैरव
गुरु भैरव हाथ में कपाल, कुल्हाडी, और तलवार पकड़े हुए है ।यह भगवान का नग्न रुप है और उनकी सवारी बैल है।गुरु भैरव के शरीर पर सांप लिपटा हुआ है।गुरु भैरव की पूजा करने से अच्छी विद्या और ज्ञान की प्राप्ति होती है ।
6 संहार भैरव
संहार भैरव नग्न रुप में है, और उनके सिर पर कपाल स्थापित है ।इनकी तीन आंखें हैं और वाहन कुत्ता है । संहार भैरव की आठ भुजाएं हैं और शरीर पर सांप लिपटा हुआ है ।इसकी पूजा करने से मनुष्य के सभी पाप खत्म हो जाते है ।
7 उन्मत भैरव
उन्मत भैरव शांत स्वभाव का प्रतीक है। इनकी पूजा-अर्चना करने से मनुष्य की सारी नकारात्मकता और बुराइयां खत्म हो जाती है । भैरव के इस रुप का स्वरूप भी शांत और सुखद है । उन्मत भैरव के शरीर का रंग हल्का पीला हैं और उनका वाहन घोड़ा हैं।
8 भीषण भैरव
भीषण भैरव की पूजा-अर्चना करने से बुरी आत्माओं और भूतों से छुटकारा मिलता है । भीषण भैरव अपने एक हाथ में कमल, दूसरे में त्रिशूल, तीसरे हाथ में तलवार और चौथे में एक पात्र पकड़े हुए है। भीषण भैरव का वाहन शेर है।

जानिए क्या ना करें काल भैरव अष्टमी-जयंती के दिन-
काल भैरव जयंती के दिन झूठ नहीं बोलना चाहिए।
अन्न ग्रहण न करें। ये नियम केवल उनके लिए हैं जो व्रत करेंगे।
गंदगी न करें। घर की साफ-सफाई करें।
कुत्ते को मारें नहीं। संभव हो तो कुत्ते को भोजन कराएं।
नमक न खाएं। नमक की कमी महसूस होने पर सेंधा नमक खा सकते हैं।
माता-पिता और गुरु का अपमान न करें।
बिना भगवान शिव और माता पार्वती के काल भैरव पूजा नहीं करना चाहिए।
इस रात में सोना नहीं चाहिए। संभव हो तो जागरण करें।

इन उपायों से करें कालभैरव को प्रसन्न (कोई भी 1 करें)…
1. कालभैरव अष्टमी को सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद कुश (एक प्रकार की घास) के आसन पर बैठ जाएं। सामने भगवान कालभैरव की तस्वीर स्थापित करें व पंचोपचार से विधिवत पूजा करें। इसके बाद रूद्राक्ष की माला से नीचे लिखे मंत्र की कम से कम पांच माला जाप करें तथा भैरव महाराज से सुख-संपत्ति के लिए प्रार्थना करें।
मंत्र- ‘ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नमः’
2. कालभैरव अष्टमी पर किसी ऐसे भैरव मंदिर में जाएं, जहां कम ही लोग जाते हों। वहां जाकर सिंदूर व तेल से भैरव प्रतिमा को चोला चढ़ाएं। इसके बाद नारियल, पुए, जलेबी आदि का भोग लगाएं। मन लगाकर पूजा करें। बाद में जलेबी आदि का प्रसाद बांट दें। याद रखिए अपूज्य भैरव की पूजा से भैरवनाथ विशेष प्रसन्न होते हैं।
3. कालभैरव अष्टमी को भगवान कालभैरव की विधि-विधान से पूजा करें और नीचे लिखे किसी भी एक मंत्र का जाप करें। कम से कम 11 माला जाप अवश्य करें।
– ॐ कालभैरवाय नमः।
– ॐ भयहरणं च भैरवः।
– ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरूकुरू बटुकाय ह्रीं।
– ॐ भ्रां कालभैरवाय फट्
4. कालभैरव अष्टमी की सुबह भगवान कालभैरव की उपासना करें और शाम के समय सरसों के तेल का दीपक लगाकर समस्याओं से मुक्ति के लिए प्रार्थना करें।
5. कालभैरव अष्टमी पर 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ॐ नमः शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। साथ ही, एकमुखी रुद्राक्ष भी अर्पण करें। इससे आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं।
6. कालभैरव अष्टमी को एक रोटी लें। इस रोटी पर अपनी तर्जनी और मध्यमा अंगुली से तेल में डुबोकर लाइन खींचें। यह रोटी किसी भी दो रंग वाले कुत्ते को खाने को दीजिए। इस क्रम को जारी रखें, लेकिन सिर्फ हफ्ते के तीन दिन (रविवार, बुधवार व गुरुवार)। यही तीन दिन भैरवनाथ के माने गए हैं।
7. अगर आप कर्ज से परेशान हैं तो कालभैरव अष्टमी की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव की पूजा करें। उन्हें बिल्व पत्र अर्पित करें। भगवान शिव के सामने आसन लगाकर रुद्राक्ष की माला लेकर इस मंत्र का जाप करें।
मंत्र- ॐ ऋणमुक्तेश्वराय नमः
8. कालभैरव अष्टमी के एक दिन पहले (29 नवंबर, गुरुवार) उड़द की दाल के पकौड़े सरसों के तेल में बनाएं और रात भर उन्हें ढंककर रखें। सुबह जल्दी उठकर सुबह 6 से 7 बजे के बीच बिना किसी से कुछ बोलें घर से निकलें और कुत्तों को खिला दें।
9. सवा किलो जलेबी भगवान भैरवनाथ को चढ़ाएं और बाद में गरीबों को प्रसाद के रूप में बांट दें। पांच नींबू भैरवजी को चढ़ाएं। किसी कोढ़ी, भिखारी को काला कंबल दान करें।
10. कालभैरव अष्टमी पर सरसो के तेल में पापड़, पकौड़े, पुए जैसे पकवान तलें और गरीब बस्ती में जाकर बांट दें। घर के पास स्थित किसी भैरव मंदिर में गुलाब, चंदन और गुगल की खुशबूदार 33 अगरबत्ती जलाएं।
11. सवा सौ ग्राम काले तिल, सवा सौ ग्राम काले उड़द, सवा 11 रुपए, सवा मीटर काले कपड़े में पोटली बनाकर भैरवनाथ के मंदिर में कालभैरव अष्टमी पर चढ़ाएं।
12. कालभैरव अष्टमी की सुबह स्नान आदि करने के बाद भगवान कालभैरव के मंदिर जाएं और इमरती का भोग लगाएं। बाद में यह इमरती दान कर दें। ऐसा करने से भगवान कालभैरव प्रसन्न होते हैं।
13. कालभैरव अष्टमी को समीप स्थित किसी शिव मंदिर में जाएं और भगवान शिव का जल से अभिषेक करें और उन्हें काले तिल अर्पण करें। इसके बाद मंदिर में कुछ देर बैठकर मन ही मन में ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करें।

जानिए शिवांश महाकाल भैरव का जन्म कैसे हुआ?
पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार एक बार भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के बीच विवाद छिड़ गया कि उनमें से श्रेष्ठ कौन है ? यह विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि सभी देवता घबरा गए। उन्हें डर था कि दोनों देवताओं के बीच युद्ध ना छिड़ जाए और प्रलय ना आ जाए।इसलिए सभी देवता घबराकर भगवान शिव के पास चले गए और उनसे समाधान ढूंढ़ने का निवेदन किया। जिसके बाद भगवान शंकर ने एक सभा का आयोजन किया जिसमें भगवान शिव ने सभी ज्ञानी, ऋषि-मुनि, सिद्ध संत आदि और साथ में विष्णु और ब्रह्मा जी को भी आमंत्रित किया।
इस सभा में निर्णय लिया गया कि सभी देवताओं में भगवान शिव श्रेष्ठ है। इस निर्णय को सभी देवताओं समेत भगवान विष्णु ने भी स्वीकार कर लिया। लेकिन ब्रह्मा ने इस फैसले को मानने से इंकार कर दिया। वे भरी सभा में भगवान शिव का अपमान करने लगे। भगवान शंकर इस तरह से अपना अपमान सह ना सके और उन्होंने रौद्र रूप धारण कर लिया।
भगवान शंकर प्रलय के रूप में नजर आने लगे और उनका रौद्र रूप देखकर तीनों लोक भयभीत हो गए। भगवान शिव के इसी रूद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए। वह श्वान (कुत्ते) पर सवार थे, उनके हाथ में एक दंड था और इसी कारण से भगवान शंकर को ‘दंडाधिपति’ भी कहा गया है। पुराणों के अनुसार भैरव जी का रूप अत्यंत भयंकर था।
दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से शिव के प्रति अपमानजनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा के पांचवे सिर को ही काट दिया।
शिव के कहने पर भैरव ने काशी प्रस्थान किया जहां उन्हें ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। रूद्र ने उन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया।
ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार आज भी काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। भैरव अवतार का वाहन काला कुत्ता है। उनके अवतार को महाकाल के नाम से भी जाना जाता है। भैरव जयंती को पाप का दंड मिलने वाला दिवस भी माना जाता है।
अपने स्वरूप से उत्पन्न भैरव को भगवान शंकर ने आशीष दिया कि आज से तुम पृथ्वी पर भरण-पोषण की जिम्मेदारी निभाओगे। तुम्हारा हर रूप धरा पर पुजनीय होगा।
– ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री

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