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धर्म-आस्था : परीक्षा के समय विद्यार्धी वर्ग के लिए बेहतर परिणाम हेतु ज्योतिष, वास्तु पर आधारित प्रभावी और लाभकारी उपाय…

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ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री

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परीक्षा के समय विद्यार्धी वर्ग के लिए प्रभावी और लाभकारी उपाय –

ज्योतिष, वास्तु पर आधारित विद्यार्थी वर्ग के लिए कुछ अनुभूत विशेष प्रयोग —

इस समय बच्चो की परीक्षाएं चलने वाली है आइये जानते है ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री से विद्यार्थियों हेतु कुछ विशेष उपाय जो सभी के लिए बहुत कारगर होगी खुद भी करे और दूसरे बच्चो तक भी इस सन्देश को पहुंचाए।

किसी भी जन्मकुंडली में चन्द्रमा मन का कारक होता है चंद्र, बुध व् गुरु ग्रह विद्या प्राप्ति में मुख्य सहायक होते है , जन्मकुंडली में अगर चंद्र के साथ राहु , केतू का योग है अथवा चन्द्रमा 6,8 या 12 भाव में है तो चांदी के गिलास में पानी पिए , घर में बारिश का पानी रखे।

भारतीय सनातन संस्कृति में माँ सरस्वती को ज्ञान और विद्द्या की प्राप्ति के लिए पूजा जाता है, अतः माता पिता गुरु और ईश्वर का आशीर्वाद प्रतिदिन अवश्य ले कर पढाई करे। ऐसा करने से उस छात्र पर हमेशा ईश्वर की कृपा बनी रहती है ।

कई बार लोग प्रश्न करते है हमारे बच्चो का मन पढाई में नहीं लगता है या पढाई करने के बाद सब भूल जाते है ऐसे लोगो के लिए वास्तु प्रयोग अवश्य कारगर होगा ।

इन वास्तु टिप्स से होगा लाभ–
👉🏻👉🏻 माता पिता बच्चो के अध्धयन कक्ष का चयन खुले और स्वस्छ जगह में करे जिससे उनका पढाई में मन लगे इसके लिए दिशाओं का बहुत प्रभाव होता है
👉🏻👉🏻 पढाई करते समय पूर्व या उत्तर दिशा में मुँह करके अध्धयन करे।आप की कुर्सी -मेज इस तरह से हो की पढाई के समय मुंह ईशान कोण की तरफ ही रहे.

👉🏻👉🏻 अध्ययन कक्ष में पढाई करने के बाद कभी भी कोई कॉपी किताबें पेन को खुला न रखें पढ़ने के बाद उन्हें बैग या आलमारी में रखे।
👉🏻👉🏻 पढाई करते समय हमेशा बैठ कर पढाई करे कभी भी बिस्तर या लेट कर पढाई न करे।
👉🏻👉🏻 अध्ययन करते समय आचार विचार शुद्ध होना चाहिए इसके लिए सात्विक भोजन करे , जहा पर आप पढाई करते है वहां बैठ कर या टेबल कुर्सी पर खाना
नहीं खाना चाहिए।
👉🏻👉🏻 खाना खाते समय पड़ाई की टेबिल पर कॉपी किताबें बंद करके ,खाना खाने के लिए बनाये गए स्थान पर ही खाना चाहिए ।
👉🏻👉🏻 पढाई करते समय अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए कॉपी किताबों को अपने मस्तक से लगाकर पढाई करे, यही प्रक्रिया पड़ाई को समाप्त करते समय
भी दोहराएँ ।

👉🏻👉🏻 विद्या प्राप्ति का सबसे उपयुक्त समय ब्रह्म मुहूर्त अर्थात सुबह के 4 बजे का माना गया है उस काल में पड़ाई करते समय हमें कई गुना ज्यादा और तेजी से अपना पाठ याद होता है इसलिए पड़ने वाले छात्रों को सुबह सवेरे पड़ाई की आदत अवश्य ही डालनी चाहिए ।
👉🏻👉🏻 भूलकर भी विद्यार्थियों को घर पर पढ़ते समय जूते – मोज़े नहीं पहनने चाहिए ।
👉🏻👉🏻 मोर का पंख अध्ययन रूम में लगाए व् मोर पंख अपने पास रखने से विधार्थी का मन पढाई में लगता है ।
👉🏻👉🏻 ब्राम्ही औषधि का नित्य सेवन करने से विधार्थियों की बुद्धि त्रीव होती है स्मरण शक्ति बडती है.
👉🏻👉🏻 जिन विद्यार्थियों को परीक्षा में उत्तर भूल जाने की आदत हो, उन्हें परीक्षा में अपने पास कपूर और फिटकरी रखनी चाहिए। इससे मानसिक रूप से
मजबूती बनी रहती है और यह नकारात्मक ऊर्जा को भी हटाती हैं ।
👉🏻👉🏻सावधानी रखें, भूलकर भी सीढ़ियों के निचे या बीम के नीचे कभी भी बैठ कर पढाई या भोजन न करे ,
👉🏻👉🏻 पढाई करते समय प्रकाश या लाइट सामने या दाहिने तरफ से हो।
👉🏻👉🏻 जिन विद्यार्थियों की वाणी में हकलाना, तुतलाना जैसे दोष हों, ऐसे लोग बांसुरी में शहद भरकर नदी के किनारे जमीन में गाड़ें। ऐसा करने से लाभ होगा।

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परीक्षा में अच्छे अंक लाने के उपाय (जानिए परीक्षा में अच्छे अंक कैसे लाए)—-

👉🏻👉🏻यह मन्त्र भी देगा लाभ–
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
👉🏻👉🏻 तुलसी के पत्तों को मिश्री के साथ पीसकर प्रतिदिन उसका रस विधार्थी को पिलाने से भी उसकी स्मरण शक्ति का विकास होता है ।

👉🏻👉🏻 किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में सफलता प्राप्ति हेतु हर गुरुवार को नियम से किसी भी गाय को पीले पेड़े अवश्य खिलाये ।
👉🏻👉🏻विद्यार्थी को चहिये की वह गणेश चालीसा का पाठ करें और बुधवार को गणपति जी को बेसन के लड्डू और दूर्वा अर्पित करें,
👉🏻👉🏻 विद्यार्थी को चाहिए की वह अपनी पड़ाई की मेज या कमरे की ईशान की दीवार पर माँ सरस्वती की तस्वीर जरुर लगायें और रोज उनसे बेहतर विद्या प्राप्ति के लिए आग्रह करें ।
👉🏻👉🏻परीक्षा देने जाते समय यदि छात्र मीठा दही या अन्य कोई भी मीठा खाकर जाये तो उसे निश्चित ही सफलता प्राप्त होती है ।
👉🏻👉🏻👉🏻 किसी भी विद्यार्थी छात्र छात्रा को कभी भी भूलकर परीक्षा में नकल नहीं करनी चाहिए , चाहे उसे कुछ नंबरों का नुकसान ही क्यों न उठाना पड़े ,नकल करने पर विद्या की देवी माँ सरस्वती उससे कुपित हो जाती है , और उसे लगातार पड़ाई में कठनाइयों का सामना करना पड़ता है ।
👉🏻👉🏻 परीक्षा के लिए घर से निकलते समय पहले दायाँ पैर घर से बाहर निकाले और परीक्षा कक्ष में भी पहले दायाँ पैर ही अन्दर रखे ।परीक्षा/प्रतियोगी परीक्षा में
विद्यार्थियों के कमरे में यथा संभव हरे रंग के परदे लगवाने चाहिए इससे एकाग्रता आती है और मन भी शांत रहता है ।

👉🏻👉🏻👉🏻योग व् आसान —
साधारणतया मस्तिष्क का केवल 3 से 7 प्रतिशत भाग ही सक्रिय हो पाता है। शेष भाग सुप्त रहता है, जिसमें अनंत ज्ञान छिपा रहता है। ऐसी विलक्षण शक्ति को जाग्रत करने के दोनों कानों के नीचे के भाग को अंगूठे और अंगुलियों से दबाकर नीचे की ओर खीचें। पूरे कान को ऊपर से नीचे करते हुए मरोड़ें। सुबह 4-5 मिनट और दिन में जब भी समय मिले, कान के नीचे के भाग को खींचे।
सिर व गर्दन के पीछे बीच में मेडुला नाड़ी होती है। इस पर अंगुली से 3-4 मिनट मालिश करें। इससे एकाग्रता बढ़ती है और पढ़ा हुआ याद रहता है।

👉🏻👉🏻👉🏻अष्टमी के रक्त चन्दन से अनार की कलम से “ॐ ऐं ´´ को भोजपत्र पर लिख कर नित्य पूजा करने से अपार विद्या, बुद्धि की प्राप्ति होती है।

👉🏻👉🏻सोते समय सिरहाना हमेशा पूर्व या दक्षिण दिशा में रखे ।

👉🏻👉🏻सफलता के लिए कुछ विशेष रत्न उपाय —
सर्वसिद्धि मुहूर्त में आनेक्स ,हरा हकीक या सुलेमानी हक़ीक को धारण करने से भी दिमाग तेज़ होता है निर्णय लेने में आसानी रहती है ।
👉🏻👉🏻👉🏻सफलता प्राप्ति के लिए पुष्य नक्षत्र के दिन दो पंचमुखी रुद्राक्ष व् एक छः मुखी रुद्राक्ष लाएं और लाल धागे में धारण करें कि छः मुखी रुद्राक्ष बीच में रहे।

यह भी पढ़ें : महामृत्युंजय मंत्र के बारे में सब कुछ

‘महामृत्युंजय मंत्र” भगवान शिव का सबसे बड़ा मंत्र माना जाता है। हिन्दू धर्म में इस मंत्र को प्राण रक्षक और महामोक्ष मंत्र कहा जाता है। मान्यता है कि महामृत्युंजय मंत्र से शिवजी को प्रसन्न करने वाले जातक से मृत्यु भी डरती है। इस मंत्र को सिद्ध करने वाला जातक निश्चित ही मोक्ष को प्राप्त करता है।

 

मंत्र इस प्रकार है –

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

यह त्रयम्बक “त्रिनेत्रों वाला”, रुद्र का विशेषण जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया, को संबोधित है।

महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ

  • त्र्यंबकम् = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक)

  • यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय

  • सुगंधिम = मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)

  • पुष्टिः = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता

  • वर्धनम् = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा माली

  • उर्वारुकम् = ककड़ी (कर्मकारक)

  • इव = जैसे, इस तरह

  • बन्धनात् = तना (लौकी का); (“तने से” पंचम विभक्ति – वास्तव में समाप्ति -द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)

  • मृत्योः = मृत्यु से

  • मुक्षीय = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें

  • मा = न

  • अमृतात् = अमरता, मोक्ष

~ इस महामत्रँ से लाभ निम्न है –

  • धन प्राप्त होता

  • .जो आप सोच के जाप करते वह कार्य सफल होता

  • परिवार मे सुख सम्रद्बि रहती है

  • जिवन मे आगे बढते जाते है आप

~ जप करने कि विधि –

  • सुबह स्नान करते समय गिलास मे पानी लेकर मुह गिलास के पास रखकर ग्यारह बार मत्रँ का जप करे फिर उस पानी को अपने उपर प्रवाह कर ले, महादेव कि कृपा आप के उपर बनी रहगी।

यह मंत्र ऋषि मार्कंडेय द्वारा सबसे पहले पाया गया था।भगवान शिव को कालों का काल महाकाल कहा जाता है। मृत्यु अगर निकट आ जाए और आप महाकाल के महामृत्युंजय मंत्र का जप करने लगे तो यमराज की भी हिम्मत नहीं होती है कि वह भगवान शिव के भक्त को अपने साथ ले जाए।
इस मंत्र की शक्ति से जुड़ी कई कथाएं शास्त्रों और पुराणों में मिलती है जिनमें बताया गया है कि इस मंत्र के जप से गंभीर रुप से बीमार व्यक्ति स्वस्थ हो गए और मृत्यु के मुंह में पहुंच चुके व्यक्ति भी दीर्घायु का आशीर्वाद पा गए।
यही कारण है कि ज्योतिषी और पंडित बीमार व्यक्तियों को और ग्रह दोषों से पीड़ित व्यक्तियों को महामृत्युंजय मंत्र जप करवाने की सलाह देते हैं। शिव को अति प्रसन्न करने वाला मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र। लोगों कि धारणा है कि इसके जाप से व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती परंतु यह पूरी तरह सही अर्थ नहीं है।
महामृत्युंजय का अर्थ है महामृत्यु पर विजय अर्थात् व्यक्ति की बार-बार मृत्यु ना हो। वह मोक्ष को प्राप्त हो जाए। उसका शरीर स्वस्थ हो, धन एवं मान की वृद्धि तथा वह जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाए। महामृत्युञ्जय मंत्र यजुर्वेद के रूद्र अध्याय स्थित एक मंत्र है। इसमें शिव की स्तुति की गयी है। शिव को ‘मृत्यु को जीतने वाला’ माना जाता है।
कहा जाता है कि यह मंत्र भगवान शिव को प्रसन्न कर उनकी असीम कृपा प्राप्त करने का माध्यम है। इस मंत्र का सवा लाख बार निरंतर जप करने से आने वाली अथवा मौजूदा बीमारियां तथा अनिष्टकारी ग्रहों का दुष्प्रभाव तो समाप्त होता ही है, इस मंत्र के माध्यम से अटल मृत्यु तक को टाला जा सकता है।
हमारे वैदिक शास्त्रों और पुराणों में असाध्य रोगों से मुक्ति और अकाल मृत्यु से बचने के लिए महामृत्युंजय जप करने का विशेष उल्लेख मिलता है।
महामृत्युंजय भगवान शिव को खुश करने का मंत्र है। इसके प्रभाव से इंसान मौत के मुंह में जाते-जाते बच जाता है, मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की अद्भुत कृपा से जीवन पा लेता है। बीमारी, दुर्घटना, अनिष्ट ग्रहों के प्रभावों से दूर करने, मौत को टालने और आयु बढ़ाने के लिए सवा लाख महामृत्युंजय मंत्र जप करने का विधान है।
शिव के साधक को न तो मृत्यु का भय रहता है, न रोग का, न शोक का। शिव तत्व उनके मन को भक्ति और शक्ति का सामर्थ देता है। शिव तत्व का ध्यान महामृत्युंजय के रूप में किया जाता है। इस मंत्र के जप से शिव की कृपा प्राप्त होती है। सतयुग में मूर्ति पूजा कर सकते थे, पर अब कलयोग में सिर्फ मूर्ति पूजन काफी नहीं है। भविष्य पुराण यह बताया गया है कि महामृत्युंजय मंत्र का रोज़ जाप करने से उस व्यक्ति को अच्छा स्वास्थ्य, धन, समृद्धि और लम्बी उम्र मिलती है।
अगर आपकी कुंडली में किसी भी तरह से मास, गोचर, अंतर्दशा या अन्य कोई परेशानी है तो यह मंत्र बहुत मददगार साबित होता है।
अगर आप किसी भी रोग या बीमारी से ग्रसित हैं तो रोज़ इसका जाप करना शुरू कर दें, लाभ मिलेगा। यदि आपकी कुंडली में किसी भी तरह से मृत्यु दोष या मारकेश है तो इस मंत्र का जाप करें। इस मंत्र का जप करने से किसी भी तरह की महामारी से बचा जा सकता है साथ ही पारिवारिक कलह, संपत्ति विवाद से भी बचता है।
अगर आप किसी तरह की धन संबंधी परेशानी से जूझ रहें है या आपके व्यापार में घाटा हो रहा है तो इस मंत्र का जप करें। इस मंत्र में आरोग्यकर शक्तियां है जिसके जप से ऐसी दुवानियां उत्पन होती हैं जो आपको मृत्यु के भय से मुक्त कर देता है, इसीलिए इसे मोक्ष मंत्र भी कहा जाता है।
शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र का जप करने के लिए सुबह 2 से 4 बजे का समय सबसे उत्तम माना गया है, लेकिन अगर आप इस वक़्त जप नहीं कर पाते हैं तो सुबह उठ कर स्नान कर साफ़ कपडे पहने फिर कम से कम पांच बार रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का जप करें।
स्नान करते समय शरीर पर लोटे से पानी डालते वक्त इस मंत्र का लगातार जप करते रहने से स्वास्थ्य-लाभ होता है। दूध में निहारते हुए यदि इस मंत्र का कम से कम 11 बार जप किया जाए और फिर वह दूध पी लें तो यौवन की सुरक्षा भी होती है। इस चमत्कारी मन्त्र का नित्य पाठ करने वाले व्यक्ति पर भगवान शिव की कृपा निरन्तंर बरसती रहती है।
महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है, लेकिन इस मंत्र के जप में कुछ सावधानियां बरतना चाहिए जिससे कि इसका संपूर्ण लाभ आपको मिले और आपको कोई हानि न हो। अगर आप नही कर पा रहे इस मंत्र का जाप जो किसी पंडित से जाप कराए यह आपके लिए और अधिक लाभकारी होगा। तीनों भुवनों की अपार सुंदरी गौरां को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप बड़ा अजीब है।
शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं।
महारूद्र सदाशिव को प्रसन्न करने व अपनी सर्वकामना सिद्धि के लिए यहां पर पार्थिव पूजा का विधान है, जिसमें मिटटी के शिर्वाचन पुत्र प्राप्ति के लिए, श्याली चावल के शिर्वाचन व अखण्ड दीपदान की तपस्या होती है।
शत्रुनाश व व्याधिनाश हेतु नमक के शिर्वाचन, रोग नाश हेतु गाय के गोबर के शिर्वाचन, दस विधि लक्ष्मी प्राप्ति हेतु मक्खन के शिर्वाचन अन्य कई प्रकार के शिवलिंग बनाकर उनमें प्राण-प्रतिष्ठा कर विधि-विधान द्वारा विशेष पुराणोक्त व वेदोक्त विधि से पूज्य होती रहती है।
भारतीय संस्कृति में शिवजी को भुक्ति और मुक्ति का प्रदाता माना गया है। शिव पुराण के अनुसार वह अनंत और चिदानंद स्वरूप हैं। वह निर्गुण, निरुपाधि, निरंजन और अविनाशी हैं। वही परब्रह्म परमात्मा शिव कहलाते हैं। शिव का अर्थ है कल्याणकर्ता। उन्हें महादेव (देवों के देव) और महाकाल अर्थात काल के भी काल से संबोधित किया जाता है।
केवल जल, पुष्प और बेलपत्र चढ़ाने से ही प्रसन्न हो जाने के कारण उन्हें आशुतोष भी कहा जाता है। उनके अन्य स्वरूप अर्धनारीश्वर, महेश्वर, सदाशिव, अंबिकेश्वर, पंचानन, नीलकंठ, पशुपतिनाथ, दक्षिणमूर्ति आदि हैं। पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु, श्रीराम, श्रीकृष्ण, देवगुरु बृहस्पति तथा अन्य देवी देवताओं द्वारा शिवोपासना का विवरण मिलता है।
जब किसी की अकालमृत्यु किसी घातक रोग या दुर्घटना के कारण संभावित होती हैं तो इससे बचने का एक ही उपाय है – महामृत्युंजय साधना। यमराज के मृत्युपाश से छुड़ाने वाले केवल भगवान मृत्युंजय शिव हैं जो अपने साधक को दीर्घायु देते हैं। इनकी साधना एक ऐसी प्रक्रिया है जो कठिन कार्यों को सरल बनाने की क्षमता के साथ-साथ विशेष शक्ति भी प्रदान करती है।
यह साधना श्रद्धा एवं निष्ठापूर्वक करनी चाहिए। इसके कुछ प्रमुख तथ्य यहां प्रस्तुत हैं, जिनका साधना काल में ध्यान रखना परमावश्यक है। अनुष्ठान शुभ दिन, शुभ पर्व, शुभ काल अथवा शुभ मुहूर्त में संपन्न करना चाहिए। मंत्रानुष्ठान प्रारंभ करते समय सामने भगवान शंकर का शक्ति सहित चित्र एवं महामृत्युंजय यंत्र स्थापित कर लेना चाहिए।
ज्योतिष अनुसार किसी जन्मकुण्डली में सूर्यादि ग्रहों के द्वारा किसी प्रकार की अनिष्ट की आशंका हो या मारकेश आदि लगने पर, किसी भी प्रकार की भयंकर बीमारी से आक्रान्त होने पर, अपने बन्धु-बन्धुओं तथा इष्ट-मित्रों पर किसी भी प्रकार का संकट आने वाला हो।
देश-विदेश जाने या किसी प्राकर से वियोग होने पर, स्वदेश, राज्य व धन सम्पत्ति विनष्ट होने की स्थिति में, अकाल मृत्यु की शान्ति एंव अपने उपर किसी तरह की मिथ्या दोषारोपण लगने पर, उद्विग्न चित्त एंव धार्मिक कार्यो से मन विचलित होने पर महामृत्युंजय मन्त्र का जप स्त्रोत पाठ, भगवान शंकर की आराधना करें।
यदि स्वयं न कर सके तो किसी पंडित द्वारा कराना चाहिए। इससे सद्बुद्धि, मनःशान्ति, रोग मुक्ति एंव सवर्था सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
अनिष्ट ग्रहों का निवारण मारक एवं बाधक ग्रहों से संबंधित दोषों का निवारण महामृत्युंजय मंत्र की आराधना से संभव है। मान्यता है कि बारह ज्योतिर्लिगों के दर्शन मात्र से समस्त बारह राशियों संबंधित शुभ फलों की प्राप्ति होती है। काल संबंधी गणनाएं ज्योतिष का आधार हैं तथा शिव स्वयं महाकाल हैं, अत: विपरीत कालखंड की गति महामृत्युंजय साधना द्वारा नियंत्रित की जा सकती है।

आइये जानते हैं भगवान शिव से जुड़े पांच अनोखे शिवलिंग के बारे में जिनके चमत्कारों ने लोगो को आश्चर्य में डाल रखा है?????

महादेव शिव की महिमा अनोखी एवं निराली जहां अन्य सभी देवताओ के स्वरूप की पूजा की जाती है वही भगवान शिव शंकर जो निर्विकार , निराकार, ओमकार स्वरूप है उनकी लिंग के रूप में पूजा होती है।

परन्तु भगवान शिव की महिमा एवं उनकी अद्भुत लीलाएं यही समाप्त नहीं होती, भारत में अनेक ऐसे शिवलिंग है जो अपने चमत्कारी शक्तियों के लिए प्रसिद्ध है।

भगवान शिव के कुछ शिवलिंगों में अपने आप जल की धारा बरसती है तो कुछ शिवलिंग का आकार दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।
भगवान शिव के कुछ शिवलिंग तो ऐसे है जिनका संबंध प्रलय से जुडा हुआ है। भगवान शिव के इन चमत्कारों के रहस्यों को जान्ने के लिए अनेको जगहों में तो विज्ञान भी फेल होता पाया गया है।

बाबा तिल भाण्डेश्वर महादेव :- बाबा तिल भाण्डेश्वर महादेव का मंदिर काशी के केदार खण्ड में स्थित है. कहते है की यह शिवलिंग सतयुग में प्रकट हुआ था तथा यह स्वयम्भू शिवलिंग है. इस शिवलिंग का वर्णन शिव पुराण धर्मग्रन्थ में भी मिलता है. वर्तमान में इस शिवलिंग का आधार कहा पर है यह आज तक एक रहस्य बना हुआ है।

इस शिवलिंग के बारे में कहा जाता है की यह शिवलिंग सतयुग से द्वापर युग तक हर रोज एक तिल के आकर तक बढ़ते रहता है. लेकिन कलयुग के आरम्भ लोगो को यह चिंता सताने लगी की यदि भगवान शिव का शिवलिंग हर रोज इसी तरह बढ़ते रहा तो एक दिन पूरी दुनिया इस शिवलिंग में समाहित हो जायेगी।

तब यहाँ लोगो ने शिव की आरधना की तथा भगवान शिव ने प्रसन्न होकर भक्तो को दर्शन दिए इसके साथ ही भगवान शिव ने यह वरदान भी दिया की अबसे में हर मकर संक्रांति को एक तिल बढ़कर भक्तो का कल्याण करूंगा।

अत्यधिक प्राचीन इस मंदिर के विषय में अनेको मान्यताएं जुडी है. कहा जाता है की इसी स्थान पर विभांड ऋषि ने तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था. भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देकर यहाँ स्वयम्भू शिवलिंग के रूप में स्थापित हुए थे।

तथा उन्हें वरदान दिया की में कलयुग में एक आकर बढूंगा. भगवान शिव के इस अद्भुद शिवलिंग के दर्शन मात्र से मुक्ति का मार्ग परास्त होता है।

मृदेश्वर महादेव मंदिर :- गुजरात गोधरा में स्थित यह मंदिर भी प्रलय का संकेत देता है. बताया जाता है के यहाँ शिवलिंग का बढ़ता आकर कलयुग के धरती पर हावी होने की निशानी है. जिस दिन ये शिवलिंग आकर में साढ़े आठ फुट हो जाएगा तथा मंदिर के छत को छू लेगा वह दिन कलयुग का अंतिम चरण होगा।

अर्थात उसके बाद पृथ्वी में प्रलय आ जायेगी और एक नए युग का प्रारम्भ होगा। लेकिन हम आपको बता दे की शिवलिंग को मंदिर के छत तक चुने में लाखो हजार वर्ष लग जाएंगे क्योकि शिवलिंग का आकर हर वर्ष एक चावल के आकार का बढ़ता है।

मृदेश्वर मंदिर की एक विशेषता यह भी ही की इसमें स्वतः ही जल की धरा लगातार बहती रहती है तथा शिवलिंग का जलाभिषेक करती रहती है. सूखे एवं गर्मी में भी इस जल द्वारा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, यह जल धारा अविरल बहती रहती है।

पोडिवाल महादेव मंदिर :- हिमांचल प्रदेश में नहान से करीब 8 किलोमीटर दुरी पर स्थित पोडिवाल महादेव मंदिर है. इसका संबंध रावण से माना जाता है, कहा जाता है की रावण ने इसकी स्थापना करी थी।

इसे स्वर्ग की दूसरी पड़ी के नाम से भी जाना जाता है।ऐसी मान्यता है की हर शिवरात्रि को यह शिवलिंग एक जौ के दाने के बराबर बढ़ता है।

ऐसी मान्यता है की इस शिवलिंग में सक्षात शिवजी का वास है तथा भगवान शिव सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करते है।

भूतेश्वर महादेव मंदिर :- छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 90 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है गरियाबंद जिला यहाँ एक प्राकृतिक शिवलिंग स्थित है जिसे भूतेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

यह विशव का सबसे बड़ा प्राकर्तिक शिवलिंग है. सबसे बड़ी आश्चर्य की बात यह है की यह शिवलिंग अपने आप बड़ा और मोटा होता जा रहा है।

यह जमीन से लगभग 18 फीट उंचा एवं 20 फीट गोलाकार है. राजस्व विभाग द्वारा प्रतिवर्ष इसकी उचांई नापी जाती है जो लगातार 6 से 8 इंच बढ रही है।

जग्गेश्वर महादेव मंदिर :- मैदागिन मार्ग से आगे बढ़ने पर महादेव का दिव्य मंदिर है . शिव की नगरी काशी में तो कंकर कंकर में शिव का वास है. शिव ही यहाँ के आराध्य हैं और शिव ही लोगों की रक्षा और भरण पोषण करते हैं।

शिव के इस आनंद वन में शिव के चमत्कारों की कोई कमी नही है. इस मन्दिर में भगवान् शिव का लिंग हर शिवरात्रि को जौ के एक दाने के बराबर बढ़ जाता है। मन्दिर के आस पास ऐसे लोगों की भी कमी नही है जिन्होंने इस शिव लिंग को अपने बचपन से बढ़ते हुए देखा है. ऐसी मान्यता है की इस मन्दिर में दर्शन करने से इस जन्म का ही नही बल्कि सात जन्मो का पाप कट जाता है।

जागिश ऋषि की कठोर तपस्या से खुश होकर महादेव यहाँ प्रकट हुए थे. हर शिवरात्रि को बढ़ते -बढ़ते वर्तमान में इस शिवलिंग ने आदम कद प्राप्त कर लिया है . महंत आनंद मिश्र बताते है कि ऋषि के हठ ने ना सिर्फ महादेव को यहाँ बुलाया बल्कि हमेशा के लिए उन्हें यही विराजमान भी होना पड़ा।

ऋषि ज़ब बिमारी की वज़ह से मौत के मुह में असमय ही चले जा रहे थे ,तब महादेव ने अपने प्रिय मदार के पुष्प से उनका इलाज़ भी किया था. बीमारी से ठीक होने को लोग मदार की माला चढ़ाते है।

यह भी पढ़ें : जानें महाशिवरात्रि पर कैसे करें महादेव शिव को प्रसन्न, ताकि भोलेनाथ करे आपकी हर इच्छा पूरी…

शिव के परिवार में अद्भुत बात है। विभिन्नताओं में एकता और विषमताओं में संतुलन यह शिव परिवार से ही सीखा जा सकता है। शिव परिवार के हर व्यक्ति के वाहन या उनसे जुड़े प्राणियों को देखें तो शेर-बकरी एक घाट पानी पीने का दृश्य साफ दिखाई देगा। शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, मगर शिवजी के तो आभूषण ही सर्प हैं। वैसे स्वभाव से मयूर और सर्प दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती स्वयं शक्ति हैं, जगदम्बा हैं जिनका वाहन शेर है। मगर शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। बेचारे बैल की सिंह के आगे औकात क्या? परंतु नहीं, इन दुश्मनियों और ऊंचे-नीचे स्तरों के बावजूद शिव का परिवार शांति के साथ कैलाश पर्वत पर प्रसन्नतापूर्वक समय बिताता है।
शिव-पार्वती चौपड़ भी खेलते हैं, भांग भी घोटते हैं। गणपति माता-पिता की परिक्रमा करने को विश्व-भ्रमण समकक्ष मानते हैं। स्वभावों की विपरीतताओं, विसंगतियों और असहमतियों के बावजूद सब कुछ सुगम है, क्योंकि परिवार के मुखिया ने सारा विष तो अपने गले में थाम रखा है। विसंगतियों के बीच संतुलन का बढ़िया उदाहरण है शिव का परिवार। जिस घर में शिव परिवार को ‍चित्र लगा होता है वहां आपस में पारिवारिक एकता, प्रेम और सामजस्यता बनी रहती है।

भगवान शिव शंकर बहुत भोले हैं, इसीलिए हम उन्हें भोले भंडारी कहते है , यदि कोई भक्त सच्ची श्रद्धा से उन्हें सिर्फ एक लोटा पानी भी अर्पित करे तो भी वे प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए कुछ छोटे और अचूक उपायों के बारे शिवपुराण में भी लिखा है, ये उपाय इतने सरल हैं कि इन्हें बड़ी ही आसानी से किया जा सकता है। हर समस्या के समाधान के लिए शिवपुराण में एक अलग उपाय बताया गया है, ये उपाय इस प्रकार हैं-

शिवपुराण के अनुसार इन छोटे उपायों से भगवान शिव को आसानी से प्रसन्न किया जा सकता है :-

भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।
तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।
जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।
गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।
यह सभी अन्न भगवान को अर्पण करने के बाद जरूरतमंदों में बांट देना चाहिए।

शिवपुराण के अनुसार जानिए भगवान शिव को कौन-सा रस (द्रव्य) चढ़ाने से क्या फल मिलता है-

बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है, सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा भगवान शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।
तीक्ष्ण बुद्धि के लिए शक्कर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।
शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।
शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।
शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से टीबी रोग में आराम मिलता है।
यदि कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से कमजोर है तो उसे उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का अभिषेक गौ माता के शुद्ध घी से करना चाहिए ।

 

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ज्योतिर्विद दयानंद शास्त्री @ नवीन समाचार, 25 फरवरी 2019। आमतौर पर मंदिर में जाना धर्म से जोड़ा जाता है। लेकिन मंदिर जाने के कुछ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से स्वास्थ्य लाभ भी हैं। ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं कि यदि हम रोज मंदिर जाते हैं तो इससे कई तरह की हेल्थ प्रॉब्लम्स कंट्रोल की जा सकती हैं।

जानिए पण्डित दयानन्द शास्त्री से ऐसे लाभ जो हमें प्रतिदिन मंदिर जाने से अनजाने में मिलते हैं–

💒हाई BP कंट्रोल करने के लिए
मंदिर के अंदर नंगे पैर जाने से वहां की साकारात्मक ऊर्जा पैरों के जरिए हमारे शरीर में प्रवेश करती है। नंगे पैर चलने के कारण पैरों में मौजूद प्रेशर प्वाइंट्स पर दवाब भी पड़ता है, जिससे हाई BP की प्रॉब्लम दूर होती है।

💒कॉन्सेंट्रेशन बढ़ाने के लिए
रोज़ मंदिर जाने और भौहों के बीच माथे पर तिलक लगाने से हमारे दिमाग के विशेष हिस्से पर दवाब पड़ता है। इससे कॉन्सेंट्रेशन बढ़ता है।

💒साकारात्मक ऊर्जा स्तर बढ़ाने के लिए रिसर्च कहती है, जब हम मंदिर का घंटा बजाते हैं, तो 7 सेकण्ड्स तक हमारे कानों में उसकी आवाज़ गूंजती है। इस दौरान शरीर में शान्ति पहुंचाने वाले 7 प्वाइंट्स क्रियाशील हो जाते हैं। इससे ऊर्जा स्तर बढ़ाने में मदद मिलती है।

💒शारिरीक क्षमता बढ़ाने के लिए मंदिर में दोनों हाथ जोड़कर पूजा करने से हथेलियों और उंगलियों के उन बिन्दुओं पर दवाब बढ़ता है, जो शरीर के कई पुर्जों से जुड़े होते हैं। इससे शरीर के बहुत से क्रिया सुधरते हैं और शारिरीक क्षमता बढ़ती है।

💒बैक्टीरिया से बचाव के लिए
मंदिर में मौजूद कपूर और हवन का धुआं बैक्टीरिया ख़त्म करता है। इससे वायरल इंफेक्शन का खतरा टलता है।

💒तनाव (स्ट्रेस) दूर करने के लिए मंदिर का शांत माहौल और शंख की आवाज़ मेंटली रिलैक्स करती है। इससे स्ट्रेस दूर होता है।

💒डिप्रेशन दूर होता है
रोज़ मंदिर जाने और भगवान की आरती गाने से ब्रेन फंक्शन सुधरते हैं। इससे डिप्रेशन दूर होता हैं।।

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ज्योतिर्विद दयानंद शास्त्री @ नवीन समाचार, 24 फरवरी 2019। ज्योतिष के प्रमुख ग्रहों में से एक व राक्षस गुरु शुक्र 24 फरवरी 2019 को धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं। शुक्र का ये परिवर्तन कई मायनों में बहुत ही विशेष होने जा रहा है। यह परिवर्तन हर किसी को प्रभावित करेगा। शुक्र भौतिक सुख के लिए परमावश्यक गृह है | कलयुग में इसी की प्रधानता मानी गयी है इसीलिये कलयुग के नर नारी नैतिक रूप से पतित होते जा रहे हैं | मकर राशी शुक्र के मित्र शनि की राशी है | शनि स्वयं भी नकारात्मक गृह है |

एक ओर जहां ये परिवर्तन कुछ राशियों को जोरदार लाभ देगा, वहीं कुछ के सामने बड़ी परेशानियां भी खड़ी करेगा, जबकि अन्य के लिये ये पूरी तरह से तख्तापलट कारक रहेगा। इससे पहले शुक्र ग्रह ने 29 जनवरी 2019 को वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश किया था और अब इससे निकल कर 24 फरवरी को मकर राशि में प्रवेश करेंगे। ज्योतिष में शुक्र भाग्य का कारक ग्रह माना गया है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री का कहना है कि शुक्र अब तक धनु राशि में हैं, जो कि बृहस्पति की राशि है। वहीं इसके ठीक बाद यानि 24 फरवरी 2019 को यह मकर राशि यानि शनि की राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं। और ये सर्वविदित है कि शनि और शुक्र महायोग का निर्माण करते हैं। ऐसे में इनकी आपसी दोस्ती जहां कुछ लोगों को फर्श से अर्श तक के दर्शन करायेगी, वहीं कुछ के लिये ये समय काफी कष्ट कारक भी हो जायेगा।

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शुक्र ग्रह जन्म कुंडली में स्थित 12 भावों पर अलग-अलग तरह से प्रभाव डालता है। इसे यानि शुक्र को एक शुभ ग्रह माना गया है, परंतु यदि शुक्र कुंडली में मजबूत होता है तो जातकों को इसके अच्छे परिणाम मिलते हैं जबकि कमज़ोर होने पर यह अशुभ फल देता है।शुक्र को सुंदरता, ऐश्वर्य और कला के साथ जुड़े क्षेत्रों का अधिपति माना जाता है। इसलिए जन्म कुंडली में शुक्र की शुभ स्थिति व्यक्ति को शारीरिक रूप से सुंदर और मन-मोहक बनाती है, साथ ही समस्त सांसारिक सुख प्रदान करती है। वहीं शुक्र के अशुभ प्रभाव से वैवाहिक जीवन में परेशानी और भौतिक सुख-सुविधाओं में कमी आती है।

वैदिक ज्योतिष में शुक्र ग्रह को एक शुभ ग्रह माना गया है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को भौतिक, शारीरिक और वैवाहिक सुखों की प्राप्ति होती है। इसलिये ज्योतिष में शुक्र ग्रह को भौतिक सुख, वैवाहिक सुख, भोग-विलास, शौहरत, कला, प्रतिभा, सौन्दर्य, रोमांस, काम वासना और फैशन डिजाइनिंग आदि का कारक माना जाता है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिष में शुक्र को वृष और तुला राशि का स्वामी माना गया है। इस वर्ष 2019में शुक्र ने 01 जनवरी 2019 को वृश्चिक राशि में, 29 जनवरी को धनु राशि में 24 फरवरी को मकर राशि में, 21 मार्च को कुम्भ राशि में, 15 अप्रैल को मीन राशि में, 10 मई को मेष राशि में 04 जून को वृष राशि में, 28 जून को मिथुन राशि में, 23 जुलाई कर्क राशि में 16 अगस्त को सिंह राशि में, 09 सितम्बर को कन्या राशि में, 03 अक्टूबर को तुला राशि में 28 अक्टूबर को वृश्चिक राशि में, 21 नवम्बर को धनु राशि में, 15 दिसम्बर को मकर राशि में संचरण करेगा।

24 फरवरी 2019 को शुक्र मकर राशि में प्रवेश करेंगे। शुक्र अभी धनु राशि में विचरण कर रहे हैं। कुंडली में शुक्र के अच्छे प्रभाव से व्यक्ति को धन और संपन्नता की प्राप्ति होती है। शुक्र वृषभ और तुला राशि का स्वामी होता है और मीन इसकी उच्च राशि है, जबकि कन्या इसकी नीच राशि कहलाती है। शुक्र को 27 नक्षत्रों में से भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रों का स्वामित्व प्राप्त है। ग्रहों में बुध और शनि ग्रह शुक्र के मित्र ग्रह हैं और सूर्य व चंद्रमा इसके शत्रु ग्रह माने जाते हैं।

👉🏻👉🏻👉🏻जानिए शुक्र के प्रभाव —
प्रचलित मान्यता के अनुसार मजबूत शुक्र व्यक्ति के वैवाहिक जीवन को सुखी बनाता है। यह पति-पत्नि के बीच प्रेम की भावना को बढ़ाता है। वहीं प्रेम करने वाले जातकों के जीवन में रोमांस में वृद्धि करता है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि जिस व्यक्ति की कुंडली में शुक्र मजबूत स्थिति में होता है वह व्यक्ति जीवन में भौतिक सुखों का आनंद लेता है। बली शुक्र के कारण व्यक्ति साहित्य एवं कला में रुचि लेता है।

वहीं इसके ठीक विपरीत पीड़ित शुक्र के कारण व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में परेशानियां आती हैं। पति-पत्नि के बीच मतभेद होते हैं। व्यक्ति के जीवन में दरिद्रता आती है और वह भौतिक सुखों के अभाव में जीता है। यदि जन्म कुंडली में शुक्र कमज़ोर होता है तो जातक को कई प्रकार की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। पीड़ित शुक्र के प्रभाव से बचने के लिये जातकों को शुक्र ग्रह के उपाय करने चाहिए।

24 फरवरी 2019 की रात 12 बजकर 30 को शुक्र ग्रह मकर राशि में प्रवेश कर रहें है जो 22 मार्च 2019 की सुबह 4 बजकर 48 मिनिट तक यहीं रहेंगे। शुक्र के इस संचरण का असर सभी राशियों पर देखने को मिलेगा।

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जानिए सभी राशियों पर शुक्र के मकर में गोचर का असर/प्रभाव–

मेष : स्वयं की मेहनत आपकी आमदनी में बढोत्तरी का कारण बनेगी | घर में कोई पुनर्निर्माण आदि करवा सकते हैं | स्वास्थ्य को लेकर कुछ समस्या रह सकती है | पेट की तकलीफ हो सकती हैं | अपने खानपान पर नियंत्रण रखना ही ठीक रहेगा | आपको अत्यधिक सेक्स करने से परहेज करना चाहिए |

वृषभ : मन में अस्थिरता रहेगी | निर्णय लेने में आपको अधिक समय लगेगा और हो सकता है की आप गलत निर्णय अधिक मात्रा में लें | जीवन साथी के साथ भी आपकी पटरी नहीं बैठ पाएगी | दूर के लोगों से आपकी अच्छी निभेगी | इन्टरनेट से कोई नया मित्र मिल सकता है | धन हानि के योग भी बने हुए हैं |

मिथुन : सेक्स की इच्छा प्रबल बनी रहेगी | गुप्त रोग भी आपको हो सकता है | कोई पुराने कार्य आपके पूर्ण हो सकते हैं | किसी पुराने मित्र से अचानक मुलाकात हो सकती है | प्रतियोगी परीक्षा में अच्छा परिणाम निकल सकता है | कामकाज ठीक रहेगा | किसी और की जिम्मेदारी भी आपके सुपुर्द करी जा सकती है |

कर्क : यह आपके लिए लाभकारी गोचर रहने वाला है | आप कुछ नयी खरीद कर सकते हैं | आपके नए मित्र भी बन सकते हैं | कामकाज में भी प्रगति रहने वाली है | व्यापारी वर्ग भी अच्छा धनार्जन करेगा |मन में संगीत फिल्म आदि के प्रति अधिक रूचि रहेगी | गाने का मन भी हो सकता है | निजी जीवन भी अच्छा रहेगा और साथी से सहयोग भी मिलेगा |

सिंह : अचानक खर्चों से परेशान हो सकते हैं | लम्बी यात्रा के योग भी बनेंगे | छोटे भाई बहिन किसी समस्या से जूझ सकते हैं | मीठा अधिक खाने से बचिए | आपको अचानक धनलाभ होने की अच्छी सम्भावना है किन्तु सामान्य जीवन में रुकावट अधिक महसूस करेंगे | सेक्स से सम्बंधित कोई समस्या उभर सकती है |

कन्या : घर परिवार में बीमारी घर कर सकती है | प्रेम संबंधों में बात आगे बढ़ सकती है | शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए अच्छा गोचर है | संतान पक्ष से प्रसन्नता प्राप्त होगी | दांतों , जबड़ों, पाचन तंत्र आदि में तकलीफ हो सकती है |

तुला : आपको गलत निर्णय लेने के कारण नुक्सान उठाना होगा | घर परिवार में अच्छा माहौल रहेगा | कार्य अच्छे होते रहेंगे किन्तु आपको बड़े निर्णय दूसरों से सलाह कर के ही लेने चहिये | जमीन के दलालों को फायदा हो सकता है साथ ही वाहन के व्यवसाइयों को भी | लाभ होगा किन्तु अपेक्षा से थोडा कम ही रहेगा | नौकरी भी ठीक बनी रहेगी|

वृश्चिक: आँखों की रक्षा कीजिये | खानपान पर नियंत्रण रखिये | विरोधी आपको परेशान कर सकते हैं | आपके विरुद्ध षड्यंत्र हो सकता है किन्तु आप स्वयं को निकाल ले जायेंगे | लम्बी यात्रा भी संभव है | अनैतिक सेक्स सम्बन्ध का लाभ भी आप ले सकते हैं |

धनु : नौकरी ढूंढ रहे लोगों को नयी नौकरी मिल सकती है | महिलाओं को विशेष रूप से लाभ रह सकता है | धन की आवक अच्छी बनी रहेगी | खर्चे अचानक आ सकते हैं | प्रेम संबध में अच्छी प्रगति होगी | आप दूसरों पर रौब ज़माने का प्रयत्न कर सकते हैं | निजी जीवन में अनबन रह सकती है |

मकर : मन में संगीत प्रेम रोमांस के भाव रहेंगे | किसी साथी की तलाश पूर्ण हो सकती है | नए दोस्त बनेंगे | निजी जीवन अच्छा रहेगा | आप सुख सुविधा पर दिल से खर्च करेंगे | आपमें दिखावे के प्रति रुझान जाग्रत हो सकता है | शारीरिक सम्बन्ध अधिक बार स्थापित करेंगे |

कुंभ :सेक्स के प्रति आपकी अधिक रूचि रहेगी | आप अनैतिक रूप से भी सेक्स सम्बन्ध बना सकते हैं | भाग्य उतना साथ नहीं देगा किन्तु आपका अहित भी नहीं होगा | मान सम्मान पर ठेस पहुँच सकती है इसका ध्यान रखना होगा | आने वाले समय में कोई नया काम शुरू कर सकते हैं |

मीन : स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या हो सकती हैं | कानूनी मसलों में हानि हो सकती है | आप नए सामान की खरीद कर सकते हैं | लम्बी यात्रा आदि पर जा सकते है | किसी विपरीत लिंग के जातक से सहयोग मिल सकता है | नौकरी बदल सकते हैं |

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सचिन मल्होत्रा, ज्योतिषशास्त्री @ नवीन समाचार, 21 फरवरी 2019। कश्मीर के पुलवामा में एक आत्मघाती हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों शहीद हो गए। इस बात को लेकर पूरे देश में आक्रोश है और हर तरफ से जंग की आवाज बुलंद की जा रही है। जनता और शहीदों के परिजन पाकिस्तान को इस हमले के लिए सबक सिखाने की मांग कर रहे हैं। देश में आक्रोश का माहौल देखकर पाकिस्तान डरा हुआ है और सीमा के पास बने अपने लौंचिंग पैड से आतंकियों को कहीं और शिफ्ट कर चुका है। लेकिन क्या कूटनीति और राजनीति अभी युद्ध की इजाजत देती है ? आइए देखें ज्योतिषशास्त्र की गणना के अनुसार भारत पाक के बीच बिगड़ते संबंध क्या युद्ध तक पहुंच पाएंगे…

ग्रहों की चाल साल 2020 के मार्च से जून के मध्य तक भारत और पाकिस्तान के बीच किसी सीमित युद्ध की आशंका दिखा रही है। इसमे चीन पाकिस्तान का खुलकर सहयोग कर सकता है। पूर्वी और पश्चिमी मोर्चे पर होने वाले इस युद्ध में भारत को भी बड़ी क्षति पहुंचने की आशंका है।आजादी के समय 15 अगस्त 1947 को मध्य रात्रि में आजाद हुए भारत की कुंडली वृषभ लग्न की है, जहां वर्तमान में चंद्रमा में गुरु की दशा चल रही है, जिसका प्रभाव इस वर्ष दिसंबर के मध्य तक रहेगा। गुरु लाभ और अष्टम भाव के स्वामी होकर शत्रुओं के छठे भाव में तुला राशि में बैठा है। गुरु की इस अंतर्दशा में भारत राजनीतिक मंचों पर विश्व-बिरादरी के सामने पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर बेनकाब करने में सफल होगा। साथ ही भारत को पाकिस्तान में छिपे बैठे आतंकी सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करवाने में इस वर्ष सफलता हासिल को सकती है। 23 मार्च को मंगल के वृषभ राशि में प्रवेश करने के 15 दिनों के भीतर भारत की सेना पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक या किसी अन्य हमले में बड़े आतंकियों का सफाया कर सकती है। बाद में अप्रैल-मई में मंगल और शनि का समसप्तक योग तथा जुलाई और दिसंबर में पड़ रहे बड़े ग्रहण भारत और पाकिस्तान में तनाव को अपने चरम पर ले जाएंगे। अप्रैल, मई, जुलाई और दिसंबर महीनों में बड़े आतंकी हमले होने की आशंका रहेगी। इसके बाद चंद्रमा में शनि की विंशोत्तरी दशा में भारत और पाकिस्तान में साल 2020 के पहली छमाही में युद्ध की आशंका बन रही है।

पाकिस्तान पर 2020 में भारी पड़ेगा अष्टम शनि

आजादी के समय 14 अगस्त 1947 को मध्य रात्रि कराची में आज़ादी की घोषणा करने वाले पाकिस्तान की कुंडली मेष लग्न की है, जहां युद्ध का कारक ग्रह मंगल पराक्रम के तीसरे भाव में चंद्रमा के साथ मिथुन राशि में बैठा है। चंद्रमा और मंगल की इस युति पर नवमेश गुरु की युद्ध स्थान यानी सप्तम भाव से दृष्टि पड़ रही है। पाकिस्तान की कुंडली में भूमि स्थान यानी चौथे भाव का स्वामी चंद्रमा अपने से बाहरवें घर में विनाश स्थान यानी अष्टम भाव के स्वामी मंगल के साथ बैठा है। इस योग के प्रभाव से 1971 में शनि की ‘साढ़ेसती’ की शुरुआत के दौरान हुए युद्ध में पाकिस्तान एक बार पहले टूट चुका है। अब साल 2020 में शनि के मकर राशि में आने पर अष्टम शनि के गोचर के चलते पाकिस्तान को एक और बड़ा झटका लगने का योग बन रहा हैं। शुक्र-गुरु और शुक्र-शनि की मारक भाव से संबंधित बुरी दशाओं और साल 2020- 2021 में चल रहे अष्टम शनि के बुरे गोचर के कारण पाकिस्तान के स्थायित्व को एक बड़ा खतरा नजर आ रहा है।

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ज्योतिर्विद दयानंद शास्त्री @ नवीन समाचार, 19 फरवरी 2019। यह सच है कि ईश्‍वर सर्वव्यापी हैं और वे हमेशा सबका कल्याण ही करेंगे, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि दिशाओं के स्वामी भी देवता ही हैं। अत: आवश्यक है कि पूजा स्थल बनवाते समय भी वास्तु के कुछ नियमों का ध्यान रखा जाए।

वास्तु विज्ञान के अनुसार देवी-देवताओं की कृपा घर पर बनी रहे, इसके लिए पूजाघर वास्तुदोष से मुक्त होना चाहिए। वास्तुविद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जिस घर या दुकान का पूजाघर वास्तुदोष के नियमों के विपरीत होता है, वहां ध्यान और पूजा करते समय मन एकाग्र नहीं रह पाता है। इससे पूजा-पाठ का पूर्ण लाभ नहीं मिलता है।

हर मकान या दुकान में पूजाघर जरूर होता है। घरों में तो पूजन कक्ष का होना और भी जरूरी है क्योंकि यह मकान का वह हिस्सा है जो हमारी आध्यात्मिक उन्नति और शांति से जुड़ा होता है। यहां आते ही हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता हैं और नकारात्मकता खत्म हो जाती है, इसलिए अगर यह जगह वास्तु के अनुरूप होती है तो उसका हमारे जीवन पर बेहतर असर होता है।

कुछ वास्तु सिद्धांत हैं, जिनपर गौर करके हम अपने पूजाघर को अधिक प्रभावशाली बना सकते हैं —

👉🏻👉🏻पूजा स्थल के लिए भवन का उत्तर पूर्व कोना सबसे उत्तम होता है। पूजा स्थल की भूमि उत्तर पूर्व की ओर झुकी हुई और दक्षिण-पश्‍चिम से ऊंची हो, आकार में चौकोर या गोल हो तो सर्वोत्तम होती है। ईशान कोण में बना पूजाघर सबसे ज्यादा शुभ होता है क्योंकि इस दिशा के अधिपति बृहस्पति हैं। उनके तत्वगत स्वभाव के अनुरुप आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार सबसे ज्यादा होता है। नतीजतन इस दिशा में बैठकर पूजा करने से र्इश्वर के प्रति ध्यान और समर्पण पूरी तरह से होता है।

👉🏻👉🏻 मंदिर की ऊंचाई उसकी चौड़ाई से दुगुनी होनी चाहिए. मंदिर के परिसर का फैलाव ऊंचाई से 1/3 होना चाहिए.

👉🏻👉🏻 मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा उस देवता के प्रमुख दिन पर ही करें या जब चंद्र पूर्ण हो अर्थात 5,10,15 तिथि को ही मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करें।

👉🏻👉🏻पूजाघर में कलश, गुंबद इत्यादि नहीं बनाना चाहिए।

👉🏻👉🏻पूजाघर में किसी प्राचीन मंदिर से लाई गई प्रतिमा या स्थिर प्रतिमा को स्थापित नहीं करना चाहिए।

👉🏻👉🏻पूजागृह के द्वार पर दहलीज़ ज़रूर बनवानी चाहिए। द्वार पर दरवाज़ा, लकड़ी से बने दो पल्लोंवाला हो तो अच्छा होगा। घर में बैठे हुए गणेशजी की प्रतिमा ही रखनी चाहिए।

👉🏻👉🏻 पूजाघर में यदि हवन की व्यवस्था है तो वह हमेशा आग्नेय कोण में ही किया जाना चाहिए।

👉🏻👉🏻पूजाघर में भूल से भी भगवान की तस्वीर या मूूर्ति आदि नैऋत्य कोण में न रखें। इससे बनते कार्यों में रुकावटें आती हैं।

👉🏻👉🏻पूजास्थल में कभी भी धन या बहुमूल्य वस्तुएं नहीं रखनी चाहिए।

👉🏻👉🏻पूजाघर की दीवारों का रंग बहुत गहरा न होकर सफेद, हल्का पीला या हल्का नीला होना चाहिए।

👉🏻👉🏻 पूजाघर की फर्श सफेद अथवा हल्का पीले रंग की होना चाहिए।

👉🏻👉🏻 पूजाघर में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इंद्र, सूर्य एवं कार्तिकेय का मुख पूर्व या पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए।

👉🏻👉🏻 पूजाघर में गणेश, कुबेर, दुर्गा का मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए।

👉🏻👉🏻 पूजाघर में हनुमानजी का मुख नैऋत्य कोण में होना चाहिए।

👉🏻👉🏻 पूजाघर में प्रतिमाएं कभी भी प्रवेशद्वार के सम्मुख नहीं होनी चाहिए।

👉🏻👉🏻मूर्ति के आमने-सामने पूजा के दौरान कभी नहीं बैठना चाहिए, बल्कि सदैव दाएं कोण में बैठना उत्तम होगा।

👉🏻👉🏻वास्तुशात्री पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं कि कभी भी आपके घर या दुकान में पूजाघर बीम के नीचे न हो और आप खुद भी बीम के नीचे बैठकर पूजा न करें। बीम के नीचे बैठकर पूजा करने से एकाग्रता भंग हो जाती है तथा पूजा का शुभफल मिलने की बजाय रोग आदि की आशंका बढ़ जाती है।

👉🏻👉🏻पूजाघर के निकट एवं भवन के ईशान कोण में झाड़ू या कूड़ादान आदि नहीं रखना चाहिए।

👉🏻👉🏻 शयनकक्ष में पूजा स्थल नहीं होना चाहिए. अगर जगह की कमी के कारण मंदिर शयनकक्ष में बना हो तो मंदिर के चारों ओर पर्दे लगा दें। इसके अलावा शयनकक्ष के उत्तर पूर्व दिशा में पूजास्थल होना चाहिए । यदि परिस्थितिवश ऐसा करना ही पड़े तो वह शयनकक्ष विवाहितों के लिए नहीं होना चाहिए। यदि फिर भी जगह की कमी के कारण शयन कक्ष में ही पूजाघर बनाना पड़े तो ध्यान रखें कि बिछावन इस प्रकार हो ताकि सोते समय भगवान की ओर पैर नहीं हो।

👉🏻👉🏻पूजाघर के आसपास, ऊपर या नीचे शौचालय वर्जित है. पूजाघर में और इसके आसपास पूर्णत: स्वच्छता तथा शुद्वता होना अनिवार्य है। रसोई घर भूलकर भी शौचालय अथवा पूजाघर के पास न बनाएं। घर में सीढ़ियों के नीचे पूजाघर नहीं होना चाहिए।

👉🏻👉🏻पूजन कक्ष में मृतात्माओं का चित्र वर्जित है. किसी भी श्रीदेवता की टूटी-फूटी मूर्ति या तस्वीर व सौंदर्य प्रसाधन का सामान, झाडू व अनावश्यक सामान नही होना चाहिए।

👉🏻👉🏻पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि एक ही घर में कई लोग रहते हैं तो अलग-अलग पूजाघर बनवाने की बजाए मिल-जुलकर एक पूजाघर बनवाएं। एक ही मकान में कई पूजाघर होने पर घर के सदस्यों को मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भगवान को एक-दूसरे से कम से कम 1 इंच की दूरी पर रखें। अगर घर में एक ही भगवान की दो तस्वीरें हों तो दोनों को आमने-सामने बिलकुल न रखें। एक ही भगवान के आमने-सामने होने पर घर में आपसी तनाव बढ़ता है।

👉🏻👉🏻यदि सम्भव हो तो पूजा घर की फर्श बनवाने से पहले जमीन पर गाय के गोबर की एक परत पहले लगवाने का प्रयास करना चाहिए। विदित हो कि गाय का गोबर तमाम तरह के वास्तुदोष को दूर कर सुख-समृद्धि लाता है।

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ज्योतिषाचार्य दयानंद शास्त्री @ नवीन समाचार, 16 फरवरी 2019। वर्तमान में भारत-पाक युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं व पाक के आका परमाणु युद्ध की धमकी दे रहे हैं, ऐसी स्थिति में युद्ध की आशंका है या नहीं? इसी विषय पर आधारित ज्योतिषीय विश्लेषण प्रस्तुत है।

भारत की कुंडली वृषभ लग्न की है जिसके स्वामी शुक्र हैं। वृषभ लग्न व लग्नेश शुक्र दोनों को ही स्वभाव से शांत माना जाता है। इसी कारण भारत का स्वभाव भी क्षमाशील है। भारत उग्रता का परिचय बहुत ही अति होने के बाद देता है। इसके विपरीत पाकिस्तान की कुंडली को देखा जाये तो वह मेष लग्न की बनती है जिसके स्वामी मंगल हैं। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि मेष लग्न व लग्नेश मंगल दोनों की प्रकृति में आक्रामकता निहित होती है। मंगल ग्रह को युद्ध का कारक माना जाता है। इसलिये उग्रता पाकिस्तान के स्वभाव में ही है और अपने स्वभाव को कोई त्याग नहीं सकता। भारत की नरमी और पाक की गरमी को आप भारत-पाक के संबंधों में शुरुआत से ही देख सकते हैं।

हालांकि पाकिस्तान, भारत के साथ निर्णायक युद्ध नहीं चाहता है वह तो छद्म युद्ध के माध्यम से कश्मीर को जैसे तैसे भारत से हासिल करना चाहता है। पाकिस्तान, भारत को एटम बम की धमकी भी दे चुका है। हालांकि वह जानता है कि वह ऐसा करने में सक्षम नहीं है। यदि भारत ने कोई हमला किया तो पाकिस्तान भारत से बदला लेने के लिए देश में बड़े पैमाने पर आतंकी गतिविधियों को अंजाम दे सकता है जिसके जवाब में भारत, पाकिस्तान के खिलाफ बड़ा युद्ध कर सकता है। भारत के खिलाफ रसायनिक हथियार का प्रयोग भी कर सकता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार पाकिस्तान की कुंडली में चौथे घर में सूर्य, शनि, शुक्र, बुध व चंद्रमा 5 ग्रहों का जमावड़ा होने के कारण पाकिस्तान न खुद शांत रहेगा और न ही पड़ोसी को शांत रहने देगा। पाक की कुंडली में कुलीक नामक कालसर्प योग अधिक पीड़ादायक होने से उसे जीवन भर संघर्ष, धन की हानि होगी तथा वह भारत के लिए सिरदर्द बना रहेगा। चीन की कुंडली में मकर लग्र तथा सप्तम स्थान में नीच का मंगल होने के कारण अपनी षड्यंत्रकारी कुचालों से भारत को नुक्सान व आक्रमण की तैयारी में लगा रहेगा तथा अंत में निर्णायक जंग करके ही दम लेगा।

पाकिस्तान की कुण्डली में मौजूद विष योग के कारण भारत को विश्वास घात का सामना करना होगा। भारत के साथ हो सकता है कि इस बार भी पाकिस्तान विश्वासघात करे। इसलिए भारत को इस बार दुश्मन की चाल को समझ कर उसे पूरी तरह नेस्तनाबूद करना जरूरी होगा तभी भारत का भविष्य सुरक्षित रह पाएगा।

ज्योतिष की दृष्टि से युद्ध की पहल पाकिस्तान करेगा और इस जंग में भारत की कुंडली में शत्रु स्थान पर देवगुरु बृहस्पति बैठे हैं, जिसके कारण संसार के अंदर शत्रु पक्ष में भारत का मान, गौरव, दबदबा व बड़प्पन ऊंचा रहेगा। वर्तमान में भारत की कुंडली में कर्क राशि का चंद्रमा तीसरे भाव में होने के कारण तथा चंद्रमा की महादशा होने के कारण भारत का समय अच्छा चल रहा है। यह समय पाकिस्तान का पोस्टमार्टम करने के लिए उचित है। युद्ध होने पर पाकिस्तान के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। भारतवर्ष के लिए मूलांक वाले वर्ष शुभ है। इस समय जीत का डंका निश्चित रूप से बजेगा। 2020 तक पाकिस्तान के तीन टुकड़े हो जाना चाहिए। ऐसे में पाकिस्तान भारत के खिलाफ रसायनिक हथियार का इस्तेमाल करेगा।

भारत के राशि स्वामी चंद्रमा से पाकिस्तान के राशि स्वामी बुध की शत्रुता :

लग्न ही नहीं यदि राशिनुसार भी आकलन किया जाये तो भारत की राशि कर्क है जिसके स्वामी चंद्रमा हैं। चंद्रमा को भी शीतलता व शांति का प्रतीक माना जाता है। भारत तो हमेशा से ही शांतिदूत के रूप में जाना जाता रहा है। वहीं पाकिस्तान की राशि मिथुन है जिसके स्वामी बुध हैं। बुध का स्वयं अपना कोई अस्तित्व नहीं होता वह हमेशा दूसरों पर आश्रित रहता है और उनकी सोच से अपना कार्य करता है। लेकिन चंद्रमा से बुध का संबंध शत्रुवत माना जाता है। हालांकि पौराणिक कथाओं में बुध को चंद्रमा का पुत्र माना जाता है और चूंकि चंद्रमा ने बुध की मां तारा से छल किया इस कारण बुध का उससे शत्रुवत सबंध है। यही कारण है कि भारत से पाकिस्तान का संबंध शत्रुता का रहता है।

इस प्रकार जन्म कुंडली के अनुसार लग्न, लग्नेश, राशि आदि के आकलन से भारत और पाकिस्तान का संबंध आरंभ से ही शत्रुवत रहा है। भारत की राशि से पाकिस्तान की राशि 12वीं होने के कारण आपसी प्यार-प्रेम की कमी लगातार दोनों देशों में बनी रहती है। ग्रहों के बीच मैत्री न होने से भी दोनों देश एक दूसरे को राजनीतिक रूप से हमेशा नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि वर्ष 2019 में ग्रहों की दशानुसार आकलन करें तो भारत-पाकिस्तान के बीच 2019 में किसी बड़े युद्ध की संभावनाएं तो कम हैं लेकिन सीमाओं पर स्थिति तनावपूर्ण व छिटपुट घटनाएं देखने को मिल सकती हैं।

केतु व शनि का साथ बिगड़ सकते हैं हालात :

वर्ष का आरंभ कन्या लग्न व तुला राशि में हो रहा है। वर्ष लग्न स्वामी व पाकिस्तान की राशि के स्वामी बुध हैं जो वर्ष लग्न से नव वर्ष आगमन के समय तीसरे स्थान में गुरु के साथ गोचर कर रहे हैं वहीं भारत की कुंडली में लग्न व 2019 की वर्ष राशि स्वामी शुक्र चौथे स्थान में विराजमान हैं। वर्ष की शुरुआत सौहार्दपूर्ण रहने के आसार हैं। हालांकि भारत को लगातार सचेत रहने की आवश्यकता बनी रहेगी। नव वर्ष की शुरुआत खुशहाल हो इसके लिये भारत में कुछ स्थानों पर चौकसी भी बढ़ाई जा सकती है। हालांकि बहुत ज्यादा चिंताजनक स्थिति इस समय नहीं कही जा सकती लेकिन मार्च में राहू भारत की राशि से निकल कर राशि से 12वें स्थान में चले जायेंगें। इस समय अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर माहौल भारत के पक्ष में बन सकता है। रक्षा बजट भी भारत को बढ़ाने की आवश्यकता पड़ेगी। हालांकि इसी समय केतु का शनि के साथ आना रिश्तों में कड़वाहट लायेगा। आपसी द्वंद और बढ़ने के आसार बन सकते हैं। अप्रैल से लेकर अगस्त के बीच बृहस्पति व शनि के वक्री होने के कारण विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता दोनों देशों को होगी। इस समय परिस्थितियां तनावपूर्ण हो सकती हैं। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी घटना को अंजाम देने के प्रयास भी इस समय हो सकते हैं। इसके अलावा समय दोनों देशों में सौहार्द बढ़ाने के लिये प्रयास किये जाने के संकेत कर रहा है।

निष्कर्ष :

भारत, चीन व पाकिस्तान की कुंडलियों का विवेचन करने से पता चलता है कि चीन व पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक जंग लडऩी ही होगी, क्योंकि भारत की कुंडली में तीसरे घर में सूर्य, बुध, शुक्र, शनि एवं चंद्रमा 5 ग्रहों की युति तथा कालसर्प दोष के कारण भारत को पड़ोसी देशों से विश्वासघात का सामना करना पड़ेगा। तीसरा घर साहस व पड़ोसी का भी होता है। भारत की कुंडली में 5 ग्रहों के योग के कारण संतुलन में कमी रहती है। पड़ोसी देशों से समस्याएं आती हैं। नव विक्रम संवत् 2076 की वर्ष प्रवेश कुंडली के अनुसार, भारत सहित भारतीय उपमहाद्वीप के कई देशों में काफी उथल-पुथल की स्थिति देखी जायेगी।अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से भी विश्व अर्थव्यवस्था काफी नाजुक दौर से गुजरेगी। नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार अपने आंतरिक विवादों के कारण परेशान रहेंगे । सरहदों पर सैनिक-हलचल बढ़ा रहेगा।

धर्म आस्था में यह भी पढ़ें : आज बसंत पंचमी पर जानें सरस्वती पूजा की विधि और मंत्र तथा शुभ मुहूर्त ताकि वर्ष भर बढ़ता रहे आपकी बुद्धि व ज्ञान

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नवीन समाचार नैनीताल 10 फरवरी 2019। सरस्वती पूजा इस साल दो दिन मनाया जा रहा है इसकी वजह यह है कि माघ शुक्ल पंचमी यानी बसंत पंचमी 2 दिन यानी 9 और 10 फरवरी को है। देश के कुछ भागों में चतुर्थी तिथि 9 तारीख को दोपहर से पहले ही समाप्त हो जा रही है और पंचमी तिथि शुरू हो रही है और 10 तारीख को पंचमी तिथि 2 बजकर 9 मिनट तक रहेगी।

पंचांग की गणना के अनुसार देश के उत्तर पश्चिमी भागों में 9 फरवरी को पूर्वाह्न के पूर्व पंचमी आरंभ हो जाने से यहां सरस्वती पूजन 9 तारीख को करना शास्त्रानुकूल रहेगा। जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ ही देश के अन्य हिस्सों में यह पर्व 10 फरवरी को मनाना जाना शास्त्र के अनुकूल रहेगा।

इसकी वजह यह है कि यहां 9 तारीख को दोपहर के बाद यहां पंचमी तिथि शुरू होगी। शास्त्रों में पूर्वाह्न से पूर्व सरस्वती पूजन करने का विधान बताया गया है। उत्तर पूर्वी भारत में सरस्वती पूजा खूब धूम-धाम से मनाया जाता है। यहां 10 तारीख को सुबह 6 बजकर 45 मिनट से दोपहर 12 बजकर 25 मिनट तक सरस्वती पूजन करने का शुभ मुहूर्त रहेगा।

सरस्वती पूजा विधि मंत्र सहित विस्तार सेः-

मां सरस्वती की प्रतिमा अथवा तस्वीर को सामने रखकर उनके सामने धूप-दीप, अगरबत्ती, गुगुल जलाएं जिससे वातावरण में सकारात्मक उर्जा का संचार हो और आस-पास से नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाए।

इसके बाद पूजा आरंभ करें। पहले अपने आपको तथा आसन को मंत्र से शुद्ध करें- “ऊं अपवित्र: पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥” इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर 3-3 बार कुशा या पीले फूल से छींटें लगाएं फिर इस मंत्र से आचमन करें – ऊं केशवाय नम:, ऊं माधवाय नम:, ऊं नारायणाय नम:, फिर हाथ धोएं, पुन: आसन शुद्धि मंत्र बोलें- ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

शुद्धि और आचमन के बाद अपने माथे पर चंदन लगाना चाहिए। अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें ‘चन्दनस्य महत्पुण्यम् पवित्रं पापनाशनम्, आपदां हरते नित्यम् लक्ष्मी तिष्ठतु सर्वदा।’

अब पूजन के लिए संकल्प करें। हाथ में तिल, फूल, अक्षत मिठाई और फल लेकर ‘यथोपलब्धपूजनसामग्रीभिः भगवत्या: सरस्वत्या: पूजनमहं करिष्ये।’ इस मंत्र को बोलते हुए हाथ में रखी हुई सामग्री मां सरस्वती के सामने रखें। अब गणपति की पूजा करें।

गणपति पूजन विधि

हाथ में फूल लेकर गणपति का ध्यान करें। मंत्र पढ़ें- गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्। हाथ में अक्षत लेकर गणपति जी का आह्वान करें ‘ऊं गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। इतना कहकर पात्र में अक्षत रखें।

जल लेकर बोलें- एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:। रक्त चंदन लगाएं: इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:, इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं। इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाएं “इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:। दूर्वा और विल्बपत्र गणेश जी को चढ़ाएं। गणेश जी को पीले वस्त्र चढ़ाएं। इदं पीत वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि।

गणेश जी को प्रसाद अर्पित करें: इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:।

प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन कराएं। इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ाएं- इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। अब एक फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:

गणपति पूजन की तरह अब सूर्य सहित नवग्रहों की पूजा करें। गणेश के स्थान पर नवग्रहों के नाम लें।

कलश पूजन विधि:-

घड़े या लोटे पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम का पल्लव रखें। कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत, मुद्रा रखें। कलश के गले में मोली लपेटें। नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें। हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर वरुण देवता का कलश में आह्वान करें:- ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥)

इसके बाद जिस प्रकार गणेश जी की पूजा की है उसी तरह से वरूण और इन्द्रादि देवताओं की पूजा करें।

सरस्वती पूजन आरंभः –

सरस्वती ध्यान मंत्र-
सबसे पहले ध्यान मंत्र माता सरस्वती का ध्यान करें-
या कुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।।

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमांद्यां जगद्व्यापनीं।
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यांधकारपहाम्।।

हस्ते स्फाटिक मालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्।
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्।।

देवी सरस्वती की प्रतिष्ठा करेंः-
हाथ में अक्षत लेकर बोलें “ॐ भूर्भुवः स्वः सरस्वती देव्यै इहागच्छ इह तिष्ठ। इस मंत्र को बोलकर अक्षत छोड़ें। इसके बाद जल लेकर ‘एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।” प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं: ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ श्री सरस्वतयै नमः।।

इदं रक्त चंदनम् लेपनम् से रक्त चंदन लगाएं। इदं सिन्दूराभरणं से सिन्दूर लगाएं। ‘ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, सरस्वतयै नमो नमः।। ॐ सरस्वतयै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’ इस मंत्र से पुष्प चढ़ाएं फिर माला पहनाएं। अब सरस्वती माता को इदं पीत वस्त्र समर्पयामि कहकर पीला वस्त्र पहनाएं। प्रसाद अर्पित करें “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं सरस्वतयै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें। मिष्टान अर्पित करने के लिए मंत्र: “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ऊं सरस्वतयै समर्पयामि” बालें। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन कराएं। इदं आचमनयं ऊं सरस्वतयै नम:।

इसके बाद पान सुपारी चढ़ाएं: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं सरस्वतयै समर्पयामि। अब एक फूल लेकर सरस्वती देवी पर चढ़ाएं और बोलें: एष: पुष्पान्जलि ऊं सरस्वतयै नम:। इसके बाद एक फूल लेकर उसमें चंदन और अक्षत लगाकर किताब कॉपी पर रखें।

यह भी पढ़ें : इसलिए कलाई में मौली बांधते हैं, जानिए फायदे

नवीन समाचार नैनीताल 9 फरवरी 2019। सनातन धर्म को जीवन जीने की पद्धति कहा गया है। अब हममें से ज्यादातर लोग सनातन धर्म को हिंदू धर्म के नाम से जानते हैं। हिंदू धर्म में जिन मान्यताओं का अनुसरण किया जाता रहा है या जिन्हें जीवन के लिए बेहद उपयोगी माना गया है, उन्हें आस्था के साथ जोड़कर प्रचारित किया गया। इसका कारण यह बताया जात है कि ईश्वर से जुड़ी बातें होने के कारण ज्यादातर लोग इन्हें बड़ी सरलता से जीवन में उतार लेते हैं। इन्हीं में से एक है हाथ में कलावा या मौली बांधना। क्या आपने कभी सोचा है कि हिंदू धर्म में किसी भी देवता की पूजा या अनुष्ठान हो, हाथ में मौली क्यों बांधी जाती है? आइए, जानते हैं…

पूजा में मौली के 3 उपयोग

पूजा या अनुष्ठान करते समय मौली का उपयोग मुख्य रूप से तीन प्रकार से किया जाता है। पहला उपयोग होता है, भगवान को कलश स्थापना के समय कलश और नारियल पर बांधने में। दूसरा उपयोग होता है भगवान को वस्त्र के रूप में अर्पित करने में और तीसरा उपयोग होता है पवित्र धागे के तौर पर कलाई में बांधने के लिए।

क्यों बांधते हैं मौली?

बात सिर्फ पूजन की करें तो मौली को एक पवित्र धागा माना जाता है और इसे आपके हाथ में इसलिए बांधा जाता है ताकि आपके मन में सात्विक विचारों में वृद्धि हो। कलाई में बंधी हुई मौली या कलावा हमारे मन पर बहुत प्रभाव डालते हैं। क्योंकि कलाई पर बार-बार नजर पड़ती है और इससे हम परमात्मा के साथ सीधा जुड़ाव अनुभव करते हैं। इस अनुभव के कारण हमारे अंदर सकारात्मकता में वृद्धि होती है।

पॉजिटिव एनर्जी का फ्लो

कलाई में बंधी मौली द्वारा परम सत्ता से जुड़ाव अनुभव करने के कारण हमारे अंदर जिस सकारात्मकता की वृद्धि होती है, वह हमारे मन और आत्मा को प्रसन्न रखती है। इस कारण हमारे अंदर साकारत्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। हमारे तनाव और उदासी में कमी आती है, इससे हम अपने सभी कार्य सही तरीके से कर पाते हैं। क्या आपने सोचा है कभी इस तरह से? कि एक छोटी-सी मौली हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है

मौली और आयुर्वेद

अगर आप कभी भी किसी वैद्य या आयुर्वेदिक चिकित्सक के पास अपना उपचार कराने के लिए गए होंगे तो आपको पता होगा कि वह सबसे पहले व्याधिग्रस्त व्यक्ति की नाड़ी चेक करते हैं। अर्थात वे आपकी कलाई की एक नर्व को कुछ सेकंड के लिए पकड़ते हैं और काउंटिंग चेक करते हैं कि क्या आपकी नाड़ी ठीक चल रही है या नहीं। जिस जगह से वैद्य नाड़ी चेक करते हैं, उसी जगह पर कलावा बांधा जाता है। यह कलावा हमारी नाड़ी पर जरूरी दबाव बनाकर रखता है।

मौली बांधने का लाभ

मौली या कलावा बांधने से कलाई की नाड़ी पर जो हल्का दबाव बनता है, वह वात, पित्त और कफ को नियंत्रित करता है। आयुर्वेद के अनुसार, हमारे शरीर में कोई भी व्याधि बात, पित्त और कफ की स्थिति में समस्या होने के कारण उत्पन्न होती है।

मौली और आस्था

मौली को रक्षासूत्र भी कहा जाता है। हो सकता है कि इसका यह नाम स्वास्थ्य की रक्षा के कारण रखा गया हो। अगर मौली को कलाई पर बांधने की प्रथा के प्रारंभ की बात करें तो यह सनातन परंपरा का अभिन्न अंग रहा है। सनातन परंपरा अर्थात वह पद्धति, जो सृष्टि के आरंभ काल से चली आ रही है। रक्षाबंधन के रक्षा सूत्र के तार भी इसी मौली से जुड़े हैं। इतना ही नहीं हम अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हुए धार्मिक स्थलों और पवित्र माने जानेवाले पौधों में भी रोली बांधते हैं।

यह भी पढ़ें : आज मौनी अमावस्या पर बन रहा है दुर्लभ संयोग, यह करने से मिलेगा पुण्य, और यह बिलकुल न करें

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 फरवरी 2019। माघ मास में पड़ने वाली मौनी अमावस्या सोमवार 4 फरवरी को है। इस दिन सोमवती अमावस्या का भी दुर्लभ संयोग बन रहा है। श्रद्धालु मौन व्रत धारण कर पवित्र नदियों और संगम में स्नान करते हैं। मान्यताओं के अनुसार इस दिन अन्न, वस्त्र, धन, गो और भूमि का दान करने से सतयुग के तप के बराबर पुण्य मिलता है। वहीं पितरों का तर्पण करने से उन्हें शांति मिलती है।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार मौनी अमावस्या रविवार रात 11 बजकर 52 मिनट पर शुरू होगी, जो पांच फरवरी रात 2 बजकर 33 मिनट तक रहेगी। उनका कहना है कि इस दिन गंगा जल अमृत में बदल जाता है। इसलिए गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा करें। सूर्य को लाल चंदन से अर्घ्य दें। पीपल के पेड़ की पूजा करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। वहीं 108 बार तुलसी की परिक्रमा करने से यश मिलता है।

मौनी अमावस्या के दिन यह भूलकर भी न करें :

  • मौनी अमावस्या के दिन सुबह देर तक नहीं सोना चाहिए। जल्दी उठकर पूजा पाठ करना चाहिए। अमावस्या की रात श्मशान घाट या उसके आस-पास नहीं घूमना चाहिए। इस दिन सुबह जल्दी उठें और मौन रहते हुए पानी में काले तिल डालकर स्नान करें। यह शुभ होता है।
  • इस दिन स्त्री-पुरुष को आपस में शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए। मौनी अमावस्या पर यौन संबंध बनाने से पैदा होने वाली संतान को जीवन में कई तरह के कष्टों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए इन चीजों से जितना हो सके बचना चाहिए। 
  • मौनी अमावस्या का दिन देवता और पितरों का माना जाता है। इसलिए इस दिन पितरों को खुश करने के लिए जहां तक हो सके अपने गुस्से पर काबू रखें। किसी से बिना वजह गाली गलौज मारपीट न करें। शांत रहकर भगवान का नाम लें।
  • इस दिन गरीब या जरूरतमंद इंसान को दान करना और उनकी मदद करना शुभ होता है। इसलिए कोई भी ऐसा इंसान दिखे तो उनका अपमान न करें। साथ ही घर के बड़े बुजुर्गों का अपमान भी न करें। ऐसा करने से शनिदेव नाराज हो जाते हैं। 
  • कहा जाता है कि इस दिन बरगद, मेहंदी और पीपल के पेड़ के नीचे जाने से बचना चाहिए। मान्यता है कि इस दिनों पेड़ों पर आत्माओं का वास रहता है और अमावस्या के दिन वो और भी शक्तिशाली हो जाती हैं। इसलिए ऐसे पेड़ों के नीचे न जाएं। 
प्राकृतिक तौर पर ‘ऊं’ अथवा त्रिशूल जैसी आकृति युक्त नींबू।

नवीन समाचार, नैनीताल, 31 जनवरी 2019। कण-कण में देवताओं का वास कही जाने वाली देवभूमि के सरोवरनगरी नैनीताल में बृहस्पतिवार को एक पहाड़ी नींबू का दाना खासे चर्चा के केंद्र में रहा। निकटवर्ती गाँव बजून में एक पेड़ पर लगे इस नींबू के इस दाने में कई धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को पवित्र हिंदू चिन्ह ‘ॐ’ तो अन्य को महादेव शिव का प्रिय अस्त्र व धार्मिक चिह्न ‘त्रिशूल’ नजर आया। अलबत्ता नींबू के इस दाने में प्राकृतिक तौर पर त्रिशूल अथवा अधूरे ‘ॐ’ जैसी आकृति नजर आ रही थी। लोग इसे धार्मिक आस्था से भी जोड़ रहे हैं, और कोई चमत्कार बता रहे हैं। वहीं अन्य लोगों का कहना है कि कभी-कभार फलों, सब्जियों अथवा जीव-जंतुओं में भी ऐसे किसी धार्मिक चिन्ह जैसी आकृतियां प्राकृतिक तौर पर बन जाती हैं, और कई बार मन-मस्तिष्क में मौजूद धार्मिक आस्था की वजह से भी ऐसे चिन्ह मान लिये जाते हैं।

 

देवभूमि में इस फल में नजर आये महादेव के प्रिय त्रिशूल व ‘ॐ’ के धार्मिक चिह्न

यह भी पढ़ें : अपने हाथ की रेखाओं से जानें किस क्षेत्र में सबसे बेहतर हो सकता है आपका भविष्य

रेखाएं बताती है करियर – ज्‍योतिषशास्‍त्र में ऐसी अनेक विद्याएं हैं जिनके माध्‍यम से मनुष्‍य की कई सारी समस्‍याओं को सुलझाया जा सकता है। इन्‍हीं में से एक है हस्‍तरेखाएं जिनकी मदद से आपके भविष्‍य की गणना की जा सकती है।

आज हम आपको हाथ की उन रेखाओं के बारे में बताने जा रहे हैं जो आपके करियर का निर्धारण

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करती हैं। हाथ में सूर्य के पर्वत और सूर्य रेखा का बेहतर होना व्‍यक्‍ति को प्रशासनिक सेवा में ले जाता है। इसके अलावा मस्तिष्‍क की रेखाएं जितनी लंबी और सीधी हो उतनी ही ज्‍यादा प्रशासनिक नौकरी की संभावना बनती है। कनिष्‍ठा उंगली जितनी लंगी हो और अनामिका उंगली तक पहुंचे उतना ही प्रशासनिक सेवा में जाना निश्चित हो जाता है।

तो चलिए जानते हैं कि कैसे रेखाएं बताती है करियर – आपकी रेखाएं आपके करियर के बारे में क्‍या कहती हैं…

रेखाएं बताती है करियर – डॉक्‍टर बनाने वाली रेखा

अगर हाथ में मंगल और चंद्रमा अच्‍छा हो तो व्‍यक्‍ति चिकित्‍सक बन सकता है। मंगल की मजबूत रेखा और चंद्रमा पर ऊपर की ओर रेखाओं का जाना व्‍यक्‍ति को सर्जन बनाता है। अगर हाथ में बुध के पर्वत पर सीधी और छोटी लाइनें हों तो वह जातक फिजिशियन बनता है।

मंगल और चंद्रमा के साथ बुध जितना ज्‍यादा अच्‍छा होगा, व्‍यक्‍ति उतना ही अच्‍छा डॉक्‍टर बनता है।

रेखाएं बताती है करियर – इंजीनियर बनने की रेखा

हाथ में बुध और शनि का पर्वत अच्‍छा हो तो व्‍यक्‍ति तकनीकी करियर में ले जाता है।

बुध का पर्वत अच्‍छा हो और शनि के पर्वत पर सीधी लकीर हो या भाग्‍य रेखा जाकर मिल रही हो तो वह व्‍यक्‍ति इंजीनियर बनता है।

शनि के ठीक नीचे केतु के पर्वत पर वर्ग हो तो वह जातक कंप्‍यूटर या इंडस्ट्रियल इंजीनियर होता है।

मैनेजमेंट की लकीरें

हथेली में बुध और बृहस्‍पति की शुभ स्थिति मैनेजमेंट के क्षेत्र की ओर ले जाती है।

भाग्‍य रेखा से बुध के पर्वत की ओर रेखा का जाना इंसान को कॉरपोरेट क्षेत्र में ले जाता है।

अगर बृहस्‍पति पर्वत अच्‍छा हो तो उस पर खड़ी लकीर या तारे का चिह्न हो तो वह व्‍यक्‍ति मैनेजमेंट या मार्केटिंग में बेहतरीन सफलता पाता है।

फिल्‍म और कला से जुड़ी रेखा

आप कला या फिल्‍म के क्षेत्र में करियर बनाएंगें,  इस बात का पता हथेली पर शुक्र पर्वत से लगाया जा सकता है। इसके अलावा हाथों का रंग भी आपमें कला के गुण होने के बारे में बता सकता है।

हाथों में शुक्र का घेरा जितना बड़ा हो उतना ही व्‍यक्‍ति को ग्‍लैमर मिलता है और व्‍यक्‍ति के कला, मीडिया या फिल्‍म में जाने की संभावना बढ़ जाती है।

बुध के पर्वत पर सीधी लकीर हो और हाथ के बीचोंबीच त्रिभुज हो तो वह जातक अभिनेता बनता है।

अगर हाथों की अंगुलियां लंबी हों और अंगूठा समकोण बनता हो तो वह व्‍यक्‍ति फिल्‍म एक्‍टर बन सकता है।

रोज़गार के अवसर

अगर हाथ का रंग बहुत साफ ना हो और हाथ क़ड़ा हो तो इंसान साधारण नौकरी करता है। हाथ की रेखाएं बहुत गाढ़ी हों तो उस व्‍यक्‍ति को तमाम मुश्किलों के बाद भी धन और रोज़गार को लेकर कोई समस्‍या नहीं रहती है। सूर्य पर्वत खराब हो या इस पर क्रॉस लग रहा हो या वलय हो तो वह जातक रोज़गार में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है।

इस तरह आप अपनी हथेली की रेखाओं को देखकर जान सकते हैं कि आप किस क्षेत्र में अपना करियर बनाएंगें।

यह भी पढ़ें : सिर्फ इन 6 वास्तु टिप्स से घर में लाएं सकारात्मक ऊर्जा

नए साल 2019 की शुभ शुरुआत हो चुकी है। इस समय घर में पॉजीटिव एनर्जी का वास होना बहुत जरूरी है ताकि सारा साल खुशहाली बनी रहे। घर की नेगेटिव एनर्जी को दूर करने के लिए आप कुछ वास्तु टिप्स अपना सकते हैं। जिसे परिवार में सारा साल सुख-शांति व समृद्धि बनी रहेगी।

मुख्य द्वार पर लगाएं स्वास्तिक

घर का मुख्य दरवाजा सबसे खास होता है। इस के जरिए ही सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा घर के अंदर प्रवेश करती है। नए साल में सबसे पहले इस तरफ ध्यान दें और मेन गेट पर चांदी के बने स्वास्तिक को लगाएं, जिससे घर में सकारात्मकता आएगी।

जरूर लगाएं पेड़-पौधे

घर चाहे छोटा हो या फिर बड़ा, पेड़-पौधे जरूर लगाएं। कम स्पेस है तो गमले में पौधे लगा सकते हैं। इससे सकारात्मरक ऊर्जा को स्थान मिलता है। इससे पूर्व दिशा के दोष हटकर घर में संतुलन बना रहता है।

बाहर फेंक दें पुराना और बेकार सामान

घर से पुराना-बेकार सामान और कूडा-करकट को बाहर फेंक दें। इसके अलावा जिन कपड़ों का आप इस्तेमाल नहीं करते उसे किसी गरीब को दान कर दें। इससे भी घर में नकारात्मकता आती है और घर में क्लेश रहता है।

हिंसक जानवरों की तस्वीरें न लगाएं

वास्तु के हिसाब से घर की डैकोरेशन का सामान भी बहुत अहमियत रखता है। ऐसे चित्र जो वीरान घर, लड़ाई-झगड़े, पतझड़ आदि नकारात्मक बातों को बढ़ाते हैं, उन्हें घर से हटा दें। इसकी जगह पर हरियाली, फूल, आनंद, उमंग, शांति व तरोताजा करने वाले चित्र लगाएं। इससे पॉजीटिव एनर्जी और खुशहाली बनी रहेगी।

जमीन खरीदते समय इन बातों का रखें ख्याल

 नए साल पर कोई जमीन खरीदने का प्लान बना रहे हैं तो कुछ खास बातों का ख्याल रखें। जो जमीन खरीद रहे हैं उसके नजदीक सड़क और ढलान नहीं होनी चाहिए। वह प्लॉट न लें जिस पर दक्षिण पश्चिम से सड़क आ रही हो।

रसोई में करवाएं सफेद पेंट

रसोई घर से निकलने वाली सकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव पूरे घर पर पड़ता है। इसके दोष को दूर करने के लिए किचन में हमेशा व्हाइट पेंट करवाएं। इससे वास्तु दोष दूर हो जाएंगे।

यह भी पढ़ें : मंगलवार को जानिए श्री हनुमान गायत्री महिमा तथा श्रीहनुमान गायत्री मंत्र को

श्री गायत्री मंत्र को जाप करने वाले और सात्विक मन्त्रों में श्रेष्ठ माना गया है। और माता भगवती कि कृपानुसार गायत्री मंत्र को विभिन्न वर्गों में भिभाजित किया गया है तथा यज्ञ और हवन में इन मंत्रो की आहुति को अत्यधिक महत्व दिया जाता है और शुभ माना जाता है।

किसी भी यज्ञ या हवन के शुरुआत में सभी श्री गायत्री मंत्रो की आहुति को अति उत्तम माना जाता है।

गायत्री के मंत्रो को कई देवताओं के श्रेणी में रखते हुए हर देव का गायत्री मंत्र और मूल मंत्र बनाया गया है जो अति प्रभावशाली है।

नीचे दिया हुआ मंत्र हनुमान गायत्री मंत्र कहलाता है, इस मंत्र के जाप से हनुमान जी प्रसन्न होते है और भक्तों की उन पर कृपा होती है।

मंत्र निम्न प्रकार से है:-

ओम् आंजनेयाय विद्मिहे वायुपुत्राय धीमही
तन्नो: हनुमान: प्रचोदयात।
ओम् रामदूताय विद्मिहे कपिराजाय धीमहि।
तन्नो: मारुति: प्रचोदयात।
ओम् अन्जनिसुताय विद्मिहे महाबलाय धीमहि।
तन्नो: मारुति: प्रचोदयात।।
ओम् ह्रीं ह्रीं हूँ हौं हृ:
इति मूल मंत्र।

श्री हनुमानजी के भक्तों को इस हनुमत गायत्री मंत्र का जाप अवश्य कारण चाहिए तथा साथ में हनुमत मूल मंत्र का जाप भी श्रेष्ठ होता है। इस मंत्र का ध्यान व स्मरण करने मात्र से ही श्री हनुमानजी प्रसन्न होते है व भक्तों के संकट और पीड़ा को हर लेते है।

जाप विधि:-
प्रत्येक मंत्र को जपने और स्मरण करने का विधान होता है, और भक्तो को चाहिए कि वे विधि पूर्वक ही प्रत्येक मंत्र का जाप करे इस हनुमान गायत्री मंत्र को मंगलवार या शनिवार के दिन प्रातकाल शुद्ध होकर आसन पर पूर्वदिशाभिमुख होकर विराजमान होकर मंत्र का जाप आरम्भ करना चहिये।

इस प्रकार हनुमान जी का स्मरण करते हुए कम से कम 108 बार मंत्र जाप करे भक्त चाहे तो मंत्र को हवन या यज्ञ विधि से सिद्ध भी कर सकते है।
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यह भी पढ़ें : अद्भुत अकल्पनीय महाकुंभ में आस्था की डुबकी

वीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल 16 जनवरी 2013। भारत को आस्था, आध्यात्म और पवित्रता की भूमि कहा जाता है। सर्वधर्म सम्भाव की इस पावन भूमि के कण-कण में देवों का वास बताया जाता है। दुनिया के सबसे प्राचीन हिंदू सनातन धर्म के इस देश में ऐसी अनेकों परंपराएं हैं जो सदियों पूर्व से अनवरत चली आ रही हैं, और दुनिया के साथ भारत के भी विकास पथ पर कहीं आगे निकल जाने के बावजूद इनका कोई जवाब नहीं है। प्रयागराज में इन दिनों चल रहा आस्था का महासमागम यानी कुम्भ मेला आज भी देश हीं नहीं दुनिया के 10 करोड़ से अधिक लोगों को आकर्षित कर रहा है तो इसमें कु्म्भ मेले से जुड़ी अनेकों विशिष्टताएं हैं। इतनी भारी संख्या में एक धार्मिक भावना ‘आस्था’ के साथ लोगों का एक स्थान पर समागम दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता। कुम्भ भारतीयों के मस्तिष्क और आत्मा में रचा-बसा हुआ पर्व है, जिसमें पुरुष, महिलाएं, अमीर, गरीब सभी लोग भाग लेते हैं। अपने विशाल स्वरूप में यह पर्व भारतीय जनमानस की पर्व चेतना की विराटता का द्योतक भी है। इससे भारत की सांस्कृतिक चेतना और एकता को जाग्रत व सुदृढ़ करने की दृष्टि मिलती है, साथ ही आस्थावान देश वासियों का संत समागम के साथ आपस में जुड़ाव भी मजबूत होता है। आर्थिक दृष्टिकोण से भी प्रयागराज में इस वर्ष आयोजित 55 दिन का कुंभ अत्यधिक लाभप्रद होने जा रहा है। इस महाआयोजन में 10 से 15 करोड़ श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना जताई जा रही है, जिसके साथ ही इस दौरान 12,000 करोड़ रुपए का आर्थिक कारोबार होने और करीब छह लाख लोगों को सीमित समय के लिए ही सही रोजगार मिलने की बात भी कही जा रही है।

कुम्भ पर्व हिंदू धर्म का तो यह सबसे बड़ा और पवित्र आयोजन है ही जिसमें अमृत स्नान और अमृत पान तक की कल्पना की गई है, साथ ही यह निर्विवाद तौर पर विश्व का सबसे विशालतम मेला और महाआयोजन भी कहा जाता है, जिसमें अनेकों जाति, धर्म, क्षेत्र के करोड़ों लोग भाग लेते हैं, और पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं। दुनिया भर के वैज्ञानिक भी गंगा के सर्वाधिक लंबे समय तक खराब न होने एवं त्वचा व अन्य रोगों में लाभकारी होना स्वीकार कर चुके हैं। गंगा वैसे भी पापनाशनी, पतित पावनी कही जाती है। इसे एक नदी से कहीं अधिक देवी और माता का दर्जा दिया गया है। यह हिंदुओं के जीवन और मृत्यु दोनों से जुड़ी हुई है और इसके बिना हिंदू संस्कार अधूरे हैं, वहीं यह देश के विशालतम भूभाग को सींचते हुए उर्वरा शक्ति भी बढ़ाती है। गंगाजल का अमृत समान माना जाता है। कहा जाता है कुम्भ पर्व के दौरान गंगा नदी में ऐसे अनूठे संयोग बनते हैं कि इसकी पावन धारा में अमृत का सतत प्रवाह होने लगता है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप दूर हो जाते हैं और मनुष्य जीवन मरण के बंधनों से मुक्त हो मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। इसलिए इलाहाबाद के कुम्भ में गंगा स्नान, पूजन का अलग ही महत्व है। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है मकर संक्राति, कुम्भ और गंगा दशहरा के समय गंगा में स्नान, पूजन, दान एवं दर्शन करना महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि गंगा पूजन से मांगलिक दोष से ग्रसित जातकों को विशेष लाभ प्राप्त होता है, और गंगा स्नान करने से अशुभ ग्रहों का प्रभाव समाप्त हो जाता है, साथ ही सात्विकता और पुण्य लाभ भी प्राप्त होता है। अमावस्या के दिन गंगा स्नान और पितरों के निमित तर्पण व पिंडदान करने से सद्गति प्राप्त होती है।
कुम्भ पर्व की महिमा का वर्णन पुराणों से शुरू होता है। साथ ही कई धार्मिक, ज्योतिषीय और पौराणिक आधार इस महापर्व को विशिष्ट बनाते हैं। पुराणों में वर्णित संदर्भों के अनुसार यह पर्व समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत घट के लिए हुए देवासुर संग्राम से जुड़ा है। इसी दौरान भगवान विष्णु का कूर्म अवतार भी हुआ था। मान्यता है कि समुद्र मंथन से 14 रत्नों की प्राप्ति हुई, जिनमें प्रथम विष था तो अन्त में अमृत घट लेकर धन्वन्तरि प्रकट हुए। कहते हैं अमृत पाने की होड़ ने एक युद्ध का रूप ले लिया। ऐसे समय असुरों से अमृत की रक्षा के उद्देश्य से विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर अमृत देवताओं को सोंप दिया। एक मान्यता के अनुसार देवताओं के राजा इन्द्र के पुत्र जयंत और दूसरी मान्यता के अनुसार विष्णु के वाहन गरुड़ उस अमृत कलश (कुम्भ) को लेकर वहाँ से पलायन कर गये। इस दौरान सूर्य, चंद्रमा, गुरु एवं शनि ने अमृत कलश की रक्षा में सहयोग दिया। अमृत कलश को स्वर्ग लोक तक ले जाने में 12 दिन लगे। देवों का एक दिन मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है, लिहाजा इन बारह वर्षों में बारह स्थानों पर अमृत कलश रखने से वहाँ अमृत की कुछ बूंदे छलक गईं। इनमें आठ स्थान देवलोक स्वर्ग में तथा चार स्थान पृथ्वी पर बताए जाते हैं। कहते हैं उन्हीं स्थानों पर, ग्रहों के उन्हीं संयोगों पर कुम्भ पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि कुम्भ और महाकुम्भ में वही अमृत की बूंदे वापस इन नदियों के पानी में छलक उठती हैं। जो भी इस दौरान इन पवित्र नदियों में स्नान करता है वह जीवन-मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो जाता है। पृथ्वी के इन चारों स्थानों पर तीन वर्षों के अन्तराल पर प्रत्येक बारह वर्ष में कुम्भ का आयोजन होता है। कुम्भ पर्वों को तारों के क्रम के अनुसार हर 12वें वर्ष विभिन्न तीर्थ स्थानों पर आयोजित करने की बात भी कही जाती है। नारदीय पुराण (2/66/44), शिव पुराण (1/12/22/23), वराह पुराण (1/71/47/48) और ब्रह्मा पुराण आदि पौराणिक ग्रंथों में भी कुम्भ एवं अर्द्ध कुम्भ के आयोजन को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण मिलते हैं, इनके अनुसार कुम्भ पर्व हर तीन साल के अंतराल पर देवभूमि उत्तराखंड की धरती पर स्थित तीर्थ नगरी हरिद्वार से शुरू होता है। यहां गंगा नदी के तट पर आयोजित होने वाला कुम्भ को महाकुम्भ कहा जाता है, जिसकी अपार महिमा है। यहां के बाद तीन-तीन वर्ष के अंतराल में कुम्भ का आयोजन होता है। प्रयाग में गंगा, यमुना व अदृश्य मानी जाने वाली सरस्वती के संगम-त्रिवेणी पर आयोजित होने वाली कुंभ की ऐसी धार्मिक महत्ता है कि इस स्थान को “तीर्थराज” प्रयागराज कहा जाता है। कहते हैं कि यहां इस दौरान त्रिवेणी में स्नान करना सहस्रों अश्वमेध यज्ञों, सैकड़ों वाजपेय यज्ञों तथा एक लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से भी अधिक पुण्य प्रदान करता है। मनुष्य जन्म-जन्मांतरों के फेर से बाहर निकलकर मोक्ष को प्राप्त करता है। इस अवसर पर तीर्थ यात्रियों को गंगा स्नान के साथ ही सन्त समागम का लाभ भी मिलता है। इसके अलावा नासिक-पंचवटी में गोदावरी और अवन्तिका-उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर भी तीन-तीन वर्षों के अंतराल में कुंभ का आयोजन किया जाता है।
हजारों वर्षों से चली आ रही यह परम्परा केवल रूढ़िवाद या अंधश्रद्धा नहीं है, वरन यह महापर्व सौर मंडल के धार्मिक मान्यता के अनुसार कुम्भ की रक्षा करने के प्रसंग से जुड़े चार ग्रहों सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति एवं शनि के विशिष्ट स्थितियों में आने से बने खगोलीय संयोग पर आयोजित होते हैं, इस तरह इस पर्व का वैज्ञानिक आधार भी है। यही विशिष्ट बात इस सनातन लोकपर्व के प्रति भारतीय जनमानस की आस्था का दृढ़तम आधार है। तभी तो सदियों से चला आ रहा यह पर्व आज संसार के विशालतम धार्मिक मेले का रूप ले चुका है। अंतरराष्ट्रीय ख्याति के इस आयोजन का जिक्र प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग की डायरी में भी मिलता है। उनकी डायरी में हिन्दू महीने माघ (जनवरी – फरवरी) में 75 दिनों के उत्सव का उल्लेख है, जिसमें लाखों साधु, आम आदमी, अमीर और राजा शामिल होते थे।
कुम्भ के दौरान शाही स्नान कर अमृत पान करने के लिए निकलने वाले भव्य जुलूस में अखाड़ों के प्रमुख महंतों की सवारी सजे-धजे हाथी, पालकी और भव्य रथों पर निकलती हैं। उनके आगे पीछे सुसज्जित ऊँट, घोड़े, हाथी और बैंड़ भी होते हैं। इनके बीच विशेषकर शरीर पर वस्त्रों के बजाय राख मलकर निकलने वाले नागा साधुओं का समूह श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल का विषय रहता है। विभिन्न अखाड़ों के लिए शाही स्नान का क्रम निश्चित होता है। उसी क्रम में साधु समाज स्नान करते हैं। साधुओं की बड़ी-बड़ी जटाएं और अनोखी मुद्राएं भी आकर्षण का केंद्र रहती हैं। सामान्यतया घने वनों, जंगलों, गुफाओं में शीत, गर्मी व बरसात जैसी हर तरह की मौसमी विभीषिकाओं की परवाह किए बिना नग्न शरीर पर केवल भस्म रमा कर रहने वाले साधुओं के कुम्भ में सहज दर्शन हो पाते हैं। कुम्भ मेले का एक और बड़ा वैशिष्ट्य यह भी है कि यहाँ शैव, वैष्णव और उदासीन सम्प्रदायों के साधु अनेक अखाड़ों और मठों व विभिन्न साधु सम्प्रदायों के अखाड़ों की उपस्थिति रहती है। प्रत्येक अखाड़े के अपने प्रतीक चिह्न और ध्वज-पताका होती है, जिसके साथ ही अखाड़े मेले में उपस्थित होते हैं, वहाँ उनकी अपनी छावनी होती है, जिसके बीचों-बीच बहुत ऊँचे स्तम्भ पर उनका ध्वज फहराता है। इन अखाड़ों के साधु शस्त्रधारी होते हैं। उनकी रचना एकदम सैनिक पद्धति पर होती है। उनमें शस्त्र और शास्त्र का अद्भुत संगम होता है। ये साधु सांसारिक जीवन से विरक्त और अविवाहित होते हैं। उनकी दिनचर्या बहुत कठोर होती है। शस्त्रधारी होते हुए भी, और विश्व का सबसे बड़ा ऐश्वर्य प्रदर्शन करने के बावजूद वह फक्कड़ तपस्वी होते हैं।
कहा जाता है कि मुगल बादशाह बाबर के पूर्वज तैमूर की आत्मकथा के अनुसार तैमूर ने सन 1394 में हरिद्वार के कुम्भ में कई सहस्र तीर्थयात्रियों की अकारण ही निर्मम हत्या कर दी थी। उन दिनों हिन्दुओं की तीर्थ यात्रा भी सुरक्षित नहीं बची थी। ऐसे में निहत्थे हिन्दू समाज की रक्षा के लिए साधु-संतों को मोक्ष-साधना के साथ-साथ शस्त्र धारण भी करना पड़ा। विदेशी शासकों के अत्याचारों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष करने और हिन्दू समाज को अपनी धार्मिक आस्थाओं का निर्विघ्न पालन करने हेतु संरक्षण देने का बीड़ा साधु समाज ने उठाया। शस्त्र धारण करने की दिशा में पहले नागा साधु आगे बढ़े। कुम्भ मेलों की सुरक्षा का दायित्व वे ही संभालते थे। बहुत बाद में रामानंदी सम्प्रदाय के वैष्णव वैरागियों ने भी सन् 1713 में जयपुर के समीप ‘गाल्ता’ नामक स्थान पर महन्त रामानन्द के मठ में शस्त्र धारण करने का निर्णय लिया। जयपुर नरेश सवाई जयसिंह का नाम भी इस घटना के साथ जोड़ा जाता है। उन्हें मुगल शासनकाल में हिन्दू तीर्थ स्थानों पर ‘जयसिंहपुरा’ नामक केन्द्र स्थापित करने और उनमें रामानंदी सम्प्रदाय के निर्मोही अखाड़ो को प्रवेश देने, मराठे, बुन्देले और बंदा बैरागी जैसी अनेक हिन्दू शक्तियों को यथाशक्ति सहायता देने और पेशवा बाजीराव प्रथम को मालवा पर विजय और अधिकार दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाने का श्रेय भी दिया जाता है।
कुम्भ की तरह ही प्रयाग भी हजारों वर्षों तक देश को ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, कला, धर्म और संस्कृति की अमूल्य शिक्षा देने के बावजूद वर्तमान में मुगल शासक अकबर द्वारा 1583 में दिए गए इलाहाबाद नाम से जाना जाता है। इलाहाबाद एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ होता है अल्लाह द्वारा बसाया गया शहर। यानी अकबर भी इस पुरातन हिंदू शहर के स्वरूप से भलीभांति परिचित था। बताते हैं कि मुगल काल में इस स्थान के अनेकों ऐतिहासिक मंदिरों को तोड़कर उनका अस्तित्व मिटा दिया गया। बावजूद, प्रयाग में हिंदुओं के बहुत सारे प्राचीन मंदिर और तीर्थ है। संगम तट पर जहां कुम्भ मेले का आयोजन होता है, वहीं भारद्वाज ऋषि का प्राचीन आश्रम है। प्रयाग को विष्णु की नगरी भी कहा जाता है और यहीं पर भगवान ब्रह्मा के द्वारा प्रथम बार यज्ञ करने का वृतांत भी मिलता है। माना जाता है पवित्र गंगा और यमुना के मिलन स्थल के पास आर्यों ने प्रयाग तीर्थ की स्थापना की थी।
वहीं कुम्भ मेले के इतिहास के शोधार्थियों का प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के अध्ययन के आधार पर मानना है कि प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में कुम्भ मेलों का सूत्रपात किसी एक केन्द्रीय निर्णय के अन्तर्गत, किसी एक समय पर, एक साथ नहीं किया गया होगा, वरन एक के बाद एक अपने-अपने कारणों से पवित्र तीर्थस्थलों पर आयोजित किए गए होंगे, और आगे चलकर एक पौराणिक कथा के माध्यम से इन्हें एक श्रृंखला में पिरो दिया गया होगा। आदि गुरु शंकराचार्य को कुंभ पर्व को वर्तमान मेले का स्वरूप देने का श्रेय दिया जाता है, जिन्होंने ही भारत के चार कोनों पर चार धामों की स्थापना की थी, जिसके कारण चार धाम की तीर्थयात्रा का प्रचलन हुआ। बारहवीं शताब्दी से कुम्भ मनाए जाने के लिखित प्रमाण मिलते हैं।

अंक 36 : जानिए इस वर्ष क्यों 14 जनवरी को नहीं मनेगी मकर संक्रांति एवम आपकी राशि पर क्या पड़ेगा उत्तरायणी का प्रभाव

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री

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जानिए इस वर्ष 15 जनवरी 2019 को क्यों मनेगी मकर संक्रांति एवम जानिए आपकी राशि अनुसार उसका फल–
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प्रिय मित्रों/पाठकों, मकर संक्रांति हिंदुओ के विशेष त्योहारों में से एक है जिस देशभर में धूमधाम से मनाया जाता है। ये त्योहार जनवरी महीने में मनाया जाता है।
वर्षो से मकर संक्रांति का त्योहार 14 जनवरी को मनाया जाता रहा है। वर्ष 2019 याने इस बार ये पर्व 14 को नहीं, बल्कि 15 जनवरी को मनाया जाएगा। हम सभी जानते हैं कि हिंदू पंचांग के अनुसार पौष माह में जब सूर्य मकर राशि में आता है तब ये पर्व मनाया जाता है।

इस वर्ष ऐसा होने का बड़ा कारण ये है कि 14 जनवरी 2019 को शाम 7.52 बजे पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। परन्तु मकर राशि का पुण्यकाल 14 जनवरी को रात 1.28 बजे से 15 जनवरी को दोपहर 12 बजे तक रहेगा। ऐसे में संक्रांति पर दान-स्नान का महत्व 15 तारीख को माना जा रहा है। इसका प्रभाव 15 जनवरी को दिनभर होगा।

इसलिए देशभर में मकर संक्रांति का पर्व दो दिन तक मनाया जा सकेगा। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होता है। परंपराओं में ऐसी मान्यता है कि इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है।

ज्योतिषी पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि सूर्य के प्रतीक मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर लोग सुबह नहा धोकर पूर्व दिशा की ओर सूर्य को अर्घ्य देते हुए नमस्कार करते है।

वैसे प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार इस वजह 15 जनवरी को मनाया जा रहा है।

(सोमवार) 14 जनवरी 2019 को सूरज शाम के समय 7 बजकर 52 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करने वाला है जिसका पुणयकाल 15 जनवरी तक जारी रहेगा। 15 जनवरी को दिनभर दान-धर्म चलता रहेगा।
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सिंह पर आ रही मकर संक्रांति–

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि इस बार मकर संक्रांति सिंह पर आ रही है।

इस वर्ष मकर संक्रांति का 2019 में वाहन सिंह रहेगा। इसके अलावा उपवाहन गज होगा। सफेद रंग के वस्त्र में स्वर्ण के बर्तन में अन्न ग्रहण करते हुए व कुंकुंम का लेप करके आ रही ये मकर संक्रांति कारोबार से लेकर व्यापार के लिए बड़ी शुभ होगी।
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जानिए इस मकर संक्रांति का बाजार पर क्या होगा असर–

ज्योतिषशाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि बाजार में कुछ वस्तुओं में तेजी तो कुछ में मंदी आएगी। चांदी, चांवल, जौ, चना, कपास, अलसी, सरसो, मैथी, घी में तेजी आएगी। इसके अलावा गुड़, सोना, चांदी में मंदी रहेगी।

इतना ही नहीं, लकड़ी, कोयला व पत्थर से जुडे़ कारोबार में तेजी रहेगी।
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किस वस्तु के दान से होगा लाभ–

संक्रांति के दिन नए बर्तन, गर्म कपडे़, सुहाग का सामान, गुड़, तिल, सुखी खिचड़ी, भूमि का दान, गाय को चारा, घोडे़ को घांस खिलाने से लाभ होता है।
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जानिए कब रहेगा पुण्यकाल का समय —
मकर संक्रांति के दिन तिल के दान का विशेष महत्व है। इसके अलावा 14 जनवरी की मध्यरात्रि 2 बजकर 20 मिनट से 15 जनवरी की शाम को 6 बजकर 20 मिनट तक पुण्यकाल रहेगा।
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आपकी राशि अनुसार यह रहेगा फल—

ज्योतिषी पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार मकर संक्रान्ति के दिन दान करने से हर राशि वाले को लाभ होता है।

अगर दान किया गया तो मेष राशि को धन का लाभ, वृषभ राशि को अन्न का दान, मिथुन राशि को स्वास्थ्य का लाभ, कर्क राशि को हर कार्य में सफलता, सिंह राशि को पूर्वजों का आशीर्वाद, कन्या राशि को आवास का लाभ, तुला राशि को सम्मान व प्रतिष्ठा का लाभ, वृश्चिक राशि को वाहन का लाभ, धनु राशि को परीक्षा में सफलता, मकर राशि को दुश्मन पर जीत, कुंभ राशि को धनलाभ व मीन राशि को हर कार्य में सफलता मिलेगी।
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जानिए क्यों हें मकर संक्रांति का इतना महत्व–

ज्योतिषशाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि यानी नकारात्मकता का प्रतीक और उत्तरायण को देवताओं का दिन यानी सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है. इसलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक कार्यों का खास महत्व है।

ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर फिर मिल जाता है. इस दिन शुद्ध घी और कंबल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है, ऐसी मान्यता है।
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रातें छोटी, दिन बड़ा होता है आरम्भ —

मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है इसलिए इस दिन से रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं. गरमी का मौसम शुरू हो जाता है. दिन बड़ा होने से सूर्य की रोशनी अधिक होगी और रात छोटी होने से अंधकार कम होगा. इसलिए मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है।

अंक 35 : जानें कुंभ मेले में कब होंगे शाही स्‍नान और क्या है कुंभ का महत्व

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कुंभ मेले में पहला शाही स्‍नान 15 जनवरी 2019 को होगा..

वर्ष 2019 में संगम नगरी इलाहाबाद में लगने वाले कुंभ मेले के शाही स्‍नान की तारीखों का एलान शनिवार को मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ की मौजूदगी में किया गया. अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के मुताबिक इलाहाबाद में लगने वाले कुंभ मेले में पहला शाही स्‍नान 15 जनवरी, 2019 को मकर संक्रांति के मौके पर होगा.

वहीं दूसरा शाही स्‍नान 4 फरवरी, 2019 को मौनी अमावस्‍या के मौके पर होगा. इसके बाद तीसरा और आखिरीशाही स्‍नान 10 फरवरी, 2019 को वसंत पंचमी के दिन किया जाएगा.
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इलाहाबाद का कुंभ मेला –

ज्योतिषियों के अनुसार कुंभ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुड़ा है. प्रयाग का कुम्भ मेला सभी मेलों में सर्वाधिक महत्व रखता है. मेले की तिथि कीगणना करने के लिए सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति की स्थिति की आवश्यकताहोती है. इलाहाबाद की इस पावन नगरी के अधिष्ठाता भगवानश्री विष्णु स्वयं हैं और वे यहाँ माधव रूप में विराजमान हैं. भगवान के यहाँ बारहस्वरूप विद्यमान हैं.

ऐसी पौराणिक मान्यता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं. चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति केनाम से जाना जाता है.
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संक्रांति पर भीष्म पितामह ने त्यागी थी देह—
महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं. इसलिए संक्रांति मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. इस दिन तिल-गुड़ के सेवन का साथ नए जनेऊ भी धारण करना चाहिए.
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मकर संक्रांति हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है जो जनवरी के महीने में 14 या 15 तारीख को मनाया जाता है. पूरे भारत में इस त्योहार को किसी न किसी रूप में मनाया जाता है. तमिलनाडु में इसे पोंगल के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल और आंध्र प्रदेश में इसे केवल ‘संक्रांति’ कहते हैं. पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है जब इस पर्व को मनाया जाता है. यह पर्व जनवरी माह के तेरहवें, चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ( जब सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है ) पड़ता है. मकर संक्रांति के दिन से सूर्य की उत्तरायण गति प्रारंभ होती है. इसलिए इसको उत्तरायणी भी कहते हैं. शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि यानि नकारात्मकता का प्रतीक और उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है. इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है. धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है. इस दिन शुद्ध घी एवं कंबल दान मोक्ष की प्राप्त करवाता है. मकर संक्रांति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यंत शुभकारक माना गया है. इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई है. सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किंतु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक है. यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छह-छह माह के अंतराल पर होती है. भारत देश उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है. मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात भारत से दूर होता है. इसी कारण यहां रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है, लेकिन मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है. अत: इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है.
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प्रयागराज को तीर्थों का राजा कहा जाता है इसलिए यहां स्थित छोटे बड़े सभी धर्म-स्थलों का अपना एक महत्व है, अपनी एक पहचान है. संगम के ईशान कोण पर स्थित होने के कारण गंगोली शिवालय अपने आप में एक अद्भुत दार्शनिक स्थल है जहां पर भगवान भोलेनाथ के ज्योतिर्लिंग स्थापित हैं. लोगों का कहना है कि गंगोली शिवालय पर आने से एक अद्भुत सुख की अनुभूति होती है और मन को बहुत शांति मिलती है. यहां पर भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करने से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है.

कुंभ मेले के मद्देनजर इस गंगोली शिवालय का भी जीर्णोद्धार हो रहा है जिसमें पेंटिंग द्वारा सनातन धर्म एक बार फिर से दिखाने का प्रयास किया जा रहा है. मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि सरकार की इस पहल से जो युवा वर्ग है उसको अपने सनातन धर्म और भगवान के साथ ही संस्कृति और संस्कार के बारे में करीब से जानकारी मिलेगी और उनकी धर्म के प्रति आस्था बढ़ेगी. मंदिर की विशेषता है कि इस मंदिर की कलाकृतियों में भगवान भोलेनाथ से संबंधित कई महत्वपूर्ण मूर्तियों को उकेर कर उसके महत्व को दर्शाया गया है जिसके दर्शन से यहां आने वाले दर्शनार्थियों को भगवान भोलेनाथ के बारे में शिव पुराण के बारे में जानकारी मिलती है.

गंगा किनारे स्थित गंगोली शिवालय को अब और भी सुंदर बनाने के लिए पेंट माई सिटी के तहत रंगाई करके और सुंदर बनाया जा रहा है जिससे यहां आने वाले श्रद्धालुओं को सनातन धर्म के विषय मे महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सके।

तीर्थराज प्रयाग में लगने वाले सबसे बड़े धार्मिक मेले कुंभ की चर्चा हर तरफ हो रही है. आस्था, धर्म, संस्कार, संस्कृति का संगम वाला यह सबसेबड़ा धार्मिक मेला संगम किनारे लग रहा है. जहां करोड़ों की संख्या में लोगदेश-विदेश और भारत के कोने-कोने से आएंगे. संगम के आसपास और उससे सटे हुए तमाम ऐसेमंदिर हैं जिनकी अपनी आस्था और अलग पहचान है. उन्हीं में से एक है गंगोली शिवालाजोकि प्रयागराज के झूंसी क्षेत्र में बना हुआ है. यहां के पुजारी की मानें तो यह मंदिर 300 वर्ष पहलेआगरा के एक ब्राह्मण व्यापारी गंगा प्रसाद तिवारी के द्वारा बनवाया गया था. माना जाता है कि यहां आने वाले हर भक्त की समस्त मनोकामनाओं को भगवान भोलेनाथ पूरा करतेहैं.
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भारत में कुंभ मेले को लेकर लोगों में काफी आस्था है. कुंभ को सबसे बड़े शांतिपूर्ण सम्मेलन के तौर पर जाना जाता है. हिंदू कैलेंडर के हिसाब से यह हर 12 साल में आयोजित होता है. कई अखाड़ों के साधु और लाखों श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं. कुंभ को धार्मिक वैभव और विविधता का प्रतीक भी माना जाता है. इसी महत्ता को देखते हुए यूनेस्को ने भारत के कुंभ मेले को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर’ के तौर पर मान्यता दी है.

कुंभ मेला को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान करने की सिफारिश करते हुए विशेषज्ञ समिति ने कहा था कि यह पृथ्वी पर तीर्थयात्रियों का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण जमावड़ा है. योग और नवरोज के बाद पिछले करीब दो वर्षो में इस प्रकार की मान्यता प्राप्त करने वाला कुंभ मेला तीसरा धरोहर है. कुंभ मेले का आयोजन देश में चार स्थान हरिद्वार, इलाहाबाद (प्रयाग), नासिक और उज्जैन में होता है.

हिंदू मान्यताओं के अनुसार समुद्रमंथन से प्राप्त अमृत के कुंभ से इन चारों स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें गिर गई थीं. कुंभ की अवधि में इन पवित्र नदियों में डुबकी लगाने से प्राणी मात्र के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं. त्रियंबकेश्वर कुंभ को मानने वाले खुद को शैव बताते हैं जबकि नासिक कुंभ को मानने वाले वैष्णव कहलाते हैं. हिंदू कैलेंडर के हिसाब से जब माघ के महीने में सूर्य और बृहस्पति एक साथ सिंह राशि में प्रवेश करते हैं तब नासिक और त्रियंबकेश्वर में कुंभ का आयोजन होता है.
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यूनेस्को के अधीनस्थ संगठन इंटरगर्वनमेंटलकमिटी फोर द सेफगार्डिंग ऑफ इन्टेंजिबल कल्चरल हेरीटेज ने दक्षिण कोरिया के जेजूमें हुए अपने 12वें सत्र में कुंभ मेले को ‘मावनता के अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची’ में शामिल किया है.दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला माना जाने वाला कुंभ मेला सूची में बोत्सवाना, कोलंबिया, वेनेजुएला, मंगोलिया, मोरक्को, तुर्की और संयुक्त अरबअमीरात की चीजों के साथ शामिल किया गया है।
कुंभ को यूनेस्को ने दुनिया की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है और यह माना है कि यह धरती पर होने वाला सबसे बड़ा शांतिपूर्ण धार्मिक सम्मेलन है, जिसमें विभिन्न वर्गों के लोग बिना किसी भेदभाव के भाग लेते हैं. एक धार्मिक आयोजन के तौर पर कुंभ में जैसी सहिष्णुता और समायोजन नजर आता है, वह पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण है. उम्मीद करनी चाहिए कि कुंभ के प्रति दुनिया का यह विश्वास और आस्था इसी तरह बनी रहेगी.

अंक 34 : आइये जानें कि क्या हैं महाकुम्भ..???
क्यों करें कुम्भ स्नान…??

कुम्भ का पौराणिक महत्त्व और इतिहास..???

प्रिय मित्रों/पाठकों, कुम्भ हमारी संस्कृति में कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। पूर्णताः प्राप्त करना हमारा लक्ष्य है, पूर्णता का अर्थ है समग्र जीवन के सात एकता, अंग को पूरे अंगी की प्रतिस्मृति, एक टुकड़े के रूप में होते हुए अपने समूचे रूप का ध्यान करके अपने छुटपन से मुक्त। इस पूर्णता की अभिव्यक्ति है पूर्ण कुम्भ। अथर्ववेद में एक कालसूक्त है, जिसमें काल की महिमा गायी गयी है, उसी के अन्दर एक मंत्र है, जहाँ शायद पूर्ण कुम्भ शब्द का प्रयोग मिलता है, वह मन्त्र इस प्रकार है-

पूर्णः कुम्भोधिकाल आहितस्तं वै पश्यामो जगत्

ता इमा विश्वा भुवनानि प्रत्यङ् बहुधा नु सन्तः

कालं तमाहु, परमे व्योमन् ।

इसका मोटा अर्थ है, पूर्ण कुम्भ काल में रखा हुआ है, हम उसे देखते हैं तो जितने भी अलग-अलग गोचर भाव हैं, उन सबमें उसी की अभिव्यक्ति पाते हैं, जो काल परम व्योम में है। अनन्त और अन्त वाला काल दो नहीं एक हैं; पूर्ण कुम्भ दोनों को भरने वाला है। पुराणों में अमृत-मन्थन की कथा आती है, उसका भी अभिप्राय यही है कि अन्तर को समस्त सृष्टि के अलग-अलग तत्त्व मथते हैं तो अमृतकलश उद्भूत होता है, अमृत की चाह देवता, असुर सबको है, इस अमृतकलश को जगह-जगह देवगुरु वृहस्पति द्वारा अलग-अलग काल-बिन्दुओं पर रखा गया, वे जगहें प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक हैं, जहाँ उन्हीं काल-बिन्दुओं पर कुम्भ पर्व बारह-बारह वर्षों के अन्तराल पर आता है बारह वर्ष का फेरा वृहस्पति के राशि मण्डल में धूम आने का फेरा है। वृहस्पति वाक् के देवता हैं मंत्र के, अर्थ के, ध्यान के देवता हैं, वे देवताओं के प्रतिष्ठापक हैं। यह अमृत वस्तुतः कोई द्रव पदार्थ नहीं है, यह मृत न होने का जीवन की आकांक्षा से पूर्ण होने का भाव है। देवता अमर हैं, इसका अर्थ इतना ही है कि उनमें जीवन की अक्षय भावना है। चारों महाकुम्भ उस अमृत भाव को प्राप्त करने के पर्व हैं।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि (ऐसी मान्यता है कि) ब्रह्माण्ड की रचना से पहले ब्रम्हाजी ने यहीं अश्वमेघ यज्ञ किया था. दश्वमेघ घाट और ब्रम्हेश्वर मंदिर इस यज्ञ के प्रतीक स्वरुप अभी भी यहां मौजूद हैं. इस यज्ञ के कारण भी कुम्भ का विशेष महत्व है. कुम्भ और प्रयाग एक दूसरे के पर्यायवाची है.

कुंभ अर्थात मिट्टी का घड़ा (मटका) मनुष्य के शरीर को पार्थिव पृथ्वी तत्व प्रधान कहते हैं। कुंभ को अर्थात घडे को मानव देह का प्रतीक माना गया है क्योंकि शरीर मिट्टी से निर्मित है तथा मृत्यु के पश्चात मिट्टी में ही विलीन होता है। हम सभी के मटके (कुंभ) भी कच्चे ही हैं क्योंकि हमें अपने रूप संपत्ति कर्तव्य इत्यादि का अथवा इनमें से किसी एक का अहंकार होता है। साथ ही हमारा मन कामक्त्रोधादि अनेक स्वभाव दोषों से ओतप्रोत होता है। इस प्रकार अपने अनेक पापों, वासनाओं एवं कामक्त्रोध आदि विकारों से ओतप्रोत देहरूपी कुंभ को रिक्त करने का सर्वोत्तम स्थल तथा काल है कुंभ मेला।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार कुम्भ पर्व मनुष्य को आस्था में अभिषिक्त करने के लिये तो है ही, वह मनुष्य को अभिषेक का द्रव बनाने के लिये भी है। द्रव के सम्पर्क से द्रव नहीं बनता, तप के सम्पर्क से द्रव बनता है, इसीलिये उस तप की भावना का स्मरण ऐसे पर्व के अवसर पर आवश्यक है, जिसने गंगा को द्रवित किया, जिसने गंगा को सर्वजन कल्याण के लिये उन्मोचित किया, जिसने गंगा के किनारे तप करके इसकी धारा को संस्कृति की मुख्य धारा बनाया। तपोवन-आस्थातप के बिना, जीवन के कठिन निर्वाह के बिना, जड़ होती है इस महाकुम्भ पर बार-बार याद करें, तभी आप मंगलमय कुम्भाभिषेक के अधिकारी होंगे।

कुंभ पर्व अत्यंत पुण्यदायी होने के कारण प्रयाग में स्नान करने से अनंत पुण्यलाभ होता है। इसीलिए यहां करोड़ों श्रद्धालु साधु संत इस स्थान पर एकत्रित होते हैं। कुंभ मेले के काल में अनेक देवी देवता, मातृका, यक्ष, गंधर्व तथा किन्नर भी भूमण्डल की कक्षा में कार्यरत रहते हैं। साधना करने पर इन सबके आशीर्वाद मिलते हैं तथा अल्पावधि में कार्यसिद्धि होती है। गंगा यमुना सरस्वती गोदावरी एवं क्षिप्रा इन नदियों के क्षेत्र में कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। नदी के पुण्य क्षेत्र में वास करने वाले अनेक देवता पुण्यात्मा, ऋषिमुनि कनिष्ठ गण इस समय जागृत रहते हैं। इस काल में कृत्य कर्म के लिए पूरक होता है तथा कृत्य को कर्म की सहमति मिलती है। कुंभ मेले के काल में सर्वत्र आतत्वदर्शक पुण्य तरंगों का भ्रमण होता है। इससे मनुष्य के मन की शुद्धि होती है तथा उसमें उत्पन्न विचारों द्वारा कृत्य भी फलदायी होता है। अर्थात कृत्य एवं कर्म दोनों की शुद्धि होती है।

कुंभ मेले में सर्वपंथ तथा संप्रदाय के साधु संत सहस्त्रों की संख्या में एकत्रित होते हैं। इसमें विविध पीठों के शंकराचार्य, 13 अखाड़ों के साधु महामण्डलेश्वर शैव तथा वैष्णव संप्रदाय के अनेक विद्वान संन्यासी संत महात्मा एकत्रित होते हैं। इस कारण इसका स्वरूप अखिल भारत वर्ष के संतों के सम्मेलन के समान भव्य दिव्य होता है। पुराणों में इसका उल्लेख है। नारद पुराण में बताया गया है कि कुंभ अति उत्तम होता है। कुछ विद्वान ईसा पूर्व 3464 में यह मेला प्रारंभ हुआ होगा अर्थात यह सिंधु संस्कृति से एक सहस्त्र वर्ष पूर्व की परंपरा है। वर्ष 629 में चीनी यात्री हुआंगत्संग ने भी अपनी पुस्तक भारत यात्रा का वर्णन में कुंभ मेले का वर्णन किया है तथा सम्राट हर्षवर्धन के शासन काल में प्रयाग में हिंदुओं का कुंभ मेला होता है। ऐसा उल्लेख मिलता है।

धर्मव्यवस्था द्वारा चार सार्वजनिक मंच हिंदू समाज को उपलब्ध करवाये हैं। ये चार क्षेत्र चार दिशाओं के प्रतीक हैं। वर्ष 1942 में भारत के वाईसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने पं मदन मोहन मालवीय के साथ प्रयाग का कुंभ मेला विमान से देखा। वे लाखों श्रद्धालुओं का जन सागर देखकर आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने उत्सुकतावश पं मालवीय से प्रश्न किया, इस मेले में जन समूह को एकत्रित करने के लिये आयोजकों को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ा होगा, और इस पर काफी व्यय हुआ होगा?

पं मालवीय ने उत्तर दिया केवल दो पैसे, यह सुन लार्ड लिनलिथगो ने पं मालवीय से प्रति प्रश्न किया, पंडित जी आप मजाक कर रहे हैं? पं मालवीय ने थैली से पंचांग निकाला और उनके हाथ में देते हुए बोले इसका मूल्य दो पैसे है। इसी से जन सामान्य को इस पर्व के पवित्र कालखंड की जानकारी मिलती है। किसी भी व्यक्ति को व्यक्तिगत निमंत्रण नहीं दिया जाता।

इसका मुख्य कारण हिंदुओं की धर्मश्रद्धा है। गंगा माता तथा पवित्र त्रिवेणी संगम तीर्थ पर साधु संतों सहित हिंदू समाज इतनी बड़ी संख्या में इकट्ठा होता है। कुंभ मेले में किसने क्या परिधान किया है इसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं रहता। जब कोई नग्न साधु अपने अखाड़े सहित गंगा में कूदता है वह दृश्य अत्यंत मनोहर होता है। यहां स्त्री-पुरुष लिंगभेद का विस्मरण होता है तथा कामवासना का विचार तो दूर ही रहता है। यह विचार मन को स्पर्श नहीं करता। बस सबको यही धुन होती है कि गंगा में स्नान करने को मिले।

क्या आपको पता है कि हिंदुस्तान का कुम्भ मेला दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा मेला है या दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा अवसर है जिसमे सबसे से ज्यादा लोग एकत्रित होते हैं.. ऐसा पूरी दुनिया में किसी भी अवसर पर इतने लोगों के जुटने का रिकॉर्ड नहीं है…

प्रयाग कुम्भ—-

यह कुम्भ अन्य कुम्भों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रकाश की ओर ले जाता है. यह ऐसा स्थान है जहां बुद्धिमत्ता का प्रतीक सूर्य का उदय होता है. इस स्थान को ब्रह्माण्ड का उद्गम और पृथ्वी का केंद्र माना जाता है.ऐसी मान्यता है कि ब्रह्माण्ड की रचना से पहले ब्रम्हाजी ने यहीं अश्वमेघ यज्ञ किया था. दश्वमेघ घाट और ब्रम्हेश्वर मंदिर इस यज्ञ के प्रतीक स्वरुप अभी भी यहां मौजूद हैं. इस यज्ञ के कारण भी कुम्भ का विशेष महत्व है. कुम्भ और प्रयाग एक दूसरे के पर्यायवाची है.


क्या है कुभ और महाकुम्भ –?

ये केवल मेला नहीं अथवा कोई परंपरागत त्यौहार भी नहीं तो ये क्या है–?

हमारे पूर्वजों ने ऐसा क्या किया–? जिसमे बिना किसी प्रचार-प्रसार के लाखों ही नहीं करोणों की संख्या में आते

हैं पंचांग के एक लाइन पर, आम भारतीय संतो की टोली विभिन्न अखाड़े भारतीय सभी पन्थो के संत महंत महामंडलेश्वर विभिन्न संप्रदाय के जगद्गुरु, सभी शंकराचार्य अपने-अपने अखाड़ो सहित यहाँ आते हैं

यही शंकराचार्यों के उत्तराधिकारियों का चयन महामंडलेश्वरों का चुनाव व नियुक्तिया होती है ऐसा लगता है

की सम्पूर्ण भारत उमड़ रहा हो ऐसी परंपरा क्यों पड़ी या डाली गयी–?

भारत में यह सहज व स्वाभाविक प्रक्रिया है यहाँ लोकतंत्र कोई नया नहीं है, (एक बार कुछ पश्चिम मतावलंबी कुम्भ में आये वे महामना मदनमोहन मालवीय से मिले उन्होंने पूछा की इतनी बड़ी संख्या में आये है तो विज्ञापन में तो बड़ा ही धन खर्च लगा होगा मालवीय जी ने अपनी जेब से दो आने वाला पंचांग दिखा दिया बस इतना खर्च हुआ ) हमेसा सर्व सहमति से ही सभी विषयो का चयन होना हमारे स्वभाव में रहा है इस नाते किसी को भारत को लोकतंत्र सिखाने की जरुरत नहीं–!

ब्रिटिश और भारतीय शोधकर्ताओं ने चार साल के अध्ययन के बाद कहा है कि इस साल इलाहाबाद में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर होने जा रहा महाकुंभ विश्व के सबसे विशालतम धार्मिक जमावड़े में से एक है और यह ‘पृथ्वी पर सबसे बड़ा मेला है’। ब्रिटिश और भारतीय शोधकर्ताओं के दल ने चार साल तक कुंभ का अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने देखा कि लोग एक दूसरे के साथ किस तरह से व्यवहार करते हैं, भीड़ का उनका क्या अनुभव है और इस भीड़ का उनके रोजमर्रा के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है। इस अध्ययन में कुंभ मेले को एक अविश्वसनीय कार्यक्रम और पृथ्वी पर सबसे बड़ा मेला बताया गया है। महाकुंभ मेले में पूरी दुनिया के लोग आते हैं और लाखों श्रद्धालु गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं। महाकुंभ के दौरान धर्म गुरुओं जुलूस तथा राख लपेटे नागा साधु सभी के आकर्षण का केंद्र होते हैं। यह अध्ययन डूंडी विश्वविद्यालय के निक हॉपकिंस और सेंट एंड्रियूज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्टीफन रेइसर तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर नारायण श्रीनिवासन के नेतृत्व में किया गया है

यह हिन्दू की शक्ति है। यह उस भारत की शक्ति है जो सनातन धर्मी है, यह उस जमीन की ताकत है जो सेक्युलरवाद के मिलावटी प्लास्टिक−पालीथीन की थैली की जहर बुझी चमक से दूर, गंगा, यमुना, कावेरी और सिंधु को जीती है। आपकी बहसें आपको मुबारक। आपके झंडे आपको मुबारक। हम तो संगम स्नान को चले।

हजारों वर्ष की यह परम्परा, उस परम्परा में उठा हुआ अपना यह भारत वर्ष जिसमें वेद हैं, पुराण है, माता जानकी हैं, वनवासी राम हैं, गोवर्धनधारी कन्हैया है, तो भस्म शरीर पर लपेटे जटाधारी पिनाकपाणि भोलेनाथ हैं। इस माटी में उठे अगर बुद्ध और महावीर हैं तो आदिशंकर भी हैं, बाल्मीकि हैं तो कृष्ण को दीवार तोड़कर अहंकारी ब्राह्मणों का मान मर्दन करते हुए दर्शन देने पर मजबूर करने वाले कनकदास भी हैं। या चांडाल, श्वान में उसी गोविन्द का दर्शन करने वाले शंकराचार्य परम्परा के संत हैं, तो गुरुनानक और तीर्थंकर भी हैं। यहां मंथन है, चिंतन है जिज्ञासा है, मतभेद हैं तो उनका समाधान भी है। यहां यम का सत्य भी यदि विद्यमान है तो उसको ललकारने वाले नचिकेता का वीर वैराग्य भी है। यहां वह सब कुछ है जो भारत को भारत बनाता है। कुंभ का सत्व भारत का भारततत्व है। यहां जो आया वह निहाल हुआ, जो नहीं आ पाया और मात्र स्मरण ही कर पाया वह भी निहाल हुआ। जिसने श्रद्धा से कुम्भ देखा वह भी सत्व पा गया। और जिसने मात्र निर्धार्मिक कौतूहल से ही कुम्भ को देखा, जानने का प्रयास किया वह भी अपने उस सत्व की ओर पहुंचा जो उसने अपने लिए निर्धािरत कर रखा होगा।

कुम्भ हमारी राष्ट्रीयता का प्रतीक है..

सभी पंथ और संप्रदाय इसमें सम्लित हम भारतीय एक है इसकी गवाही देते और साक्ष्य बनते है शैव, वैष्णव, शाक्त, अघोर पंथी, उदासी, सिक्ख, जैन और बौद्ध मतावलंबी कुम्भ में उपस्थित होकर पूरे वर्ष भर का विचार बिमर्ष करते है, पूरी परंपरा में क्या-क्या परिवर्तन करना है सब कुम्भ में होता है, भारतीय समाज में क्या करना है कौन सा शंदेश देना है -? कौन सी परंपरा हमारे समाज को नुकसान पंहुचा रही है-? सभी विषयो पर विचार कर परिवर्तन किया जाता था यह सभी को स्वीकार्य था साधू-सन्यासियों के माध्यम से हिन्दू समाज के सभी घटकों में इसका पालन कराया जाता था, अभी आज कौन सा ऐसा पक्ष है जो कुम्भ में सामिल नहीं होता यानी भारतीय राष्ट्र में सम्लित नहीं होना चाहता. इस पर हमें विचार करना होगा, इस्लाम और ईसाई मतावलंबी क्या भारतीय राष्ट्र के अंग नहीं-? या वे इस राष्ट्र के अंगभूत नहीं होना चाहते-!

कुम्भ नहाने कौन कहां से आया, किस जाति का है, किसको क्या पता? कोई तमिलनाडु से है, या आसाम, अरुणाचल या गुजरात से या अंडमान, नेपाल या अमरिका से, वह ब्राह्मण है कि ठाकुर या यादव अथवा बाल्मीकि और तांग, मणिपुर या बस्तर का जनजातीय। त्रिवेणी तो सबको नहला देती है। समरसता का सबसे बड़ा संगम मंत्र ही त्रिवेणी में मिलता है। यह किसी को परवाह नही है कि आप कितने अमीर है या कितने गरीब। आप अपने शानदार और लक्जरी स्विस तंबुओं में फिल्मस्टारों के साथ कुम्भ स्नान के लिए रुके हैं या त्रिवेणी घाट के आसपास पुआल बिछाकर धर्मादा तम्बुओं में रातभर कीर्तन और भजन करते हुए पुण्य पा रहे हैं। किसी को यह देखने या उसकी समीक्षा करने की फुर्सत नहीं है।

इन्हें (ईसाई-मुसलमान ) अपने दोनों हाथो को फैलाकर कुम्भ की दिसा में बढ़ना चाहिए विदेशी विचार छोड़कर भारतीय संस्कृति में समरस होकर एक रस हों, जिससे भारतीय राष्ट्र में सम्लित हो सकें तभी कुम्भ की सार्थकता सवित होगी, कुम्भ हमारे राष्ट्र निर्माण और समाज ब्यवस्था का एक हिस्सा है जो हमारे समाज को नित्य नूतन बनाये रखने में निरंतर सचेत करता रहता है .

महाकुम्भ का स्नान तो उस अम्मा का होता है जो दुनियाभर की आपदाओं के सामने हिम्मत के साथ खड़े होते हुए बिना तम्बू और रिजर्वेशन का एडवांस इन्तजाम किए बच्चों और पोतों को त्रिवेणी घाट तक लाने का साहस करती है। भारतमाता का दर्शन न किया हो, तो कुम्भ नहाने आयीं इन मइया के पांव छू लीजिए। वहीं भारत स्नान हो जाएगा।

पुरानो की कथा है की समुद्र मंथन से जब अमृत कलश निकला बितरण को लेकर देवताओ और राक्षसों में छिना- झपटी हुई –जहाँ-जहाँ अमृत छलका गिरा वहां-वहां कुम्भ लगने लगा वास्तव में यह समरसता का अद्भित प्रयोग और समरसता का महाकुम्भ है जिसका उदहारण शायद कहीं मिले किसी भी समाज को लम्बे समय तक रहना होता है तो उसमे नित्य नए-नए प्रयोग समाज को एक जुट रखने समरस रखने बिचार को नित्य नूतन बनाये रखने नयी चेतना और उर्जा बनाये रखने हेतु समाज को चिरस्थायी बने हेतु कुम्भ भारतीय समाज का आधार है जहाँ एक तरफ सभी मत, पंथ और संप्रदाय के लोग अपनी रीती रिवाज और समाज उत्थान की दृष्टि से बिना किसी भेद- भाव से इकठ्ठा होते है हमें क्या- क्या सुधार करना है- ?

सब विषयो पर विचार करते हैं, वहीँ सभी जाति, भाषा और क्षेत्र से ऊपर उठकर संत दर्शन और संगम स्नान हेतु आते है वे किसी से न तो अपनी जाती बताते हैं न ही दुसरे से पूछते हैं यह दुनिया का अनूठा उदहारण है जो लाखों वर्षों से समाज के चिंतन के आधार पर चला आ रहा है, आज जिन प्रमुख स्थानों पर कुम्भ लगता है वे स्थान गंगा जी के किनारे हिमालय में हरिद्वार, गंगा -यमुना और सरस्वती जी का संगम प्रयाग, क्षिप्रा नदी के किनारे उज्जैन और गोदावरी तट पर नासिक है, लेकिन कुछ प्रमाणों से कहना है की भारत में २७ नक्षत्र, ऋतुएं, १२ राशियाँ इनके मिलन बिंदु को लेकर १२ स्थानों पर कुम्भ लगते थे जिसमे एक स्थान मक्का भी था, काल परिस्थितियां बदली हज़ार वर्ष का संघर्ष हिन्दू समाज दुर्बल हुआ परिणाम हम बहुत कुछ भूल गए कुछ नयी रीती रिवाज प्रारंभ किये गए कुछ पुराने रीती रिवाज बंद हो गए, कहते है कि यह कुम्भ दान का भी महान पर्व है

चक्रवर्ती सम्राट हर्ष वर्धन ने इस कुम्भ को विस्तार दिया वे प्रत्येक वर्ष सब -कुछ दनकर वापस घर जाते थे आज भी दान की परंपरा जारी है. इसी संगम तट पर वैदिक धर्म के पुनरो-धारक आचार्य कुमारिल भट्ट ने आत्मदाह किया उसी समय आदि जगदगुरु शंकराचार्य से उनकी भेट हुई, इसी संगम तट पर सम्राट अशोक ने विशाल किला का निर्माण किया जिसमे वैदिक कालीन वट वृक्ष मौजूद है, उदार कहे जाने वाले मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने उसे कटवाकर फेका ही नहीं तो खुदवाकर उसमे शीशा पिघलवाकर डाल दिया जिससे मान्यता अनुसार हन्दू धर्म समाप्त हो जाय, इश्वर की होनी को कौन मेट सकता है उसी कुँए में से वह वट वृक्ष आज निकल आया और सेना के कब्जे में उस किले में उसके दर्शन हेतु लाखों श्रद्धालू जाते है और अपने मुक्ति की कामना करते हैं


क्या होता है कल्पवास?

कल्पवास का अर्थ होता है संगम के तट पर निवास कर वेदाध्ययन और ध्यान करना। प्रयाग इलाहाबाद कुम्भ मेले में कल्पवास का अत्यधिक महत्व माना गया है। कल्पवास पौष माह के 11वें दिन से माघ माह के 12वें दिन तक रहता है।

कल्पवास क्यों और कब से : कल्पवास वेदकालीन अरण्य संस्कृति की देन है। कल्पवास का विधान हजारों वर्षों से चला आ रहा है। जब तीर्थराज प्रयाग में कोई शहर नहीं था तब यह भूमि ऋषियों की तपोस्थली थी। प्रयाग में गंगा-जमुना के आसपास घना जंगल था। इस जंगल में ऋषि-मुनि ध्यान और तप करते थे। ऋषियों ने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा। उनके अनुसार इस दौरान गृहस्थों को अल्पकाल के लिए शिक्षा और दीक्षा दी जाती थी।

कल्पवास के नियम :—–

इस दौरान जो भी गृहस्थ कल्पवास का संकल्प लेकर आया है वह पर्ण कुटी में रहता है। इस दौरान दिन में एक ही बार भोजन किया जाता है तथा मानसिक रूप से धैर्य, अहिंसा और भक्तिभावपूर्ण रहा जाता है।पद्म पुराण में इसका उल्लेख है। संगम तट पर वास करने वाले को सदाचारी, शान्त मन वाला तथा जितेन्द्रिय होना चाहिए। कल्पवासी के मुख्य कार्य है:- 1. तप, 2. होम और 3. दान।

यहां झोपड़ियों (पर्ण कुटी) में रहने वालों की दिनचर्या सुबह गंगा-स्नान के बाद संध्यावंदन से प्रारंभ होती है और देर रात तक प्रवचन और भजन-कीर्तन जैसे आध्यात्मिक कार्यों के साथ समाप्त होती है।

लाभ—-

ऐसी मान्यता है कि जो कल्पवास की प्रतिज्ञा करता है वह अगले जन्म में राजा के रूप में जन्म लेता है लेकिन जो मोक्ष की अभिलाषा लेकर कल्पवास करता है उसे अवश्य मोक्ष मिलता है। – मत्स्यपु 106/४०


क्यों आता है 12 वर्ष पश्चात कुम्भ का मेला..???

देवता और राक्षसों के सहयोग से समुद्र मंथन के पश्चात् अमृत कलश की प्राप्ति हुई। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र ‘जयंत’ अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।

इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं। जिनमें प्रयाग गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर और हरिद्वार गंगा नदी के किनारे हैं, वहीं उज्जैन शिप्रा नदी और नासिक गोदावरी नदी के तट पर बसा हुआ है। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया।

अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है।

जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।

अमृत पर अधिकार को लेकर देवता और दानवों के बीच लगातार बारह दिन तक युद्ध हुआ था। जो मनुष्यों के बारह वर्ष के समान हैं। अतएवं कुम्भ भी बारह होते हैं।

उनमें से चार कुम्भ पृथ्वी पर होते हैं और आठ कुम्भ देवलोक में होते हैं।युद्ध के दौरान सूर्य, चंद्र और शनि आदि देवताओं ने कलश की रक्षा की थी, अतः उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, तब कुम्भ का योग होता है और चारों पवित्र स्थलों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर क्रमानुसार कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है।

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कुम्भ – परम्परा कायम क्यों ?

१) पाप – ताप के शमन हेतु :—– कुम्भ के अवसर पर ग्रहों के संयोग से उस स्नान की नदियों का जल और अधिक पावन हो जाता है, जिसमे स्नान मनुष्य के पाप–ताप का शमन करने में सहायक होता है |

२) वास्तविक उदेश्य की यात्रा कराने हेतु :—- मानव को अपने परम लक्ष्य भगवत्प्राप्ति में सहायभूत होने के उदेश्य से हजारो वर्षों से संतो ने, ऋषियों ने इस परम्परा को कायम रखा है | कुम्भ में एक ओर जहाँ जिज्ञासु, अर्थार्थी आदि सभी प्रकार के भक्त आते है, वही दूसरी ओर सिद्ध, साधू, तपस्वी, जती-जोगी आदि न जाने किन-किन गिरी–गुफाओं से कुम्भ में पहुँचते है | उनमे से कोई-कोई विरले जीवन्मुक्त महापुरुष भी होते है, जो उन कुम्भों में पहुंचकर तीर्थों को तिर्थत्व प्रदान करते है | परम सौभाग्य, पुण्याई तथा ईश्वर की विशेष अनुकम्पा उदय होती है तो कुम्भ के अवसर पर पूज्य बापूजी जैसे जीवन्मुक्त ब्रम्हज्ञानी महापुरुष के दर्शन व सत्संग का लाभ मिलता है और श्रद्धालू उनसे सब दुःखों से पार होने की युक्तियाँ पा लेते है |

३) स्वयं तीर्थों के पावन होने हेतु :—-अग्नि पुराण’ में वसिष्ठजी कहते है : ‘गंगा तीर्थ से निकली मिट्टी धारण करनेवाला मानव सूर्य के समान पापों का नाशक होता है | जो मानव गंगा का दर्शन, स्पर्श और जलपान करता है, वाह अपनी सैकड़ों-हजारों पीढ़ियों को पवित्र कर देता है |’

ऐसी गंगा माता से राजा भागीरथ ने स्वर्ग से धरती पर आने की प्रार्थना की तब गंगाजी ने कहा :’भागीरथ ! लोग, ‘गंगे हर‘ कहकर मुझमें स्नान करेंगे और अपने पाप मुझमें डाल जायेंगे | फिर उस पाप को मै कहाँ धोऊंगी ?’

भागीरथ परब्रम्ह परमात्मा में कुछ देर शांत हो गये, बोले: ‘हे माँ ! लोग ‘गंगे हर’ कहकर तुझमें स्नान करेंगे और पाप डालेंगे, जिससे तुम दूषित तो होओगी किंतु जब आत्मतीर्थ में नहाये हुए ब्रम्हज्ञानी महापुरुष तुममे स्नान करेंगे तो उनके अंगस्पर्श से तुम्हारे पाप नष्ट हो जायेंगे और तुम पवित्र हो जाओगी |’ अत: जब ऐसे कुम्भों में ब्रम्हज्ञानी महापुरुष गंगास्नान करने आते है तो पतित-पावनी गंगा स्वयं को पावन करने का सौभाग्य प्राप्त कर तृप्त होती है |

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जानिए कुंभ मेले का इतिहास—

कुंभ के आयोजन में नवग्रहों में से सूर्य, चंद्र, गुरु और शनि की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसलिए इन्हीं ग्रहों की विशेष स्थिति में कुंभ का आयोजन होता है।

कुंभ मेले का इतिहास कम से कम 850 साल पुराना है। माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने इसकी शुरुआत की थी, लेकिन कुछ कथाओं के अनुसार कुंभ की शुरुआत समुद्र मंथन के आदिकाल से ही हो गई थी जबकि कुछ दस्तावेज बताते हैं कि कुंभ मेला 525 बीसी में शुरू हुआ था।

कुम्भ मेले का आयोजन प्राचीन काल से हो रहा है, लेकिन मेले का प्रथम लिखित प्रमाण महान बौद्ध तीर्थयात्री ह्वेनसांग के लेख से मिलता है जिसमें आठवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के शासन में होने वाले कुम्भ का प्रसंगवश वर्णन किया गया है।

कुंभ मेले के आयोजन का प्रावधान कब से है इस बारे में विद्वानों में अनेक भ्रांतियाँ हैं। वैदिक और पौराणिक काल में कुंभ तथा अर्धकुंभ स्नान में आज जैसी प्रशासनिक व्यवस्था का स्वरूप नहीं था। कुछ विद्वान गुप्त काल में कुंभ के सुव्यवस्थित होने की बात करते हैं। परन्तु प्रमाणित तथ्य सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन 617-647 ई. के समय से प्राप्त होते हैं। बाद में श्रीमद आघ जगतगुरु शंकराचार्य तथा उनके शिष्य सुरेश्वराचार्य ने दसनामी संन्यासी अखाड़ों के लिए संगम तट पर स्नान की व्यवस्था की।

—-सूर्य एवं गुरू जब दोनों ही सिंह राशि में होते हैं तब कुंभ मेले का आयोजन नासिक (महाराष्ट्र) में गोदावरी नदी के तट पर लगता है। 1980, 1992, 2003 के बाद अब अगला महाकुंभ मेला यहां 2015 में लगेगा।

—-गुरु जब कुंभ राशि में प्रवेश करता है तब उज्जैन में कुंभ लगता है। 1980,1992, 2004, के बाद अब अगला महाकुंभ मेला यहां 2016 में लगेगा।

12 वर्ष नहीं हर तीसरे वर्ष लगता है कुंभ—

गुरू एक राशि लगभग एक वर्ष रहता है। इस तरह बारह राशि में भ्रमण करते हुए उसे 12 वर्ष का समय लगता है। इसलिए हर बारह साल बाद फिर उसी स्थान पर कुंभ का आयोजन होता है। लेकिन कुंभ के लिए निर्धारित चार स्थानों में अलग-अलग स्थान पर हर तीसरे वर्ष कुंभ का अयोजन होता है। कुंभ के लिए निर्धारित चारों स्थानों में प्रयाग के कुंभ का विशेष महत्व है। हर 144 वर्ष बाद यहां महाकुंभ का आयोजन होता है।

महाकुंभ के संबंध में मान्यता—-

शास्त्रों में बताया गया है कि पृथ्वी का एक वर्ष देवताओं का दिन होता है, इसलिए हर बारह वर्ष पर एक स्थान पर पुनः कुंभ का आयोजन होता है। देवताओं का बारह वर्ष पृथ्वी लोक के 144 वर्ष के बाद आता है। ऐसी मान्यता है कि 144 वर्ष के बाद स्वर्ग में भी कुंभ का आयोजन होता है इसलिए उस वर्ष पृथ्वी पर महाकुंभ का अयोजन होता है। महाकुंभ के लिए निर्धारित स्थान प्रयाग को माना गया है।


जानिए कुम्भ का वैज्ञानिक महत्त्व—-

सौर–मंडल के विशिष्ट ग्रहों के विशेष राशियों में प्रवेश करने से बना खगोलीय संयोग इस पर्व का आधार है | जब सूर्य और चन्द्रमा मकर राशि में हों और ब्रहस्पति मेष अथवा वृषभ राशि में स्थित हो तब प्रयाग में कुम्भ महापर्व का योग बनता है | इन दिनों यहाँ का वातावरण दिव्य, अदभुत तरंगों व स्पंदनो से भर जाता है, जो यहाँ के जल पर भी अपना प्रभव छोड़ते हैं | जिससे पतित-पावनी गंगा की धारा और भी पावन हो जाती है, जिसमे स्नान करने से श्रध्दालुओं को विशेष शांति व प्रसन्नता की अनुभूति होती है |

भागीरथी गंगा के जल में कभी कीड़े नही पड़ते हैं | यह माँ गंगा की अदभुत महिमा है , जो भारतीय संस्कृति की महानता का दर्शन करती है | इसे औषधि माना गया है | वैज्ञानिकों ने भी प्रयोगों द्वारा इस बात को स्वीकारा है | उनके अनुसार गंगाजल में ऑक्सीजन की मात्र अत्यधिक होने और इसमें कुछ विशिष्ट जीवाणुओं के मौजूद होने से यह अत्यधिक विशिष्ट है | गंगाजल में हनिकारक जीवाणु नही पड़ते और मिलाये भी जाते है ती गंगाजल माँ उन्हें दूर करने की अदभुत क्षमता है जो की अन्य नदियों के जल में नही पायी जाती है |


जानिए कुम्भ का आध्यत्मिकीकरण का कारण—

कुम्भ का आधिभौतिक लाभ तो कुम्भ में आयी भक्तों की भीड़ को वहाँ के पवित्र, सात्विक वातावरण से मिल जाता है | आधिदैविक लाभ भी गंगा माँ के जल में श्रद्धा–भक्ति से स्नान करने से मिल जाता है परंतु कुम्भ का आध्यात्मिक लाभ क्या है ? वह कैसे प्राप्त हो ? इन प्रश्नों के उत्तर तो किन्ही आत्मवेत्ता महापुरुष के श्रीचरणों में बैठकर ही प्राप्त किये जा सकते है |

आत्मवेत्ता ब्रम्हनिष्ठ संत पूज्य बापूजी कुम्भ के आध्यात्मिकीकरण की यात्रा कराते हुये कहते है “ ‘तन, मन व मति के दोषों की निवृति के लिए तीर्थ और कुम्भ पर्व है | अमृत की प्राप्ति के लिए होनेवाला देवासुर संग्राम हमारे भीतर भी हो रहा है |

संत तुलसीदासजी कहते है : ‘वेद समुद्र है, ज्ञान मंदराचल है और संत देवता है जो उस समुद्र को मथकर कथारूपी अमृत निकालते है | उस अमृत में भक्ति और सत्संग रूपी मधुरता बसी रहती है |’ कुमति के विचार ही असुर है | विवेक मथनी है और प्राण-अपान ही वासुकि नागरुपी रस्सी है |

संसार ही सागर है | दैवी और आसुरी वृत्तियों को विवेकरूपी मंदराचल का सहयोग लेकर मंथन करते-करते अपने चित्तरूपी सागर से चैतन्य का अमृत खोजने की व्यवस्था का नाम है ‘कुम्भ पर्व’ | वे लोग सच में बड़भागी है जिन्हें अपने मूल अमृत-स्वभाव आत्मा की ओर ले जानेवाला वातावरण और सत्संग मिल पाता है | शरीर मरेगा कि तुम मरोगे? बीमारी शरीर को होती है कि तुमको होती है ? दुःख मन में होता है कि तुममें होता है ? दुःख आता है चला जाता है, तुम चले जाते हो क्या ? बीमारी आती है चली जाती है, तुम चले जाते हो क्या? इस प्रकार का आत्मज्ञान और उसको पाने की युक्तियाँ सबको सहज में मिल जाय, इसीलिए कुम्भ का पर्व है |

कुम्भ में संत-महात्माओं का सत्संग सान्निध्य मिलता है | उसका हेतु है कि हमारा मन अपनी जन्म–जन्मांतरो की वासनाओं का अंत करके भगवद्सुख में, भगवदशांति में सराबोर होकर भगवतप्रसाद पाने को तैयार हो और मतिदाता में विश्रांति पाये |’

इस तरह मनुष्य के सर्वांगीण विकास की दूरदृष्टि रखनेवाले भारत के ऋषि-मुनियों द्वारा सदियों से कुम्भ परम्परा की सुरक्षा की गयी है | जिसका मुख्य उद्देश्य यही है कि इस अवसर पर मनुष्य किन्ही ब्रम्हज्ञानी संत की शरण में पहुंचकर जीवन के वास्तविक अमृत ‘आत्मानंद’ की पावन गंगा में भी गोता लगा ले |
🔱🔱📿📿💐💐💐
धन्यवाद…

पंडित दयानन्द शास्त्री,(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)

वाट्सएप–9039390067..
मोब. 09669290067 (मध्य प्रदेश)
–7000395415–jio

अंक 33 : कब और कैसे होगा अर्ध कुम्भ 2019, इलाहाबाद में…
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प्रिय मित्रों/पाठकों, हिंदू धर्म में कुंभ मेला एक महत्‍वपूर्ण पर्व के रूप में मनाया जाता है, जिसमें देश-विदेश से सैकड़ों श्रद्धालु कुंभ पर्व स्थल हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन और नासिक में स्नान करने के लिए एकत्रित होते हैं। कुंभ का संस्कृत अर्थ कलश होता है। हिंदू धर्म में कुंभ का पर्व 12 वर्ष के अंतराल में आता है।

प्रयाग में दो कुंभ मेलों के बीच छह वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी होता है। कुंभ का मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है। इस दिन जो योग बनता है उसे कुंभ स्नान-योग कहते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार मान्‍यता है कि किसी भी कुंभ मेले में पवित्र नदी में स्‍नान या तीन डुबकी लगाने से सभी पुराने पाप धुल जाते हैं और मनुष्‍य को जन्म-पुनर्जन्म तथा मृत्यु-मोक्ष की प्राप्‍ति होती है।

‘अर्ध’ शब्द का अर्थ होता है आधा और इसी कारण बारह वर्षों के अंतराल में आयोजित होने वाले पूर्ण कुम्भ के बीच अर्थात पूर्ण कुम्भ के छ: वर्ष बाद अर्ध कुंभ आयोजित होता है।

इलाहाबाद में जनवरी 2019 में होने वाले अर्धकुंभ मेले में अच्छी खासी भीड़ जुटने की उम्मीद है। अर्धकुंभ मेला हर 6 साल बाद होता है और केवल इलाहाबाद और हरिद्वार में ये मेला लगता है। आप भी कुछ महीने बाद लगने वाले इस कुंभ मेले का हिस्सा बन सकते हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया अर्ध कुंभ मेला 14 जनवरी से 4 मार्च 2019 तक चलेगा है। इस बार के अर्ध कुंभ में काफी चीजें खास तौर पर होंगी जो पहले कभी नहीं हुई हैं। अगर आप यहां जाने की योजना बना रहे हैं तो मेले से जुड़ी इन खास बातों को जानकार ही यात्रा की योजना बनाएं। यहां हम आपको अर्ध कुंभ मेले के प्रमुख आकर्षणों की जानकारी दे रहे हैं।
वर्ष 2019 का कुंभ पचास दिनों का होगा, जो 14 जनवरी मकर संक्रांति के दिन से शुरू होकर 4 मार्च महाशिवरात्रि तक चलेगा। कुंभ स्‍नान का अदभुत संयोग करीब तीस सालों बाद बन रहा है।
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खगोल गणनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशी में और वृहस्पति, मेष राशी में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को “कुम्भ स्नान-योग” कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलिक माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। यहाँ स्नान करना साक्षात स्वर्ग दर्शन माना जाता है।
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जानिए कुम्भ का ज्योतिषीय महत्व —
पौराणिक विश्वास जो कुछ भी हो, ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार कुंभ का असाधारण महत्व बृहस्पति के कुंभ राशि में प्रवेश तथा सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ जुड़ा है। ग्रहों की स्थिति हरिद्वार से बहती गंगा के किनारे पर स्थित हर की पौड़ी स्थान पर गंगा जल को औषधिकृत करती है तथा उन दिनों यह अमृतमय हो जाती है। यही कारण है ‍कि अपनी अंतरात्मा की शुद्धि हेतु पवित्र स्नान करने लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से अर्ध कुंभ के काल में ग्रहों की स्थिति एकाग्रता तथा ध्यान साधना के लिए उत्कृष्ट होती है।

हालाँकि सभी हिंदू त्योहार समान श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाए जाते है, पर यहाँ अर्ध कुंभ तथा कुंभ मेले के लिए आने वाले पर्यटकों की संख्या सबसे अधिक होती है।
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कुम्भ से जुड़ी पौराणिक कहानियां—
कुंभ पर्व के आयोजन को लेकर दो-तीन पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है। इस कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उन्हे सारा वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने के यत्न में लग गए। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं के इशारे से इंद्रपुत्र ‘जयंत’ अमृत-कलश को लेकर आकाश में उड़ गया। उसके बाद दैत्यगुरु शुक्राचार्य के आदेशानुसार दैत्यों ने अमृत को वापस लेने के लिए जयंत का पीछा किया और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा। तत्पश्चात अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव-दानवों में बारह दिन तक अविराम युद्ध होता रहा।

इस परस्पर मारकाट के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी थीं। उस समय चंद्रमा ने घट से प्रस्रवण होने से, सूर्य ने घट फूटने से, गुरु ने दैत्यों के अपहरण से एवं शनि ने देवेन्द्र के भय से घट की रक्षा की। कलह शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बाँटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया।

अमृत प्राप्ति के लिए देव-दानवों में परस्पर बारह दिन तक निरंतर युद्ध हुआ था। देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के तुल्य होते हैं। अतएव कुंभ भी बारह होते हैं। उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष आठ कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगण ही प्राप्त कर सकते हैं, मनुष्यों की वहाँ पहुँच नहीं है।

जिस समय में चंद्रादिकों ने कलश की रक्षा की थी, उस समय की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं, उस समय कुंभ का योग होता है अर्थात जिस वर्ष, जिस राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का संयोग होता है, उसी वर्ष, उसी राशि के योग में, जहाँ-जहाँ अमृत बूँद गिरी थी, वहाँ-वहाँ कुंभ पर्व होता है।
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लग्ज़री टैंट में ठहरने का विकल्प —
कुंभ मेले के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा जब श्रद्धालु लग्ज़री टैंट में ठहर सकेंगे। अपने बजट के हिसाब से पर्यटक डीलक्स, सुपर डीलक्स और सुइट में से चुन सकते हैं। इन टैंट का किराया 10 हजार रुपए प्रतिदिन से शुरू होता है। इसके अलावा इस बार हेलिकॉप्टर व्यू और लेजर शो भी देखने को मिलेगा। सरकार ने इसके लिए काफी तैयारी कर रही है।

शाही स्नान—
शाही स्नान का कुंभ मेले में काफी महत्व होता है शाही स्नान सबसे पहले अखाड़े के साधु करते हैं इनके बाद ही आम आदमी पवित्र गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर स्नान कर सकते हैं। इसके लिए आम लोग सुबह 3 बजे से ही लाइन लगा लेते हैं और साधुओं के स्नान के बाद नहाने जाते हैं। इस बार पहला शाही स्नान 15-15 जनवरी, दूसरा 4 फरवरी और तीसरा 10 फरवरी को है।

अखाड़ा और साधु —
अखाड़े वो स्थान होते हैं जहां धार्मिक संगठन मिलते हैं इनमें अधिकतर साधु होते हैं। शिव की पूजा करने वाले अखाड़े का नाम शैव अखाड़ा होता है जबकि भगवान विष्णु को पूजने वाले साधुओं के अखाड़े का नाम वैष्णव अखाड़ा होता है। यहां आपको नागा, अघोरी जैसे कई तरह के साधु मिल जाएंगे। इन साधुओं के बारे को देखने और समझने की यह सबसे अच्छी जगह है।

सत्संग —
कुंभ मेले के दौरान आपको जगह-जगह सत्संग होते हुए मिले जाएंगे। कई साधु सन्यासी हिंदू धर्म के बारे में प्रवचन देते हुए मिलेंगे। यहां कई आश्रम होते हैं जहां आप जब बैठकर सत्संग सुन सकते हैं। हिंदू धर्म को करीब से समझने का यह सुनहरा मौका होता है क्योंकि प्रवचन दे रहे साधु-सन्यासियों को हिंदू धर्म की काफी जानकारी होती है।

लंगर–
इस दौरान खाने की कोई समस्या नहीं होती क्योंकि जगह-जगह लंगर चल रहे होते हैं इनमें साधु सन्यासियों के साथ आम आदमी को भी भोजन कराया जाता है। यहां खाने के लिए एक कम्यूनिटी एरिया बना होता है जहां फ्री में खाना दिया जाता है। अगर आप खाने नहीं भी जाना चाहते हैं तो इसकी फोटो क्लिक कर सकते हैं।
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जानिए 2019 कुंंभ मेले की शाही स्नान की तारीख-

14-15 जनवरी 2019: मकर संक्रांति (पहला शाही स्नान)
21 जनवरी 2019: पौष पूर्णिमा
31 जनवरी 2019: पौष एकादशी स्नान
04 फरवरी 2019: मौनी अमावस्या (मुख्य शाही स्नान, दूसरा शाही स्नान)
10 फरवरी 2019: बसंत पंचमी (तीसरा शाही स्नान)
16 फरवरी 2019: माघी एकादशी
1 9 फरवरी 2019: माघी पूर्णिमा
04 मार्च 2019: महा शिवरात्री

अंक 32 : जानिए आजीवन स्वस्थ रहने के लिए कुछ असरकारक घरेलू नुस्खे

★खड़े -खड़े पानी पीने से घुटनों में दर्द की बीमारी होती है इसलिए खाना पीना बैठ कर करना चाहिए.!!

नक्क्सीर आने पर तुरंत नाक में देशी घी लगाना चाहिए, नाक से खून आना तुरंत बंद हो जाता है.!!

★बच्चों को पेशाब ना उतरे तो स्नान घर में ले जाकर टौंटी खोल दें, पानी गिराने की आवाज़ सुनकर बच्चे का पेशाब उतर जायेगा.!!

★बस में उलटी आती हो तो सीट पर अखबार रखकर बैठने से, उलटी नहीं आती.!!

★कद बढ़ाने के लिए अश्वगंधा व मिश्री बराबर मात्र में चूरन बना कर 1 चम्मच भोजन के बाद लें.!!

★बाल गिरने लगें हों तो 100 ग्राम नारियल तेल में 10 ग्राम देशी कपूर मिलाकर जड़ों में लगायें.!!

★सर में खोरा हो, शरीर पर सूखी खुजली हो तो भी इसी तेल को लगाने से लाभ मिलता है.!!

★दिन में दो बार खाना, तो दो बार शौच भी जाना चाहिए, क्योंकि “रुकावट” ही रोग होता है.!!

★आधा सर दर्द होने पर, दर्द होने वाली साईड की नाक में 2-3 बूँद सरसों का तेल जोर से सूंघ लें.!!

★जुकाम होने पर सुहागे का फूला 1 चम्मच, गर्म पानी में घोल कर पी लें 15 मिनट में जुकाम गायब.!!

★चहरे को सुन्दर बनाने के लिए 1 चम्म्च दही में 2 बूंद शहद मिला कर लगायें 10 मिनट बाद धो लें.!!

★इसी नुसखे को पैरो की बिवाईयों में भी प्रयोग कर सकतें हैं, लाभ होगा.!!

★हाई बी.पी. ठीक करने के लिए 1 चम्मच प्याज़ का रस में 1 चम्मच शहद मिलाकर चाटें (सुगर के रोगी भी ले सकतें हैं).!!

★लो बी.पी.ठीक करने के लिए 32 दाने किसमिस के रात को कांच के गिलास में भिगो दें सुबह 1-1 दाना चबा-चबा कर खाएं (रोज़ 32 दाने खाने हैं 32 दिनों तक).!!

★कब्ज़ ठीक करने के लिए अमलताश की फली (2 इंच) का काढ़ा बनाकर शाम को भोजन के बाद पियें.!!

★कमर में दर्द होने पर 100 ग्राम खसखस में 100 ग्राम मिश्री मिला कर चूर्ण बनायें, भोजन के बाद 1 चम्मच गर्म दूध से लें.!!

★सर चक्कर आने पर 1 चम्मच धनियाँ चूर्ण में 1 चम्मच आंवला चूर्ण मिलाकर ठन्डे पानी से लें.!!

★दांतों में दर्द होने पर 1 चुटकी हल्दी, 1 चुटकी काला नमक, 5 बूंद सरसों तेल मिलाकर लगायें.!!

★टौंसिल होने पर अमलताश की फली के काढ़े से गरारे करें, ठीक हो जायेगें.!!

अंक 31 : ज्योतिष से जानें कैसा होगा विवाह के बाद पुत्री का भविष्य

सामान्यत: सभी माता-पिता अपनी कन्या का विवाह करने के लिए वर की कुंडली का गुण मिलान करते हैं। कन्या के भविष्य के प्रति चिंतित माता-पिता का यह कदम उचित है। किन्तु इसके पूर्व उन्हें यह देखना चाहिए कि लड़की का विवाह किस उम्र में, किस दिशा में तथा कैसे घर में होगा? उसका पति किस वर्ण का, किस सामाजिक स्तर का तथा कितने भाई-बहनों वाला होगा? ज्योतिष के अनुसार यह पता किया जा सकता है कि किसी व्यक्ति के जीवन साथी का स्वभाव और भविष्य कैसा हो सकता है। यहां भृगु संहिता के अनुसार बताया जा रहा है कि किसी स्त्री के जीवन साथी का स्वभाव कैसा और उनका वैवाहिक जीवन कैसा होगा।
कुंडली का सप्तम भाव विवाह का कारक स्थान माना जाता है। अलग-अलग लग्न के अनुसार इस भाव की राशि और स्वामी भी बदल जाते हैं। अत: यहां जैसी राशि रहती है, व्यक्ति का जीवन साथी भी वैसा ही होता है। लड़की की जन्म लग्न कुंडली से उसके होने वाले पति एवं ससुराल के विषय में सब कुछ स्पष्टत: पता चल सकता है। ज्योतिष विज्ञान में फलित शास्त्र के अनुसार लड़की की जन्म लग्न कुंडली में लग्न से सप्तम भाव उसके जीवन, पति, दाम्पत्य जीवन तथा वैवाहिक संबंधों का भाव है। इस भाव से उसके होने वाले पति का कद, रंग, रूप, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय या कार्यक्षेत्र परिवार से संबंध आदि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यहां सप्तम भाव के आधार पर कन्या के विवाह से संबंधित विभिन्न तथ्यों का विश्लेषण प्रस्तुत है।
ससुराल की दूरी : सप्तम भाव में अगर वृष, सिंह, वृश्चिक या कुंभ राशि स्थित हो तो लड़की की शादी उसके जन्म स्थान से 90 किलोमीटर के अंदर ही होगी।
यदि सप्तम भाव में चंद्र, शुक्र तथा गुरु हों तो लड़की की शादी जन्म स्थान के समीप होगी। यदि सप्तम भाव में चर राशि मेष, कर्क, तुला या मकर हो तो विवाह उसके जन्म स्थान से 200 किलोमीटर के अंदर होगा। अगर सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि स्थित हो तो विवाह जन्म स्थान से 80 से 100 किलोमीटर की दूरी पर होगा। यदि सप्तमेश सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य हो तो विवाह विदेश में होगा या लड़का शादी करके लड़की को अपने साथ लेकर विदेश चला जाएगा।
शादी की आयु : यदि जातक या जातक की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में सप्तमेश बुध हो और वह पाप ग्रह से प्रभावित न हो तो शादी 13 से 18 वर्ष की आयु सीमा में होती है। सप्तम भाव में सप्तमेश मंगल पापी ग्रह से प्रभावित हो तो शादी 18 वर्ष के अंदर होगी। शुक्र ग्रह युवा अवस्था का द्योतक है। सप्तमेश शुक्र पापी ग्रह से प्रभावित हो तो 25 वर्ष की आयु में विवाह होगा। चंद्रमा सप्तमेश होकर पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो विवाह 22 वर्ष की आयु में होगा। बृहस्पति सप्तम भाव में सप्तमेश होकर पापी ग्रहों से प्रभावित न हो तो शादी 27-28वें वर्ष में होगी। सप्तम भाव को सभी ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तथा सप्तम भाव में शुभ ग्रह से युक्त होकर चर राशि हो तो जातक का विवाह उचित आयु में सम्पन्न हो जाता है। यदि किसी लड़की या लड़की की जन्म कुंडली में बुध स्वर राशि मिथुन या कन्या का होकर सप्तम भाव में बैठा हो तो विवाह बाल्यावस्था में होगा।
विवाह वर्ष : आयु के जिस वर्ष में गोचरस्थ गुरु लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव में आता है, उस वर्ष शादी होना निश्चित समझें परंतु शनि की दृष्टि सप्तम भाव या लग्न पर न हो। लग्न या सप्तम में बृहस्पति की स्थिति होने पर उस वर्ष शादी होती है।
विवाह कब होगा, यह जानने की दो विधियां यहां प्रस्तुत हैं। जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में स्थित राशि अंक में 10 जोड़ दें। योग फल विवाह का वर्ष होगा। सप्तम भाव पर जितने पापी ग्रहों की दृष्टि हो, उनमें प्रत्येक की दृष्टि के लिए 4-4 वर्ष जोड़ योग फल विवाह का वर्ष होगा।
जहां तक विवाह की दिशा का प्रश्र है, जन्मांक में सप्तम भाव में स्थित राशि के आधार पर शादी की दिशा ज्ञात की जाती है। उक्त भाव में मेष, सिंह या धनु राशि एवं सूर्य और शुक्र ग्रह होने पर पूर्व दिशा वृष, कन्या या मकर राशि और चंद्र, शनि ग्रह होने पर दक्षिण दिशा, मिथुन, तुला या कुंभ राशि और मंगल, राहु, केतु ग्रह होने पर पश्चिम दिशा, कर्क, वृश्चिक, मीन या राशि और बुध और गुरु होने पर उत्तर दिशा की ओर शादी होगी। अगर जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस भाव पर अन्य ग्रह की दृष्टि न हो, तो बलवान ग्रह की स्थिति राशि में शादी की दिशा समझें।
पति कैसा मिलेगा : ज्योतिष विज्ञान में सप्तमेश अगर शुभ ग्रह (चंद्रमा, बुध, गुरु या शुक्र) हो या सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तम भाव को देख रहा हो, तो लड़की का पति सम आयु या दो-चार वर्ष के अंतर का, गौरांग और सुंदर होना चाहिए। अगर सप्तम भाव पर या सप्तम भाव में पापी ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु या केतु का प्रभाव हो तो बड़ी आयु वाला अर्थात लड़की की उम्र से 5 वर्ष बड़ी आयु का होगा।
सूर्य का प्रभाव हो तो गौरांग, आकर्षक चेहरे वाला, मंगल का प्रभाव हो तो लाल चेहरे वाला होगा। शनि अगर अपनी राशि का उच्च न हो तो वर काला या कुरूप तथा लड़की की उम्र से काफी बड़ी आयु वाला होगा। अगर शनि उच्च राशि का हो तो पतले शरीर वाला गोरा तथा उम्र में लड़की से 12 वर्ष बड़ा होगा।
सप्तमेश अगर सूर्य हो तो पति गोल मुख तथा तेज ललाट वाला, आकर्षक, गोरा सुंदर, यशस्वी एवं राज कर्मचारी होगा। चंद्रमा अगर सप्तमेश हो, तो पति शांत चित्त वाला गौर वर्ण का, मध्यम कद तथा सुडौल शरीर वाला होगा। मंगल सप्तमेश हो, तो पति का शरीर बलवान होगा। वह क्रोधी स्वभाव वाला, नियम का पालन करने वाला, सत्यवादी, छोटे कद वाला, शूरवीर, विद्वान तथा भ्रातृ प्रेमी होगा तथा सेना, पुलिस या सरकारी सेवा में कार्यरत होगा।
पति कितने भाई बहनों वाला होगा : लड़की की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव से तृतीय भाव अर्थात नवम भाव उसके पति के भाई-बहन का स्थान होता है। उक्त भाव में स्थित ग्रह तथा उस पर दृष्टि डालने वाले ग्रह की संख्या से 2 बहन, मंगल से 1 भाई व 2 बहन बुध से 2 भाई 2 बहन वाला कहना चाहिए।
लड़की की जन्मकुंडली में पंचम भाव उसके पति के बड़े भाई-बहन का स्थान है। पंचम भाव में स्थित ग्रह तथा दृष्टि डालने वाला ग्रहों की कुल संख्या उसके पति के बड़े भाई-बहन की संख्या होगी। पुरुष ग्रह से भाई तथा स्त्री ग्रह से बहन समझना चाहिए।
पति का मकान : लड़की की जन्म लग्न कुंडली में उसके लग्न भाव से तृतीय भाव पति का भाग्य स्थान होता है। इसके स्वामी के स्वक्षेत्री या मित्रक्षेत्री होने से पंचम और राशि से या तृतीयेश से पंचम जो राशि हो, उसी राशि का श्वसुर का गांव या नगर होगा।
प्रत्येक राशि में 9 अक्षर होते हैं। राशि स्वामी यदि शत्रुक्षेत्री हो, तो प्रथम, द्वितीय अक्षर, सम राशि का हो, तो तृतीय, चतुर्थ अक्षर मित्रक्षेत्री हो, तो पंचम, षष्ठम अक्षर, अपनी ही राशि का हो तो सप्तम, अष्टम अक्षर, उच्च क्षेत्री हो तो नवम अक्षर प्रसिद्ध नाम होगा। तृतीयेश के शत्रुक्षेत्री होने से जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि ससुराल या भवन की होगी।
यदि तृतीय भाव से शत्रु राशि में हो और तृतीय भाव में शत्रु राशि में पड़ा हो तो दसवीं राशि ससुर के गांव की होगी। लड़की की कुंडली में दसवां भाव उसके पति का भाव होता है। दशम भाव अगर शुभ ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो, या दशमेश से युक्त या दुष्ट हो तो पति का अपना मकान होता है। राहु, केतु, शनि से भवन बहुत पुराना होगा। मंगल ग्रह में मकान टूटा होगा। सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु एवं शुक्र से भवन सुंदर, सीमैंट का बहुमंजिला होगा। अगर दशम स्थान में शनि बलवान हो तो मकान बहुत विशाल होगा।
पति की नौकरी : लड़की की जन्म लग्न कुंडली में चतुर्थ भाव पति का राज्य भाव होता है। अगर चतुर्थ भाव बलयुक्त हो और चतुर्थेश की स्थिति या दृष्टि से युक्त सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र की स्थिति या चंद्रमा की स्थिति उत्तम हो तो नौकरी का योग बनता है।
पति की आयु : लड़की के जन्म लग्न में द्वितीय भाव उसके पति की आयु भाव है। अगर द्वितीयेश शुभ स्थिति में हो या अपने स्थान से द्वितीय स्थान को देख रहा हो तो पति दीर्घायु होता है। अगर द्वितीय भाव में शनि स्थित हो या गुरु सप्तम भाव, द्वितीय भाव को देख रहा हो तो भी पति की आयु 75 वर्ष की होती है।

अंक 30 : जानिए वर्ष 2019 के जनवरी महीने के लिए शुभ सर्वार्थसिद्धि योग कब कब बनेंगें ????

सर्वार्थ सिद्धि मुहूर्त होने पर भी इन चीजों को खरीदने से होती है बड़ी अनहोनी, जानिए जनवरी 2019 में कब कब हैं ये शुभ मुहूर्त??

✍🏻हिन्दू धर्म शास्त्रों में अनुसार जिन तिथियों में सर्वार्थ सिद्धि योग मुहूर्त होते हैं उन तिथियों में किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं, उस दिन किसी शुभ मुहूर्त को देखने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ये योग ही स्वयं सिद्ध होते हैं । ज्योतिष शास्त्र भी कहता हैं कि सर्वार्थ सिद्धि मुहूर्त में शुक्र अस्त, पंचक, भद्रा आदि पर विचार करने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि ये मुहूर्त अपने आप में ही शुभ व सिद्ध होते हैं और इन पर नीच ग्रहों का प्रभाव कभी नहीं रहता, यहां तक की कुयोग होने पर भी उसका कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता । सर्वार्थ सिद्ध योग में किये गए कार्य सदैव शुभ फल ही प्रदान करते हैं । लेकिन शास्त्रों में ये जरूर कहा गया हैं, ये शुभ योग अगर मंगलवार या फिर शनिवार के दिन हो तो उस दिन किसी भी प्रकार वाहन एवं प्रेस या कोई लोहे से बनी वस्तुएं भी भूलकर भी नहीं खरीदन चाहिए । ऐसा करने से किसी बड़ी दुर्घटना के होने की आशंका बनी रहती है । जाने जनवरी 2019 में किन किन तिथियों में सर्वार्थ सिद्धि योग मुहूर्त पड़ रहे हैं।
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सर्वार्थ सिद्धि योग मुहूर्त जनवरी 2019–

1- दिन बुधवार 2 जनवरी सुबह 9 बजकर 39 मिनट से अनुराधा
2- दिन गुरुवार 3 जनवरी सुबह 6 बजकर 47 मिनट से अनुराधा
3- दिन रविवार 6 जनवरी शाम 5 बजकर 43 मिनट से उत्तराषाढ़
4- दिन सोमवार 7 जनवरी रात बजकर 36 मिनट से श्रवण
5- दिन रविवार 13 जनवरी शाम 5 बजकर 49 मिनट से उत्तराभाद्रपद
6- दिन मंगलवार 15 जनवरी शाम 6 बजकर 48 मिनट से अश्विनी
7- दिन बुधवार 16 जनवरी दोपहर 2 बजकर 12 मिनट से कृतिका
8- दिन रविवार 20 जनवरी शाम 7 बजकर 20 मिनट से पुष्य
9- दिन सोमवार 21 जनवरी सुबह 6 बजकर 48 मिनट से पुष्य
10- दिन मंगलवार 22 जनवरी सुबह 6 बजकर 45 मिनट से अश्लेषा
11- दिन बुधवार 30 जनवरी सुबह 6 बजकर 44 मिनट से अनुराधा

अंक 29 : जानिए कब और कौन सी अंगूठी (रत्न) करें धारण ओर कौन सी नही..? क्या रखें सावधानी, रत्न (अंगूठी) धारण करते समय ?
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प्रिय मित्रों/पाठकों, वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई ग्रह खराब स्थिति में या कमजोर स्थिति में होता है तब ज्योतिषी उस ग्रह से संबंधित रत्न की अंगूठी पहनने के लिए कहते हैं। कोई अंगूठी पहनते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि आपको सदैव उसका शुभ फल मिले। आजकल लोग कई तरह के रत्न धारण कर लेते हैं। कोई आय बढ़ाने के लिए पुखराज तो गुस्सा कम करने के लिए मोती पहन लेता है। लेकिन इनके फायदों के साथ कई नुकसान भी होते हैं। अगर ये आपके अनुकूल नहीं हो तो ये आपके लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि वैदिक ज्योतिष शास्त्र में रत्न पहनने के पूर्व कई निर्देश दिए गए हैं. रत्नों में मुख्यतः नौ ही रत्न ज्यादा पहने जाते हैं. सूर्य के लिए माणिक, चन्द्र के लिए मोती, मंगल के लिए मूंगा, बुध के लिए पन्ना, गुरु के लिए पुखराज, शुक्र के लिए हीरा, शनि के लिए नीलम, राहु के लिए गोमेद और केतु के लिए लहसुनियां।

किन्तु रत्नों का आपके जीवन पर कैसा असर होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने उसे कैसे, किस दिन और किस समय में पहना है.??
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जानिए रत्न (अंगूठी) पहनते समय क्या करें और क्या ना करें–

किसी भी रत्न को दूध में ना डालें. अंगूठी को जल से एक बार धोकर पहनें. रत्न को दूध में डालकर रात भर ना रखें. कई रत्न दूध को सोख लेते हैं और दूध के कण रत्नों में समा कर रत्न को विकृत कर देते हैं. अपने मन की संतुष्टि के लिए अपने ईष्ट देवी की मूर्ति से स्पर्श करा कर रत्न धारण कर सकते हैं.
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कब रत्न धारण ना करें —
रत्न धारण करने से पहले यह देख लें कि कहीं 4, 9 और 14 तिथि तो नहीं है. इन तिथियों (तारीखों) को रत्न धारण नहीं करना चाहिए. यह भी ध्यान रखें कि जिस दिन रत्न धारण करें उस दिन गोचर का चंद्रमा आपकी राशि से 4,8,12 में ना हो. अमावस्या, ग्रहण और संक्रान्ति के दिन भी रत्न धारण ना करें.
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जानिए किस नक्षत्र में रत्न धारण करें —
मोति, मूंगा जो समुद्र से उत्पन्न रत्न हैं, यदि रेवती, अश्विनी, रोहिणी, चित्रा, स्वाति और विशाखा नक्षत्र में धारण करें तो विशेष शुभ माना जाता है. सुहागिन महिलाएं रोहिणी, पुनर्वसु, पुष्य नक्षत्र में रत्न धारण ना करें. ये रेवती, अश्विनी, हस्त, चित्रा, अनुराधा नक्षत्र में रत्न धारण करें, तो विशेष लाभ होता है।
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जानिए कब (अंगूठी) रत्न को बदलें —
ग्रहों के 9 रत्नों में से मूंगा और मोति को छोड़कर बाकी बहुमूल्य रत्न कभी बूढ़े नहीं होते हैं. मोती की चमक कम होने पर और मूंगा में खरोंच पड़ जाए तो उसे बदल देना चाहिए. माणिक्य, पन्ना, पुखराज, नीलम और हीरा सदा के लिए होते हैं. इनमें रगड़, खरोच का विशेष असर नहीं होता है. इन्हें बदलने की जरूरत नहीं होती है।
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👉🏻👉🏻कछुए वाली अंगूठी–

कछुए का संबंध माता लक्ष्मी से माना जाता है। क्योंकि माता लक्ष्मी और कछुए दोनों की उत्पत्ति जल से हुई है। कछुए की अंगूठी को पहनने से धन-संपदा की प्राप्ति होती है। लेकिन ज्योतिष के अनुसार, इस अंगूठी को पहनते समय इस बात का ध्यान रखें कि अगर आपकी राशि कर्क, वृश्चिक या मीन है तो इस अंगूठी को न पहनें। क्योंकि इस अंगूठी के प्रभाव से इन राशियों के लोगों में शीत विकार हो सकते हैं। क्योंकि कछुए और इन तीनों राशियों का संबंध जल से है। आजकल कछुआ अंगूठी का चलन जोरों पर है। मूलरूप से यह एक फेंगशुई वस्तु है। जापानी मान्यता के अनुसार इसे समृद्धि का प्रतीक माना गया है। वहीं भारत में इस अंगूठी को भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है।
कछुए की अंगूठी को पहनते समय आपको इसके सिर को लेकर ध्यान देना है। कछुए के सिर वाला भाग पहनने वाले की तरफ होना चाहिए। इस से असीम कृपा मिलती है। इस तरह से अंगूठी पहनने से ये पैसे को अपनी तरफ आकर्षित करता है।

इसके अलावा ये भी जानना जरूरी है कि कछुए की अंगूठी को किस उंगली में पहनना चाहिए। हम आपको बता दें कि कछुए की अंगूठी को सीधे हाथ की मध्यमा या तर्जनी उंगली में पहनना चाहिए। इसके अलावा कछुए की अंगूठी हमेशा शुक्रवार को खरीदें।

शुक्रवार को अंगूठी खरीदने के बाद लक्ष्मी जी के सामने दूधिया पानी से धोकर अगरबत्ती जलाएं। इसके बाद अंगूठी को धारण करें। कछुए वाली अंगूठी को आप अपने हिसाब से डिजायन भी करा सकते हैं। यदि आप चाहें तो इसमें चांदी, सोने में जडे नग द्वारा भी बनवा सकते हैं।

1.कछुआ अंगूठी धातु से बनी एक वस्तु है। आमतौर पर ये चांदी से बनी होती है, लेकिन इन दिनों ये सोना व अन्य मेटल में भी उपलब्ध है। कई लोग इसमें कीमती रत्न भी जड़ाकर पहनते हैं। इस अंगूठी में कछुए की आकृति बनी होती है।

2.फेंगशुई में कछुआ एक बहुत ही शक्तिशाली जीव है। इसे गुड लक के चार स्तम्भों में से एक माना गया है। विद्वानों के अनुसार कछुआ पूरी सृष्टि जुड़ा हुआ है। इसका उपरी हिस्सा स्वर्ग से और नीचे का भाग धरती से संबंध रखता है।

3.फेंगशुई के अलावा भारतीय धार्मिक दृष्टिकोण से भी कछुआ बहुत महत्वपूर्ण है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कछुए को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। साथ ही समुद्र मंथन के दौरान कछुए के निकलने से इसे देवी लक्ष्मी का भी प्रिय कहा गया है।

4.धार्मिक मान्यताओं से जुड़े होने के कारण कछुआ अंगूठी पहनने से घर में बरक्कत होती है। ये बाहरी धन को अपनी ओर खीचता है। जिससे ये गरीब को भी राजा बना देता है।

5.चूंकि कछुए को स्वर्ग व धरती से जुड़ा माना जाता है इसलिए इसे पहनने से ये आस-पास के महौल को खुशनुमा बनाता है। ये परिवार के सदस्यों में त्याग और प्रेम की भावना बढ़ाता है, जिससे उनमें भतभेद नही होते हैं।

6.कछुआ अंगूठी पहनने से प्रेम संबंध भी बेहतर होते हैं। ये पति-पत्नी व प्रेमी-प्रेमिका को एक-दूसरे के प्रति आकर्षित करता है। ये आपस में प्यार बढ़ाता है। साथ ही ये व्यक्ति को अपने पार्टनर के लिए वफादार होने के लिए भी प्रेरित करता है।

7.कछुए को लंबे समय तक जीने वाला प्राणी माना जाता है। इसलिए इसकी अंगूठी को पहनते ही रोग दूर हो जाते है। शरीर में नई ऊर्जा उत्पन्न होती है। साइंस के मुताबिक कछुआ अंगूठी पहनने से शरीर के कुछ विशेष नस दबते हैं, जिससे शरीर स्वस्थ्य रहता है।

8.कछुआ अंगूठी की एक और खासियत है। ये व्यक्ति के मन से बुरे व नकारात्मक विचारों को दूर करता है। साथ ही ह्दय में सकारात्मक भावना का संचार करता है। ये जीवन में आगे बढ़ने और तरक्की के लिए प्रेरित करता है।

9.कछुआ अंगूठी को करियर के लिए भी अच्छा माना गया है। इसे धारण करते ही ये आपके सोए हुए भाग्य को जगाता है। आपके बिगड़े हुए कामों को ठीक करता है और लोगों के दिलों में आपके प्रति सम्मान पैदा करता है। इससे आपको अपने व्यवसाय और नौकरी में सफलता मिलती है।

10.कछुआ अंगूठी हमेशा शुक्रवार को ही खरीदनी और पहननी चाहिए। इसे पहनने से पहले अंगूठी को दूध में धोना चाहिए। फिर इसे भगवान को स्पर्श कराकर धूप-दीप दिखाना चाहिए। अंगूठी को सीधे हाथ की मध्यमा व तर्जनी उंगली में ही पहनना चाहिए।
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👉🏻👉🏻हीरे की अंगूठी–

शुक्र का माना जाता है। लेकिन इसे नवविवाहित जोड़े को नहीं पहनना चाहिए और शादी के एक साल बाद तक हीरा नहीं पहनना चाहिए। ज्योतिष के अनुसार, हीरा संतान प्राप्ति में दिक्कत करता है।
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👉🏻👉🏻गोमेद की अंगूठी–

गोमेद राहु का रत्न है, इसे पहनने से लाभ और हानि दोनों हो सकते हैं। इसलिए गोमेद पहनने से पहले उसके बारें में अच्छे से जान लेना जरूरी होता है।ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार गोमेद बहुत सस्‍ता रत्‍न है लेकिन यह आवश्‍यक नहीं है कि सभी को सही गोमेद जरूरत के समय पर ही प्राप्‍त हो जाए। इसलिए इसके दो उपरत्‍न हैं जिन्‍हें गोमेद के बदले धारण किया जा सकता है। पहला उपरत्‍न है तुरसा और दूसरा साफी। इसके अलावा गोमेद के रंग का अकीक भी गोमेद के स्‍थान पर पहना जा सकता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि गोमेद में किसी प्रकार का गड्डा दिखाई दे तो वह पुत्र व व्यापार को हानि पहुंचाता है। यदि गोमेद में चीरा या क्रास हो तो वह शरीर में रक्त सम्बन्धी विकार उत्पन्न करता है। अगर गोमेद में किसी प्रकार की कोई चमक न हो तो शरीर को लकवा भी हो सकता है।
राहु एक छाया ग्रह है। इसका अपना कोई अस्तित्व नहीं है, यह जिस भाव, राशि, नक्षत्र या ग्रह के साथ से जुड़ जाता है, उसके अनुसार ही अपना फल देने लगता है। राहु जब नीच का या अशुभ होकर प्रतिकूल फल देने लगता है तो ज्योतिष के जानकार लोग गोमेद पहनने का सुझाव देते हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शनिवार के दिन अष्टधातु या चॉदी की अंगूठी में जड़वाकर षोड़षोपचार पूजन करने के बाद निम्न ”ऊॅ रां राहवे नमः” मन्त्र की कम से कम एक माला जाप करके मध्यमा उंगली में धारण करना चाहिए।
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👉🏻👉🏻कब करें मोती धारण–

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मोती को चंद्रमा की अशुभता दूर करने के लिए धारण किया जाता है। जन्म कुण्डली में यदि चंद्रमा के साथ पापी ग्रह राहु या केतु एक ही भाव में आकर बैठ जाएं तो यह चंद्र ग्रहण बनाता है। इस ग्रहण का जीवन पर अशुभ प्रभाव ना हो इसके लिए भी मोती धारण किया जाता है । इसके साथ लहसुनिया और गोमेद धारण ना करें। अगर आपने ग्रह-नक्षत्रों को अनुकूल बनाने के लिए । चंद्रमा के साथ जब भी राहु और केतु होते हैं तो ग्रहण दोष बनता है। इससे बुद्धि भ्रमित रहती है। लहसुनिया केतु का ग्रह है गोमेद राहु का रत्न है।
ज्योतिष अनुसार कुल 8 प्रकार के मोती पाए गए हैं जो इस प्रकार हैं – अभ्र मोती, शंख मोती, शुक्ति मोती, सर्प मोती, गज मोती, बांस मोती, शूकर मोती और मीन मोती।
यदि चंद्रमा कुंडली के छठे या आठवें भाव में बैठा है तो अशुभ प्रभाव कम करने के लिए मोती धारण करें। यदि चंद्रमा कुंडली में नीच का है तब भी मोती पहनना लाभकारी सिद्ध होता है।अमावस्या के दिन जन्मे लोग यह मोती अवश्य धारण करें। यदि कुंडली में राहु के साथ ग्रहण योग बन रहा है तो मोती जरूर पहनें।
कम से कम 8 से 15 रत्ती का मोती चांदी की अंगूठी में जड़वा कर धारण करें। इस अंगूठी को सोमवार के दिन धारण करना है लेकिन धारण करने से ठीक एक रात पहले अंगूठी को दूध, गंगाजल, शहद, चीनी के मिश्रण में डालकर रात भर रखें। अगले दिन पांच अगरबत्ती चंद्रदेव को समर्पित करते हुए प्रज्जवलित करें और इस अंगूठी को अपनी कनिष्ठिका अंगुली में धारण कर लें। इस तरह चंद्रमा की अंगूठी धारण करने के 4 दिन के अंदर-अंदर अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर देती है और औसतन 2 साल एक महीना और 27 दिन तक यह मोती अपना प्रभाव दिखाता है और इसके बाद निष्क्रिय हो जाता है।
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👉🏻👉🏻नवग्रह अंगूठी–

तांबा, पीतल, कांसा, चांदी, सोना, रांगा, लोहा इत्यादि को मिलाकर बनाया जाता है। इस अंगूठी को धारण करते समय इस बात का ध्यान रखें कि जब आपने यह अंगूठी धारण कर रखी हो तो मांस-मंदिरा का सेवन न करें। ऐसा करने पर इस अंगूठी का प्रभाव नकारात्मक हो सकता है।
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👉🏻👉🏻नीलम की अंगूठी—

नीलम की अंगूठी पहनते समय इस बात का ध्यान रखें कि इसे हमेशा सोने में या पंच धातु में जड़वाकर ही पहनना चाहिए। इस रत्न का प्रभाव सबसे अधिक तेज होता है। अगर यह आपके लिए सकारात्मक फल लाता है तो राजा बना सकता है और घर शुभ न हो तो सड़क पर ला सकता है। नीलम को शनि की दशा में ही पहनना चाहिए। इसकी अंगूठी बनवाने से पहले कुछ दिन इसे अपने सिरहाने रखकर सोएं या कपड़े में लपेटकर हर समय अपने पास रखें। सब सामान्य रहे तो इसकी अंगूठी बनवाएं। कुछ नकारात्मक घटे तो इसकी अंगूठी न पहनें।बताया जाता है कि नीलम पहनने से शनि का बुरा प्रभाव कम होता है और इससे आदमी रंक से राजा भी बन सकता है। लेकिन अगर नीलम रत्न आपके लिए अनुकूल नहीं है तो आपके हाथ-पैरों में जबर्दस्त दर्द करने लगेगा, आपकी विपरीत बुद्धि उत्पन्न करेगा।
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👉🏻👉🏻पंच धातु की अंगूठी–

ग्रहों के दोष दूर करने का एक उपाय ये है कि अशुभ ग्रह से संबंधित धातु की अंगूठी धारण की जाए। सभी ग्रहों की अलग-अलग धातुएं हैं। अगर सभी ग्रहों को एक साथ प्रसन्न करना हो तो पंचधातु की अंगूठी पहन सकते हैं। पंच धातु की अंगूठी अनामिका उंगली यानी रिंग फिंगर में पहन सकते हैं।

👉🏻👉🏻इस पंच धातु की अंगूठी से होते हैं ये फायदे–

  • पंच धातु की अंगूठी धारण करने से हमारे आसपास की नकारात्मकता खत्म होती है। हमारी ऊर्जा बढ़ती है। सकारात्मक विचार आने लगते हैं। किस्मत का साथ मिल सकता है।
  • अगर आपसे जलते हैं तो आपको पंचधातु की अंगूठी धारण करने से लाभ मिल सकता है।
  • काम में मन लगने लगता है और ग्रहों के दोष भी कम हो सकते हैं।
  • जो लोग ये अंगूठी नहीं पहनना चाहते हैं, वे पंच धातु का कड़ा भी पहन सकते हैं।

👉🏻👉🏻इन धातुओं से बनती है पंच धातु अंगूठी–

इस अंगूठी में पांच धातुएं मिलाई जाती हैं यानी ये मिश्रित धातु की अंगूठी होती है। इसे बनाने के लिए सोना, चांदी, तांबा, पीतल और सीसा धातु का उपयोग किया जाता है।
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👉🏻👉🏻जानिए माणिक्य के प्रभाव को–
ज्योतिष के अनुसार मिथून राशि वालों को माणिक पहनना चाहिए। लेकिन दूसरी ओर कई ज्योतिष कहते हैं कि अगर सूर्य की दशा में माणिक नहीं पहना जाए तो ये आपके लिए नुकसान दायक भी हो सकता है। वहीं कन्या राशि वालों के लिए तो इसे बहुत ही खतरनाक बताया है।
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👉🏻👉🏻समझें पुखराज के प्रभाव को–
आपने कई पैसे वालों को पुखराज धारण किए हुए देखा होगा। बताया जाता है कि पुखराज पहनने से पैसे की समस्या दूर होती है और विवाह भी जल्द हो जाता है। लेकिन जब पुखराज का दुष्प्रभाव है कि उससे आपका अहंकार बढ़ जाता है और इससे पेट भी गड़बड़ हो जाता है।
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जानिए मूंगे के असर को–
जब कोई मांगलिक होता है तो उसे मूंगा धारण करने के लिए कहा जाता है। लेकिन कई ज्योतिषी कहते है कि मूंगा किसी राशि से मेल नहीं करें या आपके अनुकूल नहीं हो तो ये आपको कई नुकसान पहुंचा सकता है। इससे ब्लड प्रेशर आदि की समस्या हो सकती है।
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ऐसे करता है असर लहसुनिया–
लहसुनिया यानि कैट्स आई केतु के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए धारण किया जाता है। लेकिन इसकी विकिरण की क्षमता बहुत अधिक होती है। बताया जाता है कि जो भी व्यक्ति प्रतिदिन एक घंटे इस लहसुनिया नग से आठ हाथ की दूरी पर रहता होगा, वो भी इससे प्रभावित होगा। इससे उसको अंधापन या कुष्ठ रोग भी हो सकता है।

अंक 28 : जानिए “वास्तु” क्या है और क्या हैं इसके लाभ ?

🌺🌺✍🏻✍🏻🌷🌷👉🏻👉🏻🌸🌸संस्कृत में कहा गया है कि…

गृहस्थस्य क्रियास्सर्वा न सिद्धयन्ति गृहं विना। वास्तु का शाब्दिक अर्थ ” निवास स्थान ” होता है। इसके सिद्धांत वातावरण में जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाश तत्वों के बीच एक सामंजस्य स्थापित करने में मदद करते हैं। जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाश इन पाँचों तत्वों का हमारे कार्य प्रदर्शन, स्वभाव, भाग्य एवं जीवन के अन्य पहलुओं पर पड़ता है। यह विद्या भारत की प्राचीनतम विद्याओं में से एक है जिसका संबंध दिशाओं और ऊर्जाओं से है। इसके अंतर्गत दिशाओं को आधार बनाकर आसपास मौजूद नकारात्मक ऊर्जाओं को कुछ इस तरह सकारात्मक किया जाता है, ताकि वह मानव जीवन पर अपना प्रतिकूल प्रभाव ना डाल सकें।

उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम ये चार मूल दिशाएं हैं। वास्तु विज्ञान में इन चार दिशाओं के अलावा 4 विदिशाएं हैं। आकाश और पाताल को भी इसमें दिशा स्वरूप शामिल किया गया है। इस प्रकार चार दिशा, चार विदिशा और आकाश पाताल को जोड़कर इस विज्ञान में दिशाओं की संख्या कुल दस माना गया है। मूल दिशाओं के मध्य की दिशा ईशान, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य को विदिशा कहा गया है।

वास्तु शास्त्र घर, प्रासाद, भवन अथवा मन्दिर निर्मान करने का प्राचीन भारतीय विज्ञान है जिसे आधुनिक समय के विज्ञान आर्किटेक्चर का प्राचीन स्वरुप माना जा सकता है।

डिजाइन दिशात्मक संरेखण के आधार पर कर रहे हैं। यह हिंदू वास्तुकला में लागू किया जाता है, हिंदू मंदिरों के लिये और वाहनों सहित, बर्तन, फर्नीचर, मूर्तिकला, चित्रों, आदि।

दक्षिण भारत में वास्तु का नींव परंपरागत महान “साधु मायन” को जिम्मेदार माना जाता है और उत्तर भारत में “विश्वकर्मा” को जिम्मेदार माना जाता है।
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कैसे समझें वास्तु की अवधारणा को —
प्रकृति में संतुलन बनाए रखने के लिए विविध प्राकृतिक बलों जैसे जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाश के बीच परस्पर क्रिया होती है, जिसका व्यापक प्रभाव इस पृथ्वी पर रहने वाली मनुष्य जाति के अलावा अन्य प्राणियों पर पड़ता है। वास्तु विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इन पांच तत्वों के बीच होने वाली परस्पर क्रिया को वास्तु के नाम से जाना जाता है। वास्तु ज्योतिष के अनुसार इस प्रक्रिया का प्रभाव हमारे कार्य प्रदर्शन, स्वभाव, भाग्य एवं जीवन के अन्य पहलुओं पर पड़ता है।

वास्तु शास्त्र आपके आस पास की महान परिशोध है एवं यह आपके जीवन को प्रभावित करता है। वास्तुशास्त्री पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि वास्तु का शाब्दिक अर्थ निवासस्थान होता है। इसके सिद्धांत वातावरण में जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि और आकाश तत्वों के बीच एक सामंजस्य स्थापित करने में मदद करते हैं। वास्तु शास्त्र कुछ नहीं है, लेकिन कला, विज्ञान, खगोल विज्ञान और ज्योतिष का मिश्रण है। इसके अतिरिक्त यह कहा जा सकता है कि यह एक बहुत सदियों पुराना रहस्यवादी नियोजन का विज्ञान, चित्र नमूना एवं अंत निर्माण है।
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जानिए हमारे जीवन में वास्तु का महत्व—-

यह माना जाता है कि वास्तुशास्त्र हमारे जीवन को बेहतर बनाने एवं कुछ गलत चीजों से हमारी रक्षा करने में मदद करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो वास्तुशास्त्र हमें नकारात्मक तत्वों से दूर सुरक्षित वातावरण में रखता है। वास्तुशास्त्र सदियों पुराना निर्माण का विज्ञान है, जिसमें वास्तुकला के सिद्धांत और दर्शन सम्मिलित हैं, जो किसी भी भवन निर्माण में बहुत अधिक महत्व रखते हैं। इनका प्रभाव मानव की जीवन शैली एवं रहन सहन पर पड़ता है।

विश्व के प्रथम विद्वान वास्तुविद् विश्वकर्मा के अनुसार शास्त्र सम्मत निर्मित भवन विश्व को सम्पूर्ण सुख, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति कराता है। वास्तु शिल्पशास्त्र का ज्ञान मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कराकर लोक मे परमानन्द उत्पन्न करता है, अतः वास्तु शिल्प ज्ञान के बिना निवास करने का संसार मे कोई महत्व नहीं है। जगत और वास्तु शिल्पज्ञान परस्पर पर्याय है।

वास्तुशात्री पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं कि वास्तु एक प्राचीन विज्ञान है। हमारे ऋषि मनीषियो ने हमारे आसपास की सृष्टि मे व्याप्त अनिष्ट शक्तियो से हमारी रक्षा के उद्देश्य से इस विज्ञान का विकास किया। वास्तु का उद्भव स्थापत्य वेद से हुआ है, जो अथर्ववेद का अंग है। इस सृष्टि के साथ साथ मानव शरीर भी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है और वास्तु शास्त्र के अनुसार यही तत्व जीवन तथा जगत को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक है। भवन निर्माण मे भूखंड और उसके आसपास के स्थानों का महत्व बहुत अहम होता है। भूखंड की शुभ-अशुभ दशा का अनुमान वास्तुविद् आसपास की चीजो को देखकर ही लगाते है।
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वास्तुशास्त्र का मूल आधार विविध प्राकृतिक ऊर्जाओं पर निर्भर है, जो हमारे लिए शुल्क रहित उपलब्ध हैं। जी हां, बिल्कुल निःशुल्क।

इसमें निम्न शामिल हो सकती हैं :-
पृथ्वी से ऊर्जा प्राप्ति
दिन के उजाले से ऊर्जा
सूर्य की ऊर्जा या सौर ऊर्जा
वायु से ऊर्जा
आकाश से ऊर्जा प्राप्ति
लौकिक / ब्रह्मांड से ऊर्जा
चंद्रमा की ऊर्जा

ऊर्जा स्रोत में चुंबकीय, थर्मल और विद्युत ऊर्जा भी शामिल होगी। जब हम इन सभी ऊर्जाओं का आनन्दमय उपयोग करते हैं, तो यह हमें अत्यंत आंतरिक खुशी, मन की शांति, स्वास्थ्य एवं समृद्धि के लिए धन प्रदान करती हैं। वास्तु को किसी भी प्रकार के कमरे, घर, वाणिज्यिक या आवासीय संपत्ति, बंगले, विला, मंदिर, नगर नियोजन आदि के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। वास्तु छोटी एवं बड़ी परियोजनाओं एवं उपक्रमों पर भी लागू होता है। पूर्ण सामंजस्य बनाने के लिए तीन बल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिनमें जल, अग्नि एवं वायु शामिल हैं। वास्तु के अनुसार, वहां पूर्ण सद्भाव और शांति होगी, जहां यह तीनों बल अपनी सही जगह पर स्थित होंगे। अगर इन तीन बलों की जगह में आपसी परिवर्तन यानी गड़बड़ी होती है, जैसे कि जल की जगह वायु या अग्नि को रखा जाए तथा अन्य ताकत का गलत स्थानांतरण हो तो इस गलत संयोजन का जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण सद्भाव की कमी एवं अशांति पैदा होती है।
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पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार वास्तु शास्त्र एवं ज्योतिष शास्त्र दोनो एक-दूसरे के पूरक है क्योंकि दोनो एक-दूसरे के अभिन्न अंग हैं। जैसे शरीर का अपने विविध अंगों के साथ अटूट संबंध होता है। ठीक उसी प्रकार ज्योतिष शास्त्र का अपनी सभी शाखायें प्रश्न शास्त्र, अंक शास्त्र, वास्तु शास्त्र आदि के साथ अटूट संबंध है। ज्योतिष एवं वास्तु शास्त्र के बीच निकटता का कारण यह है कि दोनों का उद्भव वैदिक संहितायों से हुआ है। दोनों शास्त्रों का लक्ष्य मानव मात्र को प्रगति एवं उन्नति की राह पर अग्रसर कराना है एवं सुरक्षा देना है। वास्तु सिद्धांत के अनुरूप निर्मित भवन एवं उसमे वास्तुसम्मत दिशाओं मे सही स्थानों पर रखी गई वस्तुओं के फलस्वरूप उसमे रहने वाले लोगो का जीवन शांतिपूर्ण और सुखमय होता है। इसलिए उचित यह है कि भवन का निर्माण किसी वास्तुविद से परामर्श लेकर वास्तु सिद्धांतों के अनुरूप ही करना चाहिए। इस तरह, मनुष्य के जीवन मे वास्तु का महत्व अहम होता है। इसके अनुरूप भवन निर्माण से उसमे सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। फलस्वरूप उसमे रहने वालों का जीवन सुखमय होता है। वहीं, परिवार के सदस्यों को उनके हर कार्य मे सफलता मिलती है। एक अच्छे और अनुभवी वास्तुशात्री को ज्योतिष का ज्ञान होना बहुत आवश्यक होता हैं।

अंक 27 : प्रस्तुत है हनुमान अष्टमी पर विशेष जानकारी—

आज (29 दिसंबर, शनिवार) पौष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है। इस दिन हनुमान अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन हनुमानजी की पूजा विशेष रूप से की जाती है।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के प्रिय भक्त हनुमानजी की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं, वहीं बुधवार को हनुमान अष्टमी होने से उनका पूजन विशेष मायने रखता है।

मान्यता हें की हनुमान अष्टमी के दिन हनुमानजी को चोला चढ़ाने से हर बिगड़ा काम बन जाता है और साधक पर हनुमानजी की विशेष कृपा होती है।

अगर आप अपने जीवन की सभी परेशानियों से निजात पाना चाहते हैं तो आप निम्न मंत्र और उपाय आजमाएं, शीघ्र ही आपके सारे कष्ट दूर होकर आपको सुख की अनुभूति होगी—

  • ॐ हं हनुमंतये नम: मंत्र का जप करें।
  • हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् का रुद्राक्ष की माला से जप करें।
  • संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।
  • राम-राम नाम मंत्र का 108 बार जप करें।
  • हनुमान को नारियल, धूप, दीप, सिंदूर अर्पित‍ करें।
  • हनुमान अष्टमी के दिन हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  • हनुमान को चमेली का तेल, सिंदूर का चोला चढ़ाएं।
  • गुड-चने और आटे से निर्मित प्रसाद वितरित करें।
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  • राम रक्षा स्त्रोत, बजरंगबाण, हनुमान अष्टक का पाठ करें।
    हनुमान आरती, हनुमत स्तवन, राम वन्दना, राम स्तुति, अथवा संकटमोचन हनुमानाष्टक का पाठ करें।

फिर दोपहर में घर में शुद्धता पूर्वक बने चूरमे का हनुमानजी भोग लगाएं। अगर ये संभव न हो तो गुड़-चने का भोग भी लगा सकते हैं।
– उसी स्थान पर बैठकर हनुमान चालीसा या हनुमान बाहुक का पाठ करें।
– इसके बाद रुद्राक्ष की माला से एक श्लोकी रामायण का पाठ करें। कम से कम 108 बार ये मंत्र बोलें-

आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं कांचनं
वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसंभाषणम्।
वालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनं
पश्चाद्रावणकुंभकर्णहननमेतद्धि रामायणम्॥

  • सबसे अंत में हाथ जोड़कर हनुमानजी के सामने अपनी मनोकामना कहें। इस विधि से पूजा करने से हनुमानजी अपने भक्तों पर प्रसन्न होते हैं।
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  • शनि ग्रह से पीड़ित जातकों को हनुमान आराधना करना चाहिए।
  • बाधा मुक्ति के लिए श्रद्घालु हनुमान यंत्र स्थापना के साथ बजरंग बाण या हनुमान चालीसा का पाठ कर सकते हैं। इससे निश्चित ही हनुमानजी प्रसन्न होते है।
  • ‍परिवार सहित मंदिर में जाकर मंगलकारी सुंदरकांड पाठ करें।
  • श्रद्धानुसार भोजन या भंडारे का आयोजन कराएं।
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    मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें। तो निश्चित ही हनुमानजी की कृपा आप पर अवश्य बनी रहेगी।

आज हनुमान अष्टमी पर लाल फूल और गुलाब का इत्र चढ़ाकर हनुमानजी की पूजा अवश्य करनी चाहिए।

इसके अलावा आप हनुमान अष्टमी पर हनुमानजी को एक विशेष पान अर्पित करें। इस पान में केवल कत्था, गुलकंद, सौंफ, खोपरे का बुरा और सुमन कतरी डलवाएं। पान बनवाते समय इस बात का ध्यान रखें कि उसमें चूना एवं सुपारी नहीं हो। इस पान में तंबाकू भी नहीं होनी चाहिए। हनुमानजी का विधि-विधान से पूजन करने के बाद यह पान हनुमानजी को यह बोलकर अर्पण करें- हे हनुमानजी। आपको मैं यह मीठा रस भरा पान अर्पण कर रहा हूं। आप भी मेरा जीवन मिठास से भर दीजिए। हनुमानजी की कृपा से कुछ ही दिनों में आपकी हर समस्या दूर हो जाएगी।
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हनुमान अष्टमी का यह पर्व विजय उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। जो भक्त इस खास मौक पर हनुमान जी का दर्शन और उनकी पूजा आराधना करता है उसकी हर मनोकामना पूरी होती है।

शास्त्रों में हनुमान अष्टमी को हनुमानजी का विजय उत्सव मानने के पीछे प्रसंग है। जिसके अनुसार भगवान राम और रावण के बीच युद्ध के समय जब अहिरावण ने भगवान राम और लक्ष्मण को कैद करके पाताल लोक में ले जाकर दोनों की बलि देना चाहता था, तब भगवान हनुमान ने उसे युद्ध में हरा कर और उसका वध कर भगवान को छु़ड़ाया था। युद्ध के दौरान ज्यादा थक जाने के कारण हनुमानजी पृथ्वी के नाभि स्थल अवंतिका में आराम किया था। हनुमान जी बल के कारण भगवान राम प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया की पौष कृष्ण की अष्टमी को जो भी भक्त पूजा करेगा उसके सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। ऐसी मान्यता है तभी से इस दिन विजय उत्सव का पर्व मनाया जाता है ।

हनुमान अष्टमी के दिन हनुमान मंदिर जा कर हनुमानजी के दर्शन करना चाहिए और इस दिन हनुमान जी के 12 नामों का जप करना चाहिए।
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अंक 26 : जानिए कैसा रहेगा आपकी राशि के लिए जनवरी 2019 का महीना :

मेष – राशिफल

जनवरी माह में आपको अपनी ऊर्जा का सही ढंग से उपयोग करना है ।
आपके नैतिक पहलु बहुत मजबूत होंगे, जो किसी भी स्थिति में ईमानदार व्यवहार की गारंटी देता है। जनवरी बहुत व्यस्त महीना होगा।
अपनी महत्वाकांक्षी और जुझारू विशेषता की वजह से वे प्रमुख कठिनाइयों को दूर करेंगे और कई अनमोल अनुभव प्राप्त करेंगे।

वृषभ- अप्रत्याषित शुभता के साथ आया जनवरी माह उत्तरोत्तर अच्छा होने वाला है। समझ और धैर्य से खुद को बेहतर स्थिति में लाने में सफल होंगे। निजी जीवन में श्रेष्ठता और सहजता बनी रहेगी। महत्वपूर्ण कार्यों को उत्तरार्ध आगे बढ़ाने पर जोर दें। मकर संक्रांति से पहले यथासंभव बड़ी योजनाओं को टालें रहेंगे तो बेहतर होगा। मासफल मिश्रित फलकारक। मौसम को सम्मान दें सावधानी बरतें।

मिथुन- अपनों से नजदीकियां बढ़ाने और दूरियां मिटाने की संभावनाओं के साथ आया जनवरी माह व्यक्तिगत उपलब्धियों के लिए उत्साह बनाए रखने वाला है। दांपत्य जीवन में खुशियों का गुलदस्ता तरोताजा बना रहेगा। साथी श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकता है। महत्वपूर्ण कार्यों को पूर्वार्ध में पूरा कर लेने पर जोर दें। उत्तरार्ध में व्यस्तता बढ़ने से आवश्यक कार्य प्रभावित हो सकते हैं। सेहत से समझौता न करें। मासफल सामान्य।

कर्क- मित्रों की संख्या में बढ़ोतरी की संभावनाएं लाया जनवरी माह उत्तरोत्तर हितकर रहने वाला है। बाधाओं और विरोधों को साहस और बल से पीछे छोड़ने में सफल होंगे। समझौतों और कारोबारी बैठकों पर जोर रहेगा। यात्राओं की अधिकता रह सकती है। आर्थिक लेन देन में सतर्कता बरतें। उधारी से हरसंभव बचें। उत्तरार्ध अपेक्षाकृत अधिक अच्छा रहेगा। मासफल सामान्य से शुभ। जब तक कोई बात पूरी तरह से स्पष्ट न हो जाए प्रतिक्रिया देने से बचें।

सिंह- प्रेम और दुलार से सजा उपहार लेकर आया जनवरी आपको प्रसन्नता से भरा रखने वाला है। किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति का जुड़ाव बढ़ सकता है। संबंधों में स्थायित्व बढ़ेगा। महत्वपूर्ण कार्यों को आगे बढ़ाने में जुटे रहें। पूर्वार्ध अपेक्षाकृत अधिक श्रेष्ठ रहने वाला है। उत्तरार्ध में खुद को बेहतर स्थिति में बनाए रखने पर जोर देंगे। बेधड़क आगे बढ़ें। मासफल श्रेष्ठ, वार्तालाप में नम्र बने रहेंगे तो जल्द सफल होंगे।

कन्या- सुख और सहजता को साथ लाया जनवरी माह रहन सहन को बढ़ावा देने वाला बना रह सकता है। अनुशासन और आज्ञाकारिता से बड़ों का दिल जीतने में सफल होंगे। प्रेम संबंधों को बल मिलेगा। प्रियजन के साथ श्रेष्ठ समय व्यतीत कर सकते हैं। उत्तरार्ध अपेक्षाकृत अधिक शुभकारक रहेगा। अतिगरिष्ठ भोजन और कड़वे वचनों से बचें। रक्त संबंधों का आदर करें, मासफल शुभफलकारक।

तुला- साहस, पहल और संपर्कों को बल देते आया जनवरी माह रचनात्मक बना रहेगा। जिम्मेदारी से अतिरिक्त और बेहतर करने पर जोर रहेगा। वाणिज्यिक कार्यों में रुचि बनी रहेगी। शानो-शौकत से जीना पसंद करेंगे। अपनों में प्रभाव बना रहेगा। महत्वपूर्ण कार्यों को पूर्वार्ध में बढ़ावा दें। जनसंपर्क और सूचनातंत्र बेहतर बना रहेगा। उत्तरार्ध में स्थान परिवर्तन की आशंका है। मासफल शुभकारक। खुलकर अपनी बात रखने की आदत को बढ़ावा दें।

वृश्चिक- खुशियां मनाने के ढेर सारे बहाने और अवसर संग आया जनवरी माह प्रभावशीलता को बढ़ावा देगा। संबंधों में सुधार और उनके बेहतर इस्तेमाल पर जोर रहेगा। मेलजोल में रुचि रहेगी। सभी परिचितों से जुड़े रहने पर जोर रहेगा। शुभ सूचना प्राप्त होगी। गणितीय कार्यों में रुचि बढ़ेगी। मासफल उत्तरोत्तर शुभकारक। पुराने मामले आंशिक असहजता बनाए रख सकते हैं। विवादों में पड़ने की अपेक्षा उनसे बच निकलने पर जोर दें।

धनु- भ्रमण-मनोरंजन और स्वप्रतिष्ठा को बढ़ावा देता आया। जनवरी माह उपलब्धियों को जुटाने में सहायक हो सकता है। पूछपरख और ख्याति में इजाफा होगा। अविस्मरणीय यात्रा का सुखद अनुभव प्राप्त हो सकता है। भव्य आयोजनों में जिम्मेदार दायित्व निभा सकते हैं। अपनों से करीबी बढ़ाने का अवसर मिलेगा। मासफल उत्तरोत्तर शुभकारक अति उत्साह से बचें। आय बढ़ाने पर जोर दें।

मकर- इच्छाओं को पूरा करने की सोच के साथ आया जनवरी माह शुभकार्यों की आय श्रेष्ठ कार्यों में खर्च करने के लिए प्रेरित करने वाला रहेगा। खुद को निखारने, संवारने पर जोर देंगे। पूर्वार्ध में तैयारियों पर अधिक जोर दें, ताकि उत्तरार्ध में अच्छे संकेतों और परिस्थितियों का अधिकाधिक दोहन कर सकें। अफवाहों पर भरोसा न करें। आर्थिक लेन-देन से बचें। उधारी से हर संभव दूर रहें। मासफल उत्तरोत्तर श्रेष्ठतावर्धक।

कुंभ:
इस महीने के प्रारंभिक चरण में संतान संबंधी खर्च में वृद्धि हो सकती है। संतान के स्वास्थ्य का ध्यान रखें। नौकरीपेशा लोग जल्दबाजी में निर्णय न लें। वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भी संभलकर बात करें तथा जहां टीमवर्क में काम पूरा करना का हो वहां आवश्यकता से अधिक गुस्से के स्थान पर विनम्रता बनाए रखें। यदि बाहर घूमने जा रहे हैं तो वाहन चलाने के दौरान धीरज रखें क्योंकि दुर्घटना का प्रबल योग बन रहा है। आपके भाग्य के आधार पर यह समय सामान्य रहेगा ऐसा दिखाई दे रहा है। कोई उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई नहीं दे रहा है।

मीन:
इस महीने आपका सरल और आनंदपूर्ण स्वभाव जिंदगी का पूरा मजा लेने में सहयोगी है। इस महीने विडंबना यह है कि सूर्य-राहु के साथ है जिसके कारण आपको वास्तव में खेलने के लिए मैदान प्राप्त करने अर्थात् अपनी भूमिका निभाने के लिए खूब मेहनत करनी पड़ेगी। परंतु आप चिंता न करें, आप स्थिति संभाल लेंगे। छोटी-बड़ी बातों से परेशान होने की जरूरत नहीं है। कल्याण केंद्र, हॉस्पीटल, धार्मिक स्थलों पर जाने का कार्यक्रम बनेगा। इसलिए खर्च होने की भी संभावना है। साथ ही साथ मानवजाति के विकास में भी रस लेंगे। इसके अलावा आपको इष्टजनों का ध्यान भी रखना पड़ेगा।
।।शुभमस्तु।।
।।कल्याण हो।।

अंक 25 : जानिए मानसिक रोग और ज्योतिष का सम्बंध

प्रिय मित्रों/पाठकों, मानसिक बीमारी होने के बहुत से कारण होते हैं, इन कारणों का ज्योतिषीय आधार क्या है, इसकी जानकारी के लिये कुंडली के उन योगों का अध्ययन करेंगे जिनके आधार पर मानसिक बिमारियों का पता चलता है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी जातक की जन्मकुंडली में शरीर के सभी अंगों का विचार तथा उनमें होने वाले रोगों या विकारों का विचार भिन्न-भिन्न भावों से किया जाता है। रोग तथा शरीर के अंगों के लिये लग्न कुण्डली में मस्तिष्क का विचार प्रथम स्थान से, बुद्धि का विचार पंचम भाव से तथा मनःस्थिति का विचार चन्द्रमा से किया जाता है। इस के अतिरिक्त शनि, बुध, शुक्र तथा सूर्य का मानसिक स्थिति को सामान्य बनाये रखने में विशेष योगदान है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि हम ज्योतिष की दृिष्टि से विचार करें तो मस्तिष्क (अवचेतन मस्तिष्क) Subconscious Mind का कारक ग्रह सूर्य है। जन्मकुण्डली में सूर्य तथा प्रथम स्थान पीड़ित हो तो, उस जातक में किसी हद तक गहरी सोच का आभाव होता है, अथवा वह गम्भीर प्रकृति का होता है, तथा मन (चेतन मस्तिष्क) Conscious Mind का कारक ग्रह चन्द्रमा है। ऐसा जातक मनमुखी होता है, जो भी मन में आता है वैसा ही करने लगता है। मन में आता है तो, नाचने लगता है, मन करता है तो गाने लगता है, परंतु उस समय की जरूरत क्या है? इसकी उसे फिक्र नहीं होती। विचित्र बाते करना, किसी एक ओर ध्यान जाने पर उसी प्रकार के कार्य करने लगता है। यह सब मनमुखी जातक के लक्षण हैं, ऐसे जातक की कुंडली में चन्द्रमा तथा कुण्डली के चतुर्थ व पंचम भाव पर पाप ग्रहों का प्रभाव होता है। इस के अलावा बुध विद्या देने वाला, गुरू ज्ञान देने वाला, तथा शनि वैराग्य देने वाले ग्रह हैं। किसी भी जातक की कुंडली में नवम् भाग्य का, तृतीय बल और पराक्रम का, एकादश लाभ का तथा सप्तम भाव वैवाहिक सुख के विचारणीय भाव होते हैं। यह सब ग्रहस्थितियाँ मन व मस्तिष्क पर किसी न किसी प्रकार से अपना प्रभाव ड़ालती हैं।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते हैं कि मानसिक बीमारी में चंद्रमा, बुध, चतुर्थ भाव व पंचम भाव का आंकलन किया जाता है. चंद्रमा मन है, बुध से बुद्धि देखी जाती है और चतुर्थ भाव भी मन है तथा पंचम भाव से बुद्धि देखी जाती है।

जन्मकुण्डली में छठा भाव बीमारी और अष्टम भाव मृत्यु और उसके कारणों पर प्रकाश डालते हैं। बीमारी पर उपचारार्थ व्यय भी करना होता है, उसका विचार जन्मकुण्डली के द्वादश भाव से किया जाता है। इन भावों में स्थित ग्रह और इन भावों पर दृष्टि डालने वाले ग्रह व्यक्ति को अपनी महादशा, अंतर्दशा और गोचर में विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। अनुभव पर आधारित जन्मकुण्डली में स्थित ग्रहों से उत्पन्न होने वाले रोगों का उल्लेख कर रहा हूँ। इन बीमारियों का कुण्डली से अध्ययन करके पूर्वानुमान लगाकर अनुकूल रत्न धारण करने, ग्रहशांति कराने एवं मंत्र आदि का जाप करने से बचा जा सकता है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि वैदिक ज्योतिष में मन का कारक ग्रह चंद्रमा माना गया है। उपरोक्त सभी शक्तियां मस्तिष्क (मन) के इसी भाग से मिलती हैं, उन्माद, आवेश आदि विकारों से ग्रसित भी यही होता है, डाक्टर इसी को निद्रित करके आप्रेशन करते हैं। किसी अंग विशेष में सुन्न करने की सूई लगाकर भी मस्तिष्क तक सूचना पहुँचाने वाले ज्ञान तन्तुओं को संज्ञाशून्य कर देते हैं, फलस्वरूप पीड़ा का अनुभव नहीं होता, और आप्रेशन कर लिया जाता है। पागलखानों में इसी चेतन मस्तिष्क का ही ईलाज होता है। अवचेतन की तो एक छोटी सी परत ही मानसिक अस्पतालों की पकड़ मे आई है, वे इसे प्रभावित करने में भी थोड़ा-बहुत सफल हुये हैं, किन्तु इसका अधिकांश भाग अभी भी डाक्टरों की समझ से परे है।

जब व्यक्ति भावुकता में बहकर मानसिक संतुलन खोता है तब उसमें पंचम भाव व चंद्रमा की भूमिका अहम मानी जाती है. सेजोफ्रेनिया बीमारी में चतुर्थ भाव की भूमिका मुख्य मानी जाती है. शनि व चंद्रमा की युति भी मानसिक शांति के लिए शुभ नहीं मानी जाती है. मानसिक परेशानी में चंद्रमा पीड़ित होना चाहिए।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रोगों की उत्पत्ति अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव से एवं पूर्वजन्म के अवांछित संचित कर्मो के प्रभाव से बताई गई है। अनिष्ट ग्रहों के निवारण के लिए पूजा, पाठ, मंत्र जप, यंत्र धारण, विभिन्न प्रकार के दान एवं रत्न धारण आदि साधन ज्योतिष शास्त्र में उल्लेखित है।
ग्रहों के अनिष्ट प्रभाव दूर करने के लिये रत्न धारण करने की बिल्कुल सार्थक है। इसके पीछे विज्ञान का रहस्य छिपा है और पूजा विधान भी विज्ञान सम्मत है। ध्वनि तरंगों का प्रभाव और उनका वैज्ञानिक उपयोग अब हमारे लिये रहस्यमय नहीं है। इस पर पर्याप्त शोध किया जा चुका है और किया जा रहा है। आज के भौतिक और औद्योगिक युग में तरह-तरह के रोगों का विकास हुआ है। रक्तचाप, डायबिटीज, कैंसर, ह्वदय रोग, एलर्जी, अस्थमा, माईग्रेन आदि औद्योगिक युग की देन है। इसके अतिरिक्त भी कई बीमारियां हैं, जिनकी न तो चिकित्सा शास्त्रियों को जानकारी है और न उनका उपचार ही सम्भव हो सका है। ज्योतिष शास्त्र में बारह राशियां और नवग्रह अपनी प्रकृति एवं गुणों के आधार पर व्यक्ति के अंगों और बीमारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मानव मस्तिष्क को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है, एक वह जिसमें बुद्धि कार्य करती है, सोचने-विचारने, तर्क विश्लेषण और निर्णय करने की क्षमता इसी में है, इसी को अवचेतन मस्तिष्क कहते हैं। ज्योतिष मतानुसार इसका कारक ग्रह सूर्य है। विचारशील (अवचेतन) मस्तिष्क रात्रि में सो जाता है, विश्राम ले लेता है, अथवा कभी-कभी नशा या बेहोशी की दवा लेने से मूर्छाग्रस्त हो जाता है। अवचेतन मस्तिष्क के इसी भाग के विकार ग्रस्त होने से जातक मूर्ख, मंद बुद्धि और अनपढ़ अविकसित मस्तिष्क वाला व्यक्ति या तो सुख के साधन प्राप्त नहीं कर पाता, और यदि कमाता भी है तो, उसका समुचित उपयोग करके सुखी नहीं रह पाता। सभी वस्तुयें उसके लिये जान का जंजाल बन जाती हैं। एेसे जातक मंदबुद्धि तो कहलाते हैं, परंतु इनमें शरीर के लिये भूख, मल-त्याग, श्वास-प्रश्वास, रक्तसंचार, तथा पलकों का झपकना आदि क्रियायें सामान्य ढंग से होती हैं। मस्तिष्क की इस विकृति का शरीर के सामान्य क्रम संचालन पर बहुत ही कम असर पड़ता है। मस्तिष्क का दूसरा भाग वह है, जिसमें आदतें संग्रहित रहती हैं, और शरीर के क्रियाकलापों का निर्देश निर्धारण किया जाता है।
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इन ज्योतिषीय योग से पहचाने मानसिक रोग को —
👉🏻👉🏻👉🏻 जातक पारिजात के अनुसार सूर्य और चंद्रमा एक साथ होकर लग्‍न में हो अथवा किसी एक त्रिकोण में हो और गुरू तीसरे स्‍थान में हो या केंद्र में हो तो जातक मंदबुद्ध‍ि होता है।
👉🏻👉🏻जन्म कुंडली में चंद्रमा अगर राहु के साथ है तब व्यक्ति को मानसिक बीमारी होने की संभावना बनती है क्योकि राहु मन को भ्रमित रखता है और चंद्रमा मन है. मन के घोड़े बहुत ज्यादा दौड़ते हैं. व्यक्ति बहुत ज्यादा हवाई किले बनाता है.

👉🏻👉🏻 यदि जन्म कुंडली में बुध, केतु और चतुर्थ भाव का संबंध बन रहा है और यह तीनों अत्यधिक पीड़ित हैं तब व्यक्ति में अत्यधिक जिदपन हो सकती है और वह सेजोफ्रेनिया का शिकार हो सकता है. इसके लिए बहुत से लोगों ने बुध व चतुर्थ भाव पर अधिक जोर दिया है.

👉🏻👉🏻जन्म कुंडली में गुरु लग्न में स्थित हो और मंगल सप्तम भाव में स्थित हो या मंगल लग्न में और सप्तम में गुरु स्थित हो तब मानसिक आघात लगने की संभावना बनती है.

👉🏻👉🏻जब जन्म कुंडली में शनि लग्न में और मंगल पंचम भाव या सप्तम भाव या नवम भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.

👉🏻👉🏻सूर्य और चंद्रमा एक साथ होकर लग्‍न में या फिर किसी त्रिकोण में एक साथ हों तथा गुरू तीसरे स्‍थान में हो या फिर वह भी केंद्र में हो तो जातक को मानस‍िक रोग होने की संभावना होती है।
👉🏻👉🏻👉🏻 कृष्ण पक्ष का बलहीन चंद्रमा हो और वह शनि के साथ 12वें भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग की संभावना बनती है. शनि व चंद्र की युति में व्यक्ति मानसिक तनाव ज्यादा रखता है.

👉🏻👉🏻जन्म कुंडली में शनि लग्न में स्थित हो, सूर्य 12वें भाव में हो, मंगल व चंद्रमा त्रिकोण भाव में स्थित हो तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.

👉🏻👉🏻👉🏻जन्म कुंडली में मांदी सप्तम भाव में स्थित हो और अशुभ ग्रह से पीड़ित हो रही हो.

👉🏻👉🏻 राहु व चंद्रमा लग्न में स्थित हो और अशुभ ग्रह त्रिकोण में स्थित हों तब भी मानसिक रोग की संभावना बनती है.

👉🏻👉🏻मंगल चतुर्थ भाव में शनि से दृष्ट हो या शनि चतुर्थ भाव में राहु/केतु अक्ष पर स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.

👉🏻👉🏻 जन्म कुंडली में शनि व मंगल की युति छठे भाव या आठवें भाव में हो रही हो.

👉🏻👉🏻 जन्म कुंडली में बुध पाप ग्रह के साथ तीसरे भाव में हो या छठे भाव में हो या आठवें भाव में हो या बारहवें भाव में स्थित हो तब भी मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.

👉🏻👉🏻यदि चंद्रमा की युति केतु व शनि के साथ हो रही हो तब यह अत्यधिक अशुभ माना गया है और अगर यह अंशात्मक रुप से नजदीक हैं तब मानसिक रोग होने की संभावना अधिक बनती है.

👉🏻👉🏻👉🏻जन्म कुंडली में शनि और मंगल दोनो ही चंद्रमा या बुध से केन्द्र में स्थित हों तब मानसिक रोग होने की संभावना बनती है.
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इन योग से बनता हैं सन्देह करने वाला–
👉🏻👉🏻यदि जन्म कुंडली मे चंद्रमा और बुध केंद्र में हो या शुभ नवांश में न हों तो जातक अत्‍यंत भ्रम वाला होता है अर्थात सभी बातों में संदेह करने वाला होता है।
👉🏻👉🏻यदि चंद्रमा पाप ग्रह के साथ हो और राहु लग्‍न से पांचवें, आठवें और बारहवें घर में हो तो जातक को मत भ्रष्‍ट होने का संदेह हमेशा रहता है।
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इन कारणों से होता हें मिरगी रोग (जानिए जन्म कुंडली में मिरगी रोग के लक्षण)—

इसके लिए चंद्र तथा बुध की स्थिति मुख्य रुप से देखी जाती है. साथ ही अन्य ग्रहों की स्थिति भी देखी जाती है.

1- शनि व मंगल जन्म कुंडली में छठे या आठवें भाव में स्थित हो तब व्यक्ति को मिरगी संबंधित बीमारी का सामना करना पड़ सकता है.

2- कुंडली में शनि व चंद्रमा की युति हो और यह दोनो मंगल से दृष्ट हो.

3- जन्म कुंडली में राहु व चंद्रमा आठवें भाव में स्थित हों.

4– चंद्रमा और बुध केंद्र में हो और उस पर पाप ग्रह की दृष्‍टि हो साथ ही पांचवें भाव या आठवें भाव में पाप ग्रह हो तो ऐसे जातक को मिर्गी की शिकायत होती है।
5- जब चंद्रमा शनि के साथ हो और उस पर मंगल की दृष्टि हो तो जातक कभी-कभी जन्‍म से पागल होता है।
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क्यों होते हैं मानसिक रुप से कमजोर बच्चे अथवा मंदबुद्धि बच्चे–

जन्म के समय लग्न अशुभ प्रभाव में हो विशेष रुप से शनि का संबंध बन रहा हो. यह संबंध युति, दृष्टि व स्थिति किसी भी रुप से बन सकता है.

1- शनि पंचम से लग्नेश को देख रहा हो तब व्यक्ति जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.

2- जन्म के समय बच्चे की कुण्डली में शनि व राहु पंचम भाव में स्थित हो, बुध बारहवें भाव में स्थित हो और पंचमेश पीड़ित अवस्था में हो तब बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.

3- पंचम भाव, पंचमेश, चंद्रमा व बुध सभी पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तब भी बच्चा जन्म से ही मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.

4- जन्म के समय चंद्रमा लग्न में स्थित हो और शनि व मंगल से दृष्ट हो तब भी व्यक्ति मानसिक रुप से कमजोर हो सकता है.

5- पंचम भाव का राहु भी व्यक्ति की बुद्धि को भ्रष्ट करने का काम करता है, बुद्धि अच्छी नहीं रहती है.
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कैसे करें मानसिक रोग की (भूलने की बीमारी) रत्न चिकित्सा :-

पण्डित दयानन्द शास्त्री के विचार से मानसिक बीमारियों के निवारण हेतु बुध को बल प्रदान करना सर्वथा उपयुक्त होगा I ऐसे व्यक्ति को पन्ना रत्न की अंगूठी चाँदी में बनवाकर दाहिने हाथ की कनिष्ठा अंगुली में धारण करना चाहिए I कुछ विशेष परिस्थितिओं में गले में भी धारण किया जा सकता है I पन्ना का भष्म आदि भी खिलाना लाभप्रद होगा I प्रज्ञा मन्त्र का अनुष्ठान एवं अपामार्ग की लता से हवन भी कराना चाहिए I

मानसिक रोग में बीती हुई बहुत सी घटनाएं अथवा बातें याद नहीं रहती है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कुण्डली में जब लग्न और लग्नेश पाप पीड़ित होते हैं तो इस प्रकार की स्थिति होती है.सूर्य और बुध जब मेष राशि में होता है और शुक्र अथवा शनि उसे पीड़ित करते हैं तो स्मृति दोष की संभावना बनती है.साढे साती के समय जब शनि की महादशा चलती है उस समय भी भूलने की बीमारी की संभावना प्रबल रहती ह.रत्न चिकित्सा पद्धति के अनुसार मोती और माणिक्य धारण करना इस रोग मे लाभप्रद होता है I
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उपरोक्त रोग पूर्व जन्म में किये गए पापों से उत्पन्न होते हैं इन्हें दूर करने के लिए दवाइयां, दान, मंत्र, जप, पूजा, अनुष्ठान करने चाहिए. तथा गलत काम करने से भी बचना चाहिए. तभी पापों के दुष्प्रभाव से मुक्त मिलेगी।
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मानसिक बीमारी का इलाज—

मानसिक रोग का उपचार आपकी मानसिक बीमारी के प्रकार और इसकी गंभीरता पर निर्भर करता है। कई चिरकारी बीमारियों की तरह मानसिक बीमारी को चलते इलाज की आवश्यकता होती है।
एलोपैथी तुरंत नतीजों के साथ विशिष्ट लक्षणों का उपचार करती है, जबकि आयुर्वेद इस मान्यता पर काम करता है कि तमाम विकार (भौतिक और मानसिक) ऊपर उल्लिखित एक या उससे ज़्यादा कारणों में असंतुलन से पैदा होते हैं. प्रभावी उपचार, डॉक्टरों के मुताबिक, एक समग्र नज़रिए से ही संभव है. इसी नज़रिए की वजह से मनोचिकित्सक ये मानते हैं कि आयुर्वेद में वैकल्पिक उपचार की संभावना भले न हो लेकिन एक पूरक उपचार के रूप में वो मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दो के लिए उपयोगी हो सकती है।
कई मानसिक स्थितियों का इलाज एक या अधिक निम्नलिखित उपचारों के साथ किया जा सकता है:
1. मनोवैज्ञानिक चिकित्सा: डॉक्टर, मनोवैज्ञानिक या अन्य स्वास्थ्य पेशेवर व्यक्तियों से उनके लक्षणों और चिंताओं के बारे में बात करते हैं और उनके बारे में सोचने और प्रबंधित करने के नए तरीकों की चर्चा करते हैं।
2. औषधि-प्रयोग: कुछ लोगों को कुछ समय तक दवा लेने से मदद मिलती है; और दूसरों को निरंतर आधार पर आवश्यकता हो सकती है।
3. सामुदायिक सहायता कार्यक्रम: सहायता कार्यक्रम विशेष रूप से आवर्ती लक्षण वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं या जिनकी मानसिक विकलांगता है। इस समर्थन में जानकारी, आवास, उपयुक्त कार्य, प्रशिक्षण और शिक्षा, मनोवैज्ञानिक पुनर्वास और आपसी सहायता समूहों को खोजने में सहायता शामिल हो सकती है।
4. औषधि-प्रयोग हालांकि मनोरोग दवाएं मानसिक बीमारी का इलाज नहीं करती हैं, वे अक्सर लक्षणों में काफी सुधार कर सकते हैं। मनश्चिकित्सा दवाएं अन्य उपचारों जैसे मनोचिकित्सा को अधिक प्रभावी बनाने में मदद कर सकती हैं।
सबसे सामान्यतः इस्तेमाल की जाने वाली कक्षाओं में से कुछ में शामिल हैं:
5. एंटी-डिप्रेसन्ट दवाएं: अवसाद, चिंता और कभी-कभी अन्य परिस्थितियों का इलाज करने के लिए एंटीडिप्रेसन्ट का उपयोग किया जाता है। वे उदासी, निराशा, ऊर्जा की कमी, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और गतिविधियों में रुचि की कमी जैसे लक्षणों को सुधारने में सहायता कर सकते हैं। एंटीडिप्रेसन्ट की लत नहीं हैं और निर्भरता नहीं पैदा करते हैं।
6. एंटी-व्यग्रता दवाएं: इन दवाओं का उपयोग चिंता विकारों के इलाज के लिए किया जाता है, जैसे कि सामान्यकृत चिंता विकार या आतंक विकार। वे व्याकुलता और अनिद्रा को कम करने में भी मदद कर सकते हैं दीर्घकालिक एंटी-डेंटिटी ड्रग्स आमतौर पर एंटीडिप्रेसन्ट होते हैं जो चिंता के लिए भी काम करती हैं। दीर्घकालिक एंटी-व्यग्रता ड्रग्स आमतौर पर एंटी-डिप्रेसन्ट होते हैं जो चिंता के लिए भी काम करती हैं।
7. मूड स्थिर करने वाली दवाएं: मनोदशा स्टेबलाइजर्स का उपयोग आमतौर पर द्विध्रुवी विकारों के इलाज के लिए किया जाता है, जिसमें उन्माद और अवसाद के वैकल्पिक एपिसोड शामिल होते हैं। अवसाद का इलाज करने के लिए कभी-कभी मूड स्टेबलाइजर्स का इस्तेमाल एंटीडिप्रेसन्ट के साथ किया जाता है।
8. मनोविकार की दवाएं: मनोवैज्ञानिक दवाओं का प्रयोग आमतौर पर मनोवैज्ञानिक विकारों, जैसे कि सिज़ोफ्रेनिया के इलाज के लिए किया जाता है। मनोवैज्ञानिक दवाओं का उपयोग द्विध्रुवी विकारों के इलाज के लिए भी किया जा सकता है या अवसाद का इलाज करने के लिए एंटीडिप्रेसन्ट के साथ प्रयोग किया जा सकता है।
9. मनोचिकित्सा: मनोचिकित्सा, जिसे टॉक-थेरेपी भी कहा जाता है, में आपकी स्थिति और मानसिक स्वास्थ्य प्रदाता के साथ संबंधित मुद्दों के बारे में बात करना शामिल है। मनोचिकित्सा के दौरान, आप अपनी स्थिति और आपके मूड, भावनाओं, विचारों और व्यवहार के बारे में जानें। अंतर्दृष्टि और ज्ञान आपको लाभ के साथ, आप मुकाबला और तनाव प्रबंधन कौशल सीख सकते हैं। अंतर्दृष्टि और ज्ञान से, आप तनाव से निपटने और उसका प्रबंधन करना सीख सकते हैं।
मनोचिकित्सा अक्सर कुछ महीनों में सफलतापूर्वक पूरा हो सकता है, लेकिन कुछ मामलों में, दीर्घकालिक उपचार की आवश्यकता हो सकती है।
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आयुर्वेद और मानसिक स्वास्थ्य–

“आयुर्वेद, अवसाद, चिंता और ओसीडी जैसे विकारों में एलोपैथी के एक पूरक उपचार के रूप में काफी महत्त्वपूर्ण नतीजे देता है. इस तरह के अध्ययन हुए हैं जिनमें पता चला है कि आयुर्वेद की दवा की खुराक को बढ़ाने के साथ मरीज में एलोपैथी की दवा की खुराक की निर्भरता कम होती गई है,” ये कहना है डॉ डी सुधाकर का जो निमहान्स में एडवान्स्ड सेंटर फ़ॉर आयुर्वेद में असिस्टेंट डायरेक्टर हैं. वो कहते हैं कि ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें एलोपैथी दवाओँ पर निर्भरता पूरी तरह खत्म कर गई है.

आयुर्वेदिक दवाएं मरीज़ में एक समग्र बदलाव लाती हैं जबकि एलोपैथी विकार के विशिष्ट लक्षणों पर ही काम करती है. आयुर्वेद पारम्परिक खानपान और जीवनशैली पर ज़ोर देता है और इसके अलावा योग, व्यायाम और हर्बल उपचार भी उसमें शामिल हैं. ये एक वैकल्पिक उपचार के रूप में प्रमाणित हैं जिसमें न सिर्फ शारीरिक और मनोवैज्ञानिक विकारों का उपचार शआमिल है बल्कि ये आगामी बीमारियों से भी निजाते दिलाने के लिए व्यक्ति की जीवनशैली में बदलाव लाता है.

स्वास्थ्य को लेकर आयुर्वेद की अपनी परिभाषा है, जिसमें एक स्वस्थ दिलोदिमाग का एक महत्त्वपूर्ण रोल है. एक समग्र विज्ञान के रूप में, आयुर्वेद मन, शरीर और आत्मा और इन्द्रियों और उनकी कार्यप्रणाली के बीच एक पारस्परिक संबंध की पड़ताल करता है. ये मानसिक सेहत में निम्न तरीकों से सुधार की दिशा में काम करता हैः

मनुष्य मन यानी मानस, आत्मा, शरीर और इन्द्रियों का एक संगठन है. इसमें शामिल हैं मनोवैज्ञानिक इन्द्रियां जिन्हें ज्ञानेन्द्रियां कहते हैं, और शारीरिक अंग जिन्हें कर्मेन्द्रियां कहते हैं. इन प्राथमिक घटकों की पारस्पारिकता ही व्यक्ति के स्वास्थ्य का संचालन करती है.

मानस तीन क्रियात्मक गुणो से बनता हैः सत्व, रज और तम. इन गुणों स व्यक्ति का तत्व यानी चरित्र परिभाषित होता है. सत्व गुण तमाम अच्छी चीज़ों का समुच्चय है- आत्म नियंत्रण, ज्ञान, जीवन में सही और गलत की समझ. रज गुण गतिशील होते हैं, हिंसा, ईर्ष्या, प्राधिकार, इच्छा और दुविधा इसमें आते हैं. तम गुण की विशेषताएं हैं सुस्ती, निष्क्रियता, नींद और बेसुधी. इन गुणों में रज और तम को मनोदशा के रूप में रेखांकित किया जाता है. सत्व, रज और तम मानसिक बीमारियों के लिए जिम्मेदार हैं जिन्हें मनोविकार कहा जाता है।
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इन ज्योतिषीय उपायों से रखें खुद को और अपने परिवार को बीमारियों से दूर–

  1. पीपल के पेड़ पर रविवार को छोड़कर हर दिन जल चढ़ाएं। साथ ही इस वृक्ष की परिक्रमा करें। पुरुष सात बार परिक्रमा करें किन्तु महिलाएं परिक्रमा न करें।
  2. हर पूर्णिमा पर भोलेनाथ को जल चढ़ाएं।
  3. अमावस्या को प्रात: मेहंदी का दीपक पानी मिला कर बनाएं। चौमुंहा दीपक बनाकर उसमें 7 उड़द के दाने, कुछ सिन्दूर, 2 बूंद दही डाल कर 1 नींबू की दो फांकें शिवजी या भैरों जी के चित्र का पूजन कर, जला दें।
  4. महामृत्युजंय मंत्र की एक माला या बटुक भैरव स्रोत का पाठ करने रोग-शोक दूर होते हैं।
  5. पीड़ित को पक्षियों, पशुओं और रोगियों की सेवा करनी चाहिए। इससे बीमारी के आलावा, भूत बाधा भी दूर होते हैं साथ ही मानसिक शान्ति का भी अनुभव होता है।
  6. पीने के पानी में थोड़ा गंगा जल मिलाकर पीने से भी रोगी को शीघ्र लाभ मिलता है।
  7. प्रत्येक मंगलवार को बजरंबली को सिन्दूर चढ़ाएं और बजरंबली से जल्द ही स्वस्थ होने की प्रार्थना करें। साथ ही वह सिन्दूर रोगी भी लगाए।
  8. शुक्ल पक्ष को सोमवार के दिन सात जटा वाले नारियल लेकर ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करते हुए नदी में प्रवाहित करें। इससे रोग अौर दरिद्रता दोनों ही दूर हो जाएंगे।
  9. तकिए के नीचे सहदेई अैर पीपल की जड़ रखें, इससे लम्बे समय से चली आ रही बीमारी से छुटकारा मिल जाएगा।
  10. दान पुण्य करने से भी बहुत लाभ होता है।

अंक 24 : क्या होता है कालसर्प, दोष अथवा योग? या फिर केवल एक भ्रम, निवारण सहित जानिए…

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प्रिय पाठकों/मित्रों, कालसर्प योग अथवा दोष के बारे में अनेकानेक लेख प्रकाशित हो चुके हैं और भविष्य में भी होते रहेगें लेकिन वास्तविकता में कालसर्प दोष होता भी है या ज्योतिषियों तथा पंडितों की केवल कमाई का साधन ये योग बना हुआ है क्योंकि भारतीय ज्योतिष में या पराशर जी द्वारा कहीं भी “कालसर्प” दोष या योग का जिक्र नहीं किया गया है, पर सर्पदोष का वर्णन जरुर मिलता है जो एक अलग प्रकार का योग है। जिस प्रकार नाभस योग बनते हैं (जो जन्म कुंडली में ग्रहों की स्थिति पर आधारित होते हैं) उन्हीं नाभस योगों के आधार पर ही कालसर्प योग भी ग्रहों की आकाशीय स्थिति है।

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जानिए कुंडली में कैसे बनता है “कालसर्प योग”?

जब जन्म कुंडली में सारे ग्रह राहु से केतु के मध्य आ जाते हैं तब इस स्थिति को कालसर्प दोष का नाम दिया जाता है। कालसर्प की गणना कब ज्योतिषी करने लगे ये बताना कठिन है और किसने आरंभ की ये कहना भी मुश्किल हैं किन्तु ये तय है कि उत्तर भारतीय ज्योतिषी इस दोष को कुछ वर्ष पहले से जानते हैं। इस योग का प्रचार दक्षिण भारत में ज्यादा मिलता है और धीरे-धीरे यह पूरे भारत में फैल गया।

यह एक ऐसा योग है जो जातक के पूर्व जन्म के किसी जघन्य अपराध के दंड या शाप के फलस्वरूप उसकी जन्मकुंडली में परिलक्षित होता है। व्यावहारिक रूप से पीड़ित व्यक्ति आर्थिक व शारीरिक रूप से परेशान तो होता ही है, मुख्य रूप से उसे संतान संबंधी कष्ट होता है। या तो उसे संतान होती ही नहीं, या होती है तो वह बहुत ही दुर्बल व रोगी होती है। उसकी रोजी-रोटी का जुगाड़ भी बड़ी मुश्किल से हो पाता है।

धनाढय घर में पैदा होने के बावजूद किसी न किसी वजह से उसे अप्रत्याशित रूप से आर्थिक क्षति होती रहती है। तरह तरह के रोग भी उसे परेशान किये रहते हैं।

कालसर्प दोष में राहु को साँप का मुख तो केतु को पूँछ माना गया है। यदि किसी की कुंडली में यह योग बन भी रहा है तो जरुरी नहीं कि ये सदा हानि ही पहुंचाएगा क्योंकि वर्तमान समय में जो टेक्नॉलॉजी है वह राहु के अधिकार में आती है तब राहु को बुरा नहीं कहा जा सकता है। जीवन में आ रही हर समस्या की जड़ “कालसर्प” नहीं कालसर्प राहु/केतु से बनने वाला योग है और किसी भी जातक को यदि लगता है कि उसके जीवन में जो रुकावट अथवा बाधा आ रही है वह इस योग की वजह से आ रही है तब उसे सबसे पहले यह समझना होगा कि जो भी जातक जन्म लेता है वह अपने पूर्व जन्म के बहुत से कर्म साथ लेकर पैदा हो रहा है जिन्हें संचित कर्म कहते हैं, जिनसे वह जन्मों तक बंधा रहता है। जो कर्म वह भोग रहा हैं वह जातक का प्रारब्ध कहलाता है और जो कर्म वर्तमान में जातक कर रहा है वह क्रियमाण कर्म कहलाता है। हर व्यक्ति अपनी कुंडली में अच्छे व बुरे कर्म लेकर पैदा होता है और उन कर्मों का फल(अच्छा या बुरा) ग्रह की दशा-अन्तर्दशा में मिलता है। किसी भी व्यक्ति के संचित कर्म कैसे हैं वह कुंडली के योग बताते हैं। जो दशा-अन्तर्दशा जातक भोगता है और उसी के अनुसार फल पाता है तो वह प्रारब्ध के कर्म बताती है। जो क्रियमाण कर्म जातक कर रहा है वह ग्रहों का गोचर बताता है क्योंकि पहले कुंडली का योग हैं फिर योग में शामिल ग्रह की दशा है और अंत में दशा का फल ग्रहों का गोचर प्रदान करता है। इस प्रकार तीनों बातें परस्पर संबंध बनाती हैं या ये भी कहा जा सकता है कि तीनों बातें एक-दूसरे की पूरक हैं। अब कोई भी अच्छे या बुरे फल मिल रहे हैं तब उसका सारा दोष कालसर्प योग पर नहीं मढ़ देना चाहिए क्योंकि जन्म कुंडली का उचित विश्लेषण अति आवश्यक है।

परंतु याद रहे, कालसर्प योग वाले सभी जातकों पर इस योग का समान प्रभाव नहीं पड़ता। किस भाव में कौन सी राशि अवस्थित है और उसमें कौन-कौन ग्रह कहाँ बैठे हैं और उनका बलाबल कितना है – इन सब बातों का भी संबंधित जातक पर भरपूर असर पड़ता है। इसलिए मात्र कालसर्प योग सुनकर भयभीत हो जाने की जरूरत नहीं बल्कि उसका ज्योतिषीय विश्लेषण करवाकर उसके प्रभावों की विस्तृत जानकारी हासिल कर लेना ही बुद्धिमत्ता कही जायेगी। जब असली कारण ज्योतिषीय विश्लेषण से स्पष्ट हो जाये तो तत्काल उसका उपाय करना चाहिए।

यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में ये योग बन भी रहा है और राहु की दशा भी चल रही है तो ये उसकी कुंडली का “योग” है जिसका फल उसे भुगतना पड़ रहा है।

ध्यान रखें,कालसर्प योग सदा अशुभ नहीं होता है कई बार ये शुभ फल भी प्रदान करता है। राहु/केतु का अपना कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है और ये जिस राशि में बैठते हैं उस राशि के स्वामी की जन्म कुंडली मैं स्थिति के आधार पर अपना फल प्रदान करते हैं। वैसे राहु को शनि की तरह माना जाता है और केतु को मंगल की तरह माना जाता है।
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जानिए राहु और केतु कब देता है बुरे फल?

जन्म कुंडली में यदि राहु के साथ सूर्य, चन्द्र या गुरु स्थित है और वह कालसर्प योग बना रहा है तब यह शुभ फलों में कमी कर सकता है इसलिए नहीं कि ये योग बना है इसलिए कि सूर्य/चन्द्र, राहु के साथ ग्रहण योग बनाते हैं जो अशुभ योग है। सूर्य आत्मा तो चंद्र मन है जबकि राहु का कोई अस्तित्व ही नहीं है वह तो धुँआ भर है। जब चारों ओर धुँआ छाया होगा तब कैसे आत्मा का निखार होगा और कैसे हमारा मन निर्मल हो पाएगा। इस धुँए में व्यक्ति को कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देगा तो अनिर्णय की स्थिति में रहेगा और जब निर्णय ही नहीं ले पाएगा तो जीवन थमा सा लगेगा ही। दूसरा ये कि राहु धुँआ-सा है तो व्यक्ति को स्पष्ट परिस्थितियाँ दिखाई नहीं देती जिससे उसके द्वारा लिए निर्णय सही नहीं हो पाते और जीवन में बाधाएं तथा हानि होती है। पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जब यही राहु गुरु के साथ रहकर इस योग को बना है तब मन में सही-गलत को लेकर कशमकश सी चलती रहती है क्योंकि गुरु ज्ञान का कारक है वह व्यक्ति को गलत करने से रोकता है लेकिन राहु का प्रभाव इतना ज्यादा हो जाता है वह ज्ञानी को भी अज्ञानी बना देता है और जातक परंपरा से हटकर कार्य कर बैठता है।
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जानिए इन ज्योतिषीय संभावनाओं को जब जन्म कुण्डली में बनता है कालसर्प योग(कालसर्प दोष)—

👉🏻👉🏻जब राहु के साथ चंद्रमा लग्न में हो और जातक को बात-बात में भ्रम की बीमारी सताती रहती हो, या उसे हमेशा लगता है कि कोई उसे नुकसान पहुँचा सकता है या वह व्यक्ति मानसिक तौर पर पीड़ित रहता है।
👉🏻👉🏻जब लग्न में मेष, वृश्चिक, कर्क या धनु राशि हो और उसमें बृहस्पति व मंगल स्थित हों, राहु की स्थिति पंचम भाव में हो तथा वह मंगल या बुध से युक्त या दृष्ट हो, अथवा राहु पंचम भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक की संतान पर कभी न कभी भारी मुसीबत आती ही है, अथवा जातक किसी बड़े संकट या आपराधिक मामले में फंस जाता है।
👉🏻👉🏻जब कालसर्प योग में राहु के साथ शुक्र की युति हो तो जातक को संतान संबंधी ग्रह बाधा होती है।
👉🏻👉🏻जब लग्न व लग्नेश पीड़ित हो, तब भी जातक शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान रहता है।
👉🏻👉🏻चंद्रमा से द्वितीय व द्वादश भाव में कोई ग्रह न हो। यानी केंद्रुम योग हो और चंद्रमा या लग्न से केंद्र में कोई ग्रह न हो तो जातक को मुख्य रूप से आर्थिक परेशानी होती है।
👉🏻👉🏻जब राहु के साथ बृहस्पति की युति हो तब जातक को तरह-तरह के अनिष्टों का सामना करना पड़ता है।
👉🏻👉🏻जब राहु की मंगल से युति यानी अंगारक योग हो तब संबंधित जातक को भारी कष्ट का सामना करना पड़ता है।
👉🏻👉🏻जब राहु के साथ सूर्य या चंद्रमा की युति हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, शारीरिक व आर्थिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।
👉🏻👉🏻जब राहु के साथ शनि की युति यानी नंद योग हो तब भी जातक के स्वास्थ्य व संतान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी कारोबारी परेशानियाँ बढ़ती हैं।
👉🏻👉🏻जब राहु की बुध से युति अर्थात जड़त्व योग हो तब भी जातक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, उसकी आर्थिक व सामाजिक परेशानियाँ बढ़ती हैं।
👉🏻👉🏻जब अष्टम भाव में राहु पर मंगल, शनि या सूर्य की दृष्टि हो तब जातक के विवाह में विघ्न, या देरी होती है।
👉🏻👉🏻यदि जन्म कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में और राहु बारहवें भाव में स्थित हो तो संबंधित जातक बहुत बड़ा धूर्त व कपटी होता है। इसकी वजह से उसे बहुत बड़ी विपत्ति में भी फंसना पड़ जाता है।
👉🏻👉🏻जब लग्न में राहु-चंद्र हों तथा पंचम, नवम या द्वादश भाव में मंगल या शनि अवस्थित हों तब जातक की दिमागी हालत ठीक नहीं रहती। उसे प्रेत-पिशाच बाधा से भी पीड़ित होना पड़ सकता है।
जब दशम भाव का नवांशेश मंगल/राहु या शनि से युति करे तब संबंधित जातक को हमेशा अग्नि से भय रहता है और अग्नि से सावधान भी रहना चाहिए।
👉🏻👉🏻जब दशम भाव का नवांश स्वामी राहु या केतु से युक्त हो तब संबंधित जातक मरणांतक कष्ट पाने की प्रबल आशंका बनी रहती है।
👉🏻👉🏻जब राहु व मंगल के बीच षडाष्टक संबंध हो तब संबंधित जातक को बहुत कष्ट होता है। वैसी स्थिति में तो कष्ट और भी बढ़ जाते हैं जब राहु मंगल से दृष्ट हो।
👉🏻👉🏻जब लग्न मेष, वृष या कर्क हो तथा राहु की स्थिति 1ले 3रे 4थे 5वें 6ठे 7वें 8वें 11वें या 12वें भाव में हो। तब उस स्थिति में जातक स्त्री, पुत्र, धन-धान्य व अच्छे स्वास्थ्य का सुख प्राप्त करता है।
जब राहु छठे भाव में अवस्थित हो तथा बृहस्पति केंद्र में हो तब जातक का जीवन खुशहाल व्यतीत होता है।
👉🏻👉🏻जब राहु व चंद्रमा की युति केंद्र (1ले 4थे 7वें 10वें भाव) या त्रिकोण में हो तब जातक के जीवन में सुख-समृद्धि की सारी सुविधाएं उपलब्ध हो जाती हैं।
👉🏻👉🏻जब शुक्र दूसरे या 12वें भाव में अवस्थित हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
जब बुधादित्य योग हो और बुध अस्त न हो तब जातक को अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
👉🏻👉🏻जब लग्न व लग्नेश सूर्य व चंद्र कुंडली में बलवान हों साथ ही किसी शुभ भाव में अवस्थित हों और शुभ ग्रहों द्वारा देखे जा रहे हों। तब कालसर्प योग की प्रतिकूलता कम हो जाती है।
👉🏻👉🏻जब दशम भाव में मंगल बली हो तथा किसी अशुभ भाव से युक्त या दृष्ट न हो। तब संबंधित जातक पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता।
👉🏻👉🏻जब शुक्र से मालव्य योग बनता हो, यानी शुक्र अपनी राशि में या उच्च राशि में केंद्र में अवस्थित हो और किसी अशुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट न हो रहा हो। तब कालसर्प योग का विपरत असर काफी कम हो जाता है।
जब शनि अपनी राशि या अपनी उच्च राशि में केंद्र में अवस्थित हो तथा किसी अशुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट न हों। तब काल सर्प योग का असर काफी कम हो जाता है।
👉🏻👉🏻जब मंगल की युति चंद्रमा से केंद्र में अपनी राशि या उच्च राशि में हो, अथवा अशुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हों। तब कालसर्प योग की सारी परेशानियां कम हो जाती हैं।
👉🏻👉🏻जब राहु अदृश्य भावों में स्थित हो तथा दूसरे ग्रह दृश्य भावों में स्थित हों तब संबंधित जातक का कालसर्प योग समृध्दिदायक होता है।
👉🏻👉🏻जब राहु छठे भाव में तथा बृहस्पति केंद्र या दशम भाव में अवस्थित हो तब जातक के जीवन में धन-धान्य की जरा भी कमी महसूस नहीं होती।
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जानिए हमेशा बुरा नहीं होता कालसर्प योग —

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यह कालसर्प योग व्यक्ति को शिखर तक भी ले जाता है। जब केन्द्र में राहु स्थित है तब यह अपनी अशुभता भूल जाता है और अच्छे फल प्रदान करता है। जब राहु केन्द्र में त्रिकोण भावों के स्वामी के साथ स्थित है तब यह राजयोगकारी हो जाता है और शुभ फल देता है। जब राहु त्रिकोण में स्थित होकर केन्द्र के स्वामी से संबंध बनाता है तब भी यह राजयोगकारी हो जाता है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि राहु यदि मेष, वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, मकर, कुंभ में है तब भी अच्छा कहा जाता है विशेषकर मेष, वृष व कर्क का राहु।

यदि दशम भाव में राहु स्थित है तब व्यक्ति अपने कैरियर में शिखर तक पहुंचता है। तृतीय भाव में राहु स्थित होने से व्यक्ति कभी हार मानता ही नहीं है क्योंकि यहाँ राहु उसे सदा आगे बढ़ने को प्रेरित करता है।

राहु के बारे में एक भ्राँति यह भी है कि पंचम भाव में स्थित राहु संतान हानि करता है लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि पंचम भाव का राहु एक पुत्र संतति भी प्रदान करता है। छठे भाव में स्थित राहु कभी शत्रुओं को जातक पर हावी नहीं होने देता है। इसलिए व्यक्ति को जीवन में बाधाएँ आती हैं, धन हानि होती है या अन्य कोई भी घटना घटती है तब उसका सारा दोष इस कालसर्प दोष पर नहीं थोपना चाहिए क्योंकि अगर ये बन रहा है तो आपका कर्म है और यदि इस योग में शामिल राहु या केतु की दशा आती है तब पूर्व जन्मों के संचित कर्मों के कारण आपको इसे भोगना भी पड़ेगा।
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इन सरल उपायों द्वारा पाएं कालसर्प योग/दोष से मुक्ति ….

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि किसी जातक( व्यक्ति) को लगता है कि कालसर्प योग होता ही है और उसी के कारण उसे बाधा आ रही है तब आवश्यक नहीं कि उसके निवारण के लिए वह सिद्धवट,(उज्जैन), नारायणी शिला-हरिद्वार, पिचाश मोचनि कुंड- वाराणसी, ब्रह्म सरोवर- पुष्कर, काल हस्ती-तमिलनाडु, मातृ गया- गुजरात, बिहार के गया तीर्थ ओर कुरुक्षेत्र-हरियाणा स्थित सरोवर आदि स्थानों पर जाकर इसकी वैदिक विधि विधान से पूजा कराकर आए।

जैसा कि बताया गया है कि राहु साँप का मुख तो केतु पूँछ है और यह साँप भगवान शंकर के गले की शोभा बढ़ाता है, उनके गले का हार है इसलिए कालसर्प दोष का सर्वोत्तम उपाय शिव की पूजा-उपासना से बढ़कर कोई दूसरा नहीं हैं। शिवलिंग पर नियमित जलाभिषेक से जातक को राहु के प्रकोप से राहत मिलती है। व्यक्ति नियमित रूप से रुद्री पाठ कर सकता है, मासिक शिवरात्रि का उपवास रख सकता है। प्रतिदिन एक माला “ऊँ नम: शिवाय” की कर सकते है अथवा महामृत्युंजय मंत्र की एक माला नियमित रूप से करने पर भी व्यक्ति को राहत मिलती है।

इसके साथ साथ चंदन से बनी वस्तुओं का उपयोग करने से मन शांत होता है और भ्रम की स्थिति से व्यक्ति बचता है। शनिवार के दिन राहु के नाम का दान भी दिया जा सकता है विशेषकर जो कुष्ठ रोगी होते हैं उन्हें खाने-पीने की वस्तुएँ दान की जाएँ।

रात्रि में राहु के मंत्र की एक माला करने से भी राहु शांत होता है। राहु की एक खासियत यह भी है कि जो व्यक्ति इसकी दशा/अन्तर्दशा में जितना भयभीत होता है यह ग्रह उसे और अधिक डराने का काम करते हैं।

इसलिए बिना डरे व्यक्ति को अपना कर्म करते रहना चाहिए और ईश्वर का भजन करना चाहिए।

यदि किसी बात को लेकर अनिर्णय की स्थिति बनी हुई है तब किसी योग्य एवम अनुभवी ज्योतिषी से अवश्य परामर्श कर लेना चाहिए।

अंक 23 : जानिए क्या होता है अगर जन्म कुंडली में सूर्य शुभ स्थिति में हो तो ??
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यदि जन्म कुण्डली में सूर्य अशुभ हो तो क्या होता है?
क्या मिलता है मान-सम्मान और बड़ा पद अशुभ सूर्य के कारण??

प्रिय मित्रों/पाठकों,ज्‍योतिष शास्‍त्र में सूर्य का बहुत ही महत्‍व है। दरअसल सूर्य नौ ग्रहों में राजा है और मनुष्‍य की आत्‍मा का कारक है। पुराणों के अनुसार सूर्य देवता के पिता का नाम महर्षि कश्यप व माता का नाम अदिति है। इनकी पत्नी का नाम संज्ञा है, जो विश्वकर्मा की पुत्री है। संज्ञा से यम नामक पुत्र और यमुना नामक पुत्री तथा इनकी दूसरी पत्नी छाया से इनको एक महान प्रतापी पुत्र हुए जिनका नाम शनि है। कहते हैं यदि कुंडली में सूर्य शुभ स्थिति में है, तो जातक के जीवन को भाग्‍य, लक्ष्‍मी, आरोग्‍य, मान सम्‍मान, यश और कीर्ति से भर देता है, लेकिन कुंडली में यदि सूर्य खराब है तो अपनी अशुभ स्थिति के चलते जातक को न केवल रोगी बना देता है बल्कि मान सम्‍मान, आत्‍मविश्‍वास में भी कमी देता है।

सूर्य सफलता का कारक हैं और अगर कुंडली में सूर्य देव कमज़ोर स्थिति में बैठे हों तो जातक का पूरा जीवन अस्‍त व्‍यस्‍त हो जाता है। ज्‍योतिष के अनुसार मनुष्‍य के जीवन पर ग्रहों का महत्‍वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

किसी को शुभ ग्रह मालामाल बना देते हैं तो किसी को कंगाल बनाने में भी देर नहीं लगाते। सौरमंडल में नौ ग्रह हैं और ये नौ ग्रह किसी ना किसी तरह मनुष्‍य के जीवन पर अच्‍छा और बुरा प्रभाव डालते ही हैं।

कोई ग्रह करियर पर प्रभाव डालता है तो कोई मनुष्‍य की लव लाइफ को बेहतर या खराब करने की क्षमता रखता है। आज हम आपको सूर्य ग्रह के बारे में बताने जा रहे हैं।
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सूर्य को प्रसन्‍न करने के लिए करें इसकी पूजा–

जैसा कि पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि सूर्य सफलता का कारक है और ये जीवन के हर पहलू में सफलता और असफलता से संबंधित होता है। अगर कुंडली में इसके अशुभ स्‍थान में बैठा है या नकारात्‍मक प्रभाव दे रहा है तो जातक को कुछ विशेष तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

ज्योतिष में बताए गए 9 ग्रहों की स्थिति पर ही हमारा जीवन निर्भर करता है। जन्म समय और स्थिति के अनुसार बनाई जाने वाली कुंडली 12 भागों (भावों) में विभाजित रहती है। इन 12 भावों में नौ ग्रहों की अलग-अलग स्थितियां रहती हैं। सभी ग्रहों के शुभ-अशुभ फल होते हैं। हमारी कुंडली में जो ग्रह अच्छी स्थिति में होता है, वह हमें शुभ फल देता है। जबकि, जो ग्रह कुंडली में अशुभ स्थिति में होता है, वह बुरा फल देता है। सभी 9 ग्रहों का फल अलग-अलग क्षेत्रों में प्राप्त होता है।

ज्योतिष के अनुसार सूर्य को नवग्रहों में से राजा माना जाता है तथा सूर्य हमारी कुंडली में हमारी आत्मा, हमारे पिता, हमारे पूर्वजों, हमारी नर संतान पैदा करने की क्षमता आदि का प्रदर्शन करते हैं जिसके चलते प्रत्येक कुंडली में सूर्य बहुत महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है तथा इसी के कारण सूर्य पर कुंडली में किसी एक या एक से अधिक अशुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ने पर जातक के लिए बहुत सीं समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में सूर्य देव सफलता का कारक हैं और अगर कुंडली में सूर्य देव कमज़ोर स्थिति में बैठे हों तो जातक का पूरा जीवन अस्‍त व्‍यस्‍त हो जाता है। ज्‍योतिष के अनुसार मनुष्‍य के जीवन पर ग्रहों का महत्‍वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

किसी को शुभ ग्रह मालामाल बना देते हैं तो किसी को कंगाल बनाने में भी देर नहीं लगाते। सौरमंडल में नौ ग्रह हैं और ये नौ ग्रह किसी ना किसी तरह मनुष्‍य के जीवन पर अच्‍छा और बुरा प्रभाव डालते ही हैं।

कोई ग्रह करियर पर प्रभाव डालता है तो कोई मनुष्‍य की लव लाइफ को बेहतर या खराब करने की क्षमता रखता है।

सूर्य के कारकत्व से जुड़े विषयों के बारे में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

सूर्य जन्म कुंडली में जिस भाव में होता है, उस भाव से जुड़े फलों की हानि करता है।

यदि सूर्य पंचमेश, नवमेश हो तो पुत्र एवं पिता को कष्ट देता है। सूर्य लग्नेश हो तो जातक को सिरदर्द, ज्वर एवं पित्त रोगों से पीड़ा मिलती है।

मान-प्रतिष्ठा की हानि का सामना करना पड़ता है।

किसी अधिकारी वर्ग से तनाव, राज्यपक्ष से परेशानी आदि।

यदि न्यायालय में विवाद चल रहा हो, तो प्रतिकूल परिणाम।

शरीर के जोड़ों में अकड़न तथा दर्द। किसी कारण से फसल का सूख जाना।

व्यक्ति के मुंह में अक्सर थूक आने लगता है तथा उसे बार-बार थूकना पड़ता है।

सिर किसी वस्तु से टकरा जाता है। तेज धूप में चलना या खड़े रहना पड़ता है।
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ये हैं सूर्य के शत्रु ग्रह:

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्‍योतिष शास्‍त्र में सूर्य ग्रह के चंद्र, गुरु और मंगल ग्रह मित्र हैं, जबकि शुक्र, राहु और शनि इसके शत्रु हैं। वहीं दूसरी ओर बुध और केतु मध्यम। सूर्य ग्रह मेष में उच्च और तुला में नीच के होते हैं। सूर्य का बलवान होना सभी तरह के अनिष्टों को नष्ट कर देता है। आइए आज आपको बताते हैं, यदि सूर्य जो आरोग्‍य और शरीर में कई व्‍याधियों का कारक है यदि खराब है तो कौन-कौन से रोग हो सकते हैं और कैसे कोई भी जातक कुंडली में सूर्य की अशुभ स्थिति का सुधारने और बुरा प्रभाव कम करने के लिए कौन कौन से उपाय कर सकता है।
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खराब सूर्य होने से हो सकती ये बीमारियां — ज्योतिष में सूर्य सिर, दिमाग, दाहिनी आंख, पेट के अंदर का भाग, ह्रदय, बुखार, कालरा, ब्लड प्रेशर, धमनिया, उच्‍च रक्‍तचाप, दिल, कंठ स्वर, पित्त,और हड्डी से सम्बंधित रोग। यकीन मानिये यदि आप इन रोगों से प्रभावित हैं तो ज़रूर आपका सूर्य गृह आपकी जन्म कुंडली में ख़राब है। इसके साथ ही मान, सम्मान, यश, प्रतिष्ठा, कीर्ति, वैभव, ख्याति, आत्मा, शक्ति, लक्ष्मी, प्रभाव, तेज, बल, विहीन है तो भी आपका आपका सूर्य पीड़ित है।
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जानिए सूर्य के अशुभ प्रभाव—

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि किसी जातक की कुंडली में ये ग्रह अशुभ भाव में बैठा है तो व्‍यक्‍ति को अपने करियर में असफलता मिलती है। उसे नौकरी मिलने में दिक्‍कत आती है।

व्‍यापार पर सूर्य का प्रभाव—
ये ग्रह व्‍यक्‍ति की प्रोफेशनल और पर्सनल दोनों ही पहलुओं पर असर डालता है। इसके अशुभ होने पर व्‍यापार में घाटा होता है और व्‍यक्‍ति को पैसा कमाने या आय के साधनों में बाधा उत्‍पन्‍न होती है। कई प्रयास करने के बाद भी व्‍यक्‍ति व्‍यापार में प्रग‍ति नहीं कर पाता है।
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जीवन में मिलती है असफलता–
अशुभ सूर्य का दूसरा मतलब है असफलता। ऐसी स्थित में आप जो भी कार्य करते हैं उसमें आपको असफलता मिलती है। अगर आप किसी से प्रेम करते हैं और उसे अपने दिल की बात बताते हैं तो किसी ना किसी कारण से वो व्‍यक्‍ति आपसे दूर चला जाता है।

रोजगार/नौकरी मिलने में दिक्‍कत–
कई लोग शिकायत करते हैं कि अच्‍छी डिग्री लेने और पढ़ाई करने के बाद भी उन्‍हें नौकरी नहीं मिल रही है या अच्‍छी नौकरी पाने में उन्‍हें दिक्‍कत हो रही है। इसकी वजह कुंडली में बैठा सूर्य हो सकता है। जब येे किसी अशुभ भाव में बैठा होता है तो वो उस जातक को नौकरी मिलने में परेशानियां उत्‍पन्‍न करता है।
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उपाय—
इन्‍हें प्रसन्‍न करने के लिए रोज़ सुबह एक लोटे पानी में हल्‍दी डालकर सूर्य को अर्घ्‍य दें।
रविवार के दिन सूर्य से संबंधित वस्‍तुओं का दान करें।
सफलता पाने हेतु माणिक्‍य रत्‍न धारण करें।
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यह कर सकते हैं उपाय —
जातक की कुंडली में कोई भी अशुभ या बलहीन ग्रह पूरी तरह से अपना बुरा प्रभाव देना बंद तो नहीं करता, लेकिन फिर भी उपाय के द्वारा इस प्रभाव को कम किया जा सकता है। यदि सूर्य खराब है तो आप पिता की सेवा कर सकते हैं, भगवान शिव की पूजा करें, रविवार को लाल वस्तुओं का दान करें।

अंक 22 : क्या आप जानते हैं, रसोई घर मे तवे का स्थान और उसे रखने के स्थान का महत्व…

जानिए आज वास्तुशात्री पण्डित दयानन्द शास्त्री से की आपके रसोईघर में तवा, कब और कहाँ रखना होता हैं लाभकारी..
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प्रिय मित्रों/पाठकों, तवा हमारे रसोईघर की सबसे मूलभूत चीजों में से एक है। इसके बिना किचन संपूर्ण नहीं है। आमतौर पर हर किचन में आपको तवा देखने को मिल जाएगा। क्योंकि, जिस किचन में तवा नहीं होगा तो वहां रोटी बन पाना भी संभव नहीं है। साधारण तौर पर भी इतना खास महत्व रखने वाले तवे के ऐसे कई महत्व भी है, जो उस घर के लोगों के लिए बहुत लाभकारी है।

वास्तु शास्त्र में घर से जुड़ी हुई बहुत सी चीजों को अच्छा और बुरा बताया गया है। इन चीजों में रसोई घर का सामान भी आता है। वास्तु के अनुसार चीजों व्यवस्थित न हो तो यह अपशगुन का कारण बनती हैं। इस प्रकार रसोई घर में भी बहुत सी चीजे होती हैं तो किसी न किसी काम में तो आती हैं लेकिन अगर उन्हें हमें ठीक प्रकार इस्तेमाल न करें तो यह घर में बुरी शक्त्यिों या दरिद्रता का कारण बन सकती हैं।

पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार, रसोईघर में किसी विशेष स्थान पर,सावधानी पूर्वक तवा रखने से अनेक लाभ हो सकते हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री का मानना है कि, अगर व्यक्ति उन तरीकों को सच्चे मन के साथ व्यवस्थित तौर पर करेगा तो उसके घर में कभी भी धन की कमी नहीं होगी। या यूं कहें कि,उसकी किस्मत के बंद दरवाजे खुल जाएंगे।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि वास्तु अनुसार, रसोई घर में रात के समय तवा को खड़ा करके कभी नहीं रखना चाहिए। बल्कि जब सभी रोटियां बन जाए तो उसके बाद तवे पर एक छोटी सी रोटी बनाकर डाल दें और जब वह रोटी एक साइड से पक जाए तो उसको पलटकर गैस बंद ही कर दें और उस रोटी को तवे पर ही रहने दें और उस तवे को किसी चीज से ढककर रख दें। ऐसा करना शुभ माना गया है।

भोजन बनाने के बाद तवा, कढ़ाई अन्य बर्तन चूल्हे या गैस पर न रखें रहनें दें।

तवा किचन की सबसे जरूरी चीज है, तवे पर ही रोटी बनती है। वास्तु के अनुसार तवे भी घर में अधिक महत्व होता है।

वास्तु में बताया गया है कि तवा और कढ़ाई राहु प्रतिनिधित्व करने वाले होते हैं। तवा को अगर वास्तु अनुसार रखा जाए तो यह शुभ फलदायी हो सकता है। इतना ही नहीं तवे के कारण घर में सुख समृद्धि और धन दौलत आ सकती है।

आपको बता दें कि अगर रसोई घर में कोई महिला गंदे तवे और कढ़ाई का प्रयोग करती है तो यह उसके पति के लिए बुरा असर डाल सकता है। इस कारण महिला के घर के सदस्य पति या बेटा नशे में लिप्त हो जाते हैं।

रसोई में तवा रखने के वास्तु नियम जब रात को खाना बना लें तो तवे को धो कर रखें। गंदे तवे पर खाना गरम करने की बजाय उस पर नमक डाल लें।

तवा के कारण वास्तु दोष दूर करने के लिए गंदे तवे पर 2 या 3 इंच की रोटी बना लें फिर इसे बाहर रख दें कि कोई जानवर इसको खा ले। इससे घर की सारी नकारात्मक चीजे समाप्त हो जाती हैं।

घर में जब तवे का उपयोग न हो उसे छुपाकर रखें अलमारी बगैरह में।

रसोई घर में तवे या कढ़ाई को कभी भी उल्टा नहीं रखें। तवा और कढ़ाई को हमेशा रसोई में दाएं तरफ स्थान दें। खाना बनने के बाद खाली चूल्हे पर तवा न चढ़ाएं।

भूलकर भी गर्म तवे पर पानी नहीं डालना चाहिए इससे घर में मुसीबतें आती हैं। तवा ठंडा होने पर उसके ऊपर नींबू और नमक रगड़कर उसे चमका दें इससे घरवालों की किस्मत भी चमक उठेगी।

तवे या कढ़ाई के जल जाने पर उसे रात भर भिगा दें और सुबह साफ करें इससे आप उसे खुरंचकर साफ करने से बचेंगी जो अशुभ होता है।

तवे या कढ़ाई में कभी नहीं खाना चाहिए न ही उसमें जूठा खाना छोड़ना चाहिए। तवा की पवित्रता का ख्याल रखे इससे घर में बरकत आती है।
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प्रिय मित्रों/पाठकों, आप अपनी आदतों में निम्न परिवर्तन लाकर अनेक परेशानियों से बच सकते है।
जानिए कैसे…

बहुत से लोग रोटी बनाने के बाद या बर्तन धुलने के बाद तवे को उलटा करके रख देते हैं, लेकिन क्या आपको पता ये आदत आपको मुसीबत में डाल सकती है। वास्तु के अनुसार ये एक तरह का दोष है। इससे रुपए-पैसों की किल्लत के साथ घर-परिवार पर मुसीबतें आ सकती हैं।

👉🏻👉🏻बहुत से लोग बर्तन धुलने के बाद तवे को सुखाने के लिए रैक पर उलटा करके रख देते हैं मगर ऐसा करने से आपका भाग्य प्रभावित होता है। इससे आपके बनते हुए काम बिगड़ सकते हैं। साथ ही घर में अन्न और धन की कमी हो सकती है।

👉🏻👉🏻कई लोग सुबह इस्तेमाल हुए तवे को पोंछकर ही दोबारा उसमें रोटी बना लेते हैं, लेकिन वास्तु के अनुसार ये गलत है। इससे मां अन्नपूर्णा नाराज होती हैं। साथ ही घर की बरक्कत रुक जाती है।

👉🏻👉🏻कई लोग रोटी सेंकने के बाद इसी पर सब्जी भी गरम कर लेते हैं, लेकिन इससे भी वास्तु दोष लगता है। इससे बचने के लिए तवे को धोकर प्रयोग करें या तवे पर पहले थोड़ा नमक डालें इसके बाद सब्जी गरम करें। इससे दोष नहीं लगेगा।

👉🏻👉🏻बहुत से लोग खाना बनाने के बाद खाली तवे को गैस पर रखे रहने देते हैं, लेकिन ये गलत है। इससे घर में निर्धनता आती है।

👉🏻👉🏻तवे को गैस से हटाते समय उस पर रोटी रखते हुए ही उतारें। ऐसा करने से वास्तु दोष नहीं लगेगा। इससे घर में समृद्धि भी आएगी।

👉🏻👉🏻खाना बनाते समय एवं इसके बाद तवे को हमेशा गैस के दाईं ओर रखना चाहिए। इससे घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है। जबकि बाईं ओर तवा रखने से धन का नाश होता है।

👉🏻👉🏻तवे को धोते समय कभी भी खुरचे नहीं इससे दरिद्रता आ सकती है। इसे धोने के लिए तवे को पहले पानी में भिगो दें इसके बाद धोएं।

👉🏻👉🏻कढ़ाई में खाना नहीं खाना चाहिए इस बारे में तो शायद सभी को पता होगा, लेकिन क्या आपको पता है तवे पर भी खाना नहीं खाना चाहिए। इससे मां अन्नपूर्णा नाराज होती हैं। जिसके चलते घर में अन्न की कमी होती है और सम्पन्नता चली जाती है।

अंक 21 : जानिए 2019 में कब और कैसा रहेगा ग्रहों का प्रभाव, और कब कौन सा ग्रहण लगेगा…??

प्रिय मित्रों/पाठकों, नए वर्ष 2019 के स्वागत की तैयारियां शुरू हो गयी हैं। नववर्ष 2019 को लेकर हर किसी के मन में ढेर सारी आशाएं और सपने हैं। नया साल कैसा रहेगा हम सब के लिए। उनके जीवन में बेहतरी आएगी कि नहीं?
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ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने पंचागों के हवाले से बताया कि वर्ष 2019 व हिन्दू कैलेंडर के हिसाब से विक्रम संवत 2076 (परिधावी संवत्सर) के राजा शनि हैं जबकि मंत्री सूर्य। दुर्गेश भी शनि हैं जबकि धनेश मंगल हैं।
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मंगल का विशेष संयोग बना है 2019 में —
वर्ष2019 में मंगलवार का विशेष संयोग बन रहा है। नए वर्ष की शुरुआत मंगलवार से हो रही है। वहीं नए वर्ष का समापन भी मंगलवार को होगा।
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जैमिनी और केदार योग में होगा नए वर्ष 2019 का आगमन–
ज्योतिषी पण्डित दयानन्द शास्त्री केअनुसार नव वर्ष की शुरुआत जैमिनी और केदार योग में हो रही है। शुक्र व चंद्रमा के एक साथ रहने से जैमिनी योग बना है जबकि सभीग्रहों का चार स्थानों पर रहने से केदार योग का संयोग बन रहा है।
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नए वर्ष 2019 में कई ग्रह होंगे वक्री और मार्गी —

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार नए साल में गुरु 10 अप्रैल को वक्री होंगे और मार्गी होंगे 11 अगस्त को। इसी तरह शनि 30 अप्रैल को वक्री और मार्गी होंगे 18 सितंबर को l बुध 5 मार्च को वक्री होंगे। पूरे साल में बुध तीन बार वक्री होंगे और तीन बार मार्गी होंगे।
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कई राशियों का होगा परिवर्तन–

नए वर्ष में कई ग्रहों का राशि परिवर्तन होगा। शनि का राशि परिवर्तन 30 साल बाद धनु में होगा। शनि इससे पहले 18 दिसंबर 1987 को धनु राशि में थे अगली बार 8 दिसंबर 2046 को धनु राशि में आएंगे। बृहस्पति ग्रह वृश्चिक राशि से धनु में 29 मार्च को प्रवेश करेंगे। राहु का गोचर परिवर्तन कर्क से मिथुन राशि में 7 मार्च को होगा और केतु धनु में प्रवेश करेंगे। शनि के 1 मई 2019 तक मार्गी रहने से एवं सीधी चाल रहने से कई राशियों को फायदा मिलेगा। गुरु का स्थान परिवर्तन होने से देश की स्थिति काफी मजबूत होगी।
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नए साल 2019 की शुरुआत सूर्यग्रहण से होगी —
ज्योतिषी पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार नए साल की शुरुआत सूर्य ग्रहण से हो रही है। 6 जनवरी को है पहला सूर्यग्रहण। दूसरा सूर्य ग्रहण 2 एवं 3 जुलाई के मध्य है। यह दोनों ही सूर्य ग्रहण भारत में दिखाई नहीं पड़ेंगे। तीसरा सूर्य ग्रहण 26 दिसंबर को लगेगा जो भारत में दिखेगा। नए साल में पहला चंद्र ग्रहण 21 जनवरी को लगेगा। दूसरा चंद्र ग्रहण 16 जुलाई एवं 17 जुलाई मध्यांतर में लगेगा यह भारत में भी दिखेगा। ग्रहण हमेशा से मानव समुदाय के लिए उत्सुकता का विषय रहा है। भारत के अलावा पश्चिमी देशों में भी ग्रहण को लेकर अलग-अलग मान्यताएँ हैं। हिन्दू धर्म में सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण को लेकर कई तरह की पौराणिक कथा और मान्यताएँ हैं। जिसकी वजह से वैदिक ज्योतिष में ग्रहण एक महत्वपूर्ण घटना है। सूर्य और चंद्र ग्रहण के घटित होने से मानव जीवन, प्रकृति और वस्तुओं पर सीधा असर पड़ता है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, साल 2019 में कुल 5 ग्रहण पड़ेंगे। इनमें 3 सूर्य ग्रहण होंगे और 2 बार चंद्रमा ग्रहण से पीड़ित होंगे। साल का पहला ग्रहण सूर्यग्रहण होगा और यह जनवरी के पहले सप्ताह में पड़ेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्रहण एक खगोलीय घटना है। लेकिन ज्योतिष में इसका अपना महत्व होता है। ज्योतिषियों के अनुसार, सूर्य और चंद्रग्रहण का अलग-अलग राशियों पर अलग प्रभाव पड़ता है। साथ ही इसके अशुभ प्रभावों से बचने के लिए ज्योतिष शास्त्र में कुछ उपाय भी बताए गए हैं। आइए, जानते हैं कि साल 2019 में पड़नेवाले 5 ग्रहण किस-किस तारीख को प्रभावी होंगे।
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साल में पड़नेवाले सूर्यग्रहण—

साल 2019 में कुल तीन सूर्य ग्रहण लगेंगे। इनमें से 2 ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देंगे। इस साल जनवरी महीने में ही दो ग्रहण हैं। इनमें एक सूर्य ग्रहण और दूसरा चंद्रग्रहण है।
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साल का पहला सूर्यग्रहण–

साल का पहला ग्रहण सूर्यग्रहण है और जनवरी के पहले सप्ताह में ही यह सूर्य ग्रहण लगेगा। हालांकि यह आंशिक ग्रहण होगा और भारत में नहीं दिखाई देगा। जनवरी की 6 तारीख को यह ग्रहण प्रभावी होगा। भारतीय समय के हिसाब से सुबह 5 बजकर 4 मिनट पर शुरू होगा और सुबह 9 बजकर 18 मिनट तक प्रभावी रहेगा।
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साल का दूसरा सूर्यग्रहण–

साल का दूसरा सूर्य ग्रहण 2 जुलाई को लगेगा। यह पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा और यह ग्रहण भी भारत में नहीं दिखाई देगा। इस सूर्यग्रहण का समय रात 11 बजकर 31 मिनट से 2 बजकर 15 मिनट तक लगेगा।
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तीसरा सूर्यग्रहण–

यह ग्रहण दिसंबर महीने की 26 तारीख को पड़ेगा। यह 8 बजकर 17 मिनट पर लगेगा और 10 बजकर 57 मिनट पर संपन्न होगा।
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साल 2019 के चंद्रग्रहण–

साल 2019 में 2 चंद्रग्रहण लगेंगे और इनमें से एक चंद्रग्रहण भारत सहित अन्य एशियाई देशों में दिखाई देगा। साथ ही साल का पहला चंद्रग्रहण दिन के समय लगेगा।चंद्र ग्रहण भारतीय ज्योतिष शास्त्र में एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना है। पूर्णिमा की रात्रि में चंद्र ग्रहण के घटित होने से प्रकृति और मानव जीवन में कई बदलाव देखने को मिलते हैं। ये परिवर्तन अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के हो सकते हैं। जिस तरह चंद्रमा के प्रभाव से समुद्र में ज्वार भाटा आता है, ठीक उसी प्रकार चंद्र ग्रहण की वजह से मानव समुदाय प्रभावित होता है। हर वर्ष पृथ्वी पर चंद्र ग्रहण घटित होते हैं। इस साल 2019 में दो चंद्र ग्रहण होंगे।
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जानिए दिन में होगा साल का पहला चंद्रग्रहण–

साल का दूसरा ग्रहण और पहला चंद्रग्रहण जनवरी महीने के तीसरे सप्ताह में पड़ेगा। यह ग्रहण 21 तारीख को प्रात: 9 बजकर 3 मिनट से शुरू होकर दोपहर 12 बजकर 21 मिनट तक लगेगा। यह ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा।
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दूसरा चंद्रग्रहण—

16 जुलाई को दूसरा चंद्रग्रहण यह ग्रहण रात में 1 बजकर 31 मिनट से सुबह 4 बजकर 29 मिनट तक लगेगा। यह ग्रहण भारत सहित एशिया के अन्य देशों में भी दिखाई देगा। यह ग्रहण आंशिक चंद्रग्रहण है।
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2019 में पहला चंद्र ग्रहण

दिनांक समय प्रकार दृश्यता
21 जनवरी 2019 08:07:34 से 13:07:03 बजे तक पूर्ण चंद्र ग्रहण मध्य प्रशांत महासागर, उत्तरी/दक्षिणी अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका
सूचना: यह चंद्र ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा, इसलिए यहां पर इसका धार्मिक महत्व और सूतक मान्य नहीं होगा। चंद्र ग्रहण पुष्य नक्षत्र और कर्क राशि में लगेगा, इसलिए इस राशि और नक्षत्र से संबंधित लोग इस चंद्र ग्रहण से प्रभावित होंगे।
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2019 में दूसरा चंद्र ग्रहण–

दिनांक समय प्रकार दृश्यता
16-17 जुलाई 2019 25:32:35 से 28:29:50 बजे तक (भारतीय समयानुसार, 01:32:35 से 04:29:50 बजे तक) आंशिक चंद्रग्रहण भारत और अन्य एशियाई देश, दक्षिण अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया
सूचना: यह चंद्रग्रहण 16-17 जुलाई के मध्य घटित होगा और भारत में दिखाई देगा, इसलिए यहां पर इस ग्रहण का सूतक मान्य होगा। यह ग्रहण उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में लगेगा और धनु व मकर दोनों राशि के जातकों पर इसका असर देखने को मिलेगा।
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चंद्र ग्रहण का सूतक–
सूतक काल वह अशुभ समय है जो ग्रहण के घटित होने से पूर्व शुरू हो जाता है और ग्रहण समाप्ति पर स्नान के बाद खत्म होता है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूतक काल को अच्छा समय नहीं माना जाता है इसलिए इस समय में कुछ कार्यों को करने की मनाही होती है। इनमें मूर्ति पूजा, मूर्तियों का स्पर्श और भोजन बनाना व खाना वर्जित होता है। हालांकि वृद्धजनों, रोगियों और बच्चों पर ग्रहण का सूतक प्रभावी नहीं होता है। इसके अलावा जहां जिस देश या क्षेत्र में ग्रहण दिखाई देता है वहीं पर उसका सूतक मान्य होता है।
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चंद्र ग्रहण ( 16-17 जुलाई) के सूतक का समय–
सूतक प्रारंभ 16 जुलाई को 15:55:13 बजे से
सूतक समाप्त 17 जुलाई 04:29:50 बजे।।
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जानिए जन्म कुंडली में ग्रहण दोष कब बनता हैं–
वैदिक ज्योतिष में कालसर्प दोष, गण्डमूल दोष, पितृ दोष, मांगलिक और ग्रहण दोष समेत कई प्रकार के दोष बताए गए हैं। कुंडली में अशुभ दोष के निर्मित होने से व्यक्ति को जीवन में कुछ समस्या और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सूर्य और चंद्र ग्रहण के घटित होने से कभी-कभी कुछ लोगों की कुंडलियों में ग्रहण दोष भी उत्पन्न होता है। यह एक अशुभ दोष है जिसकी वजह से मनुष्य को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि जब किसी व्यक्ति की लग्न कुंडली के द्वादश भाव में सूर्य या चंद्रमा के साथ राहु या केतु में से कोई एक ग्रह स्थित हो, तो ग्रहण दोष बनता है। वहीं अगर सूर्य या चंद्रमा के भाव में राहु-केतु में से कोई एक ग्रह बैठा हो, तो यह भी ग्रहण दोष कहलाता है। ग्रहण दोष के अशुभ प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में परेशानियां टलने का नाम नहीं लेती हैं। इस दौरान नौकरी-व्यवसाय में समस्या, आर्थिक चुनौती और खर्च की अधिकता जैसी परेशानी बनी रहती है।
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हण और मानव जीवन
आकाश में विचरण करने वाले ग्रह, नक्षत्र और सितारे हमेशा से मानव जीवन को प्रभावित करते आये हैं। वहीं मानव समुदाय के मन में भी आकाश में होने वाली घटनाओं को लेकर उत्सुकता रहती है। क्योंकि इन घटनाओं का सीधा असर हमारे जीवन पर देखने को मिलता है। हिन्दू ज्योतिष में कर्म की प्रधानता के साथ-साथ ग्रह गोचर और नक्षत्रों के प्रभाव को भी मनुष्य की भाग्य उन्नति के लिए जिम्मेदार माना जाता है। नवग्रह में सूर्य और चंद्रमा भी आते हैं इसलिए सूर्य और चंद्र ग्रहण का महत्व बढ़ जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कोई भी ग्रहण घटित होने से पहले ही अपना असर दिखना शुरू कर देता है और ग्रहण की समाप्ति के बाद भी इसका प्रभाव कई दिनों तक देखने को मिलता है। ग्रहण का प्रभाव न केवल मनुष्यों पर बल्कि जल, जीव और पर्यावरण के अन्य कारकों पर भी पड़ता है। यही वजह है कि ग्रहण मानव समुदाय को प्रभावित करता है।
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यह हें ग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथा–
हिन्दू धर्म में ग्रहण को लेकर एक प्राचीन कथा सुनने को मिलती है। इसमें सूर्य और चंद्र ग्रहण के लिए राहु और केतु को जिम्मेदार बताया गया है। मान्यता है कि देवासुर संग्राम के समय देवता और दानवों ने जब समुद्र मंथन किया था, उस समय समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए अमृत को दानवों ने देवताओं से छीन लिया था। अमृत के सेवन से असुर जाति अमर हो जाती और यह समस्त जगत के लिए सही नहीं था, इसलिए असुरों को अमृत पीने से रोकने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी नामक सुंदर स्त्री का रूप धारण किया। मोहिनी ने अपनी सुंदरता और बातों से दानवों को बहला दिया और उनसे अमृत लेकर, उसे देवताओं में बांटने लगी। मोहिनी रूप धारण किये भगवान विष्णु की इस चाल को राहु नामक दैत्य समझ गया और वह देवता का रूप धारण कर अमृत पीने के लिए देवताओं की पंक्ति में जा बैठा। जैसे ही राहु ने अमृतपान किया, उसी समय सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और उसका भेद खोल दिया। इसके बाद भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से राहु की गर्दन को उसके धड़ से अलग कर दिया। हालांकि अमृत का सेवन कर लेने की वजह से उसकी मृत्यु नहीं हुई इसलिए उसका सिर राहु व धड़ केतु सौर मंडल में छायाग्रह के नाम से स्थापित हो गए। कहा जाता है कि राहु और केतु, सूर्य व चंद्रमा से इसी वजह से शत्रुता रखते हैं और इसी बैर की वजह से सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण के रूप में शापित करते हैं। कहते हैं कि ग्रहण के समय राहु और केतु, सूर्य व चंद्रमा को निगल जाते हैं।

अंक 20 : जानिए क्या करें ऐसा कुछ नया कि आने वाले नए साल में खुशियां ही खुशियां हों

प्रिय मित्रों/पाठकों,वास्तु शास्त्र के अनुसार पांच तत्व, सूरज, चांद, नवग्रह और पृथ्वी, इनकी ऊर्जा का संतुलन ही जीवन संचालित करता है, घर में इसी ऊर्जा का संतुलन स्थापित कर हम जीवन को बेहतरी की ओर ले जा सकते हैं। यहां दिए जा रहे हैं वास्तु से जुड़े ऐसे ही कुछ उपाय जो आपकी मदद कर सकते हैं।

👉🏻👉🏻 घर के मुख्य द्वार से ही सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जाओं के प्रवेश का आदान-प्रदान शुरू होता है अत: वहीं से हम शुरू करते हैं अपने घर को सकारात्मक ऊर्जा देने का उद्यम करते हैं तो नववर्ष में घर के द्वार पर चांदी के बने स्वास्तिक को स्थान देकर घर में सकारात्मकता उत्पन्न करें।
👉🏻👉🏻घर में शांति और सुखद वातावरण बनाने के लिए ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) पर ध्यान दें। यह प्राण वायु का जनक है।

इस पर सोम का प्रभाव है। यह घर में स्थिरता लाता है। मन को आराम देने वाला स्थान है। यहां पर भारी वस्तुएं न रखें।

मुख्यद्वार होना, भाग्यशाली रहेगा। इस स्थान पर सूर्य-चंद्र की आकृति तथा सोने-चांदी के रंग वाली आकृति लगानी चाहिए। म्यूजिकल चीजें विंड चाइम्स भी बढ़िया हैं।

अपने बेडरूम को युद्ध स्थल न बनाएं। इससे घर की शांति भंग होती है। घर के सभी सदस्यों की संयुक्त फोटोग्राफ पूर्व/उत्तर दिशा में लगाएं। यह वैमनस्य दूर करेगी तथा सबको करीब लाएगी।

साल में एक बार घर के सारे सदस्य एक ही स्थान पर एकत्रित हों तथा सुखद माहौल में अपना समय व्यतीत करें। अतीत की सुखद यादों में जिएं।
👉🏻👉🏻धन के देवता कुबेर का घर उत्तर दिशा में है तो इस वर्ष उत्तर दिशा को सशक्त बनाएं।

👉🏻👉🏻 खाते में असंतुलन या धोखाधड़ी, अप्रासंगिक वार्तालाप, विदेश यात्रा में देरी या जाना रद्द होना, उच्च शिक्षा में असफलता, मुंहासे या चकत्तों से रूप रंग में गिरावट और कानून संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हों तो वास्तु द्वारा उत्तर दिशा को सशक्त बनाएं। उत्तर दिशा में कुबेर देवता को स्थान देकर अपनी बुद्धिमता और समझ को संतुलित करें।
👉🏻👉🏻देवी-देवताओं की फटी हुईं और पुरानी तस्वीरें अथवा खंडित हुईं मूर्तियों से भी आर्थिक हानि होती है। अत: उन्हें किसी नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए। देवी-देवताओं की तस्वीरों या मूर्तियों को निश्चित संख्या और स्थान पर ही रखना चाहिए। एक ही देवी या देवता की 3-3 मूर्तियां या तस्वीर होने पर वास्तुदोष होता है।

👉🏻👉🏻घर में पेड़-पौधे लगाने से ही सकारात्मक ऊर्जा को स्थान मिलता है। यह पूर्व दिशा के दोषों को हटाकर संतुलन बनाने का कार्य करते हैं।

👉🏻👉🏻घर के उत्तर, पूर्व से कूडा-करकट को फेंककर, पुराने सड़े-गले कपड़ों और अन्य वस्तुओं को हटाकर, छह महीने या अधिक समय से रखे बेकार व बिना इस्तेमाल किए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जो विकास में रुकावट या अड़चन डालें, उन्हें घर से बाहर करके कलह क्लेश से दूर रहें। इनसे मुक्ति पाकर सकारात्मक शक्ति की उर्जा को घर व परिवार में स्थान दें।

👉🏻👉🏻लोहे की छड़ आदि सामान को भी छत पर न रख कर घर में खुशहाली का वातावरण स्थापित करें।

👉🏻👉🏻घर में ऐसे चित्र जो वीरान घर, लड़ाई-झगड़े, पतझड़ आदि नकारात्मक बातों को इंगित करते हैं उनके स्थान पर वहां मन को उत्साह, आनंद, उमंग, शांति व तरोताजगी की सकारात्मक उर्जा वाले चित्रों को पूर्व दिशा में लगाएं।

👉🏻👉🏻अध्ययन करते हुए पीठ खिड़की की और नहीं होनी चाहिए बल्कि पीठ के पीछे दीवार होनी चाहिए जो निरन्तरता को कायम रखती है और एकाग्रता को बढ़ाती है।
👉🏻👉🏻कई लोग अपने घर में अनावश्यक पत्थर, नग, अंगुठी, ताबीज या अन्य इसी तरह के सामान को घर में कहीं रख देते हैं। बिना इस जानकारी के कि कौन-सा नग फायदा पहुंचा रहा है और कौन-सा नग नुकसान पहुंचा रहा है। इसलिए इस तरह के सामान को घर से बाहर निकाल दें।
👉🏻👉🏻 यदि नए साल में यदि बच्चों की शिक्षा, बुद्धिमानी, युवावस्था के विकास को अच्छा रखना है, तो पूर्व दिशा को ठीक रखने का संकल्प लें। यहां पर देवराज इंद्र का प्रभाव रहता है। इस दिशा में मेष और वृष राशि तथा शुक्र का प्रभाव होता है। बच्चों के शयनकक्ष तथा कमरे को बल देना है, तो इंद्र से जुड़ी चीजें जैसे हाथी, डायमंड, क्रिस्टल या सफेद रंग का घोड़ा लगाएं।

👉🏻👉🏻जल तत्व संबंधी चित्रों को सोने के कमरे में न लगाएं।

👉🏻👉🏻घर में बड़ा मंदिर न बनाएं। यदि बनाएं तो छोटा-सा मंदिर मूर्ति रहित होना चाहिए।

👉🏻👉🏻 पूजा स्थल में मृतक की फोटो न लगाएं। पितरों की दिशा दक्षिण- पश्चिम दीवार होती है।

👉🏻👉🏻दक्षिण-पश्चिम में शीशा नहीं लगाना चाहिए। इससे बनते काम अंतिम दौर में पूर्ण नहीं होते।

👉🏻👉🏻घर की दक्षिण दिशा में जलतत्व या नीला रंग नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा करना अति आवश्यक हो तो हरे और लाल रंग का मिश्रण या केवल लाल रंग का ही प्रयोग करना चाहिए।

👉🏻👉🏻दक्षिण दिशा मंगल ग्रह की होती है। दक्षिण दिशा का सेनापति कहा जाता है। मंगल ग्रह दक्षिण दिशा का स्वामी है अत: इसमें किसी प्रकार के दोष से कानूनी कठिनाइयां उत्पन्ना हो सकती हैं।

👉🏻👉🏻दक्षिण दिशा के रसोई घर में सफेद रंग का रोगन वास्तु दोष को दूर कर देता है।

👉🏻👉🏻घर के दक्षिण में यदि खुलापन है तो उसे दूर करने के लिए कृष्ण की मुरली बजाती मूर्ति को रख कर दूर किया जा सकता है।

👉🏻👉🏻घर के दक्षिण व पश्चिम में पानी का बहाव, पानी का फव्वारा बचत में बाधक हो सकता है।

👉🏻👉🏻नव वर्ष में जमीन खरीदते समय उसकी निकटवर्ती सड़कें और ढलान का खास ध्यान रखना जरूरी है। वे प्लॉट न लें जिस पर दक्षिण-पश्चिम से सड़क आ रही हो। दक्षिण दिशा को सड़क वाले प्लॉट को नहीं खरीदना चाहिए। दक्षिण-पश्चिम दिशा को कटता प्लॉट भी नहीं खरीदना चाहिए।

👉🏻👉🏻पानी की टंकी, बोरिंग, रसोईघर में पौधे, बालकनी, भंडारण, खुली जगह ढलान, रंग और सज्जा का वास्तु तालमेल जरूरी है।
👉🏻👉🏻घर या दुकान की कोई भी अलमारी टूटी हुई नहीं होना चाहिए। टूटी अलमारी पैसों के नुकसान का कारण बनती है। इसके अलावा काम न होने पर अलमारी को हमेशा बंद करके रखें। अलमारी को बेवजह खुला रखने पर हर तरह के कामों में रुकावट आती है और धन भी पानी की तरह बह जाता है।
👉🏻👉🏻जिस इमारत के दक्षिण पूर्व में भूमिगत पानी की टंकी होती है उसको बाद में बेचने में मुश्किल होती है।

👉🏻👉🏻यदि प्लॉट व्यापारिक उपयोग के लिए खरीद रहे है तो ध्यान रखना चाहिए कि वे किस उद्देश्य के लिए खरीद रहे है। जिस प्लॉट में दक्षिण-पश्चिम दिशा में कट हो वह प्रॉपर्टी डीलिंग के उपयुक्त नहीं है।

👉🏻👉🏻अगर तैयार फ्लैट, बंगला, दुकान या शोरूम खरीद रहे हों तो उनका मुख्य द्वार, कमरों के स्थान निर्धारण और पंचतत्वों के संतुलन को वास्तु के अनुसार ध्यान में रखना चाहिए।
👉🏻👉🏻👉🏻नए साल में आग्नेय दिशा (पूर्व-दक्षिण का कोना) को सुधारें। इस दिशा में प्रज्‍ज्वलित अग्नि की तस्वीर, मंगल चिन्ह, मोमबत्ती या फिर अग्नि तत्व का प्रतीक त्रिकोण आकृति लगाएं। इस दिशा में लाल, पीला व नारंगी रंग का प्रयोग करें। यदि रात को नींद न आए, बेचैनी रहे, बीमारी से परेशान हैं, तो दक्षिण की दिशा को ठीक करें।
👉🏻👉🏻बंद घड़ियां भी घर से जितनी जल्दी हो सके बिदा कीजिए। यह सीधे किस्मत से कनेक्ट होती है। ध्यान रखें,बंद घड़ी आपकी प्रगति को रोक देती है।
👉🏻👉🏻नव-वर्ष में अपने लक्ष्य को स्वयं अपने हाथों से कागज पर लिख कर अपने घर के काम के मेज पर या सामने दीवार पर टांग लें। साथ ही निश्चित समय सीमा भी बांध लें तो लक्ष्य पूरे करने की ऊर्जा मिलती है।

👉🏻👉🏻आईना (शीश/मिरर/कांच) वास्तुशास्त्र में बहुत महत्व रखता है, अगर आप अपने वॉलेट या पर्स में छोटा आईना रखते हैं तो बहुत ही जल्द धन आपकी ओर आकर्षित होने लगेगा। आपको अलग-अलग जगहों से धन मिलने लगेगा। साथ ही आपको अपने घर में किसी प्रकार की कोई नकारात्मक उर्जा का वास नहीं हो सकता है।
इसलिए बीती ताही बिसार दे आगे की सुधि ले। इस वर्ष में जो कुछ अच्छा या बुरा हुआ उसे भूलकर अपने आगे आने वाले समय के लिए सोचेंगे तो ज्यादा चीजें हासिल कर पाएंगे। अपने घर के आसपास वास्तु दोषों को दूर करके अगर आप नए वर्ष में आगे बढ़ेंगे तो ज्यादा परिणाम हासिल कर पाएंगे।

अंक 19 : इन सरल और साधारण उपायों से करें ग्रहों को खुश…

प्रिय मित्रों/पाठकों, हमारे वैदिक शास्त्रों में वर्णित उपायों में भिन्न-भिन्न ग्रहों को बली करने के लिए विशेष रत्नों के साथ-साथ अनिष्टकारी ग्रहों के निराकरण हेतु विशेष मंत्र जाप करने की व्याख्या भी विशद रूप से दी है। इसके अलावा, ग्रह शांति के उपाय सामान्यजन सरलता से कर सकें इसके लिए प्राचीन शास्त्रों में इसकी जानकारी भी विस्तार से दी गई है। जातक स्वयं इन उपायों को अजमाते हुए ग्रहों के सकारात्मक प्रभावों में बढ़ोत्तरी कर सकता है।
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्योतिष के अनुसार ग्रहों के नीच, पाप या अशुभ प्रभाव में होने से जीवन में बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के समाधान से लिए अनेक उपाय भी किए जाते हैं। सभी ग्रह किसी न किसी संबंधी का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर हम इन उपायों के साथ-साथ अशुभ प्रभाव देने वाले ग्रहों से संबंधित संबंधी या व्यक्ति की सेवा करें, उनका सम्मान करें और उनके साथ अच्छे संबंध बनाए रखें तो शुभ परिणाम मिलने लगते हैं।
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जानिए कैसे करें गुरु-शुक्र को प्रसन्न..

गुरु ग्रह अध्यापक, दादा और बड़े बुजुर्ग के साथ संबंध रखता है। इसलिए इनकी सेवा और सम्मान से अशुभ गुरु शुभ फल देने लगता है। भूरे रंग की गाय को गुड़, चने की भीगी दाल खिलाने से भी गुरु प्रसन्न रहते हैं।

शुक्र ग्रह को प्रसन्न रखने के लिए जीवन साथी के प्रति प्यार व सम्मान बनाए रखना और सदैव वफादार रहना परम आवश्यक है।
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जानिए ग्रहों की सेवा और प्रभाव…

सूर्य ग्रह का संबंध मुख्य रूप से पिता और सरकार से होता है। सूर्य यदि अशुभ फल दे रहा हो तो जातक को अपने पिता, बाबा, नाना या बुजुर्गों की सेवा करना, उनका सम्मान करना और प्रतिदिन चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लेना शुभ होता है। लाल बछड़े वाली गाय को प्रतिदिन चारा देना भी सूर्य को प्रसन्न रखने का उपाय है। चंद्र ग्रह माता का कारक है।

अशुभ फल देने वाले चंद्र के लिए अन्य उपायों के साथ माता, मौसी, नानी, दादी या विधवा महिला की सेवा एवं सम्मान करने से शुभ फल मिलने लगते हैं।

बुध ग्रह का संबंध बुआ, बहन, बेटी आदि से होता है। बुध के अशुभ प्रभाव से छुटकारा पाने के लिए इनकी सेवा करें और इनकी जिम्मेदारी उठाएं।

वहीं दिव्यांग, भिक्षुक, साधु, गाय आदि को हरी वस्तुएं देने से भी बुध प्रसन्न होता है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि अगर आपका सूर्य अशुभ है तो पिता की सेवा करें।

अगर आपका चंद्र अशुभ है तो मां का आशीर्वाद लें।

अगर पिछले जन्म का मां का कर्ज है तो इस जन्म में मंगल अशुभ होगा। मां को मीठा खिलाएं।

अगर आपका बुध अशुभ है तो बहन व बुआ का आशीर्वाद लें। उन्हें प्रसन्न रखें।

गुरु अशुभ है तो समझिए कि पिछले जन्म का मंदिर का ऋण है। अत: मंदिर में सेवा करें। दादा या किसी बजुर्ग की सेवा करें।

अगर कुंडली में शुक्र अशुभ है तो समझिए पिछले जन्म का पत्नी का ऋण है। अपनी पत्नी से कभी तेज आवाज में बात न करें। पत्नी का अपमान न करें। उसे गुलाबी वस्तु उपहार में दें।

अगर कुंडली में शनि-राहु अशुभ हैं तो है अपने अधीनस्थ लोगों को हमेशा खुश रखें। नौकरों पर गुस्सा न करें।

अगर केतु कुंडली में अशुभ है तो पिछले जन्म का पुत्र दोष है। अत: इस जन्म में पुत्र से बैर न रखें। उसे मनचाही वस्तु उपहार में देकर इस ऋण का निवारण करें।
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जानिये राहू और केतु को रिझाएं…

शनि ग्रह चाचा, ताऊ और मजदूर का प्रतिनिधित्व करता है। उनका सम्मान करना चाहिए। राहु ग्रह ससुराल का कारक है। सास, सुसुर, साले और सरहज को सम्मान देने और उनके साथ अच्छे संबंध बनाए रखने से अशुभ राहु शुभ फल देता है। पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र का पालन पोषण करने से केतु के अशुभ प्रभाव दूर होने लगते हैं। पिल्लों को पालने व उन्हें भोजन देना भी केतु को प्रसन्न रखने का आसान उपाय है।

आकाश मंडल में विचरण कर रहे ग्रहों के प्रभाव का मानव प्रकृति पर असर पड़ता है। मनुष्य, पशु-पक्षी, वनस्पति और हर एक सजीव-निर्जीव पर ग्रहों का अच्छा-बुरा असर देखने को मिलता है। जन्मकुंडली में छपे ग्रह और उनके परस्पर क्रास से बनने वाले शुभ व अशुभ योग और ग्रहों की वक्री व मार्गी स्थिति का असर मनुष्यों के जीवन पर पड़ता देखा गया है। कुंडली के शुभ ग्रह अनुकूल स्थितियों में जातक के लिए शुभ समाचार तथा कुंडली के अशुभ ग्रह या शुभ ग्रहों के प्रतिकूल स्थितियों में होने पर जातक के लिए अशुभ समाचार लेकर आते हैं। इसलिए, ग्रहों के खराब असर से मनुष्यों को सुरक्षित रखने के लिए हमारे दिव्य दृष्टा ऋषि-मुनियों ने ज्योतिष शास्त्र में अनेक ज्योतिषीय उपायों द्वारा मानव कल्याण के रास्ते बताएं हैं।

अंक 18 : जानिए कैसे करें रत्नों के माध्यम से रोगोपचार

प्रिय मित्रों/पाठकों, ज्योतिष शास्त्र मानता है कि रत्नों को कुंडली के अनुसार धारण करने से रत्न जातक में रोगों से लड़ने की शक्ति पैदा करते हैं। आयुर्वेद में रत्नों की भस्म द्वारा रोग निवारण के प्रयोग बताए गए हैं। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जीवन में सुख की कामना की पूर्ति के लिए रत्‍न धारण करने की सलाह दी जाती है। ग्रहों के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए रत्‍न पहने जाते हैं लेकिन सेहत पर भी इन रत्‍नों का बहुत बढिया असर देखेने को मिलता है। कई रोगों से बचाव के लिए रत्‍न धारण किए जाते हैं।

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार रत्न ना केवल भाग्योदय कारक होते अपितु स्वास्थ्य रक्षा तथा रोगोपचार में भी इनका महत्व है क्योंकि रत्न भी उन्हीं तत्वों और यौगिकों के सम्मिश्रण से बने हैं जिनसे मानव देह और ब्रह्मांड। अपने यौगिकों के अनुसार ही इन रत्नों का रंग होता है। अपनी आकर्षण एवं विकर्षण शक्तियों के द्वारा शरीर में विभिन्न तत्वों का संतुलन बनाए रखने में ये सक्षम होते हैं तथा जिस तत्व (दोष या मल) की वृद्धि से शरीर में विकृति (रोग) उत्पन्न हुई हो उसे नियंत्रित करते हैं।

रत्न धारण से स्वास्थ्य लाभ और रोगोपचार तो होता ही है, आयुर्वेद में भी विभिन्न रत्नों की भस्म आदि के द्वारा रोगी का उपचार होता है। रत्न धारण में रत्नों के द्वारा विभिन्न रंगों की बह्मांडीय ग्रह रश्मियों, किरणों को शरीर में प्रविष्ट कराकर विसर्जित किया जाता है, क्योंकि रत्न इसके सशक्त माध्यम हैं। विद्वानों ने विभिन्न रत्नों का स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है और किस रत्न से किस रोग की शांति होती है इस पर व्यापक अनुसंधान किया है।

रत्न भाग्योन्नति में तो सहायक होते ही हैं क्योंकि रत्नों में ग्रहों की ऊर्जा होती है। यही शुभ ऊर्जा स्वास्थ्य भी प्रदान करती है।
रत्न धारण करने के लिए हमेशा कुंडली का सही निरिक्षण अति आवश्यक है। कुंडली के सही निरिक्षण के बिना रत्न धारण करना नुकसान दायक हो सकता है। अतः किसी योग्य ओर अनुभवी ज्योतिर्विद से परामर्श लेकर रोग अनुसार रत्न धारण करना चाहिए।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि किसी भी जन्म कुण्डली में लग्न, मनुष्य का आईना होता है। इसमें जातक के शरीर, स्वभाव, रूप, गुण आदि का विचार किया जाता है। शास्त्रों में इसके आधार पर रोगों का विचार भी किया जाता है। लग्न के अनुसार शरीर को लग रहे रोगों के बारे में हम जान सकते हैं। रोग होने से पहले हम सावधानियां रख सकते हैं। हम रत्न धारण द्वारा भी अनेक रोगों से मुक्ति पा सकते हैं।

उच्च रक्तचाप और रत्न चिकित्सा:-

चन्द्रमा हृदय का स्वामी है। चन्द्रमा के पीड़ित होने पर इस रोग की संभावना बनती है। जिनकी जन्मपत्री में सूर्य, शनि, चन्द्र, राहु अथवा मंगल की युति कर्क राशि में होती है उन्हें भी इस रोग की आशंका रहती है। पाप ग्रह राहु और केतु जब चन्द्रमा के साथ योग बनाते हैं तब इस स्थिति में व्यक्ति को उच्च रक्तचाप की समस्या का सामना करना होता है। मिथुन राशि में पाप ग्रहों की उपस्थिति होने पर भी यह रोग पीड़ित करता है। इस रोग की स्थिति में 7-9 रत्ती का मूंगा धारण करना लाभप्रद होता है। चन्द्र के रत्न मोती या मूनस्टोन भी मूंगा के साथ धारण करने से विशेष लाभ मिलता है।
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तपेदिक और रत्न चिकित्सा:- तपेदिक एक घातक रोग है। नियमित दवाईयों के सेवन से इस रोग को दूर किया जा सकता है। अगर उपयुक्त रत्नों को धारण किया जाए तो चिकित्सा का लाभ जल्दी प्राप्त हो सकता है। ज्योतिष विधा के अनुसार जब मिथुन राशि में चन्द्रमा, शनि, अथवा बृहस्पति होता है या कुम्भ राशि में मंगल और केतु पीड़ित होता है तो तपेदिक रोग की संभावना बनती है। इस रोग से पीड़ित होने पर पुखराज, मोती अथवा मूंगा धारण करना लाभप्रद होता है।
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पैरों में रोग और रत्न चिकित्सा :-

शरीर के अंगों में पैरों का स्वामी शनि होता है। पैरों से सम्बन्धित पीड़ा का कारण शनि का पीड़ित या पाप प्रभाव में होना है। ज्योतिषीय मतानुसार जन्मपत्री के छठे भाव में सूर्य अथवा शनि होने पर पैरों में कष्ट का सामना करना होता है। जल राशि मकर, कुम्भ अथवा मीन में जब राहु, केतु, सूर्य या शनि होता है तब पैरों में चर्म रोग होने की संभावना बनती है। पैरों से सम्बन्धित रोग में लाजवर्त, नीलम अथवा नीली एवं पुखराज धारण करने से लाभ मिलता है।
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त्वचा रोग और रत्न चिकित्सा :-

शुक्र त्वचा का स्वामी ग्रह है। बृहस्पति अथवा मंगल से पीड़ित होने पर शुक्र त्वचा सम्बन्धी रोग जैसे दाद, खाज, खुजली, एक्जीमा देता है। कुण्डली में सूर्य और मंगल का योग होने पर भी त्वचा सम्बन्धी रोग की सम्भावना रहती है। मंगल मंद होने पर भी इस रोग की पीड़ा का सामना करना पड़ सकता है। जन्मपत्री में इस प्रकार की स्थिति होने पर हीरा, स्फटिक या मूंगा धारण करने से लाभ मिलता है।
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बवासीर और रत्न चिकित्सा :-

बवासीर गुदा का रोग है। जन्मकुण्डली का सप्तम भाव गुदा का कारक होता है। जिनकी जन्मपत्री के सप्तम भाव में पाप ग्रहों की उपस्थिति होती है उन्हें इस रोग की संभावना रहती है, मंगल की दृष्टि इस संभावना को और भी प्रबल बना देती है। मंगल की राशि वृश्चिक कुण्डली में पाप प्रभाव में होने से भी बवासीर होने की संभवना को बल मिलता है। अष्टम भाव में शनि व राहु हो अथवा द्वादश भाव में चन्द्र और सूर्य का योग हो तो इस रोग की पीड़ा का सामना करना होता है। इस रोग में मोती, मूनस्टोन अथवा मूंगा धारण करना रत्न चिकित्सा की दृष्टि से लाभप्रद होता है।
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भूलने की बीमारी और रत्न चिकित्सा :-

इस रोग में बीती हुई बहुत सी घटनाएं अथवा बातें याद नहीं रहती है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कुण्डली में जब लग्न और लग्नेश पाप पीड़ित होते हैं तो इस प्रकार की स्थिति होती है.सूर्य और बुध जब मेष राशि में होता है और शुक्र अथवा शनि उसे पीड़ित करते हैं तो स्मृति दोष की संभावना बनती है.साढे साती के समय जब शनि की महादशा चलती है उस समय भी भूलने की बीमारी की संभावना प्रबल रहती ह.रत्न चिकित्सा पद्धति के अनुसार मोती और माणिक्य धारण करना इय रोग मे लापप्रद होता है I
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सफेद दाग़ और रत्न चिकित्सा :-

सफेद दाग़ त्वचा सम्बन्धी रोग है.इस रोग में त्वचा पर सफेद रंग के चकत्ते उभर आते हैं.यह रोग तब होता है जब वृष, राशि में चन्द्र, मंगल एवं शनि का योग बनता है.कर्क, मकर, कुम्भ और मीन को जल राशि के नाम से जाना जाता है.चन्द्रमा और शुक्र जब इस राशि में युति बनाते हैं तो व्यक्ति इस रोग से पीड़ित होने की संभावना रहती है.बुध के शत्रु राशि में होने पर अथवा वक्री होने पर भी इस रोग की संभावना बनती है.इस रोग की स्थिति में मोती एवं पुखराज धारण करने से लाभ मिलता है I
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गंजापन और रत्न चिकित्सा :- गंजापन बालों के झड़ने से सम्बन्धित रोग है.आनुवांशिक कारणों के अलावा यह रोग एलर्जी अथवा किसी अन्य रोग के कारण होता है.जिनकी कुण्डली के लग्न स्थान में तुला अथवा मेष राशि में स्थित होकर सूर्य शनि पर दृष्टि डालता है उन्हें गंजेपन की समस्या से पीड़ित होने की संभावना अधिक रहती है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार नीलम और पन्ना धारण करके इस समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है I
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मधुमेह और रत्न चिकित्सा :- ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मधुमेह यानी डयबिटीज का सामना उस स्थिति में करना होता है जबकि कर्क, वृश्चिक अथवा मीन राशि में पाप ग्रहों की संख्या दो या उससे अधिक रहती है.लग्नपति के साथ बृहस्पति छठे भाव में हो तुला राशि में पाप ग्रहों की संख्या दो अथवा उससे अधिक हो तो इस रोग की संभावना बनती है.अष्टमेश और षष्ठेश कुण्डली में जब एक दूसरे के घर में होते हैं तब भी इस रोग का भय रहता है.रत्न चिकित्सा के अन्तर्गत इस रोग में मूंगा और पुखराज धारण करना लाभप्रद होता है I
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दन्त रोग और रत्न ज्योतिष :- दांतों का स्वामी बृहस्पति होता है.कुण्डली में बृहस्पति के पीड़ित होने पर दांतों में तकलीफ का सामना करना होता है.ज्योतिषशास्त्र के अनुसार बृहस्पति जब नीच राशि में होता है अथवा द्वितीय, नवम एवं द्वादश भाव में होता है तब दांत सम्बन्धी तकलीफ का सामना करना होता है.मूंगा और पुखराज इस रोग में लाभदायक होता है I

अंक 17 : जानिए सूर्यदेव और ज्योतिष के सम्बंध(प्रभाव) को…

प्रिय मित्रों/पाठकों, भारतीय ज्योतिष में सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है। सूर्य से सम्बन्धित नक्षत्र कृतिका उत्तराषाढा और उत्तराफ़ाल्गुनी हैं। यह भचक्र की पांचवीं राशि सिंह का स्वामी है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि सूर्य पिता का प्रतिधिनित्व करता है, लकड़ी मिर्च घास हिरन शेर ऊन स्वर्ण आभूषण तांबा आदि का भी कारक है। मन्दिर सुन्दर महल जंगल किला एवं नदी का किनारा इसका निवास स्थान है। शरीर में पेट आंख ह्रदय चेहरा का प्रतिधिनित्व करता है। और इस ग्रह से आंख सिर रक्तचाप गंजापन एवं बुखार संबन्धी बीमारी होती हैं। सूर्य की जाति क्षत्रिय है। शरीर की बनाव सूर्य के अनुसार मानी जाती है। हड्डियों का ढांचा सूर्य के क्षेत्र में आता है। सूर्य का अयन ६ माह का होता है। ६ माह यह दक्षिणायन यानी भूमध्य रेखा के दक्षिण में मकर वृत पर रहता है, और ६ माह यह भूमध्य रेखा के उत्तर में कर्क वृत पर रहता है। इसका रंग केशरिया माना जाता है। धातु तांबा और रत्न माणिक उपरत्न लाडली है। यह पुरुष ग्रह है। इससे आयु की गणना ५० साल मानी जाती है। सूर्य अष्टम मृत्यु स्थान से सम्बन्धित होने पर मौत आग से मानी जाती है। सूर्य सप्तम द्रिष्टि से देखता है। सूर्य की दिशा पूर्व है। सबसे अधिक बली होने पर यह राजा का कारक माना जाता है। सूर्य के मित्र चन्द्र मंगल और गुरु हैं। शत्रु शनिऔर शुक्र हैं। समान देखने वाला ग्रह बुध है। सूर्य की विंशोत्तरी दशा ६ साल की होती है। सूर्य गेंहू घी पत्थर दवा और माणिक्य पदार्थो पर अपना असर डालता है। पित्त रोग का कारण सूर्य ही है। और वनस्पति जगत में लम्बे पेड का कारक सूर्य है। मेष के १० अंश पर उच्च और तुला के १० अंश पर नीच माना जाता है। सूर्य का भचक्र के अनुसार मूल त्रिकोण सिंह पर ० अंश से लेकर १० अंश तक शक्तिशाली फ़लदायी होता है। सूर्य के देवता भगवान शिव हैं। सूर्य का मौसम गर्मी की ऋतु है। सूर्य के नक्षत्र कृतिका का फ़ारसी नाम सुरैया है। और इस नक्षत्र से शुरु होने वाले नाम ’अ’ ई उ ए अक्षरों से चालू होते हैं। इस नक्षत्र के तारों की संख्या अनेक है। इसका एक दिन में भोगने का समय एक घंटा है।
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ऋग्वेद के देवताओं कें सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। यजुर्वेद ने “चक्षो सूर्यो जायत” कह कर सूर्य को भगवान का नेत्र माना है। छान्दोग्यपनिषद में सूर्य को प्रणव निरूपित कर उनकी ध्यान साधना से पुत्र प्राप्ति का लाभ बताया गया है। ब्रह्मवैर्वत पुराण तो सूर्य को परमात्मा स्वरूप मानता है। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र सूर्य परक ही है। सूर्योपनिषद में सूर्य को ही संपूर्ण जगत की उतपत्ति का एक मात्र कारण निरूपित किया गया है। और उन्ही को संपूर्ण जगत की आत्मा तथा ब्रह्म बताया गया है। सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते है। सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं। अत: कोई आश्चर्य नहीं कि वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। पहले यह सूर्योपासना मंत्रों से होती थी। बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ तो यत्र तत्र सूर्य मन्दिरों का नैर्माण हुआ। भविष्य पुराण में ब्रह्मा विष्णु के मध्य एक संवाद में सूर्य पूजा एवं मन्दिर निर्माण का महत्व समझाया गया है। अनेक पुराणों में यह आख्यान भी मिलता है, कि ऋषि दुर्वासा के शाप से कुष्ठ रोग ग्रस्त श्री कृष्ण पुत्र साम्ब ने सूर्य की आराधना कर इस भयंकर रोग से मुक्ति पायी थी। प्राचीन काल में भगवान सूर्य के अनेक मन्दिर भारत में बने हुए थे। उनमे आज तो कुछ विश्व प्रसिद्ध हैं। वैदिक साहित्य में ही नहीं आयुर्वेद, ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्रों में सूर्य का महत्व प्रतिपादित किया गया है।
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जानिए ज्योतिष विज्ञान के अनुसार आपका सूर्य कब अच्छा, कब शुभ फल देगा —
सूर्य संजीवनी जैसा फल देता है। सूर्य आपकी आत्मा है। इसीलिए, जन्मकुंडली का विचार करते समय ज्योतिष गण सूर्य का विचार पहले करते हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री कर अनुसार यह पूर्व दिशा में स्थान बली बनता है। राशि चक्र की 5वीं राशि यानी सिंह पर इसका आधिपत्य है। इसलिए, सिंह राशि में सूर्य स्वगृही बनता है। मेष राशि में 10 अंश का होने पर यह परम उच्च का हो जाता है। यानी यह बहुत ही अच्छी स्थिति में पहुंचकर अति शुभ हो जाता है। वहीं तुला राशि में 10 अंश का सूर्य नीच का गिना जाता है। इसके अलावा, मेष राशि में सूर्य में 0 से 10 अंश या डिग्री तक मूल त्रिकोण का होता है।

नक्षत्र के अनुसार मेष राशि में यह कृतिका नक्षत्र के प्रथम चरण, वृषभ राशि में 2,3,4 चरण, सिंह राशि में उत्तरा फाल्गुनी का प्रथम चरण, कन्या राशि में 2,3,4 चरण और धनु राशि में उत्तराषाढ़ा के प्रथम चरण और मकर राशि में उत्तराषाढ़ा के 2,3,4 चरण पर इसका आधिपत्य है।

विभिन्न ग्रहों की सूर्य से दूरी यह बताती है कि जातक पर सूर्य का कैसा शुभाशुभ प्रभाव पड़ेगा। साथ ही सूर्य किस राशि में है, वह उसकी नीच राशि, उच्च राशि, स्वगृही, मित्र या शत्रु राशि तो नहीं यह सब भी फलित ज्योतिष में फलादेश करते समय एक ज्योतिषी ध्यान में रखता है।
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ज्योतिष विद्याओं में अंक विद्या भी एक महत्वपूर्ण विद्या है। जिसके द्वारा हम थोडे समय में ही प्रश्न कर्ता के उत्तर दे सकते है।] अंक विद्या में “१” का अंकसूर्य को प्राप्त हुआ है। जिस तारीखको आपका जन्म हुआ है, उन तारीखों में अगरआपकी जन्म तारीख १,१०,१९,२८, है तो आपका भाग्यांक सूर्य का नम्बर “१”ही माना जायेगा.इसके अलावा जो आपका कार्मिक नम्बर होगा वह जन्म तारीख,महिना, और पूरा सन जोड़ने केबाद जो प्राप्त होगा, साथ ही कुल मिलाकर अकेले नम्बर को जब सामने लायेंगे, और वह नम्बर एक आताहै तो कार्मिक नम्बर ही माना जायेगा। जिन लोगों के जन्मतारीख के हिसाब से “१” नम्बर ही आता है उनके नाम अधिकतर ब, म, ट, और द से ही चालू होतेदेखे गये हैं। अम्क १ शुरुआती नम्बर है, इसके बिना कोई भी अंक चालूनहीं हो सकता है। इस अंक वाला जातक स्वाभिमानी होता है, उसके अन्दर केवल अपनेही अपने लिये सुनने की आदत होती है। जातक के अन्दर ईमानदारी भी होती है, और वह किसी के सामनेझुकने के लिये कभी राजी नहीं होता है। वह किसी के अधीन नहीं रहना चाहता है और सभीको अपने अधीन रखना चाहता है। अगर अंक १ वाला जातक अपने ही अंक के अधीन होकर यानीअपने ही अंक की तारीखों में काम करता है तो उसको सफ़लता मिलती चली जाती है। सूर्यप्रधान जातक बहुत तेजस्वी सदगुणी विद्वान उदार स्वभाव दयालु, और मनोबल में आत्मबल से पूर्ण होता है। वहअपने कार्य स्वत: ही करता है किसी के भरोसे रह कर काम करना उसे नहीं आता है। वह सरकारी नौकरी और सरकारी कामकाज केप्रति समर्पित होता है। वह अपने को अल्प समय में ही कुशल प्रसाशक बनालेता है। सूर्यप्रधान जातक में कुछ बुराइयां भी होतीं हैं। जैसे अभिमान,लोभ,अविनय,आलस्य,बाह्य दिखावा,जल्दबाजी,अहंकार, आदि दुर्गुण उसके जीवन में भरेहोते हैं। इन दुर्गुणों के कारण उसका विकाश सही तरीके से नहीं हो पाता है। साथ हीअपने दुश्मनो को नहीं पहिचान पाने के कारण उनसे परेशानी ही उठाता रहता है। हर काममें दखल देने की आदत भी जातक में होती है।
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ॐ सः सूर्याय नमः…

आदित्य, भास्कर या भगवान सूर्य की महिमा का बखान शब्दों में करना बहुत मुश्किल है। मनुष्य के संपूर्ण विकास में सूर्य की रोशनी का कितना महत्व है, इसे साइंस भी मानता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सूर्य, सौरमंडल का मुख्य प्रतिनिधि तारा है इसलिए एस्ट्रोलॉजी में इसका माहात्म्य भी सबसे अधिक है। मनुष्य सहित सभी जीवों पर सूर्य की रश्मियां अपना गहरा असर छोड़ती हैं। इन किरण रश्मियों से मनुष्य का भाग्य बहुत ज्यादा प्रभावित होता है।

यदि किसी इंसान के जन्म समय पर सूर्य की स्थिति कमजोर होती है तो जीवनभर उसका भाग्य डांवाडोल ही रहता है। सूर्य की अशुभ भावों में मौज़ूदगी जातक से पद-प्रतिष्ठा, वैभव, संपत्ति आदि छीन लेती है। ऐसे में उचित ज्योतिषीय उपायों का प्रयोग करना चाहिए ताकि सूर्य के सकारात्मक प्रभाव को बढ़ाकर जिंदगी में सफलता पाई जा सके।
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हस्तरेखा में सूर्य–

किसी भी जातक के जीवन में होने वाले प्रभाव को हथेली में अनामिका उंगली की जड में सूर्य पर्वत और उस पर बनी रेखाओं को देख कर सूर्य की स्थिति का पता लगाया जा सकता है। सूर्य पर्वत पर बनी रेखायें ही सूर्य रेखा या सूर्य रेखायें कहलाती है।अनामिका उंगली के तर्जनी से लम्बी होने की स्थिति में ही व्यक्ति के राजकीय जीवन का फ़ल कथन किया जाता है। उन्नत पर्वत होने पर और पर्वत के मध्य सूक्ष्म गोल बिन्दु होने पर पर्वत के गुलाबी रंग का होने पर प्रतिष्ठ्त पद का कथन किया जाता है। इसी पर्वत के नीचे विवाह रेखा के उदय होने पर विवाह में राजनीति के चलते विवाह टूटने और अनैतिक सम्बन्धों की जानकारी मिलती है।
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विविध ग्रहों के साथ सूर्य की युति का कुंडली पर प्रभाव—

सूर्य में से निकलने वाली किरणें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अन्य ग्रहों को प्रकाशित करती है। इसलिए ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रह का प्रभाव महत्वपूर्ण कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य यानी आत्मा और चंद्रमा यानी मन

जानिए जब सूर्य आपकी कुंडली में अलग–अलग ग्रहों के साथ होता है तो आपके लिए कैसे शुभ या अशुभ फल लेकर आता है।

सूर्य और चंद्र की युति—
ज्योतिष के नजरिये से सूर्य और चंद्रमा की बात करें तो सूर्य–चंद्र की युति जातक को दृढ़ निश्चयी बनाती है। यहां पर चंद्रमा सूर्य के कारकत्व को बढ़ा देता है।

सूर्य और मंगल की युति–
सूर्य व मंगल अर्थात आत्मा और साहस साथ–साथ हो तो वैदिक ज्योतिष के अनुसार अंगारक दोष बनता है। एेसे जातक बहुत गुस्सैल किस्म के होते हैं। किसी भी निर्णय में जल्दबाजी करते हैं जिसकी वजह से बहुधा अपनी टांग पर स्वयं ही कुल्हाड़ी मार लेते हैं। मुसीबत मोल ले लेते हैं।

सूर्य और बुध की युति–
सूर्य और बुध की युति का विचार करें तो सूर्य (आत्मा) और बुध (बुद्धि) का समन्वय जातक को आंतरिक बुद्धि और वाह्य बुद्धि की एकरूपता को दर्शाता है। ग्रहों की एेसे युति वाले जातक निर्णय लेने में अत्यंत अडिग होते हैं। पिता और पुत्र दोनों की शैक्षणिक योग्यता अच्छी होती है। समाज में प्रतिष्ठित रहता है।

सूर्य और गुरु की युति–
सूर्य व गुरु अगर कुंडली में अगर एक साथ हो तो बहुत ही अच्छे आध्यात्मिक योग का निर्माण होता है। वेदों में सूर्य को आत्मा और गुरु को आंतरिक बुद्धि यानी अंतर्मन कहा गया है। सूर्य व गुरु की युति जातक को धर्म और अध्यात्म की ओर ले जाती है। इस युति का नकारात्मक पक्ष केवल इतना रहता है कि इससे जातक जिद्दी सा हो जाता है।

सूर्य और शुक्र की युति–
सूर्य व शुक्र यदि कुंडली में साथ आ जाए तो क्या कहने ! शुक्र जीवन की उमंग है तो सूर्य उसको देने वाली ऊर्जा। कुंडली में एेसे गुणों वाला जातक अपनी लाइफ को रॉयल यानी शाही तरीके से जीता है। हालांकि, पर्सनल लाइफ में मनमुटाव और असंतोष की भावना पैदा होने से भी इंकार नहीं किया जा सकता। जातक यदि अपनी लालसाओं पर काबू नहीं रख पाता तो वह विलासी, सौंदर्य प्रिय और स्त्री प्रिय होकर चीजों पर धन लुटाता रहता है।

सूर्य और शनि की युति–
सूर्य और शनि की युति होने पर यानी सूर्य और शनि यदि कुंडली में साथ बैठ जाएं तो शापित दोष बना लेते हैं। एेसे जातक के जीवन के अधिकांश भाग में संघर्षपूर्ण स्थिति पैदा हो जाती है। यहां दिलचस्प बात यह है कि पुराणों के अनुसार सूर्य और शनि के पिता–पुत्र के संबंध होने पर भी एक दूसरे के शत्रु हैं। इस प्रकार से पिता–पुत्र के बीच वैर व नाराजगी बढ़ जाने की आशंका बढ़ जाती है। नौकरीपेशा लोगों का वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मतभेद और असंतोष पैदा होता है।

सूर्य और राहु की युति–
सूर्य और राहु अगर किसी कुंडली में युति में आ जाएं तो ज्योतिषीय दृष्टि से ग्रहण योग बना लेते हैं। अगर ये डिग्रीकल (अंशात्मक) नजदीक हो और यह दोष कुंडली में 2,6,8 या 12वें भाव में बन रहा हो तो पितृदोष भी बनाता है। एेसे जातक को अपने जीवन के तमाम क्षेत्रों में अवरोध का सामना करना पड़ता है। मुसीबतों के पीछा न छोड़ने की वजह से जातक का अपने ऊपर से से भी आत्मविश्वास उठ जाता है।

सूर्य और केतु की युति–
सूर्य और केतु के साथ होने पर जातक के अंदर सूर्य के गुणों में कमी आ जाती है। वह मूर्ख, चंचल दिमाग का अस्थिर, विचित्र प्रवृत्ति, अन्याय का साथ देने वाला, हानिकारक एवं शंकालु स्वभाव का होता है।
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जानिए सूर्य किन बातों का प्रतिनिधित्व करता है, किन-किन वस्तुओं का कारक है—

ये तो सभी जानते हैं कि सूर्य एक तारा है जिसका स्वयं का प्रकाश है। अत्याधिक तप्त होने के कारण सूर्य का प्रभाव पृथ्वी पर सर्वाधिक पड़ता है। इसलिए मनुष्य के लिए इसकी उपयोगिता भी सबसे अधिक होती है।

सूर्य का कारकत्व उन सभी बातों पर प्रभाव डालता है जिसका प्राण और सूक्ष्म तत्व से संबध होता है। सूर्य यश-प्रतिष्ठा-वैभव का सर्वोत्तम प्रतीक है। सूर्य पिता का भी कारक है। यानि ऐसी बातें जो पोषण के लिए जिम्मेदार हैं, उनका भी कारक सूर्य है।
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सूर्य ग्रह के जप हेतु विभिन्न वैदिक ओर शाबर मंत्र–
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विनियोग :- ऊँ आकृष्णेनि मन्त्रस्य हिरण्यस्तूपांगिरस ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्द: सूर्यो देवता सूर्यप्रीत्यर्थे जपे विनियोग:

देहान्गन्यास :- आकृष्णेन शिरसि, रजसा ललाटे, वर्तमानो मुखे, निवेशयन ह्रदये, अमृतं नाभौ, मर्त्यं च कट्याम, हिरण्येन सविता ऊर्व्वौ, रथेना जान्वो:, देवो याति जंघयो:, भुवनानि पश्यन पादयो:.

करन्यास :- आकृष्णेन रजसा अंगुष्ठाभ्याम नम:, वर्तमानो निवेशयन तर्जनीभ्याम नम:, अमृतं मर्त्यं च मध्यामाभ्याम नम:, हिरण्ययेन अनामिकाभ्याम नम:, सविता रथेना कनिष्ठिकाभ्याम नम:, देवो याति भुवनानि पश्यन करतलपृष्ठाभ्याम नम:

ह्रदयादिन्यास :- आकृष्णेन रजसा ह्रदयाय नम:, वर्तमानो निवेशयन शिरसे स्वाहा, अमृतं मर्त्यं च शिखायै वषट, हिरण्येन कवचाय हुम, सविता रथेना नेत्रत्र्याय वौषट, देवो याति भुवनानि पश्यन अस्त्राय फ़ट (दोनो हाथों को सिर के ऊपर घुमाकर दायें हाथ की पहली दोनों उंगलियों से बायें हाथ पर ताली बजायें.

ध्यानम :- पदमासन: पद मकरो द्विबाहु: पद मद्युति: सप्ततुरंगवाहन:। दिवाकरो लोकगुरु: किरीटी मयि प्रसादं विदधातु देव: ॥
👉🏻👉🏻सूर्य गायत्री :- ऊँ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात.

👉🏻🌸सूर्य बीज मंत्र :- ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: ऊँ भूभुर्व: स्व: ऊँ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतम्मर्तंच। हिण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन ऊँ स्व: भुव: भू: ऊँ स: ह्रौं ह्रीं ह्रां ऊँ सूर्याय नम: ॥

👉🏻👉🏻सूर्य जप मंत्र :- ऊँ ह्राँ ह्रीँ ह्रौँ स: सूर्याय नम:। नित्य जाप ७००० प्रतिदिन।
👉🏻👉🏻मंत्र ‘ॐ घृणि सूर्याय नम:’ है।
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ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि जन्म कुंडली मे सूर्य की नकारात्मक ऊर्जा मनुष्य को हर क्षेत्र में पीछे धकेल देती है। इसलिए सूर्य के प्रभाव को बढ़ाने के लिए अग्रलिखित उपाय आवश्यक हैं–

  1. गुरुजनों, बुजुर्ग एवं माता-पिता की जितनी ही सेवा की जाएगी सूर्य का बल भी उतना ही अधिक बढ़ेगा।
  2. किसी योग्य रत्नविद द्वारा सुझाए भार का माणिक्य सोने की अंगूठी में बनवाकर अनामिका अंगुली में रविवार को धारण करें। इसके विकल्प के रूप में गार्नेट उपरत्न भी धारण कर सकते हैं।
  3. सूर्य को जल देते हुए प्रतिदिन 108 बार निम्नलिखित मंत्र का जप करें:

ॐ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात (रविवार से शुरू करें)।

  1. गाय को गेहूं और गुड़ मिलाकर खिलाएं या हर रविवार को किसी ब्राह्मण को गेहूं का दान करें।

अंक 17 : तो वास्तु दोष बना रमन सरकार की लैंडस्लाइड हार-जीत का कारण !

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वास्तुविद देव नारायण शर्मा, रायपुर (छत्तीसगढ़)..
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” क्या वास्तुदोष की वजह से हुई बीजेपी की छत्तीसगढ़ में हार “

छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद से चार चुनाव हुए उसमे से तीन चुनाव में लगातार बीजेपी ने शानदार जीत दर्ज की ।

मूलतः छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है ,लेकिन बीजेपी का लगातार जीत दर्ज करने के कुछ तो कारण होंगे ।

2018 के चुनाव में कांग्रेस ने राज्य बनने के बाद पहली बार दो तिहाई बहुमत से जीत दर्ज की ।

कांग्रेस का पुराना भवन :-

कांग्रेस का पुराना भवन वास्तु दोष से भरा हुवा है ।

कांग्रेस के पुराने भवन में अध्यक्ष का बैठक ईशान कोण में और मुख्य प्रवेश द्वार नैऋत्य कोण में है ।

ईशान कोण में शौचालय भी बना हुवा है ।

नैऋत्य कोण का द्वार हमेशा अनुशासन हीनता देता है ।

बीजेपी का पुराना भवन :- पूर्णतः वास्तु शास्त्र के अनुकूल है ।
इसी भवन से बीजेपी ने तीन बार सरकार बनाई ।

अजित जोगी की सरकार बनी थी जब म.प्र. और छत्तीसगढ़ एक थे ।

बुनियादी परिवर्तन :-

जब विपरीत परिस्थिति आने को रहता है तो जातक पुराने भवन को छोड़कर बड़े और विशाल भवन में प्रवेश करता है।

ठीक यही स्थिति छत्तीसगढ़ में हुई।
बीजेपी ने जैसे ही अपने नए भवन में प्रवेश किया तब से बीजेपी की उल्टी गिनती शरू हो गयी ।

बीजेपी का नया भवन पूरी तरह से वास्तु दोषों से भरा हुवा है।

बीजेपी के नया भवन दक्षिण दिशा का है जिसमें कांगेस के पुराने भवन के समान नैऋत्य कोण में मुख्य द्वार बना हुवा है।

नैऋत्य कोण का द्वार से अनहोनी होती है।
मुखिया का राजपाट चला जाता है।

इसके विपरीत जैसे ही कांग्रेस ने शंकर नगर स्थित पूर्णतः वास्तु अनुरूप भवन में प्रवेश किया वैसे ही कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में नया जोश और उत्साह देखने को मिला।
तीन राज्यों में बीजेपी की सरकार थी पर बुरी तरह चुनाव में पराजय का सामना केवल और केवल छत्तीसगढ़ में हुवी।

चुनावों ने तीन बातों का प्रभाव पड़ता है —

आपका कर्म
आपका भाग्य
आपका वास्तु

जिसका वास्तु अच्छा रहेगा वो अपनी बढ़त जरूर बनाएगा।

अगर बीजेपी को लोकसभा चुनाव से पहले अपनी वापसी करनी है तो अपने नए भवन में ताला लगाकर पुराने भवन से पार्टी का संचालन करना चाहिए।

बीजेपी के नए भवन में वास्तु दोष..

नए भवन में नैऋत्य कोण में द्वार बना था जिसे वास्तु दोष की वजह से बंद करना पड़ा ।

नैऋत्य कोण के द्वार के ठीक सामने आने जाने का रास्ता बनाया गया है जिसमे एक विशाल पेड़ है जो वृक्ष वेध कर रहा है ।

दक्षिण दिशा में आग्नेय कोण में ही एक और द्वार बना है जो अत्यंत घातक है ।

उत्तर दिशा में निर्माण किया हुवा है जबकि दक्षिण दिशा खाली है ।
दक्षिण दिशा का स्वामी यम अर्थात मृत्यु का देवता होता है।
दक्षिण दिशा का खाली होने मृत्यु तुल्य कष्ट देता है ।
चुनाव में बुरी तरह हारना मृत्यु तुल्य कष्ट ही है।

दक्षिण दिशा में ज्यादा खुली जगह होने के दोष को दूर करने के लिए दक्षिण में नया निर्माण किया जा रहा है ।
पर दक्षिण दिशा में बेसमेंट भी बनाया जा रहा है।

क्या किसी वास्तु सलाहकार ने बीजेपी को गलत सलाह देकर निपटाया यह भी शहर में चर्चा का विषय है।

कांग्रेस के सूत्र तो यहाँ तक कहते हैं कि जब बीजेपी के नए भवन का निर्माण किया जा रहा था तब हैदराबाद के एक वास्तु सलाहकार को कांग्रेस के लोगों ने निर्माण कार्य देख रहे बीजेपी के नेता से मिलवाया था।
उस वास्तु सलाहकार को बीजेपी को गलत वास्तु सलाह देने के लिए कांग्रेस के लोगों ने पैसे दिए थे।
कहते है प्यार और युध्द में सब कुछ जायज है ।

चुनाव जीतने के लिए कुछ भी किया जा सकता है ।

लेकिन भारत के इतिहास में यह पहली बार हुवा कि विरोधी पार्टी को चुनाव में हराने के लिए वास्तु
शास्त्र का उपयोग किया गया ।
कांग्रेस का नया भवन वास्तु अनुरूप है :-

कांग्रेस के नए भवन में अध्यक्ष का बैठक नैऋत्य कोण में लाभदायक है।

मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर मध्य में लाभदायक है ।

भूखण्ड के तिरछे पन को दूर करने के लिए भूखण्ड को कई हिस्से में बांटा गया है ।

लिफ्ट और सीढ़ी की जगह भी वास्तु अनुरूप है ।

अंक 17 : जानिए कौन से ज्योतिषीय योग बनाते हैं आपको धनवान…

प्रिय मित्रों/पाठकों, यदि आप थोड़ा-बहुत ज्योतिष भी जानते हैं तो खुद देख लीजिए आपकी जन्म कुंडली में धनवान होने के योग, कितना पैसा है आपकी किस्मत में…
जानिए ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जन्म कुण्डली के कुछ प्रमुख धनवान बनाने वाले योग को —

—यदि लग्न से तीसरे, छठे, दसवें व ग्यारहवें भाव में शुभ ग्रह बैठे हों।
— सप्तमेश दशम भाव में अपनी उच्च राशि में हो।
— जब सप्तमेश दशम भाव में हो तथा दशमेश अपनी उच्च राशि में नवमेश के साथ हो।
— अगर जन्मकुंडली के दूसरे भाव में शुभ ग्रह बैठा हो तो जातक के पास अथाह पैसा आता है।
—धनेश व लाभेश उच्च राशिगत हों।
— जब चंद्रमा व बृहस्पति की किसी शुभ भाव में यु‍ति हो।
— बृहस्पति धनेश होकर मंगल के साथ हो।
— जब चंद्र व मंगल दोनों एकसाथ केंद्र में हों।
— जब चंद्र व मंगल दोनों एकसाथ त्रिकोण में हों।
— जब चंद्र व मंगल दोनों एकसाथ लाभ भाव में हों।
— यदि जन्म कुंडली के दूसरे भाव पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तब भी भरपूर धन के योग बनते हैं।
— जब दूसरे भाव के स्वामी यानी द्वितीयेश को धनेश माना जाता है अत: उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तब भी व्यक्ति को धन की कमी नहीं रहती।
— दूसरे भाव का स्वामी यानी द्वितीयेश के साथ कोई शुभ ग्रह बैठा हो तब भी व्यक्ति के पास खूब पैसा रहता है।
— जब बृहस्पति यानी गुरु कुंडली के केंद्र में स्थित हो।
— बुध पर गुरु की पूर्ण दृष्टि हो। (5,7,9)
— बृहस्पति लाभ भाव (ग्यारहवें भाव) में स्‍थित हो।
— द्वितीयेश उच्च राशि का होकर केंद्र में बैठा हो।
— जब लग्नेश लग्न स्थान का स्वामी जहां बैठा हो, उससे दूसरे भाव का स्वामी उच्च राशि का होकर केंद्र में बैठा हो।

अंक 16 : जानिए सूर्य का वृश्चिक से धनु राशि में (मल मास (काला महीना) गोचर का सभी राशियों पर क्या होगा असर..

प्रिय मित्रों/पाठकों, सूर्य ग्रह गोचर 16 दिसंबर 2018 यानि रविवार को सुबह 9 बजकर 25 मिनट पर वृश्चिक से धनु राशि में प्रवेश कर रहे हैं और 29 दिसबंर 2018 यानि शनिवार को 11 बजकर 25 मिनट तक इसी में स्थित रहेंगे। वहीं मंगल 23 दिसंबर 2018 यानि रविवार को 1 बजकर 20 मिनट पर कुंभ से मीन राशि में प्रवेश कर रहा है।

सनातन हिन्दू धर्म शास्त्रों में सूर्य ही वह ग्रह है जो मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करता है। सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने वाला सरकारी नौकरी और जीवन में ऊंचाईयों तक ले जाने के लिए यही ग्रह मुख्य है।

सूर्य देव द्वारा 16 दिसंबर 2018 को वृश्चिक राशि से निकलकर धनु राशि में प्रवेश करना अर्थात इस महीने को धनुर्मास कहते हैं। कई जगह इसे मलमास के नाम से भी जाना जाता है। इस एक महीने के दौरान वैवाहिक काम रूक जाते हैं। अब ये मांगलिक काम मकर संक्रांति के बाद शुरू होंगे।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि हिन्दू पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास में जब सूर्य राशि परिवर्तन करते हैं तो उस संक्रांति को वृश्चिक संक्रांति कहा जाता हैं। वहीं साल 2018 के अंतिम माह दिसंबर में तीन ग्रह अपनी राशि बदलने वाले हैं। इसमें चंद्र, सूर्य और मंगल ग्रह के राशि बदलने से किन राशियों पर असर पड़ने वाला है।

दिसंबर माह में ग्रह गोचर में शेष ग्रहों की स्थिति में कोई परिवर्तन न होने के संकेत हैं। ज्योतिष के अनुसार सूर्य 16 दिसंबर 2018 को वृश्चिक से धनु राशि में प्रवेश करेगा। बुध और गुरु ग्रह वृश्चिक में प्रवेश करेगा जिसके कारण 12 राशियों में से शुक्र तुला में, शनि धनु में, राहु कर्क राशि में और केतु मकर राशि में रहेगा। उस प्रकार इन ग्रहों की स्थिति से आपकी रिशियों पर भी असर पड़ेगा।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जानिए किन राशियों के लिए यह सूर्य ग्रह का गोचर समस्या देने वाला रहेगा और किन राशियों के लिए ये शुभ संकेत लाया है…

मेष राशि:—
सूर्य गोचर आपके लिए सुख प्रदान करने वाला है। गोचर का यह समय शिक्षा के क्षेत्र में लगे जातकों के लिए शुभ फलदायी साबित होगा। व्यवसाय में सफलता आपको प्रसन्न रखेगी।

सूर्यदेव का यह गोचर कुल मिलाकर आपको शुभ फल देने वाला रहेगा। साथ ही राजनीति में भी सफलताएं मिलेगी। स्वास्थ्य पहले से बेहतर होगा जाएगा। इस अवधि में आपके लिए सूर्य भाग्य भाव से भ्रमण करेगा। इसके परिणाम अत्यंत शुभ होंगे। इस समय आपसी संबंधों में सुधार होगा। संबंधियों से निकटता बढ़ेगी। इस समय धर्म तथा अध्यात्म के प्रति अधिक रुझान रहेगा। धार्मिक कार्यों में भी व्यय होगा। पारिवारिक सुख-शांति रहेगी। संतान से सहयोग और प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता मिलेगी। इस समय माणिक पहनना शुभता में वृद्धि करेगा।
उपाय–प्रत्येक रविवार को आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।

वृषभ राशि:
आपसी तालमेल की कमी रहेगी। पारिवारिक मामलों में विरोध हो सकता है। अपने क्रोध और अहम पर नियंत्रण रखें। शत्रु पक्ष से सावधानी बरतना होगी। मातृपक्ष के स्वास्थ्य की चिंता रह सकती है। किसी भी कार्य में सावधानीपूर्वक निर्णय लेना होगा। नौकरीपेशा व व्यापारी वर्ग को संभलकर चलना होगा।

मिथुन राशि:–
दाम्पत्य जीवन में वाद-विवाद से बचना होगा। दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में पराक्रम द्वारा ही सफल होंगे। प्रेम संबंधों के मामलों में आपको किसी न किसी प्रकार की समस्या सामना करना पड़ सकता है। कानूनी विवाद से बचना होगा। शत्रुपक्ष पर दबदबा बना रहेगा। साझेदारी के कार्य में सावधानी रखना होगी।

कर्क राशि:—
सूर्यदेव का यह गोचर आपकी राशि के जातकों के लिए धर्म और अध्यात्म में रूचि रखने का साबित होगा। शिक्षा के क्षेत्र में लगे जातकों को लाभ पहुचेगा। धन लाभ होने की संभावना है। व्यवसाय सफलताएं प्राप्त करेंगे। यह समय आपके लिए उतार-चढ़ाव का साबित होगा।
भाग्य में रुकावट आ सकती है और कार्य में भी बाधा रह सकती है। शत्रुपक्ष प्रभावहीन होंगे। मामा पक्ष से कुछ विरोध का सामना करना पड़ सकता है। आपको पेट संबंधी रोग हो सकता है। खान-पान में सुधार करना होगा। कर्ज या लेन-देन के कारण खर्च बढ़ सकता है। नौकरीपेशा लाभान्वित होंगे।
उपाय–सूर्यदेव को नित्य जल अर्पित करें।।

सिंह राशि:–
राजनीतिज्ञों के लिए सूर्य गोचर बहुत ही शुभ है। छात्र प्रतियोगिताओं में सफलता की प्राप्ति करेंगे। वृश्चिक राशि या मेष राशि के जातक से आपको व्यवसाय में लाभ मिल सकता है। खर्चें बढ़ेंगे। यात्रा के योग बन रहे हैं। प्रेम संबंधों के मामलों में असफलता का स्वाद चखना पड़ सकता है। आपको अपने कार्य तथा व्यवहार पर नियंत्रण रखना होगा। संतान पक्ष में संभलकर चलना होगा। प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता मिलेगी। गैस संबंधित समस्या हो सकती है। सेल्फ कॉन्फिडेंस बढ़ा-चढ़ा रहेगा। विद्यार्थी वर्ग व शिक्षा से जुड़े लोगों को लाभ मिल सकता है।
उपाय–सूर्यदेव की रोशनी में बैठकर आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करें।

कन्या राशि:–
पारिवारिक कारणों से घर से दूर जाना पड़ सकता है। नौकरी के क्षेत्र में आपका प्रभुत्व कायम रहेगा। आपके प्रभाव में वृद्धि होगी। परिवारिक जीवन सुखद ही कहा जा सकता है। इस समय आपको आर्थिक लाभ के अवसर प्राप्त होंगे। जमीन संबंधित कार्यों में सफलता के अवसर हैं। माता के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहें। शत्रुपक्ष पर प्रभाव बना रहेगा।

तुला राशि:
पराक्रम अत्यधिक बढा-चढ़ा रहेगा। आपकी मेहनत और प्रयासों की प्रशंसा होगी। भाई-बंधुओं और मित्रगण का सहयोग मिलेगा। भाग्य का साथ मिलने से आपके कई कार्य बनेंगे। सहयोगियों का भरपूर सहयोग मिलेगा। इस समय आपका प्रभाव लोगों पर अधिक पड़ेगा। इस समय रचनात्मक कार्यों से जुड़े लोग लाभान्वित होंगे। आपके प्रयास ही आपकी सफलता का कारक बनेंगे।

वृश्चिक राशि:–
वृश्चिक राशि वाले जातकों के लिए सूर्य गोचर चतुर्दिक विकास का साबित होगा। क्योंकि सू्र्यदेव आपकी राशि में ही गोचर कर प्रवेश कर रहे हैं। इसलिए यह समय आपको सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कराने वाला रहेगा। जमीन संबंधित विवादों का समाधान होगा। कोई बिगड़ा काम इस गोचर की अवधि में बनेगा। साथ ही कई समय से रूका हुआ धन आसानी से मिलेगा।
आर्थिक लाभ मिलेगा, लेकिन बचत के योग कम ही हैं। इस समय किसी प्रकार की मानसिक समास्या आपको परेशान कर सकती है। नौकरीपेशा के लिए समय उत्तम है। राजकीय कार्य संपन्न होंगे। व्यापार-व्यवसाय में प्रगति होगी। पिता का सहयोग लेकर चलें।
उपाय–सूर्यदेव को तांबे के पात्र द्वारा नित्य जल चढ़ाएं।

धनु राशि:–
किसी विशेष पद की प्राप्ति हो सकती है। कार्यक्षेत्र में अत्यधिक व्यस्तता रहेगी। स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा। किसी कार्य में पिता का सहयोग प्राप्त होगा। पुरानी वस्तु से लाभ प्राप्त हो सकता है। मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। सरकारी क्षेत्रों से जुड़े लोगों को प्रगति के अवसर मिलेंगे।

मकर राशि:
सावधानी रखना होगी। यात्रा संभलकर करें। आपको अपने कार्यों पर नियंत्रण रखना होगा। अत्यधिक भागदौड़ होने से शारीरिक थकावट अधिक होगी। प्रत्येक कार्य के लिए आपको अधिक प्रयत्न करना होगा। शत्रुपक्ष प्रभावहीन होंगे।
उपाय– गोचर की समयावधि में इस राशि के जातक लाल और नारंगी रंग के वस्त्र अधिक पहनें।

कुंभ राशि:–
गोचर शुभ फल देगा। घर या परिवार में कोई मांगलिक कार्य हो सकता है। पिता या बड़े भाई से लाभ प्राप्त होने के योग हैं। यात्रा के योग बन सकते हैं। धनलाभ के योग भी प्रबल हैं। इस समयावधि में अधिकारियों का सहयोग प्राप्त होगा। नौकरी के लिए इच्छुक व्यक्ति के प्रयास सफल हो सकते हैं। ससुराल पक्ष से लाभ या प्रसन्नता प्राप्त हो सकती है।

मीन राशि:–
समय आपके कार्यों के लिए उत्तम रहेगा। किसी उच्च पद की प्राप्ति हो सकती है। इस समय कार्य की अधिकता होने से थकान महसूस करेंगे। अधिकारी वर्ग कार्यों को लेकर प्रसन्न रहेंगे। घर-परिवार के सुखों में वृद्धि होगी। आप अपनी प्रतिभा को विस्तार देंगे।
सूर्य का वृश्चिक राशि में गोचर आपके लिए प्रगति, सुख और सौभाग्य लेकर आया है। आपके कई दिनों से रुके कार्य पूर्ण होंगे। लेकिन आंखों का कोई रोग आपको परेशान कर सकता है ।सूर्य के इस गोचर के कारण संतान को सफलताएं हासिल होंगी। धार्मिक क्षेत्रों में रूचि बढ़ेगी। धार्मिक यात्राएं भी हो सकती है। प्रतिदिन उगते सूर्य को जल में गुड़ डालकर चढ़ाएं।
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इन सरल उपाय से होगा सभी 12 राशियों को लाभ —

👉🏻👉🏻सुबह उदय होते सूर्य को दूध-मिश्री मिले जल का अर्घ्य सूर्य को दें।
👉🏻👉🏻नमक का सेवन न के बराबर करें।
👉🏻👉🏻ॐ घृणि सूर्य: आदित्य:या ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्र किरणाय मनोवांछित फलं देहि देहि स्वाहा…
मंत्र का जाप 108 बार करें।

👉🏻👉🏻पिता का आशीर्वाद लेकर कार्य का शुभारंभ करें। इस तरह के सरल उपायों द्वारा सूर्य के अनिष्ट प्रभावों से बचा जा सकता है।

अंक 15 : क्या कमलनाथ का कार्यकाल पूर्ण होगा ??

प्रिय मित्रों/पाठकों, मध्यप्रदेश के नवोदित/नामित मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ 17 दिसंबर 2018 (सोमवार) को दोपहर करीब डेढ़ बजे के बाद शपथ लेकर मुख्यमंत्री घोषित होंगे, तब वो पंचक ओर खरमास (मलमास) में शपथ लेंगे।

ज्योतिष के हिसाब से 16 तारीख से ही मलमास शुरु हो जाएगा ऐसे में इस काल में कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित माना जाता है।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार कमलनाथ को 1 बजकर 04 मिनट से 1 बजकर 44 मिनट (विजय मुहूर्त) के बीच शपथ लेना चाहिए क्योंकि इस दौरान लग्न बर्गोत्तर होकर कांग्रेस सरकार के लिए भी शुभ रहेगा। इस दौरान चौघड़िया भी चर का रहेगा ओर मेष लग्न रहेगा। उस दिन विक्रम सम्वत 2075 के मार्गशीर्ष माह को शुक्ल पक्षीय नवमी तिथि पश्चात दशमी तिथि रहेगी। चन्द्रमा, मीन राशि मे रहेगा और रेवती नक्षत्र रहेगा।

कांग्रेस की कुंडली में शुक्र की दशा के कारण पार्टी में विवाद जारी रहेंगे तो वहीं गुरु की कृपा से सरकार की छवि सुधरेगी।

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ऐसी हें कमलनाथ की कुंडली—

गूगल पर उपलब्ध जानकारी अनुसार मध्यप्रदेश के नए(मनोनीत ) मुख्यमंत्री कमलनाथ का जन्म (सोमवार) 18 नवम्बर 1946 को कानपुर (उप्र) में दोपहर में लगभग 12 बजे हुआ था । उनका जन्म सूर्य की महादशा में हुआ जिसका भोग्यकाल 3 वर्ष 1 माह 10 दिन रहा। इस प्रकार का जातक सम्मानित पद पर विराजमान होता है (चंद्र कुंडली अनुसार) एवं सरकार (राजा) द्वारा सम्मानित होता है।

जिस समय कमलनाथ जन्मे उस समय जो चंद्रमा विराजमान था, उसकी स्थिति अनुसार भी जातक उच्च सम्मान को प्राप्त करता है।उनकी राशि कन्या बनती है।

कमलनाथ की राशि पर वर्तमान में शनि की महादशा चल रही है। जो 02 फरवरी 2002 से प्रारंभ हुई थी। यह पूरे 17 वर्ष रहकर 02 फरवरी 2021 को समाप्त होगी।फिलहाल शनि की महादशा मे गुरु की अंतर्दशा ओर शनि की प्रत्यन्तर दशा चल रही हैं(23 नवम्बर 2018 से 18 अप्रेल 2019 तक)।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार मुख्यमंत्री कमलनाथ की कुंडली मकर लग्न की है, इसलिए वे राजयोगकारी सिद्ध हुई है। कुंडली में राहु राजयोग कारी होकर नवांश में स्थित है इसलिए वे कार्यकाल पूरा कर पाएं इसमें शंका है. लेकिन, जितने समय वे मुख्यमंत्री रहेंगे उस दौरान उनका कार्यकाल उल्लेखनीय होगा।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया को गूगल पर उपलब्ध कमलनाथ की कुण्डली विवरण अनुसार उनकी कुण्डली में 11वें भाव में पंचग्रही योग बना हुआ है जहां वृश्चिक राशि मे सूर्य, बुध, मंगल और शुक्र, केतु के स्थिति हें।
इसके कारण बुधादित्य योग, ग्रहण दौष के साथ साथ कला से भी सम्बन्ध बन रहा हैं।

पंचम भाव मे राहु है, वृषभ राशि मे।

भाग्य स्थान (8वें भाव में) चंद्रमा ,मीन राशि में स्थित है।

गुरु तथा शुक्र का प्रभाव से ही कमलनाथ पर किसी का रुष्ट होना या मनाना, इसका असर नहीं पड़ता है। ईष्ट मित्रों से मनमुटाव हो सकता है। आपको संयम रखना होगा। अन्यथा कटु आलोचना होगी।

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार कमलनाथ को स्वास्थ्य, पारिवारिक चिंता बनी रहेगी। कृपया उस पर ध्यान दें। उच्च स्तर से मनमुटाव की स्थिति बन सकती है। अप्रिय समाचार चिंता ग्रस्त करें, इससे पहले विवेक से काम करें। सावधान रहें। कोई भी निर्णय लेने के पहले विचार करें।
हम आपके उत्तम ओर उज्ज्वल मंगलमय भविष्य को कामना करते है।
।।शुभमस्तु।।

अंक 14 : आज जानें एक मंत्र, जिसके पाठ से पूरी कर लें बड़ी से बड़ी इच्छा-मृत संजीवनी मन्त्र…
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प्रिय मित्रों/पाठकों, हिंदू धर्म में दो मंत्रों महामृत्युंजय तथा गायत्री मंत्र की बड़ी भारी महिमा बताई गई हैं। कहा जाता है कि इन दोनों मंत्रों में किसी भी एक मंत्र का सवा लाख जाप करके जीवन की बड़ी से बड़ी इच्छा को पूरा किया जा सकता है चाहे वो दुनिया का सबसे अमीर आदमी बनने की इच्छा हो या अपना पूरा भाग्य ही बदलना हो।

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय ऋषि-मुनियों ने इन दोनों मंत्रों को मिलाकर एक अन्य मंत्र महामृत्युंजय गायत्री मंत्र अथवा मृत संजीवनी मंत्र का निर्माण किया था। इस मंत्र को संजीवनी विद्या के नाम से जाना जाता है। इस मंत्र के जाप से मुर्दा को भी जिंदा करना संभव है बशर्ते गुरू से इसका सही प्रयोग सीख लिया जाए। हालांकि भारतीय ऋषि-मुनि इस मंत्र के जाप के लिए स्पष्ट रूप से मना भी करते हैं।

👉🏻👉🏻 महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का प्रसिद्ध और सिद्ध मंत्र है। सहज मंत्र ओम है तो सारी बाधाओं से मुक्ति का महामंत्र महामृत्युंजय मंत्र है।

👉🏻👉🏻यह मृत संजीवनी है। ऋषि मार्कण्डेय को इसी मंत्र ने अल्पायु से जीवन संजीवनी दी थी। यमराज भी उनके द्वार से वापस चले गए थे।

👉🏻👉🏻इस मंत्र के जाप से साधक की अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।
👉🏻👉🏻यदि आपकी कुंडली में किसी भी तरह से मृत्यु दोष या मारकेश है तो इस मंत्र का जाप करें तो उस दोष का प्रभाव कम हो जाएगा।
👉🏻👉🏻कुछ अनिष्ट होने का भय या आशंका हो तो इस मंत्र का जाप कर आप उस अनिष्ट को टाल सकते हैं।
👉🏻👉🏻रोगों से छुटकारा और जीवन में प्रसन्नता की प्राप्ति करने के लिए भी इस मंत्र के जाप से अच्छा कुछ और नहीं है।
👉🏻👉🏻इस मंत्र का जाप आर्थिक परेशानी या आपके व्यापार में घाटा की स्थिति में भी कर सकते हैं।
👉🏻👉🏻किसी भी तरह की महामारी और पारिवारिक कलह, संपत्ति विवाद आदि से बचने के लिए इस मंत्र का जाप किया जाता है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद का एक श्लोक है।शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित ये महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है.स्वयं या परिवार में किसी अन्य व्यक्ति के अस्वस्थ होने पर मेरे पास अक्सर बहुत से लोग इस मन्त्र की और इसके जप विधि की जानकारी प्राप्त करने के लिए आते हैं. इस महामंत्र के बारे में जहांतक मेरी जानकारी है,वो मैं पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ—
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|| महा मृत्‍युंजय मंत्र ||

ॐ त्र्यम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धन्म। उर्वारुकमिव बन्धनामृत्येर्मुक्षीय मामृतात् !!
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||संपुटयुक्त महा मृत्‍युंजय मंत्र ||

ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्‍धनान् मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!

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||लघु मृत्‍युंजय मंत्र ||

ॐ जूं स माम् पालय पालय स: जूं ॐ। किसी दुसरे के लिए जप करना हो तो-ॐ जूं स (उस व्यक्ति का नाम जिसके लिए अनुष्ठान हो रहा हो) पालय पालय स: जूं ॐ
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कालजयी मंत्र: —

ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥ ( समस्त गृहस्थों के लिए। विशेषकर रोगों से और कष्टों से मुक्ति के लिए)
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रोगों से मुक्ति के लिए बीज मंत्र—

रोगों से मुक्ति के लिए यूं तो महामृत्युंजय मंत्र विस्तृत है लेकिन आप बीज मंत्र के स्वस्वर जाप करके रोगों से मुक्ति पा सकते हैं। इस बीज मंत्र को जितना तेजी से बोलेंगे आपके शरीर में कंपन होगा और यही औषधि रामबाण होगी। जाप के बाद शिवलिंग पर काले तिल और सरसो का तेल ( तीन बूंद) चढाएं।

ॐ हौं जूं सः ( तीन माला) …
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क्या है महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र–

ऊँ हौं जूं स: ऊँ भूर्भुव: स्व: ऊँ ˜यंबकंयजामहे
ऊँ तत्सर्वितुर्वरेण्यं ऊँ सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम
ऊँ भर्गोदेवस्य धीमहि ऊँ उर्वारूकमिव बंधनान
ऊँ धियो योन: प्रचोदयात ऊँ मृत्योर्मुक्षीय मामृतात
ऊँ स्व: ऊँ भुव: ऊँ भू: ऊँ स: ऊँ जूं ऊँ हौं ऊँ..

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ऋषि शुक्राचार्य ने इस मंत्र की आराधना निम्न रूप में की थी जिसके प्रभाव से वह देव-दानव युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए दानवों को सहज ही जीवित कर सकें।

महामृत्युंजय मंत्र में जहां हिंदू धर्म के सभी 33 देवताओं (8 वसु, 11 रूद्र, 12 आदित्य, 1 प्रजापति तथा 1 वषट तथा ऊँ) की शक्तियां शामिल हैं वहीं गायत्री मंत्र प्राण ऊर्जा तथा आत्मशक्ति को चमत्कारिक रूप से बढ़ाने वाला मंत्र है। विधिवत रूप से संजीवनी मंत्र की साधना करने से इन दोनों मंत्रों के संयुक्त प्रभाव से व्यक्ति में कुछ ही समय में विलक्षण शक्तियां उत्पन्न हो जाती है। यदि वह नियमित रूप से इस मंत्र का जाप करता रहे तो उसे अष्ट सिदि्धयां, नव निधियां मिलती हैं तथा मृत्यु के बाद उसका मोक्ष हो जाता है।
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संजीवनी मंत्र के जाप में निम्न बातों का ध्यान रखें–

(1) जपकाल के दौरान पूर्ण रूप से सात्विक जीवन जिएं।
(2) मंत्र के दौरान साधक का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।
(3) इस मंत्र का जाप शिवमंदिर में या किसी शांत एकांत जगह पर रूद्राक्ष की माला से ही करना चाहिए।
(4) मंत्र का उच्चारण बिल्कुल शुद्ध और सही होना चाहिए साथ ही मंत्र की आवाज होठों से बाहर नहीं आनी चाहिए।
(5) जपकाल के दौरान व्यक्ति को मांस, शराब, सेक्स तथा अन्य सभी तामसिक चीजों से दूर रहना चाहिए। उसे पूर्ण ब्रहमचर्य के साथ रहते हुए अपनी पूजा करनी चाहिए।
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जानिए क्यों नहीं करना चाहिए महामृत्युंजय गायत्री (संजीवनी) मंत्र का जाप–

आध्यात्म विज्ञान के अनुसार संजीवनी मंत्र के जाप से व्यक्ति में बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है जिसे हर व्यक्ति सहन नहीं कर सकता। नतीजतन आदमी या तो कुछ सौ जाप करने में ही पागल हो जाता है तो उसकी मृत्यु हो जाती है। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि इसीलिए इसे गुरू के सान्निध्य में सीखा जाता है और धीरे-धीरे अभ्यास के साथ बढ़ाया जाता है। इसके साथ कुछ विशेष प्राणायाम और अन्य यौगिक क्रियाएं भी सिखनी होती है ताकि मंत्र से पैदा हुई असीम ऊर्जा को संभाला जा सके। इसीलिए इन सभी चीजों से बचने के लिए इस मंत्र की साधना किसी अनुभवी गुरू के दिशा- निर्देश में ही करनी चाहिए।
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|| जानिए महा मृत्‍युंजय जप की विधि ||

महा मृत्युंजय मंत्र का पुरश्चरण सवा लाख है और लघु मृत्युंजय मंत्र की 11 लाख है.मेरे विचार से तो कोई भी मन्त्र जपें,पुरश्चरण सवा लाख करें.इस मंत्र का जप रुद्राक्ष की माला पर सोमवार से शुरू किया जाता है.जप सुबह १२ बजे से पहले होना चाहिए,क्योंकि ऐसी मान्यता है की दोपहर १२ बजे के बाद इस मंत्र के जप का फल नहीं प्राप्त होता है.आप अपने घर पर महामृत्युंजय यन्त्र या किसी भी शिवलिंग का पूजन कर जप शुरू करें या फिर सुबह के समय किसी शिवमंदिर में जाकर शिवलिंग का पूजन करें और फिर घर आकर घी का दीपक जलाकर मंत्र का ११ माला जप कम से कम ९० दिन तक रोज करें या एक लाख पूरा होने तक जप करते रहें. अंत में हवन हो सके तो श्रेष्ठ अन्यथा २५ हजार जप और करें.ग्रहबाधा, ग्रहपीड़ा, रोग, जमीन-जायदाद का विवाद, हानि की सम्भावना या धन-हानि हो रही हो, वर-वधू के मेलापक दोष, घर में कलह, सजा का भय या सजा होने पर, कोई धार्मिक अपराध होने पर और अपने समस्त पापों के नाश के लिए महामृत्युंजय या लघु मृत्युंजय मंत्र का जाप किया या कराया जा सकता है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि इस अद्भुत मंत्र का जाप शुभ मुहुर्त में शुरू करना चाहिए। इसके लिए महाशिवरात्रि, श्रावणी सोमवार, प्रदोष (सोम प्रदोश अधिक शुभ है), सर्वार्थ या अमृत सिद्धि योग, मासिक शिवरात्रि (कृष्ण पक्ष चतुर्दशी) अथवा अति आवश्यक होने पर शुभ लाभ या अमृत चौघड़िया में किसी भी दिन शुभ माना जाता है। घातक व जटिल स्थिति में भी यह मंत्र आपकी परेशानियों को समाप्त करता है। इस मंत्र का जाप पूरी श्रद्धा व पवित्र हृदय से करना चाहिए। महामृत्युंजय जप अनुष्ठान शास्त्रीय विधि-विधान से करना चाहिए। मनमाने ढंग से करना या कराना हानिप्रद हो सकता है।
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|| यह हें महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ ||

त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वालायजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देयसुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधितपुष्टि = एक सुपोषित स्थिति,फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णतावर्धनम = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है,स्वास्थ्य, धन, सुख में वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है, और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा मालीउर्वारुकम= ककड़ीइव= जैसे, इस तरहबंधना= तनामृत्युर = मृत्यु सेमुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति देंमा= नअमृतात= अमरता, मोक्ष
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||जानिए महा मृत्‍युंजय मंत्र का अर्थ ||

समस्‍त संसार के पालनहार, तीन नेत्र वाले शिव की हम अराधना करते हैं। विश्‍व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्‍यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।|| इस मंत्र का विस्तृत रूप से अर्थ ||हम भगवान शंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो प्रत्येक श्वास में जीवन शक्ति का संचार करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत का पालन-पोषण अपनी शक्ति से कर रहे हैं,उनसे हमारी प्रार्थना है कि वे हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो जाए.जिस प्रकार एक ककड़ी अपनी बेल में पक जाने के उपरांत उस बेल-रूपी संसार के बंधन से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार-रूपी बेल में पक जाने के उपरांत जन्म-मृत्यु के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाएं, तथा आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आप ही में लीन हो जाएं.
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|| क्या होता हैं महामृत्युंजय मंत्र का प्रभाव ||

मेरे विचार से महामृत्युंजय मंत्र शोक,मृत्यु भय,अनिश्चता,रोग,दोष का प्रभाव कम करने में,पापों का सर्वनाश करने में अत्यंत लाभकारी है.महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना या करवाना सबके लिए और सदैव मंगलकारी है,परन्तु ज्यादातर तो यही देखने में आता है कि परिवार में किसी को असाध्य रोग होने पर अथवा जब किसी बड़ी बीमारी से उसके बचने की सम्भावना बहुत कम होती है,तब लोग इस मंत्र का जप अनुष्ठान कराते हैं.महामृत्युंजय मंत्र का जाप अनुष्ठान होने के बाद यदि रोगी जीवित नहीं बचता है तो लोग निराश होकर पछताने लगे हैं कि बेकार ही इतना खर्च किया।

यहां पर मैं एक बात कहना चाहूंगा कि मेरे विचार से तो इस मंत्र का मूल अर्थ ही यही है कि हे महादेव..या तो रोगी को ठीक कर दो या तो फिर उसे जीवन मरण के बंधनों से मुक्त कर दो.अत: इच्छानुसार फल नहीं मिलने पर पछताना या कोसना नहीं चाहिए.अंत में एक बात और कहूँगा कि महामृत्युंजय मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण न करें और महा मृत्युंजय मन्त्र जपने के बाद में इक्कीस बार गायत्री मन्त्र का जाप करें ताकि महामृत्युंजय मन्त्र का अशुद्ध उच्चारण होने पर भी पर अनिष्ट होने का भय न रहे.जगत के स्वामी बाबा भोलेनाथ और माता पार्वती आप सबकी मनोकामना पूर्ण करें।
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जानिए क्या रखें महामृत्युंजय मंत्र में रखें सावधानी ….

  1. महामंत्र का उच्चारण शुद्ध रखें
  2. एक निश्चित संख्या में जप करें।
  3. मंत्र का मानसिक जाप करें।
  4. पूरे विधि-विधान और धूप-दीप के साथ जाप करें
  5. रुद्राक्ष की माला पर ही जप करें।
  6. माला को गोमुखी में रखें।
  7. जप काल में महामृत्युंजय यंत्र की पूजा करें।
  8. महामृत्युंजय के जप कुशा के आसन पर बैठकर करें।
  9. जप काल में दुग्ध मिले जल से शिवजी का अभिषेक करते रहें।
  10. महामृत्युंजय मंत्र का जाप पूर्व दिशा की तरफ मुख करके ही करें।

अंक 13 : आज जानें सर्दियों में बेहतर स्वास्थ्य के लिए क्या खाएं, क्या न खाएं

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सर्दियों में जरूर खाएं इन चीजों को, शरीर को देते है ऊर्जा (गर्मी)…
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प्रिय मित्रों/पाठकों, आजकल चल रहे ठंड के मौसम में सर्दी के असर से बचने के लिए लोग गर्म कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन शरीर को चाहे कितने ही गर्म कपड़ों से ढक लिया जाए ठंड से लड़ने के लिए बॉडी में अंदरूनी गर्मी होनी चाहिए। इस मौसम में आप की हड्डियों को गरमाहट देने, आप को सर्दीजुकाम से बचाने और आप के परिवार की प्रतिरक्षण क्षमता बढ़ाने के लिए बहुत से मौसमी फल और सब्जियां उपलब्ध हैं, जिन का सही तरीके से उपयोग कर आप स्वस्थ व फिट भी रह सकते हैं। सर्दी सेहत बनाने का मौसम है। खूब सारे फल आते हैं, पाचन-शक्ति अच्छी होती है और खूब भूख भी लगती है। कहा जाता है कि इस मौसम में पत्थर भी पचाए जा सकते हैं।

शरीर में यदि अंदर से खुद को मौसम के हिसाब से ढालने की क्षमता हो तो ठंड कम लगेगी और कई बीमारियां भी नहीं होंगी। यही कारण है कि ठंड में खानपान पर विशेष रूप से ध्यान देने को आयुर्वेद में बहुत महत्व दिया गया है। सर्दियों में यदि खानपान पर विशेष ध्यान दिया जाए तो शरीर संतुलित रहता है और सर्दी कम लगती है।

👉🏻👉🏻तिल–
सर्दियों के मौसम में तिल खाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है। तिल के तेल की मालिश करने से ठंड से बचाव होता है। तिल और मिश्री का काढ़ा बनाकर खांसी में पीने से जमा हुआ कफ निकल जाता है। तिल में कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं जैसे, प्रोटीन, कैल्शियम, बी कॉम्प्लेक्स और कार्बोहाइट्रेड आदि। प्राचीन समय से खूबसूरती बनाए रखने के लिए तिल का उपयोग किया जाता रहा है।तिल्ली और गुड़ के लड्डू सर्दी से बचाव के लिए बेहतरीन उपाय माना जाता है। ठंड के मौसम में सूखे मेवे, बादाम आदि का सेवन भी लाभदायक होता है। या तो इन्हें भिगोकर खाएं या दूध में मिलाकर या फिर सूखे मेवों का दरदरा पावडर-सा बना लें और इसे दूध में मिलाकर प्रोटीन शेक-सा बना लें।

👉🏻👉🏻👉🏻 बादाम—
बादाम कई गुणों से भरपूर होते हैं। इसका नियमित सेवन अनेक बीमारियों से बचाव में मददगार है।अक्सर माना जाता है कि बादाम खाने से याददाश्त बढ़ती है, लेकिन यह ड्राय फ्रूट अन्य कई रोगों से हमारी रक्षा भी करता है। इसके सेवन से कब्ज की समस्या दूर हो जाती है, जो सर्दियों में सबसे बड़ी दिक्कत होती है। बादाम में डायबिटीज को निंयत्रित करने का गुण होता है। इसमें विटामिन – ई भरपूर मात्रा में होता है।

👉🏻👉🏻 अदरक–
क्या आप जानते हैं कि रोजाना के खाने में अदरक शामिल कर बहुत सी छोटी-बड़ी बीमारियों से बचा जा सकता है। सर्दियों में इसका किसी भी तरह से सेवन करने पर बहुत लाभ मिलता हैै। इससे शरीर को गर्मी मिलती है और डाइजेशन भी सही रहता है।

👉🏻👉🏻शहद–
शरीर को स्वस्थ, निरोग और उर्जावान बनाए रखने के लिए शहद को आयुर्वेद में अमृत भी कहा गया है। यूं तो सभी मौसमों में शहद का सेवन लाभकारी है, लेकिन सर्दियों में तो शहद का उपयोग विशेष लाभकारी होता है। इन दिनों में अपने भोजन में शहद को जरूर शामिल करें। इससे पाचन क्रिया में सुधार होगा और इम्यून सिस्टम पर भी असर पड़ेगा।

👉🏻👉🏻👉🏻आधिकाँश घरों में पारंपरिक तौर पर सर्दियों के लिए मेवे के लड्डू बनाए जाते हैं। आटे, बेसन या फिर उड़द या मूंग की दाल के आटे से लड्डू बनाए जाते हैं। गुजरात में उड़द की दाल के आटे से बने लड्डुओं को अड़दिया कहा जाता है, जबकि पंजाब में इन्हें दाल की पिन्नियों के नाम से जाना जाता है।
👉🏻👉🏻ओमेगा 3 फैटी एसिड–
सर्दियों में ओमेगा – 3 फैटी एसिड सबसे अच्छा फूड होता है। यह मुख्य रूप से मछलियों में पाया जाता है। सर्दियों में दिनों में मछली का सेवन करें, इससे शरीर को गर्मी मिलती है। इसमें जिंक भरपूर मात्रा में होता है है। इसलिए यह शरीर का इम्युनिटी पॉवर बढ़ाता है व बीमारियों को दूर रखता है।

👉🏻👉🏻👉🏻 मूंगफली—
100 ग्राम मूंगफली के भीतर ये तत्व मौजूद होते हैं: प्रोटीन- 25.3 ग्राम, नमी- 3 ग्राम, फैट्स- 40.1 ग्राम, मिनरल्स- 2.4 ग्राम, फाइबर- 3.1 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट- 26.1 ग्राम, ऊर्जा- 567 कैलोरी, कैल्शियम – 90 मिलीग्राम, फॉस्फोरस 350 मिलीग्राम, आयरन-2.5 मिलीग्राम, कैरोटीन- 37 मिलीग्राम, थाइमिन- 0.90 मिलीग्राम, फोलिक एसिड- 20मिलीग्राम। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन, मिनिरल्स आदि तत्व इसे बेहद फायदेमंद बनाते हैं। यकीनन इसके गुणों को जानने के बाद आप कम से कम इस सर्दियों में मूंगफली से टाइमपास करने का टाइम तो निकाल ही लेंगे।
👉🏻👉🏻👉🏻डाइट एक्सपर्ट यह मानते हैं कि सर्दियों में देशी घी का उपयोग किया जाना चाहिए।
👉🏻👉🏻👉🏻मधुमेह के रोगियों को चीनी का सेवन नियंत्रित रूप से करना चाहिए. उन्हें रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट के सेवन से बचना चाहिए और कौंप्लैक्स कार्बोहाइड्रेट का सेवन करना चाहिए. यानी साबूत गेहूं, जई और मल्टीग्रेन आटे का इस्तेमाल करना उन की सेहत के लिए फायदेमंद होता है।

👉🏻👉🏻👉🏻 सब्जियां—
अपनी खुराक में हरी सब्जियों का सेवन करें। सब्जियां, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है और गर्मी प्रदान करती है। सर्दियों के दिनों में मेथी, गाजर, चुकंदर, पालक, लहसुन बथुआ आदि का सेवन करें। इनसे इम्यून सिस्टम मजबूत होता है।

👉🏻👉🏻 रसीले फल न खाएं–
सर्दियों के दिनों में रसीले फलों का सेवन न करें। संतरा, रसभरी या मौसमी आपके शरीर को ठंडक देते है। जिससे आपको सर्दी या जुकाम जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
👉🏻👉🏻सर्दियों में हरी सब्जियों व अन्य फलों और सब्जियों के सेवन से शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर भी सही मात्रा में बना रहता है.

👉🏻👉🏻पानी और तरल पदार्थों का सेवन पर्याप्त मात्रा में करना चाहिए और बच्चों व बुजुर्गों को ठंडी चीजों जैसे आइसक्रीम आदि के सेवन से बचना चाहिए.

👉🏻👉🏻👉🏻जो लोग सर्दियों में वजन कम करना चाहते हैं, उन्हें वसा और तेल युक्त पदार्थों जैसे परांठों का सेवन नहीं करना चाहिए. उन के आहार में फाइबर, फलों, सलाद और तरल पदार्थों की पर्याप्त मात्रा होनी चाहिए. अनाज, मल्टीग्रेन आटा, ब्राउन ब्रैड और उच्च फाइबर से युक्त बिस्कुट भी वजन कम करने में मददगार होते हैं.

👉🏻👉🏻अमरूद, गाजर, सेब, हरी पत्तेदार सब्जियां, कच्चे फल, संतरा और खीरा फायदेमंद होते हैं और घर में बने टमाटर, मिलीजुली सब्जियों और हरी पत्तेदार सब्जियों के सूप हमेशा बाजार में मिलने वाले पैक्ड सूप से बेहतर होते हैं.

👉🏻👉🏻 बाजरा—
कुछ अनाज शरीर को सबसे ज्यादा गर्मी देते है। बाजरा एक ऐसा ही अनाज है। सर्दी के दिनों में बाजरे की रोटी बनाकर खाएं। छोटे बच्चों को बाजरा की रोटी जरूर खाना चाहिए। इसमें कई स्वास्थ्यवर्धक गुण भी होते है। दूसरे अनाजों की अपेक्षा बाजरा में सबसे ज्यादा प्रोटीन की मात्रा होती है। इसमें वह सभी गुण होते हैं, जिससे स्वास्थ्य ठीक रहता है। ग्रामीण इलाकों में बाजरा से बनी रोटी व टिक्की को सबसे ज्यादा जाड़ो में पसंद किया जाता है। बाजरा में शरीर के लिए आवश्यक तत्व जैसे मैग्नीशियम,कैल्शियम,मैग्नीज, ट्रिप्टोफेन, फाइबर, विटामिन- बी, एंटीऑक्सीडेंट आदि भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
👉🏻👉🏻ठंड के मौसम में अपने खाने में आंवले को शामिल करें। सीधे नहीं खा सकते हैं तो या तो मुरब्बे के तौर पर या फिर किसी और तरह से हर दिन के खान-पान में इस्तेमाल करें। यदि आप डाइट चार्ट का पालन कर रहे हैं तो फिर आंवला मुरब्बा लेने की बजाय किसी और रूप में लें।

इसके साथ ही अजवाइन भी शरीर को गर्मी देने का अच्छा स्रोत है। इससे भी आप कोल्ड एंड फ्लू से बचाव कर सकते हैं। गुड़ और शहद भी सर्दियों के दिनों में अच्छा माना जाता है।

👉🏻👉🏻विशेष सावधानी रखें खाने में —
(क्या न खाएं)

आप को नमक एवं चीनी का ज्यादा सेवन करने के साथ साथ तेल एवं मसाले युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन से भी बचना चाहिए. अपने आहार की योजना कुछ इस तरीके से बनाएं कि अगर आप कुछ हैवी या स्पैशल खाना चाहते हैं, तो उसे दोपहर के भोजन के समय खाएं ताकि दिन की गतिविधियों के दौरान अतिरिक्त कैलोरीज बर्न हो जाएं. उस दिन नाश्ते को हलका और रात के भोजन में जहां तक हो सके कम कैलोरीज का सेवन करें।

अंक 12 : जानिए कब मिलेगा आपको वाहन सुख ?
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प्रिय मित्रों/पाठकों, ज्योतिषीय दृष्टि से विचार करें तो जन्म के समय जिस भाव, राशि एवं स्थिति में ग्रह जन्म कुण्डली में विराजते हैं उसी आधार पर यह निर्धारित होता है कि व्यक्ति को कब और किस श्रेणी का वाहन सुख मिलेगा।
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि किसी भी जातक की जन्म कुण्डली में चतुर्थ भाव से वाहन-कार, मोटरगाड़ी आदि के बारे में विचार किया जाता है।
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चतुर्थ भाव को सुख का स्थान माना जाता है। वाहन का कारक ग्रह शुक्र है। किसी व्यक्ति को वाहन सुख मिलेगा अथवा नहीं उसमें शुक्र, चतुर्थ भाव एवं चैथे घर के स्वामी ग्रह की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। चतुर्थ भाव के कारक ग्रह चन्द्र एवं बुध हैं। यदि इनकी स्थिति भी कुण्डली में अच्छी हो सोने पर सुहागा-अर्थात् उत्तम शुभ फल की प्राप्ति होती है। भाग्य भाव एवं आय भाव भी इस संदर्भ में विचारणीय होते हैं।
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पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी जातक को वाहन सुख तभी सम्भव है जब जातक की जन्म कुण्डली में एकादश भाव में चतुर्थेश बैठा हो एवं लग्न में शुभ ग्रह विराजमान हो तो लगभग 12 से 15 वर्ष के पश्चात वाहन सुख पाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यही फल तब भी मिलता है ।
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जब चतुर्थ भाव का स्वामी नीच राशि में बैठा हो एवं लग्न में शुभ ग्रह की स्थिति हो। ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जब चतुर्थेश उच्च राशि में शुक्र के साथ हो तथा चैथे भाव में सूर्य विराजमान हो तब 30 वर्ष के पश्चात वाहन सुख मिलने की संभावना रहती है।

👉🏻👉🏻लग्नेश तथा चतुर्थेश एक साथ लग्न, चतुर्थ या नवम भाव में हों तो इन्हीं ग्रहों की दशा अथवा अंतर्दशा में वाहन की प्राप्ति होती है।

👉🏻👉🏻जिन लोगों की जन्म कुण्डली में दशम भाव का स्वामी चतुर्थ के साथ युति बनाता है और दशमेश अपने नवमांश में उच्च का होता है उन्हें देर से वाहन सुख पाने का सौभाग्य मिलता है।

👉🏻👉🏻जब चतुर्थेश कुण्डली में स्वराशि में हो, मित्र राशि मे हो, मूल त्रिकोण में हो अथवा उच्च राशि मे हों तथा चतुर्थ भाव पाप प्रभाव से मुक्त हो तब चतुर्थेश अथवा शुक्र में जो बलवान होगा वह गोचर में जब लग्न अथवा त्रिकोण में भ्रमण करेगा तब प्रयास करने पर वाहन सुख प्राप्त किया जा सकता है।

👉🏻👉🏻पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि चतुर्थेश छठवें, आठवें अथवा बारहवें भाव में बैठा हो या अस्त या शत्रु ग्रहों या नीच राशिगत हो तो जातक के वाहन में स्थिरता नहीं होती, वाहन बिगड़ता रहता है।

👉🏻👉🏻जन्म कुण्डली में यदि चतुर्थेश लग्नेश के घर में हो तथा लग्नेश चतुर्थेश के घर में तो इन दोनों के बीच राशि परिवर्तन योग बनता है। इस योग के शुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को वाहन सुख की प्राप्ति होती है। चैथे घर का स्वामी ग्रह तथा नवम भाव का स्वामी ग्रह लग्न स्थान में युति बनाएं तो इस योग को वाहन सुख के लिए अच्छा माना जाता है। यह ग्रह स्थिति व्यक्ति के भाग्य को प्रबल बनाती है और उसे वाहन सुख मिलता है।
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पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यद्यपि चतुर्थ भाव सुख का भाव होता है और शुक्र सांसारिक सुख प्रदान वाला ग्रह माना जाता है, तथापि चतुर्थेश एवं शुक्र की युति चतुर्थ भाव में होने पर अच्छा परिणाम प्राप्त नहीं होता है। इस स्थिति में व्यक्ति सामान्य श्रेणी की बाईक अथवा छोटी कार से ही संतुष्ट होना पड़ता है।

शुक्र एवं चतुर्थेश के इस सम्बन्ध पर यदि पाप ग्रह की दृष्टि हो अथवा किसी प्रकार प्रभावित कर रहे हो तो वाहन सुख का अभाव भी हो सकता है।

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जब द्वितीयेश लग्न में हो दशमेश धनभाव में हो और चतुर्थ भाव में उच्च राशि का ग्रह हो तो उत्तम वाहन मिलता है।

जब लग्नेश, चतुर्थेश तथा नवमेश के परस्पर केन्द्र में रहने से वाहन सुख मिलता है।
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जब कुण्डली में नवम, दशम अथवा एकादश भाव में शुक्र के साथ चतुर्थेश की युति होने पर बहुत ही अच्छा वाहन प्राप्त होता है। वाहन सुख मिलने में इन ग्रहों की भूमिका बहुत प्रभावी होती है।

यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि चतुर्थेश का सम्बन्ध शनि के साथ हो अथवा शनि शुक्र की युति हो तो वाहन सुख प्राप्ति हेतु अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है अथवा शारीरिक मेहनत से चलने वाला वाहन ही मिलता है।

👉🏻👉🏻चतुर्थेश की दशा-अंतर्दशा में भी वाहन सुख का योग बनता है। यदि चतुर्थेश बली हो, तो व्यक्ति के कार खरीदने के योग बनते हैं।

👉🏻👉🏻 जब लग्नेश का संबंध चतुर्थ भाव एवं चतुर्थेश से हो, तो उसकी दशा-अंतर्दशा में वाहन सुख प्राप्त होता है।

👉🏻👉🏻जब चतुर्थेश उच्च राशि में हो, तो उसकी महादशा में अनेक वाहनों की प्राप्ति होती है।

👉🏻👉🏻 जब चतुर्थेश बली हो, तो चतुर्थेश के नक्षत्र में स्थित ग्रह की दशाओं में वाहन सुख का पूर्ण योग बनता है। जैसे कुंभ लग्न की कुंडली में चतुर्थेश शुक्र चतुर्थ भाव में स्वराशि में स्थित हो तथा शनि यदि शुक्र के नक्षत्र में हो, तो शनि की दशाओं में जातक को वाहन सुख अवश्य मिलता हें।
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जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव को सुख का स्थान माना जाता है और शुक्र को वाहन सुख का कारक। किसी व्यक्ति को वाहन सुख मिलेगा या नहीं, यह जानने के लिए शुक्र और चौथे भाव के स्वामी ग्रह की स्थिति का अध्ययन किया जाता है। भाग्य एवं आय भाव भी वाहन सुख के लिए महत्वपूर्ण हैं।
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ग्रहों की स्थिति और वाहन सुख कुंडली में यदि चतुर्थेश (चतुर्थ भाव का स्वामी) लग्न में हो तथा लग्नेश (लग्न भाव का स्वामी) चतुर्थ भाव में हो तो इन दोनों के बीच राशि परिवर्तन योग बनेगा। इस योग के शुभ प्रभाव से व्यक्ति को मनचाहे वाहन का सुख मिलता है।
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चौथे घर का स्वामी और नवम भाव का स्वामी लग्न में युति बनाएं तो यह वाहन सुख के लिए इस अच्छा योग माना जाता है। इस ग्रह स्थिति में व्यक्ति का भाग्य प्रबल होता है, जो उसे वाहन सुख दिलाता है।
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ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार प्रचलित ज्योतिषीय मान्यता है कि गोचर में जब कभी चैथे भाव का स्वामी, नवम, दशम अथवा एकादश भाव के स्वामी के साथ चर राशि में युति सम्बन्ध बनाता है, उस समय वाहन सुख की प्राप्ति आवश्यक रूप से होती है। लेकिन इस शुभ ग्रह स्थिति को पाप ग्रह किसी प्रकार प्रभावित कर रहे हों अथवा उनकी दृष्टि पड़ रही हो तो वाहन सुख मिलना कठिन हो जाता है।
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जब चतुर्थेश, शनि, गुरू एवं शुक्र के साथ नवम भाव में हो तथा नवमेश किसी केन्द्र या त्रिकोण में हो तो बहुवाहन का योग होता है।

👉🏻👉🏻जब लग्नेश चतुर्थ-नवम या एकादश भाव में हो तो जातक अनेक वाहनों का स्वामी होता है।

👉🏻👉🏻चतुर्थेश तथा नवमेश लाभ भाव में हों या इन दोनों की दृष्टि चतुर्थ भाव पर हो तो जातक को कई वाहनों का सुख प्राप्त होता है।

👉🏻👉🏻 इनके अलावा निम्न स्थितियों में भी वाहन सुख संभव होता है—
(क) चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हो तथा चन्द्र से तृतीय शुक्र हो।
(ख) चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हो तथा शुक्र से तृतीय चन्द्र हो।
(ग) चतुर्थ स्थान में शुभ ग्रह हो तथा चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो।
(घ) चतुर्थ स्थान पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तथा चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो।

अंक 11 : आज जानिए कुंडली में राहू (RAHU ) ग्रह से बनने वाले 21 विशेष शुभ अशुभ योग और प्रभावों के बारे मेें

राहु एक विच्छेदात्मक ग्रह है, जब इसका प्रभाव सप्तम भाव से संबंधित बातों पर पड़ता है यथा, सप्तम भाव, सप्तमभाव के स्वामी व शुक्र पर पड़ता है तो, यह प्रभाव जातक के विवाह में विलम्ब, जात्येतर सम्बन्ध, अलगाव, व तलाक की और संकेत करता है। यदि राहू के साथ शनि और सूर्य का प्रभाव भी सप्तम भाव से संबंधित घटकों पर हो अशुभ फलों में और तीव्रता आ जाती है। यदि किसी कुंडली में राहू , शनि की युति होतो शनि का प्रभाव दुगना हो जाता है।
१. यदि मेष, वृषभ, या कर्क राशि का राहू तीसरे, षष्ठ अथवा एकादश भाव मे हो तो, यह राहू अनेक अशुभ फलों का नाश कर देता है।
२. यदि राहू केंद्र , त्रिकोण १, ४, ७, १०, ५, ९ वे भाव में हो और केन्द्रेश या त्रिकोणेश से सम्बन्ध रखता हो तो यह राज योग प्रदान कर देता है।
३. यदि १० वे भाव में राहू होतो, यह राहू नेतृत्व शक्ति प्रदान करता है।
४. यदि सूर्य, चन्द्र के साथ राहू होतो, यह राहू इनकी शक्ति को कम करता है।
६. जिस जातिका के पंचम भाव में राहू होता है , उस जातिका का मासिक धर्म अनियमित होता है, जिस कारण से जातिका को संतान होने में परेशानी हो सकती है।
७. यदि पंचम भाव में कर्क, वृश्चिक अथवा मीन राशि हो और उसमे राहू, शुक्र की युति होतो, वह जातिका प्रेम जाल में फंस जाती है।
८. य़दि पंचम भाव में राहू, शुक्र की युति हो तो, वह जातिका यौन रोग , अथवा प्रसव सम्बंधित रोगों से ग्रसित होती है।
९. यदि अष्टम भाव में मेष, कर्क, वृश्चिक, या मीन राशि हो और उसमे राहू स्थित होतो, जातिका की शल्य क्रिया अवश्य होती है।
१०. सप्तम भाव में राहू, शनि, तथा मंगल की युति होतो, दाम्पत्य जीवन कष्टमय होता है।
११. यदि ८ वे भाव में शनि, राहू, व मंगल होतो, उस जातिका/ जातक के ८०%तलाक की संभावना होती है। अथवा जीवन भर वैचारिक मतभेद रहते है।
१२. यदि मेष, या वृश्चिक राशि में ८ वे भाव में या २ रे भाव में राहू पाप ग्रह से युत अथवा दृष्ट होतो, जातिका का दाम्पत्य जीवन कष्टमय होता है।
१३. यदि पंचम भाव में राहू मेष या वृश्चिक राशि का हो अथवा मंगल की दृष्टि हो तो , उस जातिका की संतान की हानि होती है।
१४. यदि राहू , गुरू की युति होतो, जातिका का एक बार गर्भपात होता है।
१५. सप्तम भाव में स्थित राहू दाम्पत्य जीवन को कष्टमय कर देता है।
१६. यदि २ रे भाव में धनु राशि का राहू होतो, जातिका धनवान हो जाती है।
१७. एकादश भाव में राहू , शुक्र की युति हो तो जातिका का दाम्पत्य जीवन बहुत दुःखी होता है।
१८. यदि शुक्र अथवा गुरू पर राहू की दृष्टि होतो, जातिका अंतर्जातीय एवं प्रेम विवाह करती है।
१९. यदि २ रे या पंचम भाव में राहू होतो , उस जातिका का विवाह बहुत कठिनाई से होता है।
२० यदि ८ वे भाव या ११ वे भाव में राहू होतो, उस जातिका का विवाह तो हो जाता है , किन्तु दाम्पत्य जीवन कष्टप्रद होता है। अथवा अलगाव/तलाक की आशंका अधिक होती है।
२१. राहू की दृष्टि सप्तम भाव , सप्तमेश, मंगल, व शुक्र पर होतो, ऐसी जातिका अंतर्जातीय विवाह करती है।

अंक 10 : आज शनिवार को जानिए आखिर क्यों चढ़ाया जाता हैं सरसों का तेल ही, शनिदेव को ?

प्रिय मित्रों/पाठकों, हमारे धर्म शास्त्रों में शनि ग्रह को अति क्रूर कहा गया है। अशुभ शनि व्यक्ति का जीवन दुखों व असफलताओं से भर देता है। ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शनि के कुप्रभाव से बचने के लिए हनुमान साधना को श्रेष्ठ कहा गया है। ग्रहों में शनिदेव को कर्मों का फल देना वाला ग्रह माना गया है। शनिदेव एकमात्र ऐसे देव हैं जिनकी पूजा लोग डर की वजह से करते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है शनि देव न्‍याय के देवता हैं जो इंसान को उसके कर्म के हिसाब से फल देते हैं।

शनिवार का दिन शनि देव को समर्पित होता है। इस दिन हर जगह शनि देव की विशेष पूजा का विधान है। हिंदू धर्म में शनि देव को प्रसन्‍न करने के लिए सबसे शुभ दिन शनिवार का ही माना जाता है। शनिवार के दिन शनि देव का प्रसन्‍न करने के लिए मंदिरों में और जगह-जगह पर शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाया जाता है। आपने देखा होगा कि एक बाल्‍टी में शनि देव की तस्‍वीर को सरसों के तेल में आधी डुबोकर रखा जाता है।

शनिवार के दिन शनिदेव को तेल चढ़ाने के लिए मंदिर के बाहर लंबी लाइन देखने को मिलती है।

मान्‍यता है कि शनि देव को तेल चढ़ाने से उनकी पीड़ा कम हो जाती है और फिर वे अपने भक्‍त की पीड़ा को भी कम कर देते हैं। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि शनि देव को तेल चढ़ाने से जीवन की सभी परेशानियों से छुटकारा मिलता है। आर्थिक समस्‍याओं से जूझ रहे लोगों को भी शनिवार के दिन शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाना चाहिए।

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि कोई व्‍यक्‍ति शनि की साढ़ेसाती अथवा ढैय्या से गुज़र रहा है तो उसे भी शनिवार के दिन शनि देव की पूजा करनी चाहिए और उन्‍हें शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाना चाहिए।

शनिदेव को न्याय का देवता माना जाता है। शनिदेव की कृपा से रंक भी राजा बन जाता है, और उन्हीं की दृष्टि से राजा को रंक बनते ज़रा भी देर नहीं लगती। श्रद्धालु शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के उपाय और पूजा-अर्चना करते हैं। अपने विभिन्न प्रयत्नों से सभी शनिदेव को प्रसन्न व शांत रखने का प्रयास करते हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शनिदेव पीपल के वृक्ष के नीचे वास करना पसंद करते हैं, यदि वजह है कि आपको शनिदेव के अधिकांश मंदिर पीपल के पेड़ नीचे ही मिलेंगे।

क्या आप यह जानते हैं कि शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाने की परंपरा कब से शुरु हुई।
आइए जानें शनिदेव को तेल चढ़ाने का कारण और इसकी कथा…

पहली कथा का संबंध है रावण—

प्राचीन कथा के अनुसार रावण ने शनिदेव को कैद कर रखा था। जब हनुमान जी देवी सीता को ढूंढते हुए लंका गए तो उन्होंने वहां शनिदेव को रावण की कैद में देखा। रामभक्त हनुमान को देखकर शनिदेव ने उन्हें रावण की कैद से आजाद करवाने की प्रार्थना की। शनिदेव की प्रार्थना सुनकर हनुमान जी ने उन्हें लंका से कहीं दूर फेंक दिया ताकि शनिदेव कहीं सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाएं। जब हनुमान जी ने शनिदेव को फेंका तो उन्हें बहुत सारे घाव हो गए। शनिदेव की पीड़ा को देखते हुए हनुमान जी ने उनके घावों पर सरसों का तेल लगाया। जिससे उन्हें काफी आराम मिला और कुछ ही देर में उनका दर्द खत्म हो गया। तब से शनिदेव को तेल चढ़ाने की परंपरा शुरु हो गई।
दूसरी कथा के अनुसार शनिदेव और हनुमानजी में हुआ था युद्ध–

एक बार शनि देव को अपने बल और पराक्रम पर घमंड हो गया था. लेकिन उस काल में भगवान हनुमान के बल और पराक्रम की कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई थी. जब शनि देव को भगवान हनुमान के बारे में पता चला तो वह भगवान हनुमान से युद्ध करने के लिए निकल पड़े. जब भगवान शनि हनुमानजी के पास पहुंचे तो देखा कि रुद्रावतार भगवान हनुमान एक शांत स्थान पर अपने स्वामी श्रीराम की भक्ति में लीन बैठे है।
तभी घमंड से भरे शनि देव ने हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारा। शनि की चुनौती का विनम्रता से जवाब देते हुए हनुमान जी ने श्री राम की साधना में व्यस्त होने का तर्क दिया। जिससे शनि क्रोधित होकर हनुमान से युद्ध करने की जिद पर अड़ गए। इस पर हनुमान जी ने शनि देव को अपनी पूंछ में लपेटकर बांध दिया। शनि के प्रहार करने पर पवन पुत्र ने शनिदेव को पत्थरों पर पटक कर घायल करके उन्हें परास्त किया। शनिदेव ने हनुमान जी से माफी मांग कर प्रणाम किया।

हनुमान जी ने शनिदेव का दर्द दूर करने के लिए उनके घावों पर तेल लगाया। शनि ने हनुमान जी को उनके भक्त को परेशान न करने का वचन दिया।
विशेष सावधानी—

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया की गलती से भी शनिवार के दिन सरसों का तेल कभी नहीं खरीदना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार शनिवार के दिन तेल व सरसों का दान किया जाता है। इसलिए सरसों का तेल खरीदना शुभ नहीं माना जाता। शनिवार को कुछ लोग शनि मंदिर के सामने दुकान लगाए लोगों से तेल का दीपक खरीदते हैं और उसे शनिदेव के आगे जलाकर उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जाने-अंजाने में ही सही लेकिन शनिवार को सरसों का तेल खरीद लेते हैं। जो कि हमारे लिए शुभ नहीं होता और हमारे लिए परेशानी का कारण बन सकता है। यदि आपको मंदिर में दीपक लगाना है तो घर से ही तेल का दीपक लेकर जाएं।
आजकल ज्यादातर लोग मंदिर के बाहर से ही तेल खरीद कर शनिदेव को अर्पित करते हैं और मानते हैं कि ऐसा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं, लेकिन पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ऐसा करना बहुत गलत है और इससे शनिदेव की कृपा मिलने के बजाए विपरीत प्रभाव पड़ सकते हैं। तो चलिए, एक नज़र डालते हैं कुछ ऐसी ही चीजों पर जो हम अनजाने में कर जाते हैं, लेकिन वह किसी भी प्रकार से शुभ फल देने वाले नहीं होते हैं।

गलती से नही खरीदें शनिवार के दिन को इन वस्तुओं (चीजों) को…

👉🏻👉🏻👉🏻शनिवार को नमक खरीदने से कर्ज चढ़ने या फिर बढ़ने की संभावना रहती है। अगर आपको नमक खरीदना है तो बेहतर होगा शनिवार के बजाय किसी और दिन खरीदें।
👉🏻👉🏻👉🏻शनिवार को काले तिल कभी न खरीदें इस दिन काले तिल खरीदने से कार्यों में बाधा आती है। इसके बजाए एक दिन पहले काले तिल खरिद कर रख लें क्योंकि काले तिल चढ़ाने से शनिदेव प्रसन्‍न होते हैं और कई विपत्तियों से भी निकालते हैं।
👉🏻👉🏻👉🏻पढ़ाई-लिखाई से संबंधीत चीजें, जैसे कागज, पेन और इंक पॉट आदि खरीदने के लिए भी शनिवार का दिन शुभ नहीं माना जाता। विशेष तौर पर शनिवार को स्याही न खरीदें, यह मनुष्य को अपयश का भागी बनाती है।
👉🏻👉🏻👉🏻शनिवार के दिन कैंची कभी नहीं खरीदना चाहिए। इस दिन खरीदी गई कैंची रिश्तों में तनाव लाती है। शनिवार के अलावा किसी भी दिन आप कैंची खरीद सकते हैं।

👉🏻👉🏻👉🏻 अगर आपको काले रंग के जूते खरीदने हैं तो शनिवार को न खरीदें। माना जाता है कि शनिवार को खरीदे गए काले जूते पहनने वाले को कार्य में असफलता प्राप्त होती है।
👉🏻👉🏻👉🏻शनिवार को किसी गरीब का अपमान न करें। शनिदेव गरीबों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस कारण जो लोग गरीबों का अपमान करते हैं, गरीबों को परेशान करते हैं, शनि उनके जीवन में परेशानियां बढ़ा देता है।
👉🏻👉🏻👉🏻ध्यान रखें किसी बाहरी व्यक्ति से जूते-चप्पल उपहार में न लें। शनिवार को जूते-चप्पल का दान किसी गरीब को करेंगे तो शनि के दोष दूर हो सकते हैं।
👉🏻👉🏻👉🏻शनिवार को घर में लोहा या लोहे से बनी चीज लेकर नहीं आना चाहिए। इस दिन लोहे की चीजों का दान करना चाहिए।
👉🏻👉🏻👉🏻जिन लोगों के कर्म गलत होते हैं, उनके लिए शनि अशुभ हो जाता है। शनि के अशुभ होने से किसी भी काम में आसानी से सफलता नहीं मिल पाती है, साथ ही घर-परिवार में परेशानियां बढ़ सकती हैं। शनिवार का कारक शनि है और विशेष रूप से इस दिन ऐसे कामों से बचना चाहिए, जिनसे कुंडली में शनि अशुभ हो सकता है।

अंक 9 : घर में लगाएं दौड़ते हुए घोड़ों की फोटो ? जानें क्या है वास्तु अनुसार बहुत हैं इसके लाभ

प्रिय मित्रों/पाठकों, आज के प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर कोई सफलता पाना चाहता है, लेकिन मेहनत के बाद भी सफल नहीं हो पाता है। इसका ये अर्थ नहीं होता है कि उस व्यक्ति की मेहनत में किसी तरह की कमी है।
जीवन में सफलता हासिल करने के लिए सबसे जरूरी होता है इंसान को ऊर्जावान होना. स्वस्थ होना।

अगर आप ऊर्जा से भरपूर हैं और आपमें कार्य करने की क्षमता प्रबल है तो सफलता आपके कदम चूमेगी, इसमें कोई दो राय नहीं।वास्तुशास्त्र में बुरी शक्तियों को नकारात्मक उर्जा और अच्छी शक्ति को सकारात्मक उर्जा के रुप में देखा जाता है। उर्जा का प्रवाह जिस तरह से व्यक्ति और उसके घर पर होता है उसका असर व्यक्ति के स्वास्थ्य, सुख और धन पर भी होता है। वास्तुविज्ञान में कुछ ऐसे नियम हैं जिनका पालन किया जाए तो हम नकारात्मक उर्जा के प्रभाव को अपने से दूर करके सकारात्मक उर्जा से लाभ उठा सकते हैं।

कभी-कभी किसी ग्रह नक्षत्र और वास्तु ठीक ना होने के कारण में किसी क्षेत्र में सफलता नहीं मिल पाती है इसलिए वास्तुशास्त्र और ज्योतिष शास्त्र में कुछ उपाय दिए गए हैं जिन्हें अपनाने से जीवन में और करियर के क्षेत्र में मेहनत के साथ सफलता भी मिलने लगती है। इसके लिए आज हम आपके लिए वास्तु का एक उपाय लेकर आए हैं जिसे अपनाने से करियर में सफल होने लगते हैं।

👉🏻वास्तुशास्त्री पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि वास्तु के अनुसार अगर आप अपने घर या दफ्तर में दौड़ते हुए घोड़े की तस्वीर लगाते हैं, तो यह आपके कार्य में गति प्रदान करता है. दौड़ते हुए घोड़े सफलता, प्रगति और ताकत के प्रतीक होते हैं. खासकर 7 दौड़ते हुए घोड़े व्यवसाय की प्रगति का सूचक माने गए हैं, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार 7 अंक सार्वभौमिक है, प्राकृतिक है।

👉🏻👉🏻वास्तुविद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ध्यान देने वाली बात है कि इंद्रधनुष के रंग 7 होते हैं, सप्त ऋषि, शादी में सात फेरे, सात जन्म इत्यादि इसलिए 7 नंबर को प्रकृतिक और सार्वभौमिक माना गया है।

👉🏻👉🏻इसलिए सात घोड़ों की तस्वीर को सर्वोतम माना गया है।

👉🏻👉🏻अगर सात घोड़े के रथ पर सवार सूर्य देव हों तब यह तस्वीर और भी शुभ फलदायी होती होती है। इन तस्वीरों के घर में कहीं भी लगाने से आपको शुभ फल नहीं मिलता है।घोड़े की तस्वीर लगाने के लिए पूर्व दिशा को शुभ माना गया है।

👉🏻👉🏻दौड़ते हुए घोड़ों की तस्वीर, पोस्टर या कोई मूर्ति घर की उत्तर दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। इसे लगाने से ही प्रोमोशन जल्दी होता है। इसके साथ ही जीवन में धन लाभ के योग बनने लगते हैं।
👉🏻👉🏻इसके साथ ही अगर जीवन में नाम, यश और सम्मान पाना चाहते हैं तो घर की दक्षिण दिशा में दौड़ते हुए घोड़ों की तस्वीर लगा सकते हैं। इसके साथ सकारात्मकता आती है और इसके बाद जीवन में भी तरक्की आती है और किसी काम के लिए तारीफ मिल सकती है। यदि घर में किसी कारण से दक्षिण दिशा में घोड़ों की मूर्ति नहीं रख पा रहें हैं तो घर की खिड़की के सामने दौड़ते हुए घोड़े की मूर्ति या तस्वीर रखें। मूर्ति को ऐसे रखें कि घोड़े का मुंह खिड़की से बाहर देख रहा हो। इससे नाम,यश और मान-सम्मान की प्राप्ति होने लगेगी।

👉🏻👉🏻आपके घर में यदि पहले से ही दौड़ते घोड़ों की तस्वीर या मूर्ति है तो इसके लिए एक बात हमेशा अपने ध्यान में रखें कि इन घोड़ों पर किसी तरह की रस्सी ना बंधी हो। यदि इस तरह से आपके घर में पोस्टर या तस्वीर है तो इससे घर में आने वाले धन-धान्य पर रोक लगती है। इसके साथ एक बात ध्यान रखें कि कभी किसी एक घोडे़ की फोटो या तस्वीर ना लगाएं, ये आपके घर में धन आने से रोकता है।

👉🏻👉🏻वास्तुविद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार दौड़ते हुए घोड़े की तस्वीर बहुत शुभ मानी जाती है। ये तस्वीर करियर में ग्रोथ लाती है और आपकी एनर्जी को बढ़ाती है।
👉🏻👉🏻इन तस्वीरों को लगाते हुए इस बात का ध्यान रखें कि घोड़ों का मुंह ऑफिस के अंदर की ओर आते हुए होना चाहिए और दक्षिण दीवार पर तस्वीर लगानी चाहिए। दौड़ते हुए घोड़े प्रगति के प्रतीक होते हैं।
👉🏻👉🏻अगर आप कर्ज से परेशान है तो आप पश्चिमी दिशा में आर्टिफिशियल घोड़े का जोड़ा रखे। वो आप को किसी भी गिफ्ट शॉप पे आसानी से मिलेगा। इससे घर में सुख समृद्धि और लक्ष्मि का हमेशा वास रहता है। ये घोड़े आपके कार्य में गति प्रदान कर सफलता दिलाने में मददगार साबित होंगे।
👉🏻👉🏻घोड़े की तस्वीर खरीदते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि घोड़े का चेहरा प्रसन्नचित मुद्रा में हो, ना कि आक्रोशित हो।
👉🏻👉🏻विशेषकर सफेद घोड़े सकारात्मक ऊर्जा के प्रतीक होते हैं. इसलिए घर और ऑफिस की नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा को लाने के लिए सफेद 7 घोड़े की तस्वीर लगानी चाहिए।
👉🏻👉🏻विशेष ध्यान रखने वाली बात यह है कि कभी भी टूटी फूटी तस्वीर घर में ना रखें। या धुंधली तस्वीर भी ना रखें। जिस तस्वीर में अलग-अलग दिशा में घोड़े दौड़ते नजर आए वह तस्वीर ना लगाएं।

अंक 8 : जानें क्या रत्नों का प्रभाव वास्तव में होता हैं ? हां, तो कौन सा रत्न है आपके लिए उपयोगी और क्यों ?

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री

प्रिय मित्रों/पाठकों, आम तौर पर जो नगीने अंगूठी और लॉकेट में ज्योतिषीय सलाह के अनुसार पहने जाते हैं ,उसे रत्न कहते हैं । इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि नगीने का नीचे का हिस्सा शरीर से स्पर्श करता रहता है । ये नगीने कई रंगों के होते हैं ।वास्तव में ये रत्न नौ ग्रहों के किरणों के संवाहक होते हैं और किसी खास ग्रह की किरण को अवशोषित करते हैं ।

रत्नों को धारण करने के पीछे मात्र उनकी चमक प्रमुख कारण नहीं है बल्कि अपने लक्ष्य के अनुसार उनका लाभ प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि ये रत्न जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य करते किस प्रकार हैं।

हम अपने आस-पास व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न रत्न पहने हुए देखते हैं। ये रत्न वास्तव में कार्य कैसे करते हैं और हमारी जन्मकुंडली में बैठे ग्रहों पर क्या प्रभाव डालते हैं और किस व्यक्ति को कौन से विशेष रत्न धारण करने चाहिये, ये सब बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
रत्नों का प्रभाव-
रत्नों में एक प्रकार की दिव्य शक्ति होती है। वास्तव में रत्नों का जो हम पर प्रभाव पड़ता है वह ग्रहों के रंग व उनके प्रकाश की किरणों के कंपन के द्वारा पड़ता है। हमारे प्राचीन ऋषियों ने अपने प्रयोगों, अनुभव व दिव्यदृष्टि से ग्रहों के रंग को जान लिया था और उसी के अनुरूप उन्होंने ग्रहों के रत्न निर्धारित किए।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार जब हम कोई रत्न धारण करते हैं तो वह रत्न अपने ग्रह द्वारा प्रस्फुटित प्रकाश किरणों को आकर्षित करके हमारे शरीर तक पहुंचा देता है और अनावश्यक व हानिकारक किरणों के कंपन को अपने भीतर सोख लेता है। अत: रत्न ग्रह के द्वारा ब्रह्मांड में फैली उसकी विशेष किरणों की ऊर्जा को मनुष्य को प्राप्त कराने में एक विशेष फिल्टर का कार्य करते हैं।

जितने भी रत्न या उपरत्न है वे सब किसी न किसी प्रकार के पत्थर है। चाहे वे पारदर्शी हो, या अपारदर्शी, सघन घनत्व के हो या विरल घनत्व के, रंगीन हो या सादेङ्घ। और ये जितने भी पत्थर है वे सब किसी न किसी रासायनिक पदार्थों के किसी आनुपातिक संयोग से बने हैं। विविध भारतीय एवं विदेशी तथा हिन्दू एवं गैर हिन्दू धर्म ग्रंथों में इनका वर्णन मिलता है।

आधुनिक विज्ञान ने अभी तक मात्र शुद्ध एवं एकल 128 तत्वों को पहचानने में सफलता प्राप्त की है। जिसका वर्णन मेंडलीफ की आधुनिक आवर्त सारणी में किया गया है। किन्तु ये एकल तत्व है अर्थात् इनमें किसी दूसरे तत्व या पदार्थ का मिश्रण नहीं प्राप्त होता है। किन्तु एक बात अवश्य है कि इनमें कुछ एक को समस्थानिक के नाम से जाना जाता है।

वैज्ञानिक भी मानते हैं कि हमारे शरीर के चारों ओर एक आभामण्डल होता है, जिसे वे अवफअ कहते हैं। ये आभामण्डल सभी जीवित वस्तुओं के आसपास मौजूद होता है। मनुष्य शरीर में इसका आकार लगभग 2 फीट की दूरी तक रहता है।

यह आभामण्डल अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करता है। हर व्यक्ति का आभामण्डल कुछ लोगों को सकारात्मक और कुछ लोगों को नकारात्मक प्रभाव होता है, जो कि परस्पर एकदूसरे की प्रकृति पर निर्भर होता है। विभिन्न मशीनें इस आभामण्डल को अलग अलग रंगों के रूप में दिखाती हैं।

वैज्ञानिकों ने रंगों का विश्लेषण करके पाया कि हर रंग का अपना विशिष्ट कंपन या स्पंदन होता है। यह स्पन्दन हमारे शरीर के आभामण्डल, हमारी भावनाओं, विचारों, कार्यकलाप के तरीके, किसी भी घटना पर हमारी प्रतिक्रिया, हमारी अभिव्यक्तियों आदि को सम्पूर्ण रूप से प्रभावित करते है।

वैज्ञानिकों के अनुसार हर रत्न में अलग क्रियात्मक स्पन्दन होता है। इस स्पन्दन के कारण ही रत्न अपना विशिष्ट प्रभाव मानव शरीर पर छोड़ते हैं।

प्राचीन संहिता ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है, उसमें एकल तत्व मात्र 108 ही बताए गए हैं। इनसे बनने वाले यौगिकों एवं पदार्थों की संख्या 39000 से भी ऊपर बताई गई हैं। इनमें कुछ एक आज तक या तो चिह्नित नहीं हो पाए है, या फिर अनुपलब्ध हैं। इनका विवरण, रत्नाकर प्रकाश, तत्वमेरू, रत्न वलय, रत्नगर्भा वसुंधरा, रत्नोदधि आदि उदित एवं अनुदित ग्रंथों में दिया गया है।
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि आपका शरीर बहुत अधिक सेंसेटिव है। यह यादों का बहुत बड़ा संग्रह है। अगर आपने इम्यूनोलॉजी/ immunology को study किया है या नहीं भी किया तब भी आप यह साधारण सी बात जानते होंगे कि हमारे शरीर विभिन्न प्रकार के cells जो हमें इम्यूनिटी/immunity प्रोवाइड/provide करते हैं उनमें कुछ मेमोरी / memory cells भी होते हैं। मतलब यह कि अगर आप किसी बीमारी से इस समय ग्रस्त हुए और ठीक हो गए और आने वाले कई वर्षों में आपको यह स्वास्थ्य संबंधी परेशानी दोबारा नहीं हुई लेकिन यह memory cells तब भी आपके शरीर में बने रहें गए ताकि भविष्य में कभी आप अगर इस बीमारी से फिर से ग्रसित हुए तो यह एकदम अपना काम कर पाए।

➡इसके अलावा किसी एक हल्का सा स्पर्श, आपके द्वारा किया गया भोजन, आपका सबकॉन्शियस माइंड इन सब चीजों को याद रखता है।

➡अपने Human Psychology का वह तथ्य तो जानते ही होंगे जिसमें यह कहा जाता है कि जब आपको कोई व्यक्ति घूर रहा होता है तब आपको अचानक से यह इनट्यूशन कैसे आती है कि आपको ऊपर देखना चाहिए कुछ अटपटा सा लग रहा है। आप इसे ऐसे समझ सकते हैं कि आप जब ध्यान नहीं भी दे रहे होते हैं तब भी आपकी ज्ञान इंद्रियां चीज़ों को रजिस्टर कर रही होती है।

➡इसके अलावा हम अन्य ग्रहों की बात ना करते हुए यहां पर सिर्फ सूर्य और चंद्रमा की बात करना चाहेंगे। जिनका प्रभाव अपने शरीर पर देखा ही होगा। जब इनके प्रभाव से सागर में इतनी उथल-पुथल हो सकती है तो आप समझ ही सकते हैं कि आपके शरीर में 70% वॉटर है।

इन सब उदाहरणों के माध्यम से हम सिर्फ आपको यह बताना चाहते हैं कि आपका शरीर इतना अधिक सजग है। आपके आसपास के वातावरण और गतिविधियों के लिए। तो आप इससे क्या समझते हैं ?? कि आपके द्वारा धारण किया गई (कॉन्शसनेस mind) कोई वस्तु या आपके शरीर के साथ स्पर्श में लाएगी गई कोई अन्य चीज़ आपके शरीर पर कोई प्रभाव नहीं दिखाएगी??

नोट:- इस संदर्भ में कुछ बातें ध्यान देने योग्य जैसे कि जो भी रत्न आप इस्तेमाल में रहे हैं वह अच्छी क्वालिटी का ही हो। क्योंकि मार्केट में नकली रत्नों की भरमार है। इसके अलावा आप रत्नों के समय की अवधि का भी ध्यान रखिए। समय के साथ इन रत्नों का प्रभाव आपके शरीर पर कम हो जाता है। यदि आप अपने शरीर के प्रति कॉन्शियस है तो आप इन रत्नों के प्रभाव को अपने शरीर और जीवन पर आसानी से देख सकेंगे।
जन्म कुंडली के अनुसार रत्नों का निर्णय
लग्न भाव ग्रह रत्न

मेष — लग्नेश —– मंगल — मूंगा
पंचमेश —– सूर्य — माणिक्य

नवमेश — गुरु — पुखराज

वृष — लग्नेश — शुक्र — हीरा
पंचमेश — बुध — पन्ना

नवमेश — शनि — नीलम

मिथुन — लग्नेश — बुध — पन्ना
पंचमेश — शुक्र — हीरा

नवमेश — शनि — नीलम

कर्क — लग्नेश — चंद्र — मोती
पंचमेश —- मंगल — मूंगा

नवमेश — गुरु — पुखराज

सिंह — लग्नेश — सूर्य — माणिक्य
पंचमेश — गुरु — पुखराज

नवमेश — मंगल — मूंगा

कन्या — लग्नेश — बुध — पन्ना
पंचमेश — शनि — नीलम

नवमेश — शुक्र —- हीरा

तुला — लग्नेश — शुक्र — हीरा
पंचमेश — शनि — नीलम

नवमेश — बुध — पन्ना

वृश्चिक — लग्नेश — मंगल — मूंगा

पंचमेश — गुरु — पुखराज

नवमेश — चंद्र —- मोती

धनु — लग्नेश — गुरु — पुखराज

पंचमेश — मंगल — मूंगा

नवमेश — सूर्य — माणिक्य

मकर — लग्नेश — शनि — नीलम
पंचमेश — शुक्र — हीरा

नवमेश — बुध — पन्ना

कुम्भ — लग्नेश — शनि — नीलम

पंचमेश — बुध — पन्ना

नवमेश — शुक्र — हीरा

मीन — लग्नेश — गुरु — पुखराज

पंचमेश — चंद्र —- मोती

नवमेश — मंगल — मूंगा

7 ग्रहों को 2 गुटों में विभक्त किया गया है . पहला गुट सूर्य गुट है ,जिसमें सूर्य ,चंद्र ,मंगल और गुरु हैं . दूसरा शनि गुट है ,जिसमें बुध ,शुक्र और शनि हैं .इसी को लग्नों में देखें .

1 . सूर्य गुट के लग्न – मेष लग्न ,कर्क लग्न ,सिंह लग्न ,वृश्चिक लग्न ,धनु लग्न और मीन लग्न .कुल 6 लग्न .

2 . शनि गुट के लग्न – वृष लग्न ,मिथुन लग्न , कन्या लग्न ,तुला लग्न ,मकर लग्न और कुम्भ लग्न . कुल 6 लग्न .

ध्यान रहे कि सूर्य गुट और शनि गुट आपस में शत्रुता रखते हैं . इसलिए दोनों गुट के रत्न एक साथ नहीं पहने जाते हैं .
चंद्र राशि के अनुसार रत्न का निर्णय
राशि ग्रह रत्न

1 . मेष —— मंगल —– मूंगा

2 . वृष — शुक्र —- हीरा

  1. मिथुन —- बुध — पन्ना

4 . कर्क — चंद्र — मोती

5 . सिंह — सूर्य — माणिक्य

6 . कन्या — बुध — पन्ना

7 . तुला — शुक्र —- हीरा

8 . वृश्चिक — मंगल —- मूंगा

9 . धनु — गुरु —— पुखराज

10 . मकर — शनि —— नीलम

11 . कुम्भ — शनि —- नीलम

12 . मीन —- गुरु ——- पुखराज

🌷🌷👉🏻👉🏻🌹🌹✍🏻✍🏻🌸🌸🙏🏻🙏🏻
नौ ग्रह रत्न
1 . माणिक्य (रूबी) – माणिक्य सूर्य का रत्न है .यह एक खनिज है . इसे तराश कर अंगूठी या लॉकेट में जड़ने योग्य बनाया जाता है .यह गुलाबी रंग का होता है .
भौतिक गुण :– कठोरता – 9, आपेक्षिक घनत्व – 4.03 ,वर्तनांक –1.716 , दुहरा वर्तन – 0.008 , द्विवर्णिता –तीव्र .

रासायनिक रचना –एलुमिनियम ऑक्साइड .

2 . मोती (पर्ल ) – मोती चंद्र का रत्न है . जल में रहने वाले सीप के अन्दर इसका निर्माण होता है .यह पत्थर या खनिज नही है . मटर के गोल दाने की तरह यह पाया जाता है .

भौतिक गुण – आपेक्षिक घनत्व – 2.65 से 2.89 तक . कठोरता – 3.8 –4 .

रासायनिक गुण – कैल्सियम कार्बोनेट .

मूंगा (कोरल ) – मूंगा मंगल ग्रह का रत्न है .यह पत्थर नही है .समुद्र के अन्दर खास जंतुओं के द्वारा इसका निर्माण होता है .
रासायनिक गुण –यह भी मोती की तरह कैल्शियम कार्बोनेट है .

पन्ना (एमराल्ड ) – पन्ना बुध ग्रह का रत्न है .यह एक खनिज है .यह एक खनिज है .यह हरे रंग का होता है .
भौतिक गुण – कठोरता –7.75 . आपेक्षिक घनत्व –2.69 –2.8 , वर्तनांक –1.57 , अपकिरण – 0.014 .

5 . पुखराज (टोपाज ) – पुखराज गुरु ग्रह का रत्न है .यह पीले रंग का होता है .यह एक खनिज है .

भौतिक गुण –कठोरता – 8 , आपेक्षिक घनत्व – 6.53 ,वर्तनांक –1.61 ,दुहरा वर्तन – 0.008 ,और अपकिरण – 0.014होता है .

6 .हीरा (डायमंड ) – हीरा शुक्र ग्रह का रत्न है . यह पारदर्शी होता है . यह खनिज रत्न है . भौतिक गुण – कठोरता – 10 , आपेक्षिक घनत्व 3.4 , वर्तनांक – 2.417 ,अपकिरण – 0.44 ,रासायनिक गुण – यह कार्बन का शुद्ध रूप है .

7 .नीलम (सेफायर ) –नीलम शनि ग्रह का रत्न है .यह एक खनिज रत्न है . यह बहुत जल्द असर करता है .

भौतिक गुण –कठोरता – 9, आपेक्षिक घनत्व – 4 .03 ,वर्तनांक – 1 .76 , दुहरा वर्तन – 0.008.

8 .गोमेद (जिर्कोनी ) –गोमेद राहु का रत्न है .यह एक खनिज रत्न है . यह गो मूत्र के रंग का होता है .

भौतिक गुण –कठोरता – 7.5 , आपेक्षिक घनत्व – 4.65. वर्तनांक— 1.93 –1.98. दुहरा वर्तन – 0.006 , अपकिरण – 0.048.

9 .लहसुनिया (कैट्स आई ) – लहसुनिया या वैदूर्य केतु का रत्न है .यह खनिज रत्न है .यह बिल्ली के आंख की तरह चमकता है .

भौतिक गुण –आपेक्षिक घनत्व – 3 .68 से 3 .78 तक .कठोरता –8.5. वर्तनांक –1.75 .दुहरा वर्तन – 0 .01 , अपकिरण – 0 .015 .
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अंक 7 : जानिए क्या ओर कैसा रहेगा 7 दिसम्बर 2018 को विधानसभा के चुनावों का परिणाम..

प्रिय मित्रों/पाठकों, आकाश में विचरण करने वाले ग्रह, नक्षत्र और सितारे हमेशा से मानव जीवन को प्रभावित करते आये हैं। हिन्दू ज्योतिष में कर्म की प्रधानता के साथ-साथ ग्रह गोचर और नक्षत्रों के प्रभाव को भी मनुष्य की भाग्य उन्नति के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़- ओर तेलंगाना में क्या होगा चुनाव परिणाम-

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार तीन राज्‍यो में कांग्रेस और एक राज्य तेलंगाना में सत्तारूढ पार्टी टीआरएस सत्ता में लौट रही है जो बाद में बीजेपी के साथ लोकसभा चुनाव लडेगी- और कौन बनेगा मुख्यमंत्री इन राज्यो में-
राजस्थान में 7 दिसंबर 2018 को विधान सभा का चुनाव होने जा रहा है। इसी दिन अस्त गुरु उदित हो रहे हैं। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्योतिषशास्त्र के नियम के अनुसार जब जन्म नक्षत्र पर गुरु का गोचर होता है तो यह समय व्यक्ति के जीवन में काफी उथल-पुथल लाता है।

पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि बीजेपी का जन्म 6 अप्रैल 1980 में हुआ है। इसके तहत बीजेपी की कुंडली बनायी जाए तो मिथुन लग्र वृश्चिम राशि की कुंडली है। बीजेपी की कुंडली में अक्टूबर 2012 से सूर्य की महादशा आरंभ हुई है। सूर्य की महादशा में बीजेपी को लाभ होना शुरू हुआ। इसके बाद ही बीजेपी ने गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेन्द्र मोदी को पीएम पद का प्रत्याशी बनाया गया। उस समय पीएम मोदी की कुंडली में अच्छा समय था। जिसकी वजह से बीजेपी और पीएम मोदी की कुंडली दोनों के ग्रह योग के चलने के साथ ही पहली बार केंद्र में बहुमत की सरकार बनी। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि सूर्य की महादशा छहः साल के लिए होती है। जिसके चलते बीजेपी ने कई राज्यों में चुनाव जीता।

इस समय राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की कुंडली में जन्म नक्षत्र अनुराधा पर अतिचारी गुरु का गोचर हो हो रहा है जो शुभ दशा नहीं है।
8 मार्च 1953 को शाम 4 बजकर 45 मिनट पर पर मुंबई में जन्मी वसुंधरा राजे की कुंडली कर्क लग्न और वृश्चिक राशि की है। वसुंधरा राजे की कुंडली में नवमेश गुरु और दशमेश मंगल के स्थान परिवर्तन राजयोग ने उनको दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनवाया और जबरदस्त लोकप्रियता दी। कुंडली के कर्म स्थान (दशम भाव) में बैठे गुरु और और शुक्र के योग के कारण वसुंधरा राजे ने शिक्षा और महिला एवं बल कल्याण के क्षेत्र में राजस्थान में बेहद अच्छा काम किया। किन्तु साल 2015 में शनि की साढ़ेसाती के कारण ललित मोदी कांड में नाम आने पर वसुंधरा राजे की लोकप्रियता में गिरावट आने लगी। वर्तमान में चल रही राहु में गुरु की दशा छिद्र और जन्म-नक्षत् पर गोचर के गुरु के कारण उनको राजस्थान विधानसभा चुनावों में प्रतिकूल परिणाम मिलने के ज्योतिषीय संकेत दिख रहे हैं।

फ़िलहाल राजस्थान कांग्रेस ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं कि उनकी ओर से मुख्यमंत्री प्रत्याशी कौन होगा लेकिन पहले 2 बार राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कुंडली को देखने से ऐसा लगता है कि इनकी कुंडली में इन दिनों ग्रहों के अच्छे योग बने हुए हैं। लग्न से छठे भाव में गुरु का गोचर और सप्तम में चल रहा शनि का गोचर उनको अच्छी सफलता दिला सकते हैं।
योगकारक मंगल की महादशा में इस समय सूर्य की अंतर्दशा चल रही चल रही है, जो कि लाभ भाव में होकर उनको ‘राज्य -लाभ’ का का ज्योतिषीय संकेत दे रहे हैं।

राजस्थान कांग्रेस के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट की कुंडली में बन रहा ‘शूल योग’ जहां उनको एक तेज़तर्रार वक्त बनता है तो वहीं दूसरी ओर यह योग उनको उनकी ही पार्टी के भीतर गुटबाजी से परेशान होने का संकेत भी दे रहा है।

राजस्थान विधानसभा चुनावों में कांग्रेस जीत सकती है लेकिन सूर्य उनकी कुंडली में नवांश में नीच राशि में हैं इसलिए अभी इनके लिए मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना कठिन है।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को फिर एक बार सत्ता की चाबी मिल सकती है। इनकी कुंडली में इन दिनों ग्रहों के अच्छे योग बने हुए हैं।

धनु राशि में गोचर कर रहे शनि देव, मध्यप्रदेश की कुंडली में ‘ढैय्या’ और छत्तीसगढ़ की कुंडली में ‘साढ़ेसती’ का प्रभाव लेकर चल रहे हैं तो ऐसे में इस बात की आशंका दिख रही है कि इन दोनों राज्यों में शनि महाराज सत्ता परिवर्तन करवा सकते हैं

मध्य प्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं। इन 230 सीटों में 35 सीट अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक कुल पांच करोड़ तीन लाख 34 हजार दो सौ साठ मतदाता हैं जो अलग अलग दलों के उम्मीदवारों की किस्मक का फैसला करेंगे।

मध्य प्रदेश की कुंडली 1 नवंबर 1956 मध्य रात्रि भोपाल की है, जहां कर्क लग्न उदय हो रहा है। इस राज्य की राशि कन्या है।

धनु राशि में गोचर कर रहे शनि कन्या से चतुर्थ भाव में होकर ‘कंटक-शनि’ के गोचर का निर्माण कर रहे हैं जो मेदिनी ज्योतिष के अनुसार सत्ता परिवर्तन का योग है।

मध्य प्रदेश की कर्क लग्न की कुंडली में पिछले सितंबर महीने से दश स्थान यानी (हानि स्थान) के स्वामी बुध की महादशा शुरू हो चुकी है जिससे सत्ता परिवर्तन का योग बन रहा है।

इस दफा शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है। किसानों के आंदोलन, एससी-एसटी एक्ट का मामला शिवराज सिंह चौहान के लिए मुश्किल साबित हो सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष इस चुनाव में स्थानीय मुद्दों से ज्यादा राष्ट्रीय मुद्दों को महत्व दे रहे हैं। कांग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है जैसे जैसे मतदान की तारीख करीब आएगी बीजेपी चुनावों का ध्रूवीकरण कर सकती है लिहाजा कांग्रेस अध्यक्ष आक्रामक भूमिका में हैं।
क्या कहते हैं शिवराज सिंह के सितारे?

भाजपा के शिवराज सिंह का जन्म 05 मार्च सन् 1959 को मध्यान्ह 12 बजे हुआ था। उस समय क्षिमिज पर वृष लग्न उदित हो रही थी। वृष लग्न एक स्थिर व सौम्य स्वभाव वाली राशि है। आप गंभीर, विचारशील, शान्तप्रिय और दयालु प्रकृति होंगे। आपमें प्रबल शारीरिक व मानसिक सहनशक्ति एंव सहिष्णुता होगी जिसके फलस्वरूप आप कार्यो के प्रति धैर्य व लग्न के साथ समर्पित रहेंगे।

230 सीटों वाले मध्यप्रदेश की कमान लम्बे समय से शिवराज सिंह संभाल रहे है। आपकी पत्री में शनि की दशा में बुध का अन्तर चल रहा है और 10 नवम्बर से राहु का प्रत्यन्तर प्रारम्भ हो जायेग। शनि आपकी कुण्डली में भाग्येश व दशमेश होकर अष्टम भाव में बैठा है। बुध पंचमेश व द्वतीयेश होकर लाभ में बैठकर जनता के कारक भाव पंचम को सप्तम नजर से देख रहा है। अतः शिवराज मध्यप्रदेश की जनता के लोकप्रिय नेता बने रहेंगे। आपकी पत्री में गुरू सातवें भाव में वृश्चिक राशि में बैठा है। 12 अक्टूबर से गुरू वृश्चिक राशि में भ्रमण करना शुरू कर देगा। यह आपके लिए एक बहुत शुभ संयोग है। वृश्चिक एक स्थिर राशि है यानि राज्य में भाजपा की स्थिरता बनी रहेगी। अतः आपके जनाधार में भले ही कमी आये किन्तु आप एक बार फिर से पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब होंगे।
मध्यप्रदेश के युवा कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का जन्म 1 जनवरी 1971 को सुबह 9 बजकर 40 मिनट पर मुंबई में था। उनका मुख्यमंत्री बन पाना कठिन है।
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कांग्रेस के खेवनहार कमलनाथ
मध्यप्रदेश में कांग्रेस के खेवनहार कमल नाथ है। कमलनाथ का जन्म 18 नवम्बर सन् 1946 ई0 को 12 बजे कानपुर में हुआ था। आपका जन्म मकर लग्न में हुआ है। वर्तमान में आपकी पत्री में बृहस्पति की दशा में शनि का अन्तर चल रहा है और 22 नवम्बर से शनि का ही प्रत्यन्तर शुरू हो जायेगा। शनि आपकी पत्री में लग्नेश व द्वितीयेश होकर लाभ भाव में बैठकर सातवीं दृष्टि से पंचम भाव को देख रहा है। शनि ग्रह सम अवस्था में इसीलिए अच्छा फल दे पाने में सक्षम नहीं है। गुरू द्वादशेश तृतीयेश होकर दशम भाव में बैठा है। दशम भाव सत्ता का कारक होता है, लेकिन इसकी मूल त्रिकोण राशि 12 वें भाव में पड़ रही है, जो अशुभ है। अतः आप सत्ता के करीब-करीब आते दूर हो जायेंगे।
(संभावित) निष्कर्ष मध्यप्रदेश चुनावों का :
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा को लगभग 122 सीटें तथा कांग्रेस को 95 के आसपास सीटें पाकर ही संतोष करना पड़ेगा। बसपा को 04 सीटें और अन्य दलों को मिलाकर 04 सीटें मिलने के संकेत नजर आ रहें है।
छत्तीसगढ़ राज्य की कुंडली 1 नवंबर 2000 को मध्य रात्रि में रायपुर की है जहां कर्क लग्न और धनु राशि का प्रभाव है। धनु राशि में इन दिनों शनि महाराज चल रहे हैं जो सत्ता परिवर्तन का योग बना रहे हैं।
तेलंगाना में विधान सभा का चुनाव 7 दिसंबर 2018 को होने जा रहा है। ज्योतिषशास्त्र की गणना बताती है कि इस समय तेलंगाना के वर्तमान मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव की कुंडली में सितारे इतने मजबूत हैं कि फिर से सत्ता में लौट सकते हैं।

दक्षिण भारत में तमिलनाडु के प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार जन्म नक्षत्र में गुरु यानि बृहस्पति ग्रह का गोचर जातक को मानसिक कष्ट के साथ-साथ बड़े बदलावों से होकर गुजरने पर विवश करता है। इन तमिल ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान राम के जन्म नक्षत्र में गोचर के गुरु चल रहे थे तब सीता का हरण रावण के द्वारा किया गया था और राम, सीता की खोज में वन-वन भटकने को विवश हो गए थे। द्वापर युग में दुर्योधन के जन्म नक्षत्र पर जब गुरु का गोचर में भ्रमण हुआ तब वह अपने भाइयों सहित महाभारत के युद्ध में मारे गए। इन ज्योतिष के ग्रंथों के अनुसार, जन्म राशि और नक्षत्र में गुरु का गोचर जातक को उन परिस्थतियों में अधिक कष्ट देता है जब कुंडली में दशा अशुभ हो तथा शनि का गोचर भी प्रतिकूल चल चल रहा हो ।

ठीक ऐसी ही स्थिति इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की जन्म-कुंडली में बन रही है क्योंकि दोनों का ही जन्म नक्षत्र अनुराधा है, जहां गोचर में गुरु अतिचारी होकर चल रहे हैं और दोनों की जन्म राशि वृश्चिक है, जो कि शनि की साढ़ेसाती के प्रभाव में है।
17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे नरेंद्र मोदी की कुंडली वृश्चिक लग्न और वृश्चिक राशि की है। प्रधानमंत्री मोदी का चंद्रमा अनुराधा नक्षत्र का है, जिस पर अतिचारी गुरु का गोचर तथा धनु में चल रहे शनि की साढ़ेसाती का अशुभ प्रभाव पड़ रहा है। राफेल मामले, सीबीआई विवाद और देश में बढ़ रही बेरोजगारी की की समस्या केंद्र की मोदी सरकार के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। चंद्र में शुक्र की दशा में चल रहे प्रधानमंत्री मोदी को पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी की हार का सामना करना पड़ सकता है।

लेकिन 3 मार्च 2019 के बाद पीएम मोदी के आएंगे अच्छे दिन, यानी 2019 में फिर  मोदी सरकार !

पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि पीएम मोदी की कुंडली वृश्चिक लग्न वृश्चिक राशि की है। साथ ही पीएम मोदी की कुंडली में चंद्रमा की महादशा चल रही है। जो वर्ष 2021 तक चलेगी। पीएम मोदी की कुंडली में चन्द्रमा की महादशा में बुध का अंतर चल रहा है, यह स्थिति 3 मार्च 2019 तक रहेगी। इसके ठीक बाद कुंडली में केतु का असर आयेगा। पीएम मोदी के लिए केतु भाग्य बदलने वाला साबित हो सकता है। पीएम मोदी की कुंडली वृश्चिक लग्न की है और इस लगन में केतु लाभकारी होता है। इसके अतिरिक्त वृश्चिक लग्र के लिए बृहस्पति पंचमेश में होता है। यह स्थिति बहुत अच्छी मानी गई है। तो बता दें कि, मार्च के शुरूआत से ही पीएम मोदी का फिर से अच्छे दिन वाले हैं। यानी अच्छा समय शुरू हो जाएगा। जिसका फायदा पीएम मोदी को 2019 चुनाव में होगा और एक बार पीएम नरेन्द्र मोदी के चलते बीजेपी को बहुमत या फिर सबसे अधिक सीट मिल सकती है।
फ़िलहाल राजस्थान कांग्रेस ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं कि उनकी ओर से मुख्यमंत्री प्रत्याशी कौन होगा लेकिन पहले 2 बार राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कुंडली को देखने से ऐसा लगता है कि इनकी कुंडली में इन दिनों ग्रहों के अच्छे योग बने हुए हैं। लग्न से छठे भाव में गुरु का गोचर और सप्तम में चल रहा शनि का गोचर उनको अच्छी सफलता दिला सकते हैं।
योगकारक मंगल की महादशा में इस समय सूर्य की अंतर्दशा चल रही चल रही है, जो कि लाभ भाव में होकर उनको ‘राज्य -लाभ’ का का ज्योतिषीय संकेत दे रहे हैं।

अंक 6 : ज्योतिष के अनुसार इनकी तीसरी बार हो सकती है राजस्थान में ताजपोशी

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p style=”text-align: justify;”>👉एक नजर राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018 पर 👈

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p style=”text-align: justify;”>🌏जन्म नक्षत्र में गोचर कर रहे गुरु बढ़ाएंगे वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की मुश्किलें!🌏

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p style=”text-align: justify;”>🌹 ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार, जन्म नक्षत्र में गुरु यानि बृहस्पति ग्रह का गोचर जातक को मानसिक कष्ट के साथ-साथ बड़े बदलावों से होकर गुजरने पर विवश करता है।
👉 ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान राम के जन्म नक्षत्र में गोचर के गुरु चल रहे थे तब सीता का हरण रावण के द्वारा किया गया था और राम, सीता की खोज में वन-वन भटकने को विवश हो गए थे।
👉 द्वापर युग में दुर्योधन के जन्म नक्षत्र पर जब गुरु का गोचर में भ्रमण हुआ तब वह अपने भाइयों सहित महाभारत के युद्ध में मारे गए।
👉ज्योतिष के ग्रंथों के अनुसार, जन्म राशि और नक्षत्र में गुरु का गोचर जातक को उन परिस्थतियों में अधिक कष्ट देता है जब कुंडली में दशा अशुभ हो तथा शनि का गोचर भी प्रतिकूल चल रहा हो ।
👉ठीक ऐसी ही स्थिति इस समय राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की जन्म-कुंडलियों में बन रही है क्योंकि उनका जन्म नक्षत्र अनुराधा है, जहां गोचर में गुरु अतिचारी होकर चल रहे हैं और दोनों की जन्म राशि वृश्चिक है, जो कि शनि की साढ़ेसाती के प्रभाव में है।

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p style=”text-align: justify;”>👉🏻👉🏻 गुगल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार 8 मार्च 1953 को शाम 4 बज कर 45 मिनट्स पर मुंबई में जन्मी वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की कुंडली कर्क लग्न और वृश्चिक राशि की है।
👉👉🏻मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की जन्म कुंडली में नवमेश गुरु और दशमेश मंगल के स्थान परिवर्तन राजयोग ने उनको दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनवाया और जबरदस्त लोकप्रियता दी।
👉कुंडली के कर्म स्थान (दशम भाव) में बैठे गुरु और शुक्र के योग के कारण वसुंधरा राजे ने शिक्षा और महिला एवं बल कल्याण के क्षेत्र में राजस्थान में बेहद अच्छा काम किया।
👉किन्तु साल 2015 में शनि की साढ़ेसाती के कारण ललित मोदी कांड में नाम आने पर वसुंधरा राजे की लोकप्रियता में गिरावट आने लगी।
👉वर्तमान में चल रही राहु में गुरु की दशा छिद्र और जन्म-नक्षत्र पर गोचर के गुरु के प्रभाव के कारण उनको राजस्थान विधानसभा चुनावों में प्रतिकूल परिणाम मिलने के ज्योतिषीय संकेत दिख रहे हैं।

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p style=”text-align: justify;”>कुछ स्थानों पर राजस्थान की वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का जन्म 08 मार्च 1953 ई0 को मध्यान्ह 12 बजे मुम्बई में हुआ था। उपलब्ध जानकारी अनुसार वसुन्धरा राजे की जन्म कुण्डली के प्रथम भाव में वृषभ लग्न की है।

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p style=”text-align: justify;”>वृषभ राशि एक स्थिर राशि है, जिसके कारण आप में प्रबल शारीरिक व मानसिक सहनशक्ति एंव सहिष्णुता होगी।

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p style=”text-align: justify;”>आप स्वभाव से हठी एंव योजनाओं को पूर्ण करने की योग्यता रखेंगी।
क्या कहते हैं वसुंधरा राजे सिंधिया के सितारे?

वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया की कुण्डली में इस समय राहु की दशा में राहु का अन्तर और गुरू का प्रत्यन्तर चल रहा है। राहु आपके भाग्य में बैठकर पंचम दृष्टि से लग्न को देख रहा है, इसलिए आप चिन्ताग्रस्त रहेगी व नवम दृष्टि से जनता के संकेतक भाव पंचम को देख रहा है, जिस कारण आपकी जनता में लोकप्रियता कमी आयेगी। गुरू अष्टमेश होकर द्वादश भाव में बैठकर अशुभ फल देगा। अतः वसुंधरा राजे को दोबरा से मुख्यमंन्त्री बन पाना मुश्किल है। शनि उच्च का है एंव वक्री भी है। शनि वंसुधरा राजे को एक बार फिर मुख्यमन्त्री की कुर्सी पर आसीन होने का सुनहरा अवसर देगा किन्तु बुध नीच का होकर अपनी सप्तम नजर पंचम भाव पर डाल रहा है, इसलिए बहुमत पाकर सरकार बना पाना मुश्किल है, क्योंकि राजस्थान में भाजपा को लगभग 80 से 85 सीटें पाने के संकेत नजर आ रहें है।

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p style=”text-align: justify;”>श्री अशोक गहलोत (पूर्व मुख्य मंत्री-राजस्थान)
(नोट:-जन्म की तारीख गूगल सर्च से जैसी प्राप्त हुई है.उसी के अनुसार कुंडली का निर्माण किया है। मेरा उद्दयेश्य सिर्फ़ इतना ही है कि सफल लोगो की कुंडली के शुभ योगों की चर्चा करना है)

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p style=”text-align: justify;”>जन्म तारीख- 03.05.1951
समय 09.30 बजे सुबह
स्थान-जोधपुर
वार-गुरुवार
जन्म लग्न-मिथुन
जन्म राशी-मीन
जन्म नक्षत्र-उत्तराभाद्रपद
शुभ योग —

(1)गुरु और चन्द्रमा 10 वे भाव मे युति=गज केशरी योग-अदभुत योग है,जातक यशस्वी,धनवान,सरकार का मुखिया,समाज द्वारा पूजित होगा।

(2)लग्नेश बुध11 वे भाव मे सूर्य के साथ है,यह बुधादित्य योग का निर्माण कर रहा है।जातक की वाणी प्रभावशाली होगी ओर कई विद्याओ का जानकर होगा।

(3)गुरु केंद्र(10वे भाव मे) में है। यह बहुत शुभ योग है।शास्त्र बताते है कि केंद्र में गुरु कुंडली के 1000 दोष दूर करता है।

(4)शुक्र 12 वे भाव मे स्वराशिस्थ-जातक घर से अधिक बाहर विकास करेगा ओर अतुलनीय सुख प्राप्त पड़ेगा।

(5)गुरु केंद्र में स्वयं की राशि मे-“हंस योग” का निर्माण कर रहा है। जातक विद्ववान ओर अवार्ड प्राप्त करने वाला होगा.

(6)राहु 9 वे भाव मे है- अपनी चतुरता से लोगो को प्रभावित करेगा।

(7)केतु 3 रे भाव(पराक्रम भाव) मे है अपने समस्त शत्रुओ का नाश करेगा।

महादशा:- 12.05.2016 से 12.11.2019 तक समय शानदार है।

वर्तमान में इसका प्रबल राजयोग बन रहा है । शनिदेव के प्रबल गजकेसरी योग से गुरु का केंद्र में होने से छठे स्थान पर राहु तीसरे स्थान पर केतु होना चाहिए,जो अद्भुत योग बनता है गुरु और चंद्रमा की युति से सरकार के मुखिया बनने का योग नवंबर 2019 तक है यह योग अशोक गहलोत का है। ये हम नही कह रहे यह कहना है उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री का, जिन्होंने वर्ष 1997 में भी गहलोत के मुख्यमंत्री बनने को लेकर भविष्यवाणी की थी और वह भविष्यवाणी भी सही साबित हुई थी।

श्री अशोक गहलोत का लग्न मिथुन, उत्तराभाद्रपद नक्षत्र, मीन राशि हैं।

वर्ष 1998 से 2019 तक अशोक गहलोत के राज योग प्रबल हैं राजनीति के हर क्षेत्र में माहिर तीसरा केतु होने से वाक चातुर्य से काम बनाने की क्षमता, शत्रुओं का नाश करने की कला, नवे राहु गुरु केंद्र में होने से सभी दोष भी माफ माने जाते हैं।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि नवंबर 2019 तक समय श्रेष्ठ रहेगा इनका बुद्ध ग्यारहवें भाव में प्रभावशाली होकर प्रशासनिक पावर प्रदान कर्ता है कुल मिलाकर अशोक गहलोत के राज योग प्रबल हैं । उन्होंने बताया कि राहुल गांधी के राजयोग नहीं है गठबंधन सरकार अगर आती है तो सर्वमान्य प्रधानमंत्री उम्मीदवार अशोक गहलोत हो सकते हैं और उनकी जीत प्रबल होगी।

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p style=”text-align: justify;”>शनि देव की दशा गहलोत के लिए श्रेष्ठ राज योग कारक —
गहलोत की कुंडली प्रबल जीत के आसार बनाती है बृहस्पति की दशा शनि देव की दशा गहलोत के लिए श्रेष्ठ राज कारक है कुल मिलाकर नेतृत्व पर निर्भर है कि वह अपने तुरूप के पत्ते को इस्तेमाल करते हैं या नहीं बाकी अशोक गहलोत का भविष्य उज्जवल है। गुरु और चंद्रमा दसवें भाव में गजकेसरी योग अद्भुत योग सरकार का मुखिया बनने का योग बनता है लग्नेश बुध ग्यारहवें भाव में सूर्य के साथ बुधादित्य योग का निर्माण करता है।।

जातक की वाणी प्रभावशाली और कई विद्याओं का जानकार होता है गुरु केंद्र में दसवें भाव में शुभ योग है।। केंद्र में गुरु कुंडली के सभी दोष दूर करते हैं शुक्र बारहवें भाव में मीन राशि में स्थित है।।

खूब प्रसिद्धि प्राप्त होगी गुरु केंद्र में स्वयं की राशि में अच्छा योग बनाता है प्रधानमंत्री पद प्राप्त कर सकते हैं राहु नौवें भाव में अपनी चतुर प्रति लोगों को प्रभावित करते हैं कुल मिलाकर सर्वश्रेष्ठ योग चल रहे हैं।

कांग्रेस के अशोक गहलोत का जन्म 03 मई सन् 1951 को सुबह 9:30 मि. पर जोधपुर में हुआ था। उस काल में क्षितिज पर मिथुन लग्न उदित हो रही थी। मिथुन राशि एक द्विस्वभाव राशि है, जिसके फलस्वरूप गहलोत के स्वभाव में दोहरापन पाया जायेगा, कभी धीर गम्भीर तो कभी चंचल और वाचाल रहेंगे। आपके सोचने का तरीका वैज्ञानिक व तर्कसंगत होगा।

इस समय आपकी कुण्डली में मंगल की दशा में राहु की अन्तर एंव केतु की प्रत्यन्तर दशा चल रही है। षष्ठेश और लाभेश होकर मंगल अपनी मेष राशि में लाभ भाव में राजा सूर्य के साथ संग्रस्थ है। मंगल और सूर्य की सप्तम नजर जनता के कारक पंचम भाव पर पड़ रही है।

यह स्थिति शुभ कही जा सकती है। राहु भाग्य भाव में स्वराशि का होकर गुरू के नक्षत्र पूर्वाभाद्रपद पर कब्जा किये हुये है। गुरू सप्तमेश होकर दशम भाव में बैठा है। सप्तम भाव परिवर्तन का कारक एंव दशम स्थान राज्य का संकेतक है।

पूर्व सीएम अशोक गहलोत की कुण्डली में इस वक्त मंगल की दशा चल रही है व 6 दिसम्बर से सूर्य की अन्तर दशा प्रारम्भ होने वाली है। मंगल लाभेश होकर लाभ भाव में बैठकर सप्तम नजर से पंचम भाव को देख रहा है।

सूर्य तृतीयेश होकर लाभ पर कब्जा जमाकर पंचम भाव को देख रहा है। सूर्य व मंगल दोनों की जनता के संकेतक भाव पर दृष्टि पड़ रही है।

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p style=”text-align: justify;”>योगकारक मंगल की महादशा में इस समय सूर्य की अंतर्दशा चल रही है, जो कि लाभ भाव में होकर उनको ‘राज्य -लाभ’ का ज्योतिषीय योग दे रही है।
👉अशोक गहलोत यदि तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बन जाएं तो ज्योतिषीय दृष्टिकोण से कोई आश्चर्य नहीं होगा।
गहलोत के लिए शुभ हैं संकेत..

6 अक्टूबर से गुरू वृश्चिक में गोचर करेगा जो आपके छठें भाव में रहेगा जिसकी पंचम दृष्टि सत्ता के कारक दशम भाव पर पड़ रही है। यह एक बहुत ही शुभ संकेत है। आपके लिए अंक 8 भी विशेष फलदायी है क्योंकि आप 1998 में पहली बार सीएम बने थे। दूसरी बार सन् 2008 में सीएम बने और इस बार भी सन् 2018 में अंतिम अंक 8 है।

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p style=”text-align: justify;”>इन सभी कारणो को देखते हुये निष्कर्ष यह निकलता है कि भाजपा और कांग्रेस में कांटे की टक्कर रहेगी। भाजपा को 80 से 85 सीटें मिल सकती है। वहीं काग्रेस 100 से 110 सीटें प्राप्त करके सरकार बनाने में कामयाब होगी।
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🌎बीजेपी होगी कमजोर, कांग्रेस की पकड़ बढ़ेगी🌍

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p style=”text-align: justify;”>🌹देश के तीन बड़े राज्यों में महीने पता चल जाएगा कि 2019 में पीएम मोदी को चुनाव जीतने के लिए कितना कठिन परिश्रम करना होगा।
👉राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अभी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है।
👉यदि यहां पर किसी भी तरह से सत्ता का परिवर्तन होता है, तो पांच महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान हो सकता है।
👉भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, इस पर सीधी बात करना मुश्किल है, लेकिन चाल समझकर सितारों के इशारों को समझा जा सकता है।

🌎बीजेपी -कांग्रेस दोनों की कुंडली का अध्ययन 🌍

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p style=”text-align: justify;”>🌹बीजेपी -कांग्रेस दोनों की कुंडली का अध्ययन करने के बाद यह निकलकर आता है कि कांग्रेस अभी बृहस्पति की महादशा में है।
👉कांग्रेस के लिए बृहस्पति की दशा फायदे वाली रहेगी।
👉जिसमें से शुक्र का अंतर चल रहा है।
👉अभी शनि कुंडली में स्थित सूर्य पर से गुजर रहा है।
👉वहीं हाल ही वृश्चिक राशि में गया बृहस्पति कुंडली के आधार पर बुध के ऊपर से गुजर रहा है।
👉वहीं बीजेपी की बात करें तो चंद्रमा की दशा में 👉चंद्रमा का अंतर चल रहा है।
👉चंद्रमा में चंद्रमा की अंतर्दशा बीजेपी के लिए थोड़ी मुश्किल पैदा करने वाली है।
👉बृहस्पति का वृश्चिक राशि में पारगमन भी बीजेपी की कुंडली के अनुसार फायदा देने वाला नहीं है।
👉वहीं साढ़े साती भी आखिरी चरण में है।
👉साढ़े साती का आखिरी चरण भी बीजेपी को परेशानी में डालने वाला है।
👉वृश्चिक राशि में गया बृहस्पति चंद्रमा के ऊपर से गुजर रहा है।
👉वोटिंग के दिन यानी कि 7 दिसंबर 2018 को चंद्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र में सूर्य के साथ युति कर सकता है।
👉वोटिंग वाले दिन केतु का चंद्रमा के साथ संयोजन सत्ता पक्ष के लिए अच्छा नहीं माना जाता।
👉बहुत सी सीटों पर किसी एक तरफा वोटिंग देखने को मिल सकती है।
👉परिणाम वाले दिन चंद्रमा उत्तराषाढ़ा नक्षत्र से गुजरते हुए केतु के साथ संयोजन में रहेगा।
👉कुल मिलाकर यदि सितारों की बात सुनें तो आने वाले दिनों में बीजेपी को मेहनत का फल कम ही मिलेगा,
👉हालांकि बृहस्पति में शुक्र की अंतर्दशा आपसी झगड़ों को बढ़ा सकती है।
👉वहीं कांग्रेस यदि आंतरिक झगड़ों से मुक्त हो पाई, तो फायदे में रहेगी।
👉अभी वृश्चिक राशि में बृहस्पति का परिभ्रमण कांग्रेस के लिए फायदेमंद रह सकता है।

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p style=”text-align: justify;”>अंक 5 : जानिए किसी कन्या जातक का विवाह कब, कहाँ ओर किस दिशा में होगा??
सुसराल ओर पति कैसा मिलेगा??

प्रिय पाठकों/मित्रों, हमारे यहाँ कहावत है कि जोड़े स्वर्ग से तय होकर आते हैं और उनका मिलन पृथ्वी पर निर्धारित समय में विवाह-संस्कार से होता है अर्थात सब कुछ विधि के विधान के अनुसार तय होने के बावजूद जब बेटी की उम्र 20-21 के पार हो जाती है तो मां-बाप की चिंताएं बढ़ने लगती है| दिन-रात उन्हें यही सवाल सालने लगता है कि हमारी लाडली के हाथ पीले कब होंगे?

उसे पति (वर) कैसा मिलेगा? ससुराल कैसी और कहां होंगी आदि।

चिंता मत करिए, ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार ज्योतिष शास्त्र में आपके इन सवालों का जवाब है और आप खुद थोड़ी मेहनत करके इन बातों का जवाब जान सकते हैं।

ज्योतिष में लग्न कुंडली का प्रथम भाव जातक का स्वयं का होता है और इसके ठीक सामने वाला सातवां भाव जीवनसाथी का होता है। इस भाव से प्रमुख रूप से विवाह का विचार किया जाता है। इसके अलावा यह भी पता कर सकते हैं कि जीवनसाथी का स्वभाव कैसा होगा?

उसका चरित्र कैसा होगा, ससुराल कैसी मिलेगी और वर-वधू में आपसी मित्रता कैसी रहेगी ??

पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी कन्या लड़की की जन्म लग्न कुंडली से उसके होने वाले पति एवं ससुराल के विषय में सब कुछ स्पष्टत: पता चल सकता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्योतिष विज्ञान में फलित शास्त्र के अनुसार लड़की की जन्म लग्न कुंडली में लग्न से सप्तम भाव उसके जीवन, पति, दाम्पत्य जीवन तथा वैवाहिक संबंधों का भाव है। इस भाव से उसके होने वाले पति का कद, रंग, रूप, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय या कार्यक्षेत्र परिवार से संबंध आदि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यहां सप्तम भाव के आधार पर कन्या के विवाह से संबंधित विभिन्न तथ्यों का विश्लेषण प्रस्तुत है।

ससुराल की दूरी :

सप्तम भाव में अगर वृष, सिंह, वृश्चिक या कुंभ राशि स्थित हो तो लड़की की शादी उसके जन्म स्थान से 90 किलोमीटर के अंदर ही होगी।

यदि सप्तम भाव में चंद्र, शुक्र तथा गुरु हों तो लड़की की शादी जन्म स्थान के समीप होगी।

यदि सप्तम भाव में चर राशि मेष, कर्क, तुला या मकर हो तो विवाह उसके जन्म स्थान से 200 किलोमीटर के अंदर होगा।

अगर सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि स्थित हो तो विवाह जन्म स्थान से 80 से 100 किलोमीटर की दूरी पर होगा। यदि सप्तमेश सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य हो तो विवाह विदेश में होगा या लड़का शादी करके लड़की को अपने साथ लेकर विदेश चला जाएगा।

शादी की आयु :

यदि जातक या जातक की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में सप्तमेश बुध हो और वह पाप ग्रह से प्रभावित न हो तो शादी 13 से 18 वर्ष की आयु सीमा में होती है। सप्तम भाव में सप्तमेश मंगल पापी ग्रह से प्रभावित हो तो शादी 18 वर्ष के अंदर होगी। शुक्र ग्रह युवा अवस्था का द्योतक है। सप्तमेश शुक्र पापी ग्रह से प्रभावित हो तो 25 वर्ष की आयु में विवाह होगा। चंद्रमा सप्तमेश होकर पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो विवाह 22 वर्ष की आयु में होगा। बृहस्पति सप्तम भाव में सप्तमेश होकर पापी ग्रहों से प्रभावित न हो तो शादी 27-28वें वर्ष में होगी। सप्तम भाव को सभी ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तथा सप्तम भाव में शुभ ग्रह से युक्त होकर चर राशि हो तो जातक का विवाह उचित आयु में सम्पन्न हो जाता है। यदि किसी लड़की या लड़की की जन्म कुंडली में बुध स्वर राशि मिथुन या कन्या का होकर सप्तम भाव में बैठा हो तो विवाह बाल्यावस्था में होगा।

विवाह वर्ष :

आयु के जिस वर्ष में गोचरस्थ गुरु लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव में आता है, उस वर्ष शादी होना निश्चित समझें परंतु शनि की दृष्टि सप्तम भाव या लग्न पर न हो। लग्न या सप्तम में बृहस्पति की स्थिति होने पर उस वर्ष शादी होती है।

विवाह कब होगा ??

यह जानने की दो विधियां यहां प्रस्तुत हैं। जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में स्थित राशि अंक में 10 जोड़ दें। योग फल विवाह का वर्ष होगा। सप्तम भाव पर जितने पापी ग्रहों की दृष्टि हो, उनमें प्रत्येक की दृष्टि के लिए 4-4 वर्ष जोड़ योग फल विवाह का वर्ष होगा।

विवाह की दिशा :

किसी भी कन्या जातक की जन्मांक में सप्तम भाव में स्थित राशि के आधार पर शादी की दिशा ज्ञात की जाती है। उक्त भाव में मेष, सिंह या धनु राशि एवं सूर्य और शुक्र ग्रह होने पर पूर्व दिशा वृष, कन्या या मकर राशि और चंद्र, शनि ग्रह होने पर दक्षिण दिशा, मिथुन, तुला या कुंभ राशि और मंगल, राहु, केतु ग्रह होने पर पश्चिम दिशा, कर्क, वृश्चिक, मीन या राशि और बुध और गुरु होने पर उत्तर दिशा की ओर शादी होगी। अगर जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस भाव पर अन्य ग्रह की दृष्टि न हो, तो बलवान ग्रह की स्थिति राशि में शादी की दिशा समझें।

पति कैसा मिलेगा :

ज्योतिष विज्ञान में सप्तमेश अगर शुभ ग्रह (चंद्रमा, बुध, गुरु या शुक्र) हो या सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तम भाव को देख रहा हो, तो लड़की का पति सम आयु या दो-चार वर्ष के अंतर का, गौरांग और सुंदर होना चाहिए। अगर सप्तम भाव पर या सप्तम भाव में पापी ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु या केतु का प्रभाव हो तो बड़ी आयु वाला अर्थात लड़की की उम्र से 5 वर्ष बड़ी आयु का होगा।

सूर्य का प्रभाव हो तो गौरांग, आकर्षक चेहरे वाला, मंगल का प्रभाव हो तो लाल चेहरे वाला होगा। शनि अगर अपनी राशि का उच्च न हो तो वर काला या कुरूप तथा लड़की की उम्र से काफी बड़ी आयु वाला होगा। अगर शनि उच्च राशि का हो तो पतले शरीर वाला गोरा तथा उम्र में लड़की से 12 वर्ष बड़ा होगा।

सप्तमेश अगर सूर्य हो तो पति गोल मुख तथा तेज ललाट वाला, आकर्षक, गोरा सुंदर, यशस्वी एवं राज कर्मचारी होगा। चंद्रमा अगर सप्तमेश हो, तो पति शांत चित्त वाला गौर वर्ण का, मध्यम कद तथा सुडौल शरीर वाला होगा। मंगल सप्तमेश हो, तो पति का शरीर बलवान होगा। वह क्रोधी स्वभाव वाला, नियम का पालन करने वाला, सत्यवादी, छोटे कद वाला, शूरवीर, विद्वान तथा भ्रातृ प्रेमी होगा तथा सेना, पुलिस या सरकारी सेवा में कार्यरत होगा।

पति कितने भाई बहनों वाला होगा :

लड़की की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव से तृतीय भाव अर्थात नवम भाव उसके पति के भाई-बहन का स्थान होता है। उक्त भाव में स्थित ग्रह तथा उस पर दृष्टि डालने वाले ग्रह की संख्या से 2 बहन, मंगल से 1 भाई व 2 बहन बुध से 2 भाई 2 बहन वाला कहना चाहिए।

लड़की की जन्मकुंडली में पंचम भाव उसके पति के बड़े भाई-बहन का स्थान है। पंचम भाव में स्थित ग्रह तथा दृष्टि डालने वाला ग्रहों की कुल संख्या उसके पति के बड़े भाई-बहन की संख्या होगी। पुरुष ग्रह से भाई तथा स्त्री ग्रह से बहन समझना चाहिए।

पति का मकान :

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p style=”text-align: justify;”>लड़की की जन्म लग्न कुंडली में उसके लग्न भाव से तृतीय भाव पति का भाग्य स्थान होता है। इसके स्वामी के स्वक्षेत्री या मित्रक्षेत्री होने से पंचम और राशि से या तृतीयेश से पंचम जो राशि हो, उसी राशि का श्वसुर का गांव या नगर होगा।
प्रत्येक राशि में 9 अक्षर होते हैं। राशि स्वामी यदि शत्रुक्षेत्री हो, तो प्रथम, द्वितीय अक्षर, सम राशि का हो, तो तृतीय, चतुर्थ अक्षर मित्रक्षेत्री हो, तो पंचम, षष्ठम अक्षर, अपनी ही राशि का हो तो सप्तम, अष्टम अक्षर, उच्च क्षेत्री हो तो नवम अक्षर प्रसिद्ध नाम होगा। तृतीयेश के शत्रुक्षेत्री होने से जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि ससुराल या भवन की होगी।

यदि तृतीय भाव से शत्रु राशि में हो और तृतीय भाव में शत्रु राशि में पड़ा हो तो दसवीं राशि ससुर के गांव की होगी। लड़की की कुंडली में दसवां भाव उसके पति का भाव होता है। दशम भाव अगर शुभ ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो, या दशमेश से युक्त या दुष्ट हो तो पति का अपना मकान होता है। राहु, केतु, शनि से भवन बहुत पुराना होगा। मंगल ग्रह में मकान टूटा होगा। सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु एवं शुक्र से भवन सुंदर, सीमैंट का बहुमंजिला होगा। अगर दशम स्थान में शनि बलवान हो तो मकान बहुत विशाल होगा।

पति की नौकरी :

लड़की की जन्म लग्न कुंडली में चतुर्थ भाव पति का राज्य भाव होता है। अगर चतुर्थ भाव बलयुक्त हो और चतुर्थेश की स्थिति या दृष्टि से युक्त सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र की स्थिति या चंद्रमा की स्थिति उत्तम हो तो नौकरी का योग बनता है।

पति की आयु :

लड़की के जन्म लग्न में द्वितीय भाव उसके पति की आयु भाव है। अगर द्वितीयेश शुभ स्थिति में हो या अपने स्थान से द्वितीय स्थान को देख रहा हो तो पति दीर्घायु होता है। अगर द्वितीय भाव में शनि स्थित हो या गुरु सप्तम भाव, द्वितीय भाव को देख रहा हो तो भी पति की आयु 75 वर्ष की होती है।

अंक 4 : जानिए ज्योतिष और खांसी रोग का सम्बंध(कारण)…

प्रिय मित्रों/पाठकों, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहों के द्वारा ही व्यक्ति के शरीर का संचालन होता है। कुंडली न केवल व्यक्ति का आइना है बल्कि यह इस बात को दर्शाता है कि कौन सा ग्रह किस समय आपको शारीरिक कष्ट, लंबी और भयंकर बीमारी देकर जाएगा।

कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार मानव के शरीर का वर्गीकरण कुंडली के द्वादश भाव और नवग्रह के आधार पर किया गया है। सर्दी आते ही अमूमन लोग सर्दी, खांसी और जुकाम से पीड़ित हो जाते हैं।

ग्रह शरीर को बीमारियों का घर भी बना सकते हैं और आजीवन चुस्त-दुरुस्त भी रखते हैं।

आयुर्वेद में खांसी को कास रोग भी कहा जाता है। खांसी होने ये पहले रोगी को गले में खरखरापन, खराश, खुजली आदि होती है और गले में कुछ भरा हुआ-सा महसूस होता है। कभी-कभी मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है और भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है।

कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो एलर्जी के कारण अथवा अपनी दैनिक जीवन-शैली और आस-पास के रहन-सहन से प्रभावित होकर दमे से पीड़ित हो जाते हैं। सर्दी, खांसी और दमे का सीधा संबंध कुंडली के चौथे भाव से होता है। ये भाव छाती को संबोधित करता है। शास्त्रों ने चन्द्रमा को चौथे भाव का कारक माना है क्योंकि चौथा भाव उस माता को संबोधित करता है जो अपने शिशु को स्तनपान करवाती है। कुंडली में दूषित चन्द्रमा अथवा चन्द्रमा का पाप करती (कैंची) योग के बीच छुपना छाती संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं को न्यौता देता है।

नजला-खांसी, जुकाम और दमा चन्द्रमा एवं बुध के द्वंद योग के कारण भी उन्नत होता है। ज्योतिष की चिकित्सा प्रणाली के अनुसार चन्द्रमा को चौथे भाव को पुन: स्थापित करके छाती संबंधित समस्याओं से राहत पाई जा सकती है।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार हर बीमारी का संबंध किसी न किसी ग्रह से है, जो आपकी कुंडली में या तो कमजोर है, या फिर दूसरे ग्रहों से बुरी तरह पीड़ित है। इसी प्रकार काल पुरुष की कुंडली में मनुष्य शरीर के सभी अंगों को 12 भावों में बांटा गया है। इन 12 भावों में कालपुरुष की 12 राशियां आती हैं जिनके स्वामी 7 ग्रह हैं तथा छाया ग्रहों राहु-केतु के प्रभाव भी अति महत्वपूर्ण हैं। साथ ही 27 नक्षत्रों का प्रभाव भी मनुष्य शरीर के सभी अंगों पर बराबर बना रहता है। इनके स्वामी ग्रह भी ये ही 7 ग्रह हैं अर्थात् सारांश रूप से यह कह सकते हैं कि शरीर के सभी अंगों को 12 भाव/राशियां, 9 ग्रह व 27 नक्षत्र संचालित करते हैं।

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p style=”text-align: justify;”>यदि चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से देखें तो इसमें भी शरीर के सारे अंग आ जाते हैं जिनका चिकित्सा की दृष्टि से दवाई द्वारा उपचार करना है जबकि कुंडली में अंगों का उपचार औषधि की बजाय ज्योतिष से होता है। इन दोनों में सामंजस्य बैठाना ही काल पुरूष की कुंडली का चिकित्सा विज्ञान में प्रयोग करना कहते हैं।
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खांसी की बीमारी में ज्योतिष के इन उपाय से मिलेगी राहत–

👉🏻👉🏻👉🏻खाकी धागे में चांदी का चौकोर सिक्का पिरोकर धारण करें।

👉🏻👉🏻👉🏻सफेद रंग के अंत वस्त्र न पहनें।

👉🏻👉🏻सफेदे के पेड़ की पत्तियों को जलाकर घर में धूप करें।

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p style=”text-align: justify;”>👉🏻👉🏻सफेद गाय के शुद्ध घी में लौंग मिलाकर छाती पर लगाएं।
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घरेलू इलाज
1. सूखी खांसी में दो कप पानी में आधा चम्मच मुलहठी चूर्ण डालकर उबालें। जब पानी आधा कप बचे तब उतारकर ठंडा करके छान लें। इसे सोते समय पीने से 4-5 दिन में अंदर जमा हुआ कफ ढीला होकर निकल जाता है और खांसी में आराम हो जाता है।

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p style=”text-align: justify;”>2. गीली खांसी के रोगी गिलोय, पीपल व कण्टकारी, तीनों को मोटा-मोटा कूटकर शीशी में भर लें। एक गिलास पानी में तीन चम्मच यह चूर्ण डालकर उबालें। जब पानी आधा रह जाए तब उतारकर बिलकुल ठंडा कर लें और 1-2 चम्मच शहद या मिश्री पीसकर डाल दें। इसे दिन में दो बार सुबह-शाम आराम होने तक पीना चाहिए।
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आयुर्वेदिक चिकित्सा
श्रंगराभ्र रस, लक्ष्मी विलास रस अभ्रकयुक्त और चन्द्रामृत रस, तीनों 10-10 ग्राम तथा सितोपलादि चूर्ण 50 ग्राम। सबको पीसकर एक जान कर लें और इसकी 30 पुड़िया बना लें। सुबह-शाम 1-1 पुड़िया, एक चम्मच वासावलेह में मिलाकर चाट लें। दिन में तीन बार, सुबह, दोपहर व शाम को, ‘हर्बल वसाका कफ सीरप’ या ‘वासा कफ सायरप’ आधा कप कुनकुने गर्म पानी में डालकर पिएँ। साथ में खदिरादिवटी 2-2 गोली चूस लिया करें। छोटे बच्चों को सभी दवाएँ आधी मात्रा में दें। प्रतिदिन दिन में कम से कम 4 बार, एक गिलास कुनकुने गर्म पानी में एक चम्मच नमक डालकर आवाज करते हुए गरारे करें।
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जानिए क्या रखें सावधानी :—

1 खांसी के रोगी को कुनकुना गर्म पानी पीना चाहिए और स्नान भी कुनकुने गर्म पानी से करना चाहिए। कफ ज्यादा से ज्यादा निकल जाए इसके लिए जब-जब गले में कफ आए तब-तब थूकते रहना चाहिए।

2 मीठा, क्षारीय, कड़वा और गर्म पदार्थों का सामान्य सेवन करना चाहिए। मीठे में मिश्री, पुराना गुड़, मुलहठी और शहद, क्षारीय चीजों में यवक्षार, नवसादर और सुहागा, द्रव्यों में सोंठ, पीपल और काली मिर्च तथा गर्म पदार्थों में गर्म पानी, लहसुन, अदरक आदि-आदि पदार्थों का सेवन करना लाभकारी होता है।

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p style=”text-align: justify;”>3 खांसी होने पर खटाई, चिकनाई, अधि‍क मिठाई, तेल के तले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा ठंड, ठंडी हवा और ठंडी प्रकृति के पदार्थों का सेवन करने से परहेज करना चाहिए।
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जानिए खांसी के प्रकार —

1. वातज खांसी : वात के कारण होने वाली खांसी में कफ सूख जाता है, इसलिए इसमें कफ बहुत कम निकलता है या निकलता ही नहीं है। कफ न निकल पाने के कारण, खांसी लगातार और तेजी से आती है, ताकि कफ निकल जाए। इस तरह की खांसी में पेट, पसली, आंतों, छाती, कनपटी, गले और सिर में दर्द भी होने लगता है।

2. पित्तज खांसी : पित्त के कारण होने वाली खांसी में कफ निकलता है, जो कि पीले रंग का कड़वा होता है। वमन द्वारा पीला व कड़वा पित्त निकलना, मुंह से गर्म बफारे निकलना, गले, छाती व पेट में जलन होना, मुंह सूखना, मुंह का स्वाद कड़वा रहना, प्यास लगती रहना, शरीर में गर्माहट या जलने का अनुभव होना और खांसी चलना, पित्तज खांसी के प्रमुख लक्षण हैं।

3. कफज खांसी : कफ के कारण होने वाली खांसी में कफ बहुत निकलता है। इसमें जरा-सा खांसते ही कफ आसानी से निकल आता है। कफज खांसी के लक्षणों में गले व मुंह का कफ से बार-बार भर जाना, सिर में भारीपन व दर्द होना, शरीर में भारीपन व आलस्य, मुंह का स्वाद खराब होना, भोजन में अरुचि और भूख में कमी के साथ ही गले में खराश व खुजली और खांसने पर बार-बार गाढ़ा व चीठा कफ निकलना शामिल है।

4. क्षतज खांसी : यह खांसी वात, पित्त, कफ, तीनों कारणों से होती है और तीनों से अधिक गंभीर भी। अधि‍क भोग-विलास (मैथुन) करने, भारी-भरकम बोझा उठाने, बहुत ज्यादा चलने, लड़ाई-झगड़ा करते रहने और बलपूर्वक किसी वस्तु की गति को रोकने आदि से रूक्ष शरीर वाले व्यक्ति के गले में घाव हो जाते हैं और खांसी हो जाती है।इस तरह की खांसी में पहले सूखी खांसी होती है, फिर रक्त के साथ कफ निकलता है।

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p style=”text-align: justify;”>5. क्षयज खांसी : यह खांसी क्षतज खांसी से भी अधिक गंभीर, तकलीफदेह और हानिकारक होती है। गलत खानपान, बहुत अधि‍क भोग-विलास, घृणा और शोक के के कारण शरीर की जठराग्नि मंद हो जाती है और इनके कारण कफ के साथ खांसी हो जाती है। इस तरह की खांसी में शरीर में दर्द, बुखार, गर्माहट होती है और कभी-कभी कमजोरी भी हो जाती है। ऐसे में सूखी खांसी चलती है, खांसी के साथ पस और खून के साथ बलगम निकलता है। क्षयज खांसी विशेष तौर से टीबी यानि (तपेदिक) रोग की प्रारंभिक अवस्था हो सकती है, इसलिए इसे अनदेखा बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए।
चन्द्रमा के कारण होती है–सर्दी – खांसी, फेफड़ों में परेशानी, नजला, जुकाम, क्षय रोग, श्वास सम्बन्धी रोग एवं मानसिक रोगों के लिए चन्द्र उत्तरदायी होता है। चंद्रमा को शांति का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिषियों के मुताबिक दिमाग और खून से जुड़ी बीमारियों का संबंध चंद्रमा की दशा से है। चंद्रमा कर्क राशि का स्वामी है।

उपचार स्थिति–

प्रश्न कुण्डली में प्रथम, पंचम, सप्तम एवं अष्टम भाव में पाप ग्रह हों और चन्द्रमा कमज़ोर या पाप पीड़ित हों तो रोग का उपचार कठिन होता है जबकि चन्द्रमा बलवान हो और 1, 5, 7 एवं 8 भाव में शुभ ग्रह हों तो उपचार से रोग का ईलाज संभव हो पाता है.पत्रिका में तृतीय, षष्टम, नवम एवं एकादश भाव में शुभ ग्रह हों तो उपचार के उपरान्त रोग से मुक्ति मिलती है.सप्तम भाव में शुभ ग्रह हों और सप्तमांश बलवान हों तो रोग का निदान संभव होता है.चतुर्थ भाव में शुभ ग्रह की स्थिति से ज्ञात होता है कि रोगी को दवाईयों से अपेक्षित लाभ प्राप्त होगा. इसके आलावा अलग अलग ग्रहों के उपचार के साथ साथ रोगो से बचने के लिये महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

-ऊँ नम: शिवाय मंत्र का सतत जाप करें।

-ऊँ हूँ जूँ स: इन बीज मंत्रो का चौबीसो घंटे जाप करे।

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p style=”text-align: justify;”>-शिव का अभिषेक करें।
जन्मजात रोग-प्रतिरोधात्मक क्षमता—-

सूर्य चन्द्रमा और लग्न– जन्मपत्रिका में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अच्छे स्वास्थ्य के लिए इन तीनों का बली होना अत्यंत आवश्यक है। यदि ये तीनों बली हो तो व्यक्ति आदिव्याधि से बचा रहता है। अष्टम भाव आयु का भाव है, इसलिए अष्टम भाव और अष्टमेश का भी बली होना आवश्यक है। जन्मजात रोग प्रतिरोधक क्षमता निम्न स्थितियों में अच्छी रहती है :—

1. बली लग्र एवं लग्नेश

2. लग्न एवं लग्नेश का शुभ कतृरि में होना

3. 3,6,11 में अशुभ ग्रह एवं गुलिक

4. केन्द्र-त्रिकोण में शुभ ग्रह होना

5. अष्टम भाव में शनि होना।

6. बली अष्टमेश

7. बली आत्मकारक

8. लग्न व अष्टम भाव में अधिक अष्टक वर्ग बिन्दु होना

जन्म पत्रिका में लग्र, सूर्य, चंद्र के चक्र बिंदुओ से शरीर के बाहरी, भीतरी रोग को आसानी से समझा जा सकता है। लग्र बाहर के रोगो का, तथा सूर्य भीतर के रोग, तेज, प्रकृति का तथा चंद्रमा मन उदर का प्रतिनिधी होता है। इन तीनों ग्रहों का अन्य ग्रहों से पारस्परिक संबध या शत्रुता ही शरीर के विभिन्न रोगो को जन्म देती है।

रक्तचाप के लिए चन्द्र, मंगल और शनि ग्रह को अधिक उत्तरदायी माना गया है। शनि ग्रह और साढ़े साती से व्याप्त भय तथा विनाश की चर्चा अक्सर की जाती है, हजारों उपाय भी किये जाए हैं। लेखक ने भी ऐसी ग्रह दशा से पीड़ित लोगों को रक्तचाप से ग्रसित होना बताया है। रक्तचाप की भांति मुधमेह भी आम रोग हो गया है। मानसिक तनाव और अनियमित खान-पान को इसका कारण बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बताया गया है कि सूर्य-चन्द्र द्वादश भाव में स्थित हों, राहु और सूर्य सप्तम स्थान में हों, शनि और मंगल के साथ चन्द्रमा