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खास दिन होता है गुरुवार, इस दिन यह करें-यह कत्तई न करें…

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लेखक ज्योतिषाचार्य दयानंद शास्त्री।

गुरुवार का दिन, ब्रह्मा, बृहस्पति और विष्णु पूजा का दिन है। गुरुवार के दिन पीले रंग का विशेष महत्व होता है। पीले वस्त्र पहनने से शुभता का आगमन होता है, सुबह उठकर नहा धोकर पूजा पाठ करने से व्यक्ति को लाभ होता है। परिवार से जुड़ी सभी समस्याओं का अंत होता है साथ ही लक्ष्मी जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री जी से जानिए वे उपाय, जिन्हें अपनाकर प्रभु की विशेष कृपा पा सकते हैं।

बृहस्पतिवार अत्यंत शुभ दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन बहुत सारे काम किए जा सकते हैं। धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो देवगुरु बृहस्पति का बहुत बड़ा स्थान माना गया है और यदि हम ब्रह्मांड की बात करे तो नौ ग्रहों में बृहस्पति ग्रह को सबसे भारी माना गया है।

यही कारण है कि जिन कार्यों को इस दिन करने से घर में हल्कापन आता है, उन्हें धार्मिक दृष्टि से वर्जित माना गया है, क्योंकि इन कार्यों को करने से गुरु कमजोर होता है। बृहस्पति को धर्म एवं शिक्षा का भी कारक माना गया है। ऐसा करने पर शिक्षा में असफलता मिलती है और धर्म के प्रति भी रुझान कम होता जाता है।
इस दिन देव गुरु बृहस्पति और भगवान् विष्णु की पूजा की जाती है। ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ब्रह्मांड के सभी नौ ग्रहों में से गुरु (बृहस्पति) सबसे भारी ग्रह है। गुरुवार से जुड़े हमारे ग्रंथो में कई तरह की मान्यतायें दी गयी हैं। गुरु धर्म व शिक्षा का कारक ग्रह है। गुरु ग्रह को कमजोर होने से शिक्षा में असफलता मिलती है। साथ ही धार्मिक कार्यों में रूचि कम होती है।

हमारे जीवन में गुरुवार का बहुत महत्व है। भगवान विष्णु की कथा अनुसार ऐसे कोई कार्य नहीं करने चाहिए जिससे आपके जीवन में दुःख, और परेशानियां आये। इस दिन ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे कि शरीर या घर में हल्कापन आता हो।

बृहस्पतिवार को लक्ष्मी नारायण जी का वार भी माना जाता है। इस दिन वर्जित काम करने से लक्ष्मी और नारायण दोनों ही रुष्ट हो सकते हैं, इसलिए बृहपतिवार को कुछ वर्जित कार्यों को करने बचना चाहिए।
👉🏻👉🏻👉🏻जानिए क्या करें गुरुवार को विशेष उपाय ताकि हो धन लाभ–

यदि आपकी तनख्वाह किसी महीने में गुरुवार को आए या फिर आपको इस दिन अधिक धन का लाभ हो तो धनराशि में से 15, 30, 45 या 60 के अनुपात में मिले हुए धन एक लिफाफा बनाकर मंदिर में रख दें। भगवान से प्रार्थना करें कि आप पर धन की वर्षा यूं ही होती रहे और आपके कष्ट दूर होते रहेंगे। एक दिन बाद इन लिफाफों से पैसे निकालकर इसका 10 फीसदी दान करें और बाकी खर्च कर लें।

👉🏻👉🏻जानिए गुरुवार को क्या खरीदें?

भगवान बृहस्पति का दिन है गुरुवार, ये दिन व्यक्ति के जीवन में शुभता लाता है। गुरुवार के दिन इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदा जा सकता है, प्रॉपर्टी से जुड़े कामों में फायदा होता है। इस दिन पूजा–पाठ से जुड़ा सामान नहीं खरीदना चाहिए। आंखों से जुड़ी कोई भी वस्तु, कोई शार्प ऑब्जेक्ट जैसे चाकू, कैंची, बर्तन आदि नहीं खरीदना चाहिए।

👉🏻👉🏻👉🏻भूलकर भी नही करें गुरुवार को ये काम—

शास्त्रानुसार गुरु ग्रह किसी भी महिला की कुंडली में पति और संतान का कारक माना जाता है। अर्थात बृहस्पति ग्रह महिलाओं के जीवन में पति और संतान दोनों के जीवन को प्रभावित करता है। जो महिलाएं इस दिन बाल धोती हैं या फिर हेयर कट करवाती हैं उनका बृहस्पति कमजोर होता है, पति और संतान की उन्नति में बाधा आती है। महिलाओं को इस दिन अपने बाल ना तो धोने चाहिए और ना ही काटने चाहिए।

👉🏻👉🏻👉🏻जानिए क्यों हैं गुरुवार को कपड़े धोने की मनाही—

गुरुवार को महिलाएं कपड़े धोने से बचें। ये दिन बृहस्पति ग्रह का परिचायक है। इस दिन कपड़े धोने से आर्थिक नुकसान होता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन घर की स्त्री साबुन से वस्त्रों का मैल धोती है तो इसके साथ घर की समृद्धि भी पानी के साथ धुल जाती है। इस दिन कपड़े धुलने से बचे, कपड़ों को पानी में खंगाल सकती हैं नहीं तो अगले दिन धो लें। ​दिन घर में पोंछा नहीं लगाना चाहिए और न ही घर में उस जगह की सफाई करनी चाहिए, जहां रोजाना सफाई न होती हो। वास्तुशास्त्र के अनुसार ईशान कोण का स्वामी गुरु होता है और ईशान कोण का संबंध बच्चों से होता है। इसलिए इस दिन कबाड़ निकालने, जाले साफ करने, फर्श धोने से ईशान कोण कमजोर होता है। इसका विपरित प्रभाव बच्चों एवं गृह स्वामी पर पड़ता है।
ये कुछ जरूरी बाते हैं जिनका ध्यान आपको गुरुवार के दिन रखना चाहिए ।
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गुरुवार को लक्ष्मी पूजा का विशेष प्रावधान–

गुरुवार को लक्ष्मी पूजा का विशेष प्रावधान है। नारायण और उनकी पत्नी लक्ष्मी आपके घर में सदैव विराजमान हों, सुख समृद्धि की घर में वर्षा होती रहे इसके लिए जरूरी है इस दिन सुबह सवेरे उठकर लक्ष्मी जी की पूजा करें। उन्हें लाल पुष्प अर्पित करें। लक्ष्मी और नारायण की साथ में पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख बना रहता है। घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है।
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हल्दी स्नान से कैसे होगा लाभ..

बृहस्पति ग्रह का संबंध पीले रंग से माना जाता है। इस दिन पीले रंग के वस्त्र पहनने से शुभता आती है। हल्दी का उपाय इस दिन जरूर करना चाहिए ये बड़ा ही आसान है। अपने स्नान के पानी में एक चुटकी हल्दी डालें और बृहस्पति को याद करते हुए नहा लें। स्नान के बाद हल्दी या केसर का तिलक लगाएं। आपका दिन मंगलमयी होगा साथ ही समस्याएं भी पास नहीं फटकेंगी।

👉🏻👉🏻जानिए क्यों गुरुवार को बचें लेन-देन से…

गुरुवार के दिन लेन-देन करने की मनाही होती है। इस दिन ना तो किसी को पैसे देने चाहिए और ना ही किसी से पैसे लेने चाहिए। ऐसा करने से कर्ज चढ़ने की संभावना रहती है। अगर बहुत जरूरी हो तो दोपहर के बाद या संध्या के समय पैसों का लेन-देन कर सकते हैं, वैसे कोशिश करें इस दिन इससे बचे रहें।
👉🏻👉🏻गुरुवार को साबुन लगाकर कपड़े धोने से भी गुरु कमजोर होता है। इसलिए इस दिन साबुन लगाकर कपड़े नहीं धोने चाहिए।
👉🏻👉🏻इस दिन पुरुषों को दाढ़ी भी नहीं बनानी चाहिए। ऐसा करने से गुरु कमजोर होता है और जीवन में बाधाएं उत्पन्न करता है। इस दिन नाखून भी नहीं काटने चाहिए।
👉🏻👉🏻आंखों से जुड़ी कोई भी वस्‍तु, कोई शार्प ऑब्‍जेक्‍ट जैसे चाकू, कैंची, बर्तन आदि इस दिन नहीं खरीदना चाहिए।

हर गुरुवार को गुरु के प्रथम चौघडिया में और गुरु की होरा में ,सूर्योदय के प्रथम घंटे के अंदर नाखून काटने से उस सप्ताह में लाभ मिलता है।

हर गुरुवार को सूर्योदय के प्रथम घंटे में मस्तक पर हल्दी का साधारण लेप करके स्नान करने तक रखने से अवश्य लाभ होता है।

ये ग्रह का शुभत्व इतना है कि हर शुभकार्य में उसका बलाबल देखा जाता है।

यह भी पढ़ें : माँ बगलामुखी जन्मोत्सव पर विशेष : जानें कैसे करें पूजन की माँ बगलामुखी हो जाए प्रसन्न..

जानिए क्या करें माँ बगलामुखी जन्मोत्सव पर..
कैसे करें पूजन की माँ बगलामुखी हो जाए प्रसन्न..

आज 12 मई 2019 (रविवार) वैशाख शुक्ल अष्टमी को मां बगलामुखी की जयंती मनाई जा रही हैं। इसी पावन तिथि पर मां बगलामुखी का प्राकट्य हुआ था। मां बगलामुखी को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसीलिए इन्हें पीताम्बरा भी कहा जाता है। मां की पूजा में पीले रंग की सामग्री होने से पूजा का शुभ लाभ मिलता है। मां बगलामुखी की साधना शत्रु से जुड़ी तमाम बाधाओं से मुक्ति के लिए बहुत ही कारगर व अचूक मानी गई है।
मां बगलामुखी दसमहाविद्याओं में आठवीं महाविद्या हैं। ये स्तम्भन की देवी हैं और सारे ब्रह्माण्ड की शक्ति मिल कर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती। माता बगलामुखी की पूजा करने से शत्रुओं की पराजय होती है और सभी तरह के वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है। मान्यताओं के अनुसार देवी बगलामुखी का प्राकट्य स्थान गुजरात का सौराष्ट्र है। आज नलखेड़ा (जिला- आगर, मध्यप्रदेश) स्थित लक्ष्मणा नदी के तट पर शमशान में विराजमान प्राचीन और पांडवों द्वारा स्थापित माँ बगलामुखी मन्दिर में राष्ट्र कल्याण और रक्षा हेतु विशेष अनुष्ठान किया जायेगा
दस महाविद्या में से बगलामुखी आठवां स्वरूप है। वैशाख शुक्ल अष्टमी को देवी बगलामुखी की जयंती मनाई जाती है। इस वर्ष बंगलामुखी जन्मोत्सव (जयंती) आज 12 मई, (रविवार )को मनाई जा रही हैं। मां की साधना शत्रु बाधा से मुक्ति के लिए बहुत ही कारगर व अचूक मानी गई है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि मां बगलामुखी अपने भक्तों की सभी परेशानियां दूर करती हैं, शत्रुओं से रक्षा करती हैं, बुरी नजर और बुरी शक्तियों से बचाती हैं। देवी मां को पीला रंग बहुत प्रिय है, इस कारण इनकी पूजा में पीले रंग की पूजन सामग्री का उपयोग विशेष रूप से किया जाता है। देवी मां के इस स्वरूप की पूजा बहुत सावधानी से करनी चाहिए। इसी वजह से किसी ब्राह्मण के मार्गदर्शन में ही देवी के इस स्वरूप की पूजा करेंगे तो बेहतर रहेगा। साथ ही, देवी के भक्तों को साफ-सफाई और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।देवी बगलामुखी दसमहाविद्या में आठवीं महाविद्या हैं यह स्तम्भन की देवी हैं. संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं माता बगलामुखी शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है. इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है. बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है दुलहन है अत: मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम प्राप्त है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि माँ बगलामुखी देवी रत्नजडित सिहासन पर विराजती होती हैं रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं। देवी के भक्त को तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पाता, वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाता है पीले फूल और नारियल चढाने से देवी प्रसन्न होतीं हैं. देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करें, देवी की मूर्ति पर पीला वस्त्र चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है, बगलामुखी देवी के मन्त्रों से दुखों का नाश होता है।
👉🏻👉🏻👉🏻जाने और समझे माँ बगलामुखी मंत्र के उपयोगी मन्त्रों को —

श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि।
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये।
ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:।
ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।

इसके पश्चात आवाहन करना चाहिए—

ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।

अब देवी का ध्यान करें इस प्रकार–

सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।

👉🏻👉🏻👉🏻यह हें माँ बगलामुखी का चमत्कारी मंत्र —
ऊँ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां
वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय
बुद्धि विनाशय ह्रीं ओम् स्वाहा।

माँ बगलामुखी की साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है. यह मंत्र विधा अपना कार्य करने में सक्षम हैं. मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो निश्चित रूप से सफलता प्राप्त होती है. बगलामुखी मंत्र के जाप से पूर्व बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए. देवी बगलामुखी पूजा अर्चना सर्वशक्ति सम्पन्न बनाने वाली सभी शत्रुओं का शमन करने वाली तथा मुकदमों में विजय दिलाने वाली होती है।

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जानिए कैसे करें माँ बगलामुखी का व्रत व पूजन विधि–

इस दिन प्रातः काल उठे, नियत कर्मों से निवृत होकर पीले रंग का वस्त्र धारण करें। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार व्रती को साधना अकेले मंदिर में अथवा किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर माता बगलामुखी की पूजा करनी चाहिए। पूजा की दिशा पूर्व में होना चाहिए। पूर्व दिशा में उस स्थान को जहां पर पूजा करना है। उसे सर्वप्रथम गंगाजल से पवित्र कर लें। तत्पश्चात उस स्थान पर एक चौकी रख उस पर माता बगलामुखी की प्रतिमूर्ति को स्थापित करें। तत्पश्चात आचमन कर हाथ धोए, आसन पवित्र करे। माता बगलामुखी व्रत का संकल्प हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, एवम पीले फूल तथा दक्षिणा लेकर करें। माता की पूजा धुप, दीप, अगरबत्ती एवम विशेष में पीले फल, पीले फूल, पीले लड्डू का प्रसाद चढ़ा कर करना चाहिए। व्रत के दिन व्रती को निराहार रहना चाहिए। रात्रि में फलाहार कर सकते है। अगले दिन पूजा करने के पश्चात भोजन ग्रहण करे।

👉🏻👉🏻👉🏻इन उपाय से होगा लाभ–
दरिद्रता के मुक्ति चाहते हैं तो मां बगलामुखी के सामने हल्दी की माला का उपयोग करते हुए इस मंत्र का जाप 108 बार या 1008 बार करें।

मंत्र- श्रीं ह्रीं ऐं भगवती बगले मे श्रियं देहि देहि स्वाहा। इस मंत्र का जाप सही उच्चारण के साथ करें। अगर जाप करने में कोई परेशानी आ रही हो तो किसी अन्य ब्राह्मण से जाप करवा सकते हैं।

👉🏻👉🏻👉🏻क्या करें उपाय कृपा पाने के लिएः–
बगलामुखी जयंती पर देवी मां हल्दी की दो गांठ चढ़ाएं। पूजा करें और पूजा के बाद एक गांठ अपने पास रख लें। इस उपाय से देवी मां की कृपा हमारे साथ रहती है और बुरी नजर से रक्षा होती है।

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बजरंग बली हनुमान का जन्म दिन हनुमान जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जो इस बार 19 अप्रैल 2019 को दिन शुक्रवार को आ रहा है इस बार चैत्र पूर्णिमा 18 अप्रैल को शाम 07:27 से लग रही है जो 19 अप्रैल को संध्या 4:43 बजे तक रहेगी । (मेरठ समयानुसार)

बाबा हनुमान जी को श्रीराम का परम भक्त माना जाता है और इनसे जुड़ी कई कथाएं भी हैं।

वैसे बजरंग बली के भक्तों में हनुमान जन्मोत्सव पर बहुत ही अधिक उत्साह रहता है और इस दिन उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए वे विशेषरूप से मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करते हैं।

हनुमान जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनें। किसी शांत एवं एकांत कमरे में पूर्व दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठें। स्वयं लाल या पीली धोती पहनें। अपने सामने चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर हनुमानजी की मूर्ति स्थापित करें। चित्र के सामने तांबे की प्लेट में लाल रंग के फूल का आसन देकर श्रीहनुमान यंत्र को स्थापित करें। यंत्र पर सिंदूर से टीका करें और लाल फूल चढ़ाएं। मूर्ति तथा यंत्र पर सिंदूर लगाने के बाद धूप, दीप, चावल, फूल व प्रसाद आदि से पूजन करें।
सरसों या तिल के तेल का दीपक एवं धूप जलाएं-

धर्म ग्रंथों में हनुमानजी के 12 नाम बताए गए हैं, जिनके द्वारा इस दिन उनकी स्तुति की जाती है।

हनुमानजी के इन 12 नामों का जो रात में सोने से पहले व सुबह उठने पर अथवा यात्रा प्रारंभ करने से पहले पाठ करता है, उसके सभी भय दूर हो जाते हैं और उसे अपने जीवन में सभी सुख प्राप्त होते हैं।
वह अपने जीवन में अनेक उपलब्धियां प्राप्त करता है।
हनुमानजी की 12 नामों वाली स्तुति इस प्रकार है-

स्तुति

हनुमानअंजनीसूनुर्वायुपुत्रो महाबल:। रामेष्ट: फाल्गुनसख: पिंगाक्षोअमितविक्रम:।।
उदधिक्रमणश्चेव सीताशोकविनाशन:। लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा।।
एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मन:। स्वापकाले प्रबोधे च यात्राकाले च य: पठेत्।।
तस्य सर्वभयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्। राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचन।।

इन 12 नामो से होती है हनुमानजी की स्तुति, जानिए इनकी महिमा

1- हनुमान 🕉
हनुमानजी का यह नाम इसलिए पड़ा क्योकी एक बार क्रोधित होकर देवराज इंद्र ने इनके ऊपर अपने वज्र प्रहार किया था यह वज्र सीधे इनकी ठोड़ी (हनु) पर लगा। हनु पर वज्र का प्रहार होने के कारण ही इनका नाम हनुमान पड़ा ।

2- लक्ष्मणप्राणदाता 🕉
जब रावण के पुत्र इंद्रजीत ने शक्ति का उपयोग कर लक्ष्मण को बेहोश कर दिया था, तब हनुमानजी संजीवनी बूटी लेकर आए थे। उसी बूटी के प्रभाव से लक्ष्मण को होश आया था।इस लिए हनुमानजी को लक्ष्मणप्राणदाता भी कहा जाता है ।

3- दशग्रीवदर्पहा 🕉
दशग्रीव यानी रावण और दर्पहा यानी धमंड तोड़ने वाला । हनुमानजी ने लंका जाकर सीता माता का पता लगाया, रावण के पुत्र अक्षयकुमार का वध किया साथ ही लंका में आग भी लगा दी ।इस प्रकार हनुमानजी ने कई बार रावण का धमंड तोड़ा था । इसलिए इनका एक नाम ये भी प्रसिद्ध है ।

4- रामेष्ट 🕉
हनुमान भगवान श्रीराम के परम भक्त हैं । धर्म ग्रंथों में अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है कि श्रीराम ने हनुमान को अपना प्रिय माना है । भगवान श्रीराम को प्रिय होने के कारण ही इनका एक नाम रामेष्ट भी है ।

5- फाल्गुनसुख 🕉
महाभारत के अनुसार, पांडु पुत्र अर्जुन का एक नाम फाल्गुन भी है । युद्ध के समय हनुमानजी अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजित थे । इस प्रकार उन्होंने अर्जुन की सहायता की । सहायता करने के कारण ही उन्हें अर्जुन का मित्र कहा गया है । फाल्गुन सुख का अर्थ है अर्जुन का मित्र।

6- पिंगाक्ष 🕉
पिंगाक्ष का अर्थ है भूरी आंखों वाला ।अनेक धर्म ग्रंथों में हनुमानजी का वर्णन किया गया है । उसमें हनुमानजी को भूरी आंखों वाला बताया है । इसलिए इनका एक नाम पिंगाक्ष भी है ।

7- अमितविक्रम 🕉
विक्रम का अर्थ है पराक्रमी और अमित का अर्थ है बहुत अधिक । हनुमानजी ने अपने पराक्रम के बल पर ऐसे बहुत से कार्य किए, जिन्हें करना देवताओं के लिए भी कठिन था । इसलिए इन्हें अमितविक्रम भी कहा जाता हैं ।

8- उदधिक्रमण 🕉
उदधिक्रमण का अर्थ है समुद्र का अतिक्रमण करने वाले यानी लांधने वाला । सीता माता की खोज करते समय हनुमानजी ने समुद्र को लांधा था। इसलिए इनका एक नाम ये भी है ।

9- अंजनीसूनु 🕉
माता अंजनी के पुत्र होने के कारण ही हनुमानजी का एक नाम अंजनीसूनु भी प्रसिद्ध है ।

10- वायुपुत्र 🕉
हनुमानजी का एक नाम वायुपुत्र भी है । पवनदेव के पुत्र होने के कारण ही इन्हें वायुपुत्र भी कहा जाता है ।

11- महाबली 🕉
हनुमानजी के बल की कोई सीमा नहीं हैं । इसलिए इनका एक नाम महाबली भी है ।

12- सीताशोकविनाशन 🕉
माता सीता के शोक का निवारण करने के कारण हनुमानजी का ये नाम पड़ा ।

श्री हनुमान जी के अस्त्र-शस्त्र एवं वाहन की जानकारी-

महाबली रामभक्त श्री हनुमान जी के अस्त्र-शस्त्रों में पहला स्थान उनकी गदा का है । आपको जानकर हैरानी होगी कि केवल गदा के साथ दिखने वाले महाबली हनुमान दस आयुध (अस्त्र-शस्त्र) धारण करने वाले हैं । हनुमान जी अपने प्रभु श्रीराम के चरणों में पूर्ण स‍मर्पित आप्तकाम निष्‍काम सेवक है ।
उनका सर्वस्व प्रभु की सेवा का उपकरण है उनके संपूर्ण अंग-प्रत्यंग, रद, मुष्ठि, नख, पूंछ, गदा एवं गिरि, पादप आदि प्रभु के अमंगलों का नाश करने के लिए एक दिव्यास्त्र के समान है । हनुमान जी वज्रांग हैं ।

यम ने उन्हें अपने दंड से अभयदान दिया है, कुबेर ने गदाघात से अप्रभावित होने का वर दिया है , भगवान शंकर ने हनुमान जी को शूल एवं पाशुपत आदि अस्त्रों से अभय होने का वरदान दिया था , अस्त्र-शस्त्र के कर्ता विश्‍वकर्मा ने हनुमान जी को समस्त आयुधों से अवध्‍य होने का वरदान दिया है ।

ये दस हैं हनुमान जी के आयुध-
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शास्त्रों में हनुमान जी को दस आयुधों से अलंकृत कहा गया है । हनुमान जी के आयुधों की व्याख्‍या में खड्ग, त्रिशूल, खट्वांग, पाश, पर्वत, अंकुश, स्तम्भ, मुष्टि, गदा और वृक्ष हैं । हनुमान जी का बायां हाथ गदा से युक्त कहा गया है ” वामहस्तगदायुक्तम् ”
श्री लक्ष्‍मण और रावण के बीच युद्ध में हनुमान जी ने रावण के साथ युद्ध में गदा का प्रयोग किया था उन्होंने गदा के प्रहार से ही रावण के रथ को खंडित किया था ।
स्कंदपुराण में हनुमान जी को वज्रायुध धारण करने वाला कहकर उनको नमस्कार किया गया है उनके हाथ में वज्र सदा विराजमान रहता है । अशोक वाटिका में हनुमान जी ने राक्षसों के संहार के लिए वृक्ष की डाली का उपयोग किया था , हनुमान जी का एक अस्त्र उनकी पूंछ भी है , अपनी मुष्टिप्रहार से उन्होंने कई दुष्‍टों का संहार किया है ।

खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशाङ्कुशसुपर्वतम् ।
मुष्टिद्रुमगदाभिन्दिपालज्ञानेन संयुतम् ॥
एतान्यायुधजालानि धारयन्तं यजामहे ।
प्रेतासनोपविष्टं तु सर्वाभरणभूषितम् ॥

पवन है हनुमान जी का वाहन –
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हनुमान जी का वाहन होने की शक्ति किसमें है ? यह एक ऐसा प्रश्‍न है जिसमें केवल यही कहकर संतोष किया जा सकता है कि उनके सिवा उनका वाहन होने की शक्ति और किसी में भी नहीं है । हनुमान जी इतने वेगवान है कि उनकी वेग की तुलना कोई और कर ही नहीं सकता है । ‘हनुमत्सहस्त्रनामस्तोत्र’ के 72वें श्‍लोक में उन्हें ‘वायुवाहन:’ कहा गया है और यह युक्तिसंगत भी है, तथापि वायु भी उनके भार का वहन करने में प्राय: असमर्थ ही हैं ।
हनुमान जी ने एक बार जगतपति श्रीराम और शेषनाग के रूप श्री लक्ष्‍मण को अपने कंधे पर बैठाकर उड़ान भरा था । जगदाधार शेष को उठानेवाले हनुमानजी को वहन करने की शक्ति किसी में भी नहीं है । हनुमानजी के वेग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक बार लक्ष्मण जी को मेघनाद द्वारा ” शक्ति बाण ” लगने पर , हनुमान जी ने बात-बात में द्रोणाचल पर्वत को उखाड़कर लंका ले गये और उसी रात को यथास्थान रख आए थे । समूचे द्रोणाचल पर्वत को उखाड़कर क्षणमात्र में उसे लंका में पहूंचाने और यथास्थल रख आने वाले पवनपुत्र के वेग से बढ़कर किसका वेग हो सकता है !!!

हनुमान जन्मोत्सव विशेष
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पवन पुत्र हनुमान के जन्म की कहानी
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ज्योतिषीयों के सटीक गणना के अनुसार हनुमान जी का जन्म १ करोड़ ८५ लाख ५८ हजार ११३ वर्ष पहले चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सुबह ०६:०३ बजे हुआ था।

हनुमान जी की माता अंजनि के पूर्व जन्म की कहानी
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कहते हैं कि माता अंजनि पूर्व जन्म में देवराज इंद्र के दरबार में अप्सरा पुंजिकस्थला थीं। ‘बालपन में वो अत्यंत सुंदर और स्वभाव से चंचल थी एक बार अपनी चंचलता में ही उन्होंने तपस्या करते एक तेजस्वी ऋषि के साथ अभद्रता कर दी थी।

गुस्से में आकर ऋषि ने पुंजिकस्थला को श्राप दे दिया कि जा तू वानर की तरह स्वभाव वाली वानरी बन जा, ऋषि के श्राप को सुनकर पुंजिकस्थला ऋषि से क्षमा याचना मांगने लगी, तब ऋषि ने कहा कि तुम्हारा वह रूप भी परम तेजस्वी होगा।

तुमसे एक ऐसे पुत्र का जन्म होगा जिसकी कीर्ति और यश से तुम्हारा नाम युगों-युगों तक अमर हो जाएगा, अंजनि को वीर पुत्र का आशीर्वाद मिला।

श्री हनुमानजी की बाल्यावस्था
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ऋषि के श्राप से त्रेता युग मे अंजना मे नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा इंद्र जिनके हाथ में पृथ्वी के सृजन की कमान है, स्वर्ग में स्थित इंद्र के दरबार (महल) में हजारों अप्सरा (सेविकाएं) थीं, जिनमें से एक थीं अंजना (अप्सरा पुंजिकस्थला) अंजना की सेवा से प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें मनचाहा वरदान मांगने को कहा, अंजना ने हिचकिचाते हुए उनसे कहा कि उन पर एक तपस्वी साधु का श्राप है, अगर हो सके तो उन्हें उससे मुक्ति दिलवा दें। इंद्र ने उनसे कहा कि वह उस श्राप के बारे में बताएं, क्या पता वह उस श्राप से उन्हें मुक्ति दिलवा दें।

अंजना ने उन्हें अपनी कहानी सुनानी शुरू की, अंजना ने कहा ‘बालपन में जब मैं खेल रही थी तो मैंने एक वानर को तपस्या करते देखा, मेरे लिए यह एक बड़ी आश्चर्य वाली घटना थी, इसलिए मैंने उस तपस्वी वानर पर फल फेंकने शुरू कर दिए, बस यही मेरी गलती थी क्योंकि वह कोई आम वानर नहीं बल्कि एक तपस्वी साधु थे।

मैंने उनकी तपस्या भंग कर दी और क्रोधित होकर उन्होंने मुझे श्राप दे दिया कि जब भी मुझे किसी से प्रेम होगा तो मैं वानर बन जाऊंगी। मेरे बहुत गिड़गिड़ाने और माफी मांगने पर उस साधु ने कहा कि मेरा चेहरा वानर होने के बावजूद उस व्यक्ति का प्रेम मेरी तरफ कम नहीं होगा’। अपनी कहानी सुनाने के बाद अंजना ने कहा कि अगर इंद्र देव उन्हें इस श्राप से मुक्ति दिलवा सकें तो वह उनकी बहुत आभारी होंगी। इंद्र देव ने उन्हें कहा कि इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए अंजना को धरती पर जाकर वास करना होगा, जहां वह अपने पति से मिलेंगी। शिव के अवतार को जन्म देने के बाद अंजना को इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।

इंद्र की बात मानकर अंजना धरती पर आईं और केसरी से विवाह – इंद्र की बात मानकर अंजना धरती पर चली आईं, एक शाप के कारण उन्हें नारी वानर के रूप मे धरती पे जन्म लेना पडा। उस शाप का प्रभाव शिव के अन्श को जन्म देने के बाद ही समाप्त होना था। और एक शिकारन के तौर पर जीवन यापन करने लगीं। जंगल में उन्होंने एक बड़े बलशाली युवक को शेर से लड़ते देखा और उसके प्रति आकर्षित होने लगीं, जैसे ही उस व्यक्ति की नजरें अंजना पर पड़ीं, अंजना का चेहरा वानर जैसा हो गया। अंजना जोर-जोर से रोने लगीं, जब वह युवक उनके पास आया और उनकी पीड़ा का कारण पूछा तो अंजना ने अपना चेहरा छिपाते हुए उसे बताया कि वह बदसूरत हो गई हैं। अंजना ने उस बलशाली युवक को दूर से देखा था लेकिन जब उसने उस व्यक्ति को अपने समीप देखा तो पाया कि उसका चेहरा भी वानर जैसा था।

अपना परिचय बताते हुए उस व्यक्ति ने कहा कि वह कोई और नहीं वानर राज केसरी हैं जो जब चाहें इंसानी रूप में आ सकते हैं। अंजना का वानर जैसा चेहरा उन दोनों को प्रेम करने से नहीं रोक सका और जंगल में केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया।
केसरी एक शक्तिशाली वानर थे जिन्होने एक बार एक भयंकर हाथी को मारा था। उस हाथी ने कई बार असहाय साधु-संतों को विभिन्न प्रकार से कष्ट पँहुचाया था। तभी से उनका नाम केसरी पड गया, “केसरी” का अर्थ होता है सिंह। उन्हे “कुंजर सुदान”(हाथी को मारने वाला) के नाम से भी जाना जाता है।

पंपा सरोवर
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अंजना और मतंग ऋषि – पुराणों में कथा है कि केसरी और अंजना ने विवाह कर लिया पर संतान सुख से वंचित थे । अंजना अपनी इस पीड़ा को लेकर मतंग ऋषि के पास गईं, तब मंतग ऋषि ने उनसे कहा-पप्पा (कई लोग इसे पंपा सरोवर भी कहते हैं) सरोवर के पूर्व में नरसिंह आश्रम है, उसकी दक्षिण दिशा में नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ है वहाँ जाकर उसमें स्नान करके, बारह वर्ष तक तप एवं उपवास करने पर तुम्हें पुत्र सुख की प्राप्ति होगी।

अंजना को पवन देव का वरदान
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मतंग रामायण कालीन एक ऋषि थे, जो शबरी के गुरु थे। अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर तप किया था बारह वर्ष तक केवल वायु पर ही जीवित रही, एक बार अंजना ने “शुचिस्नान” करके सुंदर वस्त्राभूषण धारण किए। तब वायु देवता ने अंजना की तपस्या से प्रसन्न होकर उस समय पवन देव ने उसके कर्णरन्ध्र में प्रवेश कर उसे वरदान दिया, कि तेरे यहां सूर्य, अग्नि एवं सुवर्ण के समान तेजस्वी, वेद-वेदांगों का मर्मज्ञ, विश्वन्द्य महाबली पुत्र होगा।

अंजना को भगवान शिव का वरदान
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अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ के पास, अपने आराध्य शिव की तपस्या में मग्न थीं । शिव की आराधना कर रही थीं तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा, अंजना ने शिव को कहा कि साधु के श्राप से मुक्ति पाने के लिए उन्हें शिव के अवतार को जन्म देना है, इसलिए शिव बालक के रूप में उनकी कोख से जन्म लें।

(कर्नाटक राज्य के दो जिले कोप्पल और बेल्लारी में रामायण काल का प्रसिद्ध किष्किंधा)

‘तथास्तु’ कहकर शिव अंतर्ध्यान हो गए। इस घटना के बाद एक दिन अंजना शिव की आराधना कर रही थीं और दूसरी तरफ अयोध्या में, इक्ष्वाकु वंशी महाराज अज के पुत्र और अयोध्या के महाराज दशरथ, अपनी तीन रानियों के कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी साथ पुत्र रत्न की प्राप्ति के लिए, श्रृंगी ऋषि को बुलाकर ‘पुत्र कामेष्टि यज्ञ’ के साथ यज्ञ कर रहे थे।
यज्ञ की पूर्णाहुति पर स्वयं अग्नि देव ने प्रकट होकर श्रृंगी को खीर का एक स्वर्ण पात्र (कटोरी) दिया और कहा “ऋषिवर! यह खीर राजा की तीनों रानियों को खिला दो। राजा की इच्छा अवश्य पूर्ण होगी।” जिसे तीनों रानियों को खिलाना था लेकिन इस दौरान एक चमत्कारिक घटना हुई, एक पक्षी उस खीर की कटोरी में थोड़ा सा खीर अपने पंजों में फंसाकर ले गया और तपस्या में लीन अंजना के हाथ में गिरा दिया। अंजना ने शिव का प्रसाद समझकर उसे ग्रहण कर लिया।

हनुमान जी का जन्म त्रेता युग मे अंजना के पुत्र के रूप मे, चैत्र शुक्ल की पूर्णिमा की महानिशा में हुआ।

अन्य कथा अनुसार हनुमान अवतार
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सामान्यत: लंकादहन के संबंध में यही माना जाता है कि सीता की खोज करते हुए लंका पहुंचे और रावण के पुत्र सहित अनेक राक्षसों का अंत कर दिया। तब रावण के पुत्र मेघनाद ने श्री हनुमान को ब्रह्मास्त्र छोड़कर काबू किया और रावण ने श्री हनुमान की पूंछ में आग लगाने का दण्ड दिया। तब उसी जलती पूंछ से श्री हनुमान ने लंका में आग लगा रावण का दंभ चूर किया। किंतु पुराणों में लंकादहन के पीछे भी एक ओर रोचक कथा जुड़ी है, जिसके कारण श्री हनुमान ने पूंछ से लंका में आग लगाई।

श्री हनुमान शिव अवतार है। शिव से ही जुड़ा है यह रोचक प्रसंग। एक बार माता पार्वती की इच्छा पर शिव ने कुबेर से सोने का सुंदर महल का निर्माण करवाया। किंतु रावण इस महल की सुंदरता पर मोहित हो गया। वह ब्राह्मण का वेश रखकर शिव के पास गया। उसने महल में प्रवेश के लिए शिव-पार्वती से पूजा कराकर दक्षिणा के रूप में वह महल ही मांग लिया। भक्त को पहचान शिव ने प्रसन्न होकर वह महल दान दे दिया।

दान में महल प्राप्त करने के बाद रावण के मन में विचार आया कि यह महल असल में माता पार्वती के कहने पर बनाया गया। इसलिए उनकी सहमति के बिना यह शुभ नहीं होगा। तब उसने शिवजी से माता पार्वती को भी मांग लिया और भोलेभंडारी शिव ने इसे भी स्वीकार कर लिया। जब रावण उस सोने के महल सहित मां पार्वती को ले जाना लगा। तब अचंभित और दुखी माता पार्वती ने विष्णु को स्मरण किया और उन्होंने आकर माता की रक्षा की।

जब माता पार्वती अप्रसन्न हो गई तो शिव ने अपनी गलती को मानते हुए मां पार्वती को वचन दिया कि त्रेतायुग में मैं वानर रूप हनुमान का अवतार लूंगा उस समय तुम मेरी पूंछ बन जाना। जब मैं माता सीता की खोज में इसी सोने के महल यानी लंका जाऊंगा तो तुम पूंछ के रूप में लंका को आग लगाकर रावण को दण्डित करना।

हनुमान जी की प्रसिद्धि कथा
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अंजना के पुत्र होने के कारण ही हनुमान
जी को अंजनेय नाम से भी जाना जाता है
जिसका अर्थ होता है ‘अंजना द्वारा उत्पन्न’। माता श्री अंजनी और कपिराज
श्री केसरी हनुमानजी को अतिशय प्रेम करते थे।
श्री हनुमानजी को सुलाकर वो फल-फूल लेने गये थे इसी समय बाल हनुमान भूख एवं अपनी माता की अनुपस्थिति में भूख के कारण आक्रन्द करने लगे। इसी दौरान उनकी नजर क्षितिज पर पड़ी। सूर्योदय हो रहा था। बाल हनुमान को लगा की यह कोई लाल फल है। (तेज और पराक्रम के लिए कोई अवस्था नहीं होती)।
यहां पर तो श्री हनुमान जी के रुप में
माताश्री अंजनी के गर्भ से प्रत्यक्ष शिवशंकर अपने ग्यारहवें रुद्र में लीला कर रहे थे और श्री पवनदेव ने उनके उड़ने की शक्ति भी प्रदान की थी। जब शिशु हनुमान को भूख लगी तो वे उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने आकाश में उड़ने
लगे। उस लाल फल को लेने के लिए
हनुमानजी वायुवेग से आकाश में उड़ने लगे। उनको देखकर देव, दानव सभी विस्मयतापूर्वक कहने लगे कि बाल्यावस्था में एसे पराक्रम दिखाने वाला यौवनकाल में क्या नहीं करेगा। उधर भगवान सूर्य ने उन्हें अबोध शिशु समझकर अपने तेज से नहीं जलने दिया। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये लपके, उसी समय राहु
सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था।हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की “देवराज! आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज अमावस्या के दिन जब मैं सूर्य को ग्रस्त करने
गया तब देखा कि दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है।”
राहु की बात सुनकर इन्द्र घबरा गये और उसे साथ लेकर सूर्य की ओर चल पड़े। राहु को देखकर हनुमानजी सूर्य को छोड़ राहु पर झपटे। राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तो उन्होंने हनुमानजी पर वज्रायुध से प्रहार किया जिससे वे एक पर्वत पर गिरे और उनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव
को क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण अपनी गति रोक दिया। इससे संसार की कोई
भी प्राणी साँस न ले सकी और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्मा उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वे मूर्छत हनुमान को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्माजी ने उन्हें सचेत किया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सभी प्राणियों की पीड़ा दूर की।
तभी श्री ब्रह्माजी ने श्री हनुमानजी को वरदान दिया कि इस बालक को कभी ब्रह्मशाप नहीं लगेगा, कभी भी उनका एक भी अंग शस्तर नहीं होगा, ब्रह्माजीने अन्य देवताओं से भी कहा कि इस बालक को आप सभी वरदान दें तब देवराज इंन्द्रदेव ने हनुमानजी के गले में कमल की माला पहनाते हुए कहा की मेरे वज्रप्रहार के कारण इस बालक की हनु (दाढ़ी) टूट गई है इसीलिए इन कपिश्रेष्ठ का नाम आज से हनुमान रहेगा और मेरा वज्र भी इस बालक को नुकसान न पहुंचा सके ऐसा वज्र से कठोर होगा।
श्री सूर्यदेव ने भी कहा कि इस बालक को में अपना तेज प्रदान करता हूं और मैं इसको शस्त्र-समर्थ मर्मज्ञ बनाता हुं ।

हनुमानजीके कुछ नाम एवं उनका अर्थ
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हनुमानजी को मारुति, बजरंगबली इत्यादि नामोंसे भी जानते हैं। मरुत शब्द से ही मारुति शब्द की उत्पत्ति हुई है। महाभारत में हनुमानजी का उल्लेख मारुतात्मजके नाम से किया गया है। हनुमानजी का अन्य एक नाम है, बजरंगबली। बजरंगबली यह शब्द व्रजांगबली के अपभ्रंश से बना है। जिनमें वज्र के समान कठोर अस्त्र का सामना करनेकी शक्ति है, वे व्रजांगबली है। जिस प्रकार लक्ष्मण से लखन, कृष्ण से किशन ऐसे सरल नाम लोगों ने अपभ्रंश कर उपयोगमें लाए, उसी प्रकार व्रजांगबली का अपभ्रंश बजरंगबली हो गया।

हनुमानजीकी विशेषताएं
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अनेक संतोंने समाजमें हनुमानजीकी उपासनाको प्रचलित किया है। ऐसे हनुमान जी के संदर्भ में समर्थ रामदास स्वामी कहते हैं, ‘हनुमानजी हमारे देवता हैं ।’ हनुमानजी शक्ति, युक्ति एवं भक्तिका प्रतीक हैं। इसलिए समर्थ रामदासस्वामी ने हनुमानजी की उपासना की प्रथा आरंभ की। महाराष्ट्र में उनके द्वारा स्थापित ग्यारह मारुति प्रसिद्ध हैं। साथ ही संत तुलसीदास ने उत्तर भारत में मारुति के अनेक मंदिर स्थापित किए तथा उनकी उपासना दृढ की। दक्षिण भारत में मध्वाचार्य को मारुति का अवतार माना जाता है। इनके साथ ही अन्य कई संतों ने अपनी विविध रचनाओं द्वारा समाजके समक्ष मारुतिका आदर्श रखा है।

१. शक्तिमानता
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हनुमानजी सर्वशक्तिमान देवता हैं। जन्म लेते ही हनुमानजी ने सूर्यको निगलनेके लिए उडान भरी। इससे यह स्पष्ट होता है कि, वायुपुत्र अर्थात वायुतत्त्वसे उत्पन्न हनुमानजी, सूर्यपर अर्थात तेजतत्त्वपर विजय प्राप्त करनेमें सक्षम थे। पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश तत्त्वोंमेंसे तेजतत्त्वकी तुलनामें वायुतत्त्व अधिक सूक्ष्म है अर्थात अधिक शक्तिमान है। सर्व देवताओंमें केवल हनुमानजीको ही अनिष्ट शक्तियां कष्ट नहीं दे सकतीं। लंकामें लाखों राक्षस थे, तब भी वे हनुमानजीका कुछ नहीं बिगाड पाएं। इससे हम हनुमानजीकी शक्तिका अनुमान लगा सकते हैं।

२. भूतोंके स्वामी
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हनुमानजी भूतोंके स्वामी माने जाते हैं। किसी को भूत बाधा हो, तो उस व्यक्ति को हनुमानजी के मंदिर ले जाते हैं। साथ ही हनुमानजी से संबंधित स्तोत्र जैसे हनुमत्कवच, भीमरूपी स्तोत्र अथवा हनुमानचालीसाका पाठ करनेके लिए कहते हैं ।

३. भक्ति
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साधना में जिज्ञासु, मुमुक्षु, साधक, शिष्य एवं भक्त ऐसे उन्नति के चरण होते हैं। इसमें भक्त यह अंतिम चरण है। भक्त अर्थात वह जो भगवानसे विभक्त नहीं है। हनुमानजी भगवान श्रीराम से पूर्णतया एकरूप हैं। जब भी नवविधा भक्ति में से दास्य भक्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण देना होता है, तब हनुमानजी का उदाहरण दिया जाता है। वे अपने प्रभु राम के लिए प्राण अर्पण करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं । प्रभु श्रीराम की सेवा की तुलना में उन्हें सब कुछ कौडी के मोल लगता है। हनुमान सेवक एवं सैनिक का एक सुंदर सम्मिश्रण हैं। स्वयं सर्वशक्तिमान होते हुए भी वे, अपने-आपको श्रीरामजीका दास कहलवाते थ। उनकी भावना थी कि उनकी शक्ति भी श्रीरामजी की ही शक्ति है। मान अर्थात शक्ति एवं भक्तिका संगम।

४. मनोविज्ञानमें निपुण एवं राजनीतिमें कुशल
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अनेक प्रसंगों में सुग्रीव इत्यादि वानर ही नहीं, वरन् राम भी हनुमानजी से परामर्श करते थे। लंका में प्रथम ही भेंट में हनुमानजी ने सीता के मन में अपने प्रति विश्वास निर्माण किया। इन प्रसंगों से हनुमानजी की बुद्धिमानता एवं मनोविज्ञान में निपुणता स्पष्ट होती है। लंकादहन कर हनुमानजी ने रावण की प्रजा में रावणके सामर्थ्य के प्रति अविश्वास उत्पन्न किया। इस बातसे उनकी राजनीति-कुशलता स्पष्ट होती है।

५. जितेंद्रिय
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सीता को ढूंढने जब हनुमानजी रावण के अंतःपुर में गए, तो उस समय की उनकी मनः स्थिति थी, उनके उच्च चरित्र का सूचक है। इस संदर्भ में वे स्वयं कहते हैं, ‘सर्व रावण पत्नियों को निःशंक लेटे हुए मैंने देखा; परंतु उन्हें देखने से मेरे मनमें विकार उत्पन्न नहीं हुआ।’

वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड ११.४२-४३

इंद्रियजीत होनेके कारण हनुमानजी रावणपुत्र इंद्रजीत को भी पराजित कर सके। तभी से इंद्रियों पर विजय पाने हेतु हनुमानजी की उपासना बतायी गई।

६. भक्तों की इच्छा पूर्ण करनेवाले
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हनुमानजी को इच्छा पूर्ण करने वाले देवता मानते हैं, इसलिए व्रत रखने वाले अनेक स्त्री-पुरुष हनुमानजी की मूर्तिकी श्रद्धापूर्वक निर्धारित परिक्रमा करते हैं। कई लोगों को आश्चर्य होता है कि, जब किसी कन्या का विवाह निश्चित न हो रहा हो, तो उसे ब्रह्मचारी हनुमानजी की उपासना करने के लिए कहा जाता है। वास्तवमें अत्युच्च स्तर के देवताओं में ‘ब्रह्मचारी’ या ‘विवाहित’ जैसा कोई भेद नहीं होता। ऐसा अंतर मानव-निर्मित है। मनोविज्ञान के आधार पर कुछ लोगों की यह गलत धारणा होती है कि, सुंदर, बलवान पुरुष से विवाह की कामना से कन्याएं हनुमानजी की उपासना करती हैं। परंतु वास्तविक कारण कुछ इस प्रकार है। लगभग ३० प्रतिशत व्यक्तियों का विवाह भूतबाधा, जादू-टोना इत्यादि अनिष्ट शक्तियों के प्रभावके कारण नहीं हो पाता। हनुमानजी की उपासना करने से ये कष्ट दूर हो जाते हैं एवं उनका विवाह संभव हो जाता है।

७. हनुमान जन्मोत्सव कैसे मनाया जाता है ?
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हनुमान जयंती का उत्सव संपूर्ण भारत में विविध स्थानों पर धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन प्रात: ४ बजे से ही भक्तजन स्नान कर हनुमान जी के देवालयों में दर्शन के लिए आने लगते हैं। प्रात: ५ बजेसे देवालयों में पूजा विधि आरंभ होती हैं । हनुमानजी की मूर्ति को पंचामृत स्नान करवा कर उनका विधिवत पूजन किया जाता है। सुबह ६ बजे तक अर्थात हनुमान जन्म के समय तक हनुमान जन्म की कथा, भजन, कीर्तन आदि का आयोजन किया जाता है। हनुमानजी की मूर्ति को हिंडोले में रख हिंडोला गीत गाया जाता है। हनुमानजी की मूर्ति हाथ में लेकर देवालय की परिक्रमा करते हैं। हनुमान जयंती के उपलक्ष्य में कुछ जगह यज्ञ का आयोजन भी करते हैं। तत्पश्चात हनुमानजी की आरती उतारी जाती है। आरती के उपरांत कुछ स्थानों पर सौंठ अर्थात सूखे अदरक का चूर्ण एवं पीसी हुई चीनी तथा सूखे नारियल का चूरा मिलाकर उस मिश्रणको या कुछ स्थानों पर छुहारा, बादाम, काजू, सूखा अंगूर एवं मिश्री, इस पंचखाद्य को प्रसाद के रूप में बांटते हैं । कुछ स्थानों पर पोहे तथा चने की भीगी हुई दाल में दही, शक्कर, मिर्ची के टुकडे, निम्ब का अचार मिलाकर गोपाल काला बनाकर प्रसादके रूपमें बाटते है। कुछ जगह महाप्रसाद का आयोजन किया जाता है।
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🕉🙏 भारतीय स्वाभिमान एवं गौरव के प्रतीक नव वर्ष विक्रम संवत्सर २०७६ / चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (६ अप्रेल २०१९) / चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वासन्तिक नवरात्र की हार्दिक बधाई व असीम शुभकामनाएँ… 🙏🌷

सत्य सनातन, पूर्ण वैज्ञानिक, सांस्कृतिक व राष्ट्रीयता का परिचायक भारतीय नव संवत्सर-वर्ष प्रतिपदा विक्रम संवत 2076 युगाब्द 5121 तद्नुसार 6अप्रैल 2019 (शनिवार) के पावन आगमन पर हार्दिक शुभकामनाएं।।
चैत्रीय नवरात्री, गुड़ी पड़वा व नववर्ष विक्रम संवत 2076 की हार्दिक शुभकामना..
यह नववर्ष आपके जीवन को नए उत्साह और सफलताओं से भर दे ।।आप सभी को पुनःनव संवत्सर(नव वर्ष प्रतिपदा), गुड़ी पड़वा, चेटीचण्ड, ज्योतिष दिवस की शुभकामनाओं के साथ……..
इन्ही शुभकामना के साथ आपका..
🙏🙏 ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री 🙏 🙏
🌹🌹🚩चैत्र नवरात्रि🚩🌹🌹
नवरात्र वह समय है, जब दोनों ऋतुओं का मिलन होता है। इस संधि काल मे ब्रह्मांड से असीम शक्तियां ऊर्जा के रूप में हम तक पहुँचती हैं।

मुख्य रूप से हम दो नवरात्रों के विषय में जानते हैं – चैत्र नवरात्र एवं आश्विन नवरात्र। चैत्र नवरात्रि गर्मियों के मौसम की शुरूआत करता है और प्रकृति माँ एक प्रमुख जलवायु परिवर्तन से गुजरती है।

यह चैत्र शुक्ल पक्ष प्रथमा से प्रारंभ होती है और रामनवमी को इसका समापन होता है। चैत्र नवरात्रि में माँ भगवती के सभी नौ रूपों की उपासना की जाती है। इस समय आध्यात्मिक ऊर्जा ग्रहण करने के लिए लोग विशिष्ट अनुष्ठान करते हैं। इस अनुष्ठान में देवी के रूपों की साधना की जाती है।
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(पहला दिन) :- प्रतिपदा – इस दिन पर “घटत्पन”, “चंद्र दर्शन” और “शैलपुत्री पूजा” की जाती है।

(दूसरा दिन) :- दिन पर “सिंधारा दौज” और “माता ब्रह्राचारिणी पूजा” की जाती है।

(तीसरा दिन) :- यह दिन “गौरी तेज” या “सौजन्य तीज” के रूप में मनाया जाता है और इस दिन का मुख्य अनुष्ठान “चन्द्रघंटा की पूजा” है।

(चौथा दिन) :- “वरद विनायक चौथ” के रूप में भी जाना जाता है, इस दिन का मुख्य अनुष्ठान “कूष्मांडा की पूजा” है।

(पांचवा दिन) :- इस दिन को “लक्ष्मी पंचमी” कहा जाता है और इस दिन का मुख्य अनुष्ठान “नाग पूजा” और “स्कंदमाता की पूजा” जाती है।

(छटा दिन) :- इसे “यमुना छत” या “स्कंद सस्थी” के रूप में जाना जाता है और इस दिन का मुख्य अनुष्ठान “कात्यायनी की पूजा” है।

(सातवां दिन) :- सप्तमी को “महा सप्तमी” के रूप में मनाया जाता है और देवी का आशीर्वाद मांगने के लिए “कालरात्रि की पूजा” की जाती है।

(आठवां दिन) :- अष्टमी को “दुर्गा अष्टमी” के रूप में भी मनाया जाता है और इसे “अन्नपूर्णा अष्टमी” भी कहा जाता है। इस दिन “महागौरी की पूजा” और “संधि पूजा” की जाती है।

(नौंवा दिन) :- “नवमी” नवरात्रि उत्सव का अंतिम दिन “राम नवमी” के रूप में मनाया जाता है और इस दिन “सिद्धिंदात्री की पूजा ” की जाती है।
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चैत्र नवरात्रि के दौरान अनुष्ठान –
बहुत भक्त नौ दिनों का उपवास रखते हैं।
सभी भक्त अपना दिन देवी की पूजा और नवरात्रि मंत्रों का जप करते हुए बिताते हैं।
चैत्र नवरात्रि के पहले तीन दिनों को ऊर्जा माँ दुर्गा को समर्पित है। अगले तीन दिन, धन की देवी, माँ लक्ष्मी को समर्पित है और आखिर के तीन दिन ज्ञान की देवी, माँ सरस्वती को समर्पित हैं। चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में से प्रत्येक के पूजा अनुष्ठान नीचे दिए गए हैं।
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पूजा विधि —
घट स्थापना नवरात्रि के पहले दिन सबसे आवश्यक है, जो ब्रह्मांड का प्रतीक है और इसे पवित्र स्थान पर रखा जाता है, घर की शुद्धि और खुशाली के लिए।

१. अखण्ड ज्योति :- नवरात्रि ज्योति घर और परिवार में शांति का प्रतीक है। इसलिए, यह जरूरी है कि आप नवरात्रि पूजा शुरू करने से पहले देसी घी का दीपक जलातें हैं। यह आपके घर की नकारात्मक ऊर्जा को कम करने में मदद करता है और भक्तों में मानसिक संतोष बढ़ाता है।

२. जौ की बुवाई :- नवरात्रि में घर में जौ की बुवाई करते है। ऐसी मान्यता है की जौ इस सृष्टी की पहली फसल थी इसीलिए इसे हवन में भी चढ़ाया जाता है। वसंत ऋतू में आने वाली पहली फसल भी जौ ही है जिसे देवी माँ को चैत्र नवरात्रि के दौरान अर्पण करते है।

३. नव दिवस भोग (9 दिन के लिए प्रसाद) :- प्रत्येक दिन एक देवी का प्रतिनिधित्व किया जाता है और प्रत्येक देवी को कुछ भेंट करने के साथ भोग चढ़ाया जाता है।
इन सभी नौ दिन देवी के लिए 9 प्रकार भोग निम्न अनुसार हैं:
• 1 दिन: केले
• 2 दिन: देसी घी (गाय के दूध से बने)
• 3 दिन: नमकीन मक्खन
• 4 दिन: मिश्री
• 5 दिन: खीर या दूध
• 6 दिन: माल पोआ
• 7 दिन: शहद
• 8 दिन: गुड़ या नारियल
• 9 दिन: धान का हलवा

४. दुर्गा सप्तशती :- दुर्गा सप्तशती शांति, समृद्धि, धन और शांति का प्रतीक है, और नवरात्रि के 9 दिनों के दौरान दुर्गा सप्तशती के पाठ को करना, सबसे अधिक शुभ कार्य माना जाता है।

५. नौ दिनों के लिए नौ रंग :- शुभकामना के लिए और प्रसंता के लिए, नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान लोग नौ अलग-अलग रंग पहनते हैं:
• 1 दिन: हरा
• 2 दिन: नीला
• 3 दिन: लाल
• 4 दिन: नारंगी
• 5 दिन: पीला
• 6 दिन: नीला
• 7 दिन: बैंगनी रंग
• 8 दिन: गुलाबी
• 9 दिन: सुनहरा रंग

६. कन्या पूजन :- कन्या पूजन माँ दुर्गा की प्रतिनिधियों (कन्या) की प्रशंसा करके, उन्हें विदा करने की विधि है। उन्हें फूल, इलायची, फल, सुपारी, मिठाई, श्रृंगार की वस्तुएं, कपड़े, घर का भोजन (खासकर: जैसे की हलवा, काले चने और पूरी) प्रस्तुत करने की प्रथा है।
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नवरात्रि अनुष्ठान के कुछ विशेष नियम :-
बहुत सारे भक्त निचे दिए गए अनुष्ठानों का पालन करते हैं:
1. प्रार्थना और उपवास चैत्र नवरात्रि समारोह का प्रतीक है। त्योहार के आरंभ होने से पहले, अपने घर में देवी का स्वागत करने के लिए घर की साफ सफाई करते हैं।
2. सात्विक जीवन व्यतीत करते हैं। भूमि शयन करते हैं। सात्त्विक आहार करते हैं।
3. उपवास करते वक्त सात्विक भोजन जैसे कि आलू, कुट्टू का आटा, दही, फल, आदि खाते हैं।
4. नवरात्रि के दौरान, भोजन में सख्त समय का अनुशासन बनाए रखते हैं और अपने व्यवहार की निगरानी भी करते हैं, जैसे की
• अस्वास्थ्यकर खाना (Junk Food) नहीं खाते।
• सत्संग करते हैं।
• ज्ञान सूत्र से जुड़ते हैं।
• ध्यान करते हैं।
• चमड़े का प्रयोग नहीं करते हैं।
• क्रोध से बचे रहते हैं।
• कम से कम 2 घंटे का मौन रहते हैं।
• अनुष्ठान समापन पर क्षमा प्रार्थना का विधान है तथा विसर्जन करते हैं।
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चैत्र नवरात्री का महत्व :- यह माना जाता है कि यदि भक्त बिना किसी इच्छा की पूर्ति के लिए महादुर्गा की पूजा करते हैं, तो वे मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर कर मोक्ष प्राप्त करते हैं।

आप सभी को पुनःनव संवत्सर(नव वर्ष प्रतिपदा), गुड़ी पड़वा, चेटीचण्ड, ज्योतिष दिवस की शुभकामनाओं के साथ……..
🌹🚩जय जय मातारानी की🙏

चैत्र नवरात्रि –2019…

इस वर्ष चैत्र नवरात्र का महापर्व 6 अप्रैल 2019 से शुरू हो रहे हैं। नवमी तिथि 14 अप्रैल को है। इन नौ दिनों मां नौ रुपों की पूजा की जाती है। शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना अच्छा रहता है। यूं तो साल में दो बार नवरात्र आते हैं लेकिन दोनों ही नवरात्र का महत्व और पूजा विधि अलग है। इस बार कहा जा रहा है कि पांच सर्वार्थ सिद्धि, दो रवि योग और रवि पुष्य योग का संयोग बन रहा है। इस बार यह भी कहा जा रहा है कि इस बार नवमी भी दो दिन मनेगी।
👉🏻👉🏻👉🏻घट स्थापना मुहूर्त

इस साल 6 अप्रैल 2019 (शनिवार) से चैत्र नवरात्र शुरू हो रहे हैं। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार घटस्थापना के लिए देवी पुराण के अनुसार प्रातःकाल का समय ही श्रेष्ठ बताया गया है इसलिए सुबह द्विस्वभाव लग्न में घटस्थापना करनी चाहिए।
शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन उज्जैन के समयानुसार सुबह शुभ के चौघड़िया में 7 बजकर 251 मिनट से 9 बजकर 24 मिनट के बीच घट स्थापना करना बेहद शुभ होगा।
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नवरात्रि पर शक्ति के साधक मां जगदंबे की कठिन तप साधना-आराधना करते हैं। श्रद्धा और विश्वास के साथ इस पावन पर्व पर माता का पूजन करने से चारो पुरुषार्थ धर्म ,अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए शक्ति की साधना के उन महामंत्रों के बारे में जानते हैं, जिन्हें भक्ति-भाव और नियमपूर्वक करने पर माता की कृपा अवश्य मिलती है।
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इस मंत्र से मिलेगी परीक्षा में सफलता–

विद्यार्थी वर्ग और जिन लोंगो कि जन्म कुंडली में गोचर में राहु अशुभ हों उनकी दशा, अन्तर्दशा अथवा प्रत्यंतर दशा चल रही हो वै सभी ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः’ मंत्र पढ़ते हुए माता शक्ति कि पूजा अथवा जाप करें।
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देवी के यह मंत्र दूर करेगा कर्ज की परेशानी–

जीवन से कर्ज का मर्ज दूर करने के लिए नवरात्रि पर शक्ति की विशेष साधना करना न भूलें। इस पावन पर्व पर ‘या देवि सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।’ मंत्र का जप करें और इसी मंत्र से मां की पूजा करें। इन सबके अतिरिक्त यदि संभव हो तो कुंजिका स्तोत्र और देव्य अथर्वशीर्ष का पाठ भी करें। जिन्हें पूर्ण बिधि-बिधान आता है, वे भक्त अपने ही अनुसार मां की भक्ति करें। श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई साधना से निश्चित रूप से मां लक्ष्मी की कृपा मिलेगी।
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इस मंत्र जप से शीघ्र होगा विवाह—
जिन कुंवारी कन्याओं का विवाह तमाम प्रयासों के बावजूद न हो पा रहा हो, माता-पिता वर तलाशते हुए परेशान हो गए हों, वे इस पावन पर्व पर ‘ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्य धीश्वरी, नन्द गोप सुतं देवी पतिं मे कुरु ते नमः।’ मंत्र से जप एवं माता का पूजन करें। माता की कृपा से यथाशीघ्र ही उन्हें जीवनसाथी मिल जाएगा।
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देवी का यह मन्त्र करेगा कलह/क्लेश को दूर —

जिन जीवात्माओं के घर में कलह के चलते घर की ईंट से ईंट टकराती हो,
उन्हें – ‘या देवि! सर्व भूतेषु शान्ति रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।’ मंत्र का जप और पूजन करना चाहिए। जगत जननी जगदंबा का यह उपाय आपके घर-परिवार कि अशांति दूर करेगा।
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इस मंत्र से मिलेगा मनचाहा जीवनसाथी —

जिन लड़कों का विवाह तमाम प्रयासों के बाद भी न हो रहा हो, या फिर शादी में अक्सर अड़चन आ रही हो वे मनमुताबिक जीवनसाथी पाने के लिए इस दिव्य मंत्र – ‘पत्नी मनोरमां देहि, मनो वृत्तानु सारिणीम तारिणीम दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम।’ का जप और पूजन करें। माता की अवश्य कृपा होगी।
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नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के नौ रुपों की पूजा की जाती है। देवी दुर्गा के नौ रूप हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंधमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। पंडित दयानन्द शास्त्री जी बताया कि इन नौ रातों में तीन देवी पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ रुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। नवदुर्गा के नौ स्वरूप स्त्री के जीवनचक्र को दर्शाते है।

  1. जन्म ग्रहण करती हुई कन्या “शैलपुत्री” स्वरूप है।
  2. स्त्री का कौमार्य अवस्था तक “ब्रह्मचारिणी” का रूप है।
  3. विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह “चंद्रघंटा” समान है।
  4. नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह “कूष्मांडा” स्वरूप में है।
  5. संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री “स्कन्दमाता” हो जाती है।
  6. संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री “कात्यायनी” रूप है।
  7. अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह “कालरात्रि” जैसी है।
  8. संसार (कुटुंब ही उसके लिए संसार है) का उपकार करने से “महागौरी” हो जाती है।
  9. धरती को छोड़कर स्वर्ग प्रयाण करने से पहले संसार में अपनी संतान को सिद्धि(समस्त सुख-संपदा) का आशीर्वाद देने वाली “सिद्धिदात्री” हो जाती है।
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    चैत्र नवरात्रि के उपवास रखें ये सावधानियां—
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    👉🏻👉🏻नवरात्र में आपको मां दुर्गा की प्रतिमा या मूर्ति के सामने लाल फूल रोज चढ़ाना चाहिए।
    👉🏻👉🏻इन नौ दिनों न तो बाल कटवाने चाहिये और ना ही दाढ़ी मूंछ बनवानी चाहिये।
    👉🏻👉🏻नवरात्रि में भोजन में नॉन वेज, प्याज, लहसुन नहीं खाना चाहिये।
    👉🏻👉🏻नौ दिन तक नींबू को नहीं काटना चाहिये, यह बेहद अशुभ माना जाता है।
    👉🏻👉🏻नौ दिन तक दोपहर में नहीं सोना चाहिये। इससे आपको फिर व्रत रखने का फल नहीं मिलता।
    👉🏻👉🏻इन दिनों काले कपड़े नहीं पहनने चाहिये।
    👉🏻👉🏻प्‍याज-लहुसन के अलावा अनाज और नमक का भी सेवन नहीं करना चाहिये।
    👉🏻👉🏻नवरात्रि पर चमड़े से बनी हुए चीजें ना पहनें। इनमें से चमड़े की बेल्ट, बैग और जूते-चप्पल शामिल हैं।
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    जानिए इस चैत्र नवरात्रि में किस दिन करें कौनसे ग्रह की शान्ति —

यह हें नवरात्र में नवग्रह शांति की विधि:-

यह है कि प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शांति करानी चाहिए।
द्वितीय के दिन राहु ग्रह की शान्ति करने संबन्धी कार्य करने चाहिए।
तृतीया के दिन बृहस्पति ग्रह की शान्ति कार्य करना चाहिए।
चतुर्थी के दिन व्यक्ति शनि शान्ति के उपाय कर स्वयं को शनि के अशुभ प्रभाव से बचा सकता है।
पंचमी के दिन बुध ग्रह,
षष्ठी के दिन केतु ,
सप्तमी के दिन शुक्र,
अष्टमी के दिन सूर्य,
एवं नवमी के दिन चन्द्रमा की शांति कार्य किए जाते है।

पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि किसी भी ग्रह शांति की प्रक्रिया शुरू करने से पहले कलश स्थापना और दुर्गा मां की पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद लाल वस्त्र पर नव ग्रह यंत्र बनावाया जाता है. इसके बाद नवग्रह बीज मंत्र से इसकी पूजा करें फिर नवग्रह शांति का संकल्प करें।

चैत्र प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शांति होती है इसलिए मंगल ग्रह की फिर से पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद पंचमुखी रूद्राक्ष, मूंगा अथवा लाल अकीक की माला से 108 मंगल बीज मंत्र का जप करना चाहिए. जप के बाद मंगल कवच एवं अष्टोत्तरशतनाम का पाठ करना चाहिए. राहू की शांति के लिए द्वितीया को राहु की पूजा के बाद राहू के बीज मंत्र का 108 बार जप करना, राहू के शुभ फलों में वृ्द्धि करता है।

पूर्व आलेख : जीवन की विभिन्न समस्याओं के समाधान को करें होली पर यह खास उपाय..

🌹इस होली 2019 पर करें इन विशेष ज्योतिष शास्त्र सम्मत प्रयोगों को🌷

🙏🏻फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन किया जाता है। इस वर्ष ये पर्व 20 मार्च 2019(बुधवार) को है।
पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलिका दहन के दिन किए गए उपाय बहुत ही जल्दी शुभ फल प्रदान करते हैं।

इस होली पर किए जाने कुछ अचूक उपाय हैं–

1.होली की रात सरसों के तेल का चौमुखी दीपक घर के मुख्य द्वार पर लगाएं व उसकी पूजा करें। इसके बाद भगवान से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। इस प्रयोग से हर प्रकार की बाधा का निवारण होता है।
2.यदि व्यापार या नौकरी में उन्नति न हो रही हो तो 21 गोमती चक्र लेकर होलिका दहन की रात में शिवलिंग पर चढ़ा दें। इससे व्यापार में फायदा होने लगेगा।
3.होली पर किसी गरीब को भोजन अवश्य कराएं। इससे आपकी मनोकामना पूरी होगी।
4.यदि राहु के कारण परेशानी है तो एक नारियल का गोला लेकर उसमें अलसी का तेल भरें। उसी में थोड़ा सा गुड़ डालें और इस गोले को जलती हुई होलिका में डाल दें। इससे राहु का बुरा प्रभाव समाप्त हो जाएगा।
5.धन हानि से बचने के लिए होली के दिन घर के मुख्य द्वार पर गुलाल छिड़कें और उस पर दोमुखी दीपक जलाएं। दीपक जलाते समय धन हानि से बचाव की कामना करें। जब दीपक बुझ जाए तो उसे होली की अग्नि में डाल दें। यह क्रिया श्रद्धापूर्वक करें, धन हानि नहीं होगी।
6.घर की सुख-समृद्धि के लिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को होलिका दहन में घी में भिगोई हुई दो लौंग, एक बताशा और एक पान का पत्ता अवश्य चढ़ाना चाहिए। साथ ही होली की 11 परिक्रमा करते हुए होली में सूखे नारियल की आहुति देनी चाहिए।
7.अगर किसी ने आप पर कोई टोटका किया है तो होली की रात जहां होलिका दहन हो, उस जगह एक गड्ढा खोदकर उसमें 11 अभिमंत्रित कौड़ियां दबा दें। अगले दिन कौड़ियों को निकालकर अपने घर की मिट्टी के साथ नीले कपड़े में बांधकर बहते जल में प्रवाहित कर दें। जो भी तंत्र क्रिया आप पर किसी ने की होगी वह नष्ट हो जाएगी।
8.यदि आपके घर में किसी भूत-प्रेत का साया है तो जब होली जल जाए, तब आप होलिका की थोड़ी-सी अग्नि अपने घर ले आएं और अपने घर के आग्नेय कोण में उस अग्नि को तांबे या मिट्टी के पात्र में रखें। सरसों के तेल का दीपक जलाएं। इस उपाय से आपकी परेशानी दूर हो जाएगी।
9.बेरोजगार हैं तो होली की रात 12 बजे से पहले एक नींबू लेकर चौराहे पर जाएं और उसके चार टुकड़े कर चारों दिशाओं में फेंक दें। वापिस घर आ जाएं किन्तु ध्यान रहे, वापिस आते समय पीछे मुड़कर न देखें।
10.यदि आपका पैसा कहीं फंसा है तो होली के दिन 11 गोमती चक्र हाथ में लेकर जलती हुई होलिका की 11 बार परिक्रमा करते हुए धन प्राप्ति की प्रार्थना करें..फिर एक सफेद कागज पर उस व्यक्ति का नाम लाल चन्दन से लिखें जिससे पैसा लेना है फिर उस सफेद कागज को 11 गोमती चक्र के साथ में कहीं गड्ढा खोदकर दबा दें। इस प्रयोग से धन प्राप्ति की संभावना बढ़ जाएगी।
11.यदि आपको कोई अज्ञात भय रहता है तो होली पर एख सूखा जटा वाला नारियल, काले तिल व पीली सरसों एक साथ लेकर उसे सात बार अपने सिर के ऊपर उतार कर जलती होलिका में डाल देने से अज्ञात भय समाप्त हो जाएगा।
12.होलिका दहन के दूसरे दिन होलिका की राख को घर लाकर उसमें थोड़ी सी राई व नमक मिलाकर रख लें। इस प्रयोग से भूत-प्रेत या नजर दोष से मुक्ति मिलती है।
13.शत्रुओं से छुटकारा पाने के लिए होलिका दहन के समय 7 गोमती चक्र लेकर भगवान से प्रार्थना करें कि आपके जीवन में कोई शत्रु बाधा न डालें। प्रार्थना के पश्चात पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ गोमती चक्र जलती हुई होलिका में डाल दें।
14.शीघ्र विवाह के लिए होली के दिन किसी शिव मंदिर जाएं और अपने साथ 1 साबुत पान, 1 साबुत सुपारी एवं हल्दी की गांठ रख लें। पान के पत्ते पर सुपारी और हल्दी की गांठ रखकर शिवलिंग पर अर्पित करें। इसके बाद पीछे देखे बिना अपने घर लौट आएं। यही प्रयोग अगले दिन भी करें। इसके साथ ही समय-समय पर शुभ मुहूर्त में यह उपाय करते रहें । जल्दी ही विवाह के योग बन जाएंगे।
15 .ज्योतिष के अनुसार उनका कालसर्प योग नहीं रहता जिनके ऊपर केसुड़े (पलाश ) के रंग – होली के रंग का फुवारा लग जाता है फिर कालसर्प योग से मुक्ति हो गई । कालसर्प योग के भय से अपने को ग्रह दोष है, कालसर्प है ऐसा मानकर डरना नहीं अपने को दुखी करना नहीं है।
16 .जिसको सभी रोगों से मुक्त होना हो तो पलाश की लकड़ी का हवन करें l १०० माला जप करें l आहुति डालते जायें “ॐ नमः शिवाय” बोलकर….. तो सभी प्रकार के रोगों से आराम मिलेगा ।
🍂ऐसी जगह करें कि थोड़ा ही कपड़ा (कटी वस्त्र ) पहने, और शरीर के बाकी हिस्सों में धुआं लगे।
17.बच्चे पढ़ने में ढीले हो तो बुद्धि बढ़ाने के लिए सारस्वत्य मंत्र २१ बार पढ़के बिल्व-पत्र, पलाश के पत्ते और शक्कर मिलाकर उसका हवन करें।
18. होली से शुरू करके बजरंग बाण का 40 दिन तक नियमित पाठ करने से हर मनोकामना पूर्ण हो सकती है।
🔥होली (20 मार्च 2019) की रात को दूध और चावल की खीर बनवा ले घर पे … भले एक कटोरी। होली की रात को चन्द्रमा को अर्घ्य दें … दीपक जलाकर दिखा दें और कटोरी में खीर जो है वो थाली में रख दें ..मन ही मन प्रार्थना कर लें ” हे भगवान! भगवद गीता में आपने कहा है नक्षत्रों का अधिपति चन्द्रमा में हूँ । हे भगवन! आज हमने अपने घर पे आपके लिए ये प्रसाद तैयार किया है। आप इसको स्वीकार करें ।
और ये मंत्र जपें :-
ॐ सोमाय नमः
ॐ चन्द्रमसे नमः
ॐ रोहिणी कान्ताये नमः
ऐसा करके थोड़ी देर प्रार्थना करके शांत हो कर बैठें।
🔥आपके काम काज में निश्चित रूप से वृद्धि होगी
पं युगल किशोर पावनाचार्य
🌷होली के दिन पूजा विशेष🌷
🔥होली के दिन हनुमान जी के पूजा की विशेष विधान है। पूजन करते हुए “श्रीगुरु चरण सरोज रज, निज मनु मुकुर सुधारि बरनउ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि”, ” मनोजवं मारुततुल्य वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं । वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं श्री राम दूतं शरणं प्रपद्ये ।। ” ऐसी प्रार्थना करें । होली के दिन एक बार जरूर कर लें, बहुत लाभ होगा।
🔥होली के दिन शास्त्रों में लक्ष्मी माता की पूजा का भी विधान बताया गया है । वह कपूर का दिया जलाकर करें। थोड़ा सा ही कपूर जलायें, होली का पर्व दरिद्रता का नाश करनेवाला पर्व बन जाएगा।

यह भी पढ़ें : जानिए क्यों और कैसे करें राशि (लग्न) के अनुसार रुद्राक्ष धारण–

हिंदू धर्म शास्‍त्र में रुद्राक्ष को बहुत महत्‍वपूर्ण और पवित्र माना गया है। इसे स्‍वयं भगवान शिव के अश्रुओं के रूप में पूजा जाता है। रुद्र और अक्ष जैसे दो शब्‍दों से मिलकर बना रुद्राक्ष शब्‍द बहुत शक्‍तिशाली होता है। मान्‍यता है कि शिव के अश्रुओं से ही रुद्राक्ष के वृक्ष की उत्‍पत्ति हुई थी।पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि रुद्राक्ष इंसान को हर तरह की हानिकारक ऊर्जा से बचाता है। इसका इस्तेमाल सिर्फ तपस्वियों के लिए ही नहीं, बल्कि सांसारिक जीवन में रह रहे लोगों के लिए भी किया जाता है। इसलिए यदि आप अपनी राशि के अनुसार रुद्राक्ष को पहनते है तो यह आपके जीवन में काफी बदलाव लाता है, मानसिक तनाव भी दूर करता है। रुद्राक्ष की विशेषता यह है कि इसमें एक अनोखे तरह का स्पदंन होता है। जो आपके लिए आप की ऊर्जा का एक सुरक्षा कवच बना देता है, जिससे बाहरी ऊर्जाएं आपको परेशान नहीं कर पातीं।
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि जिस प्रकार उचित रत्न धारण करने से ग्रहों के कुप्रभावों को कम अथवा समाप्त किया जा सकता है, उसी तरह रुद्राक्ष भी किसी भी मनुष्य के दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने में पूर्णरूप से सक्षम होते हैं। आप अपने भाग्य के बंद द्वारों को खोलना चाहते हैं तो अपनी राशि के अनुसार रुद्राक्ष धारण करें और उसका प्रभाव देखें।
रुद्राक्ष को हिन्दू शास्त्रों में बहुत ज्यादा पवित्र माना जाता है। रूद्र और अक्ष इन दो शब्दों से मिलकर रुद्राक्ष शब्द बना है। हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि शिव के आंसुओं से ही रुद्राक्ष के पेड़ की उत्पत्ति हुई थी। ऐसा कहा जाता है कि अगर रुद्राक्ष राशि के अनुसार के हिसाब से धारण किया जाए तो यह हमारे जीवन में बहुत परिवर्तन लाता है।रुद्राक्ष धारण एक सरल एवं सस्ता उपाय है, इसे धारण करने से व्यक्ति उन सभी इच्छाओं की पूर्ति कर लेता है जो उसकी सार्थकता के लिए पूर्ण होती है. रुद्राक्ष धारण से कोई नुकसान नहीं होता यह किसी न किसी रूप में व्यक्ति को शुभ फलों की प्राप्ति कराता है।

रुद्राक्ष एक बहुत ही पवित्र चीज़ है और इसका अर्थ “रूद्र का हिस्सा” है। रूद्र भगवान शिव का दूसरा नाम है। ऐसा माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसू की बूंदो से हुई है। प्राचीन समय में, रूद्राक्ष को आभूषण, संरक्षण, ग्रहों की शांति और आध्यात्मिक लाभ के रूप में प्रयोग किया जाता है। कुल 17 प्रकार के रूद्राक्ष होते हैं लेकिन इनमें से केवल 11 प्रकार के रूद्राक्ष का उपयोग ही विशेष प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार रुद्राक्ष का उपयोग करने से अद्भुत परिणाम प्राप्त होते है और इसका प्रभाव अचूक होता है। लेकिन यह केवल तभी संभव है जब इसे सोच समझकर और कुछ नियमों का पालन करते हुए पहना जाता है।

कई बार कुंडली में शुभ-योग मौजूद होने के उपरांत भी उन योगों से संबंधित ग्रहों के रत्न धारण करना लग्नानुसार उचित नहीं होता इसलिए इन योगों के अचित एवं शुभ प्रभाव में वृद्धि के लिए इन ग्रहों से संबंधित रुद्राक्ष धारण किए जा सकते हैं और यह रुद्राक्ष व्यक्ति के इन योगों में अपनी उपस्थित दर्ज कराकर उनके प्रभावों को की गुणा बढा़ देते हैं. अर्थात गजकेसरी योग के लिए दो और पांच मुखी, लक्ष्मी योग के लिए दो और तीन मुखी रुद्राक्ष लाभकारी होता है।

👉🏻👉🏻कैसे/कहाँ धारण करें??
रुद्राक्ष को गले और हाथ में पहना जा सकता है। लेकिन रुद्राक्ष को गले में पहनना सबसे ज्यादा लाभदायक रहता है। आप हाथ में 12 रुद्राक्ष, गले में 36 रुद्राक्ष पहन सकते है। आप गले में एक रुद्राक्ष भी पहन सकते है। रुद्राक्ष को हमेशा लाल रंग के धागे में ही पहनना चाहिए। रुद्राक्ष को सावन के महीने में, सोमवार के दिन और शिवरात्रि के दिन पहनना बहुत शुभ रहता है। आपको इसे पहनने से पहले शिवलिंग के सामने रखना चाहिए और शिव मन्त्रों का जाप करें।

👉🏻👉🏻जानिए रुद्राक्ष पहनने के नियम–
कलाई, गले या ह्रदय पर रुद्राक्ष को धारण किया जा सकता है।
सबसे बेहतर रुद्राक्ष को गले में पहनना चाहिए। कलाई में 12, गले में 36 और ह्रदय पर 108 दानों का रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
लाल धागे में एक दाना रुद्राक्ष का ह्रदय तक पहन सकते हैं।
सावन, शिवरात्रि और सोमवार के दिन रुद्राक्ष पहनना सबसे उत्तम रहता है। रुद्राक्ष पहनने से पहले उसे शिव जी को समर्पित करना चाहिए।
रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप करना सर्वश्रेष्‍ठ फलदायक रहता है।
रुद्राक्ष धारण करने वाले व्‍यक्‍ति को सात्‍विक जीवन का पालन करना चाहिए। आचरण शुद्ध ना रखने पर धारण कर्ता को इसका पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता है।

👉🏻👉🏻👉🏻राशि के अनुसार क्यों पहनें रुद्राक्ष???

ज्‍योतिषशास्‍त्र के अनुसार प्रत्‍येक राशि का एक स्‍वामी ग्रह है और उस ग्रह से एक रुद्राक्ष संबंधित है। अगर कोई व्‍यक्‍ति अपनी राशि अनुसार रुद्राक्ष धारण करता है तो उसे इसके दोगुने फल प्राप्‍त होते हैं। कहा जाता है की यदि राशि के अनुसार रुद्राक्ष धारण करने से शुभ फल प्राप्त होता है। आज हम आपको लग्‍न राशि के अनुसार रुद्राक्ष धारण करने के बारे में बता रहे हैं। अगर आप अपनी लग्‍न राशि के आधार पर रुद्राक्ष को धारण करेंगें तो आपके जीवन के सारे कष्‍ट और विपत्तियां दूर हो जाएंगीं।

👉🏻👉🏻👉🏻जानिए किस रंग के धागे में पहनें रुद्राक्ष–
वैसे तो आप रुद्राक्ष को किसी भी रंग के धागे में पहन सकते हैं लेकिन इसे लाल रंग के रेशमी धागे में पहनना सबसे अधिक शुभ माना जाता है।

👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻जानिए राशि/लग्नानुसार कोनसा रुद्राक्ष करें धारण??

मेष राशि: आपको सौभाग्य वृद्धि हेतु एक मुखी, तीन मुखी अथवा पांच मुखी रुद्राक्ष प्राण-प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए। नेता, मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी, दवा विक्रेता, प्रापट्री डीलर, होटल मालिकों को एक मुखी रुद्राक्ष विशेष रूप से धारण करना चाहिए। मेष राशि का स्‍वामी मंगल होता है और मंगल साहस और वीरता का कारक है। साथ ही मंगल के प्रभाव में जातक अडियल और गुस्‍सैल भी बन जाता है। मेष राशि के जातकों को तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करने से लाभ होगा।यह रुद्राक्ष आग और गति का प्रतिनिधित्व करता है। यह रुद्राक्ष मेष और वृश्चिक राशि के लिए बेहद लाभकारी है। आप मंगलदोष दूर करने के लिए भी इसे पहन सकते है।

वृषभ राशि: आपको सौभाग्य वृद्धि हेतु चार मुखी, छः मुखी अथवा चैदह मुखी रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए। वृषभ लग्न के जातकों को चार मुखी रुद्राक्ष विशेष रूप से धारण करना चाहिए। अधिवक्ता, लेखाकार/ लेखाधिकारी, पुलिस, सेना, डाॅक्टर आदि को कैरियर में सफलता के लिए प्राण-प्रतिष्ठित एवं सिद्ध चार मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। अपने लक्ष्‍य को पाने के लिए वृषभ राशि के लोग बहुत मेहनत करते हैं। वृषभ राशि का स्‍वामी शुक्र देव हैं और ये भौतिक सुख और ऐश्‍वर्य प्रदान करते हैं। इस राशि के लोगों को 6 मुखी और दस मुखी रुद्राक्ष धारण करने से लाभ होता है।इस रुद्राक्ष को भगवान कार्तिकेय के रूप में माना जाता है। यह आपको वित्तीय और व्यावसायिक लाभ प्रदान कर सकता है। शुक्र ग्रह की दशा को सुधारने के लिए इसे पहना जा सकता है। तुला और वृषभ राशि के लिए यह बेहद लाभदायक है।

मिथुन राशि: आपको सौभाग्य वृद्धि हेतु चार मुखी, पांच मुखी और तेरह मुखी रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए। मिथुन लग्न वाले जातक को छः मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रोफेसर, शिक्षक आदि इसे धारण कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं। चार मुखी रुद्राक्ष को स्वंय ब्रह्मा जी का स्वरूप माना गया है। भगवान ब्रह्मा सर्व वेदों के ज्ञाता है उसी तरह इस रुद्राक्ष को धारण करने वाले जातक के जीवन में भी शिक्षा प्राप्ति के सभी राह खुल जाते हैं।मिथुन राशि का स्‍वामी बुध है और बुध को बुद्धि का कारक माना जाता है। मिथुन राशि के लोग परिवर्तन और गतिशील स्‍वभाव के होते हैं। मिथुन राशि के जातकों को सफलता और धन की प्राप्‍ति के लिए 4 मुखी और 11 मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

कर्क: आपको सौभाग्य वृद्धि हेतु तीन मुखी, पांच मुखी अथवा गौरी शंकर रुद्राक्ष प्राण-प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए। कर्क लग्न वाले दो मुखी, तीन मुखी व पांच मुखी रुद्राक्ष अवश्य धारण करें। चिकित्सीय क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति जैसे नर्स, केमिस्ट, कंपाउडर, दवा विक्रेताओं के लिए यह विशेष लाभकारी है। कर्क राशि का स्‍वामी चंद्रमा होता है जोकि मन का कारक है। चंद्रमा मन को स्थिरता प्रदान करता है। ये लोग अपने कार्यों को पूरी निपुणता से करते हैं और इसीलिए इन्‍हें उसमें सफलता भी मिलती है। कर्क राशि के लोगों को 4 मुखी और गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण करने से लाभ होगा। इस रुद्राक्ष को अर्धनारीश्वर के नाम से जाना जाता है। कर्क राशि के लोगों के लिए यह रुद्राक्ष धारण करना लाभदायक रहता है। अगर आप अपने जीवन में वैवाहिक स्थिति से संबंधित समस्याओं का सामना कर रहे है या फिर आपकी कुंडली में चंद्र ग्रह कमजोर है तो आपको यह रुद्राक्ष पहनना चाहिए।

सिंह राशि: सिंह राशि का स्‍वामी सूर्य देव हैं। सूर्य को सफलता का कारक माना जाता है और जिस पर सूर्य देव की कृपा पड़ गई उसे जीवन में कभी भी असफलता का सामना नहीं करना पड़ता है। सिंह राशि के जातकों को 5 मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।
आपको सौभाग्य वृद्धि हेतु एक मुखी, तीन मुखी और पांच मुखी रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए। सिंह लग्न वाले जातक को आठ मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। सी. ए. करने वाले, सिविल इंजीनियर, कंप्यूटर का काम करने वाले आठ मुखी रुद्राक्ष धारण करें।

कन्या राशि: कन्‍या राशि का स्‍वामी भी बुध ग्रह है। बुध के शुभ प्रभाव में जातक बुद्धिमान बनता है और उसके द्वारा लिए गए सभी निर्णय सही साबित होते हैं। कन्‍या राशि के जातकों को गौरीशंकर रुद्राक्ष धारण करने से सबसे ज्‍यादा लाभ होता है।
आपको सौभाग्य वृद्धि हेतु चार मुखी, पांच मुखी तथा तेरह मुखी रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए। कन्या लग्न वाले सात मुखी, आठ मुखी व छः मुखी रुद्राक्ष धारण करने से जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं। विद्युत संबंधी कार्य करने वाले, बिजली के उपकरण, निर्माता, इलेक्ट्रिकल इंजीनियर, बिजली घर व कारखाने में कार्यरत कारीगर लोग इसे धारण कर सकते हैं। इससे सुख-समृद्धि, गुप्त धन प्राप्ति तथा शत्रुनाश में लाभ होता है।

तुला राशि: आपको सौभाग्य वृद्धि हेतु चार मुखी, छः मुखी या चैदह मुखी रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए। तुला लग्न वाले जातकों को सात मुखी रुद्राक्ष व आठ मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। इसे धारण करने से जीवन में संपन्नता तथा आनंद की प्राप्ति होती है। यश, पुण्य एवं नेतृत्व का लाभ होता है। विद्या प्राप्ति के लिए सर्वोत्तम है। तुला राशि के लोग हर निर्णय से पूर्व बहुत सोच-विचार करते हैं। इस राशि का स्‍वामी शुक्र है जोकि जीवन में भौतिक सुख प्रदान करते हैं। तुला राशि के जातकों को सात मुखी रुद्राक्ष और गणेश रुद्राक्षपहनने से सर्वसुख की प्राप्‍ति होगी।
इस रुद्राक्ष को भगवान कार्तिकेय के रूप में माना जाता है। यह आपको वित्तीय और व्यावसायिक लाभ प्रदान कर सकता है। शुक्र ग्रह की दशा को सुधारने के लिए इसे पहना जा सकता है। तुला और वृषभ राशि के लिए यह बेहद लाभदायक है।

वृश्चिक राशि: वृश्चिक राशि के लोग बहुत बुद्धिमान होते हैं। इस राशि का स्‍वामी मंगल ग्रह है जोकि बहुत आक्रामक माना जाता है लेकिन इस राशि के लोगों के स्‍वभाव में आक्रामकता कम ही देखने को मिलती है। वृश्चिक राशि के लोगों को 8 मुखी और 13 मुखी रुद्राक्षधारण करने से शुभ फल की प्राप्‍ति होती है।
इस राशि वालों को सौभाग्य वृद्धि के लिए तीन मुखी, पांच मुखी या गौरी शंकर रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए। यह कैरियर के हर क्षेत्र में समान फल देने वाला है। व्यापार, व्यवसाय में लाभ तथा नौकरी में पदोन्नति, स्टेनो, सरकारी कोर्टकचहरी आदि में कार्य करने वाले सभी के लिए लाभप्रद है। यश, संपन्नता, वैभव, सुख-शांति व ख्याति की प्राप्ति होती है। यह रुद्राक्ष आग और गति का प्रतिनिधित्व करता है। यह रुद्राक्ष मेष और वृश्चिक राशि के लिए बेहद लाभकारी है। आप मंगलदोष दूर करने के लिए भी इसे पहन सकते है।

धनु राशि: धनु राशि का स्‍वामी बृहस्‍पति है। इस राशि के लोग साहसी और उग्र स्‍वभाव के होते हैं। जीवन की विपत्तियों को टालने के लिए धनु राशि के जातकों को 9 मुखी और 1 मुखी रुद्राक्ष पहनना चा‍हिए।
आपको सौभाग्य वृद्धि हेतु एक मुखी, तीन मुखी अथवा पांच मुखी रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए। इसके धारण करने से सर्वपाप का नाश होता है। मंगल/गुरु की दशा प्रतिकूल होने पर धारण करने पर विशेष लाभ प्राप्त होता है।इसे कालाग्नि के रूप में भी जाना जाता है। इसको पहनना आपको ताकत और ज्ञान प्रदान करता है। यह रुद्राक्ष धनु और मीन राशि के लिए बहुत फायदेमंद है। शिक्षा ग्रह करने संबंधी समस्या को दूर करने के लिए यह रुद्राक्ष बहुत प्रभावी है।

मकर राशि: मकर राशि का स्‍वामी शनि देव हैं और कहते हैं कि जिस पर शनि देव की कृपा हो जाए उसके वारे न्‍यारे हो जाते हैं अर्थात् उसके सारे बिगड़े काम बन जाते हैं। मकर राशि के जातकों को अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए 13 और 10 मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।इस रुद्राक्ष को सप्तमातृका और सप्तऋषि के नाम से भी जाना जाता है। इस रुद्राक्ष को मारक दशा में पहनना शुभ रहता है। यह रुद्राक्ष मकर और कुम्भ राशि के लोगों के लिए बहुत फायदेमंद है।
आपको सौभाग्य वृद्धि हेतु चार मुखी, छः मुखी या चैदह मुखी रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए।

कुंभ राशि: कुंभ राशि पर भी शनि देव की कृपा बरसती है। कुंभ राशि के लोग बहुत ऊंचे और बड़े सपने देखते हैं लेकिन ये उन सपनों को पूरा करने का दम भी रखते हैं। इस राशि के जातकों के लिए 7 मुखी रुद्राक्षबहुत फायदेमंद रहता है।इस रुद्राक्ष को सप्तमातृका और सप्तऋषि के नाम से भी जाना जाता है। इस रुद्राक्ष को मारक दशा में पहनना शुभ रहता है। यह रुद्राक्ष मकर और कुम्भ राशि के लोगों के लिए बहुत फायदेमंद है।
आपको सौभाग्य वृद्धि हेतु चार मुखी, छः मुखी या चैदह मुखी रुद्राक्ष प्राण-प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण करना चाहिए। मकर तथा कुंभ लग्न वाले जातक ग्यारह मुखी रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं।

ध्यान रखें, मकर तथा कुंभ दोनों लग्नों वाले जातकों को बैंक मैनेजर, बैंक कर्मचारी, बैंक, सिविल इंजीनियर, इलेक्ट्रिकल इंजीनियर, क्लर्क, टाइपिस्ट, डिजायनर आदि धारण कर अपने-अपने क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

मीन राशि: मीन राशि का स्‍वामी बृहस्‍पति है। इस राशि के जातकों का स्‍वास्‍थ्‍य अकसर खराब रहता है। मीन राशि के जातकों को 5 मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
आप सौभाग्य वृद्धि हेतु तीन मुखी, पांच मुखी अथवा गौरी शंकर रुद्राक्ष प्राण प्रतिष्ठित एवं सिद्ध किया हुआ धारण कर सकते हैं। मीन लग्न वाले जातक के लिए दो मुखी रुद्राक्ष धारण करना उपयोगी होता है। इसे कालाग्नि के रूप में भी जाना जाता है। इसको पहनना आपको ताकत और ज्ञान प्रदान करता है। यह रुद्राक्ष धनु और मीन राशि के लिए बहुत फायदेमंद है। शिक्षा ग्रह करने संबंधी समस्या को दूर करने के लिए यह रुद्राक्ष बहुत प्रभावी है।

👉🏻👉🏻👉🏻******कैरियर में सफलता के लिए न्यायाधीशों तथा वकीलों को दो मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।

👉🏻👉🏻👉🏻*****आर्थिक समृद्धि हेतु: –
आर्थिक स्थिति में शीघ्र सुधार के लिए आपको प्राण-प्रतिष्ठित तथा सिद्ध किया हुआ गौरी-शंकर रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। इसके प्रभाव से आप की आय औरं ऐश्वर्यपूर्ण वस्तुओं के उपभोग में भी वृद्धि होगी। जीवन में उच्च सफलता की प्राप्ति हेतु: यदि जीवन में उच्च सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो आप एक मुखी से चैदह मुखी तक के रुद्राक्ष एक साथ, एक ही माला में धारण करें। इससे आपको निश्चय ही जीवन में सफलता मिल सकती है।

👉🏻👉🏻👉🏻*******प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफलता प्राप्ति हेतु: आज का युग प्रतिस्र्पधाओं का युग है। यदि आप प्रतियोगिता परीक्षायें बार-बार देने पर भी सफल नहीं हो पा रहे हैं तो आप को निश्चित रूप से प्राण-प्रतिष्ठित एवं सिद्ध एक मुखी रुद्राक्ष अथवा इसके अभाव में गणेश रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। इसके प्रभाव से आप को भगवान शिव एवं गणेश की कृपा प्राप्त होगी तथा आप सफलता के पथ पर अग्रसर होंगे।

👉🏻👉🏻👉🏻*******राहु ग्रह से संबंधी समस्या–राहु ग्रह दोष निवारण हेतु आप आठ मुखी रुद्राक्ष को धारण करें।इसे अष्टदेवी का रूप माना जाता है। इसको पहनकर आपको अष्टसिद्धियाँ प्राप्त हो सकती है। इसकी मदद से आपको अचानक वित्तीय लाभ हो सकता है और यह आपको काले जादू के प्रभाव से बचाता है। राहु ग्रह से संबंधी समस्या को दूर करने के लिए आप इसे पहन सकते है।

👉🏻👉🏻👉🏻*******बच्चों से संबंधीत समस्या निवारण हेतु आप ग्यारह मुखी रुद्राक्ष धारण करें। इसे भगवान शिव का रूप माना जाता है। बच्चों से संबंधी समस्या को दूर करने के लिए आप ये रुद्राक्ष पहन सकते है।

👉🏻👉🏻👉🏻आरोग्य तथा सौभाग्य के लिए जिन जातकों को स्वास्थ्य संबंधी कष्ट जैसे उच्च रक्त चाप, गैस कमजोरी आदि रहती है, उनको रुद्राक्ष, मोती, स्फटिक तथा हकीक मिश्रित सौभाग्य माला दीपावली के पावन पर्व पर धारण करनी चाहिए। इसके धारण करने से अनेक रोगों से बचाव तो होता ही है साथ ही स्मरण शक्ति और भाग्यवृद्धि भी होती है।

इस माला को प्रातःकाल बिना कुछ खाएं-पिए तथा स्नानोपरांत अपने इष्ट देव की पूजा करने के पश्चात शुभ मुहूर्त में धारण करना चाहिए।

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माथे पर तिल

यदि किसी व्यक्ति के माथे के बीच में तिल हो तो वह व्यक्ति शांत, बुद्धिमान, परिश्रमी और दिल का साफ होता है।

यदि किसी के माथे में दाहिनी ओर तिल हो तो वह व्यक्ति धनवान होता है।

यदि माथे में बायीं ओर तिल हो तो वह व्यक्ति स्वार्थी होता है।

भौंह पर तिल

भौंह के बीच में तिल होने का मतलब होता है कि उस व्यक्ति के अंदर एक लीडर की विशेषता होगी। उसके जीवन में आर्थिक संपन्नता आएगी।

यदि भौंह पर बायीं ओर तिल हो तो व्यक्ति डरपोक होगा और बिज़नेस और नौकरी में उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

वहीं भौंह पर दाहिनी ओर तिल है तो व्यक्ति को वैवाहिक जीवन में ख़ुशियाँ एवं संतान सुख प्राप्त होगा।

आँखों पर तिल

यदि किसी की दाहिनी आँख पर तिल का निशान हो तो वह व्यक्ति ईमानदार, मेहनती और विश्वास करने योग्य होता है।

बायीं आँख पर तिल का होना व्यक्ति के अंहकार और आशावादी सोच को दर्शाता है।

नाक पर तिल

ऐसा माना जाता है कि जिस व्यक्ति की नाक पर (ठीक बीच पर) तिल होता है तो वह क्रोधी और बिना सोचे-समझे निर्णय लेने वाला होता है।

यदि किसी की नाक की दाहिनी तरफ तिल हो तो वह व्यक्ति कम मेहनत के बल पर अधिक धन पाने में कामयाब होता है।

यदि नाक की बायीं ओर तिल हो तो व्यक्ति को सफलता पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

यदि नाक के नीचे तिल हो तो व्यक्ति कामुक और विपरीत लिंग को आकर्षित करने वाला होगा।

गाल पर तिल

जिसके बायें गाल पर तिल हो तो वह व्यक्ति अल्पभाषी, अधिक गुस्से वाला और धन ख़र्च करने वाला होता है।

यदि किसी के दायें गाल पर तिल हो तो व्यक्ति का स्वभाव आक्रामक होता है। इसके अलावा वह तर्कवादी और धन कमाने में अग्रणी होता है।

कान पर तिल

यदि किसी के कान पर तिल हो तो उसका जीवन भौतिक सुखों से युक्त होता है।

यदि कान के ठीक ऊपर तिल हो तो व्यक्ति बुद्धिमान होता है।

होंठ पर तिल

यदि किसी व्यक्ति के होंठ पर तिल होता है तो उन्हें अपने खान-पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि उन्हें मोटापा और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हो सकती हैं।

यदि आपके नीचे वाले होंठ पर तिल है तो आप फूडी नेचर के होंगे। इसके अलावा नाटक में आपकी विशेष रुचि होगी।

जीभ पर तिल

यदि किसी शख्स की जीभ पर तिल है तो उसे स्वास्थ्य, शिक्षा एवं स्पीच संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।

यदि किसी व्यक्ति की जीभ की नोक पर तिल हो तो वह व्यक्ति बहुत कूटनीतिज्ञ होता है। वह परिस्थितियों को काबू करने में सक्षम होता है। वह व्यक्ति अधिक फूडी भी होता है।

ठोड़ी पर तिल

यदि किसी की ठोड़ी के बीच पर तिल होता है तो उस व्यक्ति को यात्रा करना अच्छा लगता है। उसे नई-नई जगहों पर जाना पसंद होता है।

यदि किसी की ठोड़ी के दाहिने हिस्से में तिल हो तो वह व्यक्ति तर्कवादी और कूटनीतिक विचारों वाला होता है।

वहीं जिस व्यक्ति की ठोड़ी पर बायीं ओर तिल हो तो वह व्यक्ति ईमानदार और स्पष्टवादी होता है।

गर्दन पर तिल

यदि किसी व्यक्ति की गर्दन पर ठीक सामने तिल हो तो वह भाग्यशाली और कला से निपुण होता है।

वहीं गर्दन के पीछे वाले भाग पर तिल का होना व्यक्ति के क्रोधी को स्वभाव को दर्शाता है।

कंधे पर तिल

यदि किसी व्यक्ति के बायें कंधे पर तिल का निशान हो तो वह व्यक्ति ज़िद्दी स्वभाव का होता है।

यदि किसी व्यक्ति के दायें कंधे पर तिल का निशान हो तो वह साहसी और बुद्धिमान होता है।

भुजा पर तिल

यदि किसी व्यक्ति की दाहिनी भुजा में तिल हो तो वह बुद्धिमान और चालाक होता है।

बायीं भुजा में तिल का होना व्यक्ति की भौतिक सुखों की कामना को दर्शाता है लेकिन वास्तव में वह सामान्य जीवन जीता है।

कोहनी पर तिल

यदि किसी व्यक्ति की कोहनी पर तिल हो तो उसका मतलब होता है कि वह व्यक्ति बेचैन, कला में निपुण, धनी और ट्रैवल लवर होगा।

कलाई पर तिल

यदि किसी व्यक्ति की कलाई पर तिल होता है तो वह व्यक्ति कलात्मक होता है। उसके मन में नए-नए विचार आते हैं। ऐसे लोग अच्छे पेंटर और लेखक होते हैं।

हथेली पर तिल

यदि किसी की हथेली पर तिल का निशान हो तो उस व्यक्ति को कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

उंगली पर तिल

ऐसा कहा जाता है कि जिसकी उंगलियों पर तिल का निशान होता है। वह व्यक्ति विश्वासपात्र नहीं होता है। उसे चीज़ों को बढ़ा चढाकर कहने की आदत होती है।

पसलियों पर तिल

दाहिनी पसली पर तिल का निशान यह बताता है कि व्यक्ति झूठ बोलने में माहिर और कई चीज़ों से भयभीत होता है।

वहीं बायीं पसली पर तिल व्यक्ति के सामान्य जीवन को दर्शाता है।

पीठ पर तिल

पीठ पर रीढ़ की हड्डी के आसपास का तिल का होना सक्सेस, फेम और लीडरशिप को बताता है।

यदि किसी व्यक्ति के शोल्डर ब्लेड्स के नीचे तिल हो तो उस व्यक्ति को जीवन में संघर्ष करना पड़ेगा।

यदि किसी व्यक्ति के शोल्डर ब्लेड्स के ऊपर तिल का निशान हो तो वह व्यक्ति साहस के साथ चुनौतियों का सामना करता है।

सीने पर तिल

जिस व्यक्ति के सीने पर तिल का निशान होता है उसकी कामुक प्रवृत्ति तीक्ष्ण होती है।

जिन महिलाओं के दाहिने सीने में तिल का निशान होता है तो उनके अंदर ड्रग्स और शराब के अलावा अन्य प्रकार का नशा करने की प्रवृत्ति पायी जाती है। वहीं यदि पुरुष के सीने में दाहिनी ओर तिल हो तो उसे आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

जिन पुरुषों के सीने में बायीं ओर तिल का निशान होता है तो वे चतुर स्वभाव के होते हैं लेकिन दोस्तों और रिश्तेदारों से उनके संबंध अच्छे नहीं रहते हैं। वहीं महिलाओं के बायें सीने में तिल हो तो वे शांत स्वभाव की होती हैं और परिवार, रिश्तेदारों और सहकर्मियों से उनके अच्छे संबंध होते हैं।

नाभि पर तिल

जिन महिलाओं की नाभि में अथवा इसके अासपास तिल का निशान होता है तो ऐसी महिलाओं का वैवाहिक जीवन सुखी होता है।

किसी पुरुष के नाभि पर बायीं ओर तिल का निशान उसके समृद्ध जीवन को दर्शाता है। उसकी संतान को भी प्रसिद्धि मिलती है।

पेट पर तिल

पेट पर तिल का निशान किसी व्यक्ति को हमेशा जोशीला बनाए रखता है।

अगर किसी पुरुष के उदर पर दाहिनी ओर तिल हो वह उसके मजबूत आर्थिक पृष्ठभूमि को दिखाता है। वहीं महिलाओं के लिए यह कमज़ोरी को दर्शाता है।

यदि पेट पर दाहिनी ओर तिल हो तो आमदनी की सुगमता को दर्शाता है।

नितंब पर तिल

जिन लोगों के दोनों नितंब पर तिल हो तो ऐसे व्यक्ति ख़ुशमिजाज़, प्रिय और विश्वास योग्य होते हैं।

जिनके दायीं नितंब पर तिल हो तो ऐसे व्यक्ति क्रिएटिव और बुद्धिमान होते हैं।

जिन लोगों के बायें नितंब पर तिल होता है तो ऐसे लोग सामान्य आमदनी के बावजूद अपने जीवन से संतुष्ट दिखाई देते हैं।

गुप्तांग पर तिल

जिन लोगों के गुप्तांग पर तिल का निशान होता है ऐसे लोग खुले विचार वाले और ईमानदार होते हैं। इसके अलावा ऐसे लोग अधिक रोमांटिक होते हैं और उनका वैवाहिक जीवन सुखी रहता है। भौतिक सुखों के अभाव के बावजूद भी ये लोग संतुष्ट रहते हैं।

जांघ पर तिल

जिन लोगों की दायीं जंघा पर दिल का निशान हो तो ऐसे लोग मध्यम स्वभावी और निडर होते हैं।

बायीं जांघ पर तिल का निशान किसी व्यक्ति की कलात्मक क्षमता को दर्शाता है लेकिन ऐसे व्यक्ति आलसी और अधिक सामाजिक नहीं होते हैं।

घुटने पर तिल

यदि किसी व्यक्ति के बायें घुटने पर तिल का निशान हो तो ऐसे व्यक्ति साहसी और रिस्क लेने वाले होते हैं। ऐसे लोग एक राजा की तरह अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

जिन लोगों के दायें घुटने पर तिल होता है ऐसे लोगों का प्रेमजीवन कामयाब होता है। ऐसे लोग सभी से मित्र जैसा व्यवहार करते हैं।

पिण्डली पर तिल

दायीं पिंडली पर तिल का होना अच्छा माना जाता है। ऐसे लोग कामयाब और समृद्धिशाली होते हैं। ऐसे व्यक्ति राजनीति में अधिक सक्रिय होते हैं और महिलाओं के द्वारा इन्हें अधिक सहयोग प्राप्त होता है।

बायीं पिण्डली पर तिल वाले व्यक्ति मेहनती होते हैं। उन्हें काम के सिलसिले में यात्रा करनी पड़ती है और उनके मित्रों की संख्या अधिक होती है।

टाँग पर तिल

जिन लोगों के टांग पर तिल होता है ऐसे व्यक्ति बिना सोचे समझें कार्य करते हैं। वे परिणाम की चिंता नहीं करते हैं। इसलिए ऐसे लोग अक्सर कंट्रोवर्सी में घिरे रहते हैं।

टखने पर तिल

यदि किसी के दायें टखने पर तिल होता है तो ऐसे व्यक्ति संभावित अनुमान लगाने वाले और अधिक बातूनी होते हैं। जबकि बायें टखने पर तिल के निशान वाले लोग अधिक धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं।

पैर पर तिल

यदि किसी व्यक्ति के दायें पाँव पर तिल का निशान हो तो ऐसे लोगों को अच्छा जीवनसाथी प्राप्त होता है और उनका पारिवारिक जीवन संतोषजनक रहता है।

अगर बायें पैर पर तिल हो तो व्यक्ति को आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है और जीवनसाथी से भी उसके मतभेद रहते हैं।

यदि तलवे पर तिल हो तो स्वास्थ्य संबंधी परेशानी, दुश्मनों से चुनौती आदि का सामना करना पड़ता है।

पैर की उंगलियों पर तिल

यदि किसी के पैर की उंगलियों पर तिल हो तो ऐसे व्यक्तियों का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं होता है।

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इन उपायों (टोटकों) से होगी व्यापार वृद्धि—

👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻 अगर आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हों, तो मन्दिर में केले के दो पौधे (नर-मादा) लगा दें।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
अगर आप अमावस्या के दिन पीला त्रिकोण आकृति की पताका विष्णु मन्दिर में ऊँचाई वाले स्थान पर इस प्रकार लगाएँ कि वह लहराता हुआ रहे, तो आपका भाग्य शीघ्र ही चमक उठेगा। झंडा लगातार वहाँ लगा रहना चाहिए। यह अनिवार्य शर्त है।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
देवी लक्ष्मी के चित्र के समक्ष नौ बत्तियों का घी का दीपक जलाए, उसी दिन धन लाभ होगा।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
एक नारियल पर कामिया सिन्दूर, मोली, अक्षत अर्पित कर पूजन करें। फिर हनुमान जी के मन्दिर में चढ़ा आएँ। धन लाभ होगा।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
शनिवार शाम को पीपल के वृक्ष की जड़ में तेल का दीपक जला दें। फिर वापस घर आ जाएँ एवं पीछे मुड़कर न देखें। धन लाभ होगा।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
प्रात:काल पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाएँ तथा अपनी सफलता की मनोकामना करें और घर से बाहर शुद्ध केसर से स्वस्तिक बनाकर उस पर पीले पुष्प और अक्षत चढ़ाए । घर से बाहर निकलते समय दाहिना पाँव पहले बाहर निकालें।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
एक हंडिया में सवा किलो हरी साबुत मूंग की दाल, दूसरी में सवा किलो डलिया वाला नमक भर दें। यह दोनों हंडिया घर में कहीं रख दें। यह क्रिया बुधवार को करें। घर में धन आना शुरू हो जाएगा।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
प्रत्येक मंगलवार को 11 पीपल के पत्ते लें। उनको गंगाजल से अच्छी तरह धोकर लाल चन्दन से हर पत्ते पर 7 बार राम लिखें। इसके बाद हनुमान जी के मन्दिर में चढ़ा आएं तथा वहां प्रसाद बाटें और इस मंत्र का जाप जितना कर सकते हो करें। `
“जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करो गुरू देव की नांई” 7 मंगलवार लगातार जप करें। प्रयोग गोपनीय रखें। अवश्य लाभ होगा।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
अगर नौकरी में तरक्की चाहते हैं, तो 7 तरह का अनाज चिड़ियों को डालें।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
ऋग्वेद (4/32/20-21) का प्रसिद्ध मन्त्र इस प्रकार है –

`ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि। ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।।´
(हे लक्ष्मीपते ! आप दानी हैं, साधारण दानदाता ही नहीं बहुत बड़े दानी हैं। आप्तजनों से सुना है कि संसारभर से निराश होकर जो याचक आपसे प्रार्थना करता है उसकी पुकार सुनकर उसे आप आर्थिक कष्टों से मुक्त कर देते हैं – उसकी झोली भर देते हैं। हे भगवान मुझे इस अर्थ संकट से मुक्त कर दो।)
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
निम्न मन्त्र को शुभ मुहूर्त्त में प्रारम्भ करें। प्रतिदिन नियमपूर्वक 5 माला श्रद्धा से भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करके,

जप करता रहे –
“ॐ क्लीं नन्दादि गोकुलत्राता दाता दारिद्र्यभंजन।
सर्वमंगलदाता च सर्वकाम प्रदायक:। श्रीकृष्णाय नम:।।”
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष भरणी नक्षत्र के दिन चार घड़ों में पानी भरकर किसी एकान्त कमरे में रख दें। अगले दिन जिस घड़े का पानी कुछ कम हो उसे अन्न से भरकर प्रतिदिन विधिवत पूजन करते रहें। शेष घड़ों के पानी को घर, आँगन, खेत आदि में छिड़क दें। अन्नपूर्णा देवी सदैव प्रसन्न रहेगीं।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
ध्यान रखें, किसी शुभ कार्य के जाने से पहले –

रविवार को पान का पत्ता साथ रखकर जायें।
सोमवार को दर्पण में अपना चेहरा देखकर जायें।
मंगलवार को मिष्ठान खाकर जायें।
बुधवार को हरे धनिये के पत्ते खाकर जायें।
गुरूवार को सरसों के कुछ दाने मुख में डालकर जायें।
शुक्रवार को दही खाकर जायें।
शनिवार को अदरक और घी खाकर जाना चाहिये।
👉🏻👉🏻👉🏻👉🏻
किसी भी शनिवार की शाम को उड़द की दाल के दाने लें। उस पर थोड़ी सी दही और सिन्दूर लगाकर पीपल के वृक्ष के नीचे रख दें और बिना मुड़कर देखे वापिस आ जायें। सात शनिवार लगातार करने से आर्थिक समृद्धि तथा खुशहाली बनी रहेगी..।।
शुभमस्तु।।
कल्याण हो।।

यह भी पढ़ें : समझें विवाह पूर्व वर-वधु के गुण-चिह्न मिलान के महत्व, तरीके और लाभ…

विवाह से पूर्व सिर्फ वर-वधू का गुण मिलान करना ही ज्योतिष में पर्याप्त नहीं होता।
पण्डित दयानन्द शास्त्री बताते है कि यदि योग्य ओर अनुभवी विद्वान ज्योतिर्विद कन्या की षोडशवर्गीय कुंंडली को शूक्ष्मता से देख ले तो ससुराल की समस्त जानकारी पूर्व में ही जान सकता है।
कन्या का विवाह के लिए वर-वधू की कुंडली का गुण मिलान करते हैं. किंतु इसके पूर्व उन्हें यह देखना चाहिए कि लड़की का विवाह किस उम्र में, किस दिशा में तथा कैसे घर में होगा?

उसका पति किस स्वभाव का, किस सामाजिक स्तर का तथा कितने भाई-बहनों वाला होगा? लड़की की जन्म कुंडली से उसके होने वाले पति एवं ससुराल के विषय में सब कुछ स्पष्टतः पता चल सकता है

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि वैदिक ज्योतिष शास्त्र के सूत्रों के अनुसार लड़की की जन्म कुंडली में लग्न से सप्तम भाव उसके जीवन, पति, दाम्पत्य जीवन तथा वैवाहिक संबंधों का भाव है. इस भाव से उसके होने वाले पति का कद, रंग, रूप, चरित्र, स्वभाव, आर्थिक स्थिति, व्यवसाय या कार्यक्षेत्र, परिवार से संबंध आदि की जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

किसी भी कन्या की जन्म कुंंडली के त्रतीय और नवम भाव के आधार पर देवर, जेठ, ननदों का व्योरा, स्वभाव आदि की जानकारी मिल सकती हें।

दशम भाव से सासूजी, चतुर्थ भाव से स्वसुर, एवं अष्टम भाव से उनके कुटुंब परिवार की स्थिती और स्वभाव को जाना जा सकता है.
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कितनी दूर होगा ससुराल होगा ??
सप्तम भाव में अगर वृषभ, सिंह, वृश्चिक या कुंभ राशि स्थित हो, तो लड़की की शादी उसके जन्म स्थान से 90 किलोमीटर के अंदर ही होगी. यदि सप्तम भाव में चंद्र, शुक्र तथा गुरु हों, तो लड़की की शादी जन्म स्थान के समीप होगी. यदि सप्तम भाव में चर राशि मेष, कर्क, तुला या मकर हो, तो विवाह उसके जन्म स्थान से 200 किलोमीटर के अंदर होगा. अगर सप्तम भाव में द्विस्वभाव राशि मिथुन, कन्या, धनु या मीन राशि स्थित हो, तो विवाह जन्म स्थान से 80 से 100 किलोमीटर की दूरी पर होगा. यदि सप्तमेश सप्तम भाव से द्वादश भाव के मध्य हो, तो विवाह विदेश में होगा या लड़का शादी करके लड़की को अपने साथ लेकर विदेश चला जाएगा।
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जानिए किस उम्र में (कब) होगा विवाह ??
यदि जातक या जातका की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में सप्तमेश बुध हो और वह पाप ग्रह से प्रभावित न हो, तो शादी 13 से 18 वर्ष की आयु सीमा में होता है. सप्तम भाव में सप्तमेश मंगल पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो शादी 18 वर्ष के अंदर होगी. शुक्र ग्रह युवा अवस्था का द्योतक है. सप्तमेश शुक्र पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो 25 वर्ष की आयु में विवाह होगा. चंद्रमा सप्तमेश होकर पापी ग्रह से प्रभावित हो, तो विवाह 22 वर्ष की आयु में होगा. बृहस्पति सप्तम भाव में सप्तमेश होकर पापी ग्रहों से प्रभावित न हो, तो शादी 27-28 वें वर्ष में होगी. सप्तम भाव को सभी ग्रह पूर्ण दृष्टि से देखते हैं तथा सप्तम भाव में शुभ ग्रह से युक्त हो कर चर राशि हो, तो जातिका का विवाह दी गई आयु में संपन्न हो जाता है. यदि किसी लड़की या लड़के की जन्मकुंडली में बुध स्वराशि मिथुन या कन्या का होकर सप्तम भाव में बैठा हो, तो विवाह बाल्यावस्था में होगा।

आयु के जिस वर्ष में गोचरस्थ गुरु लग्न, तृतीय, पंचम, नवम या एकादश भाव में आता है, उस वर्ष शादी होना निश्चित समझना चाहिए. परंतु शनि की दृष्टि सप्तम भाव या लग्न पर नहीं होनी चाहिए. अनुभव में देखा गया है कि लग्न या सप्तम में बृहस्पति की स्थिति होने पर उस वर्ष शादी हुई है।

विवाह कब होगा यह जानने की दो विधियां यहां प्रस्तुत हैं–

जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में स्थित राशि अंक में 10 जोड़ दें. योगफल विवाह का वर्ष होगा. सप्तम भाव पर जितने पापी ग्रहों की दृष्टि हो, उनमें प्रत्येक की दृष्टि के लिए 4-4 वर्ष जोड़ योगफल विवाह का वर्ष होगा.
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जानिए किस दिशा में होगा विवाह ?? :-
जहां तक विवाह की दिशा का प्रश्न है, ज्योतिष के अनुसार गणित करके इसकी जानकारी प्राप्त की जा सकती है. जन्मांग में सप्तम भाव में स्थित राशि के आधार पर शादी की दिशा ज्ञात की जाती है. उक्त भाव में मेष, सिंह या धनु राशि एवं सूर्य और शुक्र ग्रह होने पर पूर्व दिशा, वृषभ, कन्या या मकर राशि और चंद्र, शनि ग्रह होने पर दक्षिण दिशा, मिथुन, तुला या कुंभ राशि और मंगल, राहु, केतु ग्रह होने पर पश्चिम दिशा, कर्क, वृश्चिक, मीन या राशि और बुध और गुरु ग्रह होने पर उत्तर दिशा की तरफ शादी होगी. अगर जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो और उस भाव पर अन्य ग्रह की दृष्टि न हो, तो बलवान ग्रह की स्थिति राशि में शादी की दिशा समझनी चाहिए.

एक अन्य नियम के अनुसार शुक्र जन्म लग्न कुंडली में जहां कहीं भी हो, वहां से सप्तम भाव तक गिनें. उस सप्तम भाव की राशि स्वामी की दिशा में शादी होनी चाहिए।

जैसे अगर किसी कुंडली में शुक्र नवम भाव में स्थित है, तो उस नवम भाव से सप्तम भाव तक गिनें तो वहां से सप्तम भाव वृश्चिक राशि हुई. इस राशि का स्वामी मंगल हुआ. मंगल ग्रह की दिशा दक्षिण है. अतः शादी दक्षिण दिशा में करनी चाहिए।
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जानिए कैसा होगा जीवनसाथी :-
कुंंडली में सप्तमेश अगर शुभ ग्रह (चंद्रमा, बुध, गुरु या शुक्र) हो या सप्तम भाव में स्थित हो या सप्तम भाव को देख रहा हो, तो लड़की का पति सम आयु या दो-चार वर्ष के अंतर का, गौरा और सुंदर होना चाहिए. अगर सप्तम भाव पर या सप्तम भाव में पापी ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु या केतु का प्रभाव हो, तो बड़ी आयु वाला अर्थात लड़की की उम्र से 5 वर्ष बड़ी आयु का होगा. सूर्य का प्रभाव हो, तो गौरांग, आकर्षक चेहरे वाला, मंगल का प्रभाव हो, तो लाल चेहरे वाला होगा. शनि अगर अपनी राशि का उच्च न हो, तो वर काला या कुरूप तथा लड़की की उम्र से काफी बड़ी आयु वाला होगा. अगर शनि उच्च राशि का हो, तो, पतले शरीर वाला गोरा तथा उम्र में लड़की से 12 वर्ष बड़ा होगा।

सप्तमेश अगर सूर्य हो, तो पति गोल मुख तथा तेज ललाट वाला, आकर्षक, गोरा सुंदर, यशस्वी एवं राजकर्मचारी होगा. चंद्रमा अगर सप्तमेश हो, तो पति शांत चित्त वाला गौर वर्ण का, मध्यम कद तथा, सुडौल शरीर वाला होगा. मंगल सप्तमेश हो, तो पति का शरीर बलवान होगा. वह क्रोधी स्वभाव वाला, नियम का पालन करने वाला, सत्यवादी, छोटे कद वाला, शूरवीर, विद्वान तथा भ्रातृ-प्रेमी होगा तथा सेना, पुलिस या सरकारी सेवा में कार्यरत होगा.
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कैसा होगा ससुराल का परिवार :-
लड़की की जन्म लग्न कुंडली में सप्तम भाव से तृतीय भाव अर्थात नवम भाव उसके पति के भाई-बहन का स्थान होता है. उक्त भाव में स्थित ग्रह तथा उस पर दृष्टि डालने वाले ग्रह की संख्या से 2 बहन, मंगल से 1 भाई व 2 बहन, बुध से 2 भाई 2 बहन वाला कहना चाहिए. लड़की की जन्मकुंडली में पंचम भाव उसके पति के बड़े भाई-बहन का स्थान है. पंचम भाव में स्थित ग्रह तथा दृष्टि डालने वाले ग्रहों की कुल संख्या उसके पति के बड़े भाई-बहन की संख्या होगी. पुरुष ग्रह से भाई तथा स्त्री ग्रह से बहन समझना चाहिए.
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कैसा होगा ससुराल का मकान :-
लड़की की जन्म लग्न कुंडली में उसके लग्न भाव से तृतीय भाव पति का भाग्य स्थान होता है. इसके स्वामी के स्वक्षेत्री या मित्रक्षेत्री होने से पंचम और राशि वृद्धि से या तृतीयेश से पंचम जो राशि हो, उसी राशि का श्वसुर का गांव या नगर होगा. प्रत्येक राशि में 9 अक्षर होते हैं। राशि स्वामी यदि शत्रुक्षेत्री हो, तो प्रथम, द्वितीय अक्षर, सम राशि का हो, तो तृतीय, चतुर्थ अक्षर मित्रक्षेत्री हो, तो पंचम, षष्ठम अक्षर, अपनी ही राशि का हो तो सप्तम, अष्टम अक्षर, उच्च क्षेत्री हो, तो नवम अक्षर प्रसिद्ध नाम होगा. तृतीयेश के शत्रुक्षेत्री होने से जिस राशि में हो उससे चतुर्थ राशि ससुराल या भवन की होगी. यदि तृतीय से शत्रु राशि में हो और तृतीय भाव में शत्रु राशि में पड़ रहा हो, तो दसवी राशि ससुर के गांव की होगी. लड़की की कुंडली में दसवां भाव उसके पति का भाव होता है. दशम भाव अगर शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो, या दशमेश से युक्त या दृष्ट हो, तो पति का अपना मकान होता है. राहु, केतु, शनि, से भवन बहुत पुराना होगा. मंगल ग्रह में मकान टूटा होगा. सूर्य, चंद्रमा, बुध, गुरु एवं शुक्र से भवन सुंदर, मजबूत व बहुमंजिला होगा. अगर दशम स्थान में शनि बलवान हो, तो मकान भव्य मिलेगा.
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कैसी होगी पति की नौकरी/रोजगार :-
लड़की की जन्म लग्न कुंडली में चतुर्थ भाव पति का राज्य भाव होता है. अगर चतुर्थ भाव बलयुक्त हो और चतुर्थेश की स्थिति या दृष्टि से युक्त सूर्य, मंगल, गुरु, शुक्र की स्थिति या चंद्रमा की स्थिति उत्तम हो, तो अच्छी नौकरी का संयोग बनता है.
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कैसी होगी पति की आयु:-
लड़की के जन्म लग्न में द्वितीय भाव उसके पति की आयु भाव है. अगर द्वितीयेश शुभ स्थिति में हो या अपने स्थान से द्वितीय स्थान को देख रहा हो, तो पति दीर्घायु होता है. अगर द्वितीय भाव में शनि स्थित हो या गुरु सप्तम भाव, द्वितीय भाव को देख रहा हो, तो भी पति की आयु 75 वर्ष की होती है।
इन सभी मूल ज्योतिषीय सिद्धातों के शूक्ष्म परीक्षण एवं षोडशवर्गीय कुंंडली के गहन विष्लेषण से पति, ससुराल और वैवाहिक जीवन के प्रत्येक पहलू को एक योग्य विद्वान ज्योतिषी सहजता से जान सकता है।

यह भी जानें : अपनी मनोकामनानुसार कैसे शिवलिंग की करनी चाहिये पूजा और यहां से करें महादेव शिव के 108 नामों का जाप..

सृष्टि के आरम्भ से ही ब्रह्मा आदि सभी देवता, रामावतार में भगवान श्रीराम, ऋषि-मुनि, यक्ष, विद्याधर, सिद्धगण, पितर, दैत्य, राक्षस, पिशाच, किन्नर आदि विभिन्न प्रकार के शिवलिंगों का पूजन करते आए हैं। जहां शिवलिंग की उपासना से देवताओं को स्वर्ग का राज्य, कुबेर को लंका का निवास, मन के समान वेगशाली पुष्कर विमान, लोकपाल का पद तथा राज्य-सम्पत्ति प्राप्त हुई; मार्कण्डेय, लोमश आदि ऋषियों को दीर्घ आयु, ज्ञान आदि की प्राप्ति हुई; वहीं पृथ्वी पर राजाओं ने शिवपूजन से अष्ट सिद्धि नवनिधि के साथ चक्रवर्ती साम्राज्य प्राप्त किया । इसलिए लिंग के रूप में सदैव भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए । लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में भगवान विष्णु व ऊपरी भाग में प्रणव रूप में भगवान शिव विराजमान रहते हैं । लिंग की वेदी पार्वती हैं और लिंग महादेव हैं । जो वेदी के साथ लिंग की पूजा करता है उसने शिव और पार्वती का पूजन कर लिया ।
ब्रह्माजी की आज्ञा से विश्वकर्मा ने विभिन्न पदार्थों से शिवलिंगों का निर्माण कर देवताओं को दिए ।

लेखक : ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री

🌼🌺किस देवता ने की किस प्रकार के शिवलिंग की पूजा 🌺🌼

विष्णु ने सदा नीलकान्तमणि (नीलम) से बने लिंग की पूजा की;
इन्द्र ने पद्मरागमणि (पुखराज) से निर्मित लिंग की;
कुबेर ने सोने के लिंग की;
विश्वेदेवों ने चांदी के शिवलिंग की;
वसुओं ने चन्द्रकान्तमणि से बने लिंग की;
वायु ने पीतल से बने लिंग की;
अश्विनीकुमारों ने मिट्टी से बने लिंग की;
वरुण ने स्फटिक के लिंग की;
आदित्यों ने तांबे से बने लिंग की;
सोमराट् ने मोती से बने लिंग की
अनन्त आदि नागों ने प्रवाल (मूंगा) निर्मित लिंग की;
दैत्यों और राक्षसों ने लोहे से बने लिंग की;
चामुण्डा आदि सभी मातृशक्तियों ने बालू से बने लिंग की;
यम ने मरकतमणि (पन्न) से बने लिंग की;
रुद्रों ने भस्मनिर्मित लिंग की;
लक्ष्मी ने लक्ष्मीवृक्ष बेल से बने लिंग की;
गुह ने गोयम (गोबर) लिंग की;
मुनियों ने कुश के अग्रभाग से निर्मित लिंग की;
वामदेव ने पुष्पलिंग की;
सरस्वती ने रत्नलिंग की;
मन्त्रों ने घी से निर्मित लिंग की;
वेदों ने दधिलिंग की; और
पिशाचों ने सीस से बने लिंग की पूजा की ।

🌿🌷विभिन्न प्रकार के शिवलिंग की पूजा का फल🌷🌿
सुन्दर घर, बहुमूल्य आभूषण, सुन्दर पति/पत्नी, मनचाहा धन, अपार भोग और स्वर्ग का राज्य, ये सब शिवलिंग की पूजा के फल हैं । शिवोपासना करने वाले मनुष्य की न तो अकालमृत्यु होती है और न सर्दी या गर्मी आदि से ही उसकी मृत्यु होती है । लिंग विभिन्न वस्तुओं से बनाए जाते हैं और उनके पूजन का फल भी अलग होता है अत: अपनी मनोकामना के अनुसार शिवलिंग का चयन कर पूजन करना चाहिए ।
दो भाग कस्तूरी, चार भाग चंदन तथा तीन भाग कुंकुम से गंध लिंग बनाया जाता है । इसकी पूजा से शिव सायुज्य की प्राप्ति होती है ।
सुगन्धित पुष्पों से पुष्प लिंग बनाकर पूजा करने से राज्य की प्राप्ति होती है ।
बालु से ‘बालुकामय लिंग’ बनाकर पूजन करने से व्यक्ति शिव सायुज्य पाता है ।
आरोग्य लाभ के लिए मिश्री से ‘सिता खण्डमय लिंग’ का निर्माण किया जाता है ।
हरताल, त्रिकटु को लवण में मिलाकर ‘लवणज लिंग बनाया जाता है। यह वशीकरण करने वाला और सौभाग्य देने वाला है ।
भस्ममय लिंग सर्वफल प्रदायक माना गया है ।
जौ, गेहूँ और चावल के आटे का बने यव गोधूम शालिज लिंग के पूजन से स्त्री, पुत्र तथा श्री सुख की प्राप्ति होती है ।
तिल को पीस कर तिलपिष्टोत्थ लिंग बनाया जाता है । यह मनोकामना पूर्ण करता है ।
गुडोत्थ लिंग प्रीति में बढ़ोतरी करता है ।
वंशांकुर निर्मित लिंग बांस के अंकुर से बनाया जाता है । इससे वंश बढ़ता है ।
केशास्थि लिंग शत्रुओं का नाश करता है ।
दूध, दही से बने शिवलिंग का पूजन कीर्ति, लक्ष्मी और सुख देता है ।
रत्ननिर्मित लिंग लक्ष्मी प्रदान करने वाला है ।
पाषाण लिंग समस्त सिद्धियों को देने वाला है ।
धातुनिर्मित लिंग धन प्रदान करता है ।
काष्ठ लिंग भोगसिद्धि देने वाला है ।
दूर्वा से बना लिंग अकालमृत्यु का नाश करता है ।
कर्पूरज लिंग मुक्ति देने वाला है ।
मौक्तिक लिंग सौभाग्य देने वाला है ।
स्वर्ण लिंग महामुक्तिप्रद है ।
धान्यज लिंग धान्य देने वाला है ।
फलोत्थ लिंग फलप्रद है ।
नवनीत लिंग कीर्ति और सौभाग्य देने वाला है ।
धात्रीफल (आंवला) से बना लिंग मुक्ति देने वाला है।
पीतल और कांसे का लिंग मुक्ति देने वाला है ।
सीसे का लिंग शत्रुनाशक है ।
अष्टधातुज लिंग सर्वसिद्धि देने वाला है ।
स्फटिक लिंग सर्वकामप्रद होता है ।
मिट्टी से बना पार्थिव लिंग सभी सिद्धियों को देने वाला और शिवसायुज्य को देने वाला है ।
पारद लिंग का सबसे अधिक माहात्म्य है। ‘पारद’ शब्द में प=विष्णु, आ=कालिका, र= शिव, द= ब्रह्मा—ये सब स्थित होते हैं। पारदलिंग की एक बार भी पूजा करने से धन, ज्ञान, सिद्धि और ऐश्वर्य मिलते हैं ।
नर्मदा नदी के सभी कंकर ‘शंकर’ माने गए हैं। इन्हें नर्मदेश्वर या बाणलिंग भी कहते हैं। लिंगार्चन में बाणलिंग का अपना अलग ही महत्व है। यह हर प्रकार के भोग व मोक्ष देने वाला है।
✨कलियुग में इन चीजों से बने शिवलिंग की पूजा का है निषेध✨
तांबा, सीसा, रक्तचंदन, शंख, कांसा, लोहा—इनसे बने लिंगों की पूजा कलियुग में वर्जित है ।
शिव की उपासना में जहां रत्नों व मणियों से बने लिंगों की पूजा में अपार वैभव देखने को मिलता है, वहीं मिट्टी से शिवलिंग बनाकर केवल, जल, चावल और बिल्वपत्र अर्पित कर देने व ‘बम-बम भोले’ कहने से ही शिव कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है।
औढरदानी उदार अपार जु नैक सी सेवा तें ढुरि जावैं।
दमन अशान्ति, समन संकट विरद विचार जनहिं अपनावै ।।
ऐसे कपालु कृपामय देव के क्यों न सरन अबहिं चलि जावैं ।
बड़भागी नरनारि सोई जो साम्ब सदाशिव को नित ध्यावैं ।। (शिवाष्टक)

भगवान शिव के 108 नाम :-

१- ॐ भोलेनाथ नमः
२-ॐ कैलाश पति नमः
३-ॐ भूतनाथ नमः
४-ॐ नंदराज नमः
५-ॐ नन्दी की सवारी नमः
६-ॐ ज्योतिलिंग नमः
७-ॐ महाकाल नमः
८-ॐ रुद्रनाथ नमः
९-ॐ भीमशंकर नमः
१०-ॐ नटराज नमः
११-ॐ प्रलेयन्कार नमः
१२-ॐ चंद्रमोली नमः
१३-ॐ डमरूधारी नमः
१४-ॐ चंद्रधारी नमः
१५-ॐ मलिकार्जुन नमः
१६-ॐ भीमेश्वर नमः
१७-ॐ विषधारी नमः
१८-ॐ बम भोले नमः
१९-ॐ ओंकार स्वामी नमः
२०-ॐ ओंकारेश्वर नमः
२१-ॐ शंकर त्रिशूलधारी नमः
२२-ॐ विश्वनाथ नमः
२३-ॐ अनादिदेव नमः
२४-ॐ उमापति नमः
२५-ॐ गोरापति नमः
२६-ॐ गणपिता नमः
२७-ॐ भोले बाबा नमः
२८-ॐ शिवजी नमः
२९-ॐ शम्भु नमः
३०-ॐ नीलकंठ नमः
३१-ॐ महाकालेश्वर नमः
३२-ॐ त्रिपुरारी नमः
३३-ॐ त्रिलोकनाथ नमः
३४-ॐ त्रिनेत्रधारी नमः
३५-ॐ बर्फानी बाबा नमः
३६-ॐ जगतपिता नमः
३७-ॐ मृत्युन्जन नमः
३८-ॐ नागधारी नमः
३९- ॐ रामेश्वर नमः
४०-ॐ लंकेश्वर नमः
४१-ॐ अमरनाथ नमः
४२-ॐ केदारनाथ नमः
४३-ॐ मंगलेश्वर नमः
४४-ॐ अर्धनारीश्वर नमः
४५-ॐ नागार्जुन नमः
४६-ॐ जटाधारी नमः
४७-ॐ नीलेश्वर नमः
४८-ॐ गलसर्पमाला नमः
४९- ॐ दीनानाथ नमः
५०-ॐ सोमनाथ नमः
५१-ॐ जोगी नमः
५२-ॐ भंडारी बाबा नमः
५३-ॐ बमलेहरी नमः
५४-ॐ गोरीशंकर नमः
५५-ॐ शिवाकांत नमः
५६-ॐ महेश्वराए नमः
५७-ॐ महेश नमः
५८-ॐ ओलोकानाथ नमः
५४-ॐ आदिनाथ नमः
६०-ॐ देवदेवेश्वर नमः
६१-ॐ प्राणनाथ नमः
६२-ॐ शिवम् नमः
६३-ॐ महादानी नमः
६४-ॐ शिवदानी नमः
६५-ॐ संकटहारी नमः
६६-ॐ महेश्वर नमः
६७-ॐ रुंडमालाधारी नमः
६८-ॐ जगपालनकर्ता नमः
६९-ॐ पशुपति नमः
७०-ॐ संगमेश्वर नमः
७१-ॐ दक्षेश्वर नमः
७२-ॐ घ्रेनश्वर नमः
७३-ॐ मणिमहेश नमः
७४-ॐ अनादी नमः
७५-ॐ अमर नमः
७६-ॐ आशुतोष महाराज नमः
७७-ॐ विलवकेश्वर नमः
७८-ॐ अचलेश्वर नमः
७९-ॐ अभयंकर नमः
८०-ॐ पातालेश्वर नमः
८१-ॐ धूधेश्वर नमः
८२-ॐ सर्पधारी नमः
८३-ॐ त्रिलोकिनरेश नमः
८४-ॐ हठ योगी नमः
८५-ॐ विश्लेश्वर नमः
८६- ॐ नागाधिराज नमः
८७- ॐ सर्वेश्वर नमः
८८-ॐ उमाकांत नमः
८९-ॐ बाबा चंद्रेश्वर नमः
९०-ॐ त्रिकालदर्शी नमः
९१-ॐ त्रिलोकी स्वामी नमः
९२-ॐ महादेव नमः
९३-ॐ गढ़शंकर नमः
९४-ॐ मुक्तेश्वर नमः
९५-ॐ नटेषर नमः
९६-ॐ गिरजापति नमः
९७- ॐ भद्रेश्वर नमः
९८-ॐ त्रिपुनाशक नमः
९९-ॐ निर्जेश्वर नमः
१०० -ॐ किरातेश्वर नमः
१०१-ॐ जागेश्वर नमः
१०२-ॐ अबधूतपति नमः
१०३ -ॐ भीलपति नमः
१०४-ॐ जितनाथ नमः
१०५-ॐ वृषेश्वर नमः
१०६-ॐ भूतेश्वर नमः
१०७-ॐ बैजूनाथ नमः
१०८-ॐ नागेश्वर नमः
इन नामों का जप करने से समस्त सुखों की प्राप्ति होती है।

यहां जानें महादेव शिव के, मृत्यु को भी जीतने वाले महामृत्युंजय मंत्र व इसकी साधना के बारे में…

“महामृत्युंजय मंत्र” भगवान शिव का सबसे बड़ा मंत्र माना जाता है। हिन्दू धर्म में इस मंत्र को प्राण रक्षक और महामोक्ष मंत्र कहा जाता है। मान्यता है कि महामृत्युंजय मंत्र से शिवजी को प्रसन्न करने वाले जातक से मृत्यु भी डरती है। इस मंत्र को सिद्ध करने वाला जातक निश्चित ही मोक्ष को प्राप्त करता है।

मंत्र इस प्रकार है –

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

यह त्रयम्बक “त्रिनेत्रों वाला”, रुद्र का विशेषण जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया, को संबोधित है।

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p class=”in-block”>महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ

  • त्र्यंबकम् = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक)

  • यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय
  • सुगंधिम = मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
  • पुष्टिः = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता
  • वर्धनम् = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है, एक अच्छा माली
  • उर्वारुकम् = ककड़ी (कर्मकारक)
  • इव = जैसे, इस तरह
  • बन्धनात् = तना (लौकी का); (“तने से” पंचम विभक्ति – वास्तव में समाप्ति -द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)
  • मृत्योः = मृत्यु से
  • मुक्षीय = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
  • मा = न
  • अमृतात् = अमरता, मोक्ष

~ इस महामत्रँ से लाभ निम्न है –

  • धन प्राप्त होता
  • .जो आप सोच के जाप करते वह कार्य सफल होता
  • परिवार मे सुख सम्रद्बि रहती है
  • जिवन मे आगे बढते जाते है आप

~ जप करने कि विधि –

  • सुबह स्नान करते समय गिलास मे पानी लेकर मुह गिलास के पास रखकर ग्यारह बार मत्रँ का जप करे फिर उस पानी को अपने उपर प्रवाह कर ले, महादेव कि कृपा आप के उपर बनी रहगी।

यह मंत्र ऋषि मार्कंडेय द्वारा सबसे पहले पाया गया था।भगवान शिव को कालों का काल महाकाल कहा जाता है। मृत्यु अगर निकट आ जाए और आप महाकाल के महामृत्युंजय मंत्र का जप करने लगे तो यमराज की भी हिम्मत नहीं होती है कि वह भगवान शिव के भक्त को अपने साथ ले जाए।
इस मंत्र की शक्ति से जुड़ी कई कथाएं शास्त्रों और पुराणों में मिलती है जिनमें बताया गया है कि इस मंत्र के जप से गंभीर रुप से बीमार व्यक्ति स्वस्थ हो गए और मृत्यु के मुंह में पहुंच चुके व्यक्ति भी दीर्घायु का आशीर्वाद पा गए।
यही कारण है कि ज्योतिषी और पंडित बीमार व्यक्तियों को और ग्रह दोषों से पीड़ित व्यक्तियों को महामृत्युंजय मंत्र जप करवाने की सलाह देते हैं। शिव को अति प्रसन्न करने वाला मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र। लोगों कि धारणा है कि इसके जाप से व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती परंतु यह पूरी तरह सही अर्थ नहीं है।
महामृत्युंजय का अर्थ है महामृत्यु पर विजय अर्थात् व्यक्ति की बार-बार मृत्यु ना हो। वह मोक्ष को प्राप्त हो जाए। उसका शरीर स्वस्थ हो, धन एवं मान की वृद्धि तथा वह जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाए। महामृत्युञ्जय मंत्र यजुर्वेद के रूद्र अध्याय स्थित एक मंत्र है। इसमें शिव की स्तुति की गयी है। शिव को ‘मृत्यु को जीतने वाला’ माना जाता है।
कहा जाता है कि यह मंत्र भगवान शिव को प्रसन्न कर उनकी असीम कृपा प्राप्त करने का माध्यम है। इस मंत्र का सवा लाख बार निरंतर जप करने से आने वाली अथवा मौजूदा बीमारियां तथा अनिष्टकारी ग्रहों का दुष्प्रभाव तो समाप्त होता ही है, इस मंत्र के माध्यम से अटल मृत्यु तक को टाला जा सकता है।
हमारे वैदिक शास्त्रों और पुराणों में असाध्य रोगों से मुक्ति और अकाल मृत्यु से बचने के लिए महामृत्युंजय जप करने का विशेष उल्लेख मिलता है।
महामृत्युंजय भगवान शिव को खुश करने का मंत्र है। इसके प्रभाव से इंसान मौत के मुंह में जाते-जाते बच जाता है, मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की अद्भुत कृपा से जीवन पा लेता है। बीमारी, दुर्घटना, अनिष्ट ग्रहों के प्रभावों से दूर करने, मौत को टालने और आयु बढ़ाने के लिए सवा लाख महामृत्युंजय मंत्र जप करने का विधान है।
शिव के साधक को न तो मृत्यु का भय रहता है, न रोग का, न शोक का। शिव तत्व उनके मन को भक्ति और शक्ति का सामर्थ देता है। शिव तत्व का ध्यान महामृत्युंजय के रूप में किया जाता है। इस मंत्र के जप से शिव की कृपा प्राप्त होती है। सतयुग में मूर्ति पूजा कर सकते थे, पर अब कलयोग में सिर्फ मूर्ति पूजन काफी नहीं है। भविष्य पुराण यह बताया गया है कि महामृत्युंजय मंत्र का रोज़ जाप करने से उस व्यक्ति को अच्छा स्वास्थ्य, धन, समृद्धि और लम्बी उम्र मिलती है।
अगर आपकी कुंडली में किसी भी तरह से मास, गोचर, अंतर्दशा या अन्य कोई परेशानी है तो यह मंत्र बहुत मददगार साबित होता है।
अगर आप किसी भी रोग या बीमारी से ग्रसित हैं तो रोज़ इसका जाप करना शुरू कर दें, लाभ मिलेगा। यदि आपकी कुंडली में किसी भी तरह से मृत्यु दोष या मारकेश है तो इस मंत्र का जाप करें। इस मंत्र का जप करने से किसी भी तरह की महामारी से बचा जा सकता है साथ ही पारिवारिक कलह, संपत्ति विवाद से भी बचता है।
अगर आप किसी तरह की धन संबंधी परेशानी से जूझ रहें है या आपके व्यापार में घाटा हो रहा है तो इस मंत्र का जप करें। इस मंत्र में आरोग्यकर शक्तियां है जिसके जप से ऐसी दुवानियां उत्पन होती हैं जो आपको मृत्यु के भय से मुक्त कर देता है, इसीलिए इसे मोक्ष मंत्र भी कहा जाता है।
शास्त्रों के अनुसार इस मंत्र का जप करने के लिए सुबह 2 से 4 बजे का समय सबसे उत्तम माना गया है, लेकिन अगर आप इस वक़्त जप नहीं कर पाते हैं तो सुबह उठ कर स्नान कर साफ़ कपडे पहने फिर कम से कम पांच बार रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का जप करें।
स्नान करते समय शरीर पर लोटे से पानी डालते वक्त इस मंत्र का लगातार जप करते रहने से स्वास्थ्य-लाभ होता है। दूध में निहारते हुए यदि इस मंत्र का कम से कम 11 बार जप किया जाए और फिर वह दूध पी लें तो यौवन की सुरक्षा भी होती है। इस चमत्कारी मन्त्र का नित्य पाठ करने वाले व्यक्ति पर भगवान शिव की कृपा निरन्तंर बरसती रहती है।
महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है, लेकिन इस मंत्र के जप में कुछ सावधानियां बरतना चाहिए जिससे कि इसका संपूर्ण लाभ आपको मिले और आपको कोई हानि न हो। अगर आप नही कर पा रहे इस मंत्र का जाप जो किसी पंडित से जाप कराए यह आपके लिए और अधिक लाभकारी होगा। तीनों भुवनों की अपार सुंदरी गौरां को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप बड़ा अजीब है।
शरीर पर मसानों की भस्म, गले में सर्पों का हार, कंठ में विष, जटाओं में जगत-तारिणी पावन गंगा तथा माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल को वाहन के रूप में स्वीकार करने वाले शिव अमंगल रूप होने पर भी भक्तों का मंगल करते हैं और श्री-संपत्ति प्रदान करते हैं।
महारूद्र सदाशिव को प्रसन्न करने व अपनी सर्वकामना सिद्धि के लिए यहां पर पार्थिव पूजा का विधान है, जिसमें मिटटी के शिर्वाचन पुत्र प्राप्ति के लिए, श्याली चावल के शिर्वाचन व अखण्ड दीपदान की तपस्या होती है।
शत्रुनाश व व्याधिनाश हेतु नमक के शिर्वाचन, रोग नाश हेतु गाय के गोबर के शिर्वाचन, दस विधि लक्ष्मी प्राप्ति हेतु मक्खन के शिर्वाचन अन्य कई प्रकार के शिवलिंग बनाकर उनमें प्राण-प्रतिष्ठा कर विधि-विधान द्वारा विशेष पुराणोक्त व वेदोक्त विधि से पूज्य होती रहती है।
भारतीय संस्कृति में शिवजी को भुक्ति और मुक्ति का प्रदाता माना गया है। शिव पुराण के अनुसार वह अनंत और चिदानंद स्वरूप हैं। वह निर्गुण, निरुपाधि, निरंजन और अविनाशी हैं। वही परब्रह्म परमात्मा शिव कहलाते हैं। शिव का अर्थ है कल्याणकर्ता। उन्हें महादेव (देवों के देव) और महाकाल अर्थात काल के भी काल से संबोधित किया जाता है।
केवल जल, पुष्प और बेलपत्र चढ़ाने से ही प्रसन्न हो जाने के कारण उन्हें आशुतोष भी कहा जाता है। उनके अन्य स्वरूप अर्धनारीश्वर, महेश्वर, सदाशिव, अंबिकेश्वर, पंचानन, नीलकंठ, पशुपतिनाथ, दक्षिणमूर्ति आदि हैं। पुराणों में ब्रह्मा, विष्णु, श्रीराम, श्रीकृष्ण, देवगुरु बृहस्पति तथा अन्य देवी देवताओं द्वारा शिवोपासना का विवरण मिलता है।
जब किसी की अकालमृत्यु किसी घातक रोग या दुर्घटना के कारण संभावित होती हैं तो इससे बचने का एक ही उपाय है – महामृत्युंजय साधना। यमराज के मृत्युपाश से छुड़ाने वाले केवल भगवान मृत्युंजय शिव हैं जो अपने साधक को दीर्घायु देते हैं। इनकी साधना एक ऐसी प्रक्रिया है जो कठिन कार्यों को सरल बनाने की क्षमता के साथ-साथ विशेष शक्ति भी प्रदान करती है।
यह साधना श्रद्धा एवं निष्ठापूर्वक करनी चाहिए। इसके कुछ प्रमुख तथ्य यहां प्रस्तुत हैं, जिनका साधना काल में ध्यान रखना परमावश्यक है। अनुष्ठान शुभ दिन, शुभ पर्व, शुभ काल अथवा शुभ मुहूर्त में संपन्न करना चाहिए। मंत्रानुष्ठान प्रारंभ करते समय सामने भगवान शंकर का शक्ति सहित चित्र एवं महामृत्युंजय यंत्र स्थापित कर लेना चाहिए।
ज्योतिष अनुसार किसी जन्मकुण्डली में सूर्यादि ग्रहों के द्वारा किसी प्रकार की अनिष्ट की आशंका हो या मारकेश आदि लगने पर, किसी भी प्रकार की भयंकर बीमारी से आक्रान्त होने पर, अपने बन्धु-बन्धुओं तथा इष्ट-मित्रों पर किसी भी प्रकार का संकट आने वाला हो।
देश-विदेश जाने या किसी प्राकर से वियोग होने पर, स्वदेश, राज्य व धन सम्पत्ति विनष्ट होने की स्थिति में, अकाल मृत्यु की शान्ति एंव अपने उपर किसी तरह की मिथ्या दोषारोपण लगने पर, उद्विग्न चित्त एंव धार्मिक कार्यो से मन विचलित होने पर महामृत्युंजय मन्त्र का जप स्त्रोत पाठ, भगवान शंकर की आराधना करें।
यदि स्वयं न कर सके तो किसी पंडित द्वारा कराना चाहिए। इससे सद्बुद्धि, मनःशान्ति, रोग मुक्ति एंव सवर्था सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
अनिष्ट ग्रहों का निवारण मारक एवं बाधक ग्रहों से संबंधित दोषों का निवारण महामृत्युंजय मंत्र की आराधना से संभव है। मान्यता है कि बारह ज्योतिर्लिगों के दर्शन मात्र से समस्त बारह राशियों संबंधित शुभ फलों की प्राप्ति होती है। काल संबंधी गणनाएं ज्योतिष का आधार हैं तथा शिव स्वयं महाकाल हैं, अत: विपरीत कालखंड की गति महामृत्युंजय साधना द्वारा नियंत्रित की जा सकती है।

आइये जानते हैं भगवान शिव से जुड़े पांच अनोखे शिवलिंग के बारे में जिनके चमत्कारों ने लोगो को आश्चर्य में डाल रखा है????

महादेव शिव की महिमा अनोखी एवं निराली जहां अन्य सभी देवताओ के स्वरूप की पूजा की जाती है वही भगवान शिव शंकर जो निर्विकार , निराकार, ओमकार स्वरूप है उनकी लिंग के रूप में पूजा होती है।

परन्तु भगवान शिव की महिमा एवं उनकी अद्भुत लीलाएं यही समाप्त नहीं होती, भारत में अनेक ऐसे शिवलिंग है जो अपने चमत्कारी शक्तियों के लिए प्रसिद्ध है। भगवान शिव के कुछ शिवलिंगों में अपने आप जल की धारा बरसती है तो कुछ शिवलिंग का आकार दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।
भगवान शिव के कुछ शिवलिंग तो ऐसे है जिनका संबंध प्रलय से जुडा हुआ है। भगवान शिव के इन चमत्कारों के रहस्यों को जान्ने के लिए अनेको जगहों में तो विज्ञान भी फेल होता पाया गया है।

बाबा तिल भाण्डेश्वर महादेव :- बाबा तिल भाण्डेश्वर महादेव का मंदिर काशी के केदार खण्ड में स्थित है. कहते है की यह शिवलिंग सतयुग में प्रकट हुआ था तथा यह स्वयम्भू शिवलिंग है. इस शिवलिंग का वर्णन शिव पुराण धर्मग्रन्थ में भी मिलता है. वर्तमान में इस शिवलिंग का आधार कहा पर है यह आज तक एक रहस्य बना हुआ है।इस शिवलिंग के बारे में कहा जाता है की यह शिवलिंग सतयुग से द्वापर युग तक हर रोज एक तिल के आकर तक बढ़ते रहता है. लेकिन कलयुग के आरम्भ लोगो को यह चिंता सताने लगी की यदि भगवान शिव का शिवलिंग हर रोज इसी तरह बढ़ते रहा तो एक दिन पूरी दुनिया इस शिवलिंग में समाहित हो जायेगी।तब यहाँ लोगो ने शिव की आरधना की तथा भगवान शिव ने प्रसन्न होकर भक्तो को दर्शन दिए इसके साथ ही भगवान शिव ने यह वरदान भी दिया की अबसे में हर मकर संक्रांति को एक तिल बढ़कर भक्तो का कल्याण करूंगा। अत्यधिक प्राचीन इस मंदिर के विषय में अनेको मान्यताएं जुडी है. कहा जाता है की इसी स्थान पर विभांड ऋषि ने तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था. भगवान शिव ने उन्हें दर्शन देकर यहाँ स्वयम्भू शिवलिंग के रूप में स्थापित हुए थे। तथा उन्हें वरदान दिया की में कलयुग में एक आकर बढूंगा. भगवान शिव के इस अद्भुद शिवलिंग के दर्शन मात्र से मुक्ति का मार्ग परास्त होता है।

मृदेश्वर महादेव मंदिर :- गुजरात गोधरा में स्थित यह मंदिर भी प्रलय का संकेत देता है. बताया जाता है के यहाँ शिवलिंग का बढ़ता आकर कलयुग के धरती पर हावी होने की निशानी है. जिस दिन ये शिवलिंग आकर में साढ़े आठ फुट हो जाएगा तथा मंदिर के छत को छू लेगा वह दिन कलयुग का अंतिम चरण होगा। अर्थात उसके बाद पृथ्वी में प्रलय आ जायेगी और एक नए युग का प्रारम्भ होगा। लेकिन हम आपको बता दे की शिवलिंग को मंदिर के छत तक चुने में लाखो हजार वर्ष लग जाएंगे क्योकि शिवलिंग का आकर हर वर्ष एक चावल के आकार का बढ़ता है।मृदेश्वर मंदिर की एक विशेषता यह भी ही की इसमें स्वतः ही जल की धरा लगातार बहती रहती है तथा शिवलिंग का जलाभिषेक करती रहती है. सूखे एवं गर्मी में भी इस जल द्वारा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, यह जल धारा अविरल बहती रहती है।

पोडिवाल महादेव मंदिर :- हिमांचल प्रदेश में नहान से करीब 8 किलोमीटर दुरी पर स्थित पोडिवाल महादेव मंदिर है. इसका संबंध रावण से माना जाता है, कहा जाता है की रावण ने इसकी स्थापना करी थी। इसे स्वर्ग की दूसरी पड़ी के नाम से भी जाना जाता है।ऐसी मान्यता है की हर शिवरात्रि को यह शिवलिंग एक जौ के दाने के बराबर बढ़ता है। ऐसी मान्यता है की इस शिवलिंग में सक्षात शिवजी का वास है तथा भगवान शिव सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करते है।

भूतेश्वर महादेव मंदिर :- छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 90 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है गरियाबंद जिला यहाँ एक प्राकृतिक शिवलिंग स्थित है जिसे भूतेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह विशव का सबसे बड़ा प्राकर्तिक शिवलिंग है. सबसे बड़ी आश्चर्य की बात यह है की यह शिवलिंग अपने आप बड़ा और मोटा होता जा रहा है। यह जमीन से लगभग 18 फीट उंचा एवं 20 फीट गोलाकार है. राजस्व विभाग द्वारा प्रतिवर्ष इसकी उचांई नापी जाती है जो लगातार 6 से 8 इंच बढ रही है।

जग्गेश्वर महादेव मंदिर :- मैदागिन मार्ग से आगे बढ़ने पर महादेव का दिव्य मंदिर है . शिव की नगरी काशी में तो कंकर कंकर में शिव का वास है. शिव ही यहाँ के आराध्य हैं और शिव ही लोगों की रक्षा और भरण पोषण करते हैं। शिव के इस आनंद वन में शिव के चमत्कारों की कोई कमी नही है. इस मन्दिर में भगवान् शिव का लिंग हर शिवरात्रि को जौ के एक दाने के बराबर बढ़ जाता है। मन्दिर के आस पास ऐसे लोगों की भी कमी नही है जिन्होंने इस शिव लिंग को अपने बचपन से बढ़ते हुए देखा है. ऐसी मान्यता है की इस मन्दिर में दर्शन करने से इस जन्म का ही नही बल्कि सात जन्मो का पाप कट जाता है। जागिश ऋषि की कठोर तपस्या से खुश होकर महादेव यहाँ प्रकट हुए थे. हर शिवरात्रि को बढ़ते -बढ़ते वर्तमान में इस शिवलिंग ने आदम कद प्राप्त कर लिया है . महंत आनंद मिश्र बताते है कि ऋषि के हठ ने ना सिर्फ महादेव को यहाँ बुलाया बल्कि हमेशा के लिए उन्हें यही विराजमान भी होना पड़ा। ऋषि ज़ब बिमारी की वज़ह से मौत के मुह में असमय ही चले जा रहे थे, तब महादेव ने अपने प्रिय मदार के पुष्प से उनका इलाज़ भी किया था. बीमारी से ठीक होने को लोग मदार की माला चढ़ाते है।

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