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कल पंगोट में ‘तितली त्यार’ का आयोजन

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Titli Tyar - Butterfly Festival at Corbett, Ramnagar - Odin Tours | Luxury  Tours in India Nepal Bhutan Myanmar | Travel Agency in Dwarka Delhiडॉ. नवीन जोशी, नवीन समाचार, नैनीताल, 19 सितंबर 2021। मुख्यालय के निकटवर्ती पंगोट क्षेत्र में सोमवार को टाइगर फाउंडेशन ऑर्गनाइजेशन के तत्वावधान में ‘तितली त्यार’ यानी तितलियों के त्योहार का आयोजन किया जा रहा है। आयोजक मंडल के मनीष कुमार व शिवम शर्मा ने बताया कि यह आयोजन पूर्व में जिम कॉर्बेट पार्क में आयोजित होता था। अब इसे पहली बार नैनीताल के पास किया जा रहा है।

इस कार्यक्रम में तितलियों की रंग-बिरंगी दुनिया पर चर्चा होगी। इसमें तितली विशेषज्ञ सोहेल मदान, शरन वेंकटेश, मुकुल आजाद व गौरव खुल्बे तितलियों पर चर्चा करेंगे। इस दौरान कॉर्बेट क्षेत्र में पाई जाने वाली तितलियों के चित्र, तितलियों को आमंत्रित करने के लिए उनके पसंदीदा पौधों के बगीचे लगाने, होटलों के खाद्य अवशेष से कंपोस्ट खाद बनाने, बीज बम तैयार करने, मैक्रो यानी बहुत छोटे कीट-पतंगों या वस्तुओं की फोटोग्राफी, तितलियों पर फिल्में एवं तितलियों से संबंधित कहानियों आदि के कार्यक्रम होंगे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : 45 साल तक पर्यावरण को प्रदूषित करती रह सकती है प्लास्टिक की एक बोतल

-एनसीसी कैडेटों को एकल प्रयोग प्लास्टिक के भयावह दुष्प्रभावों से अवगत कराया
500ML Plastic Water Bottle, for Beverage, Rs 7 /piece Hi Tech Engineering  Works | ID: 15023138333डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 10 अगस्त 2021। 5 यूके नेवल यूनिट एनसीसी नैनीताल के तत्वाधान में सोमवार को स्वतंत्रता दिवस-221 के कार्यक्रमों की श्रृंखला में ’से नो टू सिंगल यूज प्लास्टिक’ यानी ‘एकल प्रयोग प्लास्टिक को नां’ विषय पर ऑनलाइन वेबीनार का आयोजन किया गया ।
वेबीनार में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए सब लेफ्टिनेंट डॉ. रीतेश साह ने एनसीसी कैडेटों को बताया कि एक बार में प्रयोग होने वाले प्लास्टिक का निर्माण जीवाश्म ईंधन पर आधारित रसायनों से होता है, यह पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। उन्होंने बताया कि आजकल प्रयोग की जाने वाली पानी की बोतल पृथ्वी पर लगभग 45 साल तक ऐसे ही पड़ी रह कर पर्यावरण को प्रदूषित करती रह सकती है। एकल प्रयोग प्लास्टिक के कारण प्रकृति पर कार्बन दबाव भी अत्यधिक बढ़ता जा रहा है जो उन्हें पर्यावरण के लिए बड़ी समस्या उत्पन्न कर रहा है।

इसके इस्तेमाल के कारण जलीय जीव, जंतु, पक्षी व मानव जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इंसानों में इसकी वजह से अस्थमा, कैंसर, लीवर, किडनी, मस्तिष्क, हृदय रोग व मधुमेह आदि बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं। उन्होंने कहा कि समझदारी इसी में है कि हम एकल प्रयोग प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल करें व दूसरों को भी जागरूक करें। इस अवसर पर यूनिट के कमांडिंग ऑफिसर कमांडर डीके सिंह ने कैडेटों का आह्वान किया कि वह अपनी छोटी-छोटी आदतों को बदलकर प्लास्टिक का कम से कम इस्तेमाल कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दें।

बताया गया कि संगोष्ठी में प्रतिभाग कर रहे सभी कैडेटों को ऑनलाइन प्रमाण पत्र भी प्रदान किए जाएंगे। पेट्टी ऑफीसर सुनीत बलोनी ने भी विचार रखे। जबकि कार्यक्रम में 5 यूके नेवल, 79 यूके, 77 यूके, 8 यूके बटालियन एनसीसी पिथौरागढ़, 24 यूके गर्ल्स बटालियन अल्मोड़ा तथा सैनिक स्कूल घोड़ाखाल के 1 से अधिक कैडेटों ने प्रतिभाग किया। कार्यक्रम का समन्वयन व संचालन पेट्टी ऑफीसर जयभान ने किया। वेबिनार में प्रशिक्षण अधिकारी कर्नल हितेश काला, मेजर प्रो.एचसीएस बिष्ट, पेट्टी ऑफीसर सतीश व पंकज ओली तथा हेमंत आदि शामिल रहे। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : सड़क निर्माण के मलबे के सही निस्तारण न होने पर केंद्र व राज्य प्रदूषण बोर्ड सहित कई को नोटिस

डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 14 जुलाई 2021। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश आरएस चौहान व न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने राज्य में किये जा रहे सड़को का निर्माण के दौरान उनका मलबा जंगलांे, सड़क के किनारों, खेतो, व नदियों में डाले जाने के खिलाफ जनहित याचिका पर सुनवाई की। न्यायालय ने इस मामले में लोनिवि व वन विभाग के सचिव, मुख्य वन संरक्षक, रूरल रोड एजेंसी उत्तराखंड, पीएमजीएसवाई, सड़क परिवहन मंत्रालय भारत सरकार, बीआरओ, केंद्र व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण-एनडीआरएफ को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई के लिए चार सप्ताह बाद की तिथि नियत की गई है।

मामले के अनुसार हल्द्वानी निवासी अमित खोलिया ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि राज्य के पर्वतीय व मैदानी क्षेत्रों में सड़कों के निर्माण काय तय समय के भीतर पूरा नही हो रहे हैं। सड़क निर्माण के दौरान निर्माण एजेंसी के द्वारा निस्तारण का पैंसा बचाने के लिए मलबा नदियों, नालों, जंगलों और आसपास के क्षेत्रों व गांवों के खेतों में डाला जा रहा है जिससे पर्यावरण को नुकसान होने के साथ ही नदियों में मलबा जमा होने से बाढ़ जैसे हालात पैदा हो सकते है। कुछ दिन पहले वर्षात होने के कारण कई गांवो में इन सड़कों का मलबा घुस गया। फलस्वरूप नाले बंद हो गए और काश्तकारों के खेत बह गए। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

यह भी पढ़ें : हिमालयी राज्यों पर मंडरा रहे इस बड़े खतरे की वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी

हिमालयी राज्यों पर मंडरा रहा है ये बड़ा खतरा, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनीअंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘एन्वायरमेंटल रिसर्च लेटर्स’ में वैज्ञानिकों ने भारत के बड़े भू-भाग के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। चेतावनी दी है कि बढ़ती गर्मी एवं उमस के संयुक्त प्रभाव से भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिमी बंगाल, दार्जिलिंग, सिक्किम एवं अरुणाचल प्रदेश) 21वीं सदी के अंत तक हीट स्ट्रेस से प्रभावित होने वाला दुनिया का सबसे प्रमुख क्षेत्र होगा। कोलंबिया विश्वविद्यालय की ‘नासा गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज एवं सेंटर फार इंटरनेशनल अर्थ साइंस इन्फार्मेशन नेटवर्क’ के वैज्ञानिकों के जनवरी 2018 में प्रकाशित शोध पत्र में बढ़ती गर्मी का सबसे बड़ा खतरा हिमालयी पर्वत श्रंखला को बताया गया है। हिमालय भले ही एशिया के आठ देशों की सीमाओं तक विस्तार लिए हुए है, लेकिन सबसे अधिक खतरा भारतीय हिमालय पर ही मंडरा रहा है।

ऐसी संभावना भी है कि सदी के मध्य अथवा उत्तरार्ध में गर्माहट सहन करने की मानव क्षमता ही बेहद कम हो जाएगी। गोविंद बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय के पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. वीर सिंह का कहना है कि शोध हमें चेता रहे है। हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन गंभीर चेतावनी है। इस पर अभी ध्यान नहीं दिया गया तो बाद में बहुत देर हो जाएगी।

हैरान करने वाले आंकड़े

वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा बढ़कर 410 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) हो चुकी है, जो कि खतरे की घंटी है। यह 18वीं शताब्दी के अंत में 280 पीपीएम मापी गई थी। इस गर्माहट के सबसे अधिक शिकार हिमालय हो रहा हैं।

तप रहा है हिमालय 

जीबी पंत विवि के शोधार्थी श्रेष्ठा, गौतम एवं बावा के शोधपत्र के अनुसार 1982 से 2006 तक हिमालय का तापक्रम 1.5 डिग्री सेल्सियस अर्थात 0.6 डिग्री प्रतिवर्ष की दर से बढ़ा, जो अत्यंत गंभीर है। उत्तराखंड में सार्वभौमिक गर्माहट की स्थानीय हलचल खतरे की ओर संकेत करती है। वर्ष 1911 में यहां का औसत तापमान 21.0 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता था, जो अब बढ़कर 23.5 डिग्री सेल्सियस हो गया है। आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

तीन लाख करोड़ की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है उत्तराखंड
  • पर्यावरण संरक्षण के जरिये देश की आबोहवा को शुद्ध और सांस लेने लायक बनाने में उत्तराखंड अहम योगदान दे रहा है उत्तराखंड
खुद तकलीफें झेलकर पर्यावरण संरक्षण के जरिये देश की आबोहवा को शुद्ध और सांस लेने लायक बनाने में उत्तराखंड अहम योगदान दे रहा है। नियोजन विभाग की ओर से इको सिस्टम सर्विसेज को लेकर कराए जा रहे अध्ययन के प्रारंभिक आकलन को देखें तो विषम भूगोल वाला यह राज्य करीब तीन लाख करोड़ की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। इसमें अकेले यहां के वनों का योगदान 98 हजार करोड़ के लगभग है। 71.05 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में जंगलों को सहेज पर्यावरण संरक्षण यहां की परंपरा का हिस्सा है। यही वजह भी है कि यहां के जंगल अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा सुरक्षित हैं। कुल भूभाग का लगभग 46 फीसद फॉरेस्ट कवर इसकी तस्दीक भी करता है। इससे न सिर्फ पहाड़ महफूज हैं, बल्कि पर्यावरण के मुख्य कारक हवा, मिट्टी व पानी भी। यही नहीं, गंगा-यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों का उद्गम भी उत्तराखंड ही है। हर साल ही वर्षाकाल में बड़े पैमाने पर यहां की नदियां अपने साथ बहाकर ले जाने वाली करोड़ों टन मिट्टी से निचले इलाकों को उपजाऊ माटी देती आ रही है। ऐसे में सवाल अक्सर उठता है कि आखिर यह राज्य सालाना कितने की पर्यावरणीय सेवाएं दे रहा है। पूर्व में इसे लेकर 107 बिलियन रुपये का अनुमान लगाया गया था, लेकिन बाद में राज्य सरकार ने खुद इसका आकलन कराने का निश्चय किया। नियोजन विभाग के जरिये इको सिस्टम सर्विसेज को लेकर सालभर से यह अध्ययन चल रहा है। अब इसके प्रारंभिक आंकड़े सामने आने लगे हैं। इको सिस्टम सर्विसेज को लेकर चल रहे अध्ययन के नोडल अधिकारी मनोज पंत के मुताबिक राज्य के वनों से ही अकेले 98 हजार करोड़ रुपये की सालाना पर्यावरणीय सेवाएं मिलने का अनुमान है। जंगलों के साथ ही नदी, सॉयल समेत अन्य बिंदुओं को भी शामिल कर लिया जाए तो इन सेवाओं का मोल लगभग तीन लाख करोड़ से अधिक बैठेगा। उन्होंने कहा कि अभी अध्ययन चल रहा है और फाइनल रिपोर्ट आने पर ही पर्यावरणीय सेवाओं के मोल की असल तस्वीर सामने आएगी। (केदार दत्त)
नवीन समाचार
‘नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से ‘मन कही’ के रूप में जनवरी 2010 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।
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