यह सामग्री कॉपी नहीं हो सकती है, फिर भी चाहिए तो व्हात्सएप से 8077566792 पर संपर्क करें..

ब्रेकिंग : हरीश रावत स्टिंग मामले में CBI की रिपोर्ट कोर्ट में हुई पेश, CBI कर सकती है FIR, परन्तु…

यहाँ से दोस्तों को भी शेयर करके पढ़ाइये
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  

-हरीश रावत की गिरफ़्तारी पर न्यायालय के अंतिम फैसले तक रोक, एक नवंबर को होगी अगली सुनवाई

नैनीताल पहुंचने पर कपिल सिब्बल का स्वागत करते कांग्रेस कार्यकर्ता।

नवीन समाचार, नैनीताल, 30 सितंबर 2019। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बहुचर्चित स्टिंग मामले में उत्तराखंड उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकल पीठ ने एकलपीठ ने सीबीआई की प्रारंभिक सीलबंद जांच रिपोर्ट देखी और सीबीआई के अधिवक्ता की दलील को स्वीकार कर लिया है। वहीं न्यायालय में हुई लंबी बहस के बाद एकलपीठ ने कहा कि सीबीआई एफआईआर दर्ज कर जांच कर सकती है, किंतु मामले में न्यायालय के अंतिम आदेश तक हरीश रावत को गिरफ्तार नहीं करेगी। साथ ही यह भी कहा कि यदि 31 मार्च 2016 का राज्यपाल का आदेश अवैध साबित होता है तो सीबीआई जांच का कोई अर्थ नहीं रहेगा। इसके साथ ही एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के लिए अगली तिथि एक माह बाद एक नवंबर की तय कर दी है।

सोमवार को एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान बचाव पक्ष की ओर से पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने बहस में भाग लिया। लंबी बहस के बाद एकलपीठ ने स्टे लगाते हुए अगली सुनवाई के लिए एक नवंबर की तिथि रख दी। इससे सीबीआई की हरीश रावत के खिलाफ जल्द जांच रिपोर्ट न्यायालय में पेश कर उनके विरुद्ध आगे की कार्रवाई करने के मंसूबे को झटका माना जा रहा है।

मामले में सुनवाई के दौरान एकलपीठ ने सीबीआई की प्रारंभिक सीलबंद जांच रिपोर्ट देखी और सीबीआई के अधिवक्ता की दलील को स्वीकार कर लिया है। इस पर बचाव पक्ष के अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सर्वाेच्च न्यायालय के एसआर बोम्मई केस का उद्धरण देते हुए कहा है राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्यपाल द्वारा लिए गए निर्णय असंवैधानिक होते हैं। सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश से पूर्व तिथि से ही बहाल हुई राज्य कैबिनेट ने स्टिंग मामले में सीबीआई जांच की आवश्यकता को नकारते हुए एसआइटी से जांच कराने का निर्णय लिया था। इसलिए सीबीआई की जांच की अवैध है। इस पर सीबीआई के अधिवक्ता ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि आरोपित व्यक्ति को जांच एजेंसी तय करने का अधिकार नहीं होता है। वहीं सिब्बल ने पूरे प्रकरण को साजिश करार देते हुए सीडी की प्रमाणिकता को लेकर सवाल उठाये कि जांच रिपोर्ट रविवार होेन के बावजूद चंडीगढ़ लैब से आ गई। उन्होंने मामले के दूसरे पक्षकार डा. हरक सिंह रावत व उमेश शर्मा के बीच बातचीत का ब्यौरा भी कोर्ट के सामने प्रस्तुत किया।
उल्लेखनीय है कि पिछली सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से कोर्ट को अवगत कराया था कि वह स्टिंग मामले की प्रारम्भिक जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश करना चाहती है और रावत के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने जा रही है।

(विस्तृत खबर थोड़ी देर में इसी लिंक पर, रिफ्रेश करते रहें।)

यह भी पढ़ें : हरीश रावत को सीबीआई से बचाने, पी चिदंबरम को सीबीआई से न बचा पाये वकील पहुंचे नैनीताल

नवीन समाचार, नैनीताल, 29 सितंबर 2019। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को सीबीआई के शिकंजे से बचाने के लिए, सीबीआई के शिकंजे से न बचा पाये सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता, वरिष्ठ कंाग्रेस नेता व पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल नैनीताल पहुंच गए हैं। वे सोमवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ के समक्ष हरीश रावत को बचाने के लिए पैरवी करेंगे। उल्लेखनीय है कि सिब्बल पूर्व में हरीश रावत के नेतृत्व वाली सरकार को केंद्र सरकार द्वारा पदच्युत कर दिये जाने के दौरान उत्तराखंड उच्च न्यायालय में रावत के संकटमोचक साबित हुए थे। इस बार भी रावत को उनसे ऐसी ही उम्मीद होगी।

नोट: पंचायत चुनाव में ‘सबसे सस्ते’ विज्ञापन देने के लिए संपर्क करें हमारे मोबाइल-व्हाट्सएप नंबर 8077566792 अथवा 9412037779 पर 

रविवार दोपहर को वे पंतनगर एयरपोर्ट पहुंचे। एयरपोर्ट पर कांग्रेसियों ने उनका स्वागत किया। इस दौरान कपिल सिब्बल ने कहा कि यह सिर्फ दबाव बनाने के लिए मामले को तूल दिया जा रहा है। जल्द ही इस मामले में सब साफ हो जाएगा। बता दें कि 2016 में एक निजी चैनल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत का एक स्टिंग दिखाया था। इस स्टिंग में रावत सरकार बचाने के लिए विधायकों से सौदेबाजी करते नजर आ रहे थे। इस दौरान कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा में शामिल हो गए और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया था। राष्ट्रपति शासन लगाने का मामला पहले हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, फलस्वरूप रावत सरकार बहाल हो गई थी। मामले की सीबीआई जांच को लेकर भी हरीश रावत काफी आशंकित लग रहे हैं। उन्होंने सरकार पर सीबीआई के दुरुपयोग करने का भी आरोप लगाया है। 

यह भी पढ़ें : हरीश रावत पर स्टिंग मामले की CBI जांच में सुनवाई टली..

नवीन समाचार, नैनीताल, 27 सितंबर 2019। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत पर स्टिंग मामले की CBI जांच के मामले में सुनवाई अब 30 सितंबर को होगी। शुक्रवार को मामला सुनवाई के लिए ‘मेंसन’ हुआ, परंतु इसे सोमवार तक के लिए स्थगित कर दिया गया। पूर्व में 20 सितंबर को न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे के मामले से स्वयं हट जाने के बाद मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन द्वारा मामला नई पीठ को संदर्भित किये जाने के बाद शुक्रवार को मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ में हुई।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार : हरीश रावत पर स्टिंग मामले में फिर लटकी तलवार ! दूसरे न्यायाधीश नामांकित, कल नई पीठ कर सकती है सुनवाई..

नवीन समाचार, नैनीताल, 26 सितंबर 2019। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बहुचर्चित स्टिंग कांड पर सीबीआई जांच के मामले में शुक्रवार को सुनवाई हो सकती है। मामले कों मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश रंगनाथन ने न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ को नामांकित कर दिया हैै। उल्लेखनीय है कि पिछली सुनवाई की तिथि पर इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर मामले की सुनवाई के लिए एक अक्तूबर की अगली तिथि निर्धारित कर दी थी। किंतु इधर बताया गया है कि मामला शुक्रवार को सुनवाई के लिए 66वें नंबर पर लग गया है।

यह भी पढ़ें : न्यायमूर्ति खुल्बे ने स्वयं को किया हरीश रावत के स्टिंग मामले की सुनवाई से अलग

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 सितंबर 2019। उत्तराखंड हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की एकलपीठ ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के स्टिंग प्रकरण की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया है। लिहाजा अब दूसरी एकलपीठ इस मामले को सुनेगी। आज न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की एकलपीठ ने इस प्रकरण की अगली सुनवाई एक अक्टूबर नियत कर दी थी लेकिन दोपहर बाद सीबीआई ने हरीश रावत के स्टिंग की प्रारम्भिक जाँच रिपोर्ट आज ही कोर्ट में पेश करने का अनुरोध किया लेकिन हरीश रावत के अधिवक्ताओ ने इस पर आपत्ति की कि जब 1 अक्टूबर की तिथि कोर्ट ने दे दी है तो आज ही इसे क्यों पेश कया जा रहा है। इसको लेकर न्यायमूर्ति खुल्बे ने मामले को सुनने से इनकार कर दूसरी एकलपीठ को भेज दिया।

यह भी पढ़ें : आज ‘चिदंबरम जैसी धोती’ में उन जैसी ही स्थिति में नजर आये हरीश रावत, साथ में सिमटी दिखी कांग्रेस की एकता

नवीन समाचार, नैनीताल, 20 सितंबर 2019। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ सीबीआई जांच के मामले में उच्च न्यायालय में शुक्रवार को सुनवाई हुई। न्यायालय ने सुनवाई के बाद 1 अक्टूबर की अगली तिथि निश्चित कर दी है। न्यायालय में सीबीआई द्वारा आरोप पत्र प्रस्तुत करने पर रावत के अधिवक्ताओं ने समय की मांग की। इस पर न्यायालय में सुनवाई के लिए 1 अक्टूबर की अगली तिथि निश्चित कर दी।

सीबीआई जांच मामले में सुनवाई के दौरान अपनी पूर्व घोषणा पर शुक्रवार को पूर्व मुख्यमंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता मुख्यालय में थे। इस दौरान वे राज्य अतिथि गृह में पहली बार पार्टी नेताओं व नेत्रियों के साथ अनपेक्षित तौर पर गत दिनों सीबीआई के फंदे में फंसकर इन दिनों जेल में मौजूद पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम जैसी दक्षिण भारतीय तरीके से लुंगी की तरह बांधी गयी सफेद धोती में सार्वजनिक तौर पर देखे गये। इस मौके पर कांग्रेस के पार्टी के पूर्व व वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष, उनके पूर्व मंत्रिमंडलीय सहयोगी व विधायक भी मौजूद रहे, लेकिन जिस तरह के शक्ति प्रदर्शन की रावत व कांग्रेस पार्टी की ओर से उम्मीद की जा रही थी, वैसा कुछ नहीं दिखा। अलबत्ता, मौजदा अध्यक्ष प्रीतम सिंह, पूर्व अध्यक्ष किशोर उपाध्याय व पूर्व काबीना मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश ने कहा कि यह मामला तब का है, जब वे भी रावत के सहयोगी थे। इसलिए तब के हर कार्य में रावत का समर्थन व्यक्त करते हैं, और इसीलिये आज आये हैं। डा. हृदयेश ने कहा कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं किया गया था, लेकिन भाजपा सरकार जिस प्रकार उत्पीड़न पर उतारू है, अपनी विदाई के दिन गिन ले। वहीं रावत सहित दोनों पूर्व व वर्तमान अध्यक्षों ने कहा कि न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है, किंतु भाजपा की ओर से किये जा रहे उत्पीड़न के खिलाफ सड़क पर संघर्ष करने व जेल भरो आंदोलन जैसा कोई आंदोलन भी करने को तैयार हैं। इस मौके पर कांग्रेस विधायक हरीश धामी, पूर्व विधायक हरीश दुर्गापाल, हेमेश खर्कवाल, नगर पालिकाध्यक्ष सचिन नेगी, पूर्व पालिकाध्यक्ष मुकेश जोशी, जिलाध्यक्ष सतीश नैनवाल, नगर अध्यक्ष अनुपम कबडवाल, प्रकाश जोशी, भोला भट्ट, सूरज पांडे, खष्टी बिष्ट, पुष्कर बोरा, कैलाश मिश्रा, सुशील राठी, व हुकुम सिंह कुंवर आदि कांग्रेस नेता भी मौजूद रहे।

यह हुआ आज न्यायालय में

नैनीताल। बताया गया कि उच्च न्यायालय में आज सीबीआई की ओर से अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का अनुरोध किया गया, जिसे उच्च न्यायालय ने नहीं स्वीकारा। इधर बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं का कहना था कि जांच रिपोर्ट प्रस्तुत हो तो उसकी प्रति उन्हें उपलब्ध कराई जाए। जबकि सीबीआई के अधिवक्ताओं ने जांच रिपोर्ट को गुप्त बताया। बचाव पक्ष की दलील यह भी है कि चूंकि बीच में राज्यपाल सरकार लगने के बावजूद हरीश रावत की सरकार को पूर्व से ही स्थापित किया गया, इसलिए बीच में राज्यपाल द्वारा की गयी सीबीआई जांच की संस्तुति ही अवैध है, इसलिए सीबीआई द्वारा की गयी जांच भी अवैधानिक है। यह भी माना जा रहा है कि सीबीआई का इरादा जांच रिपोर्ट उच्च न्यायालय में पेश कर रावत के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार करने का था। इन दांवपेंचों के बीच उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई की अगली तिथि 1 अक्टूबर नियत करते हुए कहा कि उस दिन ही सीबीआई जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी और उसी दिन जांच रिपोर्ट पर बहस-सुनवाई भी होगी। इस बीच सीबीआई के द्वारा पुनः उच्च न्यायालय में जांच रिपोर्ट जमा करने की कोशिश किये जाने की भी जानकारी आई।

यह भी पढ़ें : पूर्व सीएम हरीश रावत के खिलाफ एफआईआर दर्ज करेगी सीबीआई…

नवीन समाचार, नैनीताल, 3 सितंबर 2019। सीबीआई उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ स्टिंग मामले में एफआईआर दर्ज करने जा रही है। सीबीआई ने मंगलवार को उत्तराखंड उच्च न्यायालय को इस आशय की जानकारी दी है। 

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017 में उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार से 9 विधायकों द्वारा बगावती रुख अपनाकर भाजपा के पाले में चले जाने के बाद अपनी सरकार को बचाने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगे थे। इस संबंध में हरीश रावत का एक चर्चित स्टिंग भी आया था। बाद में रावत सरकार गिरने पर राज्यपाल की संस्तुति से रावत के खिलाफ सीबीआई की जांच शुरू हुई थी। सीबीआई तभी रावत की गिरफ्तारी के प्रयास में थी किंतु रावत ने इसके खिलाफ उत्तराखंड उच्च न्यायालय की शरण ली थी और अपनी गिरफ्तारी पर रोक और सीबीआई जांच को खत्म करने की मांग की थी। इस पर एकल पीठ ने सीबीआई ने गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए रावत को जांच में सहयोग करने को कहा था। साथ ही सीबीआई से कहा था कि यदि रावत की गिरफ्तारी की जरूरत पड़ती है तो सीबीआई पहले हाईकोर्ट को अवगत कराएगी। इसके बाद से सीबीआई रावत के खिलाफ जांच कर रही थी। आगे 15 जून 2017 को रावत के फिर से सत्ता में लौटने पर राज्य कैबिनेट ने हरीश रावत पर चल रही सीबीआई जांच को हटाकर एसआईटी से जांच कराने का फैसला लिया था। इसे तब कांग्रेस के बागी व वर्तमान में भाजपा नेता तथा काबीना मंत्री हरक सिंह रावत ने उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा कि राज्यपाल द्वारा की गयी संस्तुति को हटाया नहीं जा सकता है। लिहाजा कैबिनेट की संस्तुति नियमविरुद्ध है। उन्होंने रावत के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग भी की थी। इसके बाद से मामला फिर से सीबीआई के पाले में था। अब जबकि सीबीआई ने उच्च न्यायालय में अपनी जांच रिपोर्ट पेश कर दी है। जांच रिपोर्ट में क्या है, इसका खुलासा नहीं हुआ है, किंतु माना जा रहा है कि इस रिपोर्ट के बाद रावत पर सीबीआई का शिकंजा कसना तय है।

यह भी पढ़ें : सीबीआई के निशाने पर आये हरीश रावत ने अब खुद को बताया ‘गंगलोड़’, जानें क्यों ?

चुनाव प्रचार के दौरान हरीश रावत बेतालघाट में (File Photo)

नवीन समाचार, नैनीताल, 24 अगस्त 2019। सीबीआई द्वारा विधायकों की खरीद-फरोख्त के मामले में जांच रिपोर्ट उत्तराखंड उच्च न्यायालय में रखने के साथ कार्रवाई की तलवार लटकने के बीच उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने स्वयं को ‘गंगलोड़’ (पहाड़ में नदियों के पत्थरों के लिए प्रयुक्त शब्द) बताया है। उन्होंने ट्वीट किया है, ‘मेरे राजनैतिक जीवन में एक बार और दुर्दश, दुर्घष चुनौतीपूर्ण क्षण आ रहा है। कुछ ताकतें मुझे मिटा देना चाहती हैं। मैं मिटूंगा अवश्य, परन्तु उत्तराखण्डी गंगलोड़ की तरह लुढ़कते-लुढ़कते, घिंसते-घिसते इस मिट्टी में मिल जाऊंगा, परन्तु टूटंगा नहीं।’

देखें हरीश रावत का ट्वीट :

उनके इस ट्वीट को अब तक करीब दो दर्जन बार रिट्वीट भी किया जा चुका है। इसमें पहली सहित कई प्रतिक्रियाओं में लोग रावत से पूछ रहे हैं, ‘कांग्रेस का अध्यक्ष बनना है क्या ?’ वहीं कुछ उन्हें कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने और कुछ कांग्रेस-भाजपा दोनों को छोड़कर उत्तराखंड के लिए नया राजनीतिक दल बनाने की सलाह भी दे रहे हैं। वहीं कई उन्हें उनके द्वारा किये गये भ्रष्टाचार की याद भी दिला रहे हैं, और कई उन्हें अपने समर्थन का भरोसा भी दिला रहे हैं।

यह भी पढ़ें : पी चिदंबरम के बाद उत्तराखंड के इस बड़े कांग्रेस नेता पर कसेगा सीबीआई का शिकंजा !

-सीबीआई ने पूर्व सीएम हरीश रावत के खिलाफ जांच पूरी कर उच्च न्यायालय में सोंप दी है जांच रिपोर्ट

<

p style=”text-align: justify;”>नवीन समाचार, नैनीताल, 23 अगस्त 2019। पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम के बाद अब एक और कांग्रेस नेता पर सीबीआई की गाज गिर सकती है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जिस समय दिल्ली में पी चिदंबरम की पैरवी के प्रयास कर रहे थे, कमोबेश उसी समय सीबीआई ने प्रदेश के वर्ष 2017 के बहुचर्चित विधायकों की खरीद-फरोख्त के स्टिंग मामले में रावत के खिलाफ उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अपनी जांच पूरी करके रिपोर्ट जमा कर दी है। मामले की सुनवाई आगामी 20 सितंबर को होनी तय है। बताया जा रहा है कि इस मामले में भी रावत के बचाव में चिदंबरम के अधिवक्ता वरिष्ठ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल व अभिषेक मनु सिंघवी उच्च न्यायालय आ सकते हैं। वे पूर्व में भी रावत के बचाव में उत्तराखंड उच्च न्यायालय में पैरवी कर चुके हैं।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017 में उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार से 9 विधायकों द्वारा बगावती रुख अपनाकर भाजपा के पाले में चले जाने के बाद अपनी सरकार को बचाने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगे थे। इस संबंध में हरीश रावत का एक चर्चित स्टिंग भी आया था। बाद में रावत सरकार गिरने पर राज्यपाल की संस्तुति से रावत के खिलाफ सीबीआई की जांच शुरू हुई थी। सीबीआई तभी रावत की गिरफ्तारी के प्रयास में थी किंतु रावत ने इसके खिलाफ उत्तराखंड उच्च न्यायालय की शरण ली थी और अपनी गिरफ्तारी पर रोक और सीबीआई जांच को खत्म करने की मांग की थी। इस पर एकल पीठ ने सीबीआई ने गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए रावत को जांच में सहयोग करने को कहा था। साथ ही सीबीआई से कहा था कि यदि रावत की गिरफ्तारी की जरूरत पड़ती है तो सीबीआई पहले हाईकोर्ट को अवगत कराएगी। इसके बाद से सीबीआई रावत के खिलाफ जांच कर रही थी। आगे 15 जून 2017 को रावत के फिर से सत्ता में लौटने पर राज्य कैबिनेट ने हरीश रावत पर चल रही सीबीआई जांच को हटाकर एसआईटी से जांच कराने का फैसला लिया था। इसे तब कांग्रेस के बागी व वर्तमान में भाजपा नेता तथा काबीना मंत्री हरक सिंह रावत ने उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए कहा कि राज्यपाल द्वारा की गयी संस्तुति को हटाया नहीं जा सकता है। लिहाजा कैबिनेट की संस्तुति नियमविरुद्ध है। उन्होंने रावत के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग भी की थी। इसके बाद से मामला फिर से सीबीआई के पाले में था। अब जबकि सीबीआई ने उच्च न्यायालय में अपनी जांच रिपोर्ट पेश कर दी है। जांच रिपोर्ट में क्या है, इसका खुलासा नहीं हुआ है, किंतु माना जा रहा है कि इस रिपोर्ट के बाद रावत पर सीबीआई का शिकंजा कसना तय है।

यह भी पढ़ें : रावत जी, आपके पास केवल स्टंटमैनशिप है, स्टेट्समैनशिप नहीं…

श्री हरीश रावत जी के नाम खुला पत्र :

आदरणीय हरीश रावत जी,
उम्मीद है कि आप कुशल होंगे. आपकी कुशलता की खैरखबर इसलिए लेनी पड़ रही है क्यूंकि कल आपने जो विराट गिरफ्तारी दी,उससे खैर खबर लेना लाज़मी हो गया !
गिरफ्तारी का क्या नज़ारा था ! खुद ही एक-दूसरे के गले में माला डाल कर गाजे-बाजे के साथ तमाम कांग्रेस जन, आपकी अगुवाई में गैरसैण तहसील पहुंचे. वहाँ गिरफ्तार होने के लिए आपने तहसील की सीढ़ियाँ भर दी. जेल भरो आंदोलन तो सुनते आए थे पर जेल भेजे गए आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी के विरोध में “तहसील की सीढ़ियाँ भरो” आंदोलन,आपके नेतृत्व में पहली बार देखा. क्या नजारा था-आपके संगी-साथियों ने एस.डी.एम से कहा,हमें गिरफ्तार करो क्यूंकि हमारे 35 साथी जेल भेज दिये गए हैं. स्मित मुस्कान के साथ एस.डी.एम ने कहा-हमने आपको गिरफ्तार किया और अब हम आपको रिहा करते हैं. फर्जी मुकदमें में जेल भेजे गए आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी के ऐसे “प्रचंड” प्रतिवाद की अन्यत्र मिसाल मिलना लगभग नामुमकिन है ! एक पूर्व मुख्यमंत्री,विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान विधायक,उप नेता प्रतिपक्ष,पूर्व डिप्टी स्पीकर,पूर्व कैबिनेट मंत्री आदि-आदि अदने से एस.डी.एम को ज्ञापन दे कर गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी बनाने की मांग कर रहे थे और ऐसा न होने की दशा में प्रचंड आंदोलन की चेतावनी दे रहे थे ! आंदोलन के ऐसे प्रहसन का दृश्य आपके अतिरिक्त इस प्रदेश को और कौन दिखा सकता है !
इस प्रचंड प्रतिवाद प्रहसन से पूर्व आपने कांग्रेस जनों के साथ गैरसैण नगर में जुलूस निकाला. होने को जुलूस गैरसैण को राजधानी बनाए जाने के समर्थन में था पर जुलूस में नारे लग रहे थे कि हरीश रावत नहीं आँधी है,ये तो दूसरा गांधी है. जाहिर सी बात है कि नाम भले ही गैरसैण का था,पर प्रदर्शन आपके द्वारा,आपके निमित्त था.आपके निमित्त यह सब न होना होता तो जिन आंदोलनकारियों की 3 दिन बाद जमानत हुई,वह बिना उनके जेल गए ही हो जाती. पर तब आप यह गिरफ्तारी प्रहसन कैसे कर पाते ? और हाँ आँधी क्या बवंडर हैं आप ! वो बवंडर जो पानी में जब उठता है तो सबसे पहले अपने आसपास वालों को ही अपने में विलीन कर देता है,वे आपमें समा जाते हैं और रह जाते हैं सिर्फ आप. जहां तक गांधी होने का सवाल है तो गांधी तो एक ही था, एक ही है,एक ही रहेगा. गांधी के बंदर तीन भले ही बताए गए थे पर इतने सालों में वे कई कई हो गए हैं. इन बंदरों पर बाबा नागार्जुन की कविता आज भी बड़ी प्रासंगिक है. नागार्जुन कहते हैं :
बापू के भी ताऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!
सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बन्दर बापू के!
सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
ग्यानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बन्दर बापू के!
जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बन्दर बापू के!
लीला के गिरधारी निकले तीनों बन्दर बापू के!
लम्बी उमर मिली है, ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के!
दिल की कली खिली है, ख़ुश हैं तीनों बन्दर बापू के!
बूढ़े हैं फिर भी जवान हैं, तीनों बन्दर बापू के!
परम चतुर हैं, अति सुजान हैं तीनों बन्दर बापू के!
सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
बापू को हीबना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बन्दर बापू के!
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बन्दर बापू के!
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बन्दर बापू के!
हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बन्दर बापू के!
गुरुओं के भी गुरु बने हैं तीनों बन्दर बापू के!
नागार्जुन की कविता की बात इसलिए ताकि “प्रेम पगे,शहद सने,परम चतुर,अति सुजानों” को यह भान रहे है कि कहीं पे निगाहें,कहीं पे निशाना की तर्ज पर गैरसैण पर निगाहों वालों का निशाना किधर है,यह बखूबी समझा जा रहा है !
वैसे एक प्रश्न तो आप से सीधा पूछना बनता ही है हरदा कि आपके मन में गैरसैण कुर्सी छूट जाने के बाद ही क्यूँ हिलोरें मार रहा है ?आखिर जब आप मुख्यमंत्री थे तब आपको गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी बनाने की घोषणा करने से किसने रोका था ? आप घोषणा कर देते तो जिन साथियों को चक्काजाम करने की आड़ में जेल भेजा गया, न वे चक्काजाम करते,न मुकदमा होता,न उन्हें जेल जाना पड़ता. पर आपके राज में तो मुझे ही अपने साथियों के साथ गैरसैण के विधानसभा सत्र के दौरान स्थायी राजधानी की मांग करने के लिए पदयात्रा करने पर जंगल चट्टी से आपकी पुलिस ने कभी आगे नहीं बढ़ने दिया. अर्द्ध रात्रि में एस.डी.एम और पुलिस भेजी आपने,हमें धमकाने को ! ऐसा आदमी अचानक गैरसैण राजधानी की मांग का पैरोकार होने का दम भरता है तो संदेह होना लाज़मी है. साफ लगता है कि यह सत्ता,विधायकी,सांसदी गंवा चुके व्यक्ति की स्टंटबाजी है.
राजनीति में ऊंचे कद वाले राजनेता अपनी स्टेट्समैनशिप के लिए जाने जाते हैं. पर आपको देख कर लगता है कि आपके पास केवल स्टंटमैनशिप है. आपकी स्टंटमैनशिप कायम रहे,आप सलामत रहें.

भवदीय
इन्द्रेश मैखुरी

यह भी पढ़ें : हरीश रावत ने कहा, ‘मैं अपनी पारी खेल चुका’, जानिये क्या है उनके इस बयान के निहितार्थ ?

-क्या सक्रिय राजनीति छोड़ देंगे रावत… एक राजनीतिक विश्लेषण

नवीन जोशी @  नवीन समाचार, नैनीताल, 8 जुलाई 2019। एक ओर अपनी पहले जैसी ही राजनीतिक सक्रियता और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पंचायत चुनाव में जीत के लिए पांच नये कार्यकर्ताओं को जोड़ने का मंत्र देने के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने देहरादून में एक समाचार एजेंसी को अचानक यह बयान देकर चौकाने का प्रयास किया है कि वे अपनी पारी खेल चुके। किंतु रावत की राजनीति के अभ्यस्त जनों को इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा है कि रावत सक्रिय राजनीति से सन्यास ले सकते हैं। सच्चाई यह भी है कि वास्तव में अपने बयान में रावत ने कभी सक्रिय राजनीति से सन्यास लेने की बात कही ही नहीं है। बल्कि उन्होंने अपने बयान के एक हिस्से में यह भी कहा है, ‘वे कांग्रेस की सेवा करते रहना चाहते हैं।’
साफ है रावत का सक्रिय राजनीति से सन्यास लेने का कोई इरादा नहीं है। उनके इस बयान को पिछले घटनाक्रमों व उनके पिछले बयानों से जोड़कर देखें तो भी इस बात की पुष्टि होती है। उल्लेखनीय है कि रावत प्रतीकात्मक राजनीति करने वाले ऐसे खांटी नेता हैं जो अपने बयानों से राज्य की राजनीति में विरोधी दल ही नहीं अपने दल के नेताओं को भी संदेश देते रहते हैं। विधान सभा चुनाव में मुख्यमंत्री रहते दो सीटों से चुनाव हारने का ऐतिहासिक तौर पर बुरा रिकार्ड बनाने के बाद रावत ने नैनीताल से लोक सभा चुनाव राज्य के दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के साथ ‘उज्याड़ खांणी बल्द’ यानी दूसरों की फसल चरने वाला बैल, ‘इकलू बानर’ यानी झुंड से अलग अकेले रहने वाला बंदर, ‘भिजी घुघुत’ यानी भीगा हुआ कबूतर प्रजाति का पहाड़ का प्रतिनिधि पक्षी घुघुता एवं ‘स्याउ’ यानी सियार जैसी उपमाओं का आदान-प्रदान करते हुए, और यह कहते हुए लड़ा कि वह जानना चाहते थे कि कांग्रेस की विधानसभा चुनाव में हार दुर्घटनावश थी अथवा जनता को वास्तव में उनसे कोई समस्या थी। इस बीच जनता ने उन्हें उनके कद जितनी ही बड़ी, तीन लाख 39 हजार 96 वोटों के बड़े अंतर से हार देकर शायद उन्हें उनके प्रश्न का जवाब दे भी दिया, लेकिन इसके बाद रावत बोले, राजनीति में हार-जीत होती रहती है। अब 2022 के विधान सभा चुनाव की तैयारी करेंगे। इस बीच लोक सभा चुनाव के बाद असम में भी हार की जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा भी दे दिया। लेकिन इधर हाल में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी का इस्तीफा देने के बाद बीती तीन जुलाई को फिर इस तरह अपना इस्तीफा देने की याद दिलायी कि मीडिया के जरिये यह बात राहुल गांधी के स्तर की ही ‘कुर्बानी’ की तरह जनता के बीच पहुंचे। साथ में अपनी पार्टी के विरोधियों को यह संदेश भी जाये कि वे भी इस्तीफा देकर सीट खाली करें। मीडिया के जरिये भी ऐसे संदेश दिये गये कि रावत के इस्तीफे के बाद अब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह व नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा हृदयेश पर भी इस्तीफा देने का दबाव आ गया है। बावजूद विरोधियों ने उनका संदेश लेकर इस्तीफा नहीं दिया। लगा कि उन्हें रावत का साफ-साफ दिया गया संदेश समझ में नहीं आया तो उनके करीबी, सर्वाधित कठिन दौर में विधानसभा अध्यक्ष रहते उनके लिए केंद्र सरकार के समक्ष चट्टान की तरह खड़े रहे गोविंद सिंह कुंजवाल ने साफ-साफ बयान दिया कि (रावत से सबक लेकर) प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को इस्तीफा दे देना चाहिए। इसके बाद भी विरोधियों ने इस्तीफे नहीं दिये, तो अब रावत का आठ जुलाई को बयान आया है कि वे ‘अपनी पारी खेल चुके हैं’। साफ है, रावत अपने बयान से सिर्फ विरोधियों को संदेश दे रहे हैं। साथ ही उनके ताजा बयान का एक इशारा, जिसमें उन्होंने कहा है, ‘वह पार्टी नेता राहुल गांधी से मुलाकात के बाद अपने अगले कदम पर विचार करेंगे’ गांधी परिवार के प्रति उनके अति समर्पण व निष्ठा को उजागर करने और आत्म प्रचार का भी हो सकता है। बहरहाल, इतना साफ है कि उनका राजनीति से सन्यास लेने का फिलहाल कोई इरादा नहीं है। 2022 का विधानभा चुनाव लड़ने का वह लोभ संवरण करने की स्थिति में नहीं हैं।

यह कहा है हरीश रावत ने

हाल ही में कांग्रेस महासचिव पद से इस्तीफा दे चुके उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पूरे एक सप्ताह राज्य का भ्रमण करने के बाद रविवार को कहा, ‘‘मैं अपनी पारी खेल चुका हूं। लेकिन मैं अपना अगला कदम राहुल गांधी से मिलने के बाद तय करूंगा।’ इसके अलावा भी कुछ स्थानीय मीडिया संस्थानों को दिए विभिन्न साक्षात्कारों में उन्होंने कहा कि वह अपने परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताना चाहते हैं। वहीं यह पूछे जाने पर क्या वह राजनीति छोड़ना चाहते हैं? रावत ने कहा कि वह कांग्रेस की सेवा करते रहना चाहते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने कांग्रेस के लिए अथक काम किया है। मैं कह सकता हूं कि मैं सिर्फ सोते वक्त काम नहीं करता।’ रावत ने यह भी कहा कि वह यह समझने के लिए देश के विभिन्न भागों का दौरा कर रहे हैं कि कांग्रेस से चुनाव में गलतियां कहां हुईं। उन्होंने कहा, ‘‘चुनाव परिणाम आने के बाद से मैंने असम, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों का दौरा किया है। मैं यह जानना चाहता था कि हमारे साथ गलती कहां हुई।’ रावत ने कहा कि उनके जैसे व्यक्ति के लिए पार्टी के प्रति समर्पित होकर काम करने के लिए किसी पद की जरूरत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी नेता में पार्टी कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने के गुण होने चाहिए और सिर्फ राहुल गांधी में ऐसे प्रेरक गुण हैं। उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस की लगाम अगर राहुल गांधी के हाथ में रहती है तो हम 2022 में स्थिति बदल सकते हैं, जब कुछ राज्यों में चुनाव होंगे।’ उनके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को 2024 के आम चुनाव में हराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस उद्देश्य के लिए लोकतांत्रिक तत्व और पार्टी कार्यकर्ता राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में देखना चाहते हैं।

यह भी पढ़ें : हरीश रावत पहले ही दे चुके हैं राष्ट्रीय महामंत्री पद से इस्तीफा, तो अब क्या ‘पब्लिसिटी स्टंट’ ?

नवीन समाचार, देहरादून, 4 जुलाई 2019। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत लोक सभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की करारी हार के बाद ही पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री पद से इस्तीफा दे चुके थे। इधर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद एक बार उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट लिखकर याद दिलाया है कि वे पूर्व में ही महामंत्री पद से त्यागपत्र दे चुके हैं। अपनी इस पोस्ट पर उन्होंने राज्य के कई दैनिक समाचार पत्रों एवं समाचार पोर्टलों को भी टैग किया है। वैसे भी यह सामान्य बात है कि जब किसी सरकार अथवा संगठन का मुखिया अपने पद से त्यागपत्र देता है तो उसके बाद उसके पदाधिकारियों का स्वतः ही पद त्याग माना जाता है। उदाहरण के लिए मुख्यमंत्री का इस्तीफा पूरे मंत्रिमंडल का इस्तीफा माना जाता है। इसी तर्ज पर जब कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी इस्तीफा दे चुके हैं तो इसमें उनके सभी पदाधिकारियों के इस्तीफे भी निहित हैं। यानी श्री रावत को पूर्व में दिया गया, अथवा न भी दिया गया होता तो महामंत्री के पद से रुखसती हो चुकी है।

ऐसे में श्री रावत की अपने त्यागपत्र की याद दिलाना और उसे समाचार माध्यमों को टैग करना क्या इंगित करता है, समझना कठिन नहीं है। अलबत्ता, उनकी पोस्ट में एक और उल्लेखनीय बात यह भी है कि उन्होंने पत्र में राहुल गांधी के प्रति अपनी निष्ठा व समर्पण को बखूबी प्रदर्शित किया है, और कहा है कि लोकतांत्रिक शक्तियाँ व सभी कांग्रेसजन राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर देखना चाहते है।
देखें हरीश रावत की पोस्ट :

 यह भी पढ़ें : पूर्व सीएम हरीश रावत पहुंचे नैनीताल, सुननी पड़ी कार्यकर्ताओं की दो टूक

बृहस्पतिवार को नगर में पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ पूर्व सीएम हरीश रावत।

नवीन समाचार, नैनीताल, 6 जून 2019। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत बृहस्पतिवार को नैनीताल पहुंचे। बताया गया कि नगर के एक व्यवसायी के निधन पर गुरुद्वारे में चल रहे भोग कार्यक्रम में शामिल होने के लिए वह यहां आये थे। इस दौरान नगर में वाहनों की भीड़भाड़ को देखते हुए वे पार्टी कार्यकर्ताओं के सुझाव पर उनके साथ पैदल ही मल्लीताल के बाजारों से होते हुए व्यवसायियों से मिलते हुए निकले। इस दौरान कई युवा उनके साथ सेल्फी लेते भी देखे गये। पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि पत्रकार वार्ता भी करना चाहते थे, किंतु प्रदेश के वित्त मंत्री प्रकाश पंत के असामयिक निधन के कारण इस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया है। इस दौरान उनके साथ पूर्व विधायक व महिला कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष सरिता आर्य, जिला पंचायत अध्यक्ष सुमित्रा प्रसाद, जिपं सदस्य डा. हरीश बिष्ट, नगर अध्यक्ष अनुपम कबडवाल, पूर्व पालिकाध्यक्ष मुकेश जोशी, पालिका सभासद पुष्कर मेहरा, मुन्नी तिवारी, धीरज बिष्ट, कैलाश अधिकारी व कैलाश मिश्रा आदि भी मौजूद रहे।

कार्यकर्ताओं की दो टूक भी सुननी पड़ी

नैनीताल। बाजार में निकलने से पहले पूर्व सीएम हरीश रावत को नैनीताल क्लब में प्रवास के दौरान उनकी बड़ी व कड़वी हार से आक्रोशित कार्यकर्ताओं की दो टूक भी सुननी पड़ी। कार्यकर्ताओं ने कहा कि चुनाव के दौरान सीधे निकल गये थे। यदि आज की तरह तब लोगों से इस तरह मिलते तो ऐसी हार का सामना न करना पड़ता। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने चुनाव में कम योगदान देने के लिए एक-दूसरे की पोल भी खोली। बताया कि चुनाव में कैसे कुछ कार्यकर्ताओं को पार्टी से बाहर करना भारी पड़ा।

यह भी पढ़ें : अपने पैरों पर ‘कुल्हाड़ी मारना’ साबित हुआ हरीश रावत के लिए नैनीताल से लड़ना, ‘यहां’ से लड़ते तो रहते बेहतर

-विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री रहते दो विधानसभा सीटों से चुनाव हारने के बाद अब बनाया लोक सभा चुनाव में भी प्रदेश में सर्वाधिक तीन लाख से अधिक वोटों से हारने का रिकॉर्ड
-असोम राज्य के प्रभारी के रूप में भी विफल रहे रावत, असोम की 14 सीटों में केवल दो सीटों पर ही जीत की स्थिति में है कांग्रेस

चुनाव प्रचार के दौरान हरीश रावत बेतालघाट में, साथ में केवल सुरक्षा कर्मी, और कोई नहीं !

नवीन जोशी @ नवीन समाचार नैनीताल, 23 मई 2019। आज के दौर की राजनीति में स्वयं को कांग्रेस पार्टी के सबसे बड़े नेता के रूप में प्रदर्शित करने वाले, आज के दौर में (विजय बहुगुणा के भाजपा में जाने एवं पं. एनडी तिवारी के देहावसान के बाद) कांग्रेस पार्टी से प्रदेश के एकमात्र पूर्व मुख्यमंत्री एवं पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव एवं असोम प्रदेश के प्रभारी के रूप में सबसे बड़े नेता बताये जाने वाले, परन्तु काम से अधिक प्रतीकात्मक राजनीति के माहिर माने जाने वाले हरीश रावत के लिए 2019 के लोक सभा चुनाव नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सीट से हारने के साथ ‘अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने’ जैसा साबित हुए हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री रहते नैनीताल लोकसभा की किच्छा सहित दो विधानसभा सीटें हारने के बाद आखिरी क्षणों में जातिगत कारणों से रावत नैनीताल लड़ने के लिए ऐसे आये, मानो कह रहे हों, ‘आ बैल मुझे मार’। हरीश रावत ने इस चुनाव में भी प्रदेश में सर्वाधिक तीन लाख 39 हजार 96 वोटों से हारने का ऐसा बुरा रिकार्ड अपने नाम कर लिया है, जिसे शायद वे कभी याद नहीं रखना चाहेंगे। हरीश रावत के लिए यह भी एक अनचाहा बुरा परिणाम रहा है कि उनके प्रभार वाले असोम राज्य में भी उनकी पार्टी की दो सीटों पर सिमटकर बुरी दुर्गति होती दिख रही है। यहां तक कि रावत असोम में अपनी निवर्तमान सांसद व राष्ट्रीय पदाधिकारी व महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुष्मिता देव को भी जीत नहीं दिला पाये हैं।
वहीं दूसरी ओर हरीश रावत की पिछली हरिद्वार सीट पर कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी अंबरीश कुमार न केवल अपेक्षाकृत कम वोटों के अंतर से हार रहे हैं, अपितु शुरुआती चरणों में अंबरीश वहां से विजयी हुए भाजपा प्रत्याशी डा. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ से भी आगे निकल गये थे। जबकि इधर नैनीताल में हरीश रावत अपने सामने सर्वाधिक कमजोर बताये जा रहे, उनकी तरह ही अपने घर रानीखेत की विधानसभा सीट से हार कर नामांकन से कुछ ही दिन पूर्व निवर्तमान सांसद भगत ंिसह कोश्यारी के चुनाव लड़ने से इंकार करने के बाद अनमने तरीके से चुनाव मैदान में उतरे भाजपा के अजय भट्ट से तीन लाख 39 हजार से अधिक वोटों से हारे हैं। गौरतलब है कि 2017 में नैनीताल से भाजपा के भगत सिंह कोश्यारी दो लाख 84 हजार 717 वोटों के अंतर से हारे थे। रावत की हार इसलिए भी बड़ी है कि राज्य में हार का यह सबसे बड़ा अंतर तो रहा ही है, वह पूरे चुनाव व खासकर मतगणना के दौरान कभी भी मुकाबला करते नजर नहीं आये। उनकी हार इसलिये भी बड़ी है कि पिछले लोक सभा चुनाव में मुख्यमंत्री रहते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बरक्स पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के बजाय खुद को खड़ा कर चुनाव को ‘मोदी वर्सेज रावत’ करने की भूल का वैसा बुरा अंजाम (खुद दो सीटों से हार और पार्टी को ऐतिहासिक तौर पर 70 सीटों की विधान सभा में महज दहाई के करीब का स्थान) दिलाने के बावजूद उन्होंने सबक नहीं लिया। इस धोखे में रहे कि भाजपा के क्षत्रिय वर्ग से आने वाले निवर्तमान सांसद भगत सिंह कोश्यारी के चुनाव लड़ने से इंकार करने के बाद स्वयं क्षत्रिय वर्ग से होने के कारण उस वर्ग के वोट हासिल कर लेंगे, दूसरे कांग्रेस के प्रबल प्रत्याशी-दो बार के पूर्व सांसद डा. महंेद्र पाल को मिलता-मिलता टिकट अपने प्रभाव से कांग्रेस हाईकमान से छीन लाये। हल्द्वानी के नगर निगम चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी, काबीना मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश के पुत्र सुमित हृदयेश को हराने के आरोपों के बावजूद मान बैठे कि सबके वोट हासिल कर जीत हासिल कर लेंगे। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहते न केवल सीसीटीवी की फुटेज में भ्रष्टाचार पर ‘आंखें मूंद लेने’ की बात कहने वरन व्यवहार में भी खनन, शराब आदि के कार्यों में ऐसा ही रवैया दिखाना अभी जनता भूली नहीं है। दूसरी ओर देश भर में चली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘सुनामी’ सरीखी लहर को न केवल कम करके आंकना, वरन नजर अंदाज कर स्वयं को मोदी से बेहतर दिखाने की रावत की कोशिश ने उनकी बड़ी हार की पटकथा लिखने में बड़ी भूमिका निभाई है। अब देखना होगा कि कांग्रेस को ‘हरीश रावत कांग्रेस’ में तब्दील करते हुए हमेशा ‘एकला चलो’ की नीति पर चलने वाले रावत आगामी विधानसभा चुनाव के लिए स्वयं की क्या भूमिका तय करते हैं। क्योंकि वह कह चुके हैं कि विधानसभा में अपनी दो सीटों से मिली हार को ‘दुर्घटनावश अथवा जनता का गुस्सा’ भांपने के लिए वह लोक सभा चुनाव लड़े थे। शायद उन्हें इस प्रश्न का उत्तर मिल चुका होगा।

कहीं मुकाबले में नहीं दिखी कांग्रेस

नैनीताल। देश को संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री भारत रत्न पं. गोविंद बल्लभ पंत, प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचते बताये गये पं. नारायण दत्त तिवारी एवं हिमालय पुत्र हेमवती नंदन बहुगुणा सरीखे नेता देने वाली कांग्रेस पार्टी मोदी युग में 2019 के लोक सभा चुनाव तक कांग्रेस का किला माने जाने वाले उत्तराखंड को पूरी तरह से भेद कर रख दिया है। यहां तक कि पिछले विधानसभा चुनाव में प्रदेश की 70 विधानसभाओं में से केवल 11 सीटें जीत पाने के बाद इस लोक सभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी किसी भी सीट पर मुकाबले में ही नहीं दिखे। केवल हरिद्वार सीट पर सर्वाधिक कमजोर माने जा रहे अंबरीश कुमार को छोड़कर कोई भी प्रत्याशी किसी राउंड में भाजपा प्रत्याशी से एक बार भी आगे नहीं निकल पाया। यहां तक कि स्वयं को प्रदेश का सबसे बड़ा एवं राष्ट्रीय स्तर के कांग्रेस नेता बताने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने तो सर्वाधिक वोटों से हार का रिकॉर्ड ही बना दिया। हरीश अपनी गृह सीट अल्मोड़ा पर अपने खास, खुद के टिकट दिलाये हुए प्रदीप टम्टा को भी 2,21,154 वोटों के बड़े अंतर से हार के अंतर को कम नहीं कर पाये। वहीं राज्य के इतिहास में पहली बार पांच की पांच सीटें लगातार दूसरी बार जीतने का इतिहास रचते हुए भाजपा ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह को भी नहीं बख्शा। प्रीतम 2,93,390 वोटों से हारे। वहीं भाजपा के पूर्व सीएम भुवन चंद्र खंडूड़ी के पुत्र होने के नाते कांग्रेस द्वारा हाथों-हाथ लिये मनीष खंडूड़ी भी पौड़ी से 2,85,003 वोटों के बड़े अंतर से हारे हैं।

यह भी पढ़ें : हरीश रावत के बिगड़े बोल : केंद्र को लेकर ‘बाप-बेटे’ पर उतरे…

पीसी तिवारी का मुख्यमंत्री हरीश रावत के नाम जेल से खुला ख़त

सेवा में,
माननीय मुख्यमंत्री हरीश रावत जी,
उत्तराखण्ड सरकार,
देहरादून।

माननीय मुख्यमंत्री जी,
एक स्थानीय चैनल ईटीवी पर कल रात व आज सुबह पुनः नानीसार पर आपका विस्तृत पक्ष सुनने का मौका मिला। आपकी इस मामले में चुप्पी टूटने ये यह साबित हुआ कि उत्तराखण्ड में संघर्षरत जनता की आवाज आपकी पार्टी की सियासी सेहत को नुकसान पहुंचाने लगी है।

यह भी पढ़ें : 

लेकिन आपका वक्तव्य ध्यान से सुनने और मनन करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि आपके वक्तव्य में सच्चाई का नितांत अभाव था और एक बार फिर अपनी गरदन बचाने के लिए आप नानीसार के ग्रामीणों की दुहाई देकर पूरे उत्तराखण्ड व देश को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। जनता इस बात को कितना समझती है, इसके लिए थोड़ा वक्त का इंतजार करना पड़ेगा पर आपको अपने छात्र व सामाजिक जीवन से मैंने जितना जाना समझा है, उसके आधार पर मैं कह सकता हूॅं कि इतने बड़े संवैधानिक व जिम्मेदारी वाले पद पर पहुंचने के बाद भी आपकी फितरत नहीं बदली। इसे मैं उत्तराखण्ड का दुर्भाग्य ही कहूंगा। आप भी कहें न कहें इस सच्चाई को मन ही मन आप भी जरूर स्वीकारेंगे। रावत जी, आपने अपने पत्र में जिस वैचारिक भिन्नता बात कही है , वह सही है। आप यह भी जानते हैं कि आपका विचार हमसे अकसर मेल नहीं खाता है तो भी हम अपने विचारों और संकल्पों पर दृढ़ता से कायम रहने वाले लोग हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो आपके फेंके चारे को खाकर कुछ लोगों की भांति हम भी गरीब, भूमिहीन, दलित को अपने पक्ष में गुमराह करने का माध्यम बने होते और आपकी कृपा व इशारे से जिंदल ग्रुप के गुण्डो द्वारा खुद मारपीट और जानलेवा हमला कर अनुसूचित जाति जनजाति के लगाए गए झूठे मुकदमे में जेल में नहीं होते।
रावत जी, आपको मैं याद दिलाना चाहूंगा कि कुमाऊॅं विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा परिसर का छात्रसंघ अध्यक्ष रहते हुए हमने अपने संस्थान के एक सफाईकर्मी श्री नन्हे लाल वाल्मीिकि से 1978 के छात्र संघ समारोह का उद्घाटन कराया था। लेकिन इससे आपको क्या, आपके लिए तो दलित और आदिवासी मात्र वोट बैंक हैं और उसे पाने लिए आप हर स्तर पर तिकड़म करते हैं। शराब, पैसा बांटकर लोकतंत्र का हनन करते हैं। क्या मैं कुछ अधिक कड़वी सच्चाई कह गया? लेकिन उत्तराखण्ड आंदोलन को दलित विरोधी करार देने वाले आपके दलित नेता आज उन दलित भूमिहीनों को भूल गए हैं जिनके पक्ष की आवाज हम आज भी लगातार उठाए हुए हैं। ऐसे नेता प्रदेश में आपदा प्रभावित, दलितों, भूमिहीनों के हक जमीन को जिंदल व अन्य पूंजीपतियों को कौड़ियों के भाव अवैध ढंग से देने के मामले में आज भी मौन हैं।
माननीय मुख्यमंत्री जी, नानीसार का लेकर स्थानीय चैनल ई टीवी पर आपने जो कहा वह तथ्यात्मक रूप से भी गलत है। आज जानते हैं या नहीं, अपनी आदत के अनुसार आप जानबूझ कर अनजान बने रहना चाहते हैं। आप जानते हैं कि यह सच है कि स्थानीय डीडा गांव के लोग उनके नानीसार तोक की जमीन जिंदल को दिए जाने के खिलाफ 25 सितम्बर 2015 से ही आक्रोशित हैं। आपकी शह पर वहां तभी से भारी मशीनें, अवैध कटान का उपयोग कर जिंदल के गुण्डों ने कब्जा कर दिया था। जिस ग्राम प्रधान की सहमति का आप टीवी में जिक्र कर रहे थे उसके इस कृत्य के लिए ग्रामीण उसका ग्राम सभा में बहिष्कार कर चुके हैं। इस बाबत ग्रामीणों ने सूचना अधिकार से प्रक्रिया को जानना चाहा तो उन्हें ज्ञात हुआ कि ग्राम प्रधान ने गलत ढंग से ग्रामीणों को गुमराह किया। इस बाबत ग्रामीण जिलाधिकारी को अनेकों बार ज्ञापन भी दे चुके है तथा तभी से लगातार आंदोलन कर इस पूरे मामले की जांच की मांग करते आ रहे हैं। लेकिन शासन-प्रशासन ने इसे संज्ञान में नहीं लिया। अब यह मामला अदालत में है। लोकतंत्र में क्या आप इसे ग्रामीणों की सहमति कहेंगे? डीडा के ग्रामीण राज्य स्थापना दिवस से मेरे जेल जाने तक क्रमिक धरना और भूख हड़ताल कर रहे थे। क्या यही जिंदल को जमीन देने की सहमति हैं।

22 अक्टूबर को जब बिना लीज पट्टा निर्गत किए आप भाजपा सांसद मनोज तिवारी को विशिष्ट अतिथि बनाकर वहां अपने होनहार पुत्र के साथ कथित इंटरनेशनल स्कूल का उद्घाटन करने पहुंचे, तो भी ग्रामीणों को प्रबल विरोध आपको नहीं दिखा। तब भी आपकी पुलिस के हाथों पिटती ग्रामीण महिलाएं और क्षेत्र के लोग क्या जिंदल को जमीन देने के समर्थन में थे?

रावत जी, मुझे आश्चंर्य होता है कि, एक जिम्मेदार पद पर विराजमान होते हुए आप इतने भोले कैसे बन जाते हैं। यहां मैं आपको याद दिला दूूं कि आपने 28 नवम्बर को मीडिया को सार्वजनिक बयान देकर कहा था कि यदि ग्रामीण चाहेंगे तो जमीन सरकार वापस ले लेगी लेकिन दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी आपने इस दिशा में कोई निर्णय नहीं लिया। अंतरराष्ट्रीनय मानव अधिकार दिवस 10 दिसम्बर को नैनीसार बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले डीडा के ग्रामीणों ने हर परिवार के व्यक्ति के हस्ताक्षरों से एक ज्ञापन जिलाधिकारी के द्वारा आपको भेजा जिसमें इस भूमि आवंटन को खत्म करने की मांग थी। लोकतंत्र में इसे भी क्या लोगों की सहमति कहेंगे ? आपकी शह पर बिना लीज पट्टा निर्गत किए वहां चल रहे निर्माण कार्य व नियम विरूद्ध भारी तार बाड़, ग्रामीणों के रास्ते, पानी पर कब्जा, वहां बुरांस, काफल के पेड़ों का दोहन देखकर हर उत्तराखण्डी को आक्रोश आएगा। वहां सिविल जज अल्मोड़ा सीनियर डिविजन के स्थगन आदेश के बाद भी आपकी सरकार उस अवैध निर्माण को नहीं रोक पा रही है। ऐसे में आप मुझ जैसे निरीह उत्तराखण्डी पर, जिसे आपकी शह और इशारे पर जिंदल के अज्ञात गुण्डों व कथित अंगरक्षकों द्वारा मारपीट कर अपमानित किया जा रहा है और आरोप है कि मैं अपने विचारों का आप पर थोप रहा हूूॅं। क्या मेरी ऐसी हैसियत है ?
जब 26 जनवरी को नानीसार में आपके प्रशासन के अनेक स्थानों पर रोकने के बाद भी वहां पहुंची 400 के आसपास जनता के समक्ष वहां एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया, तो आपके सिपहसालारों और जिंदल के दबंगों ने उस झण्डे को वहां से उतारकर फेंक दिया। रावत जी क्या आप चाहते हैं कि नानीसार को लेकर जिस तरह पूरे प्रदेश व देश में सामाजिक कार्यकर्ता व राजनीतिक कार्यकर्ता संघर्ष में उतरकर उसका विरोध कर रहे हैं, उन सब पर आपकी कोई समझ नहीं है, कृपया इसे स्पष्ट करने की कृपा करें।
मुख्यमंत्री जी, जो कुछ आप टीवी पर बोंल रहे थे, स्थिति उसके विपरीत है। आपने भूमि की जांच हेतु स्वयं वरिष्ठंतम अधिकारी राधा रतूड़ी व शैलेश बगौली की कमेटी तीन नवम्बर 2015 को गैरसैंण में घोषित की थी। यदि आप अपने निर्णय पर दृढ़ थे तो फिर दिखाने के लिए वह कमेटी क्यों बनाई ? और इस कमेटी ने अब तक क्या किया ? यदि सब कुछ ठीक है तो आपकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष इस मामले में जाॅंच कमेटी क्यों घोषित कर रहे हैं ? रावत जी, सुना तो यह भी जा रहा है कि आपने पता नहीं किन कारणों से भूमि आवंटन की यह विवादास्पद पत्रावली अपने वरिष्ठकतम सहयोगी राजस्व मंत्री श्री यशपाल आर्य को भी नहीं भेजी। तब अपने विचारों व निर्णयों को आप थोप रहे हैं या सच्चाई यह है कि सत्ता का दुरूपयोग करे हुए आप अपनी मनमानी पर उतर आए हैं और राज्य के हितों से खिलवाड़ कर रहे हैं, यह जानते हुए कि इसका खामियाजा हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।
जहां तक आपके द्वारा वैकल्पिक विकास माॅडल के सुझावों का मामला है, तो क्या आपने इसके लिए कभी रायशुमारी की ? क्या आपकी सरकार ने उत्तराखण्ड राज्य की लड़ाई में शामिल हम जैसे सिपाहियों से इस मामले में संवाद शुरू किया ? जबकि आप जानते हैं कि पिछले 4 दशकों से हम लोग इस राज्य में तमाम मुददों पर लड़ रहे हैं फिर ऐसे तोहमत आप हमपर कैसे लगा सकते हैं ?
मुख्यमंत्री जी यदि आपको राज्य में शिक्षा और स्वास्थ्य की इतनी ही चिंता है तो इसे व्यापार क्यों बना रहे हैं ? सरकार की जिम्मेदारी क्या है ? फिर क्यों स्वास्थ्य व शिक्षा के कारण राज्य में पलायन बढ़ रहा है? सरकारी चिकित्सालयों व स्कूलों की दुर्दशा आप जानते हैं। आप इसमें सरकार की जिम्मेदारी क्यों नहीं तय करते ? सरकार का काम है कि हर नागरिक को समान और गुणवत्तापूर्वक शिक्षा व स्वास्थ्य दे । हम स्वयं इस कार्य में आपका हर स्तर पर सहयोग करने को तैयार है, लेकिन आप हैं कि लगातार बड़े-बड़े मुनाफाखोर निजी स्कूलों के उद्घाटन समारोहों में ही नजर आ रहे हैं।
मुख्यमंत्री जी, सोशल मीडिया में आपको ‘जमीनी नेता’ के स्थान पर ‘जमीन का नेता’ कह कर स्वयं आपके अपने व्यंग्य करने लगे हैं पर आपकी कार्यप्रणाली को देखकर ऐसा लगता है कि आप राज्य की सवा करोड़ जनता की भावना, सोच, विचार से नहीं वरन अपनी सोच और विवेक पर ही भरोसा करते हैं। ऐसे में तमाम संस्थाओं का क्या महत्व है? इसके बावजूद नानीसार को लेकर मैं आपको एक सुझाव दे सकता हूँ। यदि आप उचित समझें तो जेएनयू की तर्ज पर जो आवासीय विश्वविद्यालय आप अपने जन्मदिन पर हर जिले में खोलने की घोषणा कर चुके हैं, उसे नानीसार में खोलने की घोषणा करें। लेकिन जिंदल के हितों के सामने शायद आपको मेरा यह सुझाव पसंद न आए।
रावत जी, आप बार-बार इस कथित अंतरराष्ट्रीय स्कूल से रोजगार देने की बात कर रहे हैं। अभी तक हमें सूचना अधिकार से मिले सरकारी दस्तावेजों में इसके बारे में कोई प्रमाण नहीं मिला। स्पष्ट है यह सब जुबानी जमा खर्च है। यदि आप इस पर सोच रहे हैं तो यह जनता का दबाव नहीं है जिसमें आप अपने तरकश में कोई भी तीर रख सकते हैं। आप बता सकते हैं कि केवल पांच माह में आपकी सरकार ने जमीन आवंटन करने का जो शासनादेष जारी किया उसमें रोजगार भर्ती की क्या व्यवस्था है, गांव के किसानों के बच्चों की पढ़ाई की क्या व्यवस्था है। यदि नहीं, तो मैं समझता हूँ कि मुख्यमंत्री जैसे गरिमापूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति को सदैव जिम्मेदारी से सच बोलना चाहिए। अन्यथा इस पद का भी अवमूल्यन होने लगता है।
खैर, शायद मेरा पत्र लंबा होने लगा है। यदि वक्त मिला और आपके संरक्षण में पल रहे जिंदल और उसके गुण्डों से मैं और मेरा परिवार सुरक्षित रहा तो जरूर मैं जनता के समक्ष आपसे खुली बहस करने को तैयार हूँ,

और आप मेरे इस निमंत्रण को स्वीकारें, ताकि आपके विचार और अनुभवों से उत्तराखण्ड की जनता और मैं कुछ सीख सकें।
बुरा न मानें, यह लोकतंत्र हैं। आपके लाख जुल्म हों, मैं तो अपनी बात कहूंगा।

पी.सी.तिवारी
पी.सी.तिवारी

पी.सी. तिवारी
केंद्रीय अध्यक्ष, उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी
जिला कारागार अल्मोड़ा
29 जनवरी, 2016
संपर्क- 9412092159

पूर्व आलेख : दो टूक

आखिर फ़रवरी 2014 में अपने ही एक कार्यकर्ता को झन्नाटेदार झापड़ मारने से त्तराखंड राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले हरीश रावत की बीती 18 मार्च 2016 को विधान सभा में मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के बीच हुई मारपीट से पतन की कहानी शुरू हुई, और आखिर 27 मार्च को उनकी दो वर्ष एक माह लम्बी पारी का समापन हो गया। उनके इस हश्र की आशंका पहले ही जता दी गयी थी।

  • राष्ट्रपति शासन 27 फ़रवरी को : 7 + 2 = 9
  • विधायक बागी हुए = 9
  • वर्ष 2016 = 2 + 0 +1 + 6 = 9
  • राज्य को अब मिलेगा नौवां मुख्यमंत्री
  • तो क्या 9 का अंक हुआ रावत के लिए अशुभ, क्या घोड़े (Horse) से शुरू हुई उत्तराखंड की राजनीति में Horse Trading के आरोपों के बाद रावत को पड़ी ‘नौ’लत्ती

त्तराखंड राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने वाले हरीश रावत की धनै के पीडीएफ से इस्तीफे, महाराज के आशीर्वाद बिना और झन्नाटेदार थप्पड़ जैसे एक्शन-ड्रामा के साथ हुई ताजपोशी के बाद यही सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है कि क्या रावत अपना बोया काटने से बच पाएंगे। इस बाबत आशंकाएं गैरवाजिब भी नहीं हैं। रावत के तीन से चार दशक लंबे राजनीतिक जीवन में उपलब्धियों के नाम पर वादों और विरोध के अलावा कुछ नहीं दिखता।

हरीश रावत का उत्तराखंड की राजनीति में उदय किसी ‘धूमकेतु’ की तरह हुआ था। अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही जनता के दुलारे इस राजनेता का ऐसा आकर्षण था, कि उन्होंने सबसे कम उम्र में ब्लाक प्रमुख बनने का रिकार्ड बनाया। हालांकि बाद में निर्धारित से कम उम्र का होने के कारण उन्हें भिकियासेंण के ब्लाक प्रमुख के पद से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेशों पर पद से हटना पड़ा था। और आज भी राज्य की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के बाद उन्हें पद से हटना पड़ा है, और आज की तिथि में बकौल स्वयं उनके वह ‘सिर कटे’ मुख्यमंत्री हैं। यह दुर्योग ही कहा जायेगा कि एक अन्य ‘सिर कटे’ राहु ने भी अपने दौर में आज के दौर के सत्ता शीर्ष की तरह का ‘अमरत्व’ प्राप्त भी कर लिया था, किंतु आखिर उसे सिर काट कर वापस उसकी अपनी लाइन में भेज दिया गया।
हालांकि रावत गिरते-टूटते भी फिर सिर उठाकर खड़े होने की राजनीतिक कला बखूबी जानते हैं कि आज की तिथि में यह सवाल मौजू है कि उनकी राजनीति का जो हश्र हुआ है, क्या वह अनपेक्षित था कि यह तय ही था। रावत पर दूसरा पहलू अधिक उभर कर आता है। कहते हैं मनुश्य जैसा बोता है, वही उसे काटना पड़ता है। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाय। रावत पर यह उक्ति कहीं अधिक सटीक बैठती है। रावत ने जैसा-जैसा किया, वैसा-वैसा उनके साथ भी होता चला गया।
रावत ने भाजपा की बीते दौर की त्रिमूर्तियों में शुमार मुरली मनोहर जोशी को अल्मोड़ा में हराकर राजनीतिक रूप से तड़ीपार कराया तो यही दंश उन्हें भी अल्मोड़ा से हरिद्वार ‘भागने’ को मजबूर होने के रूप में झेलना पड़ा। पार्टी में उनके अग्रज पं. नारायण दत्त तिवारी की राजनीतिक यात्रा का अंत एक ‘स्टिंग ऑपरेशन’ से हुआ था। आरोप लगता है कि इसके पीछे रावत थे। अब रावत की आज तक की राजनीतिक यात्रा, कम से कम राजनीतिक शीर्ष पर पहुंचने की यात्रा का अंत करने में भी एक ‘स्टिंग ऑपरेशन’ ने सर्वप्रमुख भूमिका निभाई है। 2012 में बकौल उनके सिपहसालार तत्कालीन सांसद प्रदीप टम्टा, सत्ता शीर्ष पर पहुंचने के लिए विजय बहुगुणा ने रावत के ‘पीठ मंे छुरा’ भौंका था, तो 2014 में रावत भी बहुगुणा की ‘छाती में वार’ जैसा ही कुछ करके ही सत्ता में आए थे। तो अब बहुगुणा ने फिर उन्हें पटखनी मिली है, तो इसे उसी वार-प्रतिवार की श्रृंखला का ही एक हिस्सा माना जाएगा। वहीं उन्हांेने फरवरी 2014 में उत्तराखंड राज्य के आठवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने की शुरुआत अपने ही एक कार्यकर्ता को झन्नाटेदार थप्पड़़ जड़ने से की थी, तो सदन में उनके आखिरी दिन भी ऐसे ही एक और ‘थप्पड़ की गूंज’ भी बाहर तक सुनाई दी थी। ये कुछ ऐसी बातें हैं, जिनके साथ यह बड़ा सवाल रावत की ताजपोशी के दिन से उठ रहा है कि क्या रावत अपना बोया काटने से बच पाएंगे।
रावत के तीन से चार दशक लंबे राजनीतिक जीवन में उपलब्धियों पर नजर डालें तो वहां राजनीतिक चाल-चतुराई, शब्दों को घुमा-घुमाकर मीठी छुरी से विरोधियों ही नहीं सहयोगियों पर भी वार-प्रतिवार, वादों और विरोध के अलावा कुछ नहीं दिखता। चाहे राज्य की पिछली बहुगुणा सरकार हो या 2002 में प्रदेश में बनी पं. नारायण दत्त तिवारी की सरकार, रावत ने कभी अपनी सरकारों और मुख्यमंत्रियों के विरोध के लिए विपक्ष को मौका ही नहीं दिया। दूसरी ओर केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहते चाहे श्रम राज्य मंत्री का कार्यकाल हो, उन्होंने बेरोजगारी व पलायन से पीड़ित अपने राज्य के लिए एक भी कार्य उपलब्धि बताने लायक नहीं किया। वह कृषि मंत्री बने तब भी उन्होंने लगातार किसानी छोड़कर पलायन करने को मजबूर अपने राज्य के किसानों के लिए कुछ नहीं किया। जल संसाधन मंत्री बने, तब भी अपने राज्य की जवानी की तरह ही बह रहे पानी को रोकने या उसके सदुपयोग के लिए एक भी उल्लेखनीय पहल नहीं की। कुल मिलाकर तीन-चार दशक लंबे राजनीतिक करियर के बावजूद रावत के पास अपनी उपलब्धियां बताते के लिए कुछ है तो अपने उत्पाती प्रकृति के समर्थकों की धरोहर है, जिनके बारे में बताया जा रहा है कि वे आखिरी समय में रावत के लिये भी ‘कुछ’ बचाकर नहीं गए हैं। जैसा कि कथित स्टिंग में दिखा। रावत लाचारगी के साथ कह रहे थे, मेरे पास कुछ नहीं है, ऊपर वाले भी ‘कंगले’ बैठे हैं। और बमुश्किल अपना हाथ उठाकर इशारा कर शायद बता रहे थे, मेरे पास तो पांच करोड़ रुपए ही हैं। हां, बाद में ‘टॉप-अप’ जरूर करवा देंगे।
जनता की याददास्त कमजोर होती है। लेकिन, बहुगुणा की सरकार बनने के दौरान एक हफ्ते तक दिल्ली में पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र के नाम पर चले राजनीतिक ड्रामे की यादें अभी बहुत पुरानी भी नहीं पड़ी हैं, जिसकी हल्की झलक हरीश रावत की ताजपोशी के दिन सतपाल महाराज ने भी दिखाई थी। जिसका प्रतिफल यह हुआ कि रावत के राजनीतिक प्रतिवार के फलस्वरूप न केवल सतपाल की जल्द ही कांग्रेस से विदाई हुई, वरन मजबूरी में मंत्री बनाई गई उनकी धर्मपत्नी अमृता रावत को भी मंत्रिमंडल से विदा कर दिया गया। याद रखना होगा, अमृता ही एकमात्र मंत्री थी, जिन्हें कांग्रेस की बहुगुणा व रावत सरकारों से हटाया गया। वहीं शपथ ग्रहण समारोह में ही रावत समर्थकों के ‘कंधों पर झूलते’ हुए ‘दिन-दहाड़े’ दिखाए ‘चाल-चरित्र’ की झलक के चर्चे भी आम रहे, जिस पर आगे टीवी चैनलों ने उनके कार्यकाल के लिए ‘राव‘त’ राज’’ का एक अक्षर बदलकर ‘रावण राज’ कहने जैसी अतिशयोक्तिपूर्ण टिप्पणी भी की।

वह गूल में पानी ना आने पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखने की अदा….

अपने शुरुआती राजनीतिक दौर में अपनी समस्याएं बताने वाले लोगों को तत्काल पत्र लिखकर समाधान कराने का वादा करना, तब हरीश चंद्र सिंह रावत के नाम से पहचाने जाने वाले रावत का लोगों को अपना मुरीद बनाने का मूलमंत्र रहा। अपने खेत में पानी की गूल से पानी न आने की शिकायत करने वाले ग्रामीण को उनका तीसरे दिन ही पोस्टकार्ड से जवाब आ जाता कि उन्हें लगा है कि गूल में पानी आपके नहीं मेरी गूल में नहीं आ रहा है। उन्होंने शिकायत को सिंचाई विभाग के जेई, एई, ईई, एसई से लेकर राज्य के सिंचाई मंत्री, मुख्यमंत्री के साथ ही केंद्रीय सिंचाई मंत्री और प्रधानमंत्री को भी सूचित कर दिया है। गूल में पानी कभी ना आता, लेकिर ग्रामीण पत्र प्राप्त कर ही हरीश का मुरीद बन जाते।

विरोध, विरोध और विरोध….

उत्तराखंड आंदोलन के दौरान हरीश की पहचान उत्तराखंड राज्य विरोधी की भी बनी, जिसके परिणामस्वरूप 1989 के चुनावों के लिए नामांकन कराने के लिए उन्हें मात्र चार-छह समर्थकों के साथ कमोबेश चुपचाप आना पड़ा था। बाद के वर्षों में हरीश की अपने अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र में ब्राह्मणद्रोही क्षत्रिय नेता की छवि बनती चली गई, जिसका परिणाम उन्हें अपनी हार की हैट-ट्रिक और पत्नी की भी हार के बाद अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र का रण छोड़ने पर विवश कर गया। राज्य के ब्राह्मण नेता तिवारी और बहुगुणा का लगातार विरोध करने से भी उनकी इस ब्राह्मण विरोधी छवि का विस्तार ही हुआ। इसी का परिणाम है कि उन्होंने राज्य की कुर्सी प्राप्त भी की तो नारायण दत्त तिवारी के राज्य की राजनीति से दूर जाने के बाद।

जानें कौन और क्या हैं हरीश रावत

हरीश रावत उत्तराखंड में कांग्रेस के सबसे कद्दावर व मंझे हुए राजनेताओं में शामिल रहे हैं। अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत से ही जनता के दुलारे इस राजनेता का ऐसा आकर्षण था, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने सबसे कम उम्र में ब्लाक प्रमुख बनने का रिकार्ड बनाया। हालांकि बाद में निर्धारित से कम उम्र का होने के कारण उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेशों पर भिकियासेंण के ब्लाक प्रमुख के पद से हटना पड़ा था।
27 अप्रैल 1947 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा जिले के ग्राम मोहनरी पोस्ट चौनलिया में स्वर्गीय राजेंद्र सिंह रावत व देवकी देवी के घर जन्मे रावत की राजनीतिक यात्रा एलएलबी की पढ़ाई के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय जाने से शुरू हुई। यहां वह रानीखेत के कांग्रेस विधायक व यूपी सरकार में कद्दावर मंत्री गोविंद सिंह मेहरा के संपर्क में आए, और गांव में एक पत्नी के होते हुए रावत ने रेणुका से दूसरा विवाह किया। यहीं संजय गांधी की नजर भी उन पर पड़ी, जिन्होंने तभी उनमें भविष्य का नेता देख लिया था, और केवल 33 वर्ष के युवक हरीश को 1980 में कांग्रेस पार्टी का न केवल सक्रिय सदस्य बनाकर, वरन लोक सभा चुनावों में अल्मोड़ा संसदीय सीट से कांग्रेस-इंदिरा का टिकट दिलाने के साथ ही कांग्रेस सेवादल की जिम्मेदारी भी सोंप दी। इस चुनाव में हरीश ने गांव से निकले एक आम युवक की छवि के साथ बाद में भाजपा के त्रिमूर्तियों में शुमार व तब भारतीय लोक दल से तत्कालीन सांसद प्रोफेसर डा. मुरली मनोहर जोशी के विरुद्ध 50 हजार से अधिक मतों से बड़ी पटखनी देकर भारतीय राजनीति में एक नए ‘धूमकेतु’ के उतरने के संकेत दे दिए। जोशी को मात्र 49,848 और रावत को 1,08,503 वोट मिले। आगे 1984 में भी उन्होंने जोशी को हराकर अल्मोड़ा सीट छोड़ने पर ही विवश कर दिया। 1989 के चुनावों में उक्रांद के कद्दावर नेता काशी सिंह ऐरी निर्दलीय और भगत सिंह कोश्यारी भाजपा के टिकट पर उनके सामने थे। यह चुनाव भी रावत करीब 11 हजार वोटों से जीते। रावत को 1,49,703, ऐरी को 1,38,902 और कोश्यारी को केवल 34,768 वोट मिले, और यही कोश्यारी रावत से 12 वर्ष पहले उत्तराखंड के दूसरे मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। आगे वह युवा कांग्रेस व कांग्रेस की ट्रेड यूनियन के साथ ही 2000 से 2007 तक उत्तराखंड कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। इस बीच 2002 में वह राज्य सभा सांसद के रूप में भी संसद पहुंचे।
उत्तराखंड आंदोलन के दौर में हरीश रावत उत्तराखंड आंदोलन के दौरान वह राज्य विरोधी रहे। कहते हैं कि इसी कारण 1989 के लोक सभा चुनावों के लिए उन्हें जनता के विरोध को देखते हुए अल्मोड़ा में नामांकन कराने के लिए भी चुपचाप अकेले आना पड़ा। लेकिन इस चुनाव में उक्रांद के काशी सिंह ऐरी को हराने के बाद राजनीतिक चालबाजी दिखाते हुए अचानक अपने सिपहसालार किशोर उपाध्याय के साथ उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति का गठन कर खुद को राज्य आंदोलन से जोड़ते हुए एक तरह से राज्य आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ले ली। हालांकि इस दौरान भी वह राज्य से पहले केंद्र शासित प्रदेश की मांग पर बल देते रहे। आगे रामलहर के दौर में रावत भाजपा के नए चेहरे जीवन शर्मा से करीब 29 हजार वोटों से सीट गंवा बैठे। इसके साथ ही विरोधियों को मौका मिल गया, जो उनकी राजनीतिक छवि एक ब्राह्मण विरोधी छत्रिय नेता की बनाते चले गए, जिसका नुकसान उन्हें बाद में केंद्रीय मंत्री बने भाजपा नेता बची सिंह रावत से लगातार 1996, 1998 और 1999 में तीन हारों के रूप में झेलना पड़ा। 2004 के लोक सभा चुनावों में हरीश की पत्नी रेणुका को भी बची सिंह रावत ने करीब 10 हजार मतों के अंतर से हरा दिया। लेकिन इन विपरीत हालातों को भी वह अपने पक्ष में मोड़ने में सफल रहे। 2009 के चुनावों में रावत ने एक असाधारण फैसला करते हुए दूर-दूर तक संबंध रहित प्रदेश की हरिद्वार सीट से नामांकन करा दिया, जहां समाजवादी पार्टी से उनकी परंपरागत सीट रिकार्ड 3,32,235 वोट प्राप्त कर छीन ली, और इस तरह उनका एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ के रूप में राजनीतिक पुर्नजन्म हुआ। इसी जीत के बाद उन्हें केंद्र सरकार में पहले श्रम राज्यमंत्री बनाया गया, और आगे केंद्रीय मंत्रिमंडल में उनका कद बढ़ता चला गया। वर्ष 2011 में कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग में राज्य मंत्री, तथा बाद में ससंदीय कार्य राज्य मंत्री के बाद 2012 में वह जल संसाधन मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। इस दौरान वह लगातार विपक्ष के हमले झेल रही यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी के ‘फेस सेवर’ की दोहरी जिम्मेदारी निभाते रहे। अनेक बेहद विषम मौकों पर जब पार्टी के कोई भी नेता मीडिया चौनलों पर आने से बचते थे, रावत एक ही दिन कई-कई मीडिया चौनलों पर अपनी कुशल वाकपटुता और तर्कों के साथ पार्टी और सरकार का मजबूती से बचाव करते थे। इस तरह वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के समक्ष उत्तराखंड के सबसे विश्वस्त और भरोसेमंद राजनेता बनने में सफल रहे। शायद इसी का परिणाम रहा कि 2002 और 2012 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को प्रदेश में सत्ता तक पहुंचाने में सबसे प्रमुख भूमिका निभाने वाले हरीश रावत के राजनीतिक कौशल की हाईकमान अधिक दिनों तक अनदेखी नहीं कर पाया, और लोक सभा चुनावों के विपरीत नजर आ रहे हालातों में रावत के हाथों में ही संकटमोचक के रूप में उत्तराखंड राज्य की सत्ता सोंपी गई।

 स्याह पक्ष:

गांव में एक पत्नी के होते हुए रावत ने रेणुका से दूसरा विवाह किया। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान वह राज्य विरोधी रहे। इसी कारण 1989 के लोक सभा चुनावों के लिए उन्हें जनता के विरोध को देखते हुए अल्मोड़ा में नामांकन कराने के लिए भी चुपचाप अकेले आना पड़ा। लेकिन इस चुनाव में उक्रांद के काशी सिंह ऐरी को हराने के बाद राजनीतिक चालबाजी दिखाते हुए अचानक उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति का गठन कर खुद को राज्य आंदोलन से भी जोड़ लिया। हालांकि इस दौरान भी वह राज्य से पहले केंद्र शासित प्रदेश की मांग पर बल देते रहे। अल्मोड़ा के सांसद रहते वह ब्राह्मण विरोधी क्षत्रिय नेता बनते चले गए, जिसका खामियाजा उन्हें बाद में स्वयं की हार की तिकड़ी और पत्नी रेणुका की भी हार के साथ अल्मोड़ा छोड़ने के रूप में भुगतना पड़ा। आगे प्रदेश में पंडित नारायण दत्त तिवारी और विजय बहुगुणा सरकारों को लगातार स्वयं और अपने समर्थक विधायकों के भारी विरोध के निशाने पर रखा, और अपनी ब्राह्मण विरोधी क्षत्रिय नेता और सत्ता के लिए कुछ भी करने वाले नेता की छवि को आगे ही बढ़ाया। केंद्र में श्रम एवं सेवायोजन, कृषि एवं खाद्य प्रसंसकरण तथा जल संसाधन मंत्री रहे, लेकिन इन मंत्रालयों के जरिए प्रदेश के बेरोजगारों को रोजगार, कृषि व फल उत्पादों को बढ़ावा देने तथा जल संसाधनों के सदुपयोग की दिशा में उन्होंने एक भी उल्लेखनीय कार्य राज्य हित में नहीं किया।

मुख्यमंत्री हरीश रावत का राजनीतिक लेखा-जोखा

चुनाव लोक सभा क्षेत्र         जीते                                                हारे
1980 अल्मोड़ा हरीश रावत-कांग्रेस-ई (108530)      मुरली मनोहर जोशी-भाजपा(49848)
1884 अल्मोड़ा हरीश रावत-कांग्रेस (185006)         मुरली मनोहर जोशी-भाजपा(44674)
1989 अल्मोड़ा हरीश रावत-कांग्रेस (149703)         काशी सिंह ऐरी-निर्दलीय (138902)
1991 अल्मोड़ा जीवन शर्मा-भाजपा (149761)         हरीश रावत-कांग्रेस (120616)
1996 अल्मोड़ा बची सिंह रावत-भाजपा (161548)    हरीश रावत-कांग्रेस (104642)
1998 अल्मोड़ा बची सिंह रावत-भाजपा (228414)    हरीश रावत-कांग्रेस (146511)
1999 अल्मोड़ा बची सिंह रावत-भाजपा (192388)    हरीश रावत-कांग्रेस (180920)
2004 अल्मोड़ा बची सिंह रावत-भाजपा (225431)    रेणुका रावत-कांग्रेस (215568)
2009 हरिद्वार हरीश रावत -कांग्रेस (332235)          स्वामी यतींद्रानंद गिरि-भाजपा (204823)

नेहरू के बहाने: सोनिया-राहुल से भी आगे निकलने की कोशिश में हरीश रावत

नवीन जोशी, नैनीताल। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शुरू होकर भाजपा और राजग को भी कांग्रेस के सम्मेलन में न बुलाने को लेकर ‘नेहरू के बहाने’ शुरू हुई बहस में अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत भी कूद पड़े हैं। मौका भुनाते हुए रावत ने कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी और राहुल गांधी के न केवल सुरों में सुर मिलाए हैं, वरन उनसे भी आगे निकलने की कोशिश की है। उन्होंने किसी का नाम लिए बिना कहा सांप्रदायिक ताकतों के द्वारा नेहरू के व्यक्तित्व को खंडित करने की कोशिश की जा रही है, पर यह असंभव है। लेकिन उनकी (नेहरू की) विचारधारा को खंडित करने की बड़ी चिंता है। कुछ लोग (नाम लिए बिना) नेहरू द्वारा रखी गई गांव आधारित योजनागत विकास की बुनियाद को हिलाने, कमजोर करने में लगे हैं। वह इसकी जगह कॉरपोरेट की बात करते हैं। कांग्रेसजनों को इससे सावधान रहना है। कहा, ऐसी कोशिशों को बर्दास्त नहीं किया जाएगा और मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा।

श्री रावत ने यह बात शुक्रवार को नैनीताल क्लब स्थित शैले हॉल में देश के प्रथम राष्ट्रपति जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस-बाल दिवस के अवसर पर उनके चित्र पर माल्यार्पण करने के उपरांत कही। कहा, 125वीं जयंती पर नेहरू जी की प्रासंगिकता उनके जीवन काल से भी अधिक बढ़ गई है। नेहरू जी ने गांधी जी के समरसता, सर्वधर्म सम्भाव व धर्मनिरपेक्षता जैसे सिद्धांतों को अपने व्यक्तित्व में शामिल कर लिया था। आज देश ने जो भी प्रगति की है, उसकी नींव नेहरू जी ने ही रखी थी। वह सांप्रदायिकता के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने ही देश को योजनागत विकास का मॉडल दिया था, और अंग्रेजों की गुलामी से छूटे देश को दुनिया की पांचवी औद्योगिक शक्ति के रूप में स्थान दिलाया था, तथा अपने देश को आजादी दिलाने के साथ ही 150 अन्य देशों को भी आजादी की राह दिखाकर रूस व अमेरिका के सामने तीसरी विश्व शक्ति खड़ी की थी। उन्होंने ही बोकारो से लेकर भिलाई और दुर्गापुर से लेकर भाखड़ा बांध बनाकर उद्योगों, ऊर्जा जरूरतों और सिंचाई की परियोजनाएं शुरू की थीं। भाभा एटोमिक प्लांट बनाया था, जिससे हम बाद में इंदिरा गांधी के दौर में अणुशक्ति बने। उन्होंने ही अंतरिक्ष मिशन की नीव रखी थी, जिसके प्रतिफल में आज हम चंद्रयान, मंगलयान भेजने में सफल रहे हैं।

बिना बच्चों ने मनाया बाल दिवस

नैनीताल। बाल दिवस के अवसर पर कांग्रेसजनों ने शैले हॉल में कार्यक्रम आयोजित किया था, लेकिन कार्यक्रम में एक भी बच्चे को नहीं बुलाया गया था। ऐसे में स्वयं सीएम ने ही पहल करते हुए खुद बच्चों की तरह ‘चाचा नेहरू जिंदाबाद” के नारे लगाए, जबकि इसके प्रतिफल में पार्टी जन ‘हरीश रावत जिंदाबाद” के नारे ही लगाते रहे।

यह भी पढ़ें:  कौन और क्या हैं हरीश रावत, हरीश रावत से संबंधित अन्य आलेख :  क्या अपना बोया काटने से बच पाएंगे हरीश रावत, कांग्रेस पार्टी और उनके नेताओं के सम्बन्ध में और पढ़ें : यहां क्लिक कर के

यह क्या अजीबोगरीब हो रहा हरीश सरकार में !

हरीश रावत के आते ही तीन ‘रावत’ निपटे 
उत्तराखंड में जब से हरीश रावत के नेतृत्व में सरकार बनी है, बहुत कुछ अजीबोगरीब हो रहा है। विरोधियों को ‘विघ्नसंतोषी’ कहने और उनसे निपटने में महारत रखने वाले रावत के खिलाफ मुंह खोल रहे और खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बता रहे तीन रावत (सतपाल, अमृता और हरक) निपट चुके हैं। सतपाल व अमृता के खिलाफ विपक्ष ने अपने परिजनो को पॉलीहाउस बांटने में घोटाले का आरोप लगाया, और सीबीआई जांच की मांग उठाई है। हरक का नाम दिल्ली की लॉ इंटर्न ने छेड़खानी का मुक़दमा दर्ज कराकर ख़राब कर दिया है। बचा-खुचा नाम भाजपाई हरक को ‘बलात्कारी हरक सिंह रावत’ बताकर और उनका पुतला फूंक कर ख़राब करने में जुट गए हैं। रावत ने पहले ही उनके पसंदीदा कृषि महकमे की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी गैर विधायक तिलक राज बेहड़ को मंत्री के दर्जे के साथ देकर जोर का झटका धीरे से दे दिया था। विपक्ष के ‘मुंहमांगे’ से अविश्वाश प्रस्ताव से हरीश सरकार पहले ही छह मांह के लिए पक्की हो ही चुकी है। अब यह समझने वाली बात है कि विरोधी खुद-ब-खुद निपट रहे और रावत की राह स्वतः आसान होती जा रही है कि यह रावत के राजनीतिक या कूटनीतिक कौशल का कमाल है।

माँगा गाँव-मिला शहर  

हरीश रावत सरकार आसन्न त्रि-स्तरीय पंचायत व लोक सभा चुनावों की चुनावी बेला में अनेक अनूठी चीजें कर रही हैं। अचानक राज्य के सब उत्तराखंडी लखपति हो गए हैं। सरकार ने बताया है, राज्य की प्रति व्यक्ति आय 1,12,000 रुपये से अधिक हो गयी है। सांख्यिकी विभाग ने आंकड़ों की बाजीगरी कर कर सिडकुल में लगे चंद उद्योगों के औद्योगिक घरानों की आय राज्य की जीडीपी में जोड़कर यह कारनामा कर डाला है।
दूसरे संभवतया देश में ही ऐसा पहली बार हुआ है कि राज्य में पंचायत चुनावों की अधिसूचना 1 मार्च को और चुनाव आचार संहिता 2 मार्च से जारी होने वाली है और चुनावों के लिए नामांकन पत्रों की बिक्री इससे एक सप्ताह पहले 24 फरवरी से ही शुरू हो गयी है।
तीसरे राज्य के वन क्षेत्र सीधे ही शहर बन गए हैं। लालकुआ के पास पूरी तरह वन भूमि पर बसे बिन्दुखत्ता को राज्य कैबिनेट ने जनता की राजस्व गाँव घोषित करने की मांग से भी कई कदम आगे बढ़कर एक तरह के बिन मांगे ही स्वतंत्र रूप से नगर पालिका बनाने की घोषणा कर दी है, वहीँ इसी तरह के दमुवाढूंगा को सीधे हल्द्वानी नगर निगम का हिस्सा बनाने की घोषणा कर दी गयी है।

यह भी पढ़ें :

10 जनपथ की नाकामी अधिक है बहुगुणा की वापसी

उत्तराखंड में आयी दैवीय आपदा का आख़िरी पीड़ित

अपने दो वर्ष से भी कम समय में ही उत्तराखड की सत्ता से च्युत हुए विजय बहुगुणा की मुख्यमन्त्री पद से वापसी न केवल उनकी वरन 10 जनपथ की नाकामी अधिक है। 2010 के बाद दोबारा मार्च 2012 में विधायक दल की स्वाभाविक पसंद की अनदेखी के बावजूद उन्हें राज्य पर थोपे जाने  का ही नतीजा है कि बहुगुणा अपने कार्यकाल के पहले दिन से ही कमोबेश हर दिन सत्ता से आते-जाते रहे और एक जज के बाद एक सांसद और अब मुख्यमंत्री के रूप में भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए हैं.  तथा अपना नाम डुबाने के साथ ही अपने पिता के नाम पर भी दाग लगा चुके हैं, और कांग्रेस को भी केदारनाथ आपदा के दौरान अपने निकृष्ट कुप्रबंधन से न केवल उत्तराखंड वरन पूरे देश में नुकसान पहुंचा चुके हैं।

याद रखना होगा कि बहुगुणा की ताजपोशी 10 जनपथ को 500 करोड़ रुपए की थैली पहुंचाए जाने का प्रतिफल बताई गई थी। शायद तभी उन्हें पूरे देश को झकझोरने वाली उत्तराखंड में आई जल प्रलय की तबाही में निकृष्ट प्रबंधन की नाकामी और चारों ओर से हो रही आलोचनाओं के बावजूद के बावजूद नहीं हटाया गया। और अब हटाया भी गया है तो तब , जब तमाम ओपिनियन पोल में कांग्रेस को आगामी लोक सभा चुनावों में उत्तराखंड में पांच में से कम से कम चार सीटों पर हारता बताया जा रहा है, और आसन्न पंचायत चुनावों में भी कांग्रेस की बहुत बुरी हालत बताई जा रही है।

अब तो बस यह देखिये कि बहुगुणा के लिए 13 का अंक शुभ होता है या नहीं….

“चिंता न करें, जल्द मान जाऊँगा…” शायद यही कह रहे हैं हरीश रावत, उत्तराखंड के सीएम विजय बहुगुणा से
दोस्तो आश्चर्य न करें, कांग्रेस पार्टी में बिना पारिवारिक पृष्ठभूमि के कोई नेता मुख्यमंत्री बनना दूर आगे भी नहीं बढ़ सकता…बहुगुणा की ताजपोशी पहले से ही तय थी, बस माहौल बनाया जा रहा था….
विजय बहुगुणा को उत्तराखंड का सीएम बनाना कांग्रेस हाईकमान ने चुनावों से पहले ही तय कर लिया था. इसकी शुरुवात तब के पराजित भाजपा सांसद प्रत्यासी रहे अंतर्राष्ट्रीय निशानेबाज जसपाल राणा को कांग्रेस में शामिल कराया गया था, ताकि बहुगुणा को सीएम बनाये जाने पर पौड़ी सीट खली हो तो वहां से जसपाल को चुनाव लड़ाया जा सके. तब इसलिए उनका नाम घोषित नहीं किया गया कि पार्टी के अन्य क्षत्रप पहले ही (अब की तरह) न बिदक जाएँ. 6 मार्च को चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भी नाम घोषित नहीं किया, ताकि सीएम पद का ख्वाब पाल रहे दावेदार बहुमत के लिए जरूरी निर्दलीयों व उक्रांद का समर्थन हासिल कर लायें.  क्षत्रप 36 का आंकड़ा तो हासिल कर लाये, पर यहाँ पर एक गड़बड़ हो गयी. निर्दलीय अपने आकाओं को सीएम बनाने की मांग उठा कर एक तरह से हाईकमान को आँख दिखाने लगे, इस पर हाईकमान को एक बार फिर बहुगुणा को सीएम बनाने की घोषणा टालनी पडी. अब प्रयास हुए बसपा का समर्थन हासिल करने की, बसपा के कथित तौर पर दो विधायक कांग्रेस में आने को आतुर थे, ऐसे में तीसरा भी क्यों रीते हाथ बैठता. ऐसे में बसपाई 12 मार्च को राजभवन जा कर कमोबेश बिन मांगे कांग्रेस को समर्थन का पत्र सौंप आये. अब क्या था, तत्काल ही कांग्रेस हाईकमान ने बहुगुणा के नाम की घोषणा कर दी. इसके तुरंत बाद हरीश रावत गुट ने दिल्ली में जो किया, उससे कांग्रेस में बीते सात दिनों से ‘आतंरिक लोकतंत्र’ के नाम पर चल रहे विधायकों की राय पूछने के ड्रामे की पोल-पट्टी खुल गयी.
सच्चाई है कि कांग्रेस हाईकमान के विजय बहुगुणा को सीएम घोषित करने का एकमात्र कारण था उनका पूर्व सीएम हेमवती नंदन बहुगुणा का पुत्र होना. स्वयं परिवारवाद पर चल रहे कांग्रेस हाईकमान के लिए अपनी इस मानसिकता से बाहर निकलना आसान न था, रावत समर्थक सांसद प्रदीप टम्टा कह चुके हैं की बहुगुणा को कांग्रेस के बड़े नेता किशोर उपाध्याय को निर्दलीय दिनेश धने के हाथों हराकर पार्टी की ‘पीठ में छुरा भौकने’ का इनाम मिला है, जबकि रावत कांग्रेस की ‘छाती में वार’ करने चले थे. सो आगे उनका ‘कोर्टमार्शल’ होना तय है, कब होगा-इतिहास बतायेगा. हरीश रावत और उनके समर्थक नेता इस बात को जितना जल्दी समझ लें बेहतर होगा..
किसी भ्रम में न रहें, कुछ भी आश्चर्यजनक या अनपेक्षित नहीं होने जा रहा है, बन्दर घुड़की दिखाने के बाद दोनों रावत (हरीश-हरक) व टम्टा आदि हाईकमान की ‘दहाड़’ के बाद चुप होकर फैसले को स्वीकार कर लेंगे, किसी शौक से नहीं वरन इस फैसले को ही नियति मानकर, आखिर उनका इस पार्टी के इतर अपना कोई वजूद भी तो नहीं है.
अब तो बस यह देखिये कि 13 मार्च को प्रदेश के सीएम पद की शपथ ग्रहण करने वाले बहुगुणा के लिए 13 का अंक पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की तरह पूर्व मान्यताओं के इतर शुभ होता है या नहीं….बहरहाल खंडूडी के बाद उनके ममेरे भाई में प्रदेश की जनता एक धीर-गंभीर मुख्यमंत्री देख रही है..

2 thoughts on “ब्रेकिंग : हरीश रावत स्टिंग मामले में CBI की रिपोर्ट कोर्ट में हुई पेश, CBI कर सकती है FIR, परन्तु…

Leave a Reply

Loading...
loading...