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गौलापार से आईएसबीटी हटाने पर सरकार से हाईकोर्ट ने किया जवाब तलब

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  • हाईकोर्ट ने सरकार से माँगा अब तक के खर्च का हिसाब व पूछा क्यों हटाया गौलापार से आईएसबीटी
  • तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा

नैनीताल। हल्द्वानी के गौलापार में आईएसबीटी के निर्माण में हाथ खींचना कांग्रेस के विरोध के बाद उच्च न्यायालय पहुंचकर सरकार के लिए परेशानी का कारण बन गया लगता है। उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएम जोसफ और न्यायमूर्ति शरद शर्मा की खंडपीठ ने बुधवार को मामले की सुनवाई कर सरकार से 3 हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। पूछा है कि आईएसबीटी पर अब तक कितना धन खर्च हुआ है, और क्यों बेवजह इसे यहां से हटाया जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि मामले में गौलापार निवासी रविशंकर जोशी ने नैनीताल उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल दाखिल कर कहा है कि गौलापार में ही बस अड्डा बनाया जाना चाहिये, क्योंकि वर्ष 2008-09 में आईएसबीटी बनाये जाने की अनुमति मिलने के बाद से 2015 में भूमि को वन विभाग ने परिवहन विभाग को हस्तांतरित हुई। 2015 के बाद बमुश्किल इस स्थान पर 27 सौ हरे पेड़ों का कटान हुआ, और 8 हैक्टेयर भूमि से अन्य पौधों को भी हटाकर निर्माण शुरु किया गया। जमीन के प्रस्ताव पास होने के दौरान डीएम, डीएफओ व आरटीओ ने भी प्रमाणित रिपोर्ट दी कि हल्द्वानी में कहीं भी बस अड्डे के लिये भूमि उपलब्ध नहीं है। इसीलिये इस भूमि को बस स्टेशन के लिये हस्तांतरित किया गया, और इस पर अब तक 3 करोड़ से ज्यादा रुपए खर्च हो चुके हैं। बावजूद अब कहा जा रहा है कि आईएसबीटी को यहां से शिफ्ट किया जायेगा, जिसका कोई आधार व कारण भी नहीं बताया गया है। बुधवार को की खण्डपीठ में हुई सुनवाई के बाद कोर्ट ने सरकार से पूरे मामले पर निर्देश मांगे है कियाचिकाकर्ता के अधिवक्ता राजीव बिष्ट ने बताया कि न्यायालय ने सुनवाई के दौरान इसे जनहित से जुड़ा मुद्दा माना और कहा कि गौलापार में बस अड्डा बनने से सरकार का ही पैंसा बचेगा।

पृष्ठभूमि :

उल्लेखनीय है कि ग्रेटर हल्द्वानी (गौलापार) में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 14 अक्तूबर 2016 आठ हेक्टेयर भूमि पर 76 करोड़ रुपए की लागत से आईएसबीटी के निर्माण का शिलान्यास किया था। मार्च 2017 तक सत्ता में रही कांग्रेस यहां हल्द्वानी विधायक व तत्कालीन काबीना मंत्री डा. इंदिरा हृदयेश के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर कुछ भी खास काम प्रारंभ नहीं करा पाई। जबकि भाजपा सरकार ने आने के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसके पीछे जाहिर तौर यहां निर्माण कार्य के दौरान खुदाई में कुछ कंकाल मिलने को कारण बताया गया, लेकिन पीछे से आ रही खबरों के अनुसार कांग्रेस सरकार के दौर में अपने लोगों को दिये ठेके व घूसखोरी के साथ हल्द्वानी शहर से आईएसबीटी के लिए ‘पहुंच मार्ग में दिक्कत’ बताई गयी है। इस तरह यह मामला राजनीति की भेंट चढ़ता भी नज़र आया है।

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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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