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कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों में एकल घर बनाने वालों के लिए बड़ी राहत, 5 की जगह केवल 1 फीसद देना होगा शुल्क

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  • राष्ट्रीय व राज्य मार्गों के केवल 200 मीटर के दायरे ही आयेंगे प्राधिकरण के दायरे में
  • 200 मीटर के अंतर्गत भी एकल आवासीय भवन बनाने के लिए नक्शा स्वीकृत कराने की जरूरत नहीं होगी
  • सरकार की घोषणा के अनुरूप विकास शुल्क में 70 फीसद तक की कटौती होगी
जिला प्राधिकरण बोर्डों की बैठक की जानकारी देते मंडलायुक्त राजीव रौतेला।

नैनीताल, 7 अगस्त 2018। कुमाऊं मंडल के पर्वतीय क्षेत्रों में अपने लिये नये एकल आवासीय घर बनाने के इच्छुक लोगों के लिए बड़ी खुशखबरी है। अब वे पूर्व में तय 5 फीसद की जगह अब 200 वर्ग मीटर तक केवल 1 प्रतिशत तथा 200 वर्ग मीटर से अधिक के भूखण्डों पर 2 प्रतिशत सबडिवीजन शुल्क देकर बेखौफ होकर घर बना सकेंगे। वहीं जिला विकास प्राधिकरणों का दायरा राष्ट्रीय व राज्य मार्गों के केवल 200 मीटर के दायर में सीमित होगा। इसके बाहर के क्षेत्र में निर्माण पूर्व की तरह हो सकेंगे। 200 मीटर के अंतर्गत क्षेत्र में भी एकल आवासीय भवन बनाने के लिए नक्शा स्वीकृत कराने की जरूरत नहीं होगी। केवल भवन निर्माणकर्ता को प्राधिकरण से अधिकृत आर्किटेक्टों से भूकंपरोधी नक्शे बनाने होंगे एवं उन्हें अधिकृत आर्किटेक्टों से भूकंपरोधी होने का प्रमाणपत्र प्राधिकरण में जमा कराना होगा। इसके अलावा सरकार की घोषणा के अनुरूप विकास शुल्क में 70 फीसद तक की कटौती करने का निर्णय भी प्राधिकरण बोर्ड ने ले लिया है। सभी जिलों में प्राधिकरण संबंधी समस्याओं-शिकायतों के निस्तारण के लिए माह में एक दिन ‘प्राधिकरण दिवस’ आयोजित होंगे, जिसमें टाउन प्लानर एवं अन्य अधिकारी पहुंचकर समस्याओं का समाधान करेंगे। अधिकारियों को नक्शे निर्धारित समय सीमा में पास करने होंगे।
मंगलवार को जिला विकास प्राधिकरण सभागार में नैनीताल अल्मोड़ा एवं ऊधमसिंह नगर जिलों के प्राधिकरणों की प्राधिकरण बोर्डों की अध्यक्ष कुमाऊं मंडलायुक्त राजीव रौतेला की अध्यक्षता में हुई दूसरी बैठक में यह निर्णय लिये गये। निर्णयों की जानकारी देते हुए आयुक्त श्री रौतेला ने बताया कि पहले पर्वतीय क्षेत्र के नगरों के लिए शुल्क 2 एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 5 फीसद था, जिसे 1 फीसद कर दिया गया है, ताकि लोग स्वेच्छा से संबंधित प्राधिकरणों में आयें। सिटीजन चार्टर के अनुसार प्राधिकरण द्वारा आवासीय भवन का मानचित्र आवेदन प्राप्त होने के 15 दिन के भीतर तथा व्यवसायिक भूखण्डों के मानचित्र 30 दिनों के भीतर स्वीकृत कर दिये जायेंगे। आयुक्त ने कहा कि प्राधिकरणों का उद्देश्य प्राप्त शुल्क से संबंधित क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना है, न कि लोगों को परेशान करना। प्राधिकरणों के कार्यों को सुचारू तरीके से चलाने के लिए शासन के प्राविधानों के अनुसार शासन से आउटसोर्सिंग के जरिये नियुक्तियां करने के लिए आवेदन करने का निर्णय भी लिया गया। आगे बुधवार को पिथौरागढ़, बागेश्वर एवं चंपावत जिलों के प्राधिकरण बोर्डों की बैठक होगी, और उनमें भी यही निर्णय होने की संभावना जतायी जा रही है। इस मौके पर नैनीताल डीएम विनोद कुमार सुमन, एडीएम हरबीर सिंह, आरडी पालीवाल, उप निदेशक सूचना योगेश मिश्रा सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

नैनीताल आने वाले तीनों मार्गों पर निर्माण पूरी तरह से प्रतिबंधित

नैनीताल। कुमाऊं मंडलायुक्त राजीव रौतेला ने बताया कि पर्यटन नगरी नैनीताल को काठगोदाम, कालाढुंगी व भवाली से आने वाले तीनों मार्गों पर हर तरह के निर्माणों को प्रतिबंधित कर दिया गया है। साथ ही पूर्व में हुए निर्माणों की जांच करने तथा नियमविरुद्ध बने आवासों के खिलाफ कार्रवाई करने आदेश भी दे दिये गये हैं। केवल किसी क्षेत्र को बहुत बेहतर तरीके से विकसित करने वाले प्रस्तावों पर ही आगे विचार किया जा सकेगा। बताया कि काठगोदाम-नैनीताल मार्ग पर वर्ष 2019 के उत्तरार्ध से टू-लेन किये जाने के कार्य शुरू होने जा रहे हैं। इसलिए हर तरह के निर्माण सड़क चौड़ीकरण में बाधक बन सकते हैं।

एकमुस्त पांच वर्ष के लिए मिलेगी जिला विकास प्राधिकरणों से भवन निर्माण की स्वीकृति

नैनीताल, 7 मार्च, 2018। जिला विकास प्राधिकरणों के द्वारा भवन निर्माण हेतु मानचित्रों की स्वीकृति पांच वर्ष के लिये एक साथ ही दे दी जायेगी, परन्तु भवन निर्माण प्राधिकरण नियमावली व मानकों के अनुसार ही बनाये जायेंगे। जिला प्राधिकरणों के तहत सभी क्षेत्रीय कार्यालय की स्थापना यथाशीघ्र की जाएगी। वहीं नैनीताल जिला प्राधिकरण के संयुक्त सचिव हल्द्वानी क्षेत्रीय कार्यालय के साथ ही सप्ताह में एक दिन क्षेत्रीय कार्यालय रामनगर में भी बैठेंगे। नैनीताल नगर क्षेत्र में व्यवसायिक भवनों के निर्माण पूर्णतया प्रतिबंधित होने के मद्देजर गृह-आवास यानी होम स्टे आदि के अनुमन्यता प्रकरण शासन को संदर्भित किये जाएंगे।

बुधवार को जिला विकास प्राधिकरण बोर्ड की द्वितीय बैठक लेते हुये मंडलायुक्त एवं प्राधिकरणों के अध्यक्ष प्राधिकरण चन्द्र शेखर भट्ट ने गत बैठक मे लिये गये निर्णयों की समीक्षा करते हुये प्राधिकरण के नियमों एवं मानकों के अनुसार कार्य करने के निर्देश अधिकारियों को दिये। बोर्ड बैठक में निर्णय लिया गया कि सभी क्षेत्रीय कार्यालय की स्थापना कर कार्य प्रारम्भ किया जाय। क्षेत्रीय कार्यालय हल्द्वानी हेतु भूमि तलाशने के साथ ही बोर्ड के समक्ष प्रस्ताव प्रस्तुत करने को कहा। तहसील रामनगर के ग्राम शिवलालपुर पान्डे में प्रस्तावित जलपान गृह निर्माण, नैनीताल नगर पालिका क्षेत्र में गृह आवास, होम स्टे की अनुमन्यता के संबंध में भी चर्चा की गयी। बैठक में प्राधिकरण उपाध्यक्ष डीएम दीपेन्द्र कुमार चौधरी, सचिव श्रीश कुमार, सदस्य एसके पंत, मुख्य नगर एवं ग्राम नियोजक एसके पंत, कोषाधिकारी मामूर जहां, सहायक नगर आयुक्त विजेन्द्र सिंह चौहान, धीरेन्द्र रावत, राजेन्द्र कुमार अग्रवाल, टाउन प्लानर एसएम श्रीवास्तव, अभियंता सीएम साह आदि मौजूद रहे।

पूर्व आलेख : कुमाऊं के सभी परगनों में खुलेंगे जिला विकास प्राधिकरण के कार्यालय

  • 350 वर्ग मीटर के प्लॉटों पर निर्माण की स्वीकृति प्राधिकरण सचिव एवं इससे ऊपर डीएम देंगे
  • राष्ट्रीय एवं राज्य मार्गों के मध्य से 200 मीटर की परिधि के राजस्व गांवों में 200 वर्ग मीटर के आवासीय भवन एवं 30 वर्ग मीटर की स्वयं की व्यवसायिक दुकानों को मानचित्र स्वीकृत कराने से मिली छूट
  • नैनीताल शहर के जोन-1 व 2 के साथ ग्रीन बेल्ट क्षेत्र में निर्माण पूर्व की तरह प्रतिबंधित

नैनीताल। जनता को सही समय पर प्राधिकरण के नियमों आदि की जानकारियां प्राप्त हों व अनावश्यक परेशानियों का सामना ना करना पड़े इसके लिये कुमाऊं मंडल के सभी परगनों में संबंधित जिले के जिला विकास प्राधिकरणों के क्षेत्रीय कार्यालय खोले जाएंगे। बुधवार को कुमाऊं मंडल के जिला प्राधिकरणों के अध्यक्ष, कुमाऊं आयुक्त चंद्रशेखर भट्ट की अध्यक्षता में हुई बोर्ड बैठक में इसकी स्वीकृति दे दी गयी। साथ ही बोर्ड बैठक में निर्माण कार्यों को नियमों के तहत स्वीकृति देते हुये व्यवसायिक भवनों में वर्षा जल संग्रहण के प्रबंध करने और उन्हें भूकम्परोधी बनाने का प्राविधान रखा गया। अवस्थापना, पद सृजन एवं सम्बद्धता तथा वित्तीय अधिकारों के साथ ही जिला प्राधिकरण के त्रैमासिक बजट को भी स्वीकृति दी गयी।
इसके अलावा प्राधिकरण बनने से पूर्व बने ग्रुप हाउसिंग व बहुमंजिला भवनों, वाणिज्यिक भवनों के निरीक्षण हेतु सचिव की अध्यक्षता में कमेटी कठित की गयी, जो अपनी निरीक्षण रिपोर्ट एक माह में प्राधिकरण के उपाध्यक्षा यानी डीएम को देंगे। बैठक में निर्णय लिया गया कि 350 वर्गमीटर प्लाट तक की स्वीकृति सचिव व संयुक्त स्तर पर दी जायेगी तथा इससे ऊपर के प्लाटों की स्वीकृति उपाध्यक्ष यानी डीएम के स्तर पर दी जायेगी। जनपद के सभी राष्ट्रीय राज्यमार्गों एवं राज्य मार्गों के मध्य से 200 मीटर की परिधि में आने वाले राजस्व गांवों में 200 वर्ग मीटर आकार तक के आवासीय एवं 30 वर्ग मीटर तक की स्वयं की व्यवसायिक दुकानों के निर्माण में मानचित्र स्वीकृत कराने की छूट बैठक में दी गयी। ऑनलाइन सिस्टम से भी प्राधिकरण एवं मानचित्र की स्वीकृति की जानकारियां दी जायेंगी। प्राधिकरणों के द्वारा समय-समय पर अपने विकास क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले शहरों एवं गांवों में अवस्थापना विकास कार्य तथा आवासीय सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजनाएं भी चलाई जाएंगी। वहीं प्राधिकरण की बिना अनुमति प्राप्त किये अवैध निर्माण किये जाने पर निर्माण को यथावत रोकने हेतु सील बंद करने के प्राविधानों को भी मंजूरी दी गयी। बैठक में प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, नैनीताल डीएम दीपेन्द्र कुमार चौधरी ने नैनीताल शहर में जनता की सुरक्षा को देखते हुये शहर के पुराने जीर्णक्षीर्ण भवनों की मरम्मत की स्वीकृति का प्रस्ताव रखा जिस बोर्ड द्वारा शासन को भेजा गया। आयुक्त ने कहा कि नैनीताल शहर के चिन्हित जोन-1 व 2 के साथ ही ग्रीन बेल्ट क्षेत्र में निर्माण कार्य पूर्णतः प्रतिबंधित रहेंगे। बैठक में ऊधमसिंह नगर के डीएम डा. नीरज खैरवाल, आवास विकास परिषद के संयुक्त सचिव राजेंद्र सिंह, उत्तराखण्ड पेयजल निगम के मुख्य अभियंता राजेन्द्र प्रसाद, मुख्य ग्राम व नगर नियोजक एसके पंत, सचिव श्रीश कुमार, प्रताप साह, वित्त सचिव अनीता आर्य, एसडीएम प्रमोद कुमार, पारितोष वर्मा, एपी वाजपेयी, विजेद्र चौहान, केके गुप्ता, सीएम साह, जेपी डबराल सहित अनेक अधिकारी मौजूद रहे।

यह भी पढ़ें : एलडीए-डीडीए : काम से अधिक नाकामियों के साथ मिली प्रोन्नति पर उठ रहे सवाल

राष्ट्रीय सहारा, 16 नवम्बर 2017
राष्ट्रीय सहारा, 16 नवम्बर 2017

-1984 में यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी की पहल पर वृहत्तर नैनीताल विकास प्राधिकरण से हुई थी शुरुआत, 1989 में तिवारी ने ही दिया एनएलआएसएडीए का स्वरूप
नवीन जोशी, नैनीताल। 1984 में पूर्ववर्ती उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री पं. नारायण दत्त तिवाड़ी की पहल पर ‘वृहत्तर नैनीताल विकास प्राधिकरण’ (जीएनडीए) के प्रारंभिक स्वरूप में स्थापित हुए और 1989 में तिवाड़ी द्वारा ही एक तरह से प्रोन्नत कर ‘नैनीताल झील परिक्षेत्र विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एनएलआएसएडीए) अपना वजूद खोकर एक बार पुनः ‘नैनीताल जिला विकास प्राधिकरण’ के रूप में प्रोन्नत होने जा रहा है। इस पर नगर वासियों की आम प्रतिक्रिया यह है कि अपने मौजूदा स्वरूप में काम से अधिक नाकामियों के लिए पहचाना जाने वाला यह प्राधिकरण अपने प्रोन्नत स्वरूप में जनपद का कितना भला कर पाएगा।

यह भी पढ़ें :पूर्व समाचार : नैनीताल झील विकास प्राधिकरण का वजूद खत्म

नैनीताल। कैबिनेट निर्णय के अनुपालन में 12 जिला विकास प्राधिकरणों के गठन के आदेश जारी हो गए हैं। नैनीताल झील विकास प्राधिकरण के गठन से जुड़ी अधिसूचना को खारिज कर दिया गया है। इसके बाद, झील विकास प्राधिकरण का वजूद खत्म हो गया है। इसकी जगह नैनीताल जिला विकास प्राधिकरण अब काम करेगा। शासन ने देहरादून के मामले में अभी कोई फैसला नहीं किया है। माना जा रहा है कि यहां पर एमडीडीए और साडा के विलय के बाद इस संबंध में आदेश जारी हो पाएंगे। जिला विकास प्राधिकरणों के गठन के संबंध में सरकार पूर्व में उलझी रही। पहले सिर्फ चार मैदानी जिलों में जिला विकास प्राधिकरण गठन का कैबिनेट निर्णय हुआ। बाद में पर्वतीय जिलों में भी जिला विकास प्राधिकरण के गठन को मंजूरी दे दी गई। तय किया गया कि राष्ट्रीय और राज्य मार्ग से दो सौ मीटर के अंतर्गत इलाके विकास प्राधिकरण का हिस्सा होंगे। कैबिनेट के निर्णय के अनुपालन में मंगलवार को आवास विभाग ने 12 जिलों से संबंधित 12 शासनादेश जारी कर दिए। आयुक्त को प्राधिकरण में पदेन अध्यक्ष और एडीएम को सचिव बनाया गया है। हरिद्वार को छोड़कर बाकी सभी जगहों में डीएम प्राधिकरण के उपाध्यक्ष होंगे। हरिद्वार में किसी भी आईएएस अफसर को उपाध्यक्ष बनाए जाने की व्यवस्था दी गई है।

जिले भर में विकास और निर्माण गतिविधियों को योजनाबद्ध करने के उद्देश्य से सरकार ने यह निर्णय लिया है। अब प्राधिकरण के दायरे में केवल पर्वतीय क्षेत्र ही नहीं बल्कि हल्द्वानी, कालाढूंगी, रामनगर सहित पूरे जिले का मैदानी क्षेत्र और अब तक छूटा हुआ पर्वतीय क्षेत्र भी इसमें शामिल कर दिया गया है। – श्रीष कुमार, नैनीताल झील प्राधिकरण

इस प्राधिकरण को यूं अपनी स्थापना से ही लगातार प्रोन्नतियां, कार्य विस्तार मिलता रहा है। 29 अक्टूबर 1984 को उत्तर प्रदेश के नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम 1973 के तहत अस्तित्व में आया ‘वृहत्तर नैनीताल विकास प्राधिकरण’ केवल नैनीताल की झीलों के परिक्षेत्र में विकास को नियोजित करने के उद्देश्य से अस्तित्व में आया था। लेकिन पांच वर्ष के भीतर ही इसके खिलाफ आवाजें उठनी शुरू हो गयीं। अनेक स्थानीय लोग इसके विरुद्ध सीएम तिवाड़ी के पास लखनऊ मिलने गए। लोगों की मंशा थी कि यह प्राधिकरण नैनीताल नगर की जनसंख्या को बाहरी क्षेत्रों में नियोजित तरीके से विस्तारित करे। नैनीताल नगर में ही निर्माण न बढ़ें। जिसके फलस्वरूप 21 अक्टूबर 1989 को इसके निर्माण की अधिसूचना को निरस्त कर इसी दिन इसे विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण अधिनियम 1986 के तहत ‘नैनीताल झील परिक्षेत्र विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एनएलआएसएडीए) का स्वरूप प्रदान कर दिया गया। अब इसके अंतर्गत जनपद की भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल व खुर्पाताल झीलें और इन्हें आपस में जोड़ने वाली सड़कों के दोनों ओर से 220 गज का क्षेत्र भी आ गया, अलबत्ता इस क्षेत्र में आने वाले गांवों को अलग रखा गया। 1994 में पुनः संशोधन कर 220 गज की जगह 220 मीटर के भीतर आने वाले गांवों को भी इसके अधीन कर दिया गया। वहीं 1999 में जनपद के रामगढ़ व मुक्तेश्वर क्षेत्र भी इसके अधीन कर दिए गए। किंतु इतनी शक्तियां मिलने के बावजूद प्राधिकरण न तो इन क्षेत्रों में किसी तरह का नियोजित विकास ही करवा पाया, न अपनी ओर से लोगों को कोई बेहतर आवासीय सुविधा ही दे पाया, और इस तरह लगातार शक्तिहीन भी होता चला गया। मौजूदा स्थिति यह है कि नैनीताल नगर में नियोजित विकास के लिए नाम भर को 1995 में बनी महायोजना छह वर्ष पूर्व 2011 में कालातीत हो चुकी है, और तब से नयी महायोजना नहीं बन पायी है। प्राधिकरण की नगर में आम छवि रही कि नगर के लोग अपने परिवारों के बढ़ने के साथ एक-दो कमरे भी नहीं बना सकते, किंतु बिल्डर महायोजना के अंतर्गत ‘ग्रीन बेल्ट’ यानी हरित क्षेत्रों में भी दशकों से निर्माण जारी रखे यहे। यह भी कहा जाता है कि प्राधिकरण के आने के बाद ही नगर में बिल्डरों का आगमन हुआ। वहीं मार्च 2002 में केंद्र में एनडीए सरकार के दौर में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के नैनीताल आगमन पर प्राधिकरण को 300 करोड़ की घोषणा के सापेक्ष अवमुक्त 67 करोड़ रुपए की झील संरक्षण परियोजना मिली, लेकिन इसका लाभ भी केवल नैनी झील में हो रहे एयरेशन व तल्लीताल में ‘न्यू ब्रिज कम बाइपास निर्माण’ जैसे गिने-चुने कार्यों में ही दिखाई देता है। भीमताल टापू में स्थापित एक्वेरियम जैसे अन्य कार्य भी अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। प्राधिकरण में नगर नियोजक और अभियंताओं के साथ ही अन्य कार्मिकों की कमी भी हमेशा से समस्या रही। अपनी नयी आवासीय योजनाएं न लाने, पूर्व निर्मित आवासों की कंपाउंडिंग न करने आदि कारणों से आर्थिक रूप से दिन-प्रति-दिन निशक्त होती चली गयी है। प्राधिकरण की स्थापना के दौर से नजर रखे सुदर्शन साह ने कहा कि प्राधिकरण जब नैनीताल नगर को नहीं बचा पाया है तो वह जनपद को कैसे बचाएगा, यह बड़ा सवाल है। बेहतर होता कि इसमें स्थानीय जिम्मेदार लोगों-जनप्रतिनिधियों की भूमिका बढ़ाई जाती।

भूकंपरोधी बनाने होंगे सभी व्यवसायिक निर्माण, वर्षा जल संग्रहण के भी करने होंगे प्रबंध

-नैनीताल जनपद के पहाड़ों पर निर्माण होंगे प्रतिबंधित, नैनीताल के साथ ही पूरे पर्वतीय क्षेत्र की बन रही है एकीकृत महायोजना

-जून माह तक हो जाएगी तैयार, पुरानी 1995 में बनी महायोजना 2011 में हो चुकी है कालातीत-जून माह तक हो जाएगी तैयार, पुरानी 1995 में बनी महायोजना 2011 में हो चुकी है कालातीत

नवीन जोशी, नैनीताल। सरोवरनगरी नैनीताल के साथ ही जनपद के पूरे पर्वतीय क्षेत्र, जहां व्यवसायिक निर्माण बड़े स्तर पर चल रहे हैं, व्यवस्थित निर्माणों के लिये एकीकृत महायोजना बनाने का कार्य इन दिनों चल रहा है। नैनीताल विशेष क्षेत्र झील विकास प्राधिकरण के सचिव श्रीश कुमार ने बताया कि पुरानी 1995 में बनी महायोजना 2011 में कालातीत हो गयी है। इधर छह वर्ष से लंबित नयी महायोजना बनाने का कार्य आरईपीएल नाम की कंपनी को दिया गया है। इस कंपनी को पूरे क्षेत्र का उपग्रह आधारित सर्वे के माध्यम से बाउंड्री युक्त डिजिटल नक्शे बनाकर नगर नियोजक को आगामी 15 दिसंबर तक सोंपना है। इस संबंध में काफी कार्य हो चुका है। उम्मीद है कि इसके बाद नगर नियोजक अगले छह माह में यानी जून 2018 तक महायोजना को तैयार कर लेगा। महायोजना में प्राधिकरण के क्षेत्रांतर्गत आने वाले नैनीताल के साथ ही मुक्तेश्वर, धानाचूली, श्यामखेत, नथुवाखान, धारी, हरतोला, मौना, ल्वेशाल आदि का मुख्य सड़क से 500 मीटर की दूरी तक का क्षेत्र शामिल है। बताया कि नैनीताल की तरह ही पूरे प्राधिकरण क्षेत्र का जीएसआई के माध्यम से डिजिटलाइज्ड सर्वे कराने की भी योजना है, ताकि भूवैज्ञानिकों की रिपोर्ट पर निर्भर न रहना पड़े, बल्कि नक्शे ही पारदर्शी तरीके से बता दें कि कौन सा क्षेत्र निर्माणों के लिये किस हद तक सुरक्षित अथवा असुरक्षित है। साथ ही महायोजना से पता चलेगा कि किस तरह से पूरे क्षेत्र में सड़क, खुले स्थान व आवासीय व वाणिज्यिक भवन बनाए जाएंगे।

नगर में निर्माणों पर जल्द न्यायालय से राहत की उम्मीद

नैनीताल। प्राधिकरण सचिव श्रीश कुमार ने बताया कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेशों पर नीरी यानी राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी संस्थान के द्वारा नगर के विभिन्न क्षेत्रों की ‘बियरिंग कैपेसिटी’ यानी भार धारण क्षमता और नैनी झील सहित जनपद की सात प्रमुख झीलों में पानी के आने व खर्च होने, खासकर नैनीताल झील में पानी के जल्द खत्म होने व पानी की गुणवत्ता तथा स्रोतों के सूखने व रिसाव आदि का आंकलन किया जा रहा है। इस संबंध में नीरी के निदेशक भी जल्द अक्टूबर माह की शुरुआत में नैनीताल आने जा रहे हैं। झीलों के सर्वेक्षण में तो अधिक समय लगना है। किंतु नैनी झील व मुख्यालय की भार धारण क्षमता के मानक कमोबेश वे ही हैं, जिनके आधार पर नगर में जोन एक, दो, तीन व चार का निर्धारण किया गया है। इस संबंध में जल्द नीरी द्वारा उच्च न्यायालय में तथ्यात्मक पक्ष रखे जाने के बाद उम्मीद है कि नगर में नये निर्माणों पर लगी रोक हटा ली जाएगी। बताया कि प्राधिकरण अभी भी नगर के जीर्ण-शीर्ण भवनों की मरम्मत और ध्वस्त भवनों के पुर्ननिर्माण की नियमानुसार स्वीकृतियां दे रहा है।

अब तक नगर में 445 भवन स्वामी विस्थापन के लिये चिन्हित

नैनीताल। प्राधिकरण सचिव श्रीश कुमार ने बताया कि नगर में केवल जोन 2 में वर्ष 2001 से 2016 तक 74 निर्माणों की स्वीकृति दी गयी है। इनमें से 40 पूरी तरह एवं शेष आंशिक तौर पर जोन-2 में हैं। इस तरह पूर्व के सात नंबर क्षेत्र के 361 एवं सूखाताल क्षेत्र के 44 तथा जोन-2 के इन 40 भवनों में रहने वाले कुल 445 परिवारों को विस्थापन हेतु चिन्हित किया गया है। इनकी सूची डीएम एव ंकेएमवीएन के एमडी की अध्यक्षता वाली दोनों विस्थापन समितियों को दे दी गयी है। इन परिवारों को विस्थापित किये जाने के लिये बेलुवाखान ग्राम पंचायत के अंतर्गत नैनीताल बाइपास के पास का स्थान चिन्हित किया गया था, किंतु इस स्थान पर घना जंगल होने सहित कई समस्याएं आने के कारण अन्य स्थान की तलाश भी की जा रही है। बताया कि नगर में घरेलू आवास की निर्माण की अनुमति लेकर बनाए भवनों का होटल, पेइंग गेस्ट हाउस और मल्टी हाउसिंग कॉम्प्लेक्स के रूप में वाणिज्यिक उपयोग किया जा रहा है। धामपुर बैंड स्थित स्थित ऐसे दो होटल रियो ग्रांड और काफल को सीज कर दिया गया है। आगे भी ऐसे वाणिज्यिक भवनों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाएगी।

नैनीताल को कमजोर नगर बताना सच्चाई है या कोई साजिश !

(श्री नंदा स्मारिका 2015 में प्रकाशित पूर्व आलेख) भूगर्भीय दृष्टिकोण से जोन-चार में रखे गए नैनीताल नगर की भूगर्भीय व भूसतहीय कमजोरी के बात खूब बढ़-चढ़ कर कही जाती है, लेकिन इसके उलट इस बड़े तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि नगर के बचाव के लिए अंग्रेजी दौर से किए गए मजबूत प्रबंधों की वजह से नगर के भीतरी, नैनी झील के जलागम क्षेत्र में 1880 के बाद से और पूरे नगर के समग्र पर भी बीती पूरी और मौजूदा सदी के करीब सवा सौ वर्षों में एक भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई है। इस तथ्य से क्या नगर की मजबूती का भरोसा नहीं मिलता है ? निस्संदेह इस भरोसे को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। मृत्यु शैया पर पड़े लाइलाज बीमारी से ग्रस्त रोगी को कोई कम बुद्धि और कम संसाधनों वाला चिकित्सक भी कभी नहीं कहता कि उसका बेहतर इलाज उसका जीवन समाप्त कर देेना है। लेकिन प्रकृति द्वारा दोनों हाथों से अपनी नेमतें लुटाए प्रकृति के स्वर्ग कही जाने वाली सरोवरनगरी के लिए मानो उसका उपचार करने की जिम्मेदारी वाले चिकित्सक, शासन-प्रशासन, बिना उसके उपचार के प्राथमिक प्रयास किए ही मानो निर्लज्जता के साथ कह रहे हैं, उसे बचाने का एक ही और आखिरी उपाय है-उसके कमजोर हिस्सों को काट दिया जाए। वह अपने दर्द से मरें ना मरें, पहले ही उसकी जान ले ली जाए। नगर भले ‘श्मशान’ में बदल जाए, पर यदि वह इसमें सफल रहे तो उन पर पूर्व में किए गए उनके, अतीत से लेकर वर्तमान तक अपनी जेबें भरकर नगर को कुरूप कर देने के ‘पापों’ से मुक्ति मिल जाएगी। उनके कुकृत्यों को लोग भूल जाएंगे और उन पर लगातार उठने वाली अंगुलियां आगे नहीं उठ पाएंगी।

इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि ‘अपना’ शासन-प्रशासन नैनीताल नगर का उपचार करना दूर, ‘पराए’ अंग्रेज नियंताओं द्वारा किए गए मजबूत प्रबंधों की देखभाल-मरम्मत करने में ही पूरी तरह से विफल रहा है।  उल्टे वह महज नगर के दो दशक पुराने हल्के-गहरे रंगों में रंगे नक्शे के जरिए नगर को कमजोर और अधिक व अत्यधिक कमजोर बताकर यह साबित करने की कोशिष करने में अधिक गंभीर नजर आ रहा है कि नगर बेहद जर्जर है, और मानो नगर में अधिसंख्य इलाके का ध्वस्तीकरण ही सारी समस्याओं का इलाज है।

नगर की कमजोरी की बातों में अनेकों स्तरों पर अजब और परले दर्जे का विरोधाभाष नजर आता है।

1- नैनीताल कथित तौर पर बेहद कमजोर नगर है। इसका सबसे कमजोर हिस्सा रोप-वे स्टेशन के बिलकुल करीब से लेकर ऊपर की ओर सात नंबर तक का स्थान बताया जाता है, और यहीं 1985 में करीब 12 व्यक्तियों को एक साथ लेकर चलने वाले 825 किग्रा भार वहन क्षमता के भारी-भरकम ढांचे युक्त रोप वे का निर्माण किया गया, जो कि इतने वर्षों से बिना किसी समस्या के सीजन के कई दिनों में हजार सैलानियों को भी नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे की सैर कराता है।

2- नैनीताल की दूसरी सबसे कमजोर नब्ज है नगर का आधार-बलियानाला, जिसके ऊपर प्रशासन ने तल्लीताल में ‘न्यू ब्रिज कम बाईपास’ का निर्माण करा डाला है, और पुराने बस अड्डे को खाली कराकर इस पर ही रोडवेज की भारी-भरकम बसों को खड़ा करने की ‘जिद’ भी पूरी कर डाली है।

3- नगर की तीसरी कमजोर दुःखती रग प्रदेश के नैनीताल राजभवन को निहाल नाले की ओर से खोखला कर रही है।

4- चौथा और सबसे ताजा भूस्खलन के स्थान पर प्रदेश का उच्च न्यायालय स्थित है।

इसी तरह मल्लीताल रिक्शा स्टेंड हजारों रुपए से बने ढांचे को तोड़कर ठीक नाला नंबर 21 के ऊपर फिर लाखों रुपए खर्च कर बनाया जा रहा है। यानी नगर की कमजोरी का उपयोग अपनी पसंद के साथ हो रहा है। जहां काम बनाना हो, जनहित की बात कह दी जाए, अन्यथा जनता की जान का डर दिखा दिया जाए।

बावजूद हम पूरी गंभीरता के साथ दोहरा रहे हैं-नैनीताल कमजोर नहीं मजबूत स्थान है। हमारे इस बात को कहने का आधार फिर वही है, और हमारे विश्वास को मजबूत करने वाला तथ्य यह है कि नगर में पिछले करीब सवा सौ वर्षों में एक भी व्यक्ति की मौत नगर की कमजोरी या भूस्खलनों की वजह से नहीं हुई है।अब पड़ताल करते हैं उन कारणों की जिनकी वजह से नगर की ऊपर बताई गई इतनी कमजोरी के बावजूद नगर सवा सौ वर्षों से पूरी तरह सुरक्षित है। यह आधार 18 सितंबर 1880 को आए नगर के महाविनाशकारी, उस दौर के केवल करीब ढाई हजार की जनसंख्या वाले नगर में 108 भारतीयों व 43 ब्रितानी नागरिकों सहित कुल 151 लोगों की जान लीलने वाले भयानक भूस्खलन के बाद नगर के अंग्रेज नियंताओं द्वारा बनाए गए कैचपिट युक्त 100 शाखाओं युक्त 50 नाले हैं, जिन्हें नगर की आराध्य देवी माता नयना और प्रदेश की कुल देवी नंदा-सुनंदा का स्वरूप और नगर का हृदय कही जाने वाली नैनी झील की धमनियां कहा जाता है। निर्विवाद तौर पर माता नयना तथा नंदा-सुनंदा तथा यह नाले ही नैनीताल को इतने वर्षों में हुई हजारों सेंटीमीटर-मीटर वर्षा की अकल्पनीय विभिषिका से बचाए हुए हैं। इनकी ताकत और कृपा को शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है। लेकिन इनकी ताकत-क्षमता के बारे में इतना दावे के साथ कहा जा सकता है कि नैनीताल नगर में इन नालों का सफल व सही प्रयोग ‘नैनीताल मॉडल’ के रूप आगे भी न केवल नैनीताल को हमेशा के लिए ही नहीं, वरन देश-दुनिया के किसी भी अन्य पर्वतीय शहर को बारिश की वजह से होने वाले भूस्खलन के खतरों से बचा सकता है। पिछले वर्षों में भूस्खलन की जद में आए अल्मोड़ा व वरुणावत पर्वत के खतरे से घिरे उत्तरकाशी और केदारनाथ में ‘नैनीताल मॉडल’ को लागू कर बचाया जा सकता है।

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वर्ष 1880 के भूस्खलन ने बदल दिया था सरोवरनगरी का नक्शा, तभी बने नालों की वजह से बचा है कमजोर भूगर्भीय संरचना का यह शहर 
इसी तरह से अन्यत्र भी हों प्रबंध तो बच सकते हैं दैवीय आपदाओं से 
पहाड़ का परंपरागत मॉडल भी उपयोगी 
नवीन जोशी, नैनीताल। कहते हैं कि आपदा और कष्ट मनुष्य की परीक्षा लेते हैं और समझदार मनुष्य उनसे सबक लेकर भावी और बड़े कष्टों से स्वयं को बचाने की तैयारी कर लेते हैं। ऐसी ही एक बड़ी आपदा नैनीताल में 18 सितंबर 1880 को आई थी, जिसने तब केवल ढाई हजार की जनसंख्या वाले इस शहर के 151 लोगों और नगर के प्राचीन नयना देवी मंदिर को लीलने के साथ नगर का नक्शा ही बदल दिया था, लेकिन उस समय उठाए गए कदमों का ही असर है कि यह बेहद कमजोर भौगोलिक संरचना का नगर आज तक सुरक्षित है। इसी तरह पहाड़ के ऊंचाई के अन्य गांव भी बारिश की आपदा से सुरक्षित रहते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि नैनीताल और पहाड़ के परंपरागत मॉडल केदारघाटी व चारधाम यात्रा क्षेत्र से भी भविष्य की आपदाओं की आशंका को कम कर सकते हैं।
1841 में स्थापित नैनीताल में वर्ष 1867 में बड़ा भूस्खलन हुआ था, और भी कई भूस्खलन आते रहते थे, इसी कारण यहाँ राजभवन को कई जगह स्थानांतरित करना पढ़ा था। लेकिन 18 सितम्बर 1880 की तिथि नगर के लिए कभी न भुलाने वाली तिथि है। तब 16 से 18 सितम्बर तक 40 घंटों में 20 से 25 इंच तक बारिश हुई थी। इसके कारण आई आपदा को लिखते हुए अंग्रेज लेखक एटकिंसन भी सिहर उठे थे। लेकिन उसी आपदा के बाद लिये गये सबक से सरोवर नगरी आज तक बची है और तब से नगर में कोई बड़ा भूस्खलन भी नहीं हुआ है। उस दुर्घटना से सबक लेते हुए तत्कालीन अंग्रेज नियंताओं ने पहले चरण में नगर के सबसे खतरनाक शेर-का-डंडा, चीना (वर्तमान नैना), अयारपाटा, लेक बेसिन व बड़ा नाला (बलिया नाला) में नालों का निर्माण कराया। बाद में 1890 में नगर पालिका ने रुपये से अन्य नाले बनवाए। 23 सितम्बर 1898 को इंजीनियर वाइल्ड ब्लड्स द्वारा बनाए नक्शों के आधार पर 35 से अधिक नाले बनाए गए। वर्ष 1901 तक कैचपिट युक्त 50 नालों (लम्बाई 77,292 फीट) और 100 शाखाओं का निर्माण (लंबाई 1,06,499 फीट) कर लिया गया। बारिश में कैच पिटों में भरा मलबा हटा लिया जाता था। अंग्रेजों ने ही नगर के आधार बलिया नाले में भी सुरक्षा कार्य करवाए जो आज भी बिना एक इंच हिले नगर को थामे हुए हैं। यह अलग बात है कि इधर कुछ वर्ष पूर्व ही हमारे इंजीनियरों द्वारा बलिया नाला में कराये गए कार्य कमोबेश पूरी तरह दरक गये हैं। बहरहाल, बाद के वर्षो में और खासकर इधर 1984 में अल्मोड़ा से लेकर हल्द्वानी और 2010 में पूरा अल्मोड़ा एनएच कोसी की बाढ़ में बहने के साथ ही बेतालघाट और ओखलकांडा क्षेत्रों में जल-प्रलय जैसे ही नजारे रहे, लेकिन नैनीताल कमोबेश पूरी तरह सुरक्षित रहा। ऐसे में भूवैज्ञानिकों का मानना है ऐसी भौगोलिक संरचना में बसे प्रदेश के शहरों को “नैनीताल मॉडल” का उपयोग कर आपदा से बचाया जा सकता है। कुमाऊं विवि के विज्ञान संकायाध्यक्ष एवं भू-वैज्ञानिक प्रो. सीसी पंत एवं यूजीसी वैज्ञानिक प्रो. बीएस कोटलिया का कहना है कि नैनीताल मॉडल के सुरक्षित ‘ड्रेनेज सिस्टम’ के साथ ही पहाड़ के परंपरागत सिस्टम का उपयोग कर प्रदेश को आपदा से काफी हद तक बचाया जा सकता है। इसके लिए पहाड़ के परंपरागत गांवों की तरह नदियों के किनारे की भूमि पर खेतों (सेरों) और उसके ऊपर ही मकान बनाने का मॉडल कड़ाई से पालन करना जरूरी है। प्रो. कोटलिया का कहना है कि मानसून में नदियों के अधिकतम स्तर से 60 फीट की ऊंचाई तक किसी भी प्रकार के निर्माण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
इधर आपदा प्रबंधन एवं न्यूनीकरण केंद्र (डीएमएमसी) के अध्ययन “स्लोप इनस्टेबिलिटी एंड जियो-एन्वायरमेंटल इश्यूज ऑफ द एरिया अराउंड नैनीताल” के मुताबिक नैनीताल को 1880 से लेकर 1893, 1898, 1924, 1989, 1998 में भूस्खलन का दंश झेलना पड़ा। 18 सितम्बर 1880 में हुए भूस्खलन में 151 व 17 अगस्त 1898 में 28 लोगों की जान गई थी। इन भयावह प्राकृतिक आपदाओं से सबक लेते हुए अंग्रेजों ने शहर के आसपास की पहाड़ियों के ढलानों पर होने वाले भूधंसाव, बारिश और झील से होने वाले जल रिसाव और उसके जल स्तर के साथ ही कई धारों (प्राकृतिक जलस्रेत) के जलस्रव की दर आदि की नियमित मॉनीटरिंग करने व आंकड़े जमा करने की व्यवस्था की थी। यही नहीं प्राकृतिक रूप से संवेदनशील स्थानों को मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त रखने के लिए कई कड़े नियम कानून बनाए थे। मगर आजादी के बाद यह सब ठंडे बस्ते में चला गया। शहर कंक्रीट का जंगल होने लगा। पिछले पांच वर्षो में ही झील व आस-पास के वन क्षेत्रों में खूब भू-उपयोग परिवर्तन हुआ है और इंसानी दखल बढ़ा है। नैनीझील के आसपास की संवेदनशील पहाड़ियों के ढालों से आपदा के मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए गंभीर छेड़छाड़ की जा रही है। पहाड़ के मलबों को पहाड़ी ढालों से निकलने वाले पानी की निकासी करने वाले प्राकृतिक नालों को मलबे से पाटा जा रहा है। नैनी झील के जल संग्रहण क्षेत्रों तक में अवैध कब्जे हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सरोवरनगरी में अवैध निर्माण कार्य अबाध गति से जारी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन क्षेत्रों में हुए सूक्ष्म बदलाव भी नैनी झील के वजूद के लिए खतरा बन सकते हैं।

इस दावे को सच मानने पर जरूर सवाल उठेगा कि नैनीताल नगर के लिए जीवन-मरण जितने महत्वपूर्ण इन नालों में इतनी ही ताकत है तो फिर नगर में पिछले वर्षों में नैनीताल नगर में कई भूस्खलन क्यों हुए। विश्लेषण करने पर इन सवालों का जवाब भी आसानी से मिल जाता है। चलिए, इस बात की पड़ताल करते हैं कि 1880 से पहले और बाद में नैनीताल में कितने भूस्खलन आए और उनसे क्या नुकसान हुआ। पहले बात नैनीताल नगर की स्थापना के बाद आए भूस्खलनों की। नगर के अंग्रेज नियंता नगर की कमजोर प्रकृति से सर्वप्रथम 1866 और फिर 1869 व 1879 में रूबरू हुए। नगर की आल्मा पहाड़ी पर हुए इन भूस्खलनों की वजह से तत्कालीन गवर्नर हाउसों में भी दरारें आ गई थी। अंग्रेजों ने इससे बचाव के तरीके खोजने ही प्रारंभ किए थे कि 18 सितंबर 1880 को वर्तमान रोप-वे के पास पुनः आल्मा पहाड़ी पर आए भूस्खलन ने 151 लोगों को जिंदा दफन करने के साथ नगर का नक्शा भी बदल दिया। नगर की आराध्य देवी माता नयना को भी नहीं बक्शा। नयना देवी का वर्तमान बोट स्टेंड के पास स्थित मंदिर भी झील में समा गया, जिसके बाद मंदिर को वर्तमान स्थान पर बनाया गया।

नैनीताल से हाईकोर्ट हटाओ : कोश्यारी (राष्ट्रीय सहारा, देहरादून संस्करण, 3 अगस्त 2015 , पेज-2)

बीती आधी सदी में नैनीताल में आए भूस्खलनों की बात करें तो सब से बड़ा भूस्खलन 1988 में नैना पीक की तलहटी के क्षेत्रों में हुआ था, जिसमें भूस्खलन का मलबा हंस निवास, मेलरोज कंपाउंड और सैनिक स्कूल से होते हुए तत्कालीन ब्रुक हिल छात्रावास (वर्तमान उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आउट हाउस) के कक्षों में भर गया था। लेकिन इस भूस्खलन का कारण जान लीजिए। अंग्रेजी दौर में बने नाला नंबर 26 पर इन प्रभावित क्षेत्रों के ऊपर किलवरी रोड के पास स्थित तीन नौ गुणा नौ वर्ग मीटर आकार के कैचपिटों की सफाई नहीं की गई थी। फलस्वरूप बारिश के दौरान गिरा एक सुरई का विशाल पेड़ नाले में फंस गया था, जिस कारण मलबा नाले में बहने की बजाय फंसे पेड़ की वजह से आवासीय क्षेत्रों की ओर आ गया था। कई लोगों को कुछ समय के लिए घर भी छोड़ने पड़े, पर कोई जनहानि नहीं हुई। गौरतलब है कि यह कैचपिट अभी भी भरे हुए हैं। उनकी सफाई नहीं की जा रही। अभी हाल में जून माह में नैनीताल क्लब में मुख्यमंत्री हरीश रावत के जनता दरबार में स्थानीय लोगों ने इस समस्या को रखते हुए बताया था कि उनके घरों में मलबा घुस गया है, और अफसोसजनक स्थिति थी कि संबंधित अधिकारी इस समस्या को समझ ही नहीं पाए, और कैचपिटों की सफाई इसके बाद भी नहीं हुई।

दूसरा बड़ा भूस्खलन 10 वर्ष बाद 1998 में ठंडी सड़क के ऊपर डीएसबी कॉलेज के गेट के पास के क्षेत्र में कई दिनों तक भूस्खलन होता रहा। इसकी चर्चा रेडियो के उस दौर में बीबीसी लंदन से भी हुई थी। इस क्षेत्र में पूर्व से नाले के प्रबंध ही नहीं किए गए थे। शायद इसलिए कि यहां अंग्रेजी दौर में घर ही नहीं थे। इस भूस्खलन के दौर में भी यहां गिने-चुने ही मकान थे। एक मकान हवा में लटक सा गया था, लेकिन इस बार भी कोई जनहानि नहीं हुई।

अब बात नैनीताल के सर्वाधिक संवेदनशील व नगर के आधार बलियानाला की। बलियानाला में 1898 से भूस्खलनों का लंबा इतिहास रहा है, जिसमें 28 लोगों ने जान गंवाई थी इस क्षेत्र में सबसे बड़ा भूस्खलन 17 अगस्त 1898 को हुआ था। इसे नगर के इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी दुर्घटना भी कहा जाता है। इस दुर्घटना में 27 भारतीय व एक अंग्रेज सहित कुल 28 लोग मारे गए थे। लेकिन याद रखना होगा कि यह वह दौर था, जब नालों का निर्माण चल ही रहा था, और इस क्षेत्र में इसके बाद भी 1901 तक नालों तक नालों का निर्माण होता रहा था, और यह क्षेत्र नैनी झील के जलागम क्षेत्र के बाहर आता है। गौरतलब है कि इसके बाद भी इस क्षेत्र में 1935, 1972 और 2004 में भी बड़े भूस्खलन हुए, बड़ा क्षेत्र बलियानाले में समाया, लेकिन गनीमत रही कि कोई जनहानि नहीं हुई। 2004 के भूस्खलन के बाद 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी सरकार ने बलियानाले के सुधार कार्यों के लिए 15 करोड़ रुपए की भारी-भरकम धनराशि दी। बताया जाता है कि इससे बलियानाला में आठ ‘बेड-बार’ बनाए गए, परंतु कार्यों की गुणवत्ता कैसी थी, यह बताने के लिए इतना ही कहना काफी है कि इन ‘बेड-बार’ के भग्नावशेष भी आज देख पाने कठिन हैं। इधर पिछले वर्ष यानी 2014 में यहां 10 जुलाई को और इस वर्ष 11 जुलाई को भी यहां बड़े भूस्खलन हुए। इन भूस्खलनों में क्षेत्र का काफी हिस्सा बलियानाले में समा गया, और समाता जा रहा है। अनेक परिवारों को विस्थापित भी करना पड़ा है लेकिन यह भी सच्चाई है कि इन घटनाओं में भी कोई जनहानि नहीं हुई। इधर 2014 में बलियानाले को फिर से चैनलाइज करने के लिए 44.52 करोड़ रुपए के प्रस्ताव शासन को भेजे गए हैं, लेकिन इस प्रस्ताव पर भी शासन अब तक एक रुपया भी देने को तैयार नहीं दिख रहा।

नैनीताल राजभवन के नीचे हो रहा अवैध खनन : प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं 

वहीं बात नगर के दूसरे आधार निहाल नाले की करें तो इस क्षेत्र में पिछली सदी से ही लगातार भूस्खलन जारी हैं, फलस्वरूप 1960 से इस क्षेत्र में खनन प्रतिबंधित है। लेकिन सच्चाई यह है कि इस प्रतिबंध का कोई अर्थ नहीं है। निहाल नाले में भूस्खलन करीब 10 मीटर प्रति वर्ष की दर से जारी है, और दिन-दहाड़े धड़ल्ले से जारी अवैध खनन की गति भी इससे कुछ कम नहीं है।

‘बुद्धिमान’ नियंताओं ने क्षेत्र में दूसरों को खनन से रोकना दूर, स्वयं 1960 के प्रतिबंध को धता बताकर ‘अवैध खनन’ करते हुए इस क्षेत्र से ही नैनीताल बाई-पास का निर्माण करने का ‘दुस्साहस’ कर दिखाया है। बाई पास से नगर की यातायात व्यवस्था को कुछ लाभ हुआ है अथवा नहीं, पता नहीं, अलबत्ता इसने अवैध खनन कर्ताओं को जरूर आसान रास्ता उपलब्ध करा दिया है। गौरतलब है कि निहाल नाले के शीर्ष पर उत्तराखंड राज्य का नैनीताल राजभवन स्थित है। राजभवन के गोल्फ कोर्स का पूर्व राज्यपाल रोमेश भंडारी के नाम पर बना भंडारी स्टेडियम इस भूस्खलन की जद में आ चुका है। निहाल नाले का प्लम कंक्रीट, वायर क्रेट नाला निर्माण, साट क्रीटिंग व रॉक नेलिंग आदि आधुनिक तकनीकों से क्षरण रोकने के लिए वर्ष 2012 में 38.7 करोड़ रुपए सहित पूरे नैनीताल नगर की सुरक्षा के लिए 58.02 करोड़ रुपए की बड़ी योजनाओं का प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा गया था। इन प्रस्तावों पर भी ‘धन की कमी आढ़े नहीं आने दी जाएगी’ की तोता रटंत करने वाला शासन अब तक एक रुपया भी स्वीकार नहीं कर पाया है।

अब बात हालिया बीती पांच जुलाई 2015 को आए बड़े भूस्खलन की, जिसकी वजह से नगर की कमजोरी पर बोलने के लिए प्रशासन को बड़ा मौका मिला। इस घटना का पहला मूल कारण तो बिड़ला रोड पर हुआ भूस्खलन रहा, जिसका मूल कारण इस बेहद संकरे, बीते दौर में घोड़ों के लिए बने बेहद तीक्ष्ण चढ़ाई वाले मार्ग में स्नो-व्यू, किलवरी जाने के लिए ‘शॉर्ट कट’ के रूप में प्रयोग करने वाले नए जमाने के अत्यधिक क्षमता वाले भारी-भरकम वाहनों का बेधड़क-बेरोकटोक गुजरना भी रहा, जिस कारण स्तुति गेस्ट हाउस के पास का पहले से ही वाहनों के बोझ से ढहता नाला तेज बारिश के दौरान दरक गया। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि घटना की विभीषिका इस मलबे को लेकर आने वाले नाला नंबर-6 के जीर्ण-शीर्ण होने की वजह से बढ़ी। नाला जीर्ण-शीर्ण होने से मलबा नाले की कमजोर दीवारों को तोड़कर पास के मकानों को खोखला करते हुए निकला। इसी तरह मल्लीताल पालिका गार्डन में नुकसान नाला नंबर 20 के पाइप लाइनों से बुरी तरह पटे रहने, इस कारण मलबा फंसने और नाले की कमजोर दीवारों के टूटकर पास के घरों को खोखला करने के कारण काफी नुकसान हुआ। नालों के ऊपर डाली गई सीमेंट की पटालों व लोहे की जालियों ने भी पानी को रोकने का काम किया। फलस्वरूप मल्लीताल बाजार में रामलीला मैदान के पास दो जगह सड़क ही फट गई। जबकि नारायणनगर वार्ड के लोगों को खतरनाक पहाड़ की तलहटी में बसने और नाले न होने का खामियाजा भुगतना पड़ा।

मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की

नैनीताल नगर का जो हाल हुआ है, उसके लिए निर्विवाद तौर पर केवल यहां अवैध तरीके से घर बनाने वाले ही नहीं, वरन शासन-प्रशासन भी बराबर का जिम्मेदार हैं। 1841 में स्थापित हुए इस नगर पर ‘ज्यों-ज्यों दवा की-मर्ज बढ़ता ही गया’ की उक्ति साकार बैठती है। नगर वासियों के अनुसार नगर को व्यवस्थित करने के नाम पर 1984 में की गई झील विकास प्राधिकरण की व्यवस्था ने नगर को पहले के मुकाबले कहीं अधिक अव्यवस्थित करने का कार्य किया है। प्राधिकरण की ओर से नगर को बढ़ते जन दबाव से बाहर निकालने के लिए कोई प्रयास नहीं किये गए। प्राधिकरण तथा शासन-प्रशासन की उदासीनता और भविष्य की रणनीति बनाने में पूरी तरह अक्षमता परखने के लिए एक उदाहरण ही काफी होगा कि एक ओर पर्यटन नगरी में हर वर्ष पर्यटन बढ़ाने की बात कही गई, और दूसरी ओर 1984 से 21 वर्षों में एक भी नया होटल, यहां तक कि एक भी नया कक्ष बढ़ाने का औपचारिक और नियमों के अंतर्गत कोई प्रयास किया गया, जबकि अनाधिकृत तौर पर वह सब कुछ हुआ, जिसे करने की मनाही बताई गई। दूसरी ओर आवासीय घरों के नवनिर्माण क्या मरम्मत की भी बेहद कठिन की गई प्रक्रिया का परिणाम रहा कि लोग चोरी-छुपे, रात-रात में बेहद कच्चे घरों का निर्माण करने लगे। इस प्रकार इस कठोरता ने नगर को और अधिक कमजोर करने का ही कार्य किया।

मृतप्राय महायोजना से चल रही व्यवस्थाएं, 21 करोड़ के दो प्रस्तावों पर नहीं मिला ढेला भी

दूसरी ओर प्रशासनिक अक्षमता की ही बानगी है कि नगर को ‘बचाने’ के नाम पर नगर के कमजोर, असुरक्षित घरों को ध्वस्त करने का मंसूबा बना रहा नगर की व्यवस्थाओं के लिए जिम्मेदार प्रशासन 1995 में बनी और 2011 में पूरी हो चुकी मृतप्राय ‘नैनीताल महायोजना’ को अभी भी नगर पर थोपे हुए है, और पिछले चार वर्षों से नई महायोजना नहीं बना पाया है। सवाल उठता है कि क्या महायोजना के पूरा होने से पूर्व ही नई महायोजना बनाने के प्रयास नहीं शुरू हो जाने चाहिए थे। और जो व्यवस्था समय पर अपने प्रबंध और स्वयं को समयानुसार ‘अपडेट’ न कर पाए, क्या वह नगर की अन्य मायनों में बेहतर देखरेख के काबिल है। वहीं राज्य बनने से भी पूर्व 1998 से नगर की पर्यावरणीय व भूगर्भीय सुरक्षा में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाली नैनीताल झील विशेषज्ञ समिति एवं हिल साइड सेफ्टी कमेटी की केवल एक बैठक हुई है। 1990 के दशक में नगर की सुरक्षा पर विस्तृत अध्ययन करने वाली ब्रजेंद्र सहाय समिति की संस्तुतियां का कहीं अता-पता नहीं है। वहीं शासन स्तर पर अक्षमता देखनी हो तो यह उदाहरण पर्याप्त होगा कि वर्ष 2011 में लोनिवि प्रांतीय खंड के अधिकारियों ने नगर की धमनियां कहे जाने वाले नालों की मरम्मत के लिए जेएलएनयूआरएम को 20.80 करोड़ और राज्य योजना को 20.67 करोड़ के दो अलग-अलग प्रस्ताव भिजवाए, लेकिन यह दोनों प्रस्ताव शासन में धूल फांक रहे हैं। जबकि नगरवासियों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न और नगर की धमनियां कहे जाने वाले नाले उत्तराखंड सरकार की प्राथमिकता में कहीं नहीं हैं। इसीलिए दशकों से नगर के नालों की मरम्मत के लिए एक रुपया नहीं मिला है, और मरम्मत की जगह सफाई के लिए मिलने वाली धनराशि से खानापूरी की जा रही है। पूर्व में लोनिवि ने भी इस हेतु 80 लाख रुपए शासन से मांगे थे, वह भी नहीं मिले। अब लोनिवि की जरूरत 3.6 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। इसका प्रस्ताव भी शासन में लंबित है, लेकिन नतीजा ढाक के वही तीन पात। नगर के नाले बुरी तरह से उखड़ गए हैं। उनकी दोनों ओर की दीवारें अनेक स्थानों पर टूट चुकी हैं। कैच पिट पूरी तरह मलबे से पट चुके हैं, और जालियों में पत्थर अटके हुए हैं। ऐसे में वह अपनी दिशा बदलकर किनारे चोट कर बड़ी तबाही का कारण बनने की मानो पूरी तैयारी कर चुके हैं, लेकिन सरकार की आंखें नहीं खुल रही हैं। नाले गंदगी-मलबे से भी बुरी तरह पटे हैं, और इनकी सफाई के लिए नगर पालिका और लोक निर्माण विभाग के कर्मियों की मलबे और गंदगी को लेकर होने वाला विवाद निपटाने तक में भी प्रशासन की ओर से आज तक कोई सफल प्रयास नहीं किया जा सका है।

इन्हीं कारणों से गत पांच जुलाई को नाला नंबर तीन, छह व 20 ने अपनी हिम्मत के टूट जाने का इशारा कर भयावह रूप दिखा दिया है। नाला नंबर तीन ने चांदनी चौक रेस्टोरेंट के भीतर से बहकर तथा नाला नंबर छह से इंडिया व एवरेस्ट होटलों के बीच बहते हुए करीब 15 हजार क्यूसेक मलबा माल रोड पर लाकर पहाड़ खड़ा कर दिया। वहीं नाला नंबर 20 मल्लीताल रिक्शा स्टेंड वाला नाला स्टाफ हाउस तक अनेक घरों के लिए खतरा बन गया। इसके अपने पत्थर और मलबे से नगर का खूबसूरत कंपनी गार्डन पट गया है। यही हाल मस्जिल तिराहे से डीएसबी की ओर जाने के मार्ग पर सबसे पहले पड़ने वाले नाला नंबर 24 के भी हैं। इस नाले ने भी किनारे मार करनी शुरू कर दी है। नाला नंबर 23 के भी यही हाल हैं, लेकिन सरकार के पास इन नालों की मरम्मत के लिए पैंसा नहीं है। मजबूर होकर डीएम के समक्ष झील विकास प्राधिकरण से नालों की तात्कालिक मरम्मत के लिए 10 लाख रुपए ‘मांगने’ जैसी नौबत आ गई है।

इस सबसे सबक लेने के बजाय अब प्रशासन अपनी गलतियों पर परदा जनता पर कार्रवाई के जरिए डालने की तैयारी कर रहा है। यानी 18 सितंबर 1880 को आई आपदा के बाद नगर के अंग्रेज निर्माताओं द्वारा दीर्घकालीन सोच के तहत बनाए गए नालों की स्थिति नगर को करीब सवा सौ वर्ष बिना मरम्मत सुरक्षित रखने के बाद अब दम तोड़ने की स्थिति में पहुंच गए है। बताने की जरूरत नहीं कि इन वर्षों में आई बारिश से नैनीताल को बचाने और अपनी उपस्थिति वाले स्थानों पर एक भी जनहानि न होने देने वाली नगर की इन धमनियों की दुर्दशा के लिए कौन बड़ा जिम्मेदार है। क्या नालों में गंदगी, मलबे के कट्टे डालने वालों को जिम्मेदार बताकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है ? जबकि वह नालों में गंदगी-मलबा डालने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की अपनी जिम्मेदारी भी पूरी नहीं कर पाया है। जबकि एक तथ्य यह भी है कि प्रशासन के पास नगर के कमजोर घरों का कोई सर्वेक्षण भी नहीं है, और वह हवा में कार्रवाई करने का मन बना रहा है। नगर के ‘कमजोर’ होने का भ्रम फैला कर कहा जा रहा है कि यह कार्रवाई नगर को ‘बचाने’ के लिए की जा रही है, लेकिन जिस तरह प्राधिकरण करीब 900 लोगों को पहले ही ध्वस्तीकरण नोटिस देने की बात कर रहा है, और दबी जुबान 10 हजार घरों को आदेश की जद में बता रहा है, उससे अंदाजा लगाना कठिन नहीं कि शहर बचेगा, या उजड़ जाएगा।

नालों को बचाना होगा तभी बचेगा नैनीताल

सरोवरनगरी नैनीताल में सितंबर 1880 में 18 सितंबर को आए महाविनाशकारी भूस्खलन के बाद वर्ष 1901 तक बने नालों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। नगर की धमनियां कहे जाने वाले इन नालों को हर किसी ने अपनी ओर से मनमाना इस्तेमाल किया है। नगर वासियों ने इन्हें कूड़ा व मलवा निस्तारण का कूड़ा खड्ड तथा इनके ऊपर तक अतिक्रमण कर अपने घर बनाने का स्थान बनाया है तो जल संस्थान ने इन्हें पानी की पाइप लाइनें गुजारने का स्थान, जबकि इसकी सफाई का जिम्मा उठाने वाली नगर पालिका और लोक निर्माण विभाग ने इनमें आने वाले कूड़े व गंदगी को उठाने के नाम पर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने और सफाई के नाम पर पैंसे बनाने का माध्यम बनाया है। यदि ऐसा न होता तो आज नाले अपना मूल कार्य, नैनी झील में इसके जलागम क्षेत्र का पूरा पानी बिना किसी रोकटोक के ला रहे होते, और नगर को कैसी भी भयानक जल प्रलय या आपदा न डिगा पाती। गनीमत रही कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेशों पर नगर के होटलों द्वारा अभी हाल ही में उसी स्थान से छह कमरे हटा दिए गए थे, जहां से रविवार की रात्रि दो हजार टन मलवा माल रोड पर आया है, यह कमरे न हटे होते तो रात्रि में इन कमरों में सोए लोगों के साथ हुई दुर्घटना का अंदाजा लगाना अधिक कठिन नहीं है।

इस तरह बने नाले

नगर के अंग्रेज नियंता नगर की कमजोर प्रकृति से सर्वप्रथम 1866 और फिर 1869 व 1879 में रूबरू हुए। इस दौरान जब तत्कालीन राजभवन की दीवारों में भी दरारें आने लगीं तो उन्होंने इस समस्या के स्थाई समाधान व नगर की सुरक्षा के लिए प्रयास शुरू कर दिए थे। लेकिन इससे पहले ही 18 सितंबर 1880 को महाविनाशकारी भूस्खलन हो गया। इस दुर्घटना से सबक लेते हुऐ पहले चरण में नगर के सबसे खतरनाक शेर-का-डंडा, चीना (वर्तमान नैना), अयारपाटा, लेक बेसिन व बड़ा नाला (बलिया नाला) में दो लाख रुपये से नालों का निर्माण कराया। बाद में 80 के अंतिम व 90 के शुरुआती दशक में नगर पालिका ने तीन लाख रुपये से अन्य नाले बनवाए। आगे 23 सितम्बर 1898 को इंजीनियर वाइल्ड ब्लड्स द्वारा बनाए नक्शों से 35 से अधिक नाले बनाए गए। 1901 तक कैचपिट युक्त 50 नालों (लम्बाई 77,292 फीट) व 100 शाखाओं का निर्माण (कुल लम्बाई 1,06,499 फीट यानी 324.45 किमी) किया। नालों में कैचपिटों यानी गहरे गड्ढों की व्यवस्था थी, जिन्हें बारिश में भरते ही कैच पिटों में भरा मलवा हटा लिया जाता था। अंग्रेजों ने नगर के आधार बलियानाले में भी सुरक्षा कार्य करवाऐ, जो आज भी बिना एक इंच हिले नगर को थामे हुऐ हैं। यह अलग बात है कि इधर कुछ वर्ष पूर्व ही हमारे इंजीनियरों द्वारा बलियानाला में कराये गए कार्य कमोबेश पूरी तरह दरक गये हैं। इधर भी नालों में जो-जो कार्य हाल के दौर में हुए हैं, वह इस वर्ष रविवार पांच जुलाई की बारिश में बह गए हैं।

यह किए जाने की है जरूरत:
  • नालों से सटाकर किए निर्माणों को संभव हो तो हटाया अथवा मजबूत किया जाए।
  • नालों से पानी की लाइनें पूरी तरह से हटाई जाएं, इनमें मलवा फंसने से होता है नुकसान।
  • मरम्मत के कार्यों में हो उच्च गुणवता मानकों का पालन।
  • नालों की सफाई सर्वोच्च प्राथमिकता में हो।
  • नालों में कूड़ा डालने पर कड़े व बड़े जुर्माने लगें।
  • नालों में कैचपिटों की व्यवस्था बहाल हो, सभी नालों में बनें कैचपिट और हर बारिश के बाद हो इनकी सफाई।
  • नालों की सफाई के लिए पूर्व में बने अमेरिकी मशीन ऑगर लगाने जैसे प्रस्ताव लागू हों।
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मेरा जन्म 26 नवंबर 1972 को हुआ था। मैं नैनीताल, भारत में मूलतः एक पत्रकार हूँ। वर्तमान में मार्च 2010 से राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक समाचार पत्र-राष्ट्रीय सहारा में ब्यूरो चीफ के रूप में कार्य कर रहा हूँ। इससे पहले मैं पांच साल के लिए दैनिक जागरण के लिए काम कर चुका हूँ। कुमाऊँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से ‘नए मीडिया’ विषय पर शोधरत हूँ। फोटोग्राफ़ी मेरा शौक है। मैं NIKON COOLPIX P530 और अडोब फोटोशॉप 7.0 के साथ फोटोग्राफी कर रहा हूँ। फोटोग्राफी मेरे लिए दुनियां की खूबसूरती को अपनी ओर से चिरस्थाई बनाने का बहुत छोटा सा प्रयास है। एक फोटो पत्रकार के रूप में मेरी तस्वीरों को नैनीताल राजभवन सहित विभिन्न प्रदर्शनियों में प्रस्तुत किया गया, तथा उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अलवा द्वारा सम्मानित किया गया है। कुछ चित्रों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। गूगल अर्थ पर चित्र उपलब्ध कराने वाली पैनोरामियो साइट पर मेरी प्रोफाइल को 18.85 Lacs से भी अधिक हिट्स प्राप्त हैं।पत्रकारिता और फोटोग्राफी के अलावा मुझे कवितायेँ लिखना पसंद है। काव्य क्षेत्र में मैंने नवीन जोशी “नवेन्दु” के रूप में अपनी पहचान बनाई है। मैंने बहुत सी कुमाउनी कवितायेँ लिखी हैं, कुमाउनी भाषा में मेरा काव्य संकलन उघड़ी आंखोंक स्वींड़ प्रकाशित हो चुका है, जो कि पुस्तक के के साथ ही डिजिटल (PDF) फार्मेट पर भी उपलब्ध होने वाली कुमाउनी की पहली पुस्तक है। मेरी यह पुस्तक गूगल एप्स पर भी उपलब्ध है। ’ यहां है एक पत्रकार, लेखक, कवि एवं छाया चित्रकार के रूप में मेरी रचनात्मकता, लेख, आलेख, छायाचित्र, कविताएं, हिंदी-कुमाउनी के ब्लॉग आदि कार्यों का पूरा समग्र। मेरी कोशिश है कि यहां नैनीताल, कुमाऊं, उत्तराखंड और वृहद संदर्भ में देश की विरासत, संस्कृति, इतिहास और वर्तमान को समग्र रूप में संग्रहीत करने की….। मेरे दिल में बसता है, मेरा नैनीताल, मेरा कुमाऊं और मेरा उत्तराखंड

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