नवीन समाचार, उधमसिंह नगर, 26 जनवरी 2026 (MLA Arvind Pandey Matter)। उधमसिंह नगर (Udham Singh Nagar) जनपद के गदरपुर (Gadarpur) से उठती राजनीतिक हलचल ने उत्तराखंड (Uttarakhand) की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) को असहज कर दिया है। राज्य के अब तक के सभी शिक्षा मंत्रियों के चुनाव न जीतने के मिथक को तोड़ने वाले गदरपुर विधायक अरविंद पांडे (Arvind Pandey) चुनाव तो जीते पर मंत्री नहीं बन पाए।
इसके बाद से ही दिखने लगे और खासकर इधर तेज हुए उनके तेवरों से भाजपा के भीतर असंतोष, टकराव और संभावित विद्रोह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। यहां तक चर्चा है कि गदरपुर से राज्य की सत्ता के विरुद्ध विद्रोह का लक्ष्य सत्ता पलट की कोशिश तक था। सवाल यह है कि क्या यह केवल व्यक्तिगत विवाद है या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सत्ता के लिए रचा जा रहा कोई बड़ा राजनीतिक चक्रव्यूह। बहरहाल अब वह पार्टी के भीतर ‘गदर’ का प्रतीक बनते दिख रहे हैं।
मुख्यमंत्री से टकराव और बढ़ती तल्खी
अरविंद पांडे बीते लंबे समय से अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (Pushkar Singh Dhami) के विरुद्ध तीखे सार्वजनिक कटाक्ष करते रहे हैं। देखें संबंधित वीडिओ-सरकार की ऐसी तारीफ न सुनी होगी :
दूसरी ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के समक्ष विरोध की कई बार चरम स्थितियां आ चुकी हैं, लेकिन चाहे भर्ती घोटाले में छात्रों के विरोध का मामला हो या अंकिता भंडारी मामला, धामी सीबीआई (Central Bureau of Investigation-CBI) जांच की घोषणा कर अगले वर्ष 2027 की शुरुआत में प्रस्तावित आसन्न विधानसभा चुनाव से लगभग एक वर्ष पूर्व से रचे जा रहे चक्रव्यूह से बचते-राजनीतिक दबावों को साधते रहे हैं, और इस बार तो आरोपों के केंद्र में चल रहे अरविंद पांडे स्वयं अपने विरुद्ध लगे आरोपों पर सीबीआई जांच की मांग कर चुके हैं। ऐसे में आगे देखने वाली बात होगी कि इस मामले का उंट किस करवट बैठेगा।
आरोप, नोटिस और अभियोगों का दबाव
इसी बीच एक बुजुर्ग महिला और उसके पुत्र द्वारा अरविंद पांडे पर जमीन हड़पने (Land Grabbing) के बेहद गंभीर आरोप लगाए गए हैं। यह मामला जनवरी 2026 के मध्य में काफी सुर्खियों में रहा है। साथ ही गदरपुर तहसील प्रशासन ने 19 जनवरी के गूलरभोज स्थित उनके आवास में पहुंच कर उनके बेटे अतुल पांडे को नैनीताल हाईकोर्ट में दायर याचिका 192/2024 (एमएस) सुनील यादव बनाम उत्तराखंड सरकार का हवाला देते हुए नोटिस थमा दिया है। नोटिस में अरविंद पांडे के कैंप कार्यालय को अवैध अतिक्रमण मानते हुए नोटिस जारी कर 15 दिनों के भीतर हटाने के निर्देश दिए गए हैं।

इनके अतिरिक्त अरविंद पांडेय के भाइयों और भतीजों पर मुकदमा संजय कुमार बंसल की तहरीर पर उधमसिंह नगर पुलिस (Udham Singh Nagar Police) द्वारा धमकाने जैसे आरोपों में अभियोग दर्ज किए जाने से भी राजनीतिक तापमान और बढ़ गया।
सरकार के सामने दुविधा स्पष्ट है। यदि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई नहीं होती, तो संदेश जाएगा कि प्रभावशाली नेताओं के लिए नियम अलग हैं। और यदि कार्रवाई होती है, तो पांडे के तीखे राजनीतिक प्रतिरोध की आशंका है।
गदरपुर की राजनीति और सत्ता संतुलन
इसी दौर में पूर्व मंत्री बिशन सिंह चुफाल (Bishan Singh Chufal) का गदरपुर पहुंचकर अरविंद पांडे से मिलना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना। वहीं गौलापार हल्द्वानी (Gaulapar Haldwani) में एक किसान द्वारा उधमसिंह नगर पुलिस पर आरोप लगाते हुए की गई आत्महत्या के मुद्दे पर पांडे का मुखर रुख भी सरकार के लिए असहज रहा।
इसी क्रम में केंद्रीय गृह मंत्री (Union Home Minister) के उत्तराखंड प्रवास के बीच पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत (Trivendra Singh Rawat) तथा सांसद अनिल बलूनी (Anil Baluni) के हेलीकॉप्टर से गदरपुर पहुंचने के घोषित हुए कार्यक्रम ने सत्ता परिवर्तन तक की अटकलों को जन्म दिया। हालांकि अंतिम समय में यह कार्यक्रम निरस्त हो गया, जिससे यह संकेत गया कि विरोध की चिंगारी पर फिलहाल पानी डाल दिया गया है।
पूर्वांचल मतदाता और 2027 की गणित
अरविंद पांडे पूर्वांचल मूल के प्रभावशाली नेता माने जाते हैं और खटीमा (Khatima), बाजपुर (Bajpur) और काशीपुर (Kashipur) क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ बताई जाती है। वह यहाँ स्वयं चुनाव जीतने और किसी को भी चुनाव जिताने-हराने की हैसियत रखते हैं। भाजपा के खटीमा क्षेत्र के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह आरोप भी लगाया है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री धामी की खटीमा से हार में पांडे समर्थकों की भूमिका रही। काशीपुर क्षेत्र से भी उनके विरुद्ध आवाजें उठ रही हैं।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार ऐसे कारणों से भाजपा नेतृत्व उन्हें आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में टिकट न देने का मन बना चुका है और अन्य प्रत्याशी को तैयार करने पर भी कार्य शुरू कर चुका है। यह भी चर्चा है कि इन्हीं कारणों से अरविंद पांडे को वर्तमान मंत्रिमंडल में स्थान नहीं मिला।
आगे क्या होगा
एक ओर पार्टी नेतृत्व के लिए पांडे को दरकिनार करना जोखिम भरा हो सकता है, वहीं दूसरी ओर उन्हें साथ रखना अनुशासन और सत्ता संतुलन के लिए चुनौती बनता जा रहा है। अरविन्द पांडे पर उनके कार्यकाल में अपने रिश्तेदारों को कथित तौर पर सरकारी नौकरी दिलाने के आरोपों पर भी कार्रवाई होने के भी कयास लग रहे हैं, बहरहाल, गदरपुर से उठी यह हलचल केवल एक क्षेत्र तक सीमित रहेगी या राज्यव्यापी राजनीतिक समीकरण बदलेगी, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।
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