अनिल धर्मदेश @ नवीन समाचार, नैनीताल, 1 फरवरी 2026 (UGC Regulations-Facts)। उत्तराखंड (Uttarakhand) सहित देशभर में उच्च शिक्षण संस्थानों (Higher Education Institutions) से जुड़े विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission–UGC) के नए विनियम हाल के दिनों में व्यापक चर्चा और भ्रम का विषय बने हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव निवारण के उद्देश्य से लाए गए इन नियमों पर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) द्वारा अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद यह विषय और अधिक संवेदनशील हो गया है।
गत 13 जनवरी को जारी राजपत्र (Gazette) के बाद सामान्य वर्ग में उपजे प्रारंभिक भ्रम ने, मीडिया विमर्श के प्रभाव में, राष्ट्रव्यापी असंतोष और रोष का रूप ले लिया। इसी पृष्ठभूमि में यह आवश्यक हो जाता है कि आग्रह और पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर इन विनियमों के तथ्यों, कानूनी आधार और वास्तविक उद्देश्य की गंभीरता से पड़ताल की जाए। पढ़ें पूर्व संबंधित समाचार : यूजीसी के 13 जनवरी के शासनादेश पर देशभर में असंतोष, #Rollback_UGC के साथ भाजपा के जमीनी नेताओं और एक सिटी मजिस्ट्रेट के त्यागपत्र ने बढ़ाई सियासी हलचल
संवैधानिक व्यवस्था और यूजीसी विनियमों का कानूनी आधार
भारत में कानूनों की एक स्पष्ट पदानुक्रम व्यवस्था (Hierarchy of Laws) है। सबसे ऊपर भारत का संविधान (Constitution of India) है, उसके बाद संसद द्वारा पारित अधिनियम (Acts of Parliament) और फिर मंत्रालयों व उनके अधीन निकायों द्वारा बनाए गए नियम एवं विनियम आते हैं। इसका अर्थ यह है कि कोई भी आयोग या मंत्रालय ऐसा कोई नियम नहीं बना सकता, जो संविधान या संसद द्वारा पारित कानूनों के विरुद्ध हो। यूजीसी के नए विनियम भी इसी संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत कार्य करते हैं।
जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग (Ragging) रोकने के लिए यूजीसी द्वारा लागू शपथपत्र (Affidavit) यूजीसी अधिनियम 1956 (UGC Act 1956) की धारा 26(1)(जी) के अंतर्गत है, उसी प्रकार भेदभाव उन्मूलन से जुड़े नए नियम भी संविधान और संसदीय कानूनों के अधीन ही हैं। यूजीसी ने ‘हितधारक’ (Stakeholder) और ‘समता’ (Equity) जैसे शब्दों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है, ताकि इन विनियमों का क्रियान्वयन संविधान के अनुच्छेद 14 (Article 14) और अनुच्छेद 15 (Article 15) के अनुरूप हो सके।
भेदभाव से जुड़े कानून और घोषणापत्र की अवधारणा
भारत में भेदभाव से निपटने के लिए पहले से नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 (Protection of Civil Rights Act 1955), अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 (SC/ST Act 1989) और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न निवारण अधिनियम 2013 (POSH Act 2013) जैसे कानून मौजूद हैं। यूजीसी के नए विनियम इन सभी कानूनों को एक समग्र ढांचे में समाहित करने का प्रयास करते हैं।
इसी उद्देश्य से नियम 7(क) के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों के सभी हितधारकों—छात्र, अभ्यर्थी, शिक्षक, कर्मचारी, प्रबंधन और संस्थान प्रमुख—से लिखित घोषणा पत्र (Declaration) लेने की व्यवस्था की गई है। इस घोषणा पत्र का आशय यह है कि संस्थान और उसके सभी हितधारक समता को बढ़ावा देंगे और किसी भी प्रकार के भेदभाव में संलिप्त नहीं होंगे। घोषणापत्र के उल्लंघन की स्थिति में संबंधित हितधारक के विरुद्ध प्रचलित कानूनों के साथ-साथ शपथपत्र उल्लंघन के अंतर्गत भी कार्रवाई की जा सकेगी, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, लिंग या सामाजिक-आर्थिक स्थिति से संबंधित क्यों न हो।
यूजीसी बिल में झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान नहीं है, ऐसा कहना गलत
इस प्रकार यूजीसी बिल में झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान नहीं है, ऐसा कहना गलत है। क्योंकि संस्थान में भेदभाव के किसी कृत्य में सम्मिलित नहीं होने का लिखित घोषणापत्र देने के बाद यदि कोई जातिगत अपमान की झूठी शिकायत करता है तो उस पर घोषणापत्र के उल्लंघन की कार्यवाही समता समिति ही करेगी। पहले यह व्यवस्था नहीं थी। क्योंकि लिखित घोषणा पत्र (Written Declaration), हलफनामे (Affidavit) या लिखित अनुबंध (Written Agreement/Contract) के उल्लंघन के दंड भारतीय कानूनों के अनुसार गंभीर हो सकते हैं। उल्लंघन की प्रकृति (दीवानी या आपराधिक) के आधार पर सजा निर्धारित होती है:
1. आपराधिक परिणाम (यदि घोषणा झूठी हो – IPC के तहत): झूठी गवाही या घोषणा (IPC 191/193/195/199/200): यदि कोई व्यक्ति न्यायालय या लोक सेवक के समक्ष शपथ लेकर झूठा लिखित घोषणा पत्र देता है, तो उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 193 के तहत 7 साल तक के कारावास और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
झूठी गवाही (False Evidence): यदि आपने कोई लिखित डिक्लेरेशन (हलफनामा) दिया है और वह गलत साबित होता है, तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 191, 193, 195, और 199 के तहत 3 से 7 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। यह लिखित डिक्लेरेशन सभी छात्रों (sc/St/obc, विकलांग, महिला) को समान रूप से देना है। यदि किसी छात्र की शिकायत झूठी निकलती है तो इसे उसके घोषणापत्र का उल्लंघन माना जाएगा और समता समिति द्वारा उसपर ऊपर बताए गए नियमों के अनुरूप कार्यवाही की संस्तुति संभव हो सकेगी।
नियम 3-ग पर उठे सवाल और वास्तविक स्थिति
नए विनियमों के विरोध का एक प्रमुख आधार नियम 3-ग बताया जा रहा है, जिसमें ‘भेदभाव’ की परिभाषा में जातिगत भेदभाव के संदर्भ में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग का उल्लेख है। इस पर यह प्रश्न उठाया गया कि सामान्य वर्ग का उल्लेख क्यों नहीं किया गया। वस्तुतः इसका कारण यह है कि जातिगत भेदभाव के लिए संसद पहले से ही एक विशेष कानून (SC/ST Act 1989) बना चुकी है, जिसका अनुपालन अनिवार्य है। शेष सभी हितधारक, जिनमें सामान्य वर्ग भी शामिल है, संविधान के अनुच्छेद 15 और घोषणापत्र उल्लंघन के प्रावधानों के अंतर्गत संरक्षित रहते हैं।
समता समिति और समान अवसर केंद्र का महत्व
ये नए विनियम 2012 के पुराने नियमों की तुलना में अधिक व्यापक, स्पष्ट और वर्गीकृत हैं। 2012 के नियमों में जहां भेदभाव के 26 प्रकार चिन्हित किए गए थे, वहीं घोषणापत्र और समता समिति (Equity Committee) जैसी व्यवस्थाएं नहीं थीं। अब समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centre) की स्थापना का उद्देश्य वंचित समुदायों, आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों सहित, सभी के हितों की निगरानी करना, शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक परामर्श देना तथा आवश्यकता पड़ने पर कानूनी सहायता उपलब्ध कराना है। समता समिति का दायित्व भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच करना है।
आगे की राह और अपेक्षाएं
यह मामला अब सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है और 19 मार्च को यूजीसी तथा संबंधित मंत्रालय अपना पक्ष रखेंगे। आशा की जानी चाहिए कि भ्रम के प्रत्येक बिंदु पर गहन विमर्श के बाद एक ऐसा संतुलित प्रारूप सामने आएगा, जो सभी हितधारकों के लिए समान अवसर, समान अधिकार और पारदर्शिता सुनिश्चित कर सके। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और वैश्विक मानकों के अनुरूप भारत की शैक्षणिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए समता और शुचिता का यह प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।













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