हाई कोर्ट को पहला निकाह छुपाकर किया गुमराह, भाई की गवाही से उजागर हुई बहन की सच्चाई, दंपति को सुनाई गई सश्रम कारावास की सजा

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नवीन समाचार, नैनीताल, 28 जनवरी 2026 (Fraud with Uk High Court)। उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) से सुरक्षा प्राप्त करने के लिए तथ्य छिपाने और झूठा शपथपत्र देने का एक मामला गंभीर सजा तक पहुंच गया है। नैनीताल के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Additional Chief Judicial Magistrate) रवि रंजन (Ravi Ranjan) की अदालत ने हरिद्वार (Haridwar) निवासी मुस्लिम दंपति को न्यायालय को गुमराह करने का दोषी मानते हुए दो-दो वर्ष के सश्रम कारावास और पांच-पांच हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है। यह फैसला न केवल व्यक्तिगत मामले तक सीमित है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता और शपथपत्रों की विश्वसनीयता से भी जुड़ा माना जा रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि और याचिका का आधार

(Fraud With Uk High Court) निकाह (मुस्लिम विवाह) की परिभाषा, उद्देश्य और प्रकृति - कानूनी विधिअभियोजन के अनुसार वर्ष 2020 में शाहीन (Shaheen) पत्नी शाहरूख (Shahrukh) और शाहरूख पुत्र अब्दुल रहमान (Abdul Rahman), निवासी लक्कड़ खुर्द, पथरी (Pathri), अम्बुवाला (Ambuwala), जनपद हरिद्वार ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। याचिका में शाहीन ने यह कहते हुए सुरक्षा की मांग की थी कि उसने अपनी इच्छा से निकाह किया है और उसे अपने भाई से जान का खतरा है। याचिका के समर्थन में दंपति की ओर से शपथपत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहा गया कि यह शाहीन का पहला निकाह है।

उच्च न्यायालय ने प्रारंभिक स्तर पर पुलिस को सुरक्षा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए और विपक्षियों से जवाब भी मांगा। इसी दौरान तथ्यों की जांच में एक अहम जानकारी सामने आई, जिसने पूरे मामले की दिशा बदल दी।

भाई की गवाही और पहली शादी का खुलासा

एसीजेएम न्यायालय में सुनवाई के दौरान शाहीन के भाई जैद (Zaid) ने बयान दर्ज कराते हुए कहा कि उसकी बहन की पहली शादी 17 मार्च 2019 को मोहम्मद साजिद (Mohammad Sajid) के साथ हो चुकी थी और उस विवाह का विधिवत तलाक आज तक नहीं हुआ है। जैद ने यह भी बताया कि वर्ष 2020 में शाहीन ने चोरी-छिपे शाहरूख से दूसरा निकाह कर लिया और बाद में भाइयों जैद व शाहबाज (Shahbaz) से खतरा बताकर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई।

शाहीन ने अदालत में यह स्वीकार किया कि उसकी पहली शादी साजिद से हुई थी, लेकिन उसने यह तर्क दिया कि आपसी सहमति से विवाह विच्छेद हो गया था। हालांकि, याचिका और शपथपत्र में विवाह विच्छेद के तरीके या कारण का कोई उल्लेख नहीं किया गया, जिसे अदालत ने गंभीर चूक माना।

न्यायालय का दृष्टिकोण और दंड

न्यायालय ने माना कि आरोपितों ने जानबूझकर गलत तथ्यों के आधार पर शपथपत्र प्रस्तुत कर न्यायालय को गुमराह किया। उच्च न्यायालय के निर्देश पर इस प्रकरण में भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita) की धारा 193 के अंतर्गत अपराध का संज्ञान लिया गया। उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार न्यायिक (Registrar Judicial) महेश उपाध्याय (Mahesh Upadhyay) की ओर से 11 दिसंबर 2020 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Chief Judicial Magistrate) नैनीताल में परिवाद दायर किया गया था, जिसे बाद में एसीजेएम न्यायालय को स्थानांतरित किया गया।

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सभी साक्ष्यों, गवाहियों और दस्तावेजों के आधार पर अदालत ने दंपती को दोषी ठहराते हुए सश्रम कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई।

व्यापक संदेश और सामाजिक प्रभाव

यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए शपथपत्र केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि सत्य और ईमानदारी की कानूनी जिम्मेदारी हैं। झूठे तथ्यों के आधार पर सुरक्षा या राहत प्राप्त करने के प्रयास न केवल कानून का दुरुपयोग हैं, बल्कि इससे न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।

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