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नवीन समाचार, देहरादून, 31 दिसंबर 2025 (UK Govts Order to Count Dogs)। उत्तराखंड से जुड़ा एक प्रशासनिक निर्णय इन दिनों शिक्षा जगत और समाज में व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है। शासन के आदेश पर अब महाविद्यालयों में कार्यरत प्राध्यापक अपने शैक्षणिक दायित्वों के साथ-साथ संस्थान के आसपास घूम रहे लावारिस कुत्तों की गणना भी करेंगे। यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा संबंध जनसुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ता है, जबकि दूसरी ओर शिक्षा जगत इसे अपने कार्यक्षेत्र से बाहर का दायित्व मान रहा है।
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Toggleशासन का आदेश और नई जिम्मेदारी-23 दिसंबर को जारी आदेश में क्या कहा गया
संयुक्त निदेशक उच्च शिक्षा की ओर से 23 दिसंबर को जारी आदेश के अनुसार राज्य के शासकीय, सहायता प्राप्त अशासकीय और निजी महाविद्यालयों में कार्यरत प्राध्यापकों को लावारिस कुत्तों की गणना के लिए नोडल अधिकारी नामित किया गया है। विश्वविद्यालय स्तर पर यह जिम्मेदारी कुलसचिव को सौंपी गई है।

आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि संबंधित प्राध्यापक अपने संस्थान के आसपास मौजूद लावारिस कुत्तों की संख्या का आकलन करेंगे और यह जानकारी देंगे कि उनके पुनर्वास अथवा नियंत्रण के लिए क्या कार्रवाई की गई है या नहीं की गई है। यह संपूर्ण विवरण स्थानीय प्रशासन को उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों से जुड़ा संदर्भ
शासन के अनुसार यह व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में लागू की गई है। राज्य के अनेक शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों में लावारिस कुत्तों की बढ़ती संख्या को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं। कुत्तों के काटने की घटनाएं, बच्चों और वृद्धों की सुरक्षा तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए प्रशासन को सटीक आंकड़ों की आवश्यकता बताई जा रही है। शैक्षणिक संस्थानों को स्थानीय समाज का अहम हिस्सा मानते हुए उनसे सहयोग लेने की नीति अपनाई गई है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों से जुड़ा संदर्भ-जनसुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ा विषय
शासन के अनुसार यह व्यवस्था सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में लागू की गई है। राज्य के अनेक शहरी और अर्धशहरी क्षेत्रों में लावारिस कुत्तों की बढ़ती संख्या को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं। कुत्तों के काटने की घटनाएं, बच्चों और वृद्धों की सुरक्षा तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए प्रशासन को सटीक आंकड़ों की आवश्यकता बताई जा रही है। शैक्षणिक संस्थानों को स्थानीय समाज का अहम हिस्सा मानते हुए उनसे सहयोग लेने की नीति अपनाई गई है।
शिक्षा जगत में असंतोष और मानवीय प्रभाव-अध्यापन कार्य प्रभावित होने की आशंका

शिक्षकों और प्राध्यापकों का कहना है कि उनका मूल दायित्व विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना, परीक्षा एवं मूल्यांकन कार्य तथा शैक्षणिक मार्गदर्शन है। पहले से ही उन पर विभिन्न प्रशासनिक दायित्वों का दबाव है। ऐसे में लावारिस कुत्तों की गणना जैसे कार्य सौंपे जाने से न केवल अध्यापन प्रभावित होगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की गरिमा पर भी प्रश्न खड़े होंगे। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या यह कार्य नगर निकायों या संबंधित विभागों द्वारा नहीं किया जाना चाहिए।
शैक्षिक संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया-निर्णय को गरिमा के विरुद्ध बताया
भारतीय शैक्षिक महासंघ के मंडल अध्यक्ष नरेंद्र तोमर ने आदेश पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि प्राध्यापकों को इस प्रकार के गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाना शिक्षा जगत की गरिमा के विरुद्ध है। उनके अनुसार इस निर्णय से पूरे शिक्षा समुदाय में असंतोष व्याप्त है और यदि आदेश में संशोधन नहीं किया गया तो इसका विरोध किया जाएगा।
वहीं उच्च शिक्षा निदेशक डॉ. एनपी खाली का कहना है कि यह आदेश निदेशालय स्तर से जारी किया गया है और अभी तक प्राध्यापकों की ओर से कोई औपचारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। उनके अनुसार इसका उद्देश्य केवल प्रशासन को वास्तविक स्थिति से अवगत कराना है।
आगे की संभावनाएं-संवाद से निकल सकता है संतुलित समाधान
यह विषय अब केवल लावारिस कुत्तों की गणना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक जिम्मेदारी के संतुलन का प्रश्न बन गया है। यदि शासन और शिक्षा जगत के बीच संवाद स्थापित होता है तो संभव है कि वैकल्पिक व्यवस्था या सहयोगी तंत्र विकसित किया जाए, जिससे जनसुरक्षा का उद्देश्य भी पूरा हो और शिक्षा व्यवस्था की गरिमा भी बनी रहे।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।














3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं।