नवीन समाचार, हल्द्वानी, 8 जनवरी 2026 (Uttarakhand Youth Having Drugs)। उत्तराखंड के नैनीताल (Nainital) जनपद के हल्द्वानी (Haldwani) क्षेत्र से सामने आए दो मामलों ने शिक्षा व्यवस्था, अभिभावकों और समाज को गहरी चिंता में डाल दिया है। निजी स्कूलों के भीतर छात्र-छात्राओं के बीच नशे की प्रवृत्ति के संकेत मिले हैं, जहां एक स्कूल में छात्रा की पानी की बोतल में शराब (Alcohol in Girl Student’s Water Bottle) पाई गई, वहीं दूसरे स्कूल में एक नाबालिग छात्र बाथरूम में सिगरेट (Student Found Smoking in Bathroom) पीते हुए पकड़ा गया। यह घटनाएं केवल अनुशासन का विषय नहीं, बल्कि किशोर मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक संवाद और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखी जा रही हैं।
उत्तराखंड के नैनीताल जनपद के हल्द्वानी शहर में सामने आए इन मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नशे की समस्या अब स्कूलों की चारदीवारी के भीतर तक पहुंच चुकी है। अभिभावक, शिक्षक और प्रशासन इस बात को लेकर चिंतित हैं कि किशोरावस्था में बच्चों पर बढ़ता मानसिक दबाव और बाहरी प्रभाव किस तरह उनके भविष्य को प्रभावित कर रहा है।
स्कूल परिसरों में सामने आए मामले और बढ़ती चिंता
पानी की बोतल में शराब और बाथरूम में सिगरेट
हल्द्वानी के एक निजी विद्यालय में उस समय हड़कंप मच गया, जब जांच के दौरान एक छात्रा की पानी की बोतल में शराब पाई गई। इसी तरह, दूसरे निजी स्कूल में एक नाबालिग छात्र को विद्यालय के बाथरूम में सिगरेट पीते हुए पकड़ लिया गया। दोनों ही मामलों में विद्यालय प्रबंधन ने इसे हल्के में न लेते हुए तत्काल संबंधित अभिभावकों को बुलाया और बच्चों से संवाद शुरू किया।
विद्यालय प्रबंधन के अनुसार, ऐसे मामलों का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि समस्या की जड़ तक पहुंचना है। यही कारण है कि बच्चों को समझाने और सही दिशा में लाने के लिए परामर्श प्रक्रिया शुरू की गई।
चिकित्सकीय परामर्श और मनोवैज्ञानिक सहयोग
मामलों की गंभीरता को देखते हुए इन छात्र-छात्राओं की काउंसलिंग हल्द्वानी स्थित डॉ.सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय (Dr. Sushila Tiwari Government Hospital) के मनोचिकित्सा विभाग में कराई जा रही है। विशेषज्ञों द्वारा बच्चों की मानसिक स्थिति, पारिवारिक पृष्ठभूमि और सामाजिक प्रभावों का आकलन किया जा रहा है, ताकि समस्या दोबारा न उभरे।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं
सुशीला तिवारी चिकित्सालय के मनोचिकित्सा विभाग से जुड़े मनोवैज्ञानिक डॉ. युवराज पंत (Dr. Yuvraj Pant) के अनुसार, बीते दो महीनों में विद्यालयों से जुड़े कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें छात्र-छात्राएं विद्यालय परिसर में शराब या सिगरेट का सेवन करते या अपने पास रखते पाए गए। उनके अनुसार यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि यह संकेत देती है कि किशोरों में जोखिम भरे व्यवहार की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
क्यों बढ़ रही है किशोरों में नशे की प्रवृत्ति-मानसिक दबाव और सामाजिक प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि किशोरावस्था में पढ़ाई का दबाव, भविष्य को लेकर अनिश्चितता, साथियों का गलत प्रभाव, मोबाइल और सामाजिक माध्यमों पर मिलने वाली नकारात्मक सामग्री और फिल्मों में दिखाया जाने वाला ग्लैमर बच्चों को इस दिशा में धकेल रहा है। इसके साथ ही अभिभावकों की व्यस्त जीवनशैली और संवाद की कमी भी समस्या को गहरा रही है।
पारिवारिक माहौल की भूमिका
परिवार में तनाव, अकेलापन और अत्यधिक अपेक्षाएं भी बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर कर सकती हैं। ऐसे में बच्चे अपनी भावनाओं से निपटने के लिए गलत रास्तों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते संकेत पहचानना बेहद जरूरी है।
अभिभावकों के लिए क्या है सीख
संवाद और सतर्कता सबसे जरूरी
मनोचिकित्सकों की सलाह है कि अभिभावक बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार अपनाएं। रोजमर्रा की बातचीत, उनके दोस्तों और गतिविधियों पर नजर रखना और किसी भी असामान्य व्यवहार को अनदेखा न करना बेहद आवश्यक है। आवश्यकता पड़ने पर काउंसलिंग को कलंक की तरह नहीं, बल्कि समाधान के रूप में देखना चाहिए।
आगे क्या बदल सकता है
इन घटनाओं के बाद विद्यालय प्रबंधन भी आंतरिक निगरानी, परामर्श सत्र और अभिभावक बैठकों को और सशक्त करने की दिशा में विचार कर रहा है। यह घटनाएं संकेत देती हैं कि शिक्षा के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य और जीवन कौशल पर भी उतना ही ध्यान देना होगा, ताकि भविष्य की पीढ़ी सुरक्षित और संतुलित रह सके।
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