हरिद्वार में जीवित श्रमिकों को मृतक बताकर 2-2 लाख की सहायता राशि हड़पने का आरोप, उप श्रमायुक्त ने जांच बैठाई

नवीन समाचार, हरिद्वार, 15 जनवरी 2026 (Declared Living-Deceased)। उत्तराखंड के जनपद हरिद्वार (Haridwar) में श्रमिक कल्याण योजनाओं से जुड़ा एक गंभीर फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसने सरकारी सहायता प्रणाली की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। आरोप है कि पंजीकृत श्रमिकों (Registered Workers) को फर्जी तरीके से मृतक दिखाकर उनके नाम पर मिलने वाली सहायता राशि दो-दो लाख रुपये निकाल ली गई। यह खेल श्रम विभाग (Labour Department) के कुछ कार्मिकों और श्रमिक सुविधा केंद्रों (Worker Facilitation Centers) की कथित मिलीभगत से होने की बात कही जा रही है। प्रकरण सामने आने के बाद उप श्रमायुक्त (Deputy Labour Commissioner) ने जांच बैठाते हुए विभागीय स्तर पर छानबीन शुरू कर दी है।
श्रमिक कल्याण बोर्ड की योजना में गड़बड़ी, डीबीटी प्रणाली पर भी उठे सवाल
यह पूरा मामला उत्तराखंड भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड (Uttarakhand Building and Other Construction Workers Welfare Board) की उस योजना से जुड़ा है, जिसके तहत पंजीकृत श्रमिक की मृत्यु होने पर उसके आश्रितों को दो लाख रुपये की सहायता राशि दी जाती है। शासन की यह योजना असंगठित श्रमिक परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा (Social Security) का मजबूत सहारा मानी जाती है, लेकिन अब इसी व्यवस्था में धन हड़पने के आरोपों ने भरोसे को झटका दिया है।
जानकारी के अनुसार, योजना के लिए आवेदन श्रमिक सुविधा केंद्रों के माध्यम से किया जाता है। यह आवेदन श्रम प्रवर्तन अधिकारी/पंजीकरण अधिकारी (Labour Enforcement Officer/Registration Officer) के पास जाता है। अनुमोदन के बाद इसे डीबीटी अधिकारी (DBT Officer) को भेजा जाता है, फिर धनराशि आश्रित के बैंक खाते में स्थानांतरित होती है।
यहीं पर कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के जरिए जीवित श्रमिकों को मृतक दिखाकर धनराशि निकलवाई गई। प्रशासनिक स्तर पर यह सवाल भी खड़े हो रहे हैं कि मृत्यु सत्यापन (Death Verification), दस्तावेज जांच और बैंक खाते में भुगतान की प्रक्रिया में निगरानी कितनी मजबूत है।
बहादराबाद ब्लॉक में अधिक फर्जीवाड़े की आशंका, “हिस्सेदारी” का भी आरोप
बताया जा रहा है कि अधिकांश फर्जीवाड़ा बहादराबाद (Bahadrabad) विकासखंड में हुआ है। आरोप यह भी है कि रकम आश्रित के खाते तक तो पहुंचाई गई, लेकिन इसके बाद दलालों (Middlemen) और कुछ अधिकारियों द्वारा धन का बंटवारा किया गया। दावा है कि जिस खाते में पैसा पहुंच रहा है, उसे केवल 70 हजार से एक लाख रुपये दिए जा रहे हैं और शेष राशि का हिस्सा अन्य लोगों में बंट रहा है।
यह स्थिति अगर प्रमाणित होती है तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि गरीब श्रमिक परिवारों के अधिकारों पर सीधा आघात माना जाएगा। आखिर जिन योजनाओं का उद्देश्य संकट में मदद देना है, वही योजनाएं कुछ लोगों के लिए अवैध कमाई का जरिया कैसे बन गईं—यह प्रश्न अब चर्चा में है।
सितंबर 2025 से शुरू हुआ खेल, संख्या 100 से अधिक तक पहुंचने की आशंका
खुलासे के अनुसार फर्जीवाड़े की शुरुआत सितंबर 2025 में हुई। आरोप है कि—
ग्राम बादशाहपुर (Badshahpur) और नसीरपुर कलां (Nasirpur Kalan) में दो पुरुष श्रमिकों को मृतक दिखाकर सहायता राशि निकाली गई।
नई कुंडी बिशनपुर (Nayi Kundi Bishanpur) में दो महिला श्रमिकों को मृतक बताकर धनराशि प्राप्त की गई।
खाला टीरा (Khala Teera) में भी एक श्रमिक को मृतक दिखाकर दो लाख रुपये आश्रित के खाते में भेजे जाने की बात सामने आई है।
सूत्रों के अनुसार, जांच आगे बढ़ने पर यह संख्या 100 से अधिक भी पहुंच सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह मामला केवल कुछ प्रकरणों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि एक संगठित तंत्र (Organized System) की ओर इशारा करेगा।
उप श्रमायुक्त ने जांच शुरू की, लिखित शिकायत का इंतजार
उप श्रमायुक्त विपिन कुमार (Vipin Kumar) के अनुसार विभाग को मौखिक शिकायत मिली है और लिखित शिकायत का इंतजार किया जा रहा है। इसके बावजूद विभाग ने अपने स्तर से जांच शुरू कर दी है। जांच में जो तथ्य सामने आएंगे, उसी आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
यहां महत्वपूर्ण यह भी है कि ऐसे मामलों में केवल जांच बैठा देना पर्याप्त नहीं माना जाता। जरूरत इस बात की है कि—
- मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate) और अन्य दस्तावेजों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ।
- किन अधिकारियों ने अनुमोदन किया।
- धनराशि खाते में जाने के बाद निकासी किसने कराई।
- किस सुविधा केंद्र से आवेदन भेजे गए।
यानी पूरी शृंखला की जवाबदेही तय होना अब जनहित में जरूरी हो गया है।
मजदूर संगठन ने उठाई निष्पक्ष जांच की मांग, मुख्यमंत्री तक जाने की बात
भारतीय मजदूर संघ (Bharatiya Mazdoor Sangh) के प्रदेश महामंत्री सुमित सिंघल (Sumit Singhal) ने प्रकरण को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि मामले को लेकर मुख्यमंत्री (Chief Minister) से मुलाकात कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की जाएगी।
यह प्रकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि श्रमिक कल्याण बोर्ड जैसी योजनाएं समाज के उस वर्ग के लिए हैं, जो असंगठित क्षेत्र में काम कर जीवन चलाता है। यदि इन्हीं योजनाओं में भ्रष्टाचार (Corruption) बढ़ेगा, तो वास्तविक जरूरतमंदों का विश्वास टूटेगा और राज्य की सामाजिक सुरक्षा नीति (Social Welfare Policy) प्रभावित होगी।
आखिर सरकारी सहायता का उद्देश्य “सहारा” है, “सौदा” नहीं—तो क्या यह मामला प्रशासन को व्यवस्था सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने पर मजबूर करेगा।
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