नवीन समाचार, देहरादून, 20 जनवरी 2026 (MP Fund Spent in Other State)। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सामने आए सूचना के अधिकार (आरटीआई) के दस्तावेजों ने सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि (Member of Parliament Local Area Development Scheme—MPLADS) को लेकर नई बहस छेड़ दी है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार, उत्तराखंड के कुछ सांसदों ने राज्य से बाहर उत्तर प्रदेश और हरियाणा में ट्यूबवेल, विद्यालय, सामुदायिक भवन सहित अन्य विकास कार्यों के लिए करीब 1.28 करोड़ रुपये की धनराशि आवंटित करायी।
पहाड़ के कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी पेयजल और बुनियादी सुविधाओं की जरूरत बने रहने के बीच यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे “संसाधनों की प्राथमिकता” और “निधि उपयोग की पारदर्शिता” जैसे प्रश्न सीधे उठते हैं।
आरटीआई दस्तावेजों के आधार पर सांसद निधि के बाहर खर्च का मुद्दा
आरटीआई से मिले दस्तावेजों के अनुसार, उत्तराखंड के सांसदों ने अपनी सांसद निधि का एक हिस्सा राज्य से बाहर उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में विकास कार्यों पर खर्च कराने के लिए स्वीकृत कराया। दस्तावेजों में कहा गया है कि यह धनराशि ट्यूबवेल लगवाने, विद्यालय और सामुदायिक भवन बनाने जैसे कार्यों के लिए आवंटित हुई, जिसकी कुल राशि लगभग 1.28 करोड़ रुपये बतायी गई।
यही तथ्य राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गया है क्योंकि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में कई स्थानों पर पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य सेवाएं और विद्यालयी संसाधन जैसी आवश्यकताओं को लेकर जनता लंबे समय से संघर्ष कर रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि स्थानीय जरूरतों के बीच निधि का हिस्सा दूसरे राज्यों में क्यों स्वीकृत किया गया।
सूची में सबसे ऊपर किस सांसद का नाम और कितना आवंटन
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस सूची में सबसे ऊपर टिहरी गढ़वाल की लोकसभा सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह (Mala Rajya Laxmi Shah) का नाम बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि माला राज्य लक्ष्मी शाह ने वित्त वर्ष 2024-25 में उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद (Agra District) के विकास कार्यों के लिए 1 करोड़ रुपये की धनराशि मंजूर की।
बताया गया कि इस धनराशि का उपयोग आगरा में फुटपाथ, पैदल मार्ग और पेयजल से जुड़े कार्यों में किया जाना है। यह पहल स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों से जुड़ी मानी जा रही है, लेकिन उत्तराखंड के संदर्भ में यही निर्णय आलोचना का आधार भी बन रहा है।
राज्यसभा सांसदों और पूर्व सांसद से जुड़े तथ्य
केवल लोकसभा सांसद ही नहीं, रिपोर्ट में राज्यसभा सांसदों के निर्णय भी उल्लेखित हैं। 
- राज्यसभा सांसद नरेश बंसल (Naresh Bansal) ने हरियाणा (Haryana) में शिक्षा और सामाजिक कार्यों के लिए 25 लाख रुपये की धनराशि दिए जाने की बात सामने आई है।
- इसके अतिरिक्त, पूर्व राज्यसभा सांसद तरुण विजय (Tarun Vijay) के समय 2010 से 2016 के बीच स्वीकृत 3 लाख रुपये की राशि का उल्लेख किया गया है, जो अब दिसंबर 2025 में जारी हुई बतायी गई। रिपोर्ट के अनुसार, यह धनराशि उत्तर प्रदेश के गोरखपुर (Gorakhpur) में सड़कों और नालियों के निर्माण के लिए जारी हुई है।
यह तथ्य भी चर्चा में है कि स्वीकृति पुराने समय की थी, पर धनराशि जारी होने की तिथि हाल की बतायी जा रही है, जिससे योजना, अनुमोदन और क्रियान्वयन की समय-सीमा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
क्षेत्र सीमा के बाहर, पर राज्य के भीतर—अजय टम्टा का उदाहरण
रिपोर्ट में अल्मोड़ा लोकसभा सांसद अजय टम्टा (Ajay Tamta) का भी उल्लेख है। बताया गया है कि उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र की सीमाओं से बाहर जाकर नैनीताल जनपद के विद्यालयों में हॉल और कक्ष निर्माण के लिए 5 लाख रुपये स्वीकृत किए।
यह मामला इसलिए अलग माना जा रहा है क्योंकि यह व्यय उत्तराखंड के भीतर ही है, लेकिन संसदीय क्षेत्र सीमा के बाहर होने के कारण इसे भी उदाहरण के तौर पर जोड़ा गया है।
क्या सांसद निधि राज्य से बाहर खर्च करना नियमों में संभव है
इस पूरे प्रकरण में एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि सांसदों द्वारा दूसरे राज्यों में निधि खर्च करना अब नियमों के अनुसार संभव बताया गया है। केंद्रीय सांख्यिकी मंत्रालय (Central Statistics Ministry) के अगस्त 2024 के आदेश के अनुसार, अब कोई भी सांसद देश में कहीं भी विकास कार्यों के लिए अपनी निधि की सिफारिश कर सकता है। हालांकि इसकी अधिकतम सीमा एक वर्ष में 50 लाख रुपये तय की गई बतायी गई है।
यानी विवाद का बड़ा आधार “अनुमति है या नहीं” से आगे बढ़कर “प्राथमिकता क्या होनी चाहिए” पर टिक गया है।
सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह ने क्या कहा
इस मामले पर टिहरी सांसद माला राज्य लक्ष्मी शाह (Mala Rajya Laxmi Shah) का कहना है कि उत्तराखंड के लोग पूरे देश में फैले हुए हैं और कुछ लोग अपनी जरूरतें लेकर उनके पास आए थे, इसलिए उन्हें मदद दी गई। उन्होंने यह भी कहा कि टिहरी का विकास उनकी पहली प्राथमिकता है और निधि का बड़ा हिस्सा वहीं खर्च होता है।
यह पक्ष इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि सांसद निधि के उपयोग का एक आधार “जनता की मांग” भी हो सकता है, भले ही वह मांग राज्य से बाहर से आई हो।
लोगों पर असर और आगे क्या हो सकता है
इस पूरे मुद्दे का सीधा असर सार्वजनिक भरोसे पर पड़ता है। पहाड़ी इलाकों में पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसी बुनियादी जरूरतों पर चर्चा लंबे समय से चल रही है। ऐसे में आरटीआई दस्तावेजों के आधार पर बाहर खर्च का मामला सामने आने पर लोगों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि संसाधनों का संतुलित उपयोग कैसे हो।
आगे संभावना है कि इस विषय पर राजनीतिक दलों के बीच बहस तेज होगी और सांसद निधि के उपयोग को लेकर पारदर्शिता, निगरानी और प्राथमिकता निर्धारण पर फिर से चर्चा बढ़ेगी। क्या प्रदेश की जरूरतों के साथ-साथ बाहर बसे उत्तराखंडियों की मांगों का संतुलन किसी स्पष्ट नीति से तय हो सकेगा? यही सबसे बड़ा सवाल बन रहा है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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