उत्तराखंड में न्यायपालिका का ऐतिहासिक विकास: परंपरागत व्यवस्था से उच्च न्यायालय तक की यात्रा

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 18 फरवरी 2026 (Judiciary History UK)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के कुमाऊं (Kumaon) और गढ़वाल (Garhwal) मंडलों में न्यायिक व्यवस्था का विकास एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। राजशाही की प्रथागत न्याय पद्धति से लेकर आधुनिक उच्च न्यायालय (High Court) प्रणाली तक पहुंचने की यह यात्रा न केवल प्रशासनिक परिवर्तन की कहानी है, बल्कि पहाड़ के सामाजिक ढांचे, शासन व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के विस्तार से भी जुड़ी रही है। आज की संस्थागत न्याय प्रणाली को समझने के लिए इस ऐतिहासिक क्रम को जानना  आवश्यक है, क्योंकि इसी से क्षेत्र में न्याय की पहुंच, पारदर्शिता और विधिक संरचना की नींव पड़ी।

(Judiciary History UK) भारतीय न्यायपालिका का इतिहास

वर्षक्रम में न्यायिक व्यवस्था का विकास

1790 से पूर्व – पारंपरिक राजशाही व्यवस्था

1790 से पहले उत्तराखंड के कुमाऊं में चंद राजवंश (Chand Dynasty) और गढ़वाल में परमार पंवार राजवंश (Parmara Panwar Dynasty) के अधीन न्याय व्यवस्था मुख्यतः प्रथागत और व्यक्ति-आधारित थी। राजा ही दीवानी (Civil), फौजदारी (Criminal) और राजस्व मामलों में सर्वोच्च प्राधिकारी होता था।
स्थानीय स्तर पर ‘दिथा’ और ‘हाकिम इलाका’ जैसे अधिकारी विवादों का निपटारा करते थे, जबकि ग्राम पंचायतें परंपरागत नियमों से छोटे विवाद सुलझाती थीं। असंतोष होने पर लोग देव परंपराओं और सामाजिक रीति-रिवाजों का सहारा लेते थे।

1790 से 1815 – गोरखा शासन

1790 में गोरखाओं (Gorkha Rule) ने कुमाऊं और बाद में गढ़वाल पर नियंत्रण स्थापित किया। इस काल में दंड व्यवस्था कठोर हुई और आर्थिक दंड का चलन बढ़ा। प्रशासन अधिक केंद्रीकृत हुआ, किंतु स्थानीय समाज पर इसका प्रभाव दमनात्मक माना गया। न्याय प्रक्रिया अपेक्षाकृत कठोर और शासक-केन्द्रित थी।

1815 – ब्रिटिश शासन की स्थापना

1815 में अंग्रेजों (British Rule) ने गोरखाओं को पराजित कर कुमाऊं और गढ़वाल को अपने अधीन लिया। क्षेत्र को गैर-विनियमित प्रांत (Non-Regulated Province) घोषित किया गया।
कुमाऊं के आयुक्त (Commissioner) को प्रशासनिक, दीवानी और फौजदारी सभी अधिकार दिए गए। ई. गार्डनर (E. Gardner) पहले आयुक्त बने। इससे न्याय व्यवस्था अधिक संगठित रूप लेने लगी।

1815 से 1835 – ट्रेल का प्रशासन

आयुक्त जी. डब्ल्यू. ट्रेल (G. W. Traill) के कार्यकाल में न्यायिक और प्रशासनिक ढांचे को व्यवस्थित किया गया। 1823 में ‘अस्सी साला बंदोबस्त’ (Eighty Year Settlement) नामक पहला औपचारिक राजस्व सर्वेक्षण शुरू हुआ, जिसने भूमि सीमांकन और राजस्व निर्धारण की स्थायी आधारशिला रखी।
आयुक्त के पास अपीलीय न्यायिक अधिकार भी थे, जिससे व्यवस्था अधिक संस्थागत बनी।

1838 – अधिनियम दस के अंतर्गत पृथक्करण

1838 में अधिनियम दस (Act X of 1838) के तहत गढ़वाल को कुमाऊं से प्रशासनिक रूप से अलग किया गया। दोनों क्षेत्रों में वरिष्ठ सहायक (Senior Assistant), सदर अमीन (Sadar Ameen) और मुंसिफ (Munsif) नियुक्त किए गए। आयुक्त समग्र प्रमुख बने रहे, जिससे न्यायिक संरचना बहुस्तरीय हुई।

1839 से 1863 – न्यायिक संहिताकरण

1839 में असम नियम (Assam Rules) लागू कर न्याय प्रशासन को संहिताबद्ध किया गया। 1863 में इसे झांसी नियम (Jhansi Rules) से प्रतिस्थापित किया गया।
इस काल में भी आयुक्त कुमाऊं उच्च अपीलीय प्राधिकारी थे और गंभीर मामलों की अपील सदर दीवानी अदालत (Sadar Diwani Adalat) या बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) तक जाती थी।

1913 – प्रशासनिक स्थिति

1913 तक नैनीताल, मुरादाबाद और बरेली ‘संयुक्त प्रांत आगरा और अवध’ (united Province Agra and Awadh) के अंतर्गत पृथक जिले थे। नैनीताल (Nainital) कुमाऊं मंडल का प्रमुख जिला था और यहां गैर-विनियमित प्रशासनिक ढांचा लागू रहा। पूरे पर्वतीय क्षेत्रों का न्यायिक नियंत्रण नैनीताल से संचालित होता था। प्रत्येक जिले में जिला न्यायाधीश (District Judge) नियुक्त किए गए। मुरादाबाद (Moradabad) और बरेली (Bareilly) रोहिलखंड मंडल में थे। 

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1947 – स्वतंत्रता के बाद का पुनर्गठन

स्वतंत्रता के बाद कुमाऊं और गढ़वाल उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में शामिल हुए। आयुक्त प्रणाली जारी रही, परंतु न्यायिक ढांचा भारतीय न्याय व्यवस्था के अनुरूप पुनर्गठित होने लगा। उच्च अपीलों के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र बना रहा।

1960 – नए जिलों का गठन

1960 में चमोली (Chamoli), उत्तरकाशी (Uttarkashi) और पिथौरागढ़ (Pithoragarh) जिलों का गठन हुआ। इससे न्यायिक प्रशासन का विकेंद्रीकरण हुआ और पर्वतीय क्षेत्रों में न्याय तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान बनी।

9 नवंबर 2000 – उत्तराखंड राज्य का गठन

9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य (State of Uttarakhand) बनने के साथ नैनीताल में उच्च न्यायालय की स्थापना हुई। इससे उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों को अपनी पृथक उच्च न्यायिक व्यवस्था मिली और इलाहाबाद उच्च न्यायालय पर निर्भरता समाप्त हो गई। यह क्षेत्रीय न्यायिक स्वायत्तता की दिशा में ऐतिहासिक कदम था।

2000 के बाद – विशेष व्यवस्थाएं और वर्तमान परिदृश्य

राज्य गठन के बाद भी कई पर्वतीय क्षेत्रों में राजस्व पुलिस व्यवस्था (Revenue Police System) जारी रही, जिसमें पटवारी (Patwari) और लेखपाल (Lekhpal) सीमित पुलिस अधिकारों का प्रयोग करते रहे। समय के साथ इसे नियमित पुलिस व्यवस्था में समाहित करने की प्रक्रिया जारी है।

आज न्यायपालिका का ढांचा अधिक संस्थागत, बहुस्तरीय और विधि-सम्मत हो चुका है। फिर भी दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में न्याय तक त्वरित पहुंच, आधारभूत संरचना और न्यायिक संसाधनों की उपलब्धता जैसे प्रश्न अभी भी नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती बने हुए हैं।

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