सेल्फी फीवर नहीं, अब ‘सेल्फाइटिस सिंड्रोम’: मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा घातक असर

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नवीन समाचार, देहरादून, 9 जुलाई 2025 (No more selfie fever-now Selfitis Syndrome-It is)वर्तमान समय में ‘सेल्फी’ लेना केवल एक शौक नहीं, बल्कि एक मानसिक विकार का रूप लेता जा रहा है, जिसे विशेषज्ञ ‘सेल्फाइटिस सिंड्रोम’ (Selfitis Syndrome) के रूप में पहचान रहे हैं। यह विकार विशेषकर युवाओं में तेजी से फैल रहा है, लेकिन अब इसकी चपेट में हर आयु वर्ग के लोग आ रहे हैं। सेल्फ़ी के कारण की दुर्घटनाएं भी हो रही हैं। अमेरिकी मानसिक स्वास्थ्य संगठन ‘अमेरिकन साइकियाट्री एसोसिएशन’ और देश के विशेषज्ञों द्वारा इसे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्या के रूप में चिन्हित किया गया है।

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क्या है ‘सेल्फाइटिस सिंड्रोम’?

पिछले कुछ सालों में सेल्फी का क्रेज इतना बढ़ गया है कि अब ये शौक सिंड्रोम में बदल रहा है, जिसे 'सेल्फाइटिस' कहा जा रहा है। सेल्फाइटिस और जिसकी गिरफ्त में हर उम्र के लोग हैं।दून चिकित्सालय स्थित मानसिक स्वास्थ्य विभाग की अध्यक्ष डॉ. जया नवानी के अनुसार, सेल्फाइटिस सिंड्रोम में व्यक्ति सेल्फी लेने और उसे इंटरनेट मीडिया पर साझा करने का इतना आदी हो जाता है कि यह आदत उसकी सोच, भावना और व्यवहार पर बुरा प्रभाव डालती है। यह केवल मनोरंजन नहीं रह जाता, बल्कि व्यक्ति दिनभर इस चक्र में उलझा रहता है।

डॉ. नवानी बताती हैं कि सेल्फाइटिस सिंड्रोम के तीन प्रमुख स्तर होते हैं:

  1. सौम्य (Borderline Selfitis) – व्यक्ति दिनभर में तीन सेल्फी लेता है, लेकिन उन्हें सोशल मीडिया पर साझा नहीं करता।

  2. तीव्र (Acute Selfitis) – व्यक्ति दिन में तीन से अधिक सेल्फी लेता है और सभी को सोशल मीडिया पर साझा करता है।

  3. क्रोनिक (Chronic Selfitis) – व्यक्ति दिनभर में छह या उससे अधिक सेल्फी लेकर उन्हें साझा करता है और हर कुछ मिनटों में उन पर आने वाली प्रतिक्रियाएं (लाइक, टिप्पणी आदि) देखता रहता है।

मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

इस विकार से ग्रस्त व्यक्तियों में अक्सर निम्न मानसिक एवं व्यवहारिक लक्षण पाए जाते हैं:

  • आत्म-मूल्यांकन (Self-worth) में गिरावट

  • अवसाद व चिंता की भावना

  • एकाग्रता में कमी व चिड़चिड़ापन

  • ‘बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर’ यानी अपने शरीर को लेकर असंतोष

  • नींद की कमी व व्यवहार में आक्रामकता

डॉ. नवानी बताती हैं कि यह समस्या धीरे-धीरे एक ‘इमोशनल रोलर कोस्टर’ बन जाती है, जिसमें व्यक्ति सोशल मीडिया से मिलने वाली प्रतिक्रिया पर इतना निर्भर हो जाता है कि प्रतिक्रिया न मिलने पर उसे अवसाद होने लगता है और प्रतिक्रिया अधिक मिलने पर अति-उत्साहित हो जाता है।

क्या कहता है अंतरराष्ट्रीय शोध?

अमेरिकन साइकियाट्री एसोसिएशन के अनुसार, सेल्फाइटिस सिंड्रोम एक मनोवैज्ञानिक विकार है, जिसमें व्यक्ति अपने आत्म-छवि को लेकर अत्यधिक सचेत हो जाता है और इसकी पुष्टि के लिए बार-बार अपनी तस्वीरें लेता है व साझा करता है। इसके चलते कई देशों में मानसिक रोग चिकित्सकों के पास इस लत से परेशान लोग परामर्श के लिए पहुंच रहे हैं।

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उपचार व समाधान (No more selfie fever-now Selfitis Syndrome-It is)

विशेषज्ञों के अनुसार, सेल्फाइटिस सिंड्रोम से बचाव के लिए इन उपायों को अपनाना उपयोगी हो सकता है:

  • सोशल मीडिया पर सीमित समय व्यतीत करें।

  • दिनभर की दिनचर्या में रचनात्मक गतिविधियों को शामिल करें जैसे लेखन, संगीत, योग, ध्यान आदि।

  • मानसिक स्वास्थ्य परामर्शदाता या मनोरोग चिकित्सक से परामर्श लें।

  • स्वयं को हर समय ‘परफेक्ट’ दिखाने की प्रवृत्ति से बाहर निकालें और वास्तविक जीवन को प्राथमिकता दें।

इस तरह स्पष्ट है की सेल्फी लेना एक सामान्य आधुनिक प्रवृत्ति है, लेकिन जब यह आदत विकार का रूप ले लेती है, तो यह चिंता का विषय बन जाती है। इसलिए आवश्यक है कि समाज, विशेषकर माता-पिता और शिक्षक इस ओर जागरूक हों और बच्चों व युवाओं के डिजिटल व्यवहार पर सतत निगरानी रखें।

सेल्फी सिंड्रोम को हल्के में लेना अब उचित नहीं। यह केवल एक ट्रेंड नहीं, एक मानसिक संकट है—जिससे बाहर निकलना आवश्यक है। 

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