नवीन समाचार, देहरादून, 20 दिसंबर 2025 (UK Govt Decision on Increment)। उत्तराखंड सरकार के एक निर्णय ने राज्य के हजारों शिक्षकों के लंबे समय से चले आ रहे वेतन संबंधी विवाद पर एक निर्णायक निर्णय लिया है। सरकार ने चयन और प्रोन्नत वेतनमान के दौरान दिए गए अतिरिक्त इंक्रीमेंट यानी वेतन वृद्धि को आगे के लिए अमान्य कर दिया है, हालांकि पहले से किया गया अतिरिक्त भुगतान वापस नहीं लिया जाएगा। इस फैसले का सीधा असर राज्य के लगभग 5000 शिक्षकों के भविष्य के वेतन निर्धारण पर पड़ेगा, जिससे शिक्षा व्यवस्था से जुड़े एक अहम प्रशासनिक मुद्दे पर स्पष्टता आई है।
अतिरिक्त इंक्रीमेंट पर सरकार के नियमों में संशोधन के बाद जारी हुई अधिसूचना
राज्य सरकार ने सरकारी कर्मचारी वेतन नियम 2016 में संशोधन करते हुए इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। इसके तहत चयन और प्रोन्नत वेतनमान मिलने के समय दिया गया अतिरिक्त इंक्रीमेंट अब मान्य नहीं रहेगा। सरकार का कहना है कि यह निर्णय नियमों की एकरूपता और वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिए आवश्यक था, क्योंकि पूर्व में स्पष्ट दिशा-निर्देश न होने से भ्रम की स्थिति बनी हुई थी।
पहले से मिला भुगतान सुरक्षित-वसूली नहीं होगी, शिक्षकों को राहत
इस मामले में वित्त सचिव दिलीप जावलकर ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 2016 से 2019 के बीच जिन शिक्षकों को चयन या प्रोन्नत वेतनमान के साथ अतिरिक्त इंक्रीमेंट दिया गया था, उनसे अब कोई वसूली नहीं की जाएगी। यानी पहले से दिया गया अतिरिक्त भुगतान सुरक्षित रहेगा। यह बात शिक्षकों के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है, क्योंकि रिकवरी की आशंका को लेकर लंबे समय से असमंजस बना हुआ था। इस संबंध में महानिदेशक शिक्षा को औपचारिक पत्र भेजकर निर्णय के शीघ्र क्रियान्वयन के निर्देश दिए गए हैं।
वेतन पुनर्निर्धारण का प्रभाव
भविष्य में एक इंक्रीमेंट कम मिलेगा
सूत्रों के अनुसार, वेतन के पुनर्निर्धारण के बाद प्रभावित शिक्षकों के मौजूदा वेतन से एक इंक्रीमेंट कम हो जाएगा। इसका अर्थ यह है कि आगे चलकर उन्हें उस अतिरिक्त इंक्रीमेंट का लाभ नहीं मिलेगा, जो पहले चयन या प्रोन्नत वेतनमान के समय जोड़ा गया था। राज्य में ऐसे करीब पांच हजार शिक्षक हैं, जिनके वेतन में यह तकनीकी लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव किया जाएगा। इसका दीर्घकालिक असर उनकी मासिक आय और सेवानिवृत्ति लाभों पर भी पड़ सकता है।
भ्रम कैसे पैदा हुआ और अब क्या बदलेगा-सातवें वेतन आयोग से जुड़ा मामला
इस पूरे विवाद की जड़ वर्ष 2016 में मानी जाती है। उत्तराखंड में सामान्य रूप से शिक्षकों को 10 वर्ष की सेवा के बाद चयन वेतनमान और 12 वर्ष की सेवा के बाद प्रोन्नत वेतनमान दिया जाता है। सातवें वेतन आयोग के लागू होने के बाद चयन और प्रोन्नत वेतनमान पाने वाले शिक्षकों को एक अतिरिक्त इंक्रीमेंट भी मिलने लगा, जबकि उस समय इसे लेकर स्पष्ट नियम तय नहीं थे।
बाद में 6 सितंबर 2019 को जारी शासनादेश में यह व्यवस्था की गई कि चयन या प्रोन्नत वेतनमान मिलने पर वेतन सीधे वेतन मैट्रिक्स की अगली कोष्ठिका में तय होगा और अलग से इंक्रीमेंट नहीं दिया जाएगा। इसके बावजूद 1 जनवरी 2016 से 13 सितंबर 2019 के बीच बड़ी संख्या में शिक्षकों को अतिरिक्त इंक्रीमेंट का लाभ मिल चुका था, जिससे विवाद गहराता चला गया।
2019 के बाद शिक्षा विभाग ने अतिरिक्त भुगतान की वसूली की प्रक्रिया शुरू की, जिस पर उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी थी। अब सरकार के ताजा निर्णय से यह स्पष्ट हो गया है कि न तो वसूली होगी और न ही आगे अतिरिक्त इंक्रीमेंट मिलेगा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इससे वर्षों से चला आ रहा यह विवाद समाप्त होगा। सरकार को उम्मीद है कि नियमों की यह स्पष्टता शिक्षा व्यवस्था में स्थिरता और भरोसा लौटाने में मदद करेगी।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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