नाबालिग से दुष्कर्म के आरोप में फंसा निर्दोष युवक, 3 वर्ष के बाद बच्चे की डीएनए जांच से मिली न्यायिक राहत, सवाल क्यों फँसाया और असली दुष्कर्मी कौन ?

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नवीन समाचार, नैनीताल, 25 जनवरी 2026 (Accuse of Rape-DNA Test)। उत्तराखंड के नैनीताल (Nainital) जनपद अंतर्गत भीमताल (Bhimtal) क्षेत्र से सामने आए एक पॉक्सो (Protection of Children from Sexual Offences Act–POCSO Act) अधिनियम के प्रकरण में तीन वर्षों बाद बड़ा न्यायिक मोड़ आया है। वर्ष 2023 से कारावास की सजा भुगत रहे एक आरोपित को डीएनए (DNA) परीक्षण में नवजात शिशु का जैविक पिता न पाए जाने पर दोषमुक्त घोषित कर दिया गया।

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न केवल न्यायिक प्रक्रिया में वैज्ञानिक साक्ष्य की भूमिका को रेखांकित करता है, बल्कि यह प्रश्न भी उठाता है कि  वैज्ञानिक साक्ष्य की रिपोर्ट आने व दोषमुक्त घोषित होने में इतना समय क्यों लगा और गलत आरोपों की स्थिति में निर्दोष व्यक्ति को हुई क्षति की भरपाई कैसे होगी। और क्या असली दोषी-दुष्कर्मी को व झूठे आरोप लगाने वालों को भी सजा मिलेगी ?

पॉक्सो न्यायालय का निर्णय और पूरा घटनाक्रम

(Accuse Of Rape-DNA Test)प्राप्त जानकारी के अनुसार यह मामला भीमताल थाना (Bhimtal Police Station) क्षेत्र का है। वर्ष 2023 में एक नाबालिग किशोरी के गर्भवती होने और बाद में शिशु को जन्म देने के बाद, पीड़िता के भाई ने 19 मई 2023 को एक युवक के विरुद्ध दुष्कर्म (Rape) का अभियोग दर्ज कराया था। पुलिस ने जांच के उपरांत आरोपित को गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया।

मामला हल्द्वानी (Haldwani) स्थित विशेष पॉक्सो न्यायालय (Special POCSO Court) में विचाराधीन रहा। अभियोजन पक्ष की ओर से पीड़िता सहित कुल आठ गवाह प्रस्तुत किए गए। सुनवाई के दौरान पीड़िता ने आरोपित को ही शिशु का पिता बताते हुए दुष्कर्म का आरोप दोहराया, जबकि पीड़िता के परिवार के अन्य सदस्यों ने अभियोजन कथानक का समर्थन नहीं किया।

आरोपित की ओर से अधिवक्ता लोकेश राज चौधरी (Lokesh Raj Chaudhary) ने सशक्त पैरवी करते हुए डीएनए परीक्षण की मांग की। न्यायालय के निर्देश पर पीड़िता, नवजात शिशु और आरोपित के नमूनों की वैज्ञानिक जांच कराई गई।

डीएनए रिपोर्ट और दोषमुक्ति

पति ने करवाया DNA टेस्ट तो पत्नी का भी हो गया मन, नतीजे देखकर उड़े होश,  सामने आ गया पिता का सच! - News18 हिंदीडीएनए जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि नवजात शिशु की जैविक माता पीड़िता है, किंतु आरोपित उसका जैविक पिता नहीं है। इस वैज्ञानिक साक्ष्य के आधार पर विशेष न्यायाधीश मनमोहन सिंह (Judge Manmohan Singh) के पॉक्सो न्यायालय ने आरोपित को भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code–IPC) की धारा 376(3) तथा पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धारा 5(j)(ii)/6 के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।

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मानवीय और सामाजिक प्रभाव

तीन वर्षों तक जेल में रहने के बाद निर्दोष सिद्ध हुए युवक की स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि गलत आरोपों से किसी व्यक्ति के जीवन, सम्मान और भविष्य पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है। यह मामला न्याय व्यवस्था, जांच प्रक्रिया और सामाजिक जिम्मेदारी पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। साथ ही यह भी आवश्यक हो जाता है कि वास्तविक अपराधी की पहचान कर उसे दंडित किया जाए, ताकि पीड़िता को वास्तविक न्याय मिल सके। 

आगे यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस प्रकरण में झूठे आरोपों और वास्तविक दोषी की पहचान को लेकर कोई नई जांच शुरू होती है और निर्दोष युवक को हुई क्षति की भरपाई के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।

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