पलायन की पीड़ा: पिथौरागढ़ के सीमांत तड़ीगांव में अंतिम संस्कार के लिए ग्रामीण नहीं मिले, एसएसबी के जवानों ने निभाई जिम्मेदारी

नवीन समाचार, पिथौरागढ़, 2 जनवरी 2026 (Migration-Armymen did Funeral)। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद के सीमांत गांव तड़ीगांव में एक बुजुर्ग महिला के निधन के बाद अंतिम संस्कार तक की यात्रा ने पहाड़ों से हो रहे पलायन की गहरी और संवेदनशील सच्चाई को सामने ला दिया। गांव में अंतिम यात्रा के लिए पर्याप्त लोग नहीं मिले, ऐसे में नेपाल सीमा पर तैनात सशस्त्र सीमा बल के जवानों ने आगे बढ़कर अर्थी को कंधा दिया, लकड़ियां ढोईं और अंत्येष्टि की पूरी प्रक्रिया संपन्न कराई। यह घटना केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ की सामाजिक स्थिति का आईना बन गई।
पलायन से खाली होता गांव, अंतिम यात्रा में नहीं जुटे लोग
सौ वर्षीय महिला का निधन और गांव की मजबूरी
तड़ीगांव में रहने वाली लगभग 100 वर्षीय झूपा देवी का बुधवार को निधन हो गया। परंपरा के अनुसार शव को गांव से करीब ढाई किलोमीटर दूर काली नदी के तट पर ले जाकर अंत्येष्टि की जानी थी, लेकिन गांव में शव यात्रा के लिए मुश्किल से चार-पांच लोग ही उपलब्ध हो सके। वे सभी उम्रदराज थे और लंबी दूरी तक शव ले जाना उनके लिए संभव नहीं था। पूर्व ग्राम प्रधान भूपेंद्र चंद के अनुसार, गांव में अब इतने लोग ही नहीं बचे हैं कि अंतिम संस्कार जैसे सामाजिक दायित्व पूरे किए जा सकें।
एसएसबी जवान बने सहारा
सीमा पर तैनात जवानों ने निभाई मानवीय भूमिका
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ग्रामीणों ने नेपाल सीमा पर तैनात सशस्त्र सीमा बल से सहायता मांगी। इस पर चार जवान और दो अधिकारी तुरंत गांव पहुंचे। जवानों ने न केवल अर्थी को कंधा दिया, बल्कि लकड़ियां जुटाईं और काली नदी के तट तक शव ले जाकर अंतिम संस्कार की व्यवस्था कराई। 65 वर्षीय रमेश चंद ने अपनी माता को मुखाग्नि दी। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जवान सहयोग न करते, तो अंत्येष्टि कर पाना बेहद कठिन हो जाता।
तड़ीगांव में पलायन की जड़ें
सड़क, वन्यजीव और बुनियादी सुविधाओं की कमी
तड़ीगांव से हो रहे पलायन के पीछे कई कारण हैं। वर्ष 2019 में पंचायत स्तर पर बनाई गई कच्ची सड़क अब तक पक्की नहीं हो सकी है, जिससे आवागमन कठिन बना हुआ है। खेती पर जंगली सुअरों का लगातार नुकसान, गुलदार और भालू की दहशत ने ग्रामीणों की आजीविका और सुरक्षा दोनों को प्रभावित किया है। गांव में बीस वर्ष पहले 37 परिवार रहते थे, लेकिन अब केवल 13 परिवार ही बचे हैं, जिनमें अधिकांश बुजुर्ग हैं।
यह घटना क्यों है महत्वपूर्ण
सामाजिक ताने-बाने पर गहराता संकट
यह घटना केवल एक गांव या एक परिवार तक सीमित नहीं है। यह बताती है कि पहाड़ों में व खासकर सीमांत गांवों में पलायन अब केवल जनसंख्या घटने का आंकड़ा नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराओं और मानवीय संबंधों पर भी सीधा असर डाल रहा है। जब अंतिम संस्कार जैसे संस्कार के लिए भी बाहरी सहायता की और खासकर सैनिकों की जरूरत पड़े, तो यह नीति निर्माताओं और प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है। सवाल यह भी है कि क्या सड़क, सुरक्षा और आजीविका से जुड़े मुद्दों का समाधान समय रहते हुआ होता, तो गांव की यह स्थिति पैदा होती?
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।











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