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नवीन समाचार, देहरादून, 12 जनवरी 2026 (Treatment in Animal Attacks)। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से मानव–वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) से जुड़े लोगों के लिए राहत की खबर सामने आई है। प्रदेश में जंगली जानवरों के हमले में घायल व्यक्तियों के उपचार पर अब राज्य सरकार ₹15 लाख तक का खर्च उठाएगी। इसमें ₹5 लाख तक का उपचार अटल आयुष्मान उत्तराखंड योजना (Atal Ayushman Uttarakhand Yojana) के माध्यम से होगा, जबकि शेष ₹10 लाख तक की अतिरिक्त सहायता राज्य सरकार देगी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (Pushkar Singh Dhami) की घोषणा के क्रम में इस प्रस्ताव पर वित्त विभाग (Finance Department) से राय ली गई है और शीघ्र ही संबंधित शासनादेश (Government Order) जारी होने की बात कही गई है। यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पर्वतीय और वन सीमांत क्षेत्रों में जंगली जानवरों के हमले बढ़ने से ग्रामीण परिवारों पर इलाज का आर्थिक बोझ लगातार बढ़ रहा था।

सरकार का नया निर्णय, इलाज के खर्च की स्पष्ट व्यवस्था और जिलाधिकारियों को निर्देश

उत्तराखंड में गुलदार (Leopard), बाघ (Tiger), भालू (Bear) और हाथी (Elephant) जैसे वन्यजीवों के हमलों की घटनाएं कई क्षेत्रों में चिंता का कारण बनी हुई हैं। ऐसे में सरकार का यह कदम घायल व्यक्तियों के लिए बड़ी सहायता के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद वन विभाग (Forest Department) ने शासन (State Government) को प्रस्ताव भेजा और अब उस पर वित्त विभाग की राय ली जा चुकी है।

शासनादेश जारी होने की प्रक्रिया के बीच शासन ने सभी जिलों के जिलाधिकारियों (District Magistrate – DM) को निर्देश दिए हैं कि किसी भी जिले में ऐसी स्थिति आने पर घायलों के समुचित उपचार की व्यवस्था तत्काल सुनिश्चित की जाए।

यह संदेश साफ है कि उपचार में देर न हो और जिला स्तर पर जिम्मेदारी तय रहे। क्या इससे दूरस्थ गांवों में उपचार का भरोसा बढ़ेगा। यह प्रश्न इसलिए भी अहम है क्योंकि कई बार घायल व्यक्ति को सड़क, परिवहन और संसाधन की कमी के कारण समय पर उपचार नहीं मिल पाता।

अब तक व्यवस्था क्या थी, मुआवजा था लेकिन इलाज का अलग प्रावधान नहीं

वर्तमान में वन्यजीवों के हमले में घायल व्यक्तियों को मानव–वन्यजीव संघर्ष राहत वितरण निधि (Human-Wildlife Conflict Relief Fund) के अंतर्गत विभिन्न श्रेणियों में ₹15 हजार से ₹3 लाख तक मुआवजा दिया जाता है। लेकिन नियमावली में उपचार खर्च का अलग से स्पष्ट प्रावधान नहीं था। आम तौर पर घायलों को सरकारी चिकित्सालयों (Government Hospitals) में उपचार उपलब्ध कराया जाता रहा, लेकिन जटिल स्थिति, लंबा उपचार, शल्य चिकित्सा (Surgery) या निजी चिकित्सालयों की आवश्यकता पड़ने पर परिवारों को बड़ी धनराशि स्वयं जुटानी पड़ती थी।

इसी पृष्ठभूमि में सरकार का यह निर्णय राहत देने वाला है। इससे यह उम्मीद भी बनेगी कि गंभीर रूप से घायल व्यक्ति के उपचार में धन के कारण कोई बाधा न आये।

मृत्यु पर मुआवजा पहले ही बढ़ा, अब घायलों पर फोकस

सरकार कुछ समय पहले वन्यजीव हमले में मृत्यु पर मुआवजा राशि को ₹6 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख कर चुकी है। अब नीति का अगला कदम घायलों की चिकित्सा पर केंद्रित है। यह बदलाव केवल सहायता राशि बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बताता है कि सरकार मानव–वन्यजीव संघर्ष को “सुरक्षा और स्वास्थ्य” से जोड़कर देख रही है।

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प्रमुख सचिव वन का बयान, जल्द शासनादेश की तैयारी

प्रमुख सचिव वन आरके सुधांशु (RK Sudhanshu) के अनुसार वन्यजीवों से घायल व्यक्तियों के उपचार में अटल आयुष्मान के अतिरिक्त ₹10 लाख तक का खर्च राज्य सरकार द्वारा वहन करने संबंधी प्रस्ताव राय के लिए वित्त विभाग को भेजा गया है और जल्द ही शासनादेश जारी होगा। साथ ही सभी जिलाधिकारियों को घायलों के समुचित उपचार के निर्देश दिए गए हैं।

यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि योजना केवल घोषणा स्तर पर नहीं है, बल्कि शासनादेश के माध्यम से इसे लागू करने की प्रक्रिया तेज हो चुकी है।

आमजन पर क्या असर पड़ेगा, इलाज की चिंता कम होगी तो भरोसा बढ़ेगा

ग्रामीण क्षेत्रों में वन्यजीवों के हमले की घटना केवल शारीरिक चोट नहीं होती, बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति को भी झकझोर देती है। खेत, जंगल, पानी और घास-लकड़ी जैसे कामों के लिए घर से बाहर निकलना पहाड़ में दैनिक जीवन का हिस्सा है। यदि ऐसे में किसी पर हमला हो जाए तो उपचार के साथ-साथ कामकाज रुक जाता है, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है और परिवार कर्ज के दबाव में आ सकता है।

इस योजना से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि गंभीर घायल व्यक्ति को उपचार के लिए धन जुटाने की चिंता कम होगी। साथ ही यह प्रशासन पर भी दबाव बनाएगा कि उपचार की व्यवस्था समय पर हो। अब यह देखना होगा कि शासनादेश में प्रक्रिया क्या तय की जाती है, भुगतान का तरीका क्या होगा और उपचार का सत्यापन किस स्तर पर होगा, ताकि जरूरतमंद को समय पर मदद मिल सके और व्यवस्था में अनावश्यक अड़चन न आये।

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By डॉ.नवीन जोशी

डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, 'कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन 'नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड' के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।

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