नैनीताल में उत्तराखंड का एकमात्र देवगुरु वृहस्पति मंदिर, आस्था-ज्ञान और रहस्य का संगम

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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 30 जनवरी 2026 (Devguru Brihaspati Mandir)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल (Nainital) जनपद के ओखलकांडा (Okhalkanda) विकासखंड से जुड़ी मध्य हिमालयी पर्वत श्रृंखलाओं के बीच एक ऐसा दुर्लभ और रहस्यमय तीर्थस्थल स्थित है, जो देवताओं के गुरु बृहस्पति देव (Brihaspati Dev) को समर्पित है। देवगुरु-कोटली (Devguru-Kotli) गांव के समीप, घने जंगलों और पर्वतीय सन्नाटे के बीच लगभग सात किलोमीटर की पैदल दूरी पर स्थित यह मंदिर उत्तराखंड का एकमात्र देवगुरु वृहस्पति मंदिर माना जाता है।

(Devguru Brihaspati Mandir) उत्तराखंड के नैनीताल जिले के ओखलकांडा क्षेत्र में देवगुरु बृहस्पति का मंदिर  है। जो कि देवगुरु पर्वत की चोटी पर स्थित है । इस मंदिर को ...समुद्र तल से लगभग 8000 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह स्थल न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम उदाहरण है, बल्कि आध्यात्मिक साधना, ज्ञान और गुरु कृपा का भी महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर के दर्शन मात्र से जीवन में विवेक, बौद्धिक स्पष्टता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

उत्तराखंड का एकमात्र देवगुरु वृहस्पति मंदिर

दक्षिणाभिमुख अवष्टक (Dakshinabhimukh Avashthak) के नाम से भी पहचाने जाने वाले इस प्राचीन मंदिर की स्थापना सातवीं शताब्दी मानी जाती है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार देश में देवगुरु वृहस्पति के अत्यंत सीमित मंदिर हैं, जिनमें राजस्थान (Rajasthan) के जयपुर (Jaipur) और तमिलनाडु (Tamil Nadu) में कुंभकोणम (Kumbakonam) के समीप अलनगुड़ी (Alangudi) प्रमुख हैं। ऐसे में नैनीताल जनपद में स्थित यह मंदिर विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है।

पौराणिक मान्यताएं और कथा

क्या आपको पता है नैनीताल में कहां है देवगुरु बृहस्पति का मंदिर, और किस गांव  में हुई थी मधुमती फिल्म की शूटिंग – यह नवीन समाचार का पुराना ...पौराणिक जनश्रुतियों के अनुसार जब-जब देवताओं पर असुरों का संकट बढ़ा, तब देवगुरु बृहस्पति ने इसी पर्वत पर आकर तपस्या और चिंतन किया। कहा जाता है कि उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव (Lord Shiva) ने उन्हें देवताओं का गुरु पद प्रदान किया और नवग्रहों में विशिष्ट स्थान दिया। स्थानीय मान्यताओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में अनेक ऋषि-मुनियों ने इस क्षेत्र में साधना की थी।

श्रद्धालुओं की आस्था-ज्ञान और बुद्धि का केंद्र

 

(Devguru Brihaspati Mandir) नैनीताल जिले के मांडा में स्थित है एकमात्र बृहस्पति देव का मंदिर - Naini  Liveदेवगुरु बृहस्पति मंदिर को ज्ञान और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है. छात्र, शिक्षक और शिक्षा से जुड़े लोग यहां विशेष रूप से दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से बुद्धि प्रखर होती है और निर्णय क्षमता मजबूत होती है। आज भी देश-प्रदेश से श्रद्धालु यहां गुरु दोष निवारण, शिक्षा में सफलता, जीवन में मार्गदर्शन और आध्यात्मिक उन्नति की कामना लेकर यहाँ पहुंचते हैं। विशेष रूप से विद्यार्थी, शिक्षक और बौद्धिक क्षेत्र से जुड़े लोग इस स्थल को ज्ञान और बुद्धि का केंद्र मानते हैं। मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना से निर्णय क्षमता सुदृढ़ होती है और मानसिक स्थिरता प्राप्त होती है।

गुरुवार का विशेष महत्व

हर बृहस्पतिवार (Thursday) को मंदिर में श्रद्धालुओं की विशेष उपस्थिति रहती है। इस दिन पीले वस्त्र, पीले पुष्प और चने की दाल का भोग अर्पित करने की परंपरा है, जिसे देवगुरु बृहस्पति को प्रिय माना जाता है।

वन्य जीवों के साथ अद्भुत सहअस्तित्व

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार यह मंदिर मानवीय बस्तियों से दूर घने जंगलों में स्थित है। कहा जाता है कि रात्रि के समय आसपास के गांवों के पालतू पशु और हिंसक वन्य जीव भी इस क्षेत्र में बिना किसी टकराव के एक साथ रहते हैं। वर्षों से चली आ रही इस मान्यता को देवगुरु की कृपा और इस स्थान की आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ा जाता है।

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पर्यटन की संभावनाएं और अधूरी पहल

करीब एक दशक पूर्व देवगुरु-कोटली गांव सहित नैनीताल जनपद के एक दर्जन से अधिक गांवों को ‘विलेज टूरिज्म’ (Village Tourism) से जोड़कर ‘पर्यटन गांव’ के रूप में विकसित करने की घोषणा की गई थी, लेकिन यह योजना धरातल पर पूरी तरह साकार नहीं हो सकी। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर को व्यवस्थित रूप से पर्यटन मानचित्र पर लाया जाए, तो इससे क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण मिल सकता है।

कैसे पहुंचें देवगुरु पर्वत

देवगुरु वृहस्पति मंदिर के दर्शन के लिए श्रद्धालु हल्द्वानी (Haldwani) या काठगोदाम (Kathgodam) पहुंच सकते हैं। वहां से भीमताल (Bhimtal) होते हुए ओखलकांडा के लिए सड़क मार्ग उपलब्ध है। मुख्य सड़क से मंदिर तक पहुंचने के लिए कुछ किलोमीटर की पैदल चढ़ाई चढ़नी होती है, जिसे श्रद्धालु एक आध्यात्मिक यात्रा के रूप में अनुभव करते हैं।

हिमालय की गोद में स्थित यह दुर्लभ धाम आज भी रहस्य, आस्था और ज्ञान का प्रतीक बना हुआ है, जो देवभूमि उत्तराखंड की आध्यात्मिक पहचान को और गहराई प्रदान करता है।

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