नवीन समाचार, देहरादून, 22 जुलाई 2025 (After 4 Decades Mountaineering on Nanda Devi)। उत्तराखंड के चमोली जनपद स्थित भारत की दूसरी सबसे ऊंची पर्वत चोटी नंदा देवी को लगभग चार दशक बाद फिर से पर्वतारोहण के लिए खोले जाने की तैयारी की जा रही है। भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन, पर्यटन विभाग और वन विभाग इसके लिए साझा प्रस्ताव तैयार कर रहे हैं। यह निर्णय पर्यटन सचिव धीराज सिंह गर्ब्याल की अध्यक्षता में हुई उच्च स्तरीय बैठक में लिया गया, जिसमें साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देने पर व्यापक चर्चा की गई।
वर्ष 1983 से लगा है प्रतिबंध
प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 1983 में नंदा देवी शिखर पर पर्वतारोहण पर रोक लगा दी गई थी। इससे पहले वर्ष 1965 में भारत और अमेरिका ने मिलकर नंदा देवी चोटी पर एक गुप्त परमाणु निगरानी यंत्र स्थापित करने का प्रयास किया था, जिसका उद्देश्य चीन की गतिविधियों पर नजर रखना था। किंतु मौसम बिगड़ने पर टीम को यंत्र को वहीं छोड़कर लौटना पड़ा और बाद में वह यंत्र ग्लेशियर में दब गया। माना जाता है कि वह रेडियोएक्टिव डिवाइस आज भी वहीं मौजूद है, जिससे पर्यावरण को खतरा बना रहा। इसी कारण वर्ष 1983 में चोटी पर चढ़ाई को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया।
अद्वितीय धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व
नंदा देवी पर्वत को देवी पार्वती का स्वरूप माना जाता है और इसे हिमालय की पुत्री के रूप में पूजा जाता है। यह न केवल उत्तराखंड के लोगों की आस्था का केंद्र है, बल्कि हर 12 वर्ष में निकलने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा को ‘हिमालय का कुंभ’ भी कहा जाता है। यह यात्रा अत्यंत कठिन मानी जाती है और इसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।
विश्व धरोहर क्षेत्र में आता है नंदा देवी पर्वत
7,816 मीटर (25,643 फीट) ऊंचा नंदा देवी पर्वत नंदा देवी नेशनल पार्क के अंतर्गत आता है, जो कि यूनेस्को द्वारा घोषित विश्व धरोहर स्थल है। यह पर्वत चारों ओर से बर्फीली चोटियों और ग्लेशियरों से घिरा हुआ है। यहां पर हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग सहित अनेक दुर्लभ वन्य प्रजातियां पाई जाती हैं।
पर्वतारोहण की अनुमति, लेकिन शर्तों के साथ
सरकार द्वारा प्रस्तावित योजना के अनुसार नंदा देवी पर पर्वतारोहण की अनुमति विशेष शर्तों और नियमों के अंतर्गत ही दी जाएगी। इन नियमों में शामिल हैं—
केवल अनुभवी पर्वतारोहियों को ही अनुमति दी जाएगी
मान्यता प्राप्त ट्रैकिंग एजेंसियों के साथ ही पर्वतारोहण की अनुमति होगी
सभी को परमिट व पूर्व पंजीकरण कराना होगा
स्थानीय संस्कृति, आस्था व नियमों का सम्मान करना अनिवार्य होगा
पर्यावरणीय संतुलन व जैव विविधता को प्राथमिकता दी जाएगी
रहस्य और इतिहास से भरपूर है यह पर्वत
इस क्षेत्र में कई ऐतिहासिक व रहस्यमय घटनाएं भी दर्ज हैं। 1934 में पहली बार एक ब्रिटिश-अमेरिकी टीम इस पर्वतीय क्षेत्र में पहुंची और 1936 में नंदा देवी चोटी पर विजय प्राप्त की गई। 1964 में एन. कुमार के नेतृत्व वाली भारतीय टीम ने सफलता पाई। लेकिन इसके बाद का इतिहास विशेष रूप से उस गुप्त परमाणु मिशन से जुड़ा है, जिसमें 56 किलो वजनी रेडियोएक्टिव यंत्र और प्लूटोनियम के सात कैप्सूल ग्लेशियर में दब गए थे। वैज्ञानिकों के अनुसार यह उपकरण आज भी सक्रिय हो सकता है।
उत्तराखंड में इको-टूरिज्म को मिलेगा बढ़ावा
इस निर्णय से उत्तराखंड में इको-टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे। सरकार बागेश्वर और उत्तरकाशी की कुछ अन्य ऊंची चोटियों को भी पर्वतारोहण के लिए खोलने की योजना पर कार्य कर रही है।
रूपकुंड झील का रहस्य
इस क्षेत्र से जुड़ी एक और रहस्यमयी जगह है रूपकुंड झील, जिसे ‘नरकंकालों की झील’ भी कहा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यहां मिले सैकड़ों कंकाल 9वीं शताब्दी के आदिवासियों के हैं। हालांकि लोक कथाओं के अनुसार यह कंकाल राजा जसधवल, उनकी गर्भवती रानी बलाम्पा, सैनिकों व अन्य अनुयायियों के हैं, जो नंदा देवी की नाराजगी से आए तूफान में फंसकर मारे गए थे।
धार्मिकता और पर्यटन का संतुलन (After 4 Decades Mountaineering on Nanda Devi)
इस पूरी योजना में धार्मिक आस्था, पर्यावरणीय संरक्षण, स्थानीय सहभागिता व अर्थव्यवस्था के विकास को साथ लेकर चलने का प्रयास किया जा रहा है। सरकार इस क्षेत्र को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पर्वतारोहण मानचित्र पर पुनः स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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