उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता का एक वर्ष पूर्ण होने से पहले संशोधन अध्यादेश लागू, प्रक्रियात्मक और दंडात्मक ढांचे में आए बदलाव जानें

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नवीन समाचार, देहरादून, 26 जनवरी 2026 (UCC Amendment Ordinance)। उत्तराखंड (Uttarakhand) में लागू समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code–UCC) 27 जनवरी 2026 को एक वर्ष पूर्ण करने जा रही है। इससे ठीक पहले राज्य सरकार द्वारा लाए गए यूसीसी संशोधन अध्यादेश (UCC Amendment Ordinance) को राज्यपाल की स्वीकृति मिलने के साथ ही प्रदेश में लागू कर दिया गया है। यह संशोधन इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसके माध्यम से यूसीसी के क्रियान्वयन को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाने की दिशा में कई प्रक्रियात्मक, प्रशासनिक और दंडात्मक सुधार किए गए हैं।

(UCC Amendment Ordinance उत्तराखंड: UCC का संशोधित अध्यादेश लागू, लिव-इन केस में किया बदलाव, एक  क्लिक जानिए सब कुछयूसीसी लागू होने के एक वर्ष के अनुभव के आधार पर यह अध्यादेश लाया गया है, ताकि व्यवहारिक स्तर पर सामने आई कठिनाइयों को दूर किया जा सके और नागरिकों को अधिक सरल, सुरक्षित और समयबद्ध सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें। राज्य सरकार का दावा है कि यह पहल उत्तराखंड को सुशासन (Good Governance) के मॉडल के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक ठोस कदम है।

यूसीसी संशोधन अध्यादेश के प्रमुख प्रावधान

  • संशोधन अध्यादेश के तहत अब आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (Code of Criminal Procedure–CrPC) के स्थान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita–BNSS) तथा दंडात्मक प्रावधानों के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita–BNS) को लागू किया गया है। इससे कानून व्यवस्था को नए आपराधिक कानूनों के अनुरूप बनाया गया है।
  • धारा 12 के अंतर्गत अब ‘सचिव’ के स्थान पर ‘अपर सचिव’ को सक्षम प्राधिकारी नामित किया गया है। यदि उप-पंजीयक (Sub-Registrar) निर्धारित समय-सीमा में कार्यवाही नहीं करता है, तो प्रकरण स्वतः पंजीयक (Registrar) और पंजीयक जनरल (Registrar General) को अग्रेषित होगा। यह प्रावधान जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
  • इसके साथ ही उप-पंजीयक द्वारा लगाए गए दंड के विरुद्ध अपील का अधिकार दिया गया है और दंड की वसूली भू-राजस्व की भांति किए जाने का प्रावधान जोड़ा गया है।
  • विवाह के समय पहचान से संबंधित गलत प्रस्तुति को विवाह निरस्तीकरण का आधार बनाया गया है, जबकि विवाह और लिव-इन संबंधों (Live-in Relationship) में बल, दबाव, धोखाधड़ी या विधि-विरुद्ध कृत्यों के लिए कठोर दंडात्मक प्रावधान सुनिश्चित किए गए हैं।
  • लिव-इन संबंध की समाप्ति पर पंजीयक द्वारा समाप्ति प्रमाण पत्र जारी किए जाने तथा अनुसूची-2 में ‘विधवा’ के स्थान पर ‘जीवनसाथी’ शब्द के प्रयोग जैसे प्रावधान सामाजिक संवेदनशीलता की दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। विवाह, तलाक, लिव-इन संबंध और उत्तराधिकार से जुड़े पंजीकरण को निरस्त करने की शक्ति पंजीयक जनरल को प्रदान की गई है।

एक वर्ष में मिले पाँच लाख से अधिक आवेदन, निजता उल्लंघन की कोई शिकायत नहीं

राज्य सरकार के अनुसार यूसीसी लागू होने के बाद अब तक विवाह, विवाह विच्छेद, वसीयत, लिव-इन पंजीकरण और लिव-इन संबंध समाप्ति जैसी सेवाओं के लिए पाँच लाख से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि एक भी मामले में निजता उल्लंघन (Privacy Violation) की शिकायत सामने नहीं आई है।

यूसीसी पोर्टल (UCC Portal) के माध्यम से शत प्रतिशत आवेदन ऑनलाइन और फेसलेस प्रक्रिया के तहत हो रहे हैं। आवेदक को किसी सरकारी कार्यालय या अधिकारी के सामने उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। मजबूत डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था के कारण, एक बार आवेदन स्वीकृत होने के बाद संबंधित अधिकारी भी आवेदक की निजी जानकारी नहीं देख पाता। औसतन पाँच दिन में प्रमाण पत्र मिलने से नागरिकों का समय और संसाधन दोनों बच रहे हैं।

मुख्यमंत्री का बयान और आगे की दिशा

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (Pushkar Singh Dhami) ने कहा कि 27 जनवरी उत्तराखंड के लिए ऐतिहासिक दिन है। संविधान के अनुच्छेद 44 (Article 44) में जिस समान नागरिक संहिता की परिकल्पना की गई थी, उसे लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बना और इसका एक वर्ष सफलतापूर्वक पूर्ण हो रहा है।

सरकार का मानना है कि यूसीसी ने प्रारंभिक आशंकाओं को पीछे छोड़ते हुए नागरिकों की निजता, समानता और न्याय के सिद्धांतों को व्यवहार में स्थापित किया है। संशोधन अध्यादेश के बाद यह व्यवस्था और अधिक मजबूत होने की उम्मीद जताई जा रही है।

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