EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / 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बारे में कहा जाता है कि यहीं से महादेव शिव के शिव लिंग की पूजा शुरू हुई थी। जागेश्वर (Jageshwar) देश में मौजूद द्वादश ज्योतिर्लिंगों के साथ देश की 25 पुरातात्त्विक धरोहरों में भी शामिल है। जागेश्वर (Jageshwar) में वह इकलौता स्थान भी है जहां भगवान शिव के बाल स्वरूप की पूजा भी की जाती है। साथ ही यहाँ ऐसा मंदिर ‘वृद्ध जागेश्वर’ भी है जहां शिव की ‘वृद्ध’ स्वरूप में भी पूजा की जाती है।उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 12 अक्टूबर को अपने उत्तराखंड दौरे पर यहाँ आ चुके हैं। यहाँ से लौटने के बाद उन्होंने कहा था, यदि आप देवभूमि उत्तराखंड आयें तो जागेश्वर जरूर आयें। आइये विस्तार से जानते हैं जागेश्वर के बारे में… देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवत्व की बात कही जाती है। प्रदेश के अनेक धर्म स्थलों में एक भगवान शिव के प्रथम ज्योर्तिलिंग जागेश्वर (Jageshwar) के बारे में स्कंद पुराण के मानसखंड में कहा गया है-‘मा वैद्यनाथ मनुषा व्रजंतु, काशीपुरी शंकर बल्ल्भावां। मायानगयां मनुजा न यान्तु, जागीश्वराख्यं तू हरं व्रजन्तु।’ अर्थात मनुष्य वैद्यनाथ, शंकर प्रिय काशी और माया नगरी हरिद्वार, भी न जा सके तो जागेश्वर (Jageshwar) धाम में शिवदर्शन अवश्य करना चाहिए। मान्यता है कि देवाधिदेव महादेव शिव सुर, नर, मुनि आदि की सेवा से प्रसन्न होकर इस स्थान पर जाग्रत हुए और इसलिए ही इस स्थान का नाम जागेश्वर (Jageshwar) पड़ा। मानस खंड में इसके लिए ‘नागेशं दारुकावने…’ शब्द का प्रयोग भी किया गया है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि जागेश्वर (Jageshwar) अल्मोड़ा जनपद मुख्यालय से पिथौरागढ़ राजमार्ग पर 34 किमी की दूरी पर समुद्र तल से 1860 मीटर की ऊंचाई पर जटा गंगा तथा दो छोटी जलधाराओं नंदिनी व सुरभि के संगम पर स्थित महादेव का यह धाम ‘दारुका’ यानी देवदारु यानी विशाल देवदार के वृक्षों के घने मनोरम वन में स्थित हैं, तथा यह क्षेत्र आदि-अनादि काल से ही नागों का स्थान कहा जाता है। इसके आस-पास ही बेरीनाग, धौलीनाग, कालियानाग व गरूड़ जैसे नामों के स्थान इसकी पुष्टि करते हैं। इसलिए माना जाता है कि कभी इसे ‘नागेश्वर’ भी कहा जाता होगा। इसे देश-दुनिया के सबसे बड़े मंदिर समूहों में भी गिना जाता है।पुरातत्वविदों के अनुसार 7वीं से 14वीं सदी के बीच पूर्व कत्यूरी काल, उत्तर कत्यूरी काल व चंद कालों में नागर शैली में निर्मित मुख्य मंदिर परिसर में 125 प्राचीन मंदिर स्थापित हैं, जिनमें 108 मंदिर भगवान शिव के जागनाथ, महामृत्युंजय, नीलकंठेश्वर व केदारनाथ आदि स्वरूपों के तथा 17 मंदिर पुष्टि देवी (पार्वती), नवदुर्गा, कालिका, सूर्य, नवग्रह व कुबेर अन्य देवी-देवताओं के हैं। वृद्ध जागेश्वरमंदिरों के पास खंभों में 25 से ज्यादा पुरातात्विक महत्व के शिलालेख भी मौजूद हैं। परिसर के बाहर भी पूर्व में कोटेश्वर, पश्चिम में डंडेश्वर, उत्तर में वृद्ध जागेश्वर (Jageshwar) व दक्षिण में झांकर सैम मंदिर स्थापित हैं। ‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन 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हुई। आगे चंद वंशीय राजाओं ने मंदिर की व्यवस्थाओं के लिए 365 गांव जागेश्वर धाम को अर्पित किए थे, जिनसे ही मंदिर में लगने वाले भोग आदि की सामग्री आती है। कैसे पहुंचें जागेश्वर धाम (Kaise Pahunchen Jageshwar Dham) जागेश्वर धाम पहुंचने के लिए काठगोदाम (125 किलोमीटर) नजदीकी रेलवे स्टेशन एवं पंतनगर (150 किलोमीटर) नजदीकी हवाई अड्डा है। इनके अलावा बरेली व देहरादून तक हवाई जहाज से आकर भी वहां से बस या टैक्सी लेकर जागेश्वर तक जा सकते हैं। दिल्ली के आनंद विहार आईएसबीटी और देहरादून से हल्द्वानी व अल्मोड़ा के लिए सीधी-अच्छी निजी व सरकारी बस सेवा लगातार उपलब्ध होती हैं। अल्मोड़ा से लगभग 35 किलोमीटर दूर जागेश्वर धाम जाने के लिए सीधे टैक्सियां या नैनी-जागेश्वर जाने वाली बस ली जा सकती हैं, या पिथौरागढ़ की ओर जाने वाली बसों से जागेश्वर के करीब 5 किलोमीटर पहले आरतोला तक आया जा सकता है। आरतोला से स्थानीय जीपों से जागेश्वर पहुंचा जा सकता है। यहाँ क्लिक कर सीधे संबंधित को पढ़ें Toggleदेवदारु वृक्ष पर होते हैं शिव पार्वती व गणेश के दर्शनयहीं से शुरू हुई दुनिया में शिव लिंग की पूजा, शिवजी तथा सप्त ऋषियों ने यहां तपस्या की थीलकुलीश संप्रदाय का भी प्रमुख केंद्र है जागेश्वर (Jageshwar)विश्व धरोहर स्मारक बनने की ओर जागेश्वर (Jageshwar), देश की 25 पुरातात्त्विक धरोहरों में हुआ शामिल-केंद्र सरकार की आदर्श स्मारक योजना के तहत हुआ चिह्नित, योजना के तहत वाइ-फाई कनेक्टिविटी, सीसीटीवी सुरक्षा, इंटरप्रेटेशन सेंटर आदि की सुविधाएं मिलेंगीयह सुविधाएं मिलेंगीदेश के इन 25 स्थानों के साथ केंद्र की आदर्श स्मारक योजना में शामिल किया गया था जागेश्वर (Jageshwar)पृथ्वी पर सबसे पहले जागेश्वर (Jageshwar) में प्रकट हुई शिव पिण्डीयह भी पढ़ें : जागेश्वर (Jageshwar) मंदिर समूह बना कुमाऊं विवि का आधिकारिक प्रतीकजागेश्वर (Jageshwar) धाम के तीन किमी क्षेत्र में निर्माणों के लिए उपनियम बनाये सरकारLike this:Relatedदेवदारु वृक्ष पर होते हैं शिव पार्वती व गणेश के दर्शनदेवाधिदेव महादेव यहां आज भी 62.80 मीटर लंबे और 8.10 मीटर व्यास के दो विशाल तनों वाले विशाल व प्राचीन देवदार वृक्ष के रूप में माता पार्वती सहित युगल रूप में विराजते हैं। पेड़ पर शिव-पार्वती पुत्र प्रथम पूज्य गणेश के भी दर्शन होते हैं। जागेश्वर (Jageshwar) के मुख्य मंदिर में भगवान शिव की ‘बाल जागेश्वर’ (Jageshwar) के रूप की पूजा की जाता है। मंदिर में शिवलिंग दो भागों में है, जहां आधा बड़ा हिस्सा भगवान शिव का प्रतीक है, जबकि दूसरा छोटा हिस्सा देवी पार्वती का प्रतिनिधित्व करता है। शिव लिंग के पीछे चंद वंशीय राजा दीप चंद और पवन चंद की अष्ट धातु निर्मित मूर्ति की मूर्तियां हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके हाथों में ‘अखंड ज्योति’ आदि-अनादि काल से जल रही है, तथा निरंतर नीचे की ओर आ रहा है। जब वह बिल्कुल नीचे आ जाएगा, धरती में प्रलय आ जाएगी।मंदिर में सभी तरह की मनौतियां पूरी हो जाती हैं। खासकर संतान विहीन दंपत्तियों को रात्रि भर हाथों में दीपक लेकर तपस्या करने से मनवांछित संतान की प्राप्ति होती है। महामृत्युंजय मंदिर के शिव लिंग पर एक आंख जैसा निसान दिखाई देता है, जिसे भगवान शिव की तीसरी आंख कहा जाता है, और इस शिव लिंग को शिव के तीसरे नेत्र युक्त इकलौता शिवलिंग कहा जाता है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में महामृत्युंजय मंदिर में मांगी गई हर तरह की अच्छी-बुरी मन्नतें स्वीकार हो जाती थीं जिसका भारी दुरुपयोग हो रहा था। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य यहां आए और उन्होंने महामृत्युंजय मंदिर में स्थापित शिवलिंग को कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। इसके बाद यहाँ केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं। अपनी भारत यात्रा के दौरान चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी यहां की यात्रा की थी और मंदिर को करीब ढाई हजार साल पुराना बताया था। यह भी पढ़ें : 'टीम इंडिया' में उत्तराखंड मूल के एक और युवा खिलाड़ी ‘बेबी एबी’-आयुष बड़ोनी की एंट्री, मौका मिलने-खेलने और गंभीर के पूर्व बयान पर चर्चा तेजविशाल शिलाओं से बने अत्यधिक ऊंचे इस मंदिरों का निर्माण कौतूहल और आश्चर्यजनक लगता है। मंदिरों के शीर्ष पर कमल जैसे चक्र और कलश सुशोभित हैं। हर वर्ष श्रावण माह में यहां विशाल मेला लगता है।यहीं से शुरू हुई दुनिया में शिव लिंग की पूजा, शिवजी तथा सप्त ऋषियों ने यहां तपस्या की थीजागेश्वर (Jageshwar) को द्वादश यानी 12 ज्योर्तिलिंगों में से प्रथम ज्योर्तिलिंग भी कहा जाता है। कहते हैं कि भगवान शिव की लिंग पूजा की शुरूआत यहां मौजूद स्वयं निर्मित शिवलिंग से ही हुई थी। यहां का प्राचीन मृत्युंजय मंदिर धरती पर स्थित बारह ज्योतिर्लिंगों का उद्गम स्थल है। यहां के बाद ही देश-दुनियां में शिव के लिंग की पूजा की जाने लगी। शिव पुराण एवं लिंग पुराण की कथाओं के अनुसार शिवजी तथा वशिष्ठ आदि सप्त ऋषियों ने यहां तपस्या की थी। एक समय भगवान शिव जागेश्वर (Jageshwar) के निकट दंडेश्वर में तपस्या कर रहे थे। इस बीच सप्त ऋषियों की पत्नियां वहां पहुंचीं, और शिव के दिगंबर रूप पर मोहित हो गईं। सप्तऋषि अपनी पत्नियों की खोज में वहां पहुंचे।उन्होंने पहचाने बिना नाराज होकर शिव को लिंग पतन का श्राप दे दिया। इससे ब्रह्मांड में उथल पुथल मच गई। बाद में देवताओं ने किसी तरह शिव को मनाया और जागेश्वर (Jageshwar) में उनके लिंग की स्थापना की गई। मान्यता है कि तभी से शिवलिंग की पूजा शुरू हुई। शिव ने नेत्र खोले और कहा कि आप लोगों ने मुझे संदेहजनक परिस्थितियों में देखकर अज्ञान के कारण ऐसा किया है, इसलिए मैं इस शाप का विरोध नहीं करूंगा। किंतु इस गलत शाप के दंड स्वरूप सप्त ऋषि भी आकाश में तारों के साथ अनंत काल तक लटके रहेंगे, और इस स्थान पर मैं दंडेश्वर के रूप में रहूंगा।लकुलीश संप्रदाय का भी प्रमुख केंद्र है जागेश्वर (Jageshwar) जागेश्वर (Jageshwar) लकुलीश संप्रदाय का भी प्रमुख केंद्र बताया जाता है। वर्ष 1960 में यहां से नवीं सदी की बनी लकुलीश की मूर्ति चोरी हो गई थी, जिसे तीन दशक बाद अमेरिका के न्यूयॉर्क के मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट में देखा गया और यहां से भारत सरकार इसे वापस लाने में सफल रही। जिसे पहले केंद्रीय पुरातात्त्विक संग्रहालय दिल्ली में रखने के विश्व पुरातत्व सप्ताह (19 से 25 नवंबर) के दौरान वर्ष 2010 में 50 साल बाद वापस अपने मूल स्थान ले आया गया है। आज के अन्य एवं अधिक पढ़े जा रहे ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। यदि आपको लगता है कि ‘नवीन समाचार’ अच्छा कार्य कर रहा है तो यहां क्लिक कर हमें सहयोग करें..यहां क्लिक कर हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें। यहां क्लिक कर हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से, यहां क्लिक कर हमारे टेलीग्राम पेज से और यहां क्लिक कर हमारे फेसबुक ग्रुप में जुड़ें। हमारे माध्यम से अमेजॉन पर सर्वाधिक छूटों के साथ खरीददारी करने के लिए यहां क्लिक करें।विश्व धरोहर स्मारक बनने की ओर जागेश्वर (Jageshwar), देश की 25 पुरातात्त्विक धरोहरों में हुआ शामिल-केंद्र सरकार की आदर्श स्मारक योजना के तहत हुआ चिह्नित, योजना के तहत वाइ-फाई कनेक्टिविटी, सीसीटीवी सुरक्षा, इंटरप्रेटेशन सेंटर आदि की सुविधाएं मिलेंगीदेवभूमि उत्तराखंड के जागेश्वर (Jageshwar) मंदिर समूह ने विश्व धरोहर स्थलों में शामिल होने की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। इसके लिए एएसआई जागेश्वर (Jageshwar) मंदिर समूह को विश्व धरोहर स्थलों की संभावित सूची में शामिल करने के लिए आवेदन करने जा रही है, जिसके बाद यूनेस्को की विशेषज्ञ टीम इस बारे में निर्णय लेगी। वहीं केंद्र सरकार ने इसे अपनी आदर्श स्मारक योजना में शामिल करने का फैसला कर लिया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की इस योजना के लिए देश भर में संरक्षित 3680 राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों व पुरातात्त्विक धरोहरों में से 25 को चिह्नित किया है, जिनमें जागेश्वर (Jageshwar) मंदिर समूह भी शामिल है। योजना के तहत इन पुरातात्त्विक धरोहर स्थलों में विश्व स्तरीय सुविधाएं मुहैया कराकर उनका विश्व मानकों के हिसाब से विकास किया जाएगा।यह सुविधाएं मिलेंगीकेंद्र सरकार की आदर्श स्मारक योजना के तहत जागेश्वर (Jageshwar) सहित सभी 25 पुरातात्त्विक धरोहरों को वाई-फाई कनेक्टिविटी, सुरक्षा, साइन बोर्ड, अतिक्रमण मुक्त क्षेत्र व इंटरप्रेटेशन सेंटर आदि की सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। इंटरप्रेटेशन सेंटरों में लघु फिल्मों के जरिये पर्यटकों को इन धरोहरों के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के बारे में बताया जाएगा। यही नहीं ‘स्वच्छ स्मारक स्वच्छ भारत’ के साइन बोर्ड भी लगाए जाएंगे, जिनमें इन स्थलों की जानकारी दी जाएगी। इतना ही नहीं इस योजना के तहत हर स्मारक में विकलांगों के लिए व्हील चेयर ले जाने को रैंप बनेंगे और सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे और पेयजल सुविधा भी मुहैया कराई जाएगी।देश के इन 25 स्थानों के साथ केंद्र की आदर्श स्मारक योजना में शामिल किया गया था जागेश्वर (Jageshwar) उत्तराखंड का जागेश्वर (Jageshwar) मंदिर समूह, दिल्ली में हुमायूं का मकबरा, लाल किला व कुतुबमीनार, उत्तर प्रदेश में आगरा का ताजमहल, फतेहपुर सीकरी, श्रावस्ती व सारनाथ, जम्मू- कश्मीर में लेह पैलेस, मार्तंड सूर्य मंदिर, पश्चिमी बंगाल में मुर्शिदाबाद का हजार द्वारी महल, महाराष्ट्र में दौलताबाद का किला व एलिफैंटा गुफाएं, केरल में महाबलिपुरम का मंदिर व सेंट एंजेलो फोर्ट, राजस्थान में कुंभलगढ़ का किला, गुजरात में रानी की वाव, कर्नाटक में हंपी नगर के अवशेष, बिहार में वैशाली-कोल्हुआ, मध्य प्रदेश में खजुराहो व मांडू, तमिलनाडु में तंजाउर का बृहदेश्वर मंदिर, हिमाचल का मसरूर रॉक कट टेंपल, उड़ीसा का कोणार्क का सूर्य मंदिर और असम के सिबसागर जिले में स्थित रंग घर।पृथ्वी पर सबसे पहले जागेश्वर (Jageshwar) में प्रकट हुई शिव पिण्डीपौराणिक मान्यताओं के अनुसार दारूकानन के इसी पावन क्षेत्र के आसपास वशिष्ठ आदि महर्षिजनों ने भी अपनी-अपनी पत्नियों व शिष्यगणों के साथ इस स्थान पर साधना की। कहा जाता है कि ऋषि पत्नियां एक बार दैनिक सामग्री की खोज में उस पवित्र वन में गईं जहां भगवान शिव आसन जमाये बैठे थे। एकाग्रचित ध्यान में सम्पूर्ण शरीर पर भस्म रमाये हुए सर्पों की माला से सुशोभित व्याघ्र चर्म को ओढे शिव का यह रूप हजारों विश्वमोहन रूप से भी ज्यादा आकर्षक था, जिनके चरणों का ध्यान योगीजन किया करते हैं वे स्वयं अपने ध्यान में स्थित थे। वे मुनि पत्नियां शिवजी की इस स्थिति को देखकर उन पर मोहित हो गईं और ईधन-कुशा ले जाना भूल गई। ऊधर रात व्यतीत होने पर भी जब प्रातःकाल तक ऋषि पत्नियां वापस नहीं लौटी तो तब चिंतित ऋणिगण अपनी पत्नियों की खोज में निकल पडे। ढूंढते-ढूंढते वे दारूकानन क्षेत्र में पहुंचे। वहीं शिव को ध्यान मग्न व अपनी पत्नियों को वेसुध पडा देखकर शंकाग्रस्त ऋषियों ने शिव को श्राप दे डाला तथा कहा आपने हमारी पत्नियों को मोहित किया है। इसलिए हम आपको श्राप देते हैं कि आपके लिंग का भूमि पर पतन हो। इस पर भगवान शिव का ध्यान भंग हुआ। उन्होंने श्राप देने वाले ऋषियों को देखा। संसार के कल्याणकर्ता शिव ने निरपराध उस श्राप को सुन ऋषियों से कहा, वैरभाव से भी मेरा दर्शन कर पुत्र-मित्र द्रोहीजन भी मुक्ति लाभ को प्राप्त होते हैं। आप भी मन्वन्तर बदलने पर वैवस्वत मनु के समय अपनी पत्नियों सहित आकाश में उत्तर की ओर तारे बनकर अनन्त काल तक चमकते रहोगे। इस प्रकार शिवजी ने ऋषियों को अनन्त कीर्ति प्रदान कर वहीं पर स्वयं अपना लिंग पतन किया। शिव कृपा से आज भी सप्तऋषि मण्डल उत्तर दिशा में दिखायी पडता है। पुण्यस्वरूप शिवलिंग के पृथ्वी पर पतन होने की बात सुनकर समस्त देवताओं ने इस क्षेत्र को अपना वास स्थान चुना। दारूकानन क्षेत्र में लिंग के पृथ्वी पर गिरते ही पृथ्वी धन्य हो उठी, किन्तु इसके भार को धारण करने में असमर्थता व्यक्त करते हुए पृथ्वी ने भगवान विष्णु की आराधना की।भगवान विष्णु ने धरा की व्यथा को जान भगवान शिव से लिंग के विभाजन की प्रार्थना की ताकि लिंग के भार से दबती पृथ्वी का उद्धार हो। प्रसन्न शिव ने भगवान विष्णु को चक्र से लिंग छिन्न करने की आज्ञा दी। शंकर की आज्ञा पाकर लोकपावन विष्णु भगवान ने शिव के द्वारा समाहृत लिंग को अपने चक्र से काट दिया तथा उन्हें पृथ्वी पर नौ खण्डों में स्थापित किया। जहां-जहां भगवान विष्णु ने उन लिंगों को स्थापित किया वे परम कल्याणकारी तीर्थ बने। प्रथम भाग मानस के नाम से प्रसिद्व हुआ। मानसरोवर नामक तीर्थ भक्तों के कल्याणार्थ परम पूज्यनीय है। दूसरा भाग कैलाश खण्ड के नाम से प्रसिद्व हुआ, जो दुर्लभ मुक्ति को प्रदान करने वाला कहा गया है और तीसरा भाग केदार नामक विस्तृत खण्ड है, जिसकी महिमा अनादि है। इसके बाद पाताल खण्ड है, जो नाग कन्याओं के नामों से सुशोभित है। तदन्तर काशीखण्ड है, जहां विश्वेश्वर लिंग के रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। आगे रेवाखण्ड है, जो नर्मदा की विभिन्न धाराओं, सुन्दरता का रूप लेकर नर्मदेश्वर के नाम से पूजित है। फिर रामेश्वरम शोणितपुर का महात्म्य वर्णित है। इसके बाद ब्रह्मोत्तर खण्ड है, जहां कोकर्णेश की पावन कथायें हैं। आगे नागखण्ड का वर्णन आता है। उज्जयिनी नगरी के महात्म्य के साथ इनकी उपासना कर भक्तजन शिवलोक प्राप्त करते हैं। शिवजी की पावन स्थली दारूकानन क्षेत्र में शिव साक्षात् रूप में प्रतिष्ठित हुए। भगवान शिव के जागेश्वर क्षेत्र में तपस्या करने का क्या रहस्य था? लीलाधर ने यह लीला क्यों रची? इसका भी विस्तृत वर्णन पुराणों में मिलता है, जिसका संक्षिप्त सार इस प्रकार है-कहा जाता है कि मधु व कैटभ महा दैत्यों को मारने के बाद उनके शरीर से जल के समान ;द्रवीभूत चर्बी जल में ही जम गयी। उन दोनों की चर्बी से पर्वतों सहित वसुधा की कल्पना कर शिव की प्रेरणा से विष्णु ने पृथ्वी की रचना की। फिर कच्छ अवतार धारण कर अपनी पीठ पर पृथ्वी को स्थापित किया तथा ब्रह्मा को आज्ञा दी कि वे सृष्टि में प्राणियों का उत्पादन करें। इस प्रकार सृष्टि चक्र चलने पर अत्रि गोत्र में उत्पन्न अंग नाम के प्रजापति हुए। उनके वंश में पृथु नाम का एक राजा हुआ, राज सिंहासन संभालने पर राजा पृथु की शरण में उनकी प्रजा जन गई तथा कहा कि आप हमारा पालन करें। यह भी पढ़ें : खुशखबरी ! अब घर बैठे मिलेगी सत्यापित खतौनी, छह राजस्व पोर्टल शुरूअपनी प्रजा के इस विनय पर राजा पृथु ने लोगों के हित में गो-रूप धारिणी समग्र पृथ्वी का दोहन किया। इस कार्य से पृथ्वी दुःखी व व्यथित हो गई। वेणु के पुत्र प्रतापशाली राजा पृथु ने अपने धनुष की नोक से सम्पूर्ण पृथ्वी को उठाया। (Jageshwar) वसुधा पृथ्वीतल को सब ओर से खोदा हुआ देखकर दुःखी पृथ्वी ने राजा पृथु से प्रार्थना की, मैं आपकी पुत्री का स्थान ग्रहण करती हूं, मेरा उद्वार करें। पृथ्वी की गहन वेदना पर तरस खाकर राजा पृथु ने अपनी प्रजा को आज्ञा देकर ग्राम व नगरों का निर्माण करवाया ताकि पृथ्वी की सुन्दरता कुरूप न हो। (Jageshwar) पुनः राजा पृथु के राज्य में अन्न आदि पदार्थों को लेकर हाहाकार मच गया, तब वेणु के प्रतापी राजा पृथु ने सब लोगों की भरण पोषण की चिंता दूर करते हुए अपने वाणों से ही अपने हाथों पृथ्वी का दोहन किया और पृथ्वी अन्नदात्री व कर्मभूमि के रूप में प्रसिद्व हुई सृष्टि के विस्तार के साथ पृथ्वी की दशा परवश हो गयी और भय से ग्रस्त पृथ्वी गोरूप धारण करके जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु की शरण में गई तथा अपनी व्यथा उन्हें सुनाई। (Jageshwar) तब भगवान विष्णु ने पृथ्वी की स्तुति पर प्रसन्न हो, कहा कि जब-जब तुम भयग्रस्त होगी, मैं मनुष्य रूप में अवतार लेकर तुम्हारा उद्वार करूंगा। पृथु ने लोक कल्याण के लिए तुम्हारा दोहन किया है इसलिए तुम दुःखी मत हो। रहा सवाल तुम्हारे भयभीत होने का, तुम निर्भय होकर अपने कर्तव्य का पालन करो तथा स्मरण रखो कि देवताओं की वर्ष गणना के हिसाब से हजारों वर्ष के बाद सतयुग के आरंभ में साक्षात शिव पृथ्वी पर आयेंगे। (Jageshwar) दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के वियोग से खिन्न होकर महादेव तपस्या करने भूमण्डल के दारूकानन क्षेत्र में साक्षात रूप में रहेंगे। वहीं पर ऋषियों से श्रापित होकर भगवान शंकर के पुनीत लिंग का पतन होगा। शिवलिंग के पृथ्वी पर गिरते ही तुम निश्चल, निर्मल, पावन गति को प्राप्त होगी, पृथ्वी के साथ-साथ समस्त पृथ्वीवासियों का भगवान शिव की कृपा से कल्याण होगा। (Jageshwar) दारुकानन सहित हिमालय का पावन क्षेत्र शिव कृपा से धन्य होगा, बाद में गंगा के पृथ्वी में अवतरण से तुम और निहाल हो उठोगी, इस प्रकार भगवान विष्णु ने विस्तार से भांति-भांति अवतारों की महिमा बताकर पृथ्वी को कृतार्थ किया। अपने परम भक्त भगवान विष्णु के वचन को सत्य सिद्व करने के लिए भगवान शिव ने विराट लीला की रचना की व जागेश्वर में लिंग का पतन कर पृथ्वी व पृथ्वीवासियों का उद्वार किया।(Jageshwar) दारुकानन के इस पर्वत पर ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि तीनों देवताओं के साथ सिद्वों, विद्याधर गणों, मरीचि, अत्रि आदि महर्षियों, महेन्द्रादि देवों, वाणादि दैत्यों तथा वासुकि आदि नागों एवं यक्षों से सेवित भगवान शंकर देवों और गन्धर्वों से पूजित है। इस स्थान पर क्षण भर आराधना करने पर महापातकी मनुष्य भी परम गति को प्राप्त कर लेता है। (Jageshwar) भगवान श्री रामचन्द्र जी के पुत्र कुश ने जब गुरू वशिष्ठ से यह पूछा कि मुनिश्रेष्ठ पातकों के विनाश के लिए आपके मत में पृथ्वी पर कौन सा क्षेत्र है तथा किस देवता की आराधना से मनुष्य को उत्तम मुक्ति मिलती है। सत्य मार्ग के अन्वेष्टा पुण्यात्माओं के लिए दुष्प्राप्य क्या है? कौन सा ऐसा उपाय है जिससे यमलोक गये हुए लोग कालपाश से रहित हों। (Jageshwar) तब गुरु वशिष्ठ जी ने श्री राम पुत्र कुश जिज्ञासा को देखकर उन्हें ऐसे दिव्य तीर्थ स्थल का वर्णन करते हुए बताया कि ऐसे क्षेत्र व ऐसे तीर्थ की जिज्ञासा एक बार ऋषि-मुनियों के हृदय में भी जागृत हुई तथा उन्होंने भगवान विष्णु से बैकुण्ठ भवन जाकर उनकी स्तुति करते हुए यह विनती की कि प्रभु आप ही अज्ञानीजनों के लिए परम गति है। (Jageshwar) हे प्रभु! कृपा करके ऐसा सुगम उपाय बतलाइये जिससे महापापी भी पाप मुक्त हो सकें। दान यज्ञ तपयज्ञ के बिना भी किस पुण्य स्थल या किस पुण्य क्षेत्र में जाकर पापों का नाश हो सकता है? हे! देवेश! हे कमलनयन! हे महाविष्णो! भूतल पर ऐसे मुक्ति प्रद तीर्थस्थान का रहस्य बतला पाने में आप ही सक्षम हैं। प्रभु हमारा मार्गदर्शन कीजिए।(Jageshwar) ऋषि जनों की विनम्र सुन्दर वाणी व उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने हिमालय क्षेत्र में स्थित दारूकानन की दिव्य अलौकिक महिमा से उन्हें विदित कराते हुए अपनी योगमाया से इस स्थान के दर्शन कराये तथा भगवान शिव की जटाओं से निकली हुई जटागंगा के समीपस्थ ही पापनाशक परम ज्योतिर्लिंग का भी दर्शन कराया। (Jageshwar) रुद्र कन्याओं से सेवित एवं तीनों लोकों को पावन करने वाला यागीश्वर क्षेत्र व इसके दर्शन से कृतार्थ हुए ऋषि जनों ने भगवान विष्णु से पुनः प्रार्थना करते हुए कहा कि हे प्रभु! आप भक्तों के सिद्विदायक हैं अब आप कृपा करके भक्तों को सिद्वि प्रदान करने वाले तथा सभी पापों का नाश करने वाले यागीश्वर तीर्थ का विस्तृत वर्णन कर हमें धन्य करें।(Jageshwar) ऋषियों की वन्दना से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु बोले, हिमालय के सुरम्य तट पर से सरयू का उद्गम हुआ है। उसके दक्षिण भाग में हिमालय की भांति ही शोभायमान दारूकानन है। इस क्षेत्र में सिद्व, गंधर्व, मनुज, देवर्षि तथा महर्षिजनों का भी वास है। (Jageshwar) उसके दर्शन करने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है। स्पर्श से यह फल दस गुना व स्तुति करने से सौ गुना और जिसने स्वयं को शिव के लिए अर्पित कर दिया है उसका तो फिर कहना ही क्या। (Jageshwar) भगवान शिव की जटाओं से निकली दारू पर्वत व टंकर्ण पर्वत के बीच की यह जटागंगा स्नान मात्र से समस्त पापों को हर लेती है और यहीं मेरे चरणों से निकली ’अलकनंदा‘ नदी भी है। इन दोनों नदियों के संगम में ही यागीश्वर भगवान विद्यमान हैं और यही स्थान मुक्तिपथ का परम मार्ग है। (Jageshwar) यह क्षेत्र अनेक सरोवरों तथा सहस्त्रों शिवलिंगों से घिरा हुआ है। नागेश के रूप में विराजमान शिव समस्त शिवलिंगों के कारण स्वरूप हैं। उनकी महिमा इतनी अलौकिक है कि लोगों के नरकवास की अवधि उनके दर्शन न करने तक ही हैं।(Jageshwar) जागेश्वर में भगवान शिव की अलौकिक लीलाओं का अनन्त वर्णन है। इस स्थान के सम्बन्ध में अनेक कथायें प्रसिद्व हैं, जिसमें से एक कथा इस प्रकार आती है। यह कथा भी भगवान विष्णु के मुखारबिन्दु से प्रकट हुई है। कहा जाता है कि सुमन्तु गोत्र में ’सुवट‘ नाम का एक ब्राह्मण था। वृद्वावस्था में उसे एक पुत्र प्राप्त हुआ, उसका नाम ’सुजामलि‘ था। (Jageshwar) पिता से अनुशासित होते हुए भी वह वेदान्तिक बनकर अनैतिक कार्य करने लगा। जुआ खेलना, वेश्याओं के संग रमण करना उसका प्रमुख कार्य बन गया। जब इस बात का पता प्रमाण सहित उसकी माता को चला तो उसने अपने पुत्र को समझाने की लाख चेष्टायें की किन्तु वह नहीं माना और क्रोधावेग में आकर कुल्हाडी से अपनी माता को मार डाला और अपनी अनैतिक पाप यात्रा जारी रखते हुए वह मिथिला आ पहुंचा और राजपुत्रों के साथ ध्रूतक्रीडा की और उनसे जुए में सब कुछ हार गया। (Jageshwar) तब उस दुराचारी ने चोरी के रूप में अपनी पाप यात्रा जारी रखी। एक दिन चोरी करते हुए नागरिकों ने उसे जंजीरों से जकड लिया तब उसे अपनी माता का स्मरण आया व स्वयं रोते हुए और अपने जीवन में किए गये तमाम पाप कर्मों की निन्दा करने लगा। लोगों को अपने जीवन की पाप यात्रा का वृतान्त कह सुनाया। समय की गति के साथ वह बन्धन मुक्त हुआ और भगवान की पूजा अर्चना करने लगा। (Jageshwar) लेकिन लोभ से मोहित महापापी माता-पिता का घातक तथा गुरू द्रोही तथा हजारों दुष्कर्म का भागी उस ब्राह्मण की पाप निवृत्ति हो तो कैसे हो। इसी सोच में वह दिन रात डूबा रहता था। एक तपस्वी की संगत मिलने पर उसने अपने हृदय की समस्त पाप व्यथा उनसे कह सुनायी। (Jageshwar) तब तपस्वी ने कहा हे विप्र! माता के वध के समान महापाप का विनाश सौ युगों में भी यद्यपि संभव नहीं है लेकिन मैं तुम्हारे करोडों जन्मों में भी भोग्य इस महापातक को दूर करने का ध्रुव उपाय बतला रहा हूं। (Jageshwar) तुम सुनो हिमालय के तट पर पुण्य दारू कानन है। दारूकानन व उसके तीर्थ की महिमा अपरम्पार है। वहां पर गो, विप्र, गुरू एवं बालधन तथा मातृ, पित्र, द्रोही जन यदि सच्चे मन से शिव की सरणागत हो जाता है तो समस्त संतापों से मुक्ति पा लेता है।(Jageshwar) जागेश्वर की महिमा का वर्णन कर पाने में इस भू-धरा में कोई भी समर्थ नहीं है। शिवलिंगों की उत्पति होने का यही स्थान है। इस मुक्ति स्थान की एक अन्य कथा तपस्वी ने उस दुराचारी ब्राह्मण को बताते हुए कही, शिवलिंगों की उत्पति होने का यही स्थान है। इसस्थान के मुक्तिक्षेत्र होने की महिमा सुनो- काफी समय पहले ’रिचक‘ नामक एक गंधर्व था और उसका वाणक नाम का परम धार्मिक पुत्र था। (Jageshwar) वह देखने में सुन्दर, दीर्घायु एवं रूप यौवन सम्पन्न था। शिल्पी तथा संगीतज्ञ भी था। साथ ही वह नृत्यकला-निपुण तथा इन्दि्रय विजेता परमवीर भी था। लेकिन माया के प्रभाव के प्रबल रूप से वह बच न सका। उसका सारा ज्ञान ध्यान कपूर बनकर उड गया और वह ऋषियों के बीच बैठकर गंधर्व कन्याओं के साथ रमण करने की इच्छा करने लगा। अतः परम धार्मिक ऋषिगण उसके इस आचारण से कुपित हो गये। (Jageshwar) कुपित ऋषिगणों ने उसे श्राप देते हुए कहा, तुम हमारे मध्य रहकर भी कुलाधम हो गये। अपने दुष्कर्म की भावना के चलते तुम भयंकर राक्षस योनि को प्राप्त करो। इस प्रकार ऋषियों के द्वारा श्राप दिये जाने पर वह अपने पूर्व शरीर को छोड राक्षस योनि को प्राप्त हो गया तथा महाविकराल रूप धारण करते हुए वह मनुष्यों को अपना ग्रास बनाते रहा। उस दुर्बद्वि ने अपनी रूपवती बहन के साथ विवाह कर लम्बे समय तक दुष्कर्म किया। (Jageshwar) एक बार राक्षसों के दलों के साथ घूमते-घूमते वे संयोगवश दारूकानन में पहुंच गया। वहां उन्होंने परम आभामय ’यागीश्वर‘ देव को देखा, साथ ही अपने पूर्व जन्म के सत्कर्म के प्रभाव से उसने देखा कि देवदेवेश, देव, गन्धर्व सहित अनेकों यागीश्वर की सेवा में लगे हुए हैं। भगवान शिव के समीप पहुंचते ही उस अधम राक्षस ने उन्हें प्रणाम किया। प्रणाम करने मात्र से ही उसका राक्षस शरीर छूट गया। यह भी पढ़ें : छुट्टी नहीं मिली तो कर्मचारियों ने यमकेश्वर के माला गांव में एआई से दिखा दिया बब्बर शेर, वन विभाग की जांच में खुली पोल....(Jageshwar) ’नागेश‘ के दर्शन के प्रभाव से पुनः उसने अपने पूर्व शरीर को प्राप्त कर लिया और उसे अपने परिजनों का स्मरण हो आया। बाद में उसने यहीं पर तपस्या करते हुए शिव लोक को प्राप्त किया। इस प्रकार उस ब्राह्मण को भगवान शिव की इस महिमा स्थल का वर्णन करते हुए उस तपस्वी ने कहा जो भी प्राणी विधिपूर्वक दारूकानन में निष्ठा भाव से शिवजी की पूजा अर्चना करता है, वह साक्षात शिवलोक को प्राप्त होता है। (Jageshwar) दारुकानन क्षेत्र में व्याप्त शिवलिंगों में कुछ तो मानव हितार्थ प्रकाशमान है तथा सैकडों लिंग शिला के भीतर समाये हुए हैं। उन सबको प्रणाम कर जो मनुष्य विधिपूर्वक सदाशिव शम्भु को याद करता है उसके लिए फिर कुछ भी दुर्लभ नहीं है।यहां स्थित शिवलिंगों में महामृत्युंजय का शिवलिंग भी साक्षात वरदायी है। महामृत्युंजय की आराधना से मनुष्य काल पर भी विजय प्राप्त कर सकता है। भगवान शिव का महामृत्युंजय के रूप में स्मरण करने से मार्कण्डेय ऋषि, नन्दी सहित असंख्य भक्तों ने अखण्ड धाम को प्राप्त किया है। महामृत्युंजय के पूजन के साथ-साथ उनके वाम भाग में स्थित विश्वेश्वरनाथ जी का पूजन भी अखण्ड सौभाग्य को प्रदान करने वाला कहा जाता है। (Jageshwar) फिर यहां समीप स्थित गोकर्णेश, विन्ध्येश्वर, वाणीश्वर की पूजा-अर्चना भी महाकल्याणकारक कही गयी है। इस धाम में महाकाल व महाकाली की पूजा भी जन्म-जन्मान्तरों के पापों का नाश करने वाली है। तुष्टि माता व पुष्टि माता जगत के कल्याण के लिए यहीं प्रतिष्ठित है। ’नागेश‘ के साथ में क्रमशः सोमेश्वर, सूर्येश, कमलाकांत एवं ब्रह्मा जी स्थित हैं। सच्चे मन से जो भी प्राणी इनका पूजन करता है वह जीवन का आनन्द लेते हुए मुक्ति को प्राप्त होता है। (Jageshwar) पश्चिम भाग में गणेश्वर, नन्दीश्वर एवं नन्दा भगवती का पूजन कर प्राणी शिवलोक प्राप्त करता है। फिर चण्डीश्वर, शीतला देवी, वरुणेश तथा महेन्द्रेश का पूजन कर वहां से पूर्व भाग में जाकर बालीश की पूजा-अर्चना का महत्व नागेश की कृपा से परम फलदायी है तथा शिवलोक को प्राप्त कराने वाला है। यहीं स्थित शंकर प्रिय चण्डिका का पूजन सभी लौकिक व अलौकिक फलों को प्रदान करता है। (Jageshwar) तदन्तर दारुकानन में ब्रह्मतीर्थ के ऊपर प्रकट सभी पापों के विनाशक पंचकेदारों का पूजन परम प्रतिष्ठा के लिए फलदायी कहा गया है। इस पावन तीर्थ दारूकानन में यागीश्वर, चक्रेश्वर, दिव्य देहधारी पवन पुत्र हनुमान, ढुण्डीश्वर, वैद्यनाथ कपर्दि गंगा, महेश्वर का पूजन लोकचक्र के भ्रमण से मुक्त करने वाला है। इस यागीश्वर तीर्थ में गौरी, पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा आदि सभी मातायें व देवमाताएं भगवान शिव की भक्ति में यहां विद्यमान रहती हैं। (Jageshwar) इनके साथ ही यहां तुष्टि, पुष्टि, धृति, स्वमाता और कुलदेवी भी विद्यमान है। इसके अतिरिक्त महेन्द्र आदि देव विद्याधर, गन्धर्व, पुष्पदन्त तथा अप्सराओं के समुदाय भी यहां पर स्थित हैं। सिद्व, पिशाच, नाग, महोरग, अष्टवासु, द्वादशार्क तथा मरूदगण भी इसी क्षेत्र में रहते हैं। (Jageshwar) देवर्षि, ब्रह्मर्षि, दैत्य, दानव तथा महाबलशालिनी डाकिनियों ने भी शिव भक्ति के लिए दिव्य रूप में प्रतिष्ठित होकर इसी स्थान को अपना वास बनाया है। यागीश्वर के साथ-साथ ये सभी वृद्व यागीश्वर ;वृद्व जागेश्वर का भी पूजन करते हुए अखण्ड रूप से आनंदित रहते हैं।(Jageshwar) दारुकानन में जागेश्वर नाथ जी के दर्शनों के पश्चात यहीं स्थित परमेश्वरी तथा दक्षिण भाग में क्षेत्रपाल जी की पूजा का भी विधान है। इस प्रकार इस क्षेत्र की यात्रा करने से मानव असंख्य कुलों का उद्वार कर शिवमण्डल को प्राप्त होता है। (Jageshwar) यहां के तीर्थमण्डलों के दर्शन के पश्चात प्राणी को माता के गर्भवास का दुःख नहीं भोगना पडता है। इस क्षेत्र में कायक्लेश के बिना देवादि दुर्लभ शिव भक्ति प्राप्त होती है तथा दर्शन मात्र से शाश्वत मुक्ति मिल जाती है।(Jageshwar) इस प्रकार तीर्थ का महात्म्य बतलाकर तपस्वी ने व्याकुल ब्राह्मण से कहा इससे बढकर कोई दूसरा तीर्थ नहीं है जो परम फलदायी हो। यहां के असंख्य तीर्थों में कपर्दितीर्थ, बाहुसरतीर्थ, वाण तीर्थ, जामदग्नतीर्थ, वेणु तीर्थ, मौर्वतीर्थ, काश्यपतीर्थ, कौन्चयतीर्थ, बाराहतीर्थ, कमलनाभ तीर्थ के अलावा कपाली, कालाप, प्राणद, लोमहन्ता, कालप्रणाशन, हरीतक, रूपप्रद, सूर्य, शशि, शूलगंगा, ब्रह्मतीर्थ है इसमें स्नान तथा पिण्डदान करने से मानव अपने एक सौ एक कुलों का उद्वार करता है। (Jageshwar) इस क्षेत्र में दृश्य व अदृश्य रूप में अनेक तीर्थ स्थल मौजूद हैं। जटागंगा के संगम में गौरीशंकर का पूजन जन्म-जन्मांतर के पापों को नाश करने वाला है। इस क्षेत्र में तीन रात्रि तक शिव की पूजा करने वाले ब्राह्मण व भक्त को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। दारू वन के मध्य में एक पुण्यशील कल्पवृक्ष है इसे जो अच्छी तरह देखते हैं उनके लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। (Jageshwar) यहां की पूजा विधि के सम्बन्ध में कहा गया है सर्वप्रथम ब्रह्मतीर्थ में स्नान कर नागेश के ज्योतिर्लिंग की पूजा करनी चाहिए तदन्तर शंकरप्रिया पार्वती की अर्चना के पश्चात परिक्रमा करते हुए यागीश्वर के समीप पहुंचकर उन्हें प्रणाम कर उनकी स्तुति करनी चाहिए। यहीं पंच रत्नों से युक्त कलश की स्थापना की जाए। गणेश और कार्तिकेय की स्थापना करने के पश्चात पूजन आरंभ करना चाहिए।(Jageshwar) ऋषि की वाणी को सुनकर वह ब्राह्मण विधिपूर्वक यागीश्वर का पूजन एवं बार-बार प्रणाम करने के पश्चात उत्तर मार्ग से दारूकानन की ओर चला गया। यहां पहुंचकर दिव्य ज्योतिर्लिंग को देख बडा पुलकित हुआ और विधि विधान के अनुसार पूजा-अर्चना कर पूर्वकृत पापों से मुक्ति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की, हे देवेश! मैनें अपनी माता का वध किया है तथा वेश्या गमनादि अनेक दुष्कर्म भी किये हैं। मुझ पापाी को आप मुक्ति प्रदान करें। मैं आपकी शरण में हूं। उस याचक की प्रार्थना सुनकर भगवान शंकर ने उसे दुष्प्राप्य मुक्ति दे दी। गौ, ब्राह्मण, गुरू एवं बालकों की हत्या करने वालों को जहां मुक्ति प्राप्त हो जाती है उस क्षेत्र में पापी ब्राह्मण भी मुक्ति को प्राप्त कर गया। कहते हैं कि जो मनुष्य इस कथा का श्रवण करेगा या लोगों को सुनायेगा वह पापरहित हो अचल कीर्ति का भागी बनकर शिवलोक को प्राप्त करेगा।(Jageshwar) महर्षि वशिष्ठ के मुखारबिन्दु से भगवान शिव की अलौकिक महिमा का बखान सुनकर श्री राम पुत्र कुश कृतार्थ हो उठे। पवित्र पहाडों की गोद में स्थित दारूकानन के मध्य जो नदियां बहती हैं वे सब सरयू में मिल जाती हैं और पावन सरयू कल-कल धुन में बहते हुए नव जीवन प्रदान करती है, ’जागेश्वर महिमा‘ को पावनता व निर्मलता प्रदान करने में मां सरयू की पावन नदी का पुण्य भी सनातन काल से पूज्यनीय रहा है। प्रस्तुति- राजेन्द्र पन्त ‘रमाकान्त’ यह भी पढ़ें : जागेश्वर (Jageshwar) मंदिर समूह बना कुमाऊं विवि का आधिकारिक प्रतीकनैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय ने सातवीं से 14वीं शताब्दी में बने देश के 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक, 125 मंदिरों के जागेश्वर (Jageshwar) मंदिर समूह को अपना आधिकारिक प्रतीक चुन लिया है। विवि के कुलपति प्रो. डीके नौड़ियाल ने बताया कि काफी सोच-विचार के बाद कुमाऊं के सबसे बड़े मंदिर समूह व पहचान के रूप में जागेश्वर मंदिर को विवि के प्रतीक के रूप में चुना गया है। विवि अपने 15वें दीक्षांत समारोह में तथा आगे भी अतिथियों को प्रतीक के रूप में जागेश्वर मंदिर की प्रतिकृति ही प्रतीक के रूप में भेंट करेगा।जागेश्वर (Jageshwar) धाम के तीन किमी क्षेत्र में निर्माणों के लिए उपनियम बनाये सरकारनैनीताल, 1 नवम्बर 2018। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने सरकार को जागेश्वर (Jageshwar) धाम के मूल स्वरूप को बरकरार रखने के लिए आठ सप्ताह के भीतर अंतिम निर्णय लेने तथा जागेश्वर (Jageshwar) धाम के आसपास स्थित छोटे-छोटे मंदिरों व उनके आस पास की जगह को सुरक्षित रखने के लिए एक साल का समय दिया है। साथ ही सरकार को जागेश्वर (Jageshwar) धाम के तीन किलोमीटर के क्षेत्र में निर्माणों के लिए उपनियम बनाने को कहा है।इसके अलावा खंडपीठ ने आरतोला-जागेश्वर (Jageshwar) मोटर मार्ग के किनारे किसी भी प्रकार का निर्माण यूपी रोड साइड लैंड कंट्रोल एक्ट के विपरीत न करने के आदेश भी दिये हैं। साथ ही कोटली के पटवारी को होटलों व रेस्टोरेंटों से निकलने वाला सीवर के गंदे का पानी न बहाने देने को निर्देशित करते हुए चेतावनी दी है कि इसके लिए तहसीलदार, एसडीएम व पटवारी जिम्मेदार होंगे। (Jageshwar) खण्डपीठ ने एसडीएम को यह भी निर्देश दिए हैं कि वहां दाह संस्कार के बाद अधजली लकड़ी आदि कोई भी सामग्री न फैले। इसके लिए अल्मोड़ा डीएम को चेताया है कि वह नदी की स्वच्छता, जागेश्वर धाम की सुंदरता बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होंगे। साथ ही डीएम को जागेश्वर धाम में सौर ऊर्जा से जलने वाली लाईटें लगाने के लिए तीन माह के भीतर आवशयक कार्यवाही करने को भी कहा है।उल्लेखनीय है कि पूर्व में खंडपीठ ने जागेश्वर (Jageshwar) आरतोला मोटर मार्ग के किनारे किसी भी प्रकार के निर्माण पर रोक लगाते हुए विशेष क्षेत्र प्राधिकरण से निर्माण कार्यो के लिए उपनियम बनाने को कहा था। साथ ही पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को निर्देश दिए थे कि जागेश्वर मुख्य मन्दिर के तीन किमी परिधि में पेड़ काटने पर रोक लगाएं और प्राचीन स्मारक और पुरातत्व क्षेत्र एक्ट 1958 का पालन सुनिश्चित करें और जागेश्वर के सभी मंदिरो का जीर्णोद्धार करें। (Jageshwar) मामले के अनुसार जागेश्वर (Jageshwar) व उसके आसपास के ग्रामीणों ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर जागेश्वर आरतोला मोटर मार्ग के किनारे अवैध निर्माण व देवदार के पेड़ो का अवैध कटान को रोकने की प्रार्थना की थी। ((Jageshwar, PM Modi Jageshwar, Jageshawar ki khas baten, PM Modi, Jahan se shuru hui thi shiv ling ki puja)(Jageshwar) जिसे कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश ने स्वतः सज्ञान लिया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की खंडपीठ ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया था। आज मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ में हुई। (Jageshwar, PM Modi Jageshwar, Jageshawar ki khas baten, PM Modi, Jahan se shuru hui thi shiv ling ki puja, Kaise pahunchen Jageshawar, Jagnath,)आज के अन्य एवं अधिक पढ़े जा रहे ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। यहां क्लिक कर हमारे व्हाट्सएप चैनल से, फेसबुक ग्रुप से, गूगल न्यूज से, टेलीग्राम से, कू से, एक्स से, कुटुंब एप से और डेलीहंट से जुड़ें। अमेजॉन पर सर्वाधिक छूटों के साथ खरीददारी करने के लिए यहां क्लिक करें। यदि आपको लगता है कि ‘नवीन समाचार’ अच्छा कार्य कर रहा है तो हमें सहयोग करें..। (Jageshwar, PM Modi Jageshwar, Jageshawar ki khas baten, PM Modi, Jahan se shuru hui thi shiv ling ki puja, Kaise pahunchen Jageshawar, Jagnath,)Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook Click to share on X (Opens in new window) X Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...Related Post navigationहल्द्वानी: छात्र संघ चुनाव के आये परिणाम एरीज (ARIES) नैनीताल के वैज्ञानिक के नेतृत्व में चीन, भारत, फिनलैंड, रूस, अमेरिका, जापान और बुल्गारिया के 28 वैज्ञानिकों ने की ब्रह्मांड के अबूझ रहस्यों पर एक बड़ी खोज