EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / 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सभ्यता के सबूत महाभारत की ही धरती, महाभारत काल में पांडवों के मांगे 5 गांवों में शामिल उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सिनौली गांव में मिले हैं। यहां आर्कियॉलजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) द्वारा की गयी खुदाई में पहली बार भारत में रथ मिले हैं, जिनसे पूर्व की आर्यों के दौर में भारत में रथों का उपयोग न होने की ऐतिहासिक धारणा खारिज हो गयी है। रथों में तांबे की पट्टियों एवं कीलों का प्रयोग मिला है, इससे इस रथ के ताम्रकालीन दौर के होने और उत्खनन स्थल के महाभारत की धरती पर होने तथा प्राप्त सबूतों के करीब 5000 वर्ष पुराने यानी लगभग 1800 से 2000 ईसा पूर्व के होने के सबूतों के साथ इस सभ्यता के महाभारतकालीन होने की पूरी संभावना व्यक्त की जा रही है।यह भी पढ़ें : 25 वर्षीय आईएएस अंशुल भट्ट ने ग्राहक बनकर पकड़ा बिना पंजीकरण के चल रहा होटल और किया सील, प्रश्न-जनपद मुख्यालय में प्रशासन ऐसी ही स्थितियों में मौन क्यों...? यह भी देखें :यहाँ क्लिक कर सीधे संबंधित को पढ़ें Toggleयह भी जानें : दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं के अब तक मिले 10 सबूत मौसमी कारणों से समाप्त हुई थी सिन्धु घाटी सभ्यता करीब 5000 साल पुराना है रथभारतीय इतिहास के लिहाज के बेहद महत्वपूर्णबागपत का इतिहास महाभारत काल से है4000 साल पहले भी यहां थी सभ्यतायुद्ध की पुष्टिLike this:Relatedयह भी जानें : दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं के अब तक मिले 10 सबूत मौसमी कारणों से समाप्त हुई थी सिन्धु घाटी सभ्यता उत्खनन वैज्ञानिकों, पुरातत्वविद और इतिहासकारों के अनुसार दुनियाभर के इतिहासकारों का मिथक सिनौली में हुए उत्खनन ने तोड़ दिया है। इस सफलता से काफी उत्साहित पुरातत्वविदों को यहां महाभारतकालीन शाही कब्रों का एक समूह मिला है, जिसमें ‘रथ’ और ‘शाही ताबूत’ भी शामिल हैं। ताबूतों में दफन योद्धा की ताम्र युगीन तलवारें, ढाल, सोने और बहुमूल्य पत्थरों के मनके, योद्धा का कवच, मुकुट व हेलमेट आदि भी प्राप्त होने से अब पूरे विश्व के पुरातत्वविदों की नजरें सिनौली पर टिक गई हैं। आगे यहां से प्राप्त दुर्लभ पुरावशेषों को दिल्ली लाल किले में पहुंचाया जा रहा है। वहां पर इनको रासायनिक विधियों से साफ-सफाई कर अंतर्राष्ट्रीय विद्धानों के सामने प्रस्तुत करने लायक बनाया जाएगा। एएसआई के अधिकारियों ने बताया कि हम बागपत के सादिकपुर सनौली गांव में खुदाई कर रहे हैं। इस इलाके में खेत की जमीन से महज दस सेंटीमीटर नीचे मिली कांस्य युगीन सभ्यता के बारे में जानकारों का कहना है कि यह सभ्यता मेसोपोटामिया जैसी समृद्ध रही होगी। इतनी प्राचीनतम सभ्यता का मिलना वैज्ञानिकों के लिए भी हैरान करने वाला है। महाभारत काल में पांडवों के मांगे 5 गांवों में बागपत भी शामिल था। इसलिए इस सभ्यता के अवशेष को महाभारत काल से जोड़कर भी देखा जा रहा है।करीब 5000 साल पुराना है रथसिनौली उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों की जानकारी देते हुए इतिहासकारों के अनुसार यहां आठ मानव कंकाल और उनके साथ तीन एंटीना शॉर्ड (तलवारें), काफी संख्या में मृदभांड, विभिन्न दुर्लभ पत्थरों के मनके और सबसे अधिक महत्वपूर्ण और कौतूहल वाला 5000 साल पुराना रथ, दो खंजर, एक ढाल, एक मशाल और एक प्राचीन हेलमेट भी मिले हैं। जानकारों का कहना है कि यह सभ्यता मेसोपोटामिया जैसी समृद्ध रही होगी। उन्होंने बताया कि भारत में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना के बाद से अभी तक हुए उत्खनन और शोध में पहली बार सिनौली उत्खनन से भारतीय योद्धाओं के तीन रथ भी प्राप्त हुए हैं, जो विश्व इतिहास की एक दुर्लभतम घटना है।यह भी पढ़ें : एम्स ऋषिकेश में चमोली के दंपति ने नौ दिन के मृत नवजात का देहदान किया, चिकित्सा शोध को मिला मानवता का बड़ा योगदानभारतीय इतिहास के लिहाज के बेहद महत्वपूर्ण अभी तक विश्व के इतिहासकार भारतीय मानव सभ्यता के प्राचीन निवासियों-आर्यों को बाहर से आया हुआ बताकर अन्य सभ्यताओं से कमतर आंकते रहे हैं, लेकिन यहां जिस तरह योद्धाओं के शवों के साथ उनके युद्ध रथ भी दफन किए हुए मिले हैं और उनके साथ ही योद्धाओं की तलवारें, उनके हेलमेट, कवच, ढाल भी प्राप्त हुए हैं, वह 5000 वर्ष पूर्व की भारतीय युद्धकला का स्पष्ट उदाहरण हैं। शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन ने दावा किया कि सिनौली सभ्यता भारतीय संस्कृति और इतिहास को विश्व के पुरातत्वविदों को दोबारा लिखने को मजबूर कर देगी।बागपत का इतिहास महाभारत काल से हैमहाभारत महाकाव्य में जनपद बागपत के बरनावा और बागपत नगर व यमुना नदी के दूसरी ओर हरियाणा के सोनीपत, पानीपत नगर को पांडवों द्वारा श्रीकृष्ण भगवान के माध्यम से कौरवों से संधि के दौरान मांगा गया था। भौगोलिक रूप से भी यह सिद्ध है कि यह इलाका कुरू जनपद का प्राचीन काल से एक केंद्र रहा है, जिसकी प्राचीन राजधानी हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) रही है।4000 साल पहले भी यहां थी सभ्यतासिनौली में 2005 में किये गये उत्खनन की रासायनिक विधियों से प्राप्त कार्बन डेटिंग भी यहां की सभ्यता को 4000 से 5000 वर्ष का सिद्ध करती है। उल्लेखनीय है कि सिनौली से 2005 में एएसआई अधिकारियों को इसी जगह से 120 मीटर की दूरी पर एक कब्रगाह मिली थी, जिसमें से लगभग 116 कब्रें मिली हैं। उन कब्रों के पास भी तलवारें आदि मिली थी। यह शव महाभारत सभ्यता के निवासियों के रहे हो, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। दूसरा दृष्टिकोण यह भी है कि वर्तमान में पुराने स्थल के करीब 5 किलोमीटर पहले स्थित खेत पर जो ट्रायल ट्रेंच लगाया गया, वहां से भारत के प्राचीनतम शवाधान केंद्रों की एक दुर्लभतम प्रक्रिया ताबूत में मानव शव को दफनाया जाना, प्राप्त हुआ है। उस ताबूत को भी अत्यधिक दुर्लभ मानी जाने वाली ताम्र धातु से सुसज्जित किया गया है।‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से 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धन्यवाद। युद्ध की पुष्टिताबूत के अंदर दफन योद्धा के अस्त्र-शस्त्र, आभूषण, ताबूत के सिरहाने में मुकुट जैसी चीज के अवशेष के साथ ही दैनिक उपयोग के खाद्य पदार्थ, मृदभांड आदि तो प्राप्त हुए ही हैं। साथ ही उसी योद्धा के प्रयोग में लाए जाने वाले युद्ध रथ भी दफन किए गए हैं। जो पहली बार भारत में प्राप्त हुए हैं। कब्रें और अंतिम संस्कार के जो सबूत मिले हैं, उनमें अब तक पहली बार ताबूत में रखी इतनी पुरानी कब्रें मिली हैं। यह सब कब्रें लकड़ी के मजबूत ताबूत में बंद हैं। आम तौर पर ताबूत में लोहे की किलो का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन इन ताबूत में तांबे की कीलों का इस्तेमाल किया गया है। इनकी दीवारों पर तांबे की प्लेटिंग है, जिस पर तमाम तरह की आकृतियां बनाई गई हैं। कार्बन डेटिंग से यह भी सिद्ध हो चुका है कि प्राप्त पुरावशेष और कंकाल 4500 वर्ष से अधिक पुराने हैं और यह समय महाभारत काल का समय कहा जाता है।यह भी पढ़ें : नैनीताल में फर्जी गाइड ने पर्यटक की कार लेकर की क्षतिग्रस्त, मालरोड पर पेड़ और डस्टबिन से टकराकर हुआ फरार, पुलिस तलाश में जुटीसिनौली में जो भी कंकाल मिले हैं, उनके साथ युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले हथियार बरामद हुए हैं जो यह बात सिद्ध करते हैं कि ये आम व्यक्ति नहीं बल्कि योद्धा थे। इस बात से भी पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता कि महाभारत युद्ध में मरने वाले योद्धाओं के शव यहां पर नहीं दफनाए गए थे, क्योंकि यह पूरा क्षेत्र महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। खुदाई के दौरान एक महिला का कंकाल भी मिला है, जिसका ताबूत पूरी तरह से गल चुका था। इस महिला के सिरहाने एक सोने का बीड के साथ चांदी का कुछ सामान, सींग का बना कंघा और एक तांबे का आइना भी मिला है।Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook Click to share on X (Opens in new window) X Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...Related Post navigation28 मई को 10 हजार महिलाओं के लिये ‘पैडमैन’ बनेगी उत्तराखंड सरकार, जानें क्यों…? हंसाएंगे, रुलायेंगे, चेहरे पर कई भाव लायेंगे बच्चों की प्रतिभा के ये प्रदर्शन
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