EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / 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दौर चल रहा है, वहीं अगले माह बसंत पंचमी पर आने वाले ऋतुराज बसंत ने भी दस्तक दे दी है। नगर के मल्लीताल में भारतीय स्टेट बैंक की मुख्य शाखा के पास ब्रूम का पेड़ पीले बासंती रंग के फूलों से लकदक हो गया है और बसंत का आभास करा रहा है। यह भी पढ़ें : सुबह तड़के दुर्घटना में 2 की मौत, एक अन्य गंभीर रूप से घायल देखें विडिओ : इसके अलावा नगर के निकट भवाली रोड पर पाइंस के पास छावनी परिषद द्वारा नव स्थापित पार्क के पास एक राज्य वृक्ष बुरांश का पेड़ रक्त वर्ण लाल रंग के फूलों के साथ प्रकृति के सुकुमार छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत के द्वारा बुरांश के लिए प्रयुक्त ‘जंगल की ज्वाला’ की याद दिला रहा है। यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार : रितेश पांडे, मोहन मेहता, मुक्ता प्रसाद सहित पूरे कुमाऊं में होगी 20 लोगों की संपत्ति जब्तगौरतलब है कि बुरांश के फूल भी बसंत ऋतु में ही खिलते हैं, और इस दौरान ही आने वाले पहाड़ के लोकपर्व फूलदेई पर घरों की देहरी पर शुभकामनाओं के साथ बिखेरे जाते हैं। गौरतलब है कि इधर चैत्र माह में पकने वाले पहाड़ के फल काफल के पकने की भी खबर है, जिसे ग्लोबलवार्मिंग से जोड़ा जा रहा है। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।यहाँ क्लिक कर सीधे संबंधित को पढ़ें Toggleयह भी पढ़ें : उत्तराखंड का राज्य वृक्ष ‘बुरांश’ कोरोना उपचार में साबित हुआ प्रभावीयह भी पढ़ें : एक वर्ष में दो बार खिला उत्तराखंड का यह खास फूल, दिये जलवायु परिवर्तन के खतरनाक संकेतशीतकालीन वर्षा न होने व अब बारिश होना तात्कालिक कारणइस बार समय से खिली ‘जंगल की ज्वाला’ संग मुस्काया पहाड़…आड़ू, बेड़ू जैसा नहीं घिंघारूLike this:Relatedयह भी पढ़ें : उत्तराखंड का राज्य वृक्ष ‘बुरांश’ कोरोना उपचार में साबित हुआ प्रभावीनवीन समाचार, नई दिल्ली, 18 जनवरी 2022। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी और इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी (आईसीजीईबी) के अनुसंधानकर्ताओं ने हिमालयी क्षेत्रों में पाये जाने वाले उत्तराखंड के राज्य वृक्ष बुरांश की पत्तियों में ‘फाइटोकेमिकल’ होने का पता लगाया है, जिसका इस्तेमाल कोविड-19 संक्रमण के उपचार के लिए हो सकता है। ‘फाइटोकेमिकल’ या पादप रसायन वे कार्बनिक यौगिक होते हैं, जो वनस्पतियों में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध होते हैं। अनुसंधान में पता चला कि हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले पौधे बुरांश या ‘रोडोडेंड्रॉन अरबोरियम’ की पादप रसायन युक्त पत्तियों में विषाणु रोधी या वायरस से लड़ने की क्षमता होती है। अध्ययन के निष्कर्षों को हाल में जर्नल ‘बायोमॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर एंड डाइनामिक्स’ में प्रकाशित किया गया। अनुसंधान दल के अनुसार कोविड-19 महामारी को शुरू हुए लगभग दो वर्ष हो चुके हैं और अनुसंधानकर्ता इस विषाणु की प्रकृति को समझने की कोशिश कर रहे हैं तथा संक्रमण की रोकथाम के नए तरीके खोज रहे हैं।आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ बेसिक साइंस के एसोसिएट प्रोफेसर श्याम कुमार मसकपल्ली ने कहा, वायरस के खिलाफ शरीर को लड़ने की क्षमता देने का एक तरीका तो टीकाकरण है, वहीं दुनियाभर में ऐसी गैर-टीका वाली दवाओं की खोज हो रही है, जिनसे मानव शरीर पर विषाणुओं के हमले को रोका जा सकता है। इन दवाओं में वो रसायन होते हैं जो या तो हमारी शरीर की कोशिकाओं में रिसेप्टर अथवा ग्राही प्रोटीन को मजबूती प्रदान करते हैं और वायरस को उनमें प्रवेश करने से रोकते हैं या स्वयं वायरस पर हमला कर हमारे शरीर में इसके प्रभाव होने से रोकथाम करते हैं। (डॉ.नवीन जोशी) आज के अन्य ताजा ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।यह भी पढ़ें : उत्तराखंड में नई समस्या बने नीले ड्रम, ‘देशी गीजर’ बनाकर हो रही बिजली चोरी, रुड़की ऊर्जा निगम की कार्रवाई में 148 नीले ड्रम बरामद...यह भी पढ़ें : एक वर्ष में दो बार खिला उत्तराखंड का यह खास फूल, दिये जलवायु परिवर्तन के खतरनाक संकेतडॉ. नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड का राज्य वृक्ष बुरांश इस बार एक ही वर्ष में आश्चर्यजनक तौर पर दो बार खिल रहा है। पहले यह कमोबेश अपने सही समय पर फरवरी माह के पहले पखवाड़े में खिल गया था, और अब तक तब के खिले बुरांश के फूल सूख भी गये हैं। लेकिन इधर नैनीताल के निकट ताकुला सहित कई जंगलों में कई पेड़ों पर इसके फूल अब अप्रैल माह के आखिरी सप्ताह में खिल रहे हैं, और एक तरह से इनकी बहार दुबारा से छा गयी है। एक ही वर्ष में दो बार बुरांश का खिलना जहां आम लोगों के लिए रोमांचित करने व कौतूहल पैदा करने वाला है, वहीं वनस्पति विज्ञानी इसे देश-दुनिया में चल रही जलवायु परिवर्तन की चिंताओं से जोड़ते हुए खतरनाक संकेत बता रहे हैं।‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। इधर मुख्यालय के निकट ताकुला के दक्षिणी ढाल के जंगलों में आस-पास ही स्थित बुरांश के किसी पेड़ में तो फरवरी में खिले बुरांश के फूल सूखे हुए नजर आ रहे हैं, तो अन्य अनेक पेड़ों में बुरांश अब लक-दक खिल रहा है। उल्लेखनीय बात यह भी है कि इस वर्ष पूर्व में, समय पर खिले बुरांश के फूलों में अपेक्षित लालिमा नहीं थी, और आकार भी छोटा था। ऐसे में इस वर्ष मुख्यालय स्थित फल संरक्षण केंद्र में भी इस वर्ष बुरांश का जूस बीते वर्षों के मुकाबले बहुत ही कम मात्रा में तैयार किया गया, और करीब एक माह पूर्व से जूस बनना बंद भी हो गया था। लेकिन इधर दुबारा से फूलों के खिलने से हर कोई आश्चर्यचकित है।लिंक क्लिक करके यह भी देखें : कुमाऊं के खूबसूरत फल-फूल व लजीज व्यंजनपहाड़ के फल: ऐसा स्वाद और कहाँबुरांश-Rhododendron: The Flower on State Tree of Uttarakhand (India)आड़ू, बेड़ू जैसा नहीं घिंघारू शीतकालीन वर्षा न होने व अब बारिश होना तात्कालिक कारणनैनीताल। इस बारे में पूछे जाने पर कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्राध्यापक प्रो. आशीष तिवारी का कहना है कि बुरांश के फूलों के खिलने में ‘वाटर पोटेंशियल’ बड़ी भूमिका निभाता है। वाटर पोटेंशियल से तात्पर्य बारिश के जल के जमीन में जाने से है। यही पानी पौधों की जड़ों में जाता है। उन्होंने बताया कि फूल खिलने के लिए बुरांश के पेड़ों को ‘0.5 बार वाटर पोटेंशियल’ की जरूरत होती है। इस वर्ष शीतकालीन वर्षा नहीं हुई, और अब ओलावृष्टि के साथ वर्षा हो रही है। उनका कहना है कि अब अच्छी बारिश होने से अब फूल भी अच्छे आएंगे।वहीं डीएसबी परिसर के ही वनस्पति विज्ञान विभाग के अन्य प्राध्यापक प्रो. बीडी पांडे का कहना है कि उत्तरी व दक्षिणी अलग-अलग ढालों पर होने की वजह से दो अलग-अलग समयों पर फूलों के खिलने की स्थिति आ सकती है। इसके अलावा अधिक व कम उम्र के पेड़ों में भी अलग-अलग समय पर फूल खिल सकते हैं। अधिक उम्र के गहरी जड़ों वाले बुरांश के पेड़ शीतकाल में अपेक्षित पानी प्राप्त कर पाये होंगे, उनमें फूल फरवरी में खिल गये होंगे, और अब कम उम्र के नये, उथली जड़ों वाले पेड़ों में फूल खिल रहे हो सकते हैं।यह भी पढ़ें : उत्तराखंड के बागेश्वर में सुबह 7:25 बजे 3.5 तीव्रता का भूकंप, झटके हरिद्वार-ऋषिकेश तक महसूस, नुकसान की सूचना नहींइसके अलावा अन्य वनस्पति विज्ञान विभाग के प्राध्यापक प्रो. ललित तिवाड़ी का कहना है कि फूलों के खिलने को पेड़ों को प्रकृति से मिलने वाला ‘प्रेसिपिटेशन’ यानी मौसम के साथ प्रभावित होने वाले सूर्य की ऊष्मा यानी गर्मी यानी तापमान, पानी, नमी व हवा आदि के तत्वों का समग्र भी प्रभावित करता है। उनका कहना है कि जब जलवायु की सभी परिस्थितियां अनुकूल होती हैं, तभी पेड़ों में फूलों के लिए कोपलें खिलती हैं। उनका कहना है कि इस वर्ष समय पर शीतकालीन वर्षा न होने के कारण दो अलग समयों पर बुरांश का खिलना साफ तौर पर पूरी दुनिया में चल रही जलवायु परिवर्तन की स्थितियों का प्रभाव बता रहा है। यह शुभ संकेत नहीं है। देर से शीतकालीन बारिश होने के कारण देर से बुरांश खिल रहा है। अब इसके बीज जमीन पर गिरने के बाद भी अंकुरित नहीं हो पाएंगे। वहीं देर से हो रही बारिश का प्रभाव आम, आड़ू, पुलम, खुमानी व सेब आदि फलों और गेहूं आदि की अन्य फसलों पर भी पड़ना तय है। बताया कि पूर्व में कुमाऊं विवि के एक शोध में बुरांश के 28 दिन पहले खिलने की बात प्रकाश में आई थी।इस बार समय से खिली ‘जंगल की ज्वाला’ संग मुस्काया पहाड़…नवीन जोशी, नैनीताल। ‘…पारा भीड़ा बुरूंशी फूली रै, मैं ज कूंछू मेरी हीरू रिसै रै….’ देवभूमि उत्तराखण्ड के पहाड़ी जंगलों में पशु चारण करते ग्वाल बालों की जुबान पर यह गीत चढ़ने लगा है। कारण उनका प्यारा लाल, सुर्ख बुरांश का फूल खिलने लगा है। उत्तराखण्ड के राज्य वृक्ष पर लकदक खिला यह फूल सरोवरनगरी के निकट भवाली, रामगढ़ व मुक्तेश्वर के जंगलों में पिछले कुछ ही दिन से इस तरह मुस्कुराने लगा है, कि इसके खिलने से महके ऋतुराज बसन्त के साथ मुस्काते पहाड़ों की खूबसूरती में चार चाँद लगा दिए हैं। कोशिश की जाऐ तो फूलों के मौसम की यह खूबसूरती प्रदेश के पर्यटन में भी चार चाँद लगाते हुए काफी लाभकर हो सकती है। वनस्पति विज्ञानियों का कहना है कि इस बार इसके समय पूर्व खिलने की कुछ छिटपुट खबरें तो आईं, परंतु वास्तव में यह अब खिलने लगा है, जो कि अधिक जल्दी नहीं है।बुरांश का फूल जितना सुन्दर है, उतना ही अधिक लाभकारी भी। वनस्पति विज्ञान की भाषा में ‘रोडोडेण्ड्रोन’ और हिन्दी के सुकुमार छायावादी कवि सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा ‘जंगल की ज्वाला’ कहे गये बुरांश का पहाड़ से गहरा संबंध है। इसीलिए इसे देवभूमि उत्तराखंड में राज्य वृक्ष का दर्जा मिला हुआ है। इधर जलवायु परिवर्तन का असर इस पेड़ पर जहां समय पूर्व खिलने के रूप में सर्वाधिक दिखाई दे रहा है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तनों पर शोध करने के लिए भी इस वृक्ष की उपयोगिता बढ़ जाती है। दूसरी ओर पशुओं के लिए उत्तम चारा व जलौनी लकड़ी होने के कारण इसके जंगलों के आसपास के ग्रामीण भी इसे खासा नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिसे रोकने की जरूरत है। फलस्वरूप इसके जंगल सिमटते जा रहे हैं।28 दिन समय पूर्व खिला बुरांश: शोध नैनीताल। बुरांश में राज्य की आर्थिकी, स्वास्थ्य और पर्यावरण सहित अनेक आयाम समाहित हैं। प्रदेश में 1,200 से 4,800 मीटर तक की ऊंचाई वाले करीब एक लाख हैक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में सामान्यतया लाल के साथ ही गुलाबी, बैंगनी और सफेद रंगों में मिलने वाला और चैत्र (मार्च-अप्रैल) में खिलने वाला बुरांश बीते कई वर्षों में पौष-माघ (जनवरी-फरवरी) में भी खिलने लगा था। इस आधार पर इस पर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ का सर्वाधिक असर पड़ने को लेकर चिंता जताई जाने लगी है। डीएफओ डा. पराग मधुकर धकाते कहते हैं कि हर फूल को खिलने के लिए एक विशेष ‘फोटो पीरियड’ यानी एक खास रोशनी और तापमान की जरूरत पड़ती है। यदि किसी पुष्प वृक्ष को कृत्रिम रूप से भी यह जरूरी रोशनी व तापमान दिया जाए तो वह समय से पूर्व खिल सकता है। वहीं कुमाऊं विवि के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्राध्यापक प्रो. ललित तिवाड़ी ने बताया कि उनके एक शोध छात्र ने बुरांश के खिलने के समय पर पांच वर्ष लंबा शोध किया था, जिसमें इसके करीब 28 दिन जल्दी खिलने की पुष्टि हुई है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष यह समय पर ही खिला है।वन विभाग ने शुरू किया शोध :बुरांश का समय से पहले खिलना पर्यावरणविद् और वन विभाग के लिए पहेली बन चुका है। इस पहेली को सुलझाने के लिए वन महकमा अब शोध में जुट गया है। वन वर्धनिक उत्तराखंड द्वारा कैंपा मद के जरिए नैनीताल जनपद के किलबरी, पटवाडांगर और भवाली के पास वन आरक्षित एरिया में इस पर शोध किया जा रहा है। तीनों लोकेशन में 20-20 पेड़ों को मार्क करने के बाद उनकी मॉनीटरिंग की जा रही है। समय से पूर्व फूल खिलने और दोबारा बीज विकसित न होने जैसे बिंदुओं को रिसर्च में शामिल किया गया है। इसके अलावा लोकेशन का तापमान भी नोट किया जा रहा है। प्रोजेक्ट के दौरान बुरांश की फीनोलॉजी पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का गहन अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार की जाएगी।राज्य की आर्थिकी से जुड़ा व जेव विविधता का परिचायक भी है बहुगुणी बुरांशयह भी पढ़ें : खुशखबरी ! अब घर बैठे मिलेगी सत्यापित खतौनी, छह राजस्व पोर्टल शुरूनैनीताल। बुरांश राज्य के मध्य एवं उच्च मिालयी क्षेत्रों में ग्रामीणों के लिए जलौनी लकड़ी व पालतू पशुओं को सर्दी से बचाने के लिए बिछौने व चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है, वहीं मानव स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से इसके फूलों का रस शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी को दूर करने वाला, लौह तत्व की वृद्धि करने वाला तथा हृदय रोगों एवं उच्च रक्तचाप में लाभदायक होता है। इस प्रकार इसके जूस का भी अच्छा-खासा कारोबार होता है। अकेले नैनीताल के फल प्रसंस्कण केंद्र में प्रति वर्ष करीब 1,500 लीटर जबकि प्रदेश में करीब 2 हजार लीटर तक जूस निकाला जाता है। इस सदापर्णी वृक्ष के रक्तिम सुर्ख फूल में शहद का भण्डार होता है। ऊंचाई बढ़ने के साथ इसके रंग में परिवर्तन होता जाता है और यह लाल रंग खोता हुआ गुलाबी, सफेद व बैगनी रंगों में भी पाया जाता है। एक ओर जहां यह चीड़ मिश्रित वनों में भी पाया जाता है, वहीं हिमालय के बुग्यालों के करीब होने वाली सीमित वृक्ष प्रजातियों में भी यह कम लंबाई के साथ मिल जाता है। इससे जूस, स्कवैश, जैम आदि उत्पाद बनाऐ जाते हैं, जो रक्तशोधक एवं हीमोग्लोबिन की पूर्तिकारक के रूप में अचूक औषधि माने जाते हैं। बुरांश का एक अन्य तरह से भी बड़ा व्यवसायिक इस्तेमाल हो सकता है। पहाड़ पर जिस मौसम में यह खिलता है, वह प्रदेश के पर्यटन के लिहाज से ‘ऑफ पीक’ यानी सर्वाधिक बुरा समय कहा जाता है, क्योंकि इन दिनों बर्फवारी की आस सिमट जाती है, और मैदानों में खास गर्मी नहीं बढ़ी होती। ऐसे में बुरांश के खिलने से पहाड़ में खिले फूलों का मौसम जहाँ सैलानियों को बड़ी संख्या में आकर्षित कर प्रदेश को बड़ी राजस्व आय दे सकता है, वहीं सैलानियों को आकर्षित करने के लिए भी यह बड़ा माध्यम साबित हो सकता है।सुमित्रानंदन पंत ने बुरांश पर ही लिखी एकमात्र कुमाउनी कविता, नेहरू भी रहे प्रशंषक नैनीताल। राज्य वृक्ष बुरांश का छायावाद के सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत ने अपनी मातृभाषा कुमाऊंनी में लिखी एकमात्र कविता में कुछ इस तरह वर्णन किया है: ‘सार जंगल में त्वि ज क्वे नहां रे क्वे नहां, फुलन छे के बुरूंश जंगल जस जलि जां। सल्ल छ, दयार छ, पईं छ अयांर छ, पै त्वि में दिलैकि आग, त्वि में छ ज्वानिक फाग।’ अर्थात, बुरांश तुझ सा सारे जंगल में कोई नहीं है। जब तू फूलता है, सारा जंगल मानो जल उठता है। जंगल में और भी कई तरह के वृक्ष हैं पर एकमात्र तुझमें ही दिल की आग और यौवन का फाग भी मौजूद है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू भी इसके प्रशंशकों में थे। उन्होंने अपने संस्मरणों में लिखा ‘पहाड़ पर बुरांश के रंजित लाल स्थल दूर ही से दिख रहे थे।’ महाकवि अज्ञेय ने भी अपनी कविताओं में इसका कई बार जिक्र किया। वहीं कवि श्रीकान्त वर्मा भी इसका जिक्र करने से स्वयं को नहीं रोक पाये. उन्होंने लिखा, ‘दुपहर भर उड़ती रही सड़क पर मुरम की धूल, शाम को उभरा मैं, तुमने मुझे पुकारा बुरूंश का फूल’। राज्य के कई अन्य कुमाउंनी-गढ़वाली कवियों ने भी इसे कभी प्रेमिका के गालों तो कभी उसके रूप सौन्दर्य के लिए खूब इस्तेमाल किया है।आड़ू, बेड़ू जैसा नहीं घिंघारूनवीन जोशी, नैनीताल। जी हां, आड़ू व बेड़ू के बाद पहाड़ पर घिंघारू (वानस्पतिक नाम पाइरा कैंथा क्रेनुलाटा-Pyracantha crenulata) की झाडियां भी छोटे-छोटे लाल रंग के फलों से लक-दक हो जाती हैं। इनके करीब-करीब एक साथ फलने की वजह से ही शायद एक पहाड़ी कहावत ‘आड़ू, बेड़ू घिंघारू’ में निकृष्ट व्यक्तियों की उपमा देने के लिए प्रयोग किया जाता है। लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। हालांकि फल के रूप में आड़ू और बेड़ू भी कम गुणवान नहीं, लेकिन घिंघारू तो इनसे कहीं अधिक गुणी नजर आता है। पहाड़ों में अनेक स्थानों पर इसकी झाड़ियां बहुतायत में मिलती हैं, लेकिन सरोवरनगरी नैनीताल में नैनी झील किनारे इसकी केवल झाड़ी भी अगस्त-सितंबर माह में लाल रंग के फलों से लदकर खुद भी लाल नजर आती है, और सैलानियों को खूब आकर्षित करती हैं।छोटी झाड़ी होने के बावजूद घिंघारू की लकड़ी की लाठियां व हॉकी सर्वश्रेष्ठ मानी जाती हैं। घरों में इसकी लकड़ी को पवित्र मानते हुए भूत भगाने के विश्वास के साथ भी रखा जाता है। दांत के दर्द में औषधि की तरह दातून के रूप में भी इसका प्रयोग होता है। बच्चे इसके फलों को बड़े चाव से खाते हैं, जबकि इधर रक्त वर्धक औषधि के रूप में इसका जूस भी तैयार किया जाने लगा है। विदेशों में घिंघारू के पौधों को ‘बोंजाई’ यानी छोटे आकार के वृक्ष की तरह में घरों के भीतर सजावटी पौधों के रूप में उगाया जाता है. इसकी पत्तियों को हर्बल चाय बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.। सेब की तरह नजर आने वाले नारंगी लाल रंग के छोटे फल बच्चों के साथ ही पक्षियों के भी प्रिय भोजन हैं।Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook Click to share on X (Opens in new window) X Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...Related Post navigationwell-known बड़ा समाचार : अब हुई सिंगल यूज प्लास्टिक की बड़ी फैक्टरी पर अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई, जखीरा बरामद, 5 लाख का जुर्माना, डीएम ने की 10 हजार के ईनाम की घोषणा
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