नवीन समाचार, नैनीताल, 9 फरवरी 2026 (Mayank Mishra Cricketer)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल (Nainital) से शुरू हुई एक साधारण सी क्रिकेट यात्रा आज राष्ट्रीय स्तर पर राज्य की पहचान बन गई है। नैनीताल के प्रतिष्ठित शेरवुड कॉलेज (Sherwood College) में बच्चों को क्रिकेट सिखाने वाले मयंक मिश्रा (Mayank Mishra) ने अपने धैर्य, मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर उत्तराखंड को पहली बार रणजी ट्रॉफी (Ranji Trophy) के सेमीफाइनल तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह उपलब्धि न केवल खेल जगत बल्कि राज्य के युवाओं के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन गई है।
रणजी ट्रॉफी में ऐतिहासिक प्रदर्शन
वर्तमान रणजी सत्र में मूलतः रुद्रपुर के निवासी 35 वर्षीय मयंक मिश्रा और अभय नेगी की धारदार गेंदबाजी से उत्तराखंड ने रणजी ट्रॉफी क्वार्टर फाइनल के तीसरे दिन झारखंड को पारी और छह रन से हराकर सेमीफाइनल में जगह पक्की कर ली। रणजी ट्रॉफी इतिहास में यह पहला मौका है जब उत्तराखंड की टीम ने सेमीफाइनल में जगह पक्की की है। उत्तराखंड के बाएं हाथ के अनुभवी स्पिनर मिश्रा ने 22 रन पर पांच विकेट लेकर झारखंड को अपनी फिरकी के जाल में फंसाया जबकि तेज गेंदबाज अभय नेगी ने 36 रन देकर चार विकेट चटकाए जिससे विरोधी टीम दूसरी पारी में सिर्फ 130 रन पर ढेर हो गई।
कल के पांच विकेट पर 282 रन से आगे खेलते हुए उत्तराखंड ने तीसरे दिन मैच पर अपनी पकड़ मजबूत करते हुए पहली पारी में 122.3 ओवर में 371 रन बनाकर 136 रन की बढ़त हासिल की। निचले क्रम के बल्लेबाज अभय नेगी ने 46 रन की पारी खेलकर उत्तराखंड को बड़ी बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई। झारखंड की टीम पहली पारी में 235 रन ही बना सकी थी। दूसरी पारी में भी झारखंड की शुरुआत खराब रही और टीम ने 14 रन तक ही दोनों सलामी बल्लेबाजों शिखर मोहन (02) और शरणदीप सिंह (08) के विकेट गंवा दिए।
कप्तान विराट सिंह (55) और कुमार कुशाग्र (34) ने तीसरे विकेट के लिए 86 रन जोड़े लेकिन 100 रन के स्कोर पर दोनों के विकेट गंवाने के बाद झारखंड का कोई अन्य बल्लेबाज दोहरे अंक में भी नहीं पहुंच पाया। दो विकेट पर 100 रन के बाद झारखंड की पारी 130 रन पर सिमट गई।
मयंक मिश्रा की पृष्ठभूमि और संघर्ष की कहानी
लगभग एक दशक पहले मयंक मिश्रा नैनीताल स्थित शेरवुड कॉलेज में क्रिकेट कोच थे। यही वह विद्यालय है जहां से फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) और फील्ड मार्शल सैम मानेकशा (Sam Manekshaw) जैसे प्रतिष्ठित पूर्व विद्यार्थी जुड़े रहे हैं। मयंक के मन में स्वयं पेशेवर क्रिकेटर बनने की आकांक्षा थी लेकिन उस समय उत्तराखंड को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (Board of Control for Cricket in India) से रणजी टीम का दर्जा प्राप्त नहीं था।
इसी सपने को जीने के लिए 2014 में वह झारखंड (Jharkhand) आए और जामताड़ा (Jamtara) को अपना ठिकाना बनाया। तीन साल तक जिला स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन के बावजूद उन्हें रणजी टीम में मौका नहीं मिला। अंततः निराश होकर वह वापस लौटे और कोचिंग को ही अपना भविष्य मान लिया। जब अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ी लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 2018 में जब उत्तराखंड को बीसीसीआइ से मान्यता मिलने की खबर आई, तो मयंक ने एक बड़ा और साहसिक फैसला लिया। उन्होंने अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ी और अपने सपने को एक आखिरी मौका देने का जोखिम उठाया।
परिवार के समर्थन से उन्होंने खुद को पूरी तरह क्रिकेट में झोंक दिया। यह जुआ काम कर गया। मयंक ने न सिर्फ उत्तराखंड टीम में जगह बनाई, बल्कि जल्द ही अपनी गेंदबाजी के मुख्य हथियार बन गए। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने इंग्लैंड में काउंटी क्रिकेट खेलकर अपनी गेंदबाजी को और निखारा, गति में विविधता लाना सीखा और अपनी फिटनेस पर कड़ी मेहनत की। रणजी सीजन में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं उन्होंने करीब सात किलो वजन कम किया, जिससे वह लंबे स्पेल फेंकने में सक्षम हुए।
आज वह इस रणजी सीजन में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं। झारखंड के खिलाफ मिली शानदार जीत के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि इस टीम के खिलाफ खेलने में एक अलग ही ऊर्जा होती है, क्योंकि यहीं उन्हें कभी खारिज कर दिया गया था। कीनन स्टेडियम में प्रशंसक जब उनसे आटोग्राफ ले रहे थे, तो यह उस क्रिकेटर के जुनून और कभी हार न मानने वाले जज्बे की जीत थी।
साहसिक निर्णय और नया मोड़
वर्ष 2018 में जब उत्तराखंड को बीसीसीआइ से मान्यता मिलने की सूचना मिली, तब मयंक मिश्रा ने एक साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने अपनी स्थिर नौकरी छोड़ी और परिवार के सहयोग से क्रिकेट को एक अंतिम अवसर देने का जोखिम उठाया। यह निर्णय उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ।
उन्होंने उत्तराखंड टीम में स्थान बनाया और शीघ्र ही बाएं हाथ के स्पिन गेंदबाज के रूप में टीम के प्रमुख हथियार बने। इंग्लैंड (England) में काउंटी क्रिकेट खेलकर उन्होंने गेंदबाजी में विविधता, फिटनेस और लंबे स्पेल डालने की क्षमता विकसित की। करीब सात किलोग्राम वजन कम कर उन्होंने स्वयं को और अधिक सक्षम बनाया।
मानवीय और सामाजिक प्रभाव
कीनन स्टेडियम (Keenan Stadium) में जब प्रशंसक मयंक मिश्रा से हस्ताक्षर ले रहे थे, तब यह दृश्य केवल एक जीत का नहीं बल्कि कभी हार न मानने वाले जज़्बे का प्रमाण था। जिस राज्य और टीम ने कभी उन्हें अवसर नहीं दिया था, उसी के विरुद्ध शानदार प्रदर्शन ने युवाओं को यह संदेश दिया कि निरंतर प्रयास से परिस्थितियां बदली जा सकती हैं।
प्रशासन और सरकार की प्रतिक्रिया
उत्तराखंड में आयोजित रणजी ट्रॉफी लीग में टीम के फाइनल में पहुंचने पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (Pushkar Singh Dhami) ने क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (Cricket Association of Uttarakhand) और पूरी टीम को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि राज्य के खेल इतिहास में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और इससे प्रदेश के खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ेगा। राज्य सरकार खेल अधोसंरचना, प्रशिक्षण और सुविधाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में निरंतर कार्य कर रही है।
आगे क्या बदल सकता है
इस सफलता से उत्तराखंड में खेल नीति, प्रशिक्षण ढांचे और युवाओं के लिए रोजगार व छात्रवृत्ति योजनाओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। क्या यह उपलब्धि राज्य में क्रिकेट अकादमियों और खेल शिक्षा को नई दिशा देगी। यह प्रश्न अब नीति निर्माताओं और खेल प्रशासकों के सामने है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
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