नवीन समाचार, स्वास्थ्य डेस्क, 16 अगस्त 2026 (Autophagy-45 Hours Fasting)। भारतीय संस्कृति में व्रत-उपवास की परंपरा सदियों पुरानी है। ऋषि-मुनियों द्वारा अपनाई गई यह विधि न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि आधुनिक विज्ञान भी इसके लाभों को स्वीकार कर चुका है। हाल ही में अमेरिका के चर्चित विचारक लेक्स फ्रिडमैन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संवाद से पूर्व 45 घंटे का उपवास रखा। इस अनुभव ने उपवास की वैज्ञानिकता को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
उपवास की प्रारंभिक अवस्था: ग्लूकोज पर निर्भरता
उपवास के पहले 6 से 12 घंटे तक शरीर भोजन से प्राप्त ग्लूकोज का उपयोग करता है। जैसे ही यह स्रोत समाप्त होता है, शरीर ग्लाइकोजन को तोड़कर ऊर्जा प्राप्त करता है। इस चरण में अग्न्याशय इंसुलिन का उत्पादन घटा देता है, जिससे शरीर वसा जलाने की दिशा में अग्रसर होता है।
मध्य चरण: वसा जलना और कोशिकीय सफाई
12 से 24 घंटे के बीच शरीर ग्लाइकोजन की कमी के कारण वसा को ऊर्जा स्रोत के रूप में अपनाता है। इस प्रक्रिया को लिपोलाइसिस कहा जाता है, जो केटोसिस की ओर ले जाती है। केटोन कण मस्तिष्क और मांसपेशियों के लिए वैकल्पिक ईंधन बनते हैं। इसी समय ऑटोफैगी की प्रक्रिया आरंभ होती है, जिसमें शरीर क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को हटाकर नई कोशिकाओं का निर्माण करता है।
गहन जैविक परिवर्तन: हॉर्मोनल बदलाव और कोशिकीय पुनर्निर्माण
24 से 36 घंटे के उपवास में ऑटोफैगी तीव्र हो जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रक्रिया कैंसर कोशिकाओं को भी समाप्त कर सकती है। साथ ही ह्यूमन ग्रोथ हॉर्मोन का स्तर कई गुना बढ़ता है, जिससे मांसपेशियों की मरम्मत और वसा जलना तेज़ होता है। एड्रेनालाईन और नॉरएड्रेनालाईन की वृद्धि से शरीर अधिक सक्रिय हो जाता है और इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ती है।
अंतिम चरण: गहन उपवास के लाभ
36 से 45 घंटे के उपवास में शरीर ग्लूकोनियोजेनेसिस प्रक्रिया से ग्लूकोज बनाता है। मेटाबॉलिक दर में 10 से 15 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। सूजन कम होती है, जिससे हृदय रोग, कैंसर और न्यूरोडिजेनेरेटिव बीमारियों का खतरा घटता है। शरीर में गहन कोशिकीय मरम्मत होती है, जिससे पुरानी कोशिकाएं हटती हैं और नई कोशिकाएं बनती हैं।
वैज्ञानिक शोध और वैश्विक मान्यता
जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओसुमी को ऑटोफैगी पर शोध के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनके अनुसार यह प्रक्रिया उम्र बढ़ने को धीमा करती है और कैंसर जैसी बीमारियों से बचाव में सहायक होती है। 2019 के एक अध्ययन में पाया गया कि 24 घंटे से अधिक का उपवास ऑटोफैगी को सक्रिय करता है, जबकि 2018 में प्रकाशित शोध के अनुसार 48 घंटे का उपवास स्टेम कोशिकाओं के पुनर्जनन को बढ़ाता है।
उपवास से संभावित लाभ
45 घंटे का उपवास वजन घटाने, मानसिक स्पष्टता, पाचन सुधार, सूजन में कमी और जीवनकाल वृद्धि में सहायक हो सकता है। यह टाइप 2 मधुमेह के खतरे को भी कम करता है।
किन्हें नहीं रखना चाहिए इतना लंबा उपवास
गर्भवती महिलाएं, स्तनपान कराने वाली माताएं, टाइप 1 मधुमेह से पीड़ित, गंभीर हृदय रोगी, अत्यधिक कमजोर व्यक्ति या वे जिन्हें उपवास के दौरान चक्कर, थकान या बेहोशी महसूस होती है—इन सभी को 45 घंटे का उपवास नहीं रखना चाहिए।
ऑटोफैगी और कैंसर से बचाव
ऑटोफैगी शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली है, जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को हटाकर स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण करती है। यह प्रक्रिया कैंसर के उपचार में भी सहायक मानी जा रही है, विशेषकर जब आहार में बदलाव के साथ इसे अपनाया जाए।
🧬 ऑटोफैगी: कैंसर कोशिकाओं की ‘स्वयं मृत्यु’ की प्रक्रिया
ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में एक शब्द इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है—”ऑटोफैगी”। यह कोई नई चिकित्सा तकनीक नहीं, बल्कि मानव शरीर की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो कोशिकाओं की सफाई और पुनर्निर्माण से जुड़ी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह प्रक्रिया कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार में सहायक हो सकती है।
क्या है ऑटोफैगी?
ऑटोफैगी एक ग्रीक शब्द है, जिसमें “ऑटो” का अर्थ है “स्वयं” और “फैगी” का अर्थ है “भक्षण”। यानी इसका शाब्दिक अर्थ है “स्वयं को खाना”। यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह शरीर की रक्षा प्रणाली का हिस्सा है। इस प्रक्रिया में शरीर अपनी क्षतिग्रस्त, निष्क्रिय या विषैली कोशिकाओं को पहचानकर उन्हें नष्ट करता है और उनके उपयोगी हिस्सों को पुनः प्रयोग में लाता है।
शरीर को कैसे लाभ पहुंचाता है ऑटोफैगी?
विशेषज्ञों के अनुसार, ऑटोफैगी शरीर की आंतरिक सफाई और पुनर्चक्रण की प्रक्रिया है। यह कोशिकाओं से तनाव, विषैले पदार्थ और बेकार प्रोटीन को हटाकर उन्हें स्वस्थ रूप में पुनः तैयार करता है। यह प्रक्रिया शरीर के भीतर एक प्रकार का “रीसेट बटन” है, जो समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाती है।
एंटी-एजिंग और न्यूरो रोगों में भूमिका
ऑटोफैगी का सबसे बड़ा लाभ उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करना है। यह युवा कोशिकाओं के निर्माण को प्रोत्साहित करता है और जीवनकाल को बढ़ाने में मदद करता है। इसके अलावा, यह पार्किंसंस, अल्जाइमर जैसे न्यूरोडिजेनेरेटिव रोगों के उपचार में भी सहायक सिद्ध हो सकता है।
उपवास और कीटोजेनिक आहार से कैसे सक्रिय होती है यह प्रक्रिया?
लंबे समय तक उपवास करने या कीटोजेनिक आहार अपनाने से शरीर में ऑटोफैगी की प्रक्रिया सक्रिय हो जाती है। उपवास के दौरान शरीर ऊर्जा के लिए कोशिकाओं के अंदर मौजूद सामग्री को तोड़ता है और उसे पुनः उपयोग करता है। वहीं कीटोजेनिक आहार—जिसमें वसा अधिक और कार्बोहाइड्रेट कम होते हैं—भी उपवास के समान प्रभाव उत्पन्न करता है।
कैंसर के उपचार में ऑटोफैगी की भूमिका
कैंसर कोशिकाएं अक्सर शरीर की सामान्य सफाई प्रक्रिया से बच निकलती हैं। लेकिन ऑटोफैगी उन्हें पहचानकर नष्ट करने की क्षमता रखती है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर में ऑटोफैगी की गति धीमी हो जाती है, जिससे क्षतिग्रस्त कोशिकाएं बढ़ने लगती हैं और कैंसर का खतरा बढ़ता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ऑटोफैगी को सही समय पर सक्रिय किया जाए, तो यह कैंसर कोशिकाओं को उनकी “स्वयं मृत्यु” की ओर ले जा सकती है।
शोध और संभावनाएं (Autophagy-45 Hours Fasting-Process of Amrit)
जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओसुमी को ऑटोफैगी पर किए गए शोध के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यह प्रक्रिया कोशिकाओं के पुनर्निर्माण और विषैले तत्वों को हटाने में अत्यंत प्रभावी है। हालांकि कैंसर के उपचार में इसकी भूमिका पर अभी और शोध की आवश्यकता है, लेकिन प्रारंभिक अध्ययनों से सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं।
🧬 उपवास के दौरान ऑटोफैगी को बढ़ावा देने वाले पेय: क्या पीना सुरक्षित है और क्या नहीं
ऑटोफैगी एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर की कोशिकाएं स्वयं को साफ करती हैं—अर्थात् क्षतिग्रस्त या अनुपयोगी घटकों को हटाकर उन्हें पुनः उपयोग योग्य बनाती हैं। यह प्रक्रिया दीर्घायु, रोग प्रतिरोधक क्षमता और कोशिकीय स्वास्थ्य को बनाए रखने में सहायक होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, उपवास इस प्रक्रिया को सक्रिय करने का एक प्रभावी उपाय है।
ऑटोफैगी के दौरान क्या पीना सुरक्षित है
🔹 पानी
शरीर को हाइड्रेटेड बनाए रखने के लिए शुद्ध जल का सेवन आवश्यक है। यह न केवल पाचन क्रिया को संतुलित रखता है, बल्कि कोशिकीय सफाई में भी सहायक होता है।
🔹 बिना चीनी वाली चाय और कॉफी
Zero Longevity Science के अनुसार, बिना चीनी वाली चाय और कॉफी में कैलोरी नगण्य होती है और ये ऑटोफैगी को बाधित नहीं करतीं। इनका सेवन उपवास के दौरान सुरक्षित माना गया है।
🔹 हर्बल चाय
कैमोमाइल, तुलसी, अदरक या पेपरमिंट जैसी हर्बल चायें, यदि बिना मिठास के ली जाएं, तो वे भी ऑटोफैगी के अनुकूल होती हैं। ऐसे पेय शरीर को हल्का और ऊर्जावान बनाए रखते हैं।
🔹 इलेक्ट्रोलाइट्स
निर्जलीकरण की स्थिति में बिना चीनी वाले इलेक्ट्रोलाइट्स का सेवन किया जा सकता है। यह शरीर में खनिज संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है, बशर्ते इनमें कोई ऊर्जा स्रोत न हो।
ऑटोफैगी के दौरान क्या नहीं पीना चाहिए
🔻 मीठे पेय पदार्थ
जूस, सोडा, कृत्रिम पेय या किसी भी प्रकार के मीठे तरल पदार्थ इंसुलिन स्तर को बढ़ा सकते हैं, जिससे ऑटोफैगी की प्रक्रिया बाधित होती है।
🔻 दूध और क्रीम
दूध, क्रीम या अन्य दुग्ध उत्पादों में कैलोरी और वसा होती है, जो उपवास की स्थिति को समाप्त कर सकती है। ये पेय इंसुलिन प्रतिक्रिया को सक्रिय कर देते हैं।
🔻 शराब
शराब न केवल शरीर के लिए हानिकारक है, बल्कि यह कोशिकीय सफाई की प्रक्रिया को भी रोक सकती है। इसके सेवन से ऑटोफैगी की गति धीमी हो जाती है।
कुछ महत्वपूर्ण बातें
किन लोगों को लंबा उपवास नहीं करना चाहिए – मधुमेह (विशेषकर इंसुलिन लेने वाले) – गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएं – 18 वर्ष से कम आयु – लो बीपी या ईटिंग डिसऑर्डर इतिहास – गंभीर थायरॉइड या क्रॉनिक बीमारी।
🧠 क्यों Day-2 पर भूख कम लगती है : दूसरे दिन कई लोगों को भूख अचानक कम लगती है क्योंकि: – घ्रेलिन (Ghrelin) हार्मोन की लहरें कम हो जाती हैं – कीटोन मस्तिष्क को वैकल्पिक ऊर्जा देते हैं – इंसुलिन निम्न रहता है – शरीर “फैट-एडाप्ट” मोड में आने लगता है।
📊 व्यावहारिक निष्कर्ष – 24–36 घंटे का उपवास अधिकांश लोगों के लिए पर्याप्त हो सकता है। – 45 घंटे कभी-कभी करना ठीक, लेकिन नियमित नहीं। – लंबा उपवास = हमेशा अधिक लाभ नहीं। – सुरक्षित हाइड्रेशन और सही री-फीडिंग सबसे महत्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष
यदि आप ऑटोफैगी को सक्रिय करना चाहते हैं, तो उपवास के दौरान केवल शुद्ध जल, बिना चीनी वाली चाय, कॉफी, कुछ हर्बल चाय और बिना मिठास वाले इलेक्ट्रोलाइट्स का सेवन करें। किसी भी प्रकार के कैलोरी युक्त पेय पदार्थों से बचना आवश्यक है, ताकि शरीर की स्वाभाविक सफाई प्रक्रिया बाधित न हो।
**अस्वीकरण:** यह लेख शैक्षिक उद्देश्य के लिए है। यदि आपको मधुमेह, हृदय, थायरॉइड या अन्य दीर्घकालिक रोग हैं तो लंबा उपवास शुरू करने से पहले योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।















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