नैनीताल में भी है एक ‘छोटा कैलाश’, कहते हैं महादेव ने इस स्थान पर किया था विश्राम और यहीं से राम-रावण युद्ध, महाशिवरात्रि और सावन में उमड़ती है आस्था

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नवीन समाचार, नैनीताल, 13 फरवरी 2026 (Chhota Kailash-Nainital)। उत्तराखंड (Uttarakhand) के नैनीताल जनपद के भीमताल ब्लॉक में पिनरों गांव की ऊंची कैलाश व आदि कैलाश जैसी ही दिखने वाली ऊंची पहाड़ी पर स्थित और ‘छोटा कैलाश’ कहा जाने वाला मंदिर शिवभक्तों की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। सावन और महाशिवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से भगवान शिव का ध्यान करने पर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, जिससे यह स्थल धार्मिक पर्यटन का भी प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। पढ़ें पूर्व संबंधित समाचार : छोटा कैलाश के लिए यातायात प्रतिबंध, कुमाऊँ विवि की स्वायत्तता के लिए एकजुटता व होली महोत्सव के कार्यक्रमों सहित नैनीताल के आज के 5 चुनिंदा नवीन समाचार…

छोटा कैलाश: आस्था, प्रकृति और कठिन साधना का संगम

IMG 6872भीमताल क्षेत्र की एक ऊंची चोटी पर स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को अंतिम चरण में करीब 3–4 किलोमीटर की कड़ी पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है, जो श्रद्धा के साथ-साथ शारीरिक सहनशक्ति की भी परीक्षा लेती है।

20352ae41db6ee682f6e37bfee69eb74 1844306832मंदिर तक पहुंचने के दो प्रमुख मार्ग हैं—

  • भवाली–भीमताल होते हुए जंगलिया गांव मार्ग (लगभग 40 किमी)

  • हल्द्वानी–अमृतपुर मार्ग से पिनरों गांव (लगभग 35 किमी)

पिनरों गांव से आगे पहाड़ी पगडंडी शुरू होती है, जहां सीमित सुविधाएं हैं। यही गांव अंतिम बसासत माना जाता है।

रास्ते का प्राकृतिक आकर्षण

छोटा कैलाश: भीमताल ब्लॉक का विख्यात शिव मंदिरअमृतपुर से जंगलियागांव को जोड़ने वाला मार्ग घने जंगलों, सीढ़ीनुमा खेतों और शांत पहाड़ी वातावरण से भरपूर है। रानीबाग क्षेत्र में पुष्पभद्रा और गगरांचल नदियों के संगम से आगे बढ़ते ही रास्ता पूरी तरह पर्वतीय सौंदर्य में डूब जाता है। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, कैलसा और गार्गी नदी की घाटियों के विहंगम दृश्य दिखाई देते हैं।

पौराणिक मान्यताएं और धार्मिक महत्व

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती से विवाह के उपरांत भगवान शिव ने इस स्थान पर एक दिन विश्राम किया था। वहीं कुछ लोगों का यह भी विश्वास है कि महादेव ने यहीं से राम और रावण के युद्ध को देखा था।

मंदिर परिसर में खुले आसमान के नीचे स्थापित शिवलिंग लंबे समय तक बिना मंदिर संरचना के रहा। वर्तमान मंदिर का स्वरूप लगभग 25 वर्ष पुराना बताया जाता है। यहां अखंड धूनी भी जलती रहती है, जिसे भक्त विशेष महत्व देते हैं।

पार्वती कुंड का पुनर्जीवन

मंदिर परिसर में स्थित पार्वती कुंड ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। समय के साथ यह सूख गया था, लेकिन अब मनरेगा योजना के तहत लगभग 8 लाख रुपये की लागत से इसके पुनर्निर्माण का कार्य किया गया है। 

महाशिवरात्रि और सावन में लगता है विशाल मेला

कर्नाटक कैलाशी बाबा, ने यहाँ लगभग 18 वर्षों से यहां तपस्या की। यहाँ सावन और माघ मास में भक्तों की संख्या तेजी से बढ़ती है। महाशिवरात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

कई भक्त पूरी रात धूनी के सामने अनुष्ठान करते हैं। कुछ श्रद्धालु मन्नत के तौर पर घंटी और चांदी का छत्र भी चढ़ाते हैं। विशेष अवसरों पर पुजारी मंदिर में पूजा संपन्न कराते हैं। 

मानवीय और पर्यटन प्रभाव

  • क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन की संभावनाएं बढ़ रही हैं

  • स्थानीय गांवों में सीमित स्तर पर रोजगार अवसर बने हैं। 

  • कठिन पैदल मार्ग होने से अभी भी बुनियादी सुविधाओं की जरूरत

आगे क्या अपेक्षित

पार्वती कुंड के पुनर्जीवन और महाशिवरात्रि मेले की बेहतर व्यवस्थाओं से छोटा कैलाश को भविष्य में एक प्रमुख आध्यात्मिक–पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने की संभावना जताई जा रही है। प्रशासन और स्थानीय समितियों से यहां बुनियादी सुविधाएं मजबूत करने की अपेक्षा भी बढ़ रही है।

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