EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / کٲشُرКыргызKurdîKʋsaalLëblaŋoлаккулезгиLugandaLingálaລາວلۊری شومالیlüüdidxʷləšucidmadhurâमैथिलीŊmampulliMalagasyKajin M̧ajeļമലയാളംМонголᠮᠠᠨᠵᡠManipuriма̄ньсиဘာသာမန်mooreमराठीမြန်မာ閩南語 / Bân-lâm-gú閩南語(漢字)閩南語(傳統漢字)Bân-lâm-gú (Pe̍h-ōe-jī)Bân-lâm-gú (Tâi-lô)KhoekhoegowabNorsk (bokmål)नेपालीनेपाल भाषाli nihanawdmNorsk (nynorsk)ngiembɔɔnߒߞߏSesotho sa LeboaThok NaathChichewaNzemaଓଡ଼ିଆਪੰਜਾਬੀPiemontèisΠοντιακάⵜⴰⵔⵉⴼⵉⵜTarandineрусскийसंस्कृतсаха тылаᱥᱟᱱᱛᱟᱞᱤ (संताली)सिंधीکوردی خوارگDavvisámegiellaKoyraboro SenniSängöⵜⴰⵛⵍⵃⵉⵜတႆးසිංහලᠰᡞᠪᡝSlovenčinaСрпски / srpskiSesothoSENĆOŦENSundaSvenskaŚlůnskiதமிழ்ತುಳುతెలుగుไทยትግርኛትግሬцӀаӀхна мизSetswanaChiTumbukaTwiⵜⴰⵎⴰⵣⵉⵖⵜудмуртУкраїнськаاردوOʻzbekchaꕙꔤTshiVenḓaVènetoWaaleWolofLikpakpaanlYorùbá中文中文(中国大陆)中文(简体)中文(繁體)中文(香港)中文(澳門)中文(马来西亚)中文(新加坡)中文(臺灣)Help इस समाचार को सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें डॉ. नवीन जोशी, नैनीताल। कण-कण में देवत्व के लिए प्रसिद्ध देवभूमि उत्तराखंड में कोटगाड़ी (Kotgadi) (कोकिला देवी) नाम की एक ऐसी देवी हैं, जिनके दरबार में कोर्ट सहित हर दर से मायूस हो चुके लोग आकर अथवा बिना आए, कहीं से भी उनका नाम लेकर न्याय की गुहार लगाते (स्थानीय भाषा में विरोधी के खिलाफ ‘घात’ डालते) हैं। कहते हैं कि माता कोटगाड़ी (Kotgadi) ‘कोट’ यानी कोर्ट में भी उद्घाटित न हो पाए न्याय को भी बाहर ‘गाड़’ यानी निकाल देती हैं। यानी जो फैसला कोर्ट में भी नहीं हो पाता, वह माता के दरबार में बिना दलील-वकील के हो जाता है। विरोधी दोषी हुआ तो वह उसे बेहद कड़ी सजा देती हैं। दोषी ही नहीं उसके प्रियजनों, पशुओं की जान तक ले लेती हैं, लेकिन यदि फरियादी ही दोषी हो और किसी अन्य पर झूठा दोष या आरोप लगा रहा हो, तो उसकी भी खैर नहीं। वह स्वयं भी माता के कोप से बच नहीं सकता। इसलिए लोग बहुत सोच समझकर ही माता के दरबार में न्याय की गुहार लगाते हैं। और जब हर ओर से हार कर उनका नाम लेते हैं, तो उन्हें अवश्य ही न्याय मिलता है।कोटगाड़ी (Kotgadi) माता का दरबार एक छोटे से मंदिर के रूप में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद में प्रसिद्ध पर्यटक स्थल चौकोड़ी के करीब कोटमन्या तथा मुन्स्यारी मार्ग के एक पड़ाव थल से 17-17 किमी की दूरी पर पाखू नामक के स्थान के पास कोटगाड़ी नाम के एक गांव में स्थित है। स्थानीय लोगों के अनुसार कोटगाड़ी (Kotgadi) मूलत: जोशी जाति के ब्राह्मणों का गांव था। एक दौर में माता कोटगाड़ी यहां स्वयं प्रकट हुई थीं और यहीं रहती थीं, तथा बोलती भी थीं। लिहाजा यह स्थान माता का शक्तिपीठ है। माता ने स्वयं स्थानीय वाशिंदों को पास के दशौली गांव के पाठक जाति के एक ब्राह्मण को यहां बुलाया था।https://youtube.com/shorts/_Aadfb88k9E कोटगाड़ी (Kotgadi) गांव के जोशी लोग माता के आदेश पर दशौली के एक पाठक पंडित को यहां लेकर आए, और उन्हें माता के मंदिर के दूसरी ओर के ‘मदीगांव” नाम के गांव में बसाया। इन्हीं पाठक पंडित परिवार को ही मंदिर में पूजा-पाठ कराने का अधिकार दिया गया। वर्तमान में उन पाठक पंडित की करीब 10 पीढ़ियों के उपरांत करीब 28 परिवार हो चुके हैं। इस तथ्य से मंदिर की प्राचीनता का अंदाजा लगाया जा सकता है। पाठक परिवार के लोग ही मंदिर में पूजा कराने का अधिकार रखते हैं। स्वयं के आचरण तथा साफ-सफाई व शुद्धता का बहुत कड़ाई से पालन करते हैं। परिवार में नई संतति अथवा किसी के मौत होने जैसी अशुद्धता की स्थिति में पास के घांजरी गांव के लोगों को अपनी जगह पूजा कराने की जिम्मेदारी देते हैं। लिहाजा एक परिवार के सदस्यों का करीब तीन से नौ माह में पूजा कराने का नंबर आता है। गांव के पास ही भंडारी ग्वल ज्यू का भी एक मंदिर है। कोटगाड़ी (Kotgadi) आने वाले लोगों के लिए भंडारी ग्वल ज्यू के मंदिर में भी शीष नवाना व खिचड़ी का प्रसाद चढ़ाना आवश्यक माना जाता है। कार्की लोग इस मंदिर के पुजारी होते हैं।‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। माता के बारे में मान्यता है कि वह यहां आए बिना भी पुकार सुन लेती हैं, और कड़ा न्याय करती हैं। इसी कारण माता पर न केवल लोगों का अटूट विश्वास वरन उनसे भय भी रहता है। कुमाऊं मंडल में अनेक गांवों के लोगों ने कोटगाड़ी (Kotgadi) माता के नाम पर इस भय मिश्रित श्रद्धा का सदुपयोग वनों-पर्यावरण को बचाने के लिए भी किया है। गांवों के पास के वनों को माता को चढ़ा दिया गया है, जिसके बाद से कोई भी इन वनों से एक पौधा भी काटने की हिम्मत नहीं करता।(Kotgadi) दिव्य अनुभवों से परिपूर्ण है यह नाग भूमिशाम ढलने के बाद कोटगाड़ी (Kotgadi) गांव के आमने-सामने की पहाड़ियां फन उठाए नागों की तरह नजर आती हैं। वैसे भी यह भूमि प्राचीन काल में नागों, नागराजों की भूमि बताई जाती है। यहां पास में बेरीनाग नाम का स्थान बेड़ीनाग का अपभ्रंश बताया जाता है, जबकि कोटगाड़ी (Kotgadi) मंदिर की ओर के पहाड़ पर काफी ऊंचाई में कालीनाग का तथा सामने के पहाड़ों में पिंगली नाग, धौलीनाग और कोटमन्या से आने वाले मार्ग पर लोहाथल के पास वासुकी नाग के मंदिर स्थित हैं। कालिया नाग का प्राचीन मंदिरएक दंत कथा के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण ने बालपन में कालिया नाग का मर्दन करने के उपरांत कालिया व उसकी पत्नियों की अनुनय-विनय पर उन्हें कोटगाड़ी (Kotgadi) माता की शरण में भेजकर अभयदान प्रदान किया था। कालिया नाग का प्राचीन मंदिर कोटगाड़ी (Kotgadi) से थोड़ी ही दूर पर पर्वत की चोटी पर स्थित है। बताया जाता है कि इस मंदिर की चोटी से कभी भी गरुड़ आर पार नहीं जा सकते। इस मंदिर की शक्ति पर किसी शस्त्र के वार का गहरा निसान स्पष्ट रुप से दिखाई देता है।एक प्राचीन कथा के अनुसार जब योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने बालपन में कालिया नाग का मर्दन किया और उसे जलाशय छोडने को कहा तो कालिया नाग व उसकी पत्नियों ने भगवान कृष्ण से क्षमा याचना कर प्रार्थना की कि, हे प्रभु हमें ऐसा सुगन स्थान बताएं जहाँ हम पूर्णतः सुरक्षित रह सकें तब भगवान श्रीकृष्ण ने इसी कष्ट निवारिणी माता की शरण में कालिया नाग को भेजकर अभयदान प्रदान किया था।कालिया नाग का प्राचीन मंदिर कोटगाड़ी (Kotgadi) से थोडी ही दूरी पर पर्वत की चोटी पर स्थित है जिसे स्थानीय भाषा में ‘काली नाग’क डान’ कहते हैं। बताते हैं कि पर्वत की चोटी पर स्थित इस मदिर को कभी भी गरुड़ आर-पार नही कर सकते।एक किवदंती के अनुसार एक गाय इस शक्ति लिंग पर आकर अपना दूध स्वयं दुहा कर चली जाती थी। गाय की मालकिन गाय के दूध न देने से परेशान थी, एक दिन वह गाय के पीछे यहां पहुंची और अपनी गाय को अपना दूध वहां दुहाते देखकर उसने धारदार हथियार से उस शक्ति पर वार कर डाला। इससे पाताल, स्वर्ग व पृथ्वी की ओर खून की तीन धारायें बह निकलीं। पृथ्वी पर खून की धारा प्रतीक स्वरुप आज भी यहां दिखती है। कहा जाता है कि यहां स्थित शक्ति लिंग पर स्थानीय श्रद्धालु दिन भर दूध-दही चढ़ाकर भर देते हैं, लेकिन सारा दूध-दही शीघ्र ही गायब हो जाता है। नाग पंचमी के दिन हर वर्ष यहां अवश्य ही वर्षा होती है। महिलाओं का इन नाग मंदिरों में एक सीमा से आगे जाना वर्जित होता है, जिसे श्राप का प्रभाव कहा जाता है। मंदिर के पास ही माता गंगा का एक पावन जल कुण्ड है, मान्यता है, कि ब्रहम व मूहत में माता कोकिला इस जल से स्नान करती है। सच्चे श्रद्वालुओं को इस पहर में यहां पर माता के वाहन शेर के दर्शन होते है, इस प्रकार की एक नही सैकडों दंत कथाएं इस शक्तिमयी देवी के बारे प्रचलित है, जो माता कोकिला के विशेष महात्मय को दर्शाती हैं। इस दरबार में माता कोकिला के साथ उनके बाण मसूरिया, उडर, घशाण आदि अनेकों देवताओं की पूजा भी की जाती है। स्थानीय गाँव के पुजारी पाठक मंदिर में पूजा अर्चना का कार्य सम्पन करते है। भण्डारी, गोलू चोटिया व वाण के पुजारी कार्की लोग हैं।कोटगाड़ी (Kotgadi) मंदिर के पास अनेक जलधारे हैं, जिनसे सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा पानी आता है, और हर मौसम में इनसे बिना परेशान हुए नहाया जा सकता है। धारों के ऊपर कहीं जल श्रोत नहीं दिखते। कहते हैं कि प्रतिदिन ब्रह्म मूहूर्त में माता कोकिला इन्हीं जल धारों में स्नान करने आती हैं। अनेक सच्चे श्रद्वालुओं को अक्सर इस समय माता के वाहन शेर के दर्शन होते हैं। कुंड में अनेक बार नागों के दर्शन भी होते हैं।सुप्रीम कोर्ट की मान्यता लिये है कोटगाड़ी (Kotgadi) देवी का दरबारकोटगाड़ी (Kotgadi) देवी का दरबार सुप्रीम कोर्ट की मान्यता लिये है, ऐसा कहना अतिशयोक्ति न होगा। नाम लेने अथवा डाक द्वारा भी मंदिर के नाम पर पत्र भेजने मात्र से कोटगाड़ी (Kotgadi) देवी पुकार सुन लेती हैं, और सच्चा न्याय करते हुए चमत्कार दिखाती हैं। इनके शरणागत सब प्रकार से मनोंवाछित फल प्राप्त करते हैं। इनके बारे में एक दंत कथा भी काफी प्रसिद्ध है कि माता के प्रभाव से आजादी के पूर्व अग्रेजों के शासन काल में एक जज ने जटिल यात्रा कर यहां पहुंचकर क्षमा याचना की। इसके पीछे कारण बताया जाता है कि क्षेत्र के एक निर्दोष व्यक्ति को जब अदालत से भी न्याय नही मिला तो सामाजिक दंश से आहत होकर स्वंय को निर्दोश साबित करने के लिए उसने करुण पुकार के साथ भगवती कोटगाड़ी (Kotgadi) के चरणों में विनती की। भक्त की विनती के फलस्वरुप चमत्कारिक घटना के साथ कुछ समय के बाद जज ने यहां पहुचकर उसे निर्दोष बताया। इस तरह के एक नही सैकडो चमत्कार देवी के इस दरबार से जुड़े हुए हैं। एक अन्य जनश्रुति के अनुसार जब सभी देवता कुछ विशेष परिस्थितियों में स्वयं को न्याय देने व फल प्रदान करने में असमर्थ मानते है, तो ऐसी स्थिति में कोकिला-कोटगाड़ी (Kotgadi) देवी तत्काल न्याय देने को तत्पर रहती है। हिमालय के देवी शक्ति पीठों में कोकिला माता का महात्म्य सबसे निराला है, सिद्धि की अभिलाशा रखने वाले तथा ऐश्वर्य की कामना करने वाले लोगों के लिए भी यह स्थान त्वरित फलदायक है। देवी के उपासक इन्हें विश्वेश्वरी, चन्दि्रका, कोटवी, सुगन्धा, परमेश्वरी, चण्डिका, वन्दनीया, सरस्वती, अभया प्रचण्डा, देवमाता, नागमाता, प्रभा आदि अनेक नामों से भी पुकारते है।इस पौराणिक मंदिर में शक्ति कैसे और कब अवतरित हुई इसकी कोई प्रमाणिक जानकारी नही मिलती है, लेकिन दंत कथाओं में कई भक्त मानते हैं कि यह देवी नेपाल से यहां आई हैं। इनके विश्राम स्थल अनेकों स्थानों पर है, जहां नित्य इनकी पूजा होती है कोट का तात्पर्य अदालत से माना जाता है, पीड़ितों को तत्काल न्याय देने के कारण ही इस देवी को न्याय की देवी माना जाता है, और इसी भाव से इनकी पूजा प्रतिष्ठा सम्पन कराने की परम्परा है। कुमाऊ मण्डल में जनपद नैनीताल के हरतोला क्षेत्र में स्थित कोकिला वन की कोकिला माता इन्ही का रुप मानी जाती है, दारमा घाटी के कनार क्षेत्र में भी माता विराजमान है, भक्तों का यह भी मत है, कि कत्यूर घाटी से इन्हें इनके भक्तजन चंदवशीय राजा लोग नेपाल को ले जा रहे थे, लेकिन माँ को यह स्थान भा गया और वे यही स्थापित हो गयी माता की कृपा से ही कालीय नाग को भद्रनाग नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। भद्रनाग की महिमा का वर्णन मानस खण्ड के 51वे अध्याय में आता है। इन्होंने माता भद्रकाली की घोर आराधना करके विशेष सिद्वियां प्राप्त की। माता कोकिला व माता भद्रकाली के पूजन के साथ भद्रनाग व कालिया नाग के पूजन से सर्पभय दूर होता है। ज्ञातव्य हो कि माता भद्रकाली का मंदिर बागेश्वर जनपद के कांडा नामक स्थान से लगभग चार पाँच किमी की दूरी पर स्थित है, यह अद्भूत क्षेत्र है, मन्दिर के नीचे गुफा है जिसमें शिव व शक्ति दोनों विराजमान है, कोकिला माता की छत्रछाया में विराजमान काली नाग को भी काली का परम उपासक माना जाता है। “काली सम्पूज्यते विप्रा कालीयने महात्मना” (81/11 (मानस खण्ड) कुल मिलाकर कोकिला माता का दरबार श्रद्वा व भक्ति का संगम है, जो सदियों से पूज्यनीय है।आज के अन्य एवं अधिक पढ़े जा रहे ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। यदि आपको लगता है कि ‘नवीन समाचार’ अच्छा कार्य कर रहा है तो यहां क्लिक कर हमें सहयोग करें..यहां क्लिक कर हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें। यहां क्लिक कर हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से, यहां क्लिक कर हमारे टेलीग्राम पेज से और यहां क्लिक कर हमारे फेसबुक ग्रुप में जुड़ें। हमारे माध्यम से अमेजॉन पर सर्वाधिक छूटों के साथ खरीददारी करने के लिए यहां क्लिक करें।शिखर-भनार व सनगाड़ के देव मंदिर भी अटूट आस्था के केंद्रकोटगाड़ी (Kotgadi) के साथ ही निकटवर्ती शिखर, भनार एवं सनगाड़ नाम के स्थानों पर स्थित देव मंदिर भी अटूट आस्था के केंद्र हैं। ऊंचे शिखर पर ‘शिखर” नाम के स्थान पर भगवान मूल नारायण का मंदिर है। कहते हैं कि वह मूल नक्षत्र में उत्पन्न हुए थे, इस कारण उनके माता-पिता ने उनका परित्याग कर दिया था। हिमालय पर्वत पर रहने वाली उनकी बुआ (पर्वत स्वरूप) नंदा देवी ने उन्हें शिखर नाम के पर्वत पर स्थापित कराया। कहा जाता है कि बाद में कभी एक भोटिया-शौका जाति का चरवाहा अपनी भेड़ों को चराता हुआ पहुंचा। उसने अपनी सभी भेड़ों के सामान ढोने के ‘करवज” एक पत्थर पर लटकाए थे। तभी एक चमत्कार हुआ। उसके करवजों का ढेर पत्थर में तथा भेड़ें, मृग, पक्षी आदि में बदल गए। भेड़ों के गायब हो जाने पर उसने ईश्वर को याद किया, तब भगवान मूल नारायण ने उसे वहीं अपना मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया। इसी लिए इस मंदिर में अब भी तिब्बती-बौद्ध वास्तु शैली के दर्शन होते हैं, तथा कहा जाता है कि यहां के जंगलों में अब भी कई पशु-पक्षी बकरियों-भेड़ों की तरह ‘अईं हो ले ले…” जैसे बोल सुनाई पड़ते हैं। कहते हैं कि मूल नारायण जी के दो पुत्र थे। इनमें से बड़े बजैंण जी भनार नाम के मंदिर में तथा छोटे भगवान विष्णु के अवतार कहे जाने वाले श्री श्री 1008 नौलिंग देव, सनगाड़ नाम के स्थान पर मंदिर में स्थापित हैं। सनगाड़ का मंदिर कोटमन्या से 13 किमी की दूरी पर स्थित है। श्रत्रिय-धामी जाति के लोगों को यहां करीब पांच शताब्दियों से पूजा-पाठ कराने का अधिकार है। नौलिंग देव से संबंधित एक सनगड़िया नाम के राक्षस की कहानी भी क्षेत्र में प्रचलित है। कहते हैं कि दिन-दहाड़े स्थानीय लोगों को खा जाने वाले इस भयंकर जटाओं वाले राक्षस को नौलिंग देव ने अनेक देवगणों की उपस्थिति में सात दिन-सात रात लगातार लड़ते हुए हराया था। उसकी खोपड़ी जटाओं सहित उखाड़ डाली थी, और उसे अपने मंदिर के पास ही स्थापित कराया था। शारदीय नवरात्र के दिनों में क्षेत्र के बहुत बड़े मेले के लिए भी सनगाड़ का नौलिंग मंदिर प्रसिद्ध है। (Kotgadi) (Kotgadi) यह भी पढ़ें: भूमिया, ऐड़ी, गोलज्यू, कोटगाड़ी (Kotgadi) ने भी किया पलायन आज के अन्य एवं अधिक पढ़े जा रहे ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। यहां क्लिक कर हमारे व्हाट्सएप चैनल से, फेसबुक ग्रुप से, गूगल न्यूज से, टेलीग्राम से, कू से, एक्स से, कुटुंब एप से और डेलीहंट से जुड़ें। अमेजॉन पर सर्वाधिक छूटों के साथ खरीददारी करने के लिए यहां क्लिक करें। यदि आपको लगता है कि ‘नवीन समाचार’ अच्छा कार्य कर रहा है तो हमें सहयोग करें..। (Kotgadi) Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook Click to share on X (Opens in new window) X Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...Related Post navigation📅🌧️🏔️🕯️18 सितम्बर : नैनीताल के साथ पूरे उत्तराखंड वासियों वालों के लिए सबक लेने का दिन संचार, समाचार लेखन, संपादन, विज्ञापन, फीचर व ब्रांड प्रबंधन