EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / کٲشُرКыргызKurdîKʋsaalLëblaŋoлаккулезгиLugandaLingálaລາວلۊری شومالیlüüdidxʷləšucidmadhurâमैथिलीŊmampulliMalagasyKajin M̧ajeļമലയാളംМонголᠮᠠᠨᠵᡠManipuriма̄ньсиဘာသာမန်mooreमराठीမြန်မာ閩南語 / Bân-lâm-gú閩南語(漢字)閩南語(傳統漢字)Bân-lâm-gú (Pe̍h-ōe-jī)Bân-lâm-gú (Tâi-lô)KhoekhoegowabNorsk (bokmål)नेपालीनेपाल भाषाli nihanawdmNorsk (nynorsk)ngiembɔɔnߒߞߏSesotho sa LeboaThok NaathChichewaNzemaଓଡ଼ିଆਪੰਜਾਬੀPiemontèisΠοντιακάⵜⴰⵔⵉⴼⵉⵜTarandineрусскийसंस्कृतсаха тылаᱥᱟᱱᱛᱟᱞᱤ (संताली)सिंधीکوردی خوارگDavvisámegiellaKoyraboro SenniSängöⵜⴰⵛⵍⵃⵉⵜတႆးසිංහලᠰᡞᠪᡝSlovenčinaСрпски / srpskiSesothoSENĆOŦENSundaSvenskaŚlůnskiதமிழ்ತುಳುతెలుగుไทยትግርኛትግሬцӀаӀхна мизSetswanaChiTumbukaTwiⵜⴰⵎⴰⵣⵉⵖⵜудмуртУкраїнськаاردوOʻzbekchaꕙꔤTshiVenḓaVènetoWaaleWolofLikpakpaanlYorùbá中文中文(中国大陆)中文(简体)中文(繁體)中文(香港)中文(澳門)中文(马来西亚)中文(新加坡)中文(臺灣)Help इस समाचार को सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें यहाँ क्लिक कर सीधे संबंधित को पढ़ें Toggleडॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 22 अगस्त 2023 (All About Personality of Girish Tiwari Girda)।(Girda) गिर्दा पर बनी पहली फिल्म:सलाम गिर्दा :फक्कड़ दा अलविदा….बेहद विस्तृत था गिर्दा का फलकप्रदेश के प्रति गहरी पीड़ा थी गिर्दा के मन मेंकैसा हो उत्तराखंड, कैसी हो राजधानी हमारी…गिर्दा का विकास का मॉडलसंस्कृति पर गिर्दाहोली हुड़दंग नहीं सामूहिक अभिव्यक्तियों का त्यौहारगिर्दा की चुनावी कविताः रंगतै न्यारीसचिन को सांस्कृतिक पुरूष मानते थे गिर्दाआखिर सच साबित हो गई गिर्दा की गैरसैंण के जीआईसी में राज्य की विधान सभा की कल्पनागिर्दा की धर्मपत्नी ने कहा, ‘मृत्यु के आठ वर्ष बाद पहली बार मिला वास्तविक सम्मान’यह भी पढ़ें : ऑनलाइन मनायी गई गिर्दा की पुण्यतिथि, हुई मानपत्र व गिर्दा की आवाज में अदम गौंडवी की कविता की प्रस्तुति.. (All About Personality of Girish Tiwari Girda)Like this:Relatedडॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 22 अगस्त 2023 (All About Personality of Girish Tiwari Girda)।‘बबा, मानस को खोलो, गहराई में जाओ, चीजों को पकड़ो.. यह मेरी व्यक्तिगत सोच है, मेरी बात सुनी जाए लेकिन मानी न जाए….’ प्रदेश के जनकवि, संस्कृतिकर्मी, आंदोलनकारी, कवि, लेखक गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ (जन्म 9 सितंबर, 1945 को अल्मोड़ा के ज्योली हवालबाग गांव में हंसादत्त तिवाडी और जीवंती तिवाडी के घर-मृत्यु 22 अगस्त 2010 को हल्द्वानी में ) जब यह शब्द कहते थे, तो पीछे से लोग यह चुटकी भी लेते थे कि ‘तो बात कही ही क्यों जाए’ लेकिन यही बात जब वर्ष 2009 की होली में ‘स्वांग’ परंपरा के तहत युगमंच संस्था के कलाकारों ने उनका ‘स्वांग’ करते हुए कही तो गिर्दा (Girda) का कहना था कि यह उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है। और शायद इसी सबसे बड़े पुरस्कार के वह इंतजार में थे, और इसे लेने के बाद वह दुनिया के रंगमंच से विदा ही हो लिए। (Girda) गिर्दा पर बनी पहली फिल्म:सलाम गिर्दा : र्यक्रम मगिर्दा क्या थे, इस सवाल को जितने लोगों से पूछा जाए उतने जवाब मिलते है। गिर्दा एक आंदोलनकारी थे, उनमें गजब की जीवटता थी। शारीरिक रूप से काफी समय से अस्वस्थ थे, पर उनमें गजब की जीवंतता थी। वह ‘हम लड़ते रयां भुला, हम लड़ते रुलो’और ‘ओ जैता एक दिन त आलो उ दिन यीं दुनीं में’ गाते हुए हमेशा आगे देखने वाले थे। उनमें गजब की याददाश्त थी, वह 40 वर्ष पूर्व लिखी अपनी कविताओं की एक-एक पंक्ति व उसे रचने की पृष्ठभूमि बता सकते थे। वह लोक संस्कृति के इतिहास के ‘जीवित एनसाइक्लोपीडिया’ थे। लोक संस्कृति में कौन से बदलाव किन परिस्थितियों में आए इसकी तथ्य परक जानकारी उनके पास होती थी। कुमाऊंनीं लोक गीतों झोड़ा चांचरी में मेलों के दौरान हर वर्ष देशकाल की परिस्थितियों पर पारंपरिक रूप से जोड़े जाने वाले ‘जोड़ों’ की परंपरा को उन्होंने आगे बढ़ाया। चाहे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश व केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को जूता मारे जाने की घटना पर उनकी कविता ‘ये जूता किसका जूता है’ हो, जिसे सुनाते हुए वह जोर देकर कहते थे कि जूता मारा नहीं वरन ‘भनकाया’ गया है, और ‘भनकाना’ शब्द के भीतर का गुस्सा समझाते थे। वहीं होली के दौरान आए त्रिस्तरीय चुनावों पर उन्होंने कविता लिखी थी ‘ये रंग चुनावी रंग ठैरा..’। वह अपनी कविताओं में आगे भी तत्कालीन परिस्थितियों को जोड़ते हुए चलते थे। गिर्दा सबकी पहुंच में थे, कमोबेश सभी ने उनके भीतर की विराटता से अपने लिए कुछ न कुछ लिया और गिर्दा ने भी बिना कुछ चाहे किसी को निराश भी नहीं किया। उनके कटाक्ष बेहद गहरे वार करते थे, ‘बात हमारे जंगलों की क्या करते हो, बात अपने जंगले की सुनाओ तो कोई बात करें’। अपनी कविता ‘जहां न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा’ से उन्होंने देश की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोली तो ‘मेरि कोसी हरै गे’ के जरिए वह नदी व पानी बचाओ आंदोलन से भी जुड़े। एक दार्शनिक के रूप में भी वह हमेशा अपनी ही इन पंक्तियों के साथ याद किए जाएंगे, ‘दिल लगाने में वक्त लगता है, टूट जाने में वक्त नहीं लगता, वक्त आने में वक्त लगता है, वक्त जाने में कुछ नहीं लगता’ अफसोस कि वह गए है तो जैसे एक बड़े ‘वक्त’ को भी अपने साथ ले चले हैं।फक्कड़ दा अलविदा…. गिर्दा में अजीब सा फक्कड़पन था। वह हमेशा वर्तमान में रहते थे, भूत उनके मन मस्तिक में रहता था और नजरे हमेशा भविष्य पर। बावजूद वह भविष्य के प्रति बेफिक्र थे। वह जैसे विद्रोही बाहर से थे कमोबेश वैसा ही उन्होंने खासकर अपने स्वास्थ्य व शरीर के साथ किया। इसी कारण कई वर्षों से शरीर उन्हें जवाब देने लगा था, लेकिन उन्होंने कभी किसी से किसी प्रकार की मदद नहीं ली। वरन वह खुद फक्कड़ होते हुए भी दूसरों पर अपने ज्ञान के साथ जो भी संभव होता लुटाने से परहेज न करते। ऐसा ही एक वाकया लखीमपुर खीरी में हुआ था जब एक चोर उनकी गठरी चुरा ले गया था तो उन्होंने उसे यह कहकर अपनी घड़ी भी सौप दी थी कि ‘यार, मुझे लगता है, मुझसे ज्यादा तू फक्कड़ है।’ गिर्दा ने आजीविका के लिए लखनऊ में रिक्शा भी चलाया और लोनिवि में वर्कचार्ज कर्मी, विद्युत निगम में क्लर्क के साथ ही आकाशवाणी से भी संबद्ध रहे। पूरनपुर (यूपी) में उन्होंने नौटंकी भी की और बाद में सन् 1967 से गीत व नाटक प्रभाग भारत सरकार में नौकरी की और सेवानिवृत्ति से चार वर्ष पूर्व 1996 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। वर्ष 2005 में अल्मोड़ा जनपद के हवालबाग के निकट ज्योली गांव में पंडित हंसादत्त तिवाड़ी व जीवंती तिवाड़ी के उच्च कुलीन घर में जन्मे गिर्दा का यह फक्कड़पन ही था कि उत्तराखंड के एक-एक गांव की छोटी से छोटी भौगोलिक व सांस्कृतिक जानकारी के ‘जीवित इनसाइक्लोपीडिया’ होने के बावजूद उन्हें अपनी जन्म तिथि का ठीक से ज्ञान नहीं था। वह ‘आदि विद्रोही’ भी थे। उन्होंने आंदोलनों को भी सांस्कृतिक रंग देने की अनूठी पहल की। यहां तक कि होली जैसे रंगों के त्योहार को भी उन्होंने शासन सत्ता पर कटाक्ष करने का अवसर बना दिया। ‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। 1977 में केंद्र सरकार की नौकरी में होने के बावजूद वह वनांदोलन में न केवल कूदे वरन उच्च कुलीन ब्राह्मण होने के बावजूद ‘हुड़का’ बजाते हुए सड़क पर आंदोलन की अलख जगाकर औरों को भी प्रोत्साहित करने लगे। इसी दौरान नैनीताल क्लब को छात्रों द्वारा जलाने पर गिर्दा हल्द्वानी जेल भेजे गए। इस दौरान उनके फक्कड़पन का आलम यह था कि वह मल्लीताल में नेपाली मजदूरों के साथ रहते थे। उत्तराखंड आंदोलन के दौर में गिर्दा कंधे में लाउडस्पीकर थाम ‘चलता फिरता रेडियो’ बन गए। वह रोज शाम तल्लीताल डांठ पर आंदोलनात्मक गतिविधियों का ‘नैनीताल बुलेटिन’ पड़ने लगे। उन्होंने हिंदी, उर्दू, कुमाऊनीं व गढ़वाली काव्य की रिकार्डिंग का भी अति महत्वपूर्ण कार्य किया। यह भी पढ़ें : दो बच्चों की मां का भतीजे ने चुराया दिल, प्रेम विवाह कर दोनों घर चलाने बन गए 'बंटी-बबली' जैसे चोर और….वहीं भारत और नेपाल की साझा संस्कृति के प्रतीक कलाकार झूसिया दमाई को वह समाज के समक्ष लाए और उन पर हिमालय संस्कृति एवं विकास संस्थान के लिए स्थाई महत्व के कार्य किये। जुलाई 2007 में वह डा. शेखर पाठक व नरेंद्र नेगी के साथ उत्तराखंड के सांस्कृतिक प्रतिनिधि के रूप में ‘उत्तराखंड ऐसोसिएशन ऑफ नार्थ अमेरिका’ के आमंत्रण पर अमेरिका गए थे जहां नेगी व उनकी जुगलबंदी ‘ज्योंला-मुरुली’ की जोड़ी की तरह काफी चर्चित व संग्रहणीय रही थी। उनका व्यक्तित्व वाकई बहुआयामी व विराट था। प्रदेश के मूर्धन्य संस्कृति कर्मी स्वर्गीय बृजेन्द्र लाल साह ने उनके बारे में कहा था, ‘मेरी विरासत का वारिश गिर्दा है।’ जबकि उनके निधन पर संस्कृतिकर्मी प्रदीप पांडे के मुंह से निकला था, ’अब जब गिर्दा चले गए है तो प्रदेश की संस्कृति का अगला वारिश ढूंढ़ना मुश्किल होगा। आगे हम संस्कृति और आंदोलनों के इतिहास को जानने और दिशा-निदश लेने कहां जाएंगे।‘बेहद विस्तृत था गिर्दा का फलक गिर्दा का फलक बेहद विस्तृत था। जाति, धर्म की सीमाओं से ऊपर वह फैज के दीवाने थे। एक कालजयी लेखक, कवि, साहित्यकार के रूप में उन्होंने फैज की गजल ’लाजिम है कि हम भी देखेंगे, वो दिन जिसका वादा है‘ से प्रेरित होकर अपनी मशहूर कविता ‘ओ जैता एक दिन त आलो, उ दिन य दुनी में’ तथा फैज की ही एक अन्य गजल ‘हम मेहनतकश जब दुनिया से अपना हिस्सा मागेंगे..’ से प्रेरित होकर व समसामयिक परिस्थितियों को जोड़ते हुए ‘हम ओड़ बारुड़ि, ल्वार, कुल्ली कभाड़ी, जै दिन यो दुनी बै हिसाब ल्यूंलो, एक हाङ नि मांगुल, एक फाङ न मांगुंल, सबै खसरा खतौनी हिसाब ल्यूंलो’ जैसी कविता लिखी। वह कुमाऊंनीं के आदि कवि कहे जाने वाले ‘गौर्दा’ से भी प्रभावित थे। गौर्दा की कविता से प्रेरित होकर उन्होंने वनांदोलन के दौरान ‘आज हिमाल तुमूकें धत्यूछौ, जागो जागो हो मेरा लाल..’लिखी। महिलाओं की पहली पत्रिका ‘उत्तरा’ को शुरू करने का विचार भी गिर्दा ने बाबा नागार्जुन के नैनीताल प्रवास के दौरान दिया था। वह नैनीताल समाचार, पहाड़, जंगल के दावेदार, जागर, उत्तराखंड नवनीत आदि पत्र- पत्रिकाओं से भी संबद्ध रहे। दुर्गेश पंत के साथ उनका ‘शिखरों के स्वर’ नाम से कुमाऊनीं काव्य संग्रह, ‘रंग डारि दियो हो अलबेलिन में’ नाम से होली संग्रह, ‘उत्तराखंड काव्य’ व डा. शेखर पाठक के साथ ‘हमारी कविता के आखर’ आदि पुस्तकें प्रकाशित हुई। वहीं एक नाटककार के रूप में गिर्दा का कई संस्थाओं से जुड़ाव था। वह प्रदेश की प्राचीनतम नाट्य संस्था युगमंच के संस्थापक सदस्यों में थे। युगमंच के पहले नाटक ‘अंधा युग’ के साथ ही ‘नगाड़े खामोश है’ व ‘थैक्यू मिस्टर ग्लाड’ उन्हीं ने निदशित किये।प्रदेश के प्रति गहरी पीड़ा थी गिर्दा के मन में‘हम भोले-भाले पहाड़ियों को हमेशा ही सबने छला है। पहले दूसरे छलते थे, और अब अपने छल रहे हैं। हमने देश-दुनिया के अनूठे ‘चिपको आन्दोलन’ वाला वनान्दोलन लड़ा, इसमें हमें कहने को जीत मिली, लेकिन सच्चाई कुछ और थी।’ गिर्दा को वनान्दोलन के परिणामस्वरूप पूरे देश के लिए बने वन अधिनियम से जनता के हक-हकूकों पर और अधिक पाबंदियां आयद कर दिए जाने की गहरी टीस थी। 1972 से शुरू हुऐ पहाड़ के एक छोटे से भूभाग का वन आंदोलन, चिपको जैसे विश्व प्रसिद्ध आंदोलन के साथ ही पूरे देश के लिए वन अधिनियम 1980 का प्रणेता भी रहा। लेकिन यह सफलता भी आंदोलनकारियों की विफलता बन गई। दरअसल शासन सत्ता ने आंदोलनकारियों के कंधे का इस्तेमाल कर अपने हक-हुकूक के लिए आंदोलन में साथ दे रहे पहाड़वासियों से उल्टे उनके हक-हुकूक और बुरी तरह छीन लिऐ थे, और आंदोलनकारियों को अपने ही लोगों के बीच गुनाहगार की तरह खड़ा कर दिया था। आंदोलन में अगली पंक्ति में रहे गिर्दा को आखिरी दिनों में यह टीस बहुत कष्ट पहुंचाती थी। उनके अनुसार ‘1972 में वनांदोलन शुरू होने के पीछे लोगों की मंशा अपने हक-हुकूकों को बेहतरी से प्राप्त करने की थी। यह वनों से जीवन-यापन के लिए अधिकार लेने की लड़ाई थी। सरकार स्टार पेपर मिल सहारनपुर को कौड़ियों के भाव यहां की वन संपदा लुटा रही थी। इसके खिलाफ आंदोलन हुआ, लेकिन जो वन अधिनियम मिला, उसने स्थितियों को और अधिक बदतर कर दिया। इससे जनभावनाऐं साकार नहीं हुईं। वरन, जनता की स्थिति बद से बदतर हो गई। तत्कालीन पतरौलशाही के खिलाफ जो आक्रोष था, वह आज भी है। औपनिवेषिक व्यवस्था ने ‘जन’ के जंगल के साथ ‘जल’ भी हड़प लिया। वन अधिनियम से वनों का कटना नहीं रुका, उल्टे वन विभाग का उपक्रम-वन निगम और बिल्डर वनों को वेदर्दी से काटने लगे। साथ ही ग्रामीण भी परिस्थितियों के वशीभूत ऐसा करने को मजबूर हो गऐ। अधिनियम का पालन करते हुए वह अपनी भूमि के निजी पेड़ों तक को नहीं काट सकते है। उन्हें हक-हुकूक के नाम पर गिनी चुनी लकड़ी लेने के लिए भी मीलों दूर जाना पड़ता है। इससे उनका अपने वनों से आत्मीयता का रिस्ता खत्म हो गया है। वन जैसे उनके दुश्मन हो गऐ, जिनसे उन्हें पूर्व की तरह अपनी व्यक्तिगत जरूरतों की चीजें तो मिलती नहीं, उल्टे वन्यजीव उनकी फसलों और उन्हें नुकसान पहुंचा जाते हैं। इसलिऐ अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ग्रामीण महिलाऐं वनाधिकारियों की नजरों से बचने के फेर में बड़े पेड़ों की टहनियों को काटने की बजाय छोटे पेड़ों को जल्द काट गट्ठर बना उनके निसान तक छुपा देती हैं। इससे वनों की नई पौध पैदा ही नहीं हो रही। पेड़-पौधों का चक्र समाप्त हो गया है। अब लोग गांव में अपना नया घर बनाना तो दूर उनकी मरम्मत तक नहीं कर सकते। लोगों का न अपने निकट के पत्थरों, न लकड़ी की ‘दुंदार’, न ‘बांस’ और न छत के लिऐ चौड़े ‘पाथरों’ पर ही हक रह गया है। पास के श्रोत का पानी भी ग्रामीण गांव में अपनी मर्जी से नहीं ला सकते। अधिनियम ने गांवों के सामूहिक गौचरों, पनघटों आदि से भी ग्रामीणों का हक समाप्त करने का शडयंत्र कर दिया। उनके चीड़ के बगेटों से जलने वाले आफर, हल, जुऐ, नहड़, दनेले बनाने की ग्रामीण काष्ठशालायें, पहाड़ के तांबे के जैसे परंपरागत कारोबार बंद हो गऐ। लोग वनों से झाड़ू, रस्सी को ‘बाबीला’ घास तक अनुमति बिना नहीं ला सकते। यहां तक कि पहाड़ की चिकित्सा व्यवस्था का मजबूत आधार रहे वैद्यों के औषधालय भी जड़ी बूटियों के दोहन पर लगी रोक के कारण बंद हो गऐ। दूसरी ओर वन, पानी, खनिज के रूप में धरती का सोना बाहर के लोग ले जा रहे हैं, और गांव के असली मालिक देखते ही रह जा रहे हैं। गिर्दा वन अधिनियम के नाम पर पहाड़ के विकास को बाधित करने से भी अत्यधिक चिंतित थे। उनका मानना था कि विकास की राह में अधिनियम के नाम पर जो अवरोध खड़े किऐ जाते हैं उनमें वास्तविक अड़चन की बजाय छल व प्रपंच अधिक होता है। जिस सड़क के निर्माण से राजनीतिक हित न सध रहे हों, वहां अधिनियम का अड़ंगा लगा दिया जाता है।कैसा हो उत्तराखंड, कैसी हो राजधानी हमारी…राज्य आन्दोलन से अपना नया राज्य हासिल करने पर बकौल गिर्दा ‘कुछ नहीं बदला कैसे कहूँ, दो बार नाम बदला-अदला, चार-चार मुख्यमंत्री बदले, पर नहीं बदला तो हमारा मुकद्दर, और उसे बदलने की कोशिश तो हुई ही नहीं।’ उनकी तर्कशक्ति लाजबाब थी। वह किसी भी मसले पर एक ओर खड़े होने के बजाय दूसरी तरफ का झरोखा खोलकर भी झांकते थे। राज्य की राजधानी के लिए गैरसैण समर्थक होने के बावजूद उनका कहना था ‘हम तो अपनी औकात के हिसाब से गैरसैण में छोटी डिबिया सी राजधानी चाहते थे, देहरादून जैसी ही ‘रौकात’ अगर वहां भी करनी हो तो उत्तराखंड की राजधानी को लखनऊ से भी कहीं दूर ले जाओ’। यह कहते हुए वह खास तौर पर ‘औकात’ और ‘रौकात’ शब्दों पर खास जोर देते थे। वह समझाते थे, ‘हमने गैरसैण राजधानी इसलिए माँगी थी ताकि अपनी ‘औकात’ के हिसाब से राजधानी बनाएं, छोटी सी ‘डिबिया सी’ राजधानी, हाई स्कूल के कमरे जितनी ‘काले पाथर’ के छत वाली विधान सभा, जिसमें हेड मास्टर की जगह विधान सभा अध्यक्ष और बच्चों की जगह आगे मंत्री और पीछे विधायक बैठते, इंटर कालेज जैसी विधान परिषद्, प्रिंसिपल साहब के आवास जैसे राजभवन तथा मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों के आवास। यह भी पढ़ें : 25 वर्षीय आईएएस अंशुल भट्ट ने ग्राहक बनकर पकड़ा बिना पंजीकरण के चल रहा होटल और किया सील, प्रश्न-जनपद मुख्यालय में प्रशासन ऐसी ही स्थितियों में मौन क्यों...?पहाड़ पर राजधानी बनाने के का एक लाभ यह भी कि बाहर के असामाजिक तत्व, चोर, भ्रष्टाचारी वहां गाड़ियों में उल्टी होने की डर से ही न आ पायें, और आ जाएँ तो भ्रष्टाचार कर वहाँ की सीमित सड़कों से भागने से पहले ही पकडे जा सकें। यह सुखद है कि स्वप्नदृष्टा गिर्दा की गैरसेंण के जीआईसी में विधान सभा बनाने की बात सच साबित हो गई हैं। आठ जून 2014 की शाम गैरसैंण के स्थानीय राजकीय इंटर कालेज के प्रांगण में विधान सभा की बैठक हो चुकी है।गिर्दा का विकास का मॉडलगिर्दा बड़े बांधों के घोर विरोधी थे, उनका मानना था कि हमें पारंपरिक घट-आफर जैसे अपने पुश्तैनी धंधों की ओर लौटना होगा। इसके लिए उनका मानना था सरकारों व राजनीतिक दलों को सत्ता की हिस्सेदारी से ऊपर उठाकर राज्य की अवधारण पर कार्य करना होगा। हमारे यहाँ सड़कें इसलिए न बनें कि वह बेरोजगारों के लिए पलायन के द्वार खोलें, वरन घर पर रोजगार के अवसर ले कर आयें। हमारा पानी, बिजली बनकर महानगरों को ही न चमकाए व ए.सी. ही न चलाये, वरन हमारे पनघटों, चरागाहों को भी ‘हरा’ रखे। हमारी जवानी परदेश में खटने की बजाये अपनी ऊर्जा से अपना ‘घर’ सजाये। हमारे जंगल पूरे एशिया को ‘प्राणवायु’ देने के साथ ही हमें कुछ नहीं तो जलौनी लकड़ी, मकान बनाने के लिए ‘बांसे’, हल, दनेला, जुआ बनाने के काम तो आयें। हमारे पत्थर टूट-बिखर कर रेत बन अमीरों की कोठियों में पुतने से पहले हमारे घरों में पाथर, घटों के पाट, चाख, जातर या पटांगड़ में बिछाने के काम तो आयें। हम अपने साथ ही देश-दुनियां के पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदेह पनबिजली परियोजनाओ से अधिक तो दुनियां को अपने धामों, अनछुए प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर स्थलों को पर्यटन केंद्र बना कर ही और अपनी ‘संजीवनी बूटी’ सरीखी जड़ी-बूटियों से ही कमा लेंगे। वह कहते थे, ‘हम अपने मानस को खोल अपनी जड़ों को भी पकड़ लेंगे, तो लताओं की तरह भी बहुत ऊंचे चले जायेंगे…….।’संस्कृति पर गिर्दावर्तमान हालातों व संस्कृति पर गिर्दा का जवाब रूंआसे स्वरों में ‘कौन समझे मेरी आंखों की नमी का मतलब, कौन मेरी उलझे हुए बालों की गिरह सुलझाऐ..’ से प्रारम्भ होता था। वह कहते थे, जहां देश के सबसे बड़े मंदिर (सवा अरब लोगों की आस्था के केंद्र) संसद में ‘नोटों के बंडल’ लहराने की संस्कति चल पड़ी हो, वहां अपनी संस्कृति की बात ही बेमानी है। उत्तराखंड भी इससे अछूता कैसे रह सकता है, इसकी बानगी पंचायत चुनावों में ही दिख जाती है। जबकि विधानसभा में कितनी तू-तू, मैं-मैं होती है, कई विपक्षी तो शायद वहां घुसने से पहले शायद लड़ने का मूंड ही बनाकर आते हैं। राज्य की राजधानी, परिसीमन, यहां के गाड़-गधेरों पर कोई बात नहीं करता। हां, थोड़ी बची खुची कृषि भूमि को बंजर कर ‘नैनो’ के लिए जरूर ‘नैन’ लगाऐ बैठे हैं। नदियों को 200 परियोजनाऐं बनाकर टुकड़े-टुकड़े कर बेच डाला है। खुद दिवालिया होते जा रहे अमेरिका से अभी भी मोहभंग नहीं हो रहा है। वह ही हमारी संस्कृति बनता जा रहा है। वह कहते थे, हमारी संस्कृति मडुवा, मादिरा, जौं और गेहूं के बीजों को भकारों, कनस्तरों और टोकरों में बचाकर रखने, मुसीबत के समय के लिए पहले प्रबंध करने और स्वावलंबन की रही है, यह केवल ‘तीलै धारु बोला’ तक सीमित नहीं है। आखिर अपने घर की रोटी और लंगोटी ही तो हमें बचाऐगी। गांधी जी ने भी तो ‘अपने दरवाजे खिड़कियां खुली रखो’ के साथ चरखा कातकर यही कहा था। वह सब हमने भुला दिया। आज हमारे गांव रिसोर्ट बनते जा रहे हैं। नदियां गंदगी बहाने का माध्यम बना दी हैं। स्थिति यह है कि हम दूसरों पर आश्रित हैं, और अपने दम पर कुछ माह जिंदा रहने की स्थिति में भी नहीं हैं। वह कहते हैं, ‘संस्कृति हवा में नहीं उगती, यह बदले माहौल के साथ बदलती है, और ऐसा बीते वर्ष में अधिक तेजी से हुआ है।’ हालांकि वह आशान्वित भी थे कि ‘संस्कृति कर्मी अपना काम कर रहे हैं। पूर्व में मेलों में तत्कालीन स्थितियों को ‘दिल्ली बै आई भानमजुवा, पैंट हीरो कट’ या ‘दिन में हैरै लेख लिखाई, रात रबड़ा घिस’ जैसे गीतों से प्रकट किया जाता था। इधर नंदा देवी के मेले के दौरान चौखुटिया के दल ने पंचायत चुनावों की स्थिति ‘गौनूं में चली देशि शराबा बजार चली रम, उम्मीदवार सकर है ग्येईं भोटर है ग्येईं कम’ के रूप में प्रकट कर इस परंपरा को कई वर्षों बाद फिर से जीवंत किया है। उनका दर्द इस रूप में भी फूटता था कि आज संस्कृति बनाने की तो फुरसत ही नहीं है, उसका फूहड़ रूप भी बच जाऐ तो गनीमत है।होली हुड़दंग नहीं सामूहिक अभिव्यक्तियों का त्यौहारगिर्दा होली को हुड़दंग नहीं सामूहिक अभिव्यक्तियों का त्यौहार मानते थे। गिर्दा के अनुसार होली में हुड़दंग का समावेश यूं तो हमेशा से ही रहा है, लेकिन कुमाऊं की होली की यह अनूठी विशेषता रही कि यहां हुड़दंग के बीच भी अभिव्यक्तियों की विकास यात्रा चलती रही है। कुमाउनीं के साथ हिंदी के भी प्राचीनतम (भारतेंदु हरिश्चंद्र से भी पूर्व के) कवि गुमानी पंत से होते हुऐ यह यात्रा गोर्दा एवं मौलाराम से होती हुई आगे बढ़ी, और इसे उन्होंने (‘गिर्दा’ ने) आगे बढ़ाया। गिर्दा अतीत से शुरू करते हुऐ बताते थे कि संचार एवं मनोरंजन माध्यमों के अभाव के दौर में कुमाऊंवासी भी मेलों के साथ होली का इंतजार करते थे। वर्ष भर की विशिष्ट घटनाओं पर उस वर्ष के बड़े मेलों के साथ ही होली में नई सामूहिक अभिव्यक्तियां निकलती थीं। उदाहरणार्थ 1919 में जलियावालां बाग में हुऐ नरसंहार पर कुमाऊं में गौर्दा ने 1920 की होलियों में ‘होली जलियांवालान बाग मची…’ के रूप में नऐ होली गीत से अभिव्यक्ति दी। इसी प्रकार गुलामी के दौर में ‘होली खेलनू कसी यास हालन में, छन भारत लाल बेहालन में….’ तथा ‘कैसे हो इरविन ऐतवार तुम्हार….’ जैसे होली गीत प्रचलन में आऐ। उत्तराखंड बनने के बाद गिर्दा ने इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए 2001 की होलियों में ‘अली बेर की होली उनरै नाम, करि लिया उनरि लै फाम, खटीमा मंसूरी रंगै ग्येईं जो हंसी हंसी दी गया ज्यान, होली की बधै छू सबू कैं…’ जैसी अभिव्यक्ति दी। इसी कड़ी में आगे भी चुनावों के दौर में भी गिर्दा ‘ये रंग चुनावी रंग ठहरा…’ जैसी होलियों का सृजन किया। ‘नैनीताल समाचार’ के प्रांगण में अपनी आखिरी होली में वह सर्वाधिक उत्साह का प्रदर्शन कर उपस्थित लोगों को आशंकित कर गये थे, बावजूद उन्होंने इस मौके पर कोई नईं होली पेश नहीं की। पूछने पर उनका जवाब था, ‘निराशा का वातावरण है, इस निराशा को शब्द देना ‘फील गुड’ के दौर में कठिन है।’गिर्दा की चुनावी कविताः रंगतै न्यारीचुनावी रंगै की रंगतै न्यारीमेरी बारी! मेरी बारी!! मेरी बारी!!!दिल्ली बै छुटि गे पिचकारी-आब पधानगिरी की छु हमरी बारी।चुनावी रंगै की रंगतै न्यारी।।मथुरा की लठमार होलि के देखन्छा,घर- घर में मची रै लठमारी-मेरी बारी! मेरी बारी!! मेरी बारी!!!आफी बंण नैग, आफी पैग,आफी बड़ा ख्वार में छापरि धरी, आब पधानगिरी की हमरि बारी।बिन बाज बाजियै नाचि गै नौताड़,‘खई- पड़ी’ छोड़नी किलक्वारी,आब पधानगिरी की हमरि बारी।रैली- थैली, नोट- भोटनैकि,मचि रै छौ मारामारी-मेरी बारी! मेरी बारी!! मेरी बारी!!!पांच साल त कान आंगुल खित,करनै रै हुं हुं ‘हुणणै’ चारी,मेरी बारी! मेरी बारी!! मेरी बारी!!!काटी में मुतण का लै काम नि ऐ जो,चोट माड़ण हुंणी भै बड़ी-मेरी बारी! मेरी बारी!! मेरी बारी!!!पाणि है पताल ऐल नौणि है चुपाणा,यसिणी कताई, बोलि- बाणी प्यारी-चुनावी रंगै कि रंगतै न्यारी।जो पुर्जा दिल्ली, जो फुर्कों चुल्ली, जैकि चलंछौ कितकनदारी,चुनावी रंगै कि रंगतै न्यारी।मेरी बारी! मेरी बारी!! मेरी बारी!!!चुनावी रंगै कि रंगतै न्यारी।सचिन को सांस्कृतिक पुरूष मानते थे गिर्दासुनने में यह अजीब लग सकता है, पर एक मुलाकात में संस्कृति की बात करने पर गिर्दा ने उस दिन का ‘राष्ट्रीय सहारा’ अखबार उठाया, और पहले पन्ने पर ही संस्कृति के दो रूप दिखा दिये। वहां एक ओर बकौल गिर्दा देश के सबसे बड़े सांस्कृतिक पुरूष, बल्ले में दम दिखाते 12 हजारी सचिन थे, तो दूसरी ओर हमारी दूसरों पर निर्भरता का प्रतीक दस हजार से नीचे गिरकर बेदम पड़ा सेंसेक्स। गिर्दा बोले, गुड़प्पा विश्वनाथ के बाद वह देश के सबसे बड़े सांस्कृतिक पुरूष नम्रता, शालीनता व देश की गरिमा के प्रतीक उस सचिन को नमन करते है, जिसे इतनी बड़ी उपलब्धि पर अपनी मां की कोख और गुरु याद आते हैं। वह कभी उपलब्धियों पर इतराते नहीं, और असफलताओं पर व्यथित नहीं होते। वह युवा पीढ़ी के लिए आदर्श हो सकते हैं। हमारी संस्कृति भी हमें यही तो सिखाती है। दूसरी ओर सेंसेक्स जो हमारी खोखली प्रगति का परिचायक है।यह भी पढ़ें : 'टीम इंडिया' में उत्तराखंड मूल के एक और युवा खिलाड़ी ‘बेबी एबी’-आयुष बड़ोनी की एंट्री, मौका मिलने-खेलने और गंभीर के पूर्व बयान पर चर्चा तेजआखिर सच साबित हो गई गिर्दा की गैरसैंण के जीआईसी में राज्य की विधान सभा की कल्पनाकहते हैं महान लोग स्वप्नदृष्टा होते हैं। इसीलिए उनके विचार कालजयी होते हैं, और उनके जाने के लंबे समय बाद भी प्रासंगिक रहते हैं, और इसलिए याद भी किए जाते हैं। गैरसैंण में उत्तराखंड की राजधानी होने के राज्य आंदोलनकारियों के ख्वाबों की ताबीर में शायद अभी वक्त लगे, लेकिन रविवार आठ जून 2014 की शाम गैरसैंण के स्थानीय राजकीय इंटर कालेज के प्रांगण में शुरू होने वाली विधान सभा की बैठक भी किसी सपने के सच साबित होने से कम नहीं है। उत्तराखंड के जनकवि कहे जाने वाले स्वर्गीय गिर्दा ठीक यही सपना देखते रहे थे। अपनी मृत्यु से कुछ समय पूर्व 24 अगस्त 2010 को उन्होंने मुझसे यह विचार साझा किया था कि राज्य की विधानसभा गैरसैंण के राजकीय इंटर कालेज में स्थापित होगी।डॉ. नवीन जोशी, नैनीताल। सामान्यतया गैरसैंण में राजधानी स्थापित कराने वाले राजनेता अपने समर्थकों को इसकी उपयोगिता नहीं समझा पाते हैं। यही कारण रहा कि राजनीतिक तौर पर गैरसेंण का विचार कभी वोटों में तब्दील नहीं हो पाया। लेकिन दार्शनिक व पहाड़ी अंदाज में गिर्दा ने अपनी रौ में कहा था-हमने गैरसैण राजधानी इसलिए माँगी थी ताकि अपनी ‘औकात’ के हिसाब से राजधानी बनाएं, छोटी सी ‘डिबिया सी’ राजधानी, ’हाई स्कूल या इंटर कालेज‘ के कमरे जितनी काले पाथर के छत वाली विधान सभा, जिसमें हेड मास्टर की जगह विधान सभा अध्यक्ष और बच्चों की जगह आगे मंत्री और पीछे विधायक बैठते, इंटर कोलेज जैसी ही विधान परिषद्, प्रिंसिपल साहब के आवास जैसे राजभवन तथा टीचरों जैसे मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों के आवास। पहाड़ पर राजधानी बनाने का एक लाभ यह भी होता कि बाहर के असामाजिक तत्व, चोर, भ्रष्टाचारी वहां गाड़ियों में उल्टी होने की डर से ही न आ पाते, और आ जाते तो भ्रष्टाचार, चोरी कर वहाँ की सीमित सड़कों से भागने से पहले ही पकडे़ जाते। लेकिन इसके साथ ही गिर्दा अपने ठेठ पहाड़ी अंदाज में यह भी कहते थे कि अगर गैरसैण राजधानी ले जाकर वहां भी देहरादून जैसी ही ‘रौकात’ करनी हो तो अच्छा है कि उत्तराखंड की राजधानी लखनऊ से भी कहीं दूर ले जाओ। यह कहते हुए वह खास तौर पर कविता के अंदाज में ‘औकात’ और ‘रौकात’ शब्दों पर खास जोर भी देते थे। बकौल गिर्दा यह थी अपने राज्य की अवधारणाजनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ बड़े बांधों के विरोधी थे, उनका मानना था कि हमें पारंपरिक घट-आफर जैसे अपने पुश्तैनी धंधों की ओर लौटना होगा। यह वन अधिनियम के बाद और आज के बदले हालातों में शायद पहले की तरह संभव न हो, ऐसे में सरकारों व राजनीतिक दलों को सत्ता की हिस्सेदारी से ऊपर उठाकर राज्य की अवधारणा पर कार्य करना होगा। वह कहते थे-हमारे यहाँ सड़कें इसलिए न बनें कि वह बेरोजगारों के लिए पलायन के द्वार खोलें, वरन घर पर रोजगार के अवसरों को ले कर आयें। हमारा पानी बिजली बनकर महानगरों को ही न चमकाए व एसी ही न चलाये, वरन हमारे पनघटों, चरागाहों को भी ‘हरा’ रखे। हमारी जवानी परदेश में खटने की बजाये अपनी ऊर्जा से अपना ‘घर’ भी संवारे व सजाये। हमारे जंगल पूरे एशिया को ‘प्राणवायु’ देने के साथ ही हमें कुछ नहीं तो जलौनी लकड़ी, मकान बनाने के लिए ‘बांसे’, हल, दनेला, जुआ बनाने के तो काम आयें। हमारे पत्थर टूट-बिखर कर रेत बन अमीरों की कोठियों में पुतने से पहले हमारे घरों में पाथर, घटों के पाट, चाख, जातर या पटांगड़ में बिछाने के काम आयें। हम अपने साथ ही देश-दुनियां के पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदेह पनबिजली परियोजनाओ से अधिक तो दुनियां को अपने धामों, अनछुए प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर स्थलों को पर्यटन केंद्र बना कर ही और अपनी ‘संजीवनी बूटी’ सरीखी जड़ी-बूटियों से ही कमा लेंगे। हम अपने मानस को खोल अपनी जड़ों को भी पकड़ लेंगे, तो लताओं की तरह भी बहुत ऊंचे जा पायेंगे। ‘गिरदा’ ने 28 नवम्बर 1977 को हुड़के पर गाए थे जनगीत नैनीताल। प्रदेश के दिवंगत जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिरदा’ ने 28 नवम्बर को 40 वर्ष पूर्व 1977 में वनांदोलन के दौरान जनगीतों के साथ हुड़के का प्रयोग किया था। गिर्दा की धर्मपत्नी ने कहा, ‘मृत्यु के आठ वर्ष बाद पहली बार मिला वास्तविक सम्मान’नैनीताल छावनी परिषद में हुआ प्रदेश के जनकवि गिर्दा के नाम पर पार्क का उद्घाटननैनीताल। छावनी परिषद नैनीताल ने अपने निवासी प्रदेश के दिवंगत जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ के नाम पर नगर में एक पार्क की स्थापना की है। शनिवार को छावनी परिषद के अध्यक्ष ब्रिगेडियर अतेश चहार ने मुख्य अधिशासी अधिकारी अभिषेक राठौर तथा सभासद बहादुर रौतेला, तुलसी बिष्ट के साथ तल्लीताल अतिथि होटल के पास ‘गिर्दा पार्क’ का औपचारिक शुभारंभ किया। इस मौके पर गिर्दा की पत्नी हेमलता तिवाड़ी ने कहा कि छावनी परिषद द्वारा किये गए सम्मान से गदगद हैं। कहा ‘मृत्यु के आठ वर्ष बाद पहली बार वास्तविक सम्मान मिला।’वहीं डा. शेखर पाठक ने कहा कि गिर्दा कटक पालिका यानी छावनी परिषद के लंबे समय तक नागरिक रहे। उन्होंने छावनी परिषद की एक सांस्कृतिक पुरुष के नाम पर एक पार्क की स्थापना करने एवं क्षेत्र में सफाई एवं बैंच आदि की स्थापना सहित सृजनशीलता परक पहलों के लिये सराहना की, और नगर पालिका को भी ऐसे कार्यों से प्रेरित होने की आवश्यकता जताई। वहीं रंगकर्मी जहूर आलम ने गिर्दा की बड़ भागी कैलाखानी, उलटबांशी, पसीने की गंध व ओ झोले वाले कविताएं सुनायीं, जबकि इदरीश मलिक, मंजूर हुसैन, मनोज साह टोनी, राजेश आर्य व महेश जोशी आदि गिर्दा के साथियों ने गिर्दा के जन गीतों का गायन किया। गिर्दा के मकान मालिक प्रसिद्ध मूर्तिकार विश्वंभर नाथ साह ‘सखा दाज्यू’ सहित अन्य वक्ताओं ने भी गिरदा का जनकवि, संत, नाटककार, राज्यान्दोलनकारी के रूप में भावपूर्ण स्मरण किया। पार्क में गिर्दा की कैसा हो स्कूल हमारा, जैंता एक दिन त आलो व क्या कहने हैं आदि कविताओं का प्रदर्शन भी किया गया। बताया गया कि पार्क में बालिकाओं को आत्मरक्षा हेतु ताइक्वांडो सिखाने, योग एवं ओपन जिम के कार्यक्रम लगातार होते रहेंगे। कार्यक्रम में पूर्व विधायक डा. नारायण सिंह जंतवाल, पालिकाध्यक्ष श्याम नारायण, गिर्दा की धर्मपत्नी हेमलता तिवाड़ी, प्रदीप पांडे, मुन्नी तिवाड़ी, अभिषेक मेहरा, गिरीश जोशी, पूरन मेहरा, किशन पांडे व दया किशन पोखरिया सहित अनेक लोग मौजूद रहे। संचालन प्रकाश कांडपाल ने किया।यह भी पढ़ें : ऑनलाइन मनायी गई गिर्दा की पुण्यतिथि, हुई मानपत्र व गिर्दा की आवाज में अदम गौंडवी की कविता की प्रस्तुति.. (All About Personality of Girish Tiwari Girda)डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 22 अगस्त 2021। उत्तराखंड के जनांदोलनों को अपने गीतों व बोलों से अलग धार प्रदान करने वाले सर्वकालिक व्यक्तित्व के धनी, प्रदेश के दिवंगत जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ की पुण्य तिथि के अवसर पर सांस्कृतिक संस्था युगमंच तथा जन संस्कृति मंच की पहल पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।इस अवसर पर रविवार को डिजिटल रंगमंच की श्रंखला के तहत गिर्दा स्मृति दिवस पर पद्मश्री रमेश चंद्र शाह द्वारा लिखी व कांता प्रसाद शाह द्वारा निर्देशित कहानी ‘मान पत्र’ की प्रस्तुति की गई। नगर के कलाकार डा. मोहित सनवाल की इस सशक्त प्रस्तुति को युगमंच के फेसबुक पेज व यूट्यूब चौनल पर लाइव प्रस्तुत किया गया। देखें ‘मानपत्र’ की प्रस्तुति :साथ ही इस अवसर पर खास अंदाज में गिर्दा की कविताओं पर युगमंच के वरिष्ठ कलाकार व पोस्टर विशेषज्ञ डॉ. भुवन शर्मा द्वारा तैयार कविता पोस्टर की श्रंखला का भी लोकार्पण किया गया। साथ ही गिर्दा की आवाज में अदम गौंडवी का लिखा व विशेष शैली में जनांदोलनों में गाया गीत ‘सौ में सत्तर आदमी’ का ऑडियो व वीडियो कोलाज भी युगमंच के सोशियल प्लेटफार्म पर जारी किया गया। गिर्दा की आवाज में अदम गौडवी का गीत यहाँ से सुनें :कार्यक्रम के आयोजनों व आनलाइन प्रस्तुति में जहूर आलम, राजा साह, जितेंद्र बिष्ट, डीके शर्मा, नवीन बेगाना, भास्कर बिष्ट, मनोज कुमार मनु, रफत आलम, डा. हिमांशु पांडे आदि का योगदान रहा। इसके अलावा मल्लीताल श्रीराम सेवक सभा में भी विशेष कार्यक्रम हुआ जिसमें अमन, संजय, नवीन बेगाना, हरीश राणा, मंजूर हुसैन, महेश जोशी, अदिति खुराना, मदन मेहरा, अजय पवार, मुकेश, धस्माना, जहूर आलम, अभिनेता ललित तिवारी, रोहित वर्मा, पूर्व विधायक डॉ.नारायण सिंह जंतवाल, स्वर्गीय गिर्दा की धर्मपत्नी श्रीमती लता तिवाड़ी आदि लोगों ने गिर्दा को उनके जनगीत आदि गाकर श्रद्धांजलि दी।आज के अन्य एवं अधिक पढ़े जा रहे उत्तराखंड के नवीनतम अपडेट्स-‘नवीन समाचार’ पर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। यहां क्लिक कर हमारे व्हाट्सएप चैनल से, फेसबुक ग्रुप से, गूगल न्यूज से यहाँ, एक्स से, थ्रेड्स चैनल से, टेलीग्राम से, कुटुंब एप से और डेलीहंट से जुड़ें। अमेजॉन पर सर्वाधिक छूटों के साथ खरीददारी करने के लिए यहां क्लिक करें। यदि आपको लगता है कि ‘नवीन समाचार’ अच्छा कार्य कर रहा है तो हमें यहाँ क्लिक करके सहयोग करें..।(All About Personality of Girish Tiwari Girda, Girda, Girish Tiwari, Janakavi, Uttarakhand, Folk Culture, Kumaoni, Poet, Activist, Swang Tradition, Holi, Poetry, Social Commentary, Chipko Movement, Forest Act, Cultural Heritage, Nainital, Almora, Environmental Activism, Hindi Poetry, Kumaoni Songs, Jhora Chanchari, Social Justice, Education System, River Conservation, Fakir Spirit, Uttarakhand Movement, Theatre, Yugmanch, Nainital Bulletin, Cultural Encyclopedia, George Bush, Sushil Kumar Shinde, Shoe Incident, Political Satire, Faiz Ahmed Faiz, Gairsain, Capital Debate, Traditional Crafts, Sustainable Development, Cultural Identity, Nanda Devi Mela, Panchayat Elections,)Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook Click to share on X (Opens in new window) X Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...Related Post navigationएक्सक्लूसिव: 23 से शुरू होने वाली धामी सरकार के पहले विधानसभा सत्र में छाएंगे नैनीताल के यह 15 सहित कुल 189 मुद्दे ! नशा मुक्ति केंद्र से लड़कियों के बाद अब भागे नाबालिग सहित 12 लड़के, हड़कंप
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