EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / 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से चला आ रहा बारिश व ओलावृष्टि का क्रम जारी है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तो अब भी बर्फबारी हो रही है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में अपेक्षित गर्मी नहीं है। मौसम का यह बदला मिजाज चर्चा में है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके दो कारण हो सकते हैं। पहला कोरोना विषाणु की महामारी के कारण दुनिया भर में लागू लॉक डाउन की वजह से फैक्टरियों एवं वाहनों के काफी कम चलने से ग्रीन हाउस गैसों के कम उत्सर्जन से पर्यावरण में प्रदूषण का घटना एवं धरती के ऊपर ओजोन परत में सुधार आना, और दूसरे धरती पर ऊष्मा व ऊर्जा देने वाले सूर्य पर उसके 11 वर्षीय सोलर साइकिल यानी सौर चक्र के ‘सोलर मिनिमम’ यानी अपने निचले स्तर पर होना। उल्लेखनीय है कि सोलर मिनिमम को सूर्य की सेहत खराब होने के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि इससे सूर्य पर सौर भभूकाएं उठने की तीव्रता कम हो जाती है।स्थानीय एरीज यानी आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाब उद्दीन के अनुसार मौसम को अनेक घटक प्रभावित करते हैं। इनमें प्राकृतिक कारणों के साथ ही मानवजनित कारण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। इस वर्ष लॉक डाउन की वजह से मानव जनित कारणों में काफी कमी आई है। इस कारण क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोना ऑक्साइड व ओजोन आदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन काफी कम होने से धरतीवासियों की सबसे बड़ी चिता का कारण बनी ओजोन परत में सुधार आया है। वहीं दूसरी ओर सूर्य 2007 के आसपास अपनी सक्रियता के 11 वर्षीय सौर चक्र में शीर्ष पर रहने के बाद इधर अपने सबसे कम सक्रियता की स्थिति में है। मौसम में दिख रहे बदलाव का यह भी बड़ा कारण हो सकता है। अगले 10 दिनों में 10 डिग्री सेल्सियस तक अधिक तापमान झेलेंगे मैदानी क्षेत्रप्रो. बहादुर सिंह कोटलियानैनीताल। बदले मौसम पर दीर्घकालीन मौसम पर शोधरत कुमाऊं विश्वविद्यालय में यूजीसी के प्रोफेसर बहादुर सिंह कोटलिया का भी मानना है कि मानव जनित कारण मौसम का काफी प्रभावित करते हैं। बावजूद उनका मानना है कि वर्तमान मौसमी बदलाव के पीछे मानवजनित कारणों से अधिक प्राकृतिक कारण हैं। उन्होंने कहा कि मई के पहले पखवाड़े तक सक्रिय रहा पश्चिमी विक्षोभ अब समाप्त हो गया है। इसके बाद अगले दो-तीन दिनों में ही गर्मी बढ़ने वाली है और मैदानी क्षेत्रों में अगले 10 दिनों में तापमान में 10 डिग्री सेल्सियस तक तापमान बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि यह बढ़ा हुआ तापतान दक्षिण पश्चिमी मानसून के आने तक बना रह सकता है। अलबत्ता, पर्वतीय क्षेत्रों में हाल में हुई बारिश की वजह से मौजूद नमी तापमान को अधिक बढ़ने नहीं देगी। लिहाजा पहाड़ों पर मौसम खुशगवार रह सकता है।यहाँ क्लिक कर सीधे संबंधित को पढ़ें Toggleयह भी पढ़ें : ‘आर्द्रा नक्षत्र’ में हो सकता है महाविस्फोट ! क्या 26 ही रह जायेंगे नक्षत्र ?जानिये आर्द्रा नक्षत्र के बारे में:यह भी पढ़ें : दुनिया पर सबसे बड़े संभावित खतरे पर: विश्व की शीर्ष विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में छपा एरीज के दो वैज्ञानिकों का शोधयह भी पढ़ें : दिवाली पर खुला अंतरिक्ष की ‘बड़ी दिवाली’ का राज, आइंस्टीन ने किया था इशारायह भी पढ़ें : 14 फीसद बड़ा और 30 फीसद अधिक चमकीला नजर आया ‘सुपर स्नो मून’यह भी पढ़ें : धरतीवासियों की बड़ी सफलता, धरतीपुत्र मंगल पर सफलतापूर्वक उतारा यानयह भी पढ़ें : करीब आएंगे मां-बेटा, इस पखवाड़े धरती के सर्वाधिक करीब पहुंचेगा धरती पुत्रयह भी पढ़ें : सूर्य पर भी मनाई गयी ‘बड़ी दिवाली’, उभरा पृथ्वी से १४ गुना बड़ा ‘सौर कलंक’सुरक्षित निकल कर भी धरती को बड़े सुरक्षा सबक दे गया क्षुद्रग्रह ‘2012टीसी 4’चाँद के बनने व डायनासोरों के धरती से गायब होने के कारण भी रहे हैं क्षुद्रग्रहस्विफ्ट टटल धूमकेतु से सशंकित है दुनिया !धूमकेतु व उल्का इस तरह हैं क्षुद्रग्रहों से अलगLike this:Relatedयह भी पढ़ें : ‘आर्द्रा नक्षत्र’ में हो सकता है महाविस्फोट ! क्या 26 ही रह जायेंगे नक्षत्र ?-पिछले पांच वर्ष से तारे की चमक में कमी आने से वैज्ञानिक जता रहे सुपरनोवा विस्फोट की आशंका, जिसके बाद कुछ समय के लिए खत्म होने से पहले सूर्य व चंद्रमा जैसा तीसरा सबसे चमकदार तारा जैसा नजर जाएगा आर्द्रा नक्षत्रनवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 20 फरवरी 2020। पृथ्वी से 700 प्रकाश वर्ष दूर एक आकाशगंगा में स्थित सूर्य से करीब 19 गुना भारी व नौ सौ गुना बड़े विशाल आकार वाले लाल रंग के तारे ‘बेटेल्गयूज’ (भारतीय नाम आर्द्रा नक्षत्र) पर दुनिया भर के खगोल वैज्ञानिकों की नजरें लगी हुई हैं। अभी यह सबसे अधिक चमक के मामले में आकाश गंगा का 11वां तारा है। लेकिन इधर पिछले पांच माह में इसकी चमक में 25 फीसद कमी आ गई है। वैज्ञानिकों का इस आधार पर ही मानना है कि जल्द ही सूपरनोवा विस्फोट के जरिये इसका अंत हो जाएगा। वहीं धार्मिक आधार पर देखें तो माता नंदा देवी के मेले का धार्मिक पक्ष निभाने वाले पंडित एवं शिक्षक भगवती प्रसाद जोशी कहते हैं कि धार्मिक तौर पर किसी नक्षत्र के समाप्त होने की परिकल्पना नहीं की गई है।जानिये आर्द्रा नक्षत्र के बारे में: आर्द्रा का अर्थ होता है नमी। आकाश मंडल में आर्द्रा छठवां नक्षत्र है। यह राहु का नक्षत्र है व मिथुन राशि में आता है। आर्द्रा नक्षत्र कई तारों का समूह न होकर केवल एक तारा है। यह आकाश में मणि के समान दिखता है। इसका आकार हीरे अथवा वज्र के रूप में भी समझा जा सकता है। कई विद्वान इसे चमकता हीरा तो कई इसे आंसू या पसीने की बूंद समझते हैं। आर्द्रा नक्षत्र मिथुन राशि में 6 अंश 40 कला से 20 अंश तक रहता है। जून माह के तीसरे सप्ताह में प्रातः काल में आर्द्रा नक्षत्र का उदय होता है। फरवरी माह में रात्रि 9 बजे से 11 बजे के बीच यह नक्षत्र शिरोबिंदु पर होता है। निरायन सूर्य 21 जून को आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करता है। इसे पृथ्वी पर नमी की मात्रा बढ़ने के रूप में भी देखा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में 0 डिग्री से लेकर 360 डिग्री तक सारे नक्षत्रों का नामकरण इस प्रकार किया गया है-अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती। 28वां नक्षत्र अभिजीत है। राहु को आर्द्रा नक्षत्र का अधिपति ग्रह माना जाता है। आर्द्रा नक्षत्र के चारों चरण मिथुन राशि में स्थित होते हैं जिसके कारण इस नक्षत्र पर मिथुन राशि तथा इस राशि के स्वामी ग्रह बुध का प्रभाव भी रहता है।इधर, स्थानीय एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. बृजेश कुमार के अनुसार सुपरनोवा विस्फोट के दौरान विशाल ऊर्जा के विकिरण से इसकी चमक कुछ समय के लिए काफी अधिक बढ़ जाएगी। इसके बाद यह यात्रि में कुछ समय के लिए आसमान में सूर्य व चंद्रमा के बाद तीसरे सबसे अधिक चमकते हुए तारे के रूप में नजर आयेगा। यह अवधि एक-दो माह से चार माह तक की हो सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार बेटेल्गयूज मृग तारा समूह का 10 मिलियन वर्ष से कम पुराना तारा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके आकार के फैलने का सिलसिला लगभग 40 हजार साल पहले शुरू हो चुका था, जो अब विशाल आकार ले चुका है। इस तारे के बारे में वैज्ञानिकों को 1836 में पता चला था। तभी से इस तारे में वैज्ञानिक नजर रखे हुए हैं। यूरोपियन सदर्न आब्जर्वेटरी की वेरी लार्ज टेलीस्कोप इस पर नजर रखी जा रही है। इसके विस्फोट को लेकर निश्चित समय का आंकलन अभी नहीं किया जा सकता है।बताया गया है कि किसी विशाल तारे में इस तरह का महाविस्फोट इससे पूर्व वर्ष 1006, 1054 व 1572 ईसवी सन मंे एवं आखिरी विस्फोट 1604 ईसवी सन में हुआ था। इसलिए सैकड़ों वर्षों में होने वाली इस दुर्लभ खगोलीय घटना को लेकर वैज्ञानिक काफी रोमांचित हैं। बेटेल्गयूज के विस्फोट से वैज्ञानिकों को पता चल सकेगा कि विस्फोट से पूर्व तारे की स्थिति क्या होती है। जिससे इस तरह के तारों के अंत समय की स्थिति के साथ आगे के अध्ययन में आसानी हो जाएगी। यह भी पढ़ें : 'टीम इंडिया' में उत्तराखंड मूल के एक और युवा खिलाड़ी ‘बेबी एबी’-आयुष बड़ोनी की एंट्री, मौका मिलने-खेलने और गंभीर के पूर्व बयान पर चर्चा तेजयह भी पढ़ें : दुनिया पर सबसे बड़े संभावित खतरे पर: विश्व की शीर्ष विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ में छपा एरीज के दो वैज्ञानिकों का शोध-14 जनवरी 2019 को हुए विशाल गामा किरणों के विष्फोट का देश के 20 देशों के वैज्ञानिकों के साथ किया स्पेन और पुणे की दूरबीनों से सफल प्रेक्षणनवीन समाचार, नैनीताल, 20 नवंबर 2019। एरीज यानी आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के दो वैज्ञानिकों डा. शशिभूषण पांडे एवं डा. कुंतल मिश्रा का शोध पत्र एक बार पुनः दुनिया की शीर्ष विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ पत्रिका के नवंबर माह के अंक में प्रकाशित हुआ है। दोनों वैज्ञानिकों का यह शोध पत्र ब्रह्मांड के सबसे बड़े-गामा किरणों के विष्फोट से संबंधित है, जिसका उन्होंने भारत के आईआईएसटी त्रिवेंद्रम की डा. एल रेसमी व उनके साथियों के साथ स्पेन और पुणे की दूरबीनों से गत 14 जनवरी 2019 को सफल प्रेक्षण किया। बुधवार अपराह्न स्थानीय एरीज में आयोजित पत्रकार वार्ता में निदेशक डा. वहाब उद्दीन एवं डा. शशि भूषण पांडे व डा. कुंतल मिश्रा ने पत्रकार वार्ता में यह जानकारी दी। बताया कि 14 जनवरी को 22 सेकेंड के लिए गामा किरणों का विस्फोट जीआरबी 190114सी हुआ था। दुनिया के 20 देशों के वैज्ञानिक भी इसका प्रेक्षण कर रहे थे। बताया कि जीआरबी विस्फोट ब्रह्मांड के सर्वाधिक बड़े व भयावह विस्फोट होते हैं। गामा किरणों सबसे शक्तिशाली तरंगे होती हैं जो कि किसी लोहे के 26 इंच मोटे से मोटे कोलम से भी पार हो जाती हैं। इनकी तरंगदैर्ध्य परमाधु के आकार से भी छोटी होती है। लिहाजा ये इतनी घातक होती हैं कि परमाणु को भी अपनी ताकत से खत्म कर सकती हैं। यदि इनका रुख कभी किसी कारण पृथ्वी की ओर हो जाए तो इससे होने वाले नुकसान की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए वैज्ञानिक इनके अध्ययन में जुटे हुए हैं। हालांकि 14 जनवरी को रिकार्ड हुआ गामा किरणों का विस्फोट ब्रह्मांड में पृथ्वी से 4.5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर हुआ था। इससे पूर्व भी डा. पांडे व डा. मिश्रा का इससे अपेक्षाकृत छोटा जीआरबी 160625बी के विस्फोट का शोध भी नेचर पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने बताया कि ऐसे विस्फोट ब्रह्मांड में हर रोज करीब एक होते रहते हैं।‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। यह भी पढ़ें : दिवाली पर खुला अंतरिक्ष की ‘बड़ी दिवाली’ का राज, आइंस्टीन ने किया था इशारा-धनतेरस की पिछली शाम वाशिंगटन से हुई है न्यूट्रॉन स्टार्स के टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलने की पहली बार घोषणा, एरीज के वैज्ञानिकों की भूमिका भी रही है इस खोज में -इस खोज में एरीज के वैज्ञानिक डा. शशि भूषण पांडे और डा. कुंतल मिश्रा भी रहे हैं शामिल -इसी माह ब्लेक होल्स के आपस में टकराने से संबंधित एक अन्य खोज पर मिला है इस वर्ष का नोबल पुरस्कार नैनीताल। महान वैज्ञानिक आंइस्टीन ने अपने जीवन काल में पृथ्वी से करीब 13 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर अंतरिक्ष में होने वाली एक ‘बड़ी दीपावली’ की ओर सैद्धांतिक तौर पर इशारा किया था। उन्होंने कहा था कि दो ‘न्यूट्रॉन स्टार्स’ के आपस में टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलती हैं, जोकि ‘स्पेस टाइम’ यानी अंतरिक्ष के समय की गणना को प्रभावित करती हैं। पहली बार वैज्ञानिकों ने आइंस्टीन की इस मान्यता की उपकरणों की मदद से पुष्टि कर दी है। बीती 16 अक्टूबर यानी धनतेरस की पिछली शाम अमेरिका के वाशिंगटन डीसी से इसकी घोषणा की गयी। गर्व करने वाली बात है कि इस सफलता में भारत और नैनीताल के एरीज के वैज्ञानिकों की भी भूमिका रही है। एरीज के दो वैज्ञानिक डा. शशि भूषण पांडे और डा. कुंतल मिश्रा भी इस परियोजना के अंतर्गत एक खास तरह की गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज में शामिल रहे हैं। खास बात यह भी है कि ऐसी ही एक अन्य खोज, जिसमें इसी तरह दो ‘ब्लेक होल्स’ के आपस में टकराने से गुरुत्वाकर्षण तरंगें निकलने की पुष्टि हुई है, पर इसी माह इस वर्ष यानी 2017 का विज्ञान का दुनिया का सबसे बड़ा नोबल पुरस्कार दिया गया है। आगे एरीज में स्थापित एशिया की सबसे बड़ी 3.6 मीटर व्यास की ‘देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप’ यानी ‘डॉट’ में भी इस सफलता की मुख्य सूत्रधार उपकरण ‘लाइगो’ के लगने की संभावना है, जिसके बाद एरीज इस दिशा में और अधिक बेहतर परिणाम दे सकता है।इस संबंध में मंगलवार को एरीज के निदेशक डा. अनिल कुमार पांडेय ने पत्रकार वार्ता कर इस उपलब्धि की जानकारी दी। बताया कि न्यूट्रॉन स्टार्स तारों के जीवन पूरा होने के बाद शेष बचे अत्यधिक घनत्व वाले करीब 20 किमी व्यास के पिंड होते हैं। ये इतने भारी होते हैं कि इनकी एक चम्मच भर सामग्री माउंट एवरेस्ट से अधिक भारी होती है। इनके टकराने के बारे में अध्ययन लेजर तकनीक आधारित ‘अमेरिकी लेजर इंटरफेरमीटर गुरुत्वाकर्षण तरंग वेधशाला’ यानी लाइगो डिटेक्टर कहे जाने वाले उपकरणों से ही संभव होता है। यह लाइगो डिटेक्टर भारत में पुणे स्थित जॉइंट मीटर वेभ रेडियो टेलीस्कोप और लद्दाख स्थित हिमालयन चंद्रा टेलीस्कोप में लगे हैं। इनकी मदद से ही एरीज के दोनों वैज्ञानिकों ने इस खोज को करने में अपना योगदान दिया है। इनके अवलोकन में वैज्ञानिक सूर्य के द्रव्यमान के 1.1 से 1.6 गुना तक भारी इन खगोलीय पिंडों को 100 सेकेंड तक न्यूट्रॉन स्टार्स के रूप में चिन्हित कर सके। इनके टकराने से गामा किरणों का फ्लैश यानी एक तीव्र प्रकाश उत्पन्न हुआ जो पृथ्वी की कक्षाओं के उपग्रहों के द्वारा गुरुत्वाकर्षण तरंगों के आगमन के सापेक्ष दो सेकेंड तक देखा गया। यह इस बात का पहला निर्णायक प्रमाण है कि अक्सर उपग्रहों से नजर आने वाला अल्प अवधि का गामा विकीरण विस्फोट वास्तव में न्यूट्रॉन स्टार्स के टकराने से उत्पन्न होता है। इसका अनुमान एक शताब्दी पूर्व आइंस्टीन से लगाया था। इससे इस बात के संकेत भी मिले हैं कि गामा विकीरण के शक्तिशाली विस्फोटों से प्राप्त विलयनों में लोहे से ज्यादा घनत्व वाले सोना और सीसा जैसे तत्वों की 50 फीसद से अधिक मात्रा होती है। लिहाजा इस खोज से एरीज के वैज्ञानिकों में हर्ष की लहर है, और इसे मील का पत्थर और बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।यह भी पढ़ें : 14 फीसद बड़ा और 30 फीसद अधिक चमकीला नजर आया ‘सुपर स्नो मून’जर्मनी में कल की रात चांद ने यूं दिखाया रंगनवीन समाचार, नैनीताल, 19 फरवरी 2019। मंगलवार 19 फरवरी को भारतीय परंपरा के अनुसार माघ पूर्णिमा की रात आसमान में चांद कुछ खास स्वरूप में नजर आया। स्थानीय एरीज के खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार आज का चांद आम दिनों के मुकाबले 14 फीसद बड़ा और 30 फीसद अधिक चमकीला नजर आया। वैज्ञानिकों के मुताबिक पूर्णिमा के दिन चांद के के अपनी कक्षा में पृथ्वी का चक्कर लगाते हुए पृथ्वी के अपेक्षाकृत सबसे करीब आ जाने के कारण इसका आकार और रोशनी आम पूर्णिमा के चांद के मुकाबले काफी अधिक हो जाती है और इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘सुपर स्नो मून’ कहा जा रहा है। सरोवरनगरी में बादलों की लुका-छिपी के बीच इसे खुली आंखों से देखा गया। खगोल विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह खास मौका रहा। बताया गया कि आगे ऐसा नजारा 2555 दिनों यानी करीब सात साल बाद 2026 में दिखाई देगा।वैज्ञानिकों ने नासा के हवाले से बताया कि रात्रि 9 बजकर 23 मिनट पर चांद अपने सबसे बड़े व चमकीले बिहंगम स्वरूप में नजर आया, जब सूर्य चांद के ठीक 180 डिग्री यानी उल्टी दिशा में रहा होगा। बताया गया है कि फरवरी के माह में ऐसे बड़े व चमकीले दिखने वाले चांद को कई संस्कृतियों में सुपरमून तो दुनिया के कुछ देशों में इस खगोलीय घटना को स्ट्रॉम मून, हंगर मून व बोन मून भी कहा जाता है। इस दौरान समुद्री क्षेत्रों में आने वाले कुछ दिनों में ज्वार की स्थिति आने और ज्यादा ऊंची लहरें उठने की भी आशंका जताई जा रही है।यह भी पढ़ें : धरतीवासियों की बड़ी सफलता, धरतीपुत्र मंगल पर सफलतापूर्वक उतारा यानवाशिंगटन। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का मार्स इनसाइट लैंडर यान सफलतापूर्वक मंगल की सतह पर उतारा गया। भारतीय समयानुसार सोमवार-मंगलवार की रात करीब 1:24 बजे इसे मंगल पर लैंड कराया गया। इनसाइट लैंडर यान को मंगल की रहस्यमयी दुनिया के बारे में जानकारी के लिए बनाया गया।वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह मंगल ग्रह के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में मददगार होगा। इससे पृथ्वी से जुड़े नए तथ्य पता लगने की उम्मीद भी जताई जा रही है।जानकारी के मुताबिक, इनसाइट के लिए मंगल पर लैंडिंग में लगने वाला छह से सात मिनट का समय बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस दौरान इसका पीछा कर रहे दोनों सैटेलाइट्स के जरिए दुनियाभर के वैज्ञानिकों की नजर इनसाइट लैंडर पर रहीं। इन दोनों सैटेलाइट्स का नाम डिज्नी के किरदानों पर रखा गया है- ‘वॉल ई’ और ‘ईव’। दोनों सैटेलाइट्स ने आठ मिनट में इनसाइट के मंगल पर उतरने की जानकारी धरती तक पहुंचा दी। नासा ने इस पूरे मिशन का लाइव कवरेज किया। इनसाइट से पहले 2012 में नासा के क्यूरियोसिटी यान ने मंगल पर लैंडिंग की थी।यह भी पढ़ें : दो बच्चों की मां का भतीजे ने चुराया दिल, प्रेम विवाह कर दोनों घर चलाने बन गए 'बंटी-बबली' जैसे चोर और….मार्स इनसाइट लैंडर यान कैसे काम करेगा नासा का यह यान सिस्मोमीटर की मदद से मंगल की आंतरिक परिस्थितियों का अध्ययन करेगा। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि मंगल ग्रह पृथ्वी से इतना अलग क्यों है।इनसाइट लैंडर की खासियतइनसाइट का पूरा नाम ‘इंटीरियर एक्सप्लोरेशन यूजिंग सिस्मिक इन्वेस्टिगेशंस’मार्स इनसाइट लैंडर का वजन 358 किलोसौर ऊर्जा और बैटरी से चलने वाला यान26 महीने तक काम करने के लिए डिजाइन किया गयाकुल 7000 करोड़ का मिशनइस मिशन में यूएस, जर्मनी, फ्रांस और यूरोप समेत 10 से ज्यादा देशों के वैज्ञानिक शामिलइसका मुख्य उपकरण सिस्मोमीटर (भूकंपमापी) है, जिसे फ्रांसीसी अंतरिक्ष एजेंसी ने बनाया है। लैंडिंग के बाद ‘रोबोटिक आर्म’ सतह पर सेस्मोमीटर लगाएगा।दूसरा मुख्य टूल ‘सेल्फ हैमरिंग’ है, जो ग्रह की सतह में ऊष्मा के प्रवाह को दर्ज करेगा।इनसाइट की मंगल के वातावरण में प्रवेश के दौरान अनुमानित गति 12 हजार 300 मील प्रति घंटा रही।इनसाइट प्रोजेक्ट के प्रमुख वैज्ञानिक ब्रूस बैनर्ट का कहना है कि यह एक टाइम मशीन है, जो यह पता लगाएगी कि 4.5 अरब साल पहले मंगल, धरती और चंद्रमा जैसे पथरीले ग्रह कैसे बने।यह भी पढ़ें : करीब आएंगे मां-बेटा, इस पखवाड़े धरती के सर्वाधिक करीब पहुंचेगा धरती पुत्र-सूर्य पर धरती की ओर उभरा 8 लाख किमी चौड़ा ‘कोरोनल होल’ से खतरे की आशंका-एरीज के सौर वैज्ञानिक के अनुसार सूर्य पर फिलहाल कोई सौर ज्वालाएं नहीं हैंनवीन जोशी, नैनीताल। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने सूर्य के धरती की ओर की सतह पर बुधवार को आठ लाख किमी चौड़ा ‘कोरोनल होल’ यानी एक तरह का गड्ढा उभरने का दावा किया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इससे 2 विशाल जी-1 श्रेणी की सौर ज्वालाएं रिकॉर्ड की गयी हैं। नासा ने आशंका जताई है कि इन विशाल सौर ज्वालाओं की वजह से उठा ‘सौर तूफान’ धरती के चुंबकीय क्षेत्र से टकरा सकता है। इसके नतीजे काफी बुरे हो सकते हैं। इसके धरती के वायुमंडल से टकराने की वजह से उपग्रह अव्यवस्थित हो सकते हैं। इसकी वजह से व्यवसायिक उड़ानें प्रभावित हो सकती हैं, और जीपीएस सिस्टम भी अव्यवस्थित हो सकता है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि इसकी वजह से दुनिया के अनेक हिस्सों में बिजली भी गुल हो सकती है। अलबत्ता, एरीज के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाबउद्दीन का ‘कोरोनल होल’ के उभरने की बात को स्वीकार करते हुए इससे इतर कहना है कि इन दिनों सूर्य अपने 11 वर्ष के सौर सक्रियता चक्र में शांत स्थिति में है, और सौर सक्रियता अपने न्यूनतम स्तर पर है। उनका कहना है कि कोरोनल होल की वजह से काफी सौर हवाएं आ सकती हैं। हो सकता है कि इसकी तीव्रता अधिक हो, किंतु सूर्य पर काफी समय से कोई बड़ी सौर ज्वाला और कोई सौर धब्बा नजर नहीं दिखी है। कितना बड़ा हो सकता है नुकसाननैनीताल। वैज्ञानिकों के अनुसार एक सौर कलंक में सामान्य सूर्य के मुकाबले तीन से चार हजार गुना तक चुंबकीय क्षेत्र हो सकता है। इसकी इकाई गौज कही जाती है। यहां बता दें कि सामान्य सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र एक गौज तथा पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र महज आधा गौज होता है। यह चुंबकीय क्षेत्र ही छह हजार डिग्री सेल्सियस से अधिक गर्म सूर्य पर बड़ी सौर ज्वालाएें पैदा करता है, जिन्हें कि एक अंग्रेजी फिल्म में सौर सूनामी नाम दे दिया गया है। इनके कारण वर्ष १८५९ में अमेरिका व यूरोप में आग लगने की अनेक घटनाएें हुई थीं, और टेलीग्राफ के तार शार्ट कर गऐ थे। ध्रुवीय देशों रूस, नार्वे के साथ फिनलेंड व कनाडा में पावर ग्रिड फेल होने से विद्युत आपूर्ति ओर कृत्रिम उपग्रह डगमगा जाने से संचार व्यवस्था ध्वस्त हो गई थी। डा. वहाबउद्दीन के अनुसार इसी कारण वर्ष १९८९ में नासा का सोलर मैक्सिमम मिशन व कोदाना उपग्रह तथा १९७६ में स्काई लैब उपग्रह नष्ट हो गऐ थे। इससे अधिक ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई जहाजों के साथ ही मानव स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है, व जीपीएस सिस्टम भी गड़बड़ा जाता है। इसलिए इन सौर तूफानों के अध्ययन की जरूरत और अधिक बढ़ जाती है। डा. वहाबउद्दीन का कहना है कि सौर तूफानों से कृत्रिम उपग्रहों को बचाने के लिए वैज्ञानिक प्रयासरत हैं।यह भी पढ़ें : सूर्य पर भी मनाई गयी ‘बड़ी दिवाली’, उभरा पृथ्वी से १४ गुना बड़ा ‘सौर कलंक’-पृथ्वी की ओर है मुंह, सूर्य पर बनी ‘सौर सूनामी” और इससे पृथ्वी और इसके उपग्रहों को नुकसान की आशंका से वैज्ञानिक चिंतित -पिछले २५ वर्षों का सबसे बड़ा सौर कलंक बताया जा रहा – सूर्य भी मना रहा दिवाली, एक्स क्लास के दो सौर भभूका निकली, अगले चार-पांच दिन हो सकते हैं महत्वपूर्ण नवीन जोशी, नैनीताल। यहां भारत में मनाई जा रही दीपावली की तरह ही सूर्य देव पर बहुत ‘बड़ी दीपावली” चल रही है। सूर्य पर पृथ्वी के आकार से करीब १४ गुना बड़े आकार का सौर कलंक (सन स्पॉट) उभरा हुआ है। इसे पिछले २५ वर्षों में सबसे बड़ा सौर कलंक बताया जा रहा है। यह सौर कलंक इतने बड़े आकार का है कि इसे पृथ्वी से सुबह और शाम के वक्त सूर्य के दक्षिण पूर्वी किनारे पर खुली आंखों से देखा जा सकता है। मैं भी 22 अक्टूबर की शाम और 23 की सुबह अपने घर खेड़ा, गौलापार (हल्द्वानी) से अपने कैमरे से इसकी फोटो लेने में सफल रहा। पृथ्वी के लिए खतरे की बात यह है कि इस सौर कलंक का मुंह पृथ्वी की ओर है, और इस पर सबसे बड़ी ‘एक्स क्लास” की दो सौर भभूका (सोलर फ्लेयर) हैं, तथा अगले चार-पांच दिनों तक और बड़ी सौर भभूकाओं के निकलने और यहां तक की इनके बढ़ने पर सौर तूफानों और २००३ जैसी ‘सौर सूनामी” की हद तक जा सकते हैं। ऐसा हुआ तो इससे पृथ्वी से अंतरिक्ष में भेजे गए कृत्रिम उपग्रह तथा पृथ्वी पर संचार सुविधाएं तहस-नहस होने तक का खतरा हो सकता है।जान लें कि सूर्य हमारे सौरमंडल की सबसे महत्वपूर्ण धुरी है, जिस पर उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों के बीच चुंबकीय तूफान चलते हैं। यही चुंबकीय तूफान वास्तव में सूर्य के इतनी अधिक ऊष्मा के साथ धधकने के मुख्य कारक हैं, जिससे पृथ्वी सहित सौरमंडल के अन्य ग्रह भी ऊष्मा, प्रकाश एवं जीवन प्राप्त करते हैं। लेकिन कहते हैं कि एक सीमा से अधिक हर चीज खतरनाक साबित होती है। ऐसा ही सूर्य पर चुंबकीय तूफानों के एक सीमा से अधिक बढ़ने पर भी होता है। चुंबकीय तूफान सूर्य पर पहले सन स्पॉट यानी सौर कलंक उत्पन्न करते हैं, इन्हें सामान्यतया बड़ी सौर दूरबीनों के माध्यम से ही काले बिंदुओं के आकार में देखा जाता है। सौर कलंक सूर्य पर असीम अग्नि की लपटें उत्पन्न करते हैं, इन्हें सोलर फ्लेयर या सौर भभूका कहते हैं। सूर्य पर सौर भभूका 11 वर्ष के चक्र में घटती-बढ़ती या शांत रहती हैं, जिसे सोलर साइकिल या सौर चक्र कहा जाता है। खगोल वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार वर्तमान में वर्ष २००८ से २४वां सौर चक्र चल रहा है, जिसका चरम यानी ‘सोलर मैक्सिमम’ २०१२-१३ में था। इसके बाद वर्तमान सौर चक्र अपने ढलान (डिके पीरियड) की ओर है, लेकिन इधर वैज्ञानिकों के अनुसार बीती १७ अक्टूबर से सूर्य पर एक बड़ा सौर कलंक बनना शुरू हुआ। तब यह सूर्य के पृथ्वी से दिखने के लिहाज से पीछे की ओर था। १८ से यह पृथ्वी की ओर आया, तब तक इसका आकार अपेक्षाकृत छोटा ही था। १९ और २२ अक्टूबर को इस पर बड़ी एक्स-१.८ श्रेणी की दो सौर भभूका प्रकट हुर्इं। इसके अलावा भी इस बीच सूर्य पर इस सौर कलंक से सी-श्रेणी की २७ और एम-श्रेणी की नौ सौर भभूका निकल चुकी हैं। शुक्रवार को भी इस पर सौर भभूकाओं का निकलना जारी रहा। स्थानीय आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के निदेशक एवं वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक डा. वहाब उद्दीन ने बताया कि इस सौर कलंक का आकार पृथ्वी से करीब नौ गुना बड़ा है, और इससे अगले चार-पांच दिनों तक बड़े सौर तूफान आने की आशंका बनी हुई है। बताया कि वर्ष २००३ में आए अब तक के बड़े सौर कलंक भी पिछले सौर सक्रियता चक्र के ढलान के दौर में ही उभरे थे। उन्होंने खुलासा किया कि बीती २२ की रात्रि सूर्य पर उभरी सौर भभूका ने २३ को पृथ्वी पर पहुंचकर कुछ पलों के लिए यहां संचार तंत्र को प्रभावित भी किया था। उत्तरी अमेरिका में कल २३ अक्टूबर के दिन लगे सूर्य ग्रहण के दौरान भी इसके चित्र लिए गए हैं। सुरक्षित निकल कर भी धरती को बड़े सुरक्षा सबक दे गया क्षुद्रग्रह ‘2012टीसी 4’<p style=”text-align: justify;”>-12 अक्टूबर 2017 की दोपहर 12.12 बजे आस्ट्रेलिया के करीब से चांद की दूरी के आठवें हिस्से तक करीब से गुजरा करीब 15 मीटर व्यास का क्षुद्रग्रह नवीन जोशी, नैनीताल। बृहस्पतिवार के दिन जब हम आम दिनों की तरह अपने काम में लगे थे, तभी करीब 15 मीटर व्यास यानी एक घर के बराबर बड़ा पिंड 4.5 मील प्रति सेकेंड यानी 7.6 किमी प्रति सेकेंड यानी 16000 मील प्रति घंटे की अत्यधिक गति से (अपार ब्रह्मांड के हिसाब से बेहद कम) धरती के मात्र 36000 किमी पास से गुजरा। गनीमत रही कि इससे धरती को कोई खतरा उत्पन्न नहीं हुआ। साथ ही अच्छी बात यह भी रही कि इसके गुजरने से देश-दुनिया के वैज्ञानिकों ने इसके गुजरने पर बारीकी से नजर रखकर भविष्य में कभी इससे बड़े क्षुद्रग्रहों के धरती से टकराने की संभावनाओं का अध्ययन और विष्लेषण भी किया, यानी इससे सबक सीखे हैं।<p style=”text-align: justify;”>बृहस्पतिवार 12 अक्टूबर 2017 को धरती के बेहद करीब से गुजरे इस क्षुद्रग्रह को सर्वप्रथम पांच वर्ष पूर्व देखा गया था, इसी आधार पर इसका नाम 2012 टीसी4 रखा गया था। वैज्ञानिकों को पहले से इसके पृथ्वी के काफी करीब से गुजरने की संभावना थी। इसलिये खोजकर्ता और वैज्ञानिक इसके प्रेक्षण से भविष्य के इस तरह के संभावित खतरों से बचने का अध्ययन करने के लिये पहले से जुटे हुए थे। स्थानीय आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज के विज्ञान केंद्र के समन्वयक डा. रवींद्र कुमार यादव ने नासा के हवाले से बताया यह क्षुद्र ग्रह भारतीय मानक समय के अनुसार 12 बजकर 12 मिनट पर पृथ्वी के सबसे करीब से गुजरा। इसकी चमक इतनी धीमी थी कि कोरी आंखो से इसे देख पाना संभव नहीं था। बावजूद वैज्ञानिक इस नजर रखे रहे। बताया गया है कि यह आस्ट्रेलिया के दक्षिणी ओर से पृथ्वी के पास से गुजरा।यह भी पढ़ें : एम्स ऋषिकेश में चमोली के दंपति ने नौ दिन के मृत नवजात का देहदान किया, चिकित्सा शोध को मिला मानवता का बड़ा योगदानचाँद के बनने व डायनासोरों के धरती से गायब होने के कारण भी रहे हैं क्षुद्रग्रहनैनीताल। डा. यादव ने बताया कि हमारे सौरमंडल में मंगल व बृहस्पति ग्रहों के बीच की एक खास पट्टी में अरबों की संख्या में क्षुद्रग्रह मौजूद हैं। इन्हें ऐसे किसी ग्रह का हिस्सा माना जाता है जो ग्रहों के बनने की प्रक्रिया के बीच ग्रह नहीं पाए और सौरमंडल में सूर्य के चारों ओर घूमते रहते हैं, और कई बार अपने पथ से भटककर दूसरे ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में भी प्रवेश कर जाते हैं। स्वयं पृथ्वी के शुरुआती समय में यह अरबों बार पृथ्वी से टकराए हैं। इन्ही शुरूआती टक्करों में से एक के कारण पृथ्वी से टूटकर ही चन्द्रमा बना। वैज्ञानिक 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व धरती के सबसे विशाल जीव डायनासोरों के समूल नाश का कारण मैक्सिको के पास एक विशाल क्षुद्रग्रह के टकराने को ही कारण मानते हैं। वहीं भारत में भी महाराष्ट्र पांत के बुल्ढाना जिले में स्थित पानी से भरे लोनार क्रेटर को किसी क्षुद्रग्रह के टकराने के कारण ही बना हुआ माना जाता है। हाल के वर्षों में बृहस्पति ग्रह पर एक विशाल क्षुद्रग्रह के टकराने की घटना भी प्रकाश में आई थी। इसी तरह 2013 में मध्य रूस के चेल्याबिन्स्क में करीब 10 टन वजनी क्षुद्रग्रह धरती से टकराने से पूर्व ही भस्म हो गया था, बावजूद इसके कारण करीब 1000 लोग इसके कठोर टुकड़ों से जख्मी हुए। अलबत्ता, वैज्ञानिकों का मानना है कि एक अरब क्षुद्रग्रहों में से एक के ही धरती पर टकराने की यानी बेहद कम संभावना होती है। क्योंकि धरती के वायुमंडल में प्रवेश करने पर इनके जल कर भष्म होने की भी अधिक संभावना रहती है, लेकिन जिस तरह धरती पर छोटे उल्का पात भी हो जाते हैं, और नुकसान पहुंचाते हैं, लिहाजा ऐसी संभावनाओं से पूरी तरह इंकार भी नहीं किया जा सकता है। हालांकि डा. यादव ने एनईओ यानी पृथ्वी के समीप के पिंड का पता लगाने वाले विशेषज्ञों के हवाले से बताया कि ज्ञात पिंडो में से कोई भी पिंड ऐसा नही है, जिसकी आने वाले 100 वर्षो में पृथ्वी से टकराने की संभावना है।स्विफ्ट टटल धूमकेतु से सशंकित है दुनिया !2016 व 2040 में पृथ्वी के पास से गुजरेगा स्विफ्ट टटल धूमकेतुओं को बताया जाता है पृथ्वी से डायनासौर के विनाश का कारण 1994 में बृहस्पति से टकराया था लेवी सूमेकर धूमकेतु, जिससे सूर्य के वलय भी प्रभावित हो गये थे, एरीज में लिये गये थे घटना के चित्रनवीन जोशी, नैनीताल। यों तो पृथ्वी के भविष्य को लेकर वैज्ञानिकों व पंडितों की ओर से अक्सर अनेक चिंताजनक भविष्यवाणियां की जाती रही हैं और अब तक ऐसी हर संभावना निर्मूल भी साबित होती रही है। लेकिन पृथ्वी के बाबत नई चिंता इस बात को लेकर उत्पन्न हो गई है कि वर्ष 2016 और वर्ष 2040 में स्विफ्ट टटल नामक एक विशालकाय धूमकेतु पृथ्वी के पास से गुजर सकता है। इसकी दूरी पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण शक्ति की जद में ना जाए, इस बात की चिंता है। यदि यह पृथ्वी से टकरा गया, तो इसके परिणामों का अंदाजा 1994 में पृथ्वी से कई गुना बड़े ग्रह बृहस्पति पर शूमेकर लेवी नाम के एक पृथ्वी से बड़े आकार के धूमकेतु की टक्कर के परिणामों से लगाया जाने लगा है, जिसमें शूमेकर पूरी तरह नष्ट हो गया था। बृहस्पति के वलयों पर भी इसका प्रभाव पड़ा था। इस आधार पर वैज्ञानिक 2016 व 2040 में पृथ्वी पर व्यापक नुकसान होने की संभावना की हद तक आशंकित हैं। शूमेकर धूमकेतु के बृहस्पति पर टकराने की घटना का नैनीताल के आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान यानी एरीज के वैज्ञानिकों ने भी अध्ययन किया था और वह अपनी एक मीटर व्यास की दूरबीन से इस घटना के कई चित्र लेने में सफल रहे थे। इधर देश-दुनिया के साथ एरीज के वैज्ञानिक भी 2016 में स्विफ्ट टटल एसएन 1998 नाम के धूमकेतु के पृथ्वी के पास से गुजरने की संभावित घटना को लेकर चिंतित हैं और 1994 की घटना के अध्ययनों के आधार पर ही 2016 में किसी अनिष्ट की संभावना को टालने के लिए प्रयासरत हैं। गौरतलब है कि वर्ष 1994 खगोलीय घटनाओं के लिए सर्वाधिक याद किया जाता रहा है। इसी वर्ष 16 से 22 जुलाई तक जो कुछ घटा, उसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों को शोध के लिए अच्छा प्लेटफार्म तो दिया ही साथ ही भविष्य में इस तरह की घटनाओं से पृथ्वी को बचा सकने की तैयारियों के लिए भी लंबा समय दिया। इस दौरान बृहस्पति पर शूमेकर लेवी नाम के एक धूमकेतु के विभिन्न आकार के टुकड़ों के टकराने से आतिशबाजी जैसी घटना हुई,फलस्वरूप शूमेकर धूमकेतु टकराने से नष्ट हो गया था। उल्लेखनीय है कि लगभग छह करेाड़ वर्ष पहले पृथ्वी से विशालकाय डायनसोरों के अंत का कारण भी धूमकेतुओं के पृथ्वी से टकराने को माना जाता है। भारत के लिए यह सौभाग्य रहा कि नैनीताल स्थित एरीज में इस महत्वपूर्ण खगोलीय घटना के दिन अध्ययन किया गया। एरीज में एक मीटर व्यास की दूरबीन के साथ लगे सीसी टीवी कैमरों से इस दुर्लभ खगोलीय घटना का अध्ययन किया गया था। इस टीम में डा. जेबी श्रीवास्तव, डा. बीबी सनवाल, डीसी जोशी, डा. एचएस मेहरा, डा.एके पांडे व डा. बीसी भट्ट ने सौर घटना के महत्वपूर्ण फोटो द्वारा इस पर शोध किया। इस बाबत पूछे जाने पर एरीज के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा.शशिभूषण पांडे कहते हैं कि वर्ष 2016 और वर्ष 2040 में भी धूमकेतु पृथ्वी के करीब से गुजरेगा। धूमकेतु व पृथ्वी की यह नजदीकी पृथ्वी व चंद्रमा के बीच की दूरी की 30 गुना तक हो सकती है। इतनी दूर से गुजरने को भी खगोल विज्ञान के दृष्टिकोण से पास से गुजरना ही कहा जाता है। धूमकेतु क्या होते हैं ? नैनीताल। धूमकेतु अंतरिक्ष में घूमने वाले ऐसे सूक्ष्म ग्रह हैं जो सौरमंडल में मंगल व बृहस्पति ग्रहों के बीच बहुतायत क्षेत्र मे फैले हैं। कभी-कभार ये पृथ्वी के आसपास भी भटकते हैं। इसी तरह का एक धूमकेतु लेवी शूमेकर भी रहा। जिसकी खोज वैज्ञानिक कैरोलिन शूमेकर व डेविड लेवी ने 1993 में की थी। यह धूमकेतु बृहस्पति से टक्कर में 22 जुलाई 1994 को नष्ट हो गया। वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार इस टक्कर से लगभग साढ़े चार करोड़ मेगाटन टीएनटी मात्रा में ऊर्जा भी निकली थी। ज्ञात रहे कि इस तरह की टक्कर पृथ्वी से होती तो यहां जीवन के साथ-साथ पृथ्वी का अस्तित्व भी नहीं रहता। विश्व भर के अंतरिक्ष शोध संस्थान इस घटना से प्राप्त फोटो के आधार पर पिछले डेड़ दशक से शोध कर रहे हैं। खगोल वैज्ञानिकों के लिए अच्छा ‘टेस्ट मैच’नैनीताल। एक ओर जहां धूमकेतु की पृथ्वी से टकराने की घटना ने खगोल वैज्ञानिकों के माथे पर चिंता की लकीर खीचीं है, दूसरी ओर भविष्य की इस संभावित घटना के लिए अच्छा प्लेटफार्म भी पाया है। इस बाबत एरीज के वरिष्ठ सौर वैज्ञानिक बहाबउद्दीन बताते हैं कि इस तरह की घटनाओं से निपटने की तैयारियों में खगोल विज्ञान और शक्तिशाली होता रहा है। दूसरी ओर यह माना जा रहा है इस तरह कि संभावित घटना पृथ्वी को आकाशीय पिंडों से बचाने व उन्हें दूर धकेलने व मिसाइल आदि से समुद्री क्षेत्र में गिराने की नई सौर तकनीकों से रूबरू होगा। यह भी सच है कि इस संभावित घटना से सौर वैज्ञानिक कई महत्वपूर्ण खोजों के साथ कईं आंकड़े भी जुटा पायेगें। पृथ्वी का बॉडीगार्ड है बृहस्पति नैनीताल। वेद पुराणों में बृहस्पति को गुरु का दर्जा मिला है। वहीं सौर विज्ञान में यह बॉडीगार्ड की भूमिका को निभाता रहा है। आकार में पृथ्वीं से कई गुना बड़ा होने के कारण यह पृथ्वी की सौर कक्षा की ओर आने वाले आकाशीय पिंडों को अपने गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में लेकर उन्हें पृथ्वी की ओर आने से रोकता है।क्या होते हैं क्षुद्रग्रहक्षुद्रग्रह या ‘बौने ग्रह’ ब्रह्माण्ड में विचरण करने वाले आकाशीय पिंड होते हैं। इनका आकर असमान होता है। पथरीले और धातुओं के ऐसे पिंड है जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं लेकिन इतने लघु हैं कि इन्हें ग्रह नहीं कहा जा सकता। हमारी सौर प्रणाली में लगभग 1,00,000 क्षुद्रग्रह हैं लेकिन उनमें से अधिकतर इतने छोटे हैं कि उन्हें पृथ्वी से नहीं देखा जा सकता। प्रत्येक क्षुद्रग्रह की अपनी कक्षा होती है, जिसमें ये सूर्य के चारों और घूमते रहते हैं। इनमें से सबसे बड़ा क्षुद्र ग्रह हैं ‘सेरेस’। इतालवी खगोलवेत्ता पीआज्जी ने इस क्षुद्रग्रह को जनवरी 1801 में खोजा था। केवल ‘वेस्टाल’ ही एक ऐसा क्षुद्रग्रह है जिसे नंगी आंखों से देखा जा सकता है, यद्यपि इसे सेरेस के बाद खोजा गया था। इनका आकार 1000 किमी व्यास के सेरस से 1 से 2 इंच के पत्थर के टुकड़ों तक होता है। ये क्षुद्र ग्रह पृथ्वी की कक्षा के अंदर से शनि की कक्षा से बाहर तक है। इनमें से दो तिहाई क्षुद्रग्रह मंगल और बृहस्पति के बीच में एक पट्टे में है। ‘हिडाल्गो’ नामक क्षुद्रग्रह की कक्षा मंगल तथा शनि ग्रहों के बीच पड़ती है। ‘हर्मेस’ तथा ‘ऐरोस’ नामक क्षुद्रग्रह पृथ्वी से कुछ लाख किलोमीटर की ही दूरी पर हैं।धूमकेतु व उल्का इस तरह हैं क्षुद्रग्रहों से अलग8 मार्च 1986 को देखा गया हेली धूमकेतुनैनीताल। क्षुद्रग्रह जहां हमारे सौरमंडल में मंगल व बृहस्पति ग्रहों के बीच की एक खास पट्टी में अवस्थित होते हैं, वहीं धूमकेतु सौरमंडल के सबसे बाहरी, प्लूटो से भी बाहर के क्षेत्र में होते हैं। इनके साथ धूल व छोटे पिंडों का गुबार होता है, जोकि सूर्य के विपरीत दिशा में पूंछ के रूप में दिखाई देता है। इसी कारण इन्हें पुच्छल तारा भी कहा जाता है। हेली पुच्छल तारा काफी चर्चित रहा है। एडमंड हेली नाम के वैज्ञानिक ने सिद्ध किया कि 1531, 1582 और 1607 में देखा गया धूमकेतु एक ही था और 1957 में फिर से दिखने की भविष्यवाणी की। वास्तव में 1959 में यह धूमकेतु आसमान में फिर से दिखा तब उसका नाम हेली धुमकेतू रखा गया। उन्होंने सर्वप्रथम सन 1705 में इसे पहचाना था।हैली धूमकेतु भीतरी सौरमंडल में आखरी बार सन 1986 में दिखाई दिया था और यह अगली बार सन 2061 में दिखाई देगा। यह प्रत्येक 75 से 76 वर्ष के अंतराल में पृथ्वी से नजर आता है।वहीं इसकी पूंछ के रूप में दिखने वाले कुछ मिमी से कुछ सेमी के आकार के छोटे उल्का कहे जाने वाले पिंडों का भी कई बार धरती पर उल्का पात होता है। यह भी अत्यधिक गति से होने की वजह से जानलेवा हो सकते हैं। क्षुद्रग्रह मुख्य रूप से खनिज और चट्टान से बने होते हैं, जबकि धूमकेतु धूल और गैसों की बर्फ के बने होते हैं। इन्हें ‘गिरते तारे’ की संज्ञा भी दी जाती है।Share this: Click to share on Facebook (Opens in new window) Facebook Click to share on X (Opens in new window) X Click to share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...Related Post navigationअखबारों की पीडीएफ कॉपी बनाना व सोशल मीडिया पर फैलाना अवैध, हो सकती है कार्रवाई : आईएनएस नए कुमाऊँ आयुक्त 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