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नवीन समाचार, हरिद्वार, 12 जनवरी 2026 (Price List of Golgappas Viral)। उत्तराखंड के हरिद्वार जनपद अंतर्गत लक्सर (Laksar) में सूचना का अधिकार अधिनियम (Right To Information Act – RTI) से जुड़ा एक रोचक लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से गंभीर मामला सामने आया है। नगर पालिका (Municipality) से विकास कार्यों और निविदाओं (Tender) की जानकारी मांगने वाले आवेदक को जो दस्तावेज उपलब्ध कराए गए, उनमें विकास कार्यों की प्रतियों के बीच एक प्रतिष्ठित मिष्ठान दुकान की चाट-पकौड़ी और गोलगप्पों की रेट सूची (Rate List) भी संलग्न निकली।

(Price List of Golgappas Viral) Laksar RTI Response यह सूची सोशल मीडिया (Social Media) पर साझा होते ही वायरल हो गई और लोगों की मजाकिया प्रतिक्रियाओं के बीच नगर पालिका की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आरटीआई व्यवस्था में दस्तावेजों की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) का अर्थ जवाबदेही और विश्वसनीयता होता है, ऐसे में गलत दस्तावेज भेजना सरकारी प्रक्रिया की गंभीर लापरवाही मानी जा रही है।

आरटीआई में मांगी थी विकास कार्यों की जानकारी, दस्तावेजों में निकली गोलगप्पों की सूची

प्राप्त जानकारी के अनुसार लक्सर निवासी शिवम कश्यप (Shivam Kashyap) ने नगर पालिका क्षेत्र में हुए विकास कार्यों तथा समाचार पत्रों में प्रकाशित निविदाओं से संबंधित जानकारी आरटीआई के माध्यम से मांगी थी। नगर पालिका कर्मचारियों ने आवेदक को मांगी गई सूचना के आधार पर दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराईं।

जब आवेदक ने इन दस्तावेजों की जांच की, तो उनके बीच एक अलग ही कागज मिला। यह कागज विकास कार्यों से संबंधित नहीं था, बल्कि एक प्रतिष्ठित मिष्ठान दुकान की चाट-पकौड़ी और गोलगप्पों की कीमतों की सूची थी। आवेदक ने इसे अपने सोशल मीडिया खाते (Social Media Account) पर साझा कर दिया, जिसके बाद यह मामला तेजी से वायरल हो गया।

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब विषय विकास कार्य और निविदाएं थीं, तो खाद्य सामग्री की सूची सरकारी दस्तावेजों के साथ कैसे पहुंच गई। क्या यह केवल त्रुटि थी या कार्यालयीय लापरवाही का संकेत—यही अब बहस का केंद्र बन गया है।

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं, लोग ले रहे मजाकिया अंदाज में चटकारे

रेट सूची वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोग इसे लेकर मजाकिया टिप्पणियां कर रहे हैं। कई लोगों ने इसे “आरटीआई में चाट सेवा” जैसी बातों से जोड़कर प्रतिक्रिया दी, जबकि कुछ लोगों ने नगर पालिका के दस्तावेज प्रबंधन पर तंज कसा।

हालांकि यह घटना देखने में हल्की-फुल्की लग सकती है, लेकिन इसके पीछे प्रशासनिक गंभीरता छिपी है। यदि आरटीआई में गलत कागज गलती से भेजा जा सकता है, तो क्या भविष्य में किसी व्यक्ति की निजी या संवेदनशील जानकारी भी इसी प्रकार अनजाने में सार्वजनिक हो सकती है—यह चिंता भी इस घटना से जुड़ती है।

नगर पालिका अधिशासी अधिकारी का पक्ष, “गलती से बिल संलग्न हो गया होगा”

इस पूरे मामले पर नगर पालिका अधिशासी अधिकारी मोहम्मद कामिल (Executive Officer – Mohammad Kamil) ने कहा कि एक आवेदक द्वारा विकास कार्यों को लेकर सूचना मांगी गई थी, सूचना में दिए गए दस्तावेजों में गलती से यह बिल अथवा रेट सूची चली गई होगी। उन्होंने यह भी कहा कि होली (Holi) और दीपावली (Diwali) जैसे पर्वों पर मिठाई की दुकानों से सामग्री मंगाई जाती है, संभव है उसी से संबंधित रेट सूची किसी दस्तावेज के साथ गलती से संलग्न हो गई हो।

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अधिशासी अधिकारी के अनुसार कर्मचारियों से पूछताछ की जाएगी, ताकि त्रुटि का वास्तविक कारण स्पष्ट हो सके। यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि इससे नगर पालिका स्तर पर इस मामले को त्रुटि मानते हुए भी जांच की आवश्यकता स्वीकार की गई है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह घटना, सूचना अधिकार और दस्तावेजों की विश्वसनीयता का प्रश्न

आरटीआई कानून का उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। जब कोई नागरिक विकास कार्यों और निविदाओं की जानकारी मांगता है, तो उसे जो दस्तावेज दिए जाते हैं, वे प्रमाणित माने जाते हैं। ऐसे में गोलगप्पों की कीमतों की सूची जैसी असंबंधित प्रति मिलना सरकारी रिकॉर्ड प्रबंधन, दस्तावेज छंटाई और सूचना उपलब्ध कराने की प्रक्रिया पर प्रश्न खड़े करता है।

यह घटना यह भी दिखाती है कि आरटीआई के तहत जो भी दस्तावेज नागरिक को दिए जाते हैं, वे सार्वजनिक क्षेत्र में आ सकते हैं। इसलिए दस्तावेजों की जांच, सत्यापन और सही संलग्नक (Attachment) सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा विभाग की छवि के साथ-साथ प्रशासनिक विश्वसनीयता पर असर पड़ता है।

आगे क्या, पूछताछ और प्रक्रिया में सुधार की जरूरत

अब ध्यान इस बात पर है कि नगर पालिका पूछताछ के बाद क्या निष्कर्ष निकालती है। क्या यह एक साधारण लापरवाही थी या दस्तावेजों का रिकॉर्ड प्रबंधन (Record Management) कमजोर है। ऐसी घटनाओं के बाद सामान्यतः कार्यालयों में दस्तावेज वितरण से पहले दोहरी जांच (Double Verification) की व्यवस्था लागू की जाती है, ताकि आरटीआई जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में त्रुटि की गुंजाइश कम हो।

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By डॉ.नवीन जोशी

डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, 'कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन 'नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड' के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।

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