एक्सक्लूसिव : क्या बदल रही है नैनीताल की राजनीति ? पालिकाध्यक्ष ने किया सांसद का अभिनंदन, निकाले जा रहे निहितार्थ

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नगर पालिका परिषद कार्यालय में सांसद अजय भट्ट का पुष्पगुच्छ से स्वागत-अभिनंदन करते पालिकाध्यक्ष सचिन नेगी।

नवीन समाचार, नैनीताल, 27 जनवरी 2020। देश की दूसरी सबसे पुरानी ऐतिहासिक नगर पालिका नैनीताल के सांसद सचिन नेगी ने रविवार को गणतंत्र दिवस के अवसर पर क्षेत्रीय सांसद अजय भट्ट का अपने कार्यालय में पुष्पगुच्छ से स्वागत अभिनंदन किया। इसके उपरांत पालिकाध्यक्ष नेगी क्षेत्रीय विधायक संजीव आर्य के साथ चलने के आमंत्रण को स्वीकार कर सांसद व अन्य अन्य भाजपा नेताओं के साथ नगर की सबसे पुरानी धार्मिक सामाजिक संस्थाओं में शुमार श्रीराम सेवक सभा के अध्यक्ष मनोज साथ एवं उत्तराखंड जल संस्थान के कर्मचारी नेता विजय साह की माता के देहावसान पर उनके घर श्रद्धांजलि देने भी साथ पहुंचे। इसके सियासी मायने निकाले जा रहे हैं।
बताया गया है कि गणतंत्र दिवस के ऐतिहासिक फ्लैट्स मैदान में हुए कार्यक्रम के उपरांत डीएसए के पैविलियन में चाय पीने के बाद सांसद अजय भट्ट, विधायक संजीव आर्य के आमंत्रण पर नगर पालिका परिषद कार्यालय पहुंचे, जहां पालिकाध्यक्ष सचिन नेगी ने पहली बार नगर पालिका कार्यालय में आगमन पर सांसद भट्ट का पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत अभिनंदन किया। गौरतलब है कि पालिकाध्यक्ष नेगी अपने कार्यालय के सामने ही ऐतिहासिक फ्लैट्स मैदान में आयोजित हुए गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए थे। इसके उपरांत विधायक संजीव ने पालिकाध्यक्ष नेगी से कहा, ‘आगे साथ चलना है; इसके बाद सभी लोग साथ आगे गए। भाजपा-कांग्रेस दो अलग दलों से होने के बावजूद बीते कुछ समय से ‘नगर हित में अच्छी समझ’ बनने की बात कही जा रही है। बताया जा रहा है अगले कुछ दिन में इस मुलाकात-अभिनंदन का प्रभाव सार्वजनिक तौर पर सामने आ सकता है।

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बृहस्पतिवार को बंशीधर भगत के साथ भाजपा प्रदेश मुख्यालय आते भाजपा के बागी नेता प्रमोद नैनवाल

नवीन जोशी @ नवीन समाचार, देहरादून, 17 जनवरी 2020। उत्तराखंड की राजनीति इन दिनों बदलाव के दौर से गुजरती नजर आ रही है। खासकर सत्तारूढ़ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद से विदाई के तुरंत बाद जिस तरह के दो बडे संकेत नजर आ रहे हैं, उससे यह संकेत नजर आ रहा था कि अजय भट्ट को लेकर सरकार एवं संगठन में भारी नाराजगी थी। भट्ट के जाने के बाद ही सरकार ने अपने 10 नेताओं को राज्य मंत्री स्तर के दायित्व एवं 13 मंडी परिषदों में अध्यक्ष एवं उपाध्यक्षों की नियुक्ति की गई। दूसरे भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष बनते हुए बंशीधर भगत भाजपा के उन बागी नेता के साथ भाजपा जिला मुख्यालय पहुंचे, जिन्हें अजय भट्ट पिछले तीन सालों में दो बार पार्टी से 6 वर्ष के निष्कासित कर चुके हैं। एक बार उनके कुछ दिनों के लिए पद से अलग होते इन बागी नेता का 6 वर्ष का निष्कासन रद्द कर दिया गया था, और अब दूसरी बार भी ऐसा होना तय माना जा रहा है, बल्कि इस बात की भी पूरी संभावना है कि उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में अजय भट्ट की परंपरागत रानीखेत विधानसभा से टिकट ही दे दिया जाए।
पहले बात राज्य में पौने तीन साल का वक्त बिता चुकी भाजपा सरकार द्वारा पहली बार बड़े स्तर पर दायित्वों के बंटवारे की। दायित्वों के बंटवारे की यह टाइमिंग केवल दो कारणों से ही हो सकती है। पहला अजय भट्ट के जाने के कारण और दूसरा भाजपा का झारखंड, महाराष्ट्र आदि राज्यों में मिली हार के कारण। बताया जा रहा है कि भट्ट अपनी पसंद के संगठन से जुड़े नेताओं को दायित्व दिलाना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए राज्य सरकार को लंबी-चौड़ी सूची काफी पहले थमाई भी थी, किंतु सरकार इसे टालती रही और उनके जाते ही इस सूची से बाहर के भी कुछ लोगों को दायित्व दे दिये गये। लेकिन यदि झारखंड, महाराष्ट्र आदि राज्यों में मिली हार के कारण अब दायित्व दिये गये हैं तो इसे सरकार के बैकफुट पर आने के रूप में देखा जा सकता है।
वहीं दूसरी गौर करने वाली बात भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत की ताजपोशी के दौरान यह दिखी है कि वह पार्टी के बागी-छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित नेता प्रमोद नैनवाल के साथ पार्टी मुख्यालय में प्रवेश करते दिखे। प्रमोद नैनवाल अजय भट्ट से अदावत रखने वाले सबसे प्रमुख नेता रहे हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में वे तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट की परंपरागत रानीखेत सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे। टिकट अजय भट्ट को मिला तो प्रमोद बागी होकर निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर गए। खुद तो नहीं जीत पाए लेकिन अजय भट्ट की हार के प्रमुख कारण जरूर साबित हुए। वह भी तब, जब प्रदेश में भाजपा को 70 में से 57 सीटें जीतीं लेकिन खुद पार्टी का मुखिया चुनाव हार गया। ऐसी हिमाकत पर प्रमोद का पार्टी से निष्कासित होना तय ही था। अन्य बागी नेताओं के साथ उन्हें भी छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित किया गया, किंतु 2019 के लोक सभा चुनावों के दौरान जब अजय भट्ट नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के लिए उतरे और चुनाव के दौरान के लिए उनकी जगह नरेश बंसल को भाजपा का कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, प्रमोद नैनवाल का छह वर्ष का निष्कासन रद्द कर दिया गया। इसमें अल्मोड़ा के सांसद अजय टम्टा व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्रमुख भूमिका बताई गई। स्वयं मुख्यमंत्री की ओर से अल्मोड़ा में इसकी घोषणा की गई। लेकिन प्रमोद हालिया त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में फिर बागी तेवर अपना बैठे। अपने परिवार की सदस्यों को बागी चुनाव में उतार दिया, फलस्वरूप भाजपा के घोषित प्रत्याशी चुनाव हारे। फलस्वरूप प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने दुबारा उन्हें छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। लेकिन अब अजय भट्ट के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने के बाद जिस तरह उनकी नये प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत के साथ प्रदेश मुख्यालय में इंट्री हो चुकी है, तो उनकी पार्टी में इंट्री भी अधिक कठिन नहीं होगी। साथ ही यह भी संभावना जताई जा रही है कि वे ही आगामी 2022 के विधानसभा चुनाव में अजय भट्ट की परंपरागत रानीखेत विधानसभा से पार्टी के प्रत्याशी होंगे।

यह भी पढ़ें : बड़ा समाचार: उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा मोड़, खुद घिरे तो ‘रावत’ के खिलाफ याचिका वापस लेने चले ‘रावत’ !

नवीन समाचार, देहरादून, 4 नवंबर 2019। उत्तराखंड की राजनीति क्या एक बार फिर नये मोड़ पर आ खड़ी हुई है ? प्रदेश के बहुचर्चित विधायकों की खरीद के स्टिंग प्रकरण में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने वाले उनके पूर्व सहयोग काबीना मंत्री डा. हरक सिंह रावत अब याचिका वापस लेने का मन बनाने लगे हैं। उन्होंने कहा है, बदली राजनीतिक परिस्थितियों में अब उस याचिका का कोई औचित्य नहीं रह गया है। उनके इस एक लाइन के कथन से कई सवाल उठ खड़े हुए हैं। इस मामले में हरीश रावत के साथ स्वयं हरक के खिलाफ भी सीबीआई द्वारा गत 23 अक्तूबर को राज्य बनाम हरीश रावत का मुकदमा दर्ज कर लिये जाने के बाद क्या राज्य के राजनीतिक हालात किसी नये मोड़ पर आ खड़े हुए हैं, जहां खुद को घिरता देख हरक का भाजपा से भी मोहभंग हो गया है, और वे किसी नई राजनीतिक दिशा की ओर चलेंगे ? क्या सीबीआई द्वारा दर्ज मुकदमे पर हरक के याचिका वापस लेने का कोई प्रभाव पड़ेगा, या कि मुकदमा अपनी तरह से चलता रहेगा ? गौरतलब है कि इस मुकदमे को पहले ही हरीश रावत नियमविरुद्ध बताकर उच्च न्यायालय में चुनौती दे चुके हैं। और वैसे भी यह मुकदमा हरीश रावत के विरुद्ध पहले से चल रहे मामले के अंतिम निर्णय पर निर्भर रहने वाला है, जिसमें उच्च न्यायालय को तय करना है कि मार्च 2016 में प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगने के दौर में राज्यपाल द्वारा सीबीआई को मामले की जांच सोंपने और फिर डा. इंदिरा हृदयेश की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में इस जांच की जगह एसआईटी से जांच कराने के निर्णय में क्या सही और क्या गलत था। इन सभी प्रश्नों के उत्तर आगे भविष्य ही देगा।

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