नवीन समाचार, पौड़ी गढ़वाल, 12 जनवरी 2026 (Yamkeshwar-AI Video on Lion)। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल (Pauri Garhwal) जनपद अंतर्गत यमकेश्वर (Yamkeshwar) क्षेत्र के माला गांव (Mala Village) में शुक्रवार को उस समय अफरा-तफरी का माहौल बन गया, जब धन्वंतरी धाम (Dhanvantari Dham) के आसपास बब्बर शेर (Lion) दिखने का एक वीडियो सोशल मीडिया (Social Media) पर तेजी से वायरल हो गया। वीडियो इतना वास्तविक प्रतीत हो रहा था कि ग्रामीण घरों में दुबक गये और “शेर आया” जैसी चर्चाएं जंगल से गांव तक फैल गईं।
लेकिन जांच में सामने आया कि यह वीडियो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence – AI) की सहायता से तैयार किया गया था। कथित तौर पर श्रमिकों को छुट्टी नहीं मिलने से नाराज एक मजदूर ने यह वीडियो बनाकर अपलोड किया था। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल भ्रम, जनसुरक्षा, वन विभाग की सतर्कता और एआई के दुरुपयोग जैसे मुद्दों को एक साथ सामने लाती है।
धन्वंतरी धाम के पास वायरल वीडियो से फैली चर्चा, काम रोककर घर लौटने की बात
प्राप्त जानकारी के अनुसार माला गांव में धन्वंतरी धाम के पास बब्बर शेर दिखाई देने का वीडियो जैसे ही लोगों ने देखा, ग्रामीणों में दहशत की स्थिति बन गई। कई लोग घरों से बाहर निकलने से बचने लगे और मोबाइल कैमरे (Mobile Camera) चालू कर आसपास रिकॉर्डिंग करने लगे। वीडियो देखकर कुछ लोगों ने गांव में शेर की मौजूदगी की बात को सच मान लिया।
बताया गया कि वीडियो इतना वास्तविक लग रहा था कि ठेकेदार (Contractor) भी इसे देखकर हैरान रह गया और गांव में शेर आने की पुष्टि तक कर दी। इसी बीच, काम कर रहे श्रमिकों ने कुछ दिन के लिए घर लौटने की बात कह दी, जिससे कार्य प्रभावित हुआ और कुछ समय के लिए काम ठप पड़ गया।
क्या एक वायरल वीडियो किसी पूरे गांव की दिनचर्या को रोक सकता है। इस घटना ने इसी प्रश्न को वास्तविक रूप में सामने रखा, क्योंकि भय और भ्रम की स्थिति में सामान्य गतिविधियां रुक गईं।
वन विभाग भी असमंजस में, क्षेत्र में बब्बर शेर का प्राकृतिक अस्तित्व नहीं
घटना की जानकारी सामने आने के बाद वन विभाग (Forest Department) के स्तर पर भी चिंता बढ़ गई। अधिकारियों ने यह सवाल उठाया कि बब्बर शेर इस क्षेत्र में पाया ही नहीं जाता, फिर वह धन्वंतरी धाम तक कैसे पहुंच गया। यह असमंजस इसलिए बढ़ा क्योंकि वीडियो में दिखाई दे रहा दृश्य वास्तविक क्षेत्र से मेल खाता प्रतीत हो रहा था। नतीजतन, वन विभाग भी “सवालों के जंगल” में उलझ गया और स्थिति की पुष्टि के लिए टीमों को मौके पर भेजा गया।
लालढांग रेंज और राजाजी टाइगर रिजर्व की टीम मौके पर पहुंची, पूछताछ से खुला सच
शनिवार को लालढांग रेंज (Laldhang Range) और राजाजी टाइगर रिजर्व (Rajaji Tiger Reserve) की टीमें मौके पर पहुंचीं। टीमों ने क्षेत्र का निरीक्षण किया और श्रमिकों से पूछताछ की। जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि न तो बब्बर शेर आया था, न किसी तरह के पदचिन्ह (Pugmarks) मिले और न ही वन्यजीव गतिविधि के प्रमाण सामने आए। पूछताछ में पता चला कि वीडियो फर्जी था और इसे एआई के माध्यम से तैयार कर वायरल किया गया था।
इस खुलासे के बाद वन विभाग ने राहत की सांस ली, क्योंकि वास्तविक वन्यजीव खतरे की स्थिति नहीं थी। लेकिन इसके साथ ही यह चिंता भी उभरी कि एआई तकनीक के जरिए कितनी आसानी से ऐसा वीडियो बनाकर जनभावना और प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित किया जा सकता है।
छुट्टी न मिलने का विवाद, मजदूर ने एआई से बना दिया शेर का वीडियो
जांच में सामने आया कि श्रमिकों ने ठेकेदार से छुट्टी मांगी थी, लेकिन जब छुट्टी नहीं मिली तो एक मजदूर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence – AI) की मदद से शेर की फोटो और वीडियो तैयार कर सोशल मीडिया पर डाल दिया। इसके बाद यह वीडियो वायरल हो गया। कुछ लोगों ने इसे धार्मिक और स्थानीय पहचान से जोड़कर इसे आचार्य बालकृष्ण (Acharya Balkrishna) के सोशल मीडिया अकाउंट (Social Media Account) तक भी पहुंचा दिया, जिससे वीडियो और तेजी से फैल गया।
यह मामला केवल “छुट्टी” का नहीं रह गया। यह दिखाता है कि तकनीकी साधनों के गलत उपयोग से जनसुरक्षा और प्रशासनिक संसाधनों पर कितना दबाव पड़ सकता है। जब वन विभाग की टीमों को भ्रमित सूचना पर तैनात करना पड़े, तो वास्तविक मानव–वन्यजीव संघर्ष या आपदा प्रबंधन जैसी प्राथमिक स्थितियों में संसाधन प्रभावित हो सकते हैं।
अधिकारियों का बयान, फर्जी वीडियो का पता चला
लैंसडौन वन प्रभाग (Lansdowne Forest Division) के उप प्रभागीय वनाधिकारी सुधीर कुमार (Sub Divisional Forest Officer – Sudhir Kumar) ने बताया कि मामले की जांच के लिए टीम भेजी गई थी। जांच में पता चला कि काम से छुट्टी न मिलने के कारण मजदूर ने एआई के माध्यम से फर्जी फोटो और वीडियो वायरल किया था। उन्होंने संकेत दिया कि इस प्रकार की भ्रामक सामग्री फैलाने से जनसुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है, इसलिए ऐसे मामलों को गंभीरता से लिया जाएगा।
पृष्ठभूमि, एआई और डिजिटल जिम्मेदारी पर बड़ा संकेत
यह घटना उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता (Digital Literacy) और तकनीकी जिम्मेदारी (Tech Responsibility) के महत्व को रेखांकित करती है। एआई अब शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और प्रशासन में उपयोगी साबित हो रहा है, लेकिन इसका गलत प्रयोग सामाजिक भ्रम, भय और कानून-व्यवस्था की समस्या भी उत्पन्न कर सकता है।
क्या भविष्य में ऐसे वीडियो और अधिक बढ़ सकते हैं। क्या तकनीक के उपयोग के साथ नागरिक जिम्मेदारी और कानूनी जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। यह घटना इसी दिशा में चेतावनी बनकर सामने आई है।
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डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड’ के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।














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