- इस लोक पर्व की ठेठ कुमाउनी आशीषों में त्रेता युग में देवर्षि विश्वामित्र द्वारा भगवान श्रीराम को दी गईं ‘आकाश की तरह ऊँचे होने और धरती की तरह चौड़े होने’ की आशीषों का भाव भी होता है
डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 16 जुलाई 2022। (Lok Parv) `लाग हरिया्व, लाग दसैं, लाग बग्वाल, जी रये, जागि रये, यो दिन यो मास भेटनैं रये, तिष्टिये, पनपिये, हिमाल में ह्यूं छन तक, गंग ज्यू में पांणि छन तक, अगासाक चार उकाव, धरती चार चकाव है जये, स्याव कस बुद्धि हो, स्यों जस तराण हो, दुब जस पंगुरिये, सिल पिसी भात खाये, जाँठ टेकी झाड़ जाए…´ यानी 10वें दिन कटने वाला हरेला तुम्हारे लिए शुभ होवे, बग्वाल तुम्हारे लिए शुभ होवे, तुम जीते रहो, जाग्रत रहो, यह शुभ दिन, माह तुम्हारी जिन्दगी में आते रहें, समृद्ध बनो, विकसित होवो, हिमालय में जब तक बर्फ है, गंगा में जब तक पानी है, आकाश की तरह ऊँचे हो जाओ, धरती की तरह चौड़े हो जाओ, सियार की सी तुम्हारी बुद्धि होवे, दूब घास की तरह फैलो, (इतनी अधिक उम्र जियो कि) भात भी पीस कर खाओ…..
यह वह आशीषें हैं जो कुमाऊं अंचल में एक ऋतु व प्रकृति पर्व हरेला के अवसर पर घर के बड़े सदस्य सात अनाजों की पीली पत्तियों (हरेले के तिनड़ों) को बच्चों, युवाओं के सिर में रखते हुऐ देते हैं। इन ठेठ कुमाउनी आशीषों में त्रेता युग में देवर्षि विश्वामित्र द्वारा भगवान श्रीराम को दी गईं ‘आकाश की तरह ऊँचे होने और धरती की तरह चौड़े होने’ की आशीषों का भाव भी है। प्रियजन घर की बजाय दूर प्रवास पर सात समुद्र पार भी हों तो उन्हें हरेले के पीले तिनके चिटि्ठयों के जरिऐ भेजे जाते हैं, जिनका उन्हें भी वर्ष भर इन्तजार रहता है।
एक अनूठी लोक मान्यताओं के अनुसार आज के दिन धरती और आसमान का विवाह हुआ था। यह लोक मान्यता यह भी बताती है कि कैसे धरती हो या आसमान, या प्रकृति की कोई भी वस्तु, सभी को हमारी मान्यताओं में देवी-देवता के रूप में माना गया है, या मानवीकृत किया गया है।
हरेला कुमाऊं में वर्ष में तीन बार, चैत्र माह के प्रथम दिन, श्रावण माह लगने से नौ दिन पूर्व आषाड़ माह में और आश्विन नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है, और इसी प्रकार नौ दिन बाद चैत्र माह की नवमी, श्रावण माह के प्रथम दिन और दशहरे के दिन काटा जाता है। श्रावण मॉस में मनाया जाने वाला हरेला बरसात के दिनों में पवित्र व शिव के माने जाने वाले श्रावण मास की संक्रांति को मनाया जाता है, इसी दिन सूर्यदेव दक्षिणायन तथा कर्क से मकर रेखा में प्रवेश करते हैं।
हरेले के लिए पांच अथवा सात अनाज गेहूं, जौं, मक्का, उड़द, सरसों, गहत, कौंड़ी, मादिरा, धान और भट्ट आदि के बीज घर के भीतर रिंगाल की टोकरियों अथवा लकड़ी के बक्सों में एक विशिष्ट पद्धति से पांच अथवा सात परतों में मिट्टी के साथ बोये जाते हैं, और प्रतिदिन नियमानुसार सुबह-शाम पूजा के बाद पानी दिया जाता है। धूप की रोशनी न मिलने के कारण यह पौधे पीले तिनकों के रूप में दिखते हैं। 10वें दिन यानी संक्रान्ति को इन्हें घर के बुजुर्ग अथवा महिलाऐं काटकर आशीषों के साथ पहले घर के मन्दिरों, फिर गांव के मन्दिरों, घर के द्वारों तथा बाद में बच्चों, युवाओं व बड़ों को एक विशेष पद्धति से पांवों से शुरू करते हुऐ शिर में आशीषों के साथ चढ़ाते हैं।
माना जाता है कि जिस घर में हरेले के पौधे जितने बड़े होते हैं, उसके खेतों में उस वर्ष उतनी ही अच्छी फसल होती है। इस प्रकार इस पर्व से बिना सूर्य की रोशनी के दुरूह परिस्थितियों में पौधों को अधिक तेजी से उगाने की प्रेरणा भी मिलती है। इस त्योहार को उत्तम कृषि उपज, हरियाली, धनधान्य, सुख संपन्नता आदि से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिव पत्नी सती को अपना कृष्ण वर्ण नहीं भाता था, इसलिऐ वह अनाज के पौधों, हरेले के रूप में गौरा रूप में अवतरित हुईं। इस पर्व को शिव विवाह से भी जोड़ा जाता है। इस दिन शिव पार्वती की पूजा का प्राविधान है।
डिकारों का भी है प्राविधान
हरेले की पूर्व संध्या को डिकारे बनाने का प्राविधान है। सामान्यतया लाल चिकनी मिट्टी से बिना किसी सांचे के शिव, गौरा एवं गणेश जी की मूर्तियां बनाई जाती हैं, जिन्हें डिकारे कहा जाता है। कई बार डिकारे केले के तने, भृंगराज आदि से भी बनाऐ जाते हैं। इनमें पहले चावल के आटे से श्वेत तथा फिर किलमोड़े, अखरोट, पांगर के छिलकों, कोयले तथा विभिन्न वनस्पतियों के प्राकृतिक रंगों से रंग कर चेहरे की आकृतियां बनाई जाती हैं। शिव सामान्यता नीले तथा गौरा सफेद बनाई जाती हैं।
हरेला से पहले ‘हर काली’ पर्व
नैनीताल। कुमाऊं मंडल में हरेला पर्व से एक दिन पहले ‘हर काली’ पर्व मनाया जाता है। परंपराओं के विशेषज्ञ परंपरा संस्था के प्रमुख बृजमोहन जोशी के अनुसार ‘हर काली’ में ‘हर’ शब्द भगवान शिव और ‘काली’ शब्द माता पार्वती के लिए प्रयुक्त होता है। 9 से 11 दिन पूर्व बोया जाने वाला हरेला पर्व के एक दिन पूर्व हर काली के दिन हरेला बोने के लिए ही प्रयुक्त मिट्टी से देवताओं के डिगारे यानी प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, और एक दिन पूर्व इन्हें रंगा जाता है। हर काली के दिन पंडित इन मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करते हैं और इन्हें हरेला चढ़ाया जाता है, जबकि घर के सदस्यों को हरेला एक दिन बाद हरेला के दिन चढ़ाया जाता है।
देश में अन्य जगह भी मनाऐ जाते हैं ऐसे ही ऋतु पर्व
हरेला जैसे ही ऋतु पर्व देश के अन्य हिस्सों में कमोबेश समान एवं अलग तरीकों से मनाऐ जाते हैं। यहाँ उत्तराखंड के के गढ़वाल अंचल में हरियाला पर्व मनाया जाता है। इसके साथ ही झारखण्ड में बालिकाओं द्वारा अंकुरित बीजों के चारों ओर सामूहिक गायन के साथ इसी तरह का त्यौहार मनाया जाता है, राजस्थान में जौ के बीजों के साथ गणगौर पर्व, हिमाचल प्रदेश के लाहुल में शीत ऋतु में अंधेरे में जौं के पीले अंकुरों (यौरा) उगाने के रूप में, हरियाणा और पशिम बंगाल में दशहरे के दौरान तथा अरुणांचल प्रदेश में भी ऐसे ही त्यौहार मनाऐ जाते हैं।
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डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 15 मार्च 2023। हिन्दू नव वर्ष यानी चैत्र महीने की 01 पैट (गते) को उत्तराखंड के कुमाऊं में मेष संक्रांति, फूल संक्रांति और फूल देई के नाम से मनाया जाता है। इस वर्ष बसन्त ऋतु के स्वागत का यह त्यौहार 15 मार्च 2023 को समूचे उत्तराखंड में बड़ी धूम-धाम से फूल देई मनाया जा रहा है। उत्तराखंड की धरती पर अलग-अलग ऋतुओं के अनुसार पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं।
ये पर्व एक ओर हमारी संस्कृति को उजागर करते हैं, तो दूसरी ओर प्रकृति के प्रति पहाड़ के लोगों के सम्मान और प्यार को भी दर्शाते हैं। इसके अलावा पहाड़ की परंपराओं को कायम रखने के लिए भी ये पर्व-त्योहार खास हैं। फूल संक्रांति यानी फूल देई का सीधा संबंध भी प्रकृति से है I इस समय चारों ओर छाई हरियाली और नाना प्रकार के खिले फूल प्रकृति के यौवन में चार चांद लगाते हैं।
पहाड़ों के साथ प्रकृति का स्वर्ग कही जाने वाली सरोवरनगरी नैनीताल में ऋतुराज बसंत का आगमन हो गया है। प्रकृति जैसे स्वयं आज फूलदेई मना रही है। फूल तो फूल कलियां भी जैसे घूंघट खोल मुस्कुराती, तितलियों-भंवरों को रिझाती नजर आ रही हैं। पतझड़ में रीते हुए चिनार-पॉपुलर के पेड़ों पर जैसे मंद-मंद मुस्कान लिये हर ओर हरियाली छा गयी है। कफुवा यानी बुरांश के साथ प्योंली ओर पयां यानी पद्म प्रजाति के पेड़ों के साथ आड़ू, पुलम, खुबानी व आलूबुखारा पर भी गुलाबी वासंती बयार छायी हुई है। इन फूलों की खुशबू से सारा चमन महका हुआ है। और यह सब जल्द शुरू होने जा रहे भारतीय नव वर्ष के स्वागत को जैसे तत्पर हैं। ऐसे मौसम-प्राकृतिक संुदरता को अपनी आंखों से निहारना चाहते हैं तो पहाड़ पर आइए, नैनीताल आइये।
हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र महीने से ही नव वर्ष शुरू होता है। इस नव वर्ष के स्वागत के लिए बसन्त के आगमन से ही पूरा पहाड़ बुरांस की लालिमा और गांव आडू, खुबानी के गुलाबी-सफेद रंगो से भर जाता है। खेतों में सरसों खिल जाती है तो पेड़ों में फूल भी आने लगते हैं। इस दिन छोटे बच्चे सुबह ही उठकर जंगलों की ओर चले जाते हैं और वहां से प्योली, फ्यूंली, बुरांस, बासिंग आदि जंगली फूलो के अलावा आडू, खुबानी, पुलम के फूलों को चुनकर लाते हैं और एक थाली या रिंगाल की टोकरी में चावल, हरे पत्ते, नारियल और इन फूलों को सजाकर हर घर की देहरी पर लोकगीतों को गाते हुये जाते हैं और देहरी का पूजन करते हुये पास-पड़ोस के घरों में जाकर उनकी दहलीज पर फूल चढ़ाते हैं और सुख-शांति की कामना करते हुए गाते हैं, और प्रकृति को इस अप्रतिम उपहार सौंपने के लिये धन्यवाद भी अदा करते हैं।
” फूलदेई, छम्मा देई.…
जतुकै देला, उतुकै सही ।
देंणी द्वार, भर भकार,
सास ब्वारी, एक लकार,
यो देलि सौ नमस्कार ।
फूलदेई, छम्मा देई.…
जतुकै देला, उतुकै सही । “
इसके बदले में उन्हें परिवार के लोग गुड़, चावल व रुपये देते हैं। इस चावल व गुड़ आदि से शाम को चावल पीसकर इसके आटे का हलवा-‘सई भी बनाया जाता है, और विशेष रुप से प्रसाद स्वरुप ग्रहण किया जाता है। इस दिन से लोकगीतों के गायन का अंदाज भी बदल जाता है, होली के फाग की खुमारी में डूबे लोग इस दिन से ऋतुरैंण और चैती गायन में डूबने लगते हैं। ढोल-दमाऊ बजाने वाले लोग जिन्हें बाजगी, औली या ढोली कहा जाता है। वे भी इस दिन गांव के हर घर के आंगन में आकर इन गीतों को गाते हैं। जिसके फलस्वरुप घर के मुखिया द्वारा उनको चावल, आटा या अन्य कोई अनाज और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है।
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कुमाऊं में ‘श्री पंचमी’, ‘सिर पंचमी’ व ‘जौं पंचमी’ के रूप में मनायी जाती है बसंत पंचमी
सभी मित्रों को फूलों के इस त्योहार की बधाइयाँ। आपके जीवन में भी इसी तरह फूलों के रंग-बिरंगे रंग खिलें।
-कुमाऊं में अलग उत्साह से मनाया जाता है ऋतुराज बसंत के आगमन का त्योहार
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं मंडल के पर्वतीय अंचलों में ऋतुराज बसंत के आगमन का पर्व ‘बसंत पंचमी” माघ माह के शुक्ल कक्ष की पंचमी की तिथि को परंपरागत तौर पर ‘श्री पंचमी’ के रूप में मनाया जाता है। इसे यहां सिर पंचमी या जौं पंचमी कहने की भी परंपरा है। इस अवसर पर ऋतुराज बसंत में खिलने वाले पीले ‘प्योंली’ के फूलों की तरह नये पीले रंग के वस्त्र धारण करने की परंपरा है। कोई पीला वस्त्र न हो तो पीले रंग के रुमाल जरूर रखे जाते हैं। साथ ही घरों व मंदिरों में खास तौर पर विद्या की देवी माता सरस्वती की विशेष पूजन-अर्चना की जाती है।
इस दिन लोग सुबह स्नान कर अपने देवी-देवताओं के थान यानी मंदिरों को और घर को गाय के गोबर से लीपते हैं। उसके बाद अक्षत-पिठ्याँ और धूप-दीप जलाकर जौं के खेतों में जाकर वहां जौं के पौधों की पूजा कर उन्हें उखाड़कर घर में लाते हैं। इन पौधों पर सरसों का तेल लगाया जाता है। परिवार के सभी लोगों को स्नान व पूजा के उपरांत अक्षत-पिठ्याँ लगाते हैं। खेतों से विधि-विधान के साथ जाैं के पौधों को उखाड़कर घर में लाते हैं, और मिट्टी एवं गाय के गोबर का गारा बनाकर इससे जौं के तिनकों को अपने घरों की चौखटों पर चिपकाते हैं, साथ ही परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जौं के तिनकों को हरेले की तरह चढ़ाते हुये आशीष दी जाती हैं। ‘लाग हरियाल, लाग बग्वाल, लाग सिर पंचमी, जी रये, जागि रये, यो दिन मास भेटनै रये’ यानी हरेला, बग्वाल एवं श्री पंचमी के त्योहार तुम्हारे लिये शुभ होवें, तुम हर वर्ष इन शुभ दिवसों को देखते जाओ।
इस अवसर पर घरों में अनेक तरह के परंपरागत पकवान भी बनते हैं। साथ ही इस दिन छोटे बच्चों को विद्यारंभ एवं बड़े बच्चों का यज्ञोपवीत संस्कार भी कराया जाता है, तथा उनके कान एवं नाक भी छिंदवाए जाते हैं। बसंत पंचमी के इस पर्व को गांवों में बहन-बेटी के पावन रिश्ते के पर्व के रूप में मनाने की भी परंपरा है। इस पर्व को मनाने के लिए बेटियां ससुराल से अपने मायके आती हैं, अथवा मायके से पिता अथवा भाई उन्हें स्वयं पकवान व आशीष देने बेटी के घर जाकर उसकी दीर्घायु की कामना करते हैं। उल्लेखनीय है पहाड़ों पर छह मौसमों में ऋतुराज बसंत का मौसम सबसे सुखद माना जाता है। इस दौरान से कड़ाके की सर्दी से निजात मिलती है, इसलिए इस त्योहार पर आम जन में खासा उत्साह नजर आता है।
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-विज्ञान व आधुनिक बौद्धिकता की कसौटी पर भी खरा उतरता है यह लोक पर्व, साफ-सफाई, पशुओं व परिवेश को बरसात के जल जनित रोगों के संक्रमण से मुक्त करने का भी देता है संदेश
डॉ. नवीन जोशी, नवीन समाचार, नैनीताल, 17 सितंबर 2021। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों, खासकर कुमाऊं अंचल में चौमांस-चार्तुमास यानी बरसात के बाद सर्दियों की शुरुआत एवं पशुओं की स्वच्छता व स्वस्थता के प्रतीक के लिए हर वर्ष आश्विन माह की पहली तिथि यानी संक्रांति के अवसर पर मनाया जाने वाला लोक पर्व ‘खतडु़वा’ ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत तरीके से एवं शहरी क्षेत्रों में औपचारिकता की तरह से मनाया जाता है। अन्य परंपरागत लोक पर्वों की तरह इस त्योहार पर भी जो कुछ किया जाता है, वह भी विज्ञान व आधुनिक बौद्धिकता की कसौटी पर खरा उतरता है, और घरेलू पशुओं व परिवेश की साफ-सफाई तथा उन्हें बरसात के जल जनित रोगों के संक्रमण से मुक्त करने का संदेश भी देता है।
दो वर्ष के अंतराल यानी वर्ष 2019 के बाद खतड़ुवा व विश्वकर्मा पूजा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिन 17 सितंबर को पड़े हैं, और तीनों ही अवसर साफ-सफाई के प्रतीक हैं। मोदी जहां ‘स्वच्छ भारत अभियान’ छेड़े हुए हैं, वहीं हर वर्ष आश्विन (असौज) माह की संक्रांति यानी प्रथम गते मनाये जाने वाले खतड़ुवा के दिन से चातुर्मास के बाद साफ-सफाई शुरू की जाती है। जबकि आश्विन (असौज) माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी की तिथि को मनायी जाने वाली विश्वकर्मा पूजा या विश्वकर्मा जयंती के दिन मशीनों-उपकरणों की सफाई की जाती है। उल्लेखनीय है कि खतड़ुवा व विश्वकर्मा पूजा सामान्यता हिंदी महीनों के हिसाब से कभी 16 तो कभी 17 सितंबर को पड़ते हैं। वर्ष 2017, 18 व 19 में लगातार तीन वर्ष यह तीनों एक दिन पड़े थे।
आइये इस वर्षों पुरानी लोक परंपरा-लोक पर्व के आज से साफ-सफाई शुरू करने के संकल्प को आज ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिन पर उनके साफ-सफाई के संदेश से जोड़ते हुए अपने घरों-परिवेश की सफाई के लिये निकलें, और देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा जी का भी स्मरण करें।
खतडु़वा लोक पर्व के अवसर पर ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अपने पालतू दुधारू गौवंशीय पशुओं तथा उनके स्थानों की साफ-सफाई करते हैं, तथा झाड़-झंखाड़ आदि को खतडु़वा के रूप में जलाकर पशुओं की रक्षा व स्वस्थ रहने की प्रार्थना करते हैं। उन्हें भरपूर मात्रा में हरी घास खिलाने के साथ ही उनके रास्ते में भी हरी घास की कालीन सी बिछाने की भी परंपरा है। उनके शरीर पर तेल भी चुपड़ा जाता है। जबकि शहरों में झाड़ियों अथवा कागज से खतडु़वे का पुतला बनाकर उसे आग के हवाले किया जाता है, एवं ककड़ियों (पहाड़ी खीरा) को प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
ककड़ियों का प्रसाद शायद इसलिए लिया जाता है, क्योंकि इस मौसम में पहाड़ों पर यही फल के रूप में सर्व सुलभ होता है। परंपरागत तौर पर माना जाता है कि इस दिन से पहाड़ों पर एक खतड़ा यानी लिहाफ ओढ़ने लायक ठंड हो जाती है। साथ ही बरसात के मौसम में प्रकृति में एवं खासकर घरेलू पशुओं के स्थान में बढ़ जाने वाले विषाणुओं को भगाने के लिए उनके स्थान (गोठ) तथा बाहर झाड़ियों को जलाकर भी साफ-सफाई की जाती है ताकि इससे उठने वाले धुंवे से नुकसानदेह कीट-पतंगे, विषाणुओं को मारने का प्रबंध स्वतः हो जाए।
इस दौरान गांवों में बच्चे ‘गाय की जीत-खतड़ुवे की हार’ के नारे लगाते हैं। लाल रंग के चुवे अथवा भांग के एक डंडे के शिरे पर बिच्छू घास बांध कर उसे मशाल का स्वरूप दिया जाता है। उसे गोठ में बंधे पशुओं के ऊपर से घुमाकर उनकी नजर, बलाएं (आधुनिक अर्थों में उन पर हुआ किसी भी तरह का संक्रमण) उतारी जाती हैं। और इस तरह इस लोक पर्व में भी मौसम बदलाव के दौरान मनाए जाने वाले होली, दीपावली तथा बैशाखी जैसे भारतीय त्योहारों की तरह आग जलाकर मौसमी बदलावों का संक्रमण दूर करने की समानता भी छुपी हुई है।
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- 1921 में इसी त्योहार के दौरान बागेश्वर में हुई प्रदेश की अनूठी रक्तहीन क्रांति, कुली बेगार प्रथा से मिली थी निजात
- घुघुतिया के नाम से है पहचान, काले कौआ कह कर न्यौते जाते हैं कौए और परोसे जाते हैं पकवान
नवीन जोशी, नैनीताल। दुनिया को रोशनी के साथ ऊष्मा और ऊर्जा के रूप में जीवन देने के कारण साक्षात देवता कहे जाने वाले सूर्यदेव के धनु से मकर राशि में यानी दक्षिणी से उत्तरी गोलार्ध में आने का उत्तर भारत में मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाने वाला पर्व पूरे देश में अलग-अलग प्रकार से मनाया जाता है। पूर्वी भारत में यह बीहू, पश्चिमी भारत (पंजाब) में लोहणी और दक्षिणी भारत (कर्नाटक, तमिलनाडु आदि) में पोंगल तथा देवभूमि उत्तराखंड में यह उत्तरायणी के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड के लिए यह पर्व न केवल मौसम परिवर्तन के लिहाज से एक ऋतु पर्व वरन बड़ा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक लोक पर्व भी है।
उल्लेखनीय है कि उत्तरायणी के दिन ही 13 जनवरी 1921 को कुली बेगार आंदोलन की परिणति उत्तराखंड की ऐतिहासिक रक्तहीन क्रांति के रूप में हुई थी। कत्यूरी शासनकाल से शुरू, चंद शासन काल में जारी रहे एवं गोरखा एवं अंग्रेजी शासनकाल में अपने सर्वाधिक बुरे-अत्याचारी रूप में रहीं कुली बेगार, कुली उतार व कुली बरदाइश की कुप्रथाओं का इस दिन अंत हुआ था।
1916 से 1921 के बीच चले कुली बेगार की आंदोलन की पृष्ठभूमि पर अनामिका फिल्म्स डेवलपमेंट सोसाइटी नैनीताल के तत्वाधान में स्वर्गीय बॉलीवुड कलाकार टॉम ऑल्टर व नगर के स्वर्गीय रंगकर्मी पंकज चौधरी, स्वर्गीय गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ व स्वर्गीय प्रेम मटियानी जैसी कलाकारों को लेकर प्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय प्रेम सिंह नेगी के उपन्यास “संकल्प की ओर” पर अंग्रेजी साम्राज्य के उत्पीड़न व अंधे कानून की मार्मिक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर कुमाउनी, हिंदी व अंग्रेजी संवादों युक्त फिल्म ‘मधुलि’ बनाई गई थी। अनामिका फिल्म्स डेवलपमेंट सोसाइटी के अध्यक्ष, निर्माता व निर्देशक सुहृद सुदर्शन शाह ने बताया कि कुली बेगार आंदोलन की 100वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में इस ऐतिहासिक महत्वपूर्ण फिल्म को आम दर्शकों तक पहुचाने के लिए यूट्यूब पर उपलब्ध करा दिया है। इस फिल्म को यहां भी देखा जा सकता है।
‘डॉ.नवीन जोशी, वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार, ‘कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले पत्रकार’ एवं मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 140 मिलियन यानी 1.40 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं।
नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।

ख़तडुवे के बारे में ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए धन्यवाद. अगली बार कृपया खतडूवे से सम्बंधित कुमाऊं गढवाल की भ्रांति का भी सत्योत्घाटन कीजिएगा. सभी को जानने की आवश्यकता है कि यह केवल मौसम के बदलने का त्यौहार है ना कि आपसी जय-पराजय का. 🙂
Sushil Kumar Joshi :
भैल्लो खतडुवा भैल्लो और सजाई हुई लकड़ियाँ फूलों से फिर पीटना जली हुई आग को बचपन याद आ गया अब तो बस तस्वीरें नजर आती हैं वो चौराहे ना जाने कहाँ खो गये। याद दिलाने के लिये आभार ।