प्रसिद्ध तीर्थ चित्रशिला-भद्रवट-रानीबाग और इसका ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व

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नवीन समाचार, नैनीताल, 19 जनवरी 2025 (Famous Pilgrimage Chitrashila-Bhadravat-Ranibagh) इस आलेख में आज हम आपको उत्तराखंड के बहुत प्रसिद्ध तीर्थ चित्रशिला भद्रवट रानीबाग और इसके ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व से अवगत कराने जा रहे हैं। रानीबाग उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में नैनीताल जनपद में हल्द्वानी के पास नैनीताल मार्ग पर गार्गी यानी गौला नदी के तट पर स्थित है।

रानीबाग उत्तराखंड का ऐतिहासिक तौर पर उत्तराखंड के गिने-चुने ऐसे स्थानों में शामिल है जो प्रदेश के कुमाऊं व गढ़वाल दोनों मंडलों के लोगों की आस्था का केंद्र है। इसीलिये यहां मकर संक्रांति यानी उत्तरायणी के अवसर पर लगने वाले मेले में पूरे उत्तराखंड से खासकर कत्यूर राजवंश के वंशज आते हैं और कड़ाके की ठंड में मध्य रात्रि में भी क

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त्यूरी रानी जिया को याद करते हुए आस्था की डुबकियां लगाते हैं।

रानीबाग का पौराणिक नाम चित्रशिला-भद्रवट

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चित्रशिला तीर्थ

पौराणिक इतिहासकारों के अनुसार स्कंद पुराण के मानसखंड के अध्याय 40 से 51 तक नैनीताल क्षेत्र के पुण्य स्थलों, नदी, नालों और पर्वत श्रृंखलाओं का 219 श्लोकों में वर्णन मिलता है। मानसखंड में रानीबाग का नाम भद्रवट बताया गया है। बताया जाता है कि सुभद्रा और पुष्पभद्रा जल धाराओं के संगम पर स्थित भद्रवट एक प्रसिद्ध धार्मिक महत्व का स्थान था।

सुभद्रा नाला का वर्तमान नाम बलिया नाला है, जो नैनी सरोवर से निकलता है, और पुष्पभद्रा नाला भीम सरोवर यानी भीमताल झील से आता है और यह दोनों जलधाराएं भद्रवट यानी रानीबाग में स्कंद पुराण में गार्गी नदी कही जाने वाली वर्तमान में गौला कही जाने वाली नदी में मिलते हैं। महर्षि मार्कंडेय का आश्रम यहीं पास में भुजियाघाट के पास बलौनधूरा के जंगल में मोरा गांव के पास स्थित है। कहते हैं कि महर्षि मार्कंडेय नियमित रूप से यहां स्नान करने आते थे। जानें महर्षि मार्कंडेय के मोरा गाँव स्थित आश्रम के बारे में यहाँ क्लिक करके। 

त्रिऋषि आए थे 

उनके अलावा सप्तर्षियों में शामिल ब्रह्मा के मानस पुत्र तीन महर्षि अत्रि, पुलह व पुलस्त्य भी कैलास मानसरोवर की ओर जाते हुए यहां पहुंचे। उल्लेखनीय है कि पुलस्त्य रामायण के प्रमुख पात्र रावण के पितामह यानी दादा थे। यहां से लंबी चढ़ाई चढ़कर वे वर्तमान नैनीताल पहुंचे और वहां प्यास लगने पर उन्होंने कैलास मानसरोवर का ध्यान कर एक ताल उत्पन्न किया, जिसके बाद नैनीताल को स्कंद पुराण के मानसखंड में त्रिषि या त्रिऋषि सरोवर कहा गया है और यहां महेंद्र परमेश्वरी नैना देवी का वास बताया गया है। 

इसके अलावा चित्रशिला घाट के पास ही गौला नदी के पार के क्षेत्र में कालीचौड़ नाम के स्थान के बारे में बताया जाता है कि वहीं से उत्तराखंड में आदि गुरु शंकराचार्य के कदम पड़े थे यानी कालीचौड़ उत्तराखंड में आदि गुरु शंकराचार्य का पहला पड़ाव था। यहां के बाद आदि गुरु शंकराचार्य जागेश्वर, हाट कालिका गंगोलीहाट व पाताल भुवनेश्वर को कीलित करते हुए कैलास मानसरोवर की ओर गये।

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ब्रह्मा, विष्णु व महेश यहाँ आए और… (Famous Pilgrimage Chitrashila-Bhadravat-Ranibagh)

स्कंद पुराण में यह भी कहा गया है कि एक बार सुतपा ऋषि के अनुग्रह पर त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी चित्रशिला पर आकर बैठ गये और प्रसन्नतापूर्वक ऋषि को विमान में बैठाकर स्वर्ग ले गये। यह स्थान पूरे कुमाऊं मंडल का अत्यधिक मान्यता वाला श्मशान घाट भी है। कहते हैं कि यहां अंतिम संस्कार होने पर मृतक की आत्मा मोक्ष को प्राप्त करती है और सीधे स्वर्ग जाती है। (Famous Pilgrimage Chitrashila-Bhadravat-Ranibagh)

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