(Dogs Were Tearing Lifeless Body of Newborn Baby)
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नवीन समाचार, ऋषिकेश, 13 जनवरी 2026 (Body Donation of 9-day-Old)। उत्तराखंड के ऋषिकेश में स्थित एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान—AIIMS Rishikesh) में चमोली जनपद के एक दंपति ने अपने नौ दिन के नवजात (New Born Baby) के निधन के बाद ऐसा निर्णय लिया, जिसे लोग वर्षों तक याद रखेंगे। जन्मजात बीमारी से पीड़ित नवजात का उपचार एम्स ऋषिकेश में चल रहा था, जहां शल्य क्रिया (Operation) के बाद नवजात की तबीयत बिगड़ गई और अंततः रविवार को उपचार के दौरान मृत्यु हो गई।

(Body Donation of 9-day-Old) माता-पिता ने 9 दिन की नजवात बच्ची का किया देहदान, ऋषिकेश एम्स में हुई थी मौतगहरे शोक में डूबे माता-पिता ने अंतिम संस्कार के बजाय चिकित्सकीय शोध (Medical Research) के लिए नवजात की देह का देहदान (Body Donation) कर मानवता की मिसाल पेश की। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह चिकित्सा शिक्षा और शोध के साथ-साथ समाज में अंगदान-देहदान जागरूकता को नई दिशा देती है।

नवजात की बीमारी और उपचार की पूरी पृष्ठभूमि

प्राप्त जानकारी के अनुसार चमोली निवासी संदीप राम (Sandeep Ram) की पत्नी हंसी (Hansi) ने गत 2 जनवरी को श्रीनगर (Srinagar) में नवजात शिशु को जन्म दिया था। जन्म के बाद नवजात में जन्मजात महावृहदान्त्र (हिर्शस्प्रुंग रोग—Hirschsprung Disease) की पुष्टि हुई। इस रोग में आंतों में तंत्रिका गुच्छों (गैंग्लिया—Ganglia) का अभाव पाया जाता है, जिससे मल त्याग में गंभीर समस्या और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

रोग की जटिलता को देखते हुए नवजात को श्रीनगर से एम्स ऋषिकेश संदर्भित (Referred) किया गया। एम्स में नवजात की शल्य क्रिया कर उपचार किया गया, किंतु शल्य क्रिया के तीन दिन बाद नवजात की स्थिति बिगड़ती चली गई और रविवार को रिफ्रैक्टरी सेप्टिक शॉक (Refractory Septic Shock) के कारण मृत्यु हो गई।

अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के दौरान सामने आया देहदान का विकल्प

नवजात की मृत्यु के बाद परिजन अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को लेकर जानकारी ले रहे थे। एम्स के वरिष्ठ नर्सिंग अधिकारी (Senior Nursing Officer) मोहित (Mohit) और महिपाल (Mahipal) से चर्चा के दौरान देहदान के विषय पर बात आगे बढ़ी। इसके बाद पीड़ित दंपति की सहायता के लिए मोहन फाउंडेशन (Mohan Foundation) उत्तराखंड के परियोजना प्रमुख (Project Leader) संचित अरोड़ा (Sanchit Arora) को सूचना दी गई।

देहदान का निर्णय, दुख के बीच मानवता की ऊंचाई

नेत्रदान कार्यकर्ता (Eye Donation Worker) और लायंस क्लब ऋषिकेश देवभूमि (Lions Club Rishikesh Devbhoomi) के चार्टर अध्यक्ष (Charter President) गोपाल नारंग (Gopal Narang) के अनुसार संचित अरोड़ा ने दंपति को देहदान का महत्व समझाया। उन्हें बताया गया कि यदि नवजात की देह चिकित्सा शोध के लिए समर्पित की जाती है तो इससे भविष्य में कई विद्यार्थियों, चिकित्सकों और अनुसंधान कार्यों को लाभ मिल सकता है।

इसके बाद दंपति ने सहमति (Consent) दी और नवजात की देह चिकित्सा विज्ञान के हित में देहदान करने का निर्णय लिया। क्या कोई माता-पिता अपने सबसे बड़े दुख के क्षण में भी समाज के लिए इतना बड़ा निर्णय ले सकता है। इस घटना ने यही साबित किया कि संवेदना और मानव कल्याण साथ चल सकते हैं।

एम्स में प्रक्रिया पूरी, एनाटॉमी विभाग को सौंपी गई देह

गोपाल नारंग के अनुसार इसके बाद एम्स ऋषिकेश के शरीर रचना विज्ञान विभाग (Department of Anatomy) के अध्यक्ष डॉ. मुकेश सिंगला (Dr. Mukesh Singla) और प्रो. डॉ. रश्मि मल्होत्रा (Prof. Dr Rashmi Malhotra) से संपर्क किया गया। उनके निर्देशन में तकनीकी सहायक अजय रावत (Ajay Rawat) ने आवश्यक कागजी कार्यवाही पूरी कर नवजात की देह विभाग को सौंपने की प्रक्रिया पूर्ण कराई।

इस दौरान डॉ. राजू बोकन (Dr Raju Bokan), अजय रावत, ऋषभ पंचाल (Rishabh Panchal), विजय जुनेजा (Vijay Juneja), अरुण शर्मा (Arun Sharma), सुरेश (Suresh), स्नेह कुमारी (Sneha Kumari), रूपेंद्र (Roopendra) और नेहा सकलानी (Neha Saklani) सहित कई लोगों ने नवजात की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की और दंपति के निर्णय को मानव कल्याण में अनुपम योगदान बताया।

क्यों महत्वपूर्ण है यह घटना, समाज और चिकित्सा दोनों के लिए

यह मामला केवल एक परिवार की कथा नहीं, बल्कि चिकित्सा शिक्षा (Medical Education), स्वास्थ्य नीति (Health Policy) और जन-जागरूकता (Public Awareness) से जुड़ा विषय है। भारत में देहदान के प्रति जागरूकता अभी भी सीमित है, जबकि चिकित्सा महाविद्यालयों (Medical Colleges) में शोध, प्रशिक्षण और शरीर रचना अध्ययन के लिए देहदान अत्यंत उपयोगी माना जाता है।

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इस निर्णय से यह संदेश भी जाता है कि दुख की घड़ी में भी कोई परिवार समाज के भविष्य के लिए प्रकाश बन सकता है। क्या हमारे समाज में देहदान को उतनी ही स्वीकृति मिल पाएगी जितनी अंगदान (Organ Donation) को मिलने लगी है। यह प्रश्न अब और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

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By डॉ.नवीन जोशी

डॉ.नवीन जोशी, पिछले 20 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय, 'कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीएचडी की डिग्री प्राप्त पहले और वर्ष 2015 से उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। 15 लाख से अधिक नए उपयोक्ताओं के द्वारा 150 मिलियन यानी 1.5 करोड़ से अधिक बार पढी गई आपकी अपनी पसंदीदा व भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ‘नवीन समाचार’ के संपादक हैं, साथ ही राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्थान समाचार आदि समाचार पत्र एवं समाचार एजेंसियों से भी जुड़े हैं। देश के पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन 'नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) उत्तराखंड' के उत्तराखंड प्रदेश के प्रदेश महामंत्री भी हैं और उत्तराखंड के मान्यता प्राप्त राज्य आंदोलनकारी भी हैं। डॉ. जोशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। नवीन समाचार’ विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी नैनीताल से जून 2009 से इंटरननेट-वेब मीडिया पर सक्रिय, उत्तराखंड का सबसे पुराना ऑनलाइन पत्रकारिता में सक्रिय समूह है। यह उत्तराखंड शासन से मान्यता प्राप्त रहा, अलेक्सा रैंकिंग के अनुसार उत्तराखंड के समाचार पोर्टलों में अग्रणी, गूगल सर्च पर उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ, भरोसेमंद समाचार पोर्टल के रूप में अग्रणी, समाचारों को नवीन दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने वाला ऑनलाइन समाचार पोर्टल भी है।

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