पति प्रताड़ित करता था तो कैसे साथ गुजार दिए 11 साल ? न्यायालय ने आरोपित फौजी पति को किया दहेज उत्पीड़न के आरोपों से दोषमुक्त….

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नवीन समाचार, अल्मोड़ा, 12 जनवरी 2026 (How Wife Spend 11 Yrs with)। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जनपद से दहेज उत्पीड़न (Dowry Harassment) से जुड़े एक प्रकरण में जिला सत्र न्यायालय (District Sessions Court) ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने महिला की अपील पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा और फौजी पति को दोषमुक्त कर दिया।

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न्यायालय ने निचली अदालत का आदेश रखा बरकरार

जिला सत्र न्यायाधीश श्रीकांत पांडेय (District & Sessions Judge – Shrikant Pandey) ने महिला की अपील पर सुनवाई के बाद निचली अदालत के निर्णय को सही माना। अधिवक्ताओं के अनुसार न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों और जिरह में सामने आए बिंदुओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि आरोपों की पुष्टि के लिए आवश्यक सामग्री पर्याप्त नहीं है, इसलिए फौजी पति को दोषमुक्त किया जाता है।

किन धाराओं में दर्ज हुआ था अभियोग

अधिवक्ता भगवती प्रसाद पंत (Advocate – Bhagwati Prasad Pant) और महेश चंद्र सिंह परिहार (Advocate – Mahesh Chandra Singh Parihar) के अनुसार अल्मोड़ा निवासी महिला ने न्यायालय में प्रार्थनापत्र (Petition) देकर कुलाउ गरुड़, बागेश्वर (Garur, Bageshwar) निवासी पति एमएस परिहार (MS Parihar) पर आरोप लगाए थे।

जनवरी 2023 में न्यायालय ने प्रार्थनापत्र स्वीकार कर पुलिस को कार्रवाई के आदेश दिए थे। इसके बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code – IPC) की धारा 323, 498ए, 504, 506 के तहत अभियोग (Case) पंजीकृत किया था।

विवाह 2011 में, दो बच्चे हुए, कई स्थानों पर साथ रहने का उल्लेख

महिला का कहना था कि उसका विवाह जून 2011 में हुआ था। पति सेना (Army) का जवान था, इसलिए वह उसे अपने साथ ले गया। महिला के अनुसार दोनों के संबंध अच्छे नहीं थे और पति आए दिन मारपीट तथा उत्पीड़न करता था।

दूसरी ओर, प्रकरण में यह तथ्य भी सामने आया कि विवाह के बाद पति महिला को हिसार, हरियाणा (Hisar, Haryana) ले गया, बाद में दिल्ली (Delhi) में भी साथ रखा। फिर हल्द्वानी (Haldwani) में किराए के कमरे में रहने और मकान बनवाने का उल्लेख किया गया। दंपति के दो बच्चे होने की बात भी सामने आई।

ऐसे तथ्यों के आधार पर जिरह के दौरान यह प्रश्न उठा कि यदि आरंभ से ही प्रताड़ना का आरोप है, तो इतने लंबे समय तक साथ रहने की स्थिति कैसे बनी। यही बिंदु न्यायालय के अवलोकन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।

11 साल बाद शिकायत क्यों, जिरह में उठा केंद्रीय प्रश्न

महिला का आरोप था कि पति शादी के बाद से ही दहेज के लिए प्रताड़ित करता रहा। जिरह (Cross Examination) में यह सवाल पूछा गया कि यदि प्रताड़ना लगातार चल रही थी, तो इतने वर्षों तक शिकायत दर्ज कराने में विलंब क्यों हुआ।

यह प्रश्न न्यायालय के समक्ष इसलिए महत्वपूर्ण बनता है क्योंकि दहेज उत्पीड़न जैसे मामलों में घटना की समयरेखा, तत्काल शिकायत, चिकित्सकीय दस्तावेज, साक्ष्य और गवाहों की भूमिका निर्णय को प्रभावित करती है। न्यायालय ने इसी समग्रता में साक्ष्यों की पर्याप्तता को परखा।

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पृष्ठभूमि और असर, न्याय प्रक्रिया में साक्ष्य और समयसीमा का महत्व

यह फैसला घरेलू विवाद, दहेज उत्पीड़न और पारिवारिक मुकदमों में एक संदेश देता है कि किसी भी आरोप की पुष्टि के लिए तथ्यात्मक साक्ष्य और विधिक प्रक्रिया में समय पर कदम उठाना निर्णायक हो सकता है। साथ ही ऐसे मामलों में यह भी आवश्यक है कि—

  • शिकायत की समयरेखा स्पष्ट हो

  • मारपीट या उत्पीड़न से जुड़े चिकित्सकीय अभिलेख (Medical Records) उपलब्ध हों

  • गवाहों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) का समर्थन हो

  • बयान और दस्तावेजों में विरोधाभास न हो

अदालत का यह निर्णय कानून व्यवस्था (Law & Order), न्याय (Justice) और महिलाओं की सुरक्षा (Women Safety) जैसे बड़े सामाजिक मुद्दों से भी जुड़ता है, क्योंकि समाज में ऐसे मामलों पर भरोसे की बुनियाद न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर टिकी होती है।

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