डॉ. नवीन जोशी @ नवीन समाचार, नैनीताल, 14 जनवरी 2026 (On Sanctioned Vacant Posts)। उत्तराखंड के नैनीताल जनपद स्थित उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court) ने राज्य सरकार के भर्ती तंत्र पर सख्त टिप्पणी करते हुए यह सवाल उठाया है कि जब विभिन्न विभागों में बड़ी संख्या में स्थायी और स्वीकृत रिक्त पद उपलब्ध हैं, तो उनके लिए नियमित भर्ती प्रक्रिया क्यों नहीं शुरू की जा रही है। न्यायालय ने मुख्य सचिव (Chief Secretary) को निर्देश दिए हैं कि सभी विभागों के सचिवों से स्वीकृत रिक्तियों का पूरा विवरण एकत्र कर शपथपत्र के साथ न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए।
इस मामले की अगली सुनवाई 16 फरवरी 2026 को तय की गई है। यह आदेश राज्य के हजारों युवाओं के रोजगार, सरकारी चयन प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और आउटसोर्सिंग आधारित नियुक्तियों पर उठ रहे सवालों के कारण खास महत्व रखता है।
नियमित भर्ती की जगह आउटसोर्सिंग पर न्यायालय की कड़ी आपत्ति
यह मामला न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल (Justice Rakesh Thapliyal) की एकलपीठ के समक्ष सुनवाई में आया। न्यायालय ने 9 जनवरी 2026 के आदेश में कहा कि अलग-अलग याचिकाओं में बार-बार यह अनुभव हुआ है कि कई विभागों में रिक्तियां होते हुए भी सरकार सामान्य चयन प्रक्रिया अपनाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। न्यायालय ने साफ कहा कि यदि पद स्वीकृत हैं और उपलब्ध भी हैं, तो उन्हें भरने की दिशा में सामान्य भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाना सरकार का दायित्व है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता नवनीष नेगी (Naveesh Negi) ने न्यायालय के समक्ष यह पक्ष रखा कि स्वीकृत स्थायी पदों के विरुद्ध विभागीय अधिकारी रिक्तियों को ठेकेदार के माध्यम से, आउटसोर्सिंग (Outsourcing) के जरिए या अस्थायी व्यवस्था से भरने का प्रयास कर रहे हैं। अधिवक्ता ने इसे अनुचित बताते हुए कहा कि ऐसी व्यवस्था शोषणकारी, मनमानी और संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के विपरीत है।
न्यायालय ने इस दलील को गंभीर मानते हुए कहा कि नियमित चयन प्रक्रिया के बजाय अस्थायी नियुक्तियां बढ़ने से एक चिंताजनक स्थिति पैदा हो रही है, क्योंकि समय बीतने के साथ कई लोग आयु सीमा पार कर देते हैं और योग्य युवाओं के लिए अवसर सीमित होते जाते हैं।
युवाओं के रोजगार पर असर, सरकार से कई बिंदुओं पर मांगा जवाब
न्यायालय ने सुनवाई के दौरान यह भी रेखांकित किया कि राज्य में बड़ी संख्या में योग्य और पात्र युवा नियमित नियुक्ति की प्रतीक्षा में हैं। रिक्तियां मौजूद हैं, फिर भी चयन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा रही—यह राज्य के अधिकारियों की घोर निष्क्रियता जैसी स्थिति पैदा कर रही है।
न्यायालय ने राज्य सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि—
स्थायी, नियमित और स्वीकृत रिक्तियों के होते हुए नियमित भर्ती प्रक्रिया क्यों नहीं चल रही है।
इन पदों को आउटसोर्सिंग, दैनिक वेतनभोगी या तदर्थ कर्मचारियों के माध्यम से क्यों भरा जा रहा है।
चतुर्थ श्रेणी (Class 4) के पदों को विलुप्त होता संवर्ग (Cadre) क्यों घोषित किया गया है।
न्यायालय ने यह संकेत भी दिया कि शासन-प्रशासन की ऐसी नीति न केवल पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े करती है, बल्कि लंबे समय में सरकारी सेवा ढांचे में असमानता और अनिश्चितता भी बढ़ा सकती है। क्या यह स्थिति राज्य के रोजगार वातावरण को प्रभावित करेगी। क्या इससे नियमित भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ेगा। इन प्रश्नों के उत्तर अब सरकार के शपथपत्र और डाटा के माध्यम से सामने आने की उम्मीद है।
आगे क्या होगा, 16 फरवरी को अगली सुनवाई
मुख्य सचिव को अब प्रत्येक विभाग से रिक्तियों का विवरण जुटाकर न्यायालय में शपथपत्र देना होगा। इसी आधार पर न्यायालय अगली सुनवाई में यह तय कर सकता है कि सरकार को नियमित भर्ती के लिए समयबद्ध निर्देश दिए जाएं या विभागीय स्तर पर किसी प्रकार की जवाबदेही तय की जाए।
राज्य में रोजगार, शिक्षा और प्रशासनिक सुधारों की दृष्टि से यह मामला महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह सरकारी भर्ती प्रक्रिया, मानव संसाधन प्रबंधन और आउटसोर्सिंग आधारित व्यवस्था की सीमाओं को केंद्र में लाता है।
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