विज्ञान: भारतीय वैज्ञानिक का कमाल, एक माइक्रोस्कोप के दाम में मिलेंगे 10 फोल्ड स्कोप, काम करेंगे वही

-कुमाऊं विवि में आयोजित हुई कार्यशाला, भारतीय वैज्ञानिक मनु प्रकाश ने अमेरिका के स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में कागज से तैयार किया है अनूठा सूक्ष्मदर्शी, जेब में मोड़कर भी रख सकते है
12NTL 7नवीन समाचार, नैनीताल, 12 दिसंबर 2018। भारतीय वैज्ञानिक मनु प्रकाश ने अमेरिका के स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी में वहां के वैज्ञानिक जिम सिविलोस्की के साथ मिलकर कागज से एक ऐसा अनूठा सूक्ष्मदर्शी तैयार किया है, जिसे जेब में मोड़कर भी रख सकते है, और कहीं भी ले जा सकते हैं। फोल्ड स्कोप नाम के इस सूक्ष्मदर्शी की कीमत परंपरागत सूक्ष्मदर्शी के मुकाबले दसवीं है। यानी एक माइक्रोस्कोप की कीमत में 10 फोल्डस्कोप खरीद सकते हैं। इससे दो माइक्रोन तक के सूक्ष्म आकार के जीवाणु एवं कवक आदि भी देखे जा सकते हैं।
12NTL 8फोल्ड स्कोप को बच्चों में लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से बुधवार को कुमाऊं विवि के सर्वप्रमुख डीएसबी परिसर के वनस्पति विज्ञान विभाग के तत्वावधान में हरमिटेज परिसर स्थित सभागार में कार्यशाला का आयोजन हुआ। इस मौके पर उपस्थित विद्यार्थियों को इस सूक्ष्मदर्शी की विशेषताओं एवं उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी। बताया गया कि यह हाईस्कूल, इंटर के विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। यह ऑनलाइन भी खरीदा जा सकता है। इस मौके पर विवि के कुलपति प्रो. दिनेश कुमार नौड़ियाल, वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. नीरजा पांडे, विवि के शोध निदेशक प्रो. राजीव उपाध्याय, प्रो. एससी सती, डा. कपिल खुल्बे, डा. परीक्षित व डा. श्वेता नैनवाल सहित नैनीताल व हल्द्वानी के वनस्पति विज्ञान विभाग के छात्र मौजूद रहे।
चित्र परिचयः 12एनटीएल-7ः नैनीताल। बुधवार को कार्यशाला में मौजूद कुलपति एवं अन्य।
चित्र परिचयः 12एनटीएल-8ः नैनीताल। ऐसा होता है फोल्ड स्कोप।

प्रयोगशाला में दुनिया की इकलौती बची प्रजाति-पटवा के क्लोन तैयार

Rashtriya Sahara 15.12.15-सरोवरनगरी के निकट इसी प्रजाति के नाम पर स्थित है पटवाडांगर नाम का कस्बा
नवीन जोशी, नैनीताल। कुमाऊं विवि के जैव प्रोद्योगिकी संस्थान भीमताल स्थित प्लांट एंड मॉलीक्यूलर बायलॉजी प्रयोगशाला ने एक अनूठा कारनामा कर डाला है। प्रयोगशाला में दुनिया की एक ऐसी प्रजाति का प्रयोगशाला में क्लोन तैयार करने में सफलता प्राप्त की है, जो पूरी तरह से विलुप्त होने की कगार पर है, और जिसके दुनिया में 100 से भी कम आखिरी पौधे ही बचे हैं, और इसके प्राकृतिक तौर पर नए पौधे उगने की प्रक्रिया भी समाप्त हो चुकी है। जैव पारिस्थितिकी के लिहाज से यह वैश्विक स्तर पर बड़ी सफलता आंकी गई है, और अमेरिका की शोध पत्रिका-अमेरिकन जर्नल ऑफ प्लांट साइंस व एशियन जर्नल ऑफ माईक्रोबायोलॉजी एंड इन्वायरमैंटल साइंस एवं इण्डियन जर्नल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च में भी इस बाबत शोध पत्र प्रकाशित किये गये हैं।

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