EnglishInternational Phonetic Alphabet – SILInternational Phonetic Alphabet – X-SAMPASystem input methodCTRL+MOther languagesAbronAcoliадыгэбзэAfrikaansअहिराणीajagbeBatak AngkolaአማርኛOboloالعربيةঅসমীয়াаварتۆرکجهᬩᬮᬶɓasaáBatak Tobawawleбеларускаябеларуская (тарашкевіца)Bariروچ کپتین بلوچیभोजपुरीभोजपुरीẸdoItaŋikomBamanankanবাংলাབོད་ཡིག།bòo pìkkàbèromबोड़ोBatak DairiBatak MandailingSahap Simalunguncakap KaroBatak Alas-KluetbuluburaብሊንMə̀dʉ̂mbɑ̀нохчийнchinook wawaᏣᎳᎩکوردیAnufɔЧăвашлаDanskDagbaniдарганdendiDeutschDagaareThuɔŋjäŋKirdkîडोगरीDuáláÈʋegbeefịkẹkpeyeΕλληνικάEnglishEsperantoفارسیmfantseFulfuldeSuomiFøroysktFonpoor’íŋ belé’ŋInternational Phonetic AlphabetGaगोंयची कोंकणी / Gõychi Konknni𐌲𐌿𐍄𐌹𐍃𐌺𐌰 𐍂𐌰𐌶𐌳𐌰ગુજરાતીfarefareHausaעבריתहिन्दीछत्तीसगढ़ी𑢹𑣉𑣉HoHrvatskiհայերենibibioBahasa IndonesiaIgboIgalaгӀалгӀайÍslenskaawainAbꞌxubꞌal PoptiꞌJawaꦗꦮქართული ენაTaqbaylit / ⵜⴰⵇⴱⴰⵢⵍⵉⵜJjuадыгэбзэ (къэбэрдеибзэ)KabɩyɛTyapkɛ́nyáŋGĩkũyũҚазақшаភាសាខ្មែរಕನ್ನಡ한국어kanuriKrioकॉशुर / 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संरक्षण के साथ ही अभावों में भी हर मौके को उत्साहपूर्वक त्योहारों के साथ ऋतु व कृषि पर्वों के साथ मनाना देवभूमि उत्तराखंड की हमेशा से पहचान रही है। यही त्योहारधर्मिता उत्तराखंड के कमोबेश सही लोक पर्वों में दृष्टिगोचर होती है। यहां प्रचलित हिंदू विक्रमी संवत की हर माह की पहली तिथि-एक पैट या एक गते को संक्रांति पर्व (चैत्र एवं श्रावण संक्रांति को हरेला तथा मकर संक्रांति को घुघुतिया-उत्तरायणी) त्योहार की तरह मनाए जाते हैं। इसी कड़ी में भाद्रपद मास की संक्रान्ति यहां घी-त्यार या घृत-संक्रांति (Ghrit Sankranti) एवं ओलगिया के रुप में मनाई जाती है। यह भी पढ़ें : नैनीताल में फर्जी गाइड ने पर्यटक की कार लेकर की क्षतिग्रस्त, मालरोड पर पेड़ और डस्टबिन से टकराकर हुआ फरार, पुलिस तलाश में जुटी घी-त्यार यानी घी-त्यौहार हरेला की तरह मूलतः एक ऋतु एवं कृषि पर्व ही है, लेकिन इसमें मानव सभ्यता, खास कर घर के पारिवारिक सदस्यों व उनमें भी बच्चों को पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा देकर उन्हें पुष्ट बनाने का भाव है। हरेला जहां चैत्र एवं श्रावण संक्रांति के मौकों पर मनाया जाता है, और बीजों को बोने और वर्षा ऋतु के आगमन का प्रतीक त्यौहार है।वहीं घी-त्यार बीजों के नई फसलों में बालियों के रूप में फलीभूत हो जाने-लहलहाने पर उत्साहपूर्वक मनाया जाने वाला लोक पर्व है। इस पर्व तक फसलों के साथ ही पहाड़ों में अखरोट, सेब, माल्टा, नारंगी आदि ऋतु फलों के साथ ही ककड़ी (खीरा), लौकी व तुरई आदि बेलों पर लगने वाली सब्जियां भी तैयार होने लगती हैं।बरसात के दिन होने की वजह से पशुओं के लिए पर्याप्त मात्रा में हरी घास के चारे की भी इफरात रहती है। गौशाला में गाय-भेंस खूब दूध दे रहे होते हैं। घर में दूध, दही, घी-मक्खन भी भरपूर होता है। वहीं दूसरी ओर बदलते बारिश के मौसम में संक्रामक रोगों की आशंका भी सिर उठा रही होती है, ऐसे में पहाड़ के लोग फसलों के पकने और घर में भरपूर पशुधन की उपलब्धता से आनंदित हो घी-त्यार या घी-संक्रांति मनाते हैं। अखरोट की नई फसल के फलों को तो इसी दिन से खाना शुरू करने की परंपरा है। घी-त्यार (Ghrit Sankranti) के दिन खास तौर पर पहाड़ी दाल मांश यानी उरद को भिगो और पीस कर तैयार की गई पिट्ठी को कचौड़ियों की तरह भरकर बनाई जाने वाली बेड़ू रोटी गाय के शुद्ध घी के साथ डुबोकर खाई जाती हैं। साथ ही पिनालू (अरबी) की नई अधखुली कोपलों (गाबे) की मूली आदि मिलाकर बनी सब्जी भी इस मौके पर बनाने की परंपरा है। कोमल और बंद पत्तियों की सब्जी भी इस दिन विशेष रुप से बनाई जाती है। इस अवसर पर किसी न किसी रुप में घी खाना अनिवार्य माना जाता है, इसलिए लगड़ (पूरी), पुवे, हलवा आदि भी प्रसाद स्वरूप शुद्ध घी से ही तैयार किए जाते हैं।यह भी पढ़ें : हल्द्वानी : गौलापार के होटल में काशीपुर के किसान सुखवंत सिंह संदिग्ध परिस्थितियों में मृत मिले, फेसबुक लाइव वीडियो में 4 करोड़ रुपये के भूमि विवाद और उत्पीड़न के आरोपऐसी भी मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन (Ghrit Sankranti) घी नहीं खाता, वह अगले जन्म में गनेल (घोंघा) बन जाता है। शायद इसलिए कि इस भय से लोग घी खाने के लिए प्रेरित हों ओर स्वस्थ व मजबूत बनें। इस दिन गाय के घी को प्रसाद स्वरुप सिर पर रखा जाता है और छोटे बच्चों की तालू (सिर के मध्य) में भी मला जाता है। माना जाता है कि भोजन के साथ ही सिर पर घी मलने से बच्चे शरीर के साथ ही मस्तिष्क से भी मजबूत बनते हैं।Ghrit Sankranti : ओलगी संक्रांति के रूप में समाज के हर वर्ग को जोड़ता भी है यह त्योहारघी संक्रांति को घृत संक्रान्ति और सिंह संक्रान्ति के साथ ही ओलगी या ओलगिया संकरात भी कहा जाता है। ओलगी संक्रांति को चंद राजवंश की परंपराओं से भी जोड़ा जाता है। कहते हैं कि चंद शासनकाल में इस दिन शिल्प कला से जुड़े दस्तकार, लोहार व बढ़ई आदि लोग अपनी कारीगरी तथा दस्तकारी की कृषि व गृह कार्यों में उपयोगी हल, दनेले, कुदाल व दराती जैसे उपकरणों के साथ ही बर्तन तथा बिंणाई जैसे छोटे वाद्य यंत्र व अन्य कलायुक्त वस्तुओं तथा अन्य लोग मौसमी साग-सब्जियां, फल-फूल, दही-दूध व मिष्ठान्न तथा पकवान अन्य उत्तमोत्तम वस्तुएं राज दरबार में भेंट-उपहार स्वरूप ले जाते थे तथा राज दरबार से धन धान्य आदि पुरस्कार स्वरूप प्राप्त करते थे।‘नवीन समाचार’ की ओर से पाठकों से विशेष अपील:3 जून 2009 से संचालित उत्तराखंड का सबसे पुराना डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘नवीन समाचार’ अपने आरंभ से ही उत्तराखंड और देश-दुनिया की सटीक, निष्पक्ष और जनहित से जुड़ी खबरें आप तक पहुँचाने का प्रयास करता आ रहा है। हिंदी में विशिष्ट लेखन शैली हमारी पहचान है। हमारा उद्देश्य केवल समाचार देना नहीं, बल्कि समाज की वास्तविक आवाज को मजबूती से सामने लाना, स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता देना और हिंदी पत्रकारिता को जीवित रखना है। हमारे प्रत्येक समाचार एक लाख से अधिक लोगों तक और हर दिन लगभग 10 लाख बार पहुंचते हैं। आज के समय में स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता को बनाए रखना आसान नहीं है। डिजिटल मंच पर समाचारों के संग्रह, लेखन, संपादन, तकनीकी संचालन और फील्ड रिपोर्टिंग में निरंतर आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। ‘नवीन समाचार’ किसी बड़े कॉर्पोरेट या राजनीतिक दबाव से मुक्त रहकर कार्य करता है, इसलिए इसकी मजबूती सीधे-सीधे पाठकों के सहयोग से जुड़ी है। ‘नवीन समाचार’ अपने सम्मानित पाठकों, व्यापारियों, संस्थानों, सामाजिक संगठनों और उद्यमियों से विनम्र अपील करता है कि वे विज्ञापन के माध्यम से हमें आर्थिक सहयोग प्रदान करें। आपका दिया गया विज्ञापन न केवल आपके व्यवसाय या संस्थान को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाएगा, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी सशक्त बनाएगा। अग्रिम धन्यवाद। इस तरह खेती और पशुपालन से जुड़े लोगों के साथ ही शिल्प कार्यों से जुड़े गैर काश्तकार भी इस त्योहार के जरिए आपस में जुड़ते थे। इस भेंट देने की प्रथा को ओलगी कहा जाता है। इसी कारण इस संक्रांति को ओलगिया संक्रांति भी कहते हैं। इस प्रकार इस पर्व में समाज के हर वर्ग को विशेष महत्व और सम्मान देने का प्रेरणादायी भाव भी स्पष्टतया नजर आता था। आगे राजशाही खत्म होने के बाद राज सत्ता की जगह गांव के पधानों, थोकदारों आदि ने ले ली, और धीरे-धीरे यह प्रथा उस रूप में तो समाप्त हो गई, लेकिन नाम अभी भी प्रयोग किया जाता है।(Ghrit Sankranti, Ghee Sankranti, Olgiya, Ghee Tyar, Ghee Tyohar, Lok Parv, Uttarakhand ke Lok Parv)यह भी पढ़ें : किसान सुखवंत सिंह प्रकरण में उधम सिंह नगर पुलिस पर बड़ी कार्रवाई, आईटीआई कोतवाली प्रभारी सहित 2 उप निरीक्षक निलंबित और 10 पुलिसकर्मी लाइन हाजिरकुमाऊं की लोक संस्कृति के बारे में और पढ़ना हो तो यहां क्लिक करें।आज के अन्य एवं अधिक पढ़े जा रहे ‘नवीन समाचार’ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। यदि आपको लगता है कि ‘नवीन समाचार’ अच्छा कार्य कर रहा है तो हमें सहयोग करें..यहां क्लिक कर हमें गूगल न्यूज पर फॉलो करें। यहां क्लिक कर यहां क्लिक कर हमारे व्हाट्सएप ग्रुप से, हमारे टेलीग्राम पेज से और यहां क्लिक कर हमारे फेसबुक ग्रुप में जुड़ें। हमारे माध्यम से अमेजॉन पर सर्वाधिक छूटों के साथ 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