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21 दिन की निराहार साधना व 12 घंटे के महायज्ञ से आस्था में सराबोर हुआ ग्वेलज्यू दरबार

< p style=”text-align: justify;”>नवीन समाचार, नैनीताल, 24 अप्रैल 2019। मंगलवार 2 अप्रैल से जनपद के धारी तहसील के दूरस्थ गांव

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सरोवरनगरी सहित यहां होल्यारों ने देवी-देवताओं के साथ खेले होली के रंग

देश-प्रदेश में जहां लोग अपने परिजनों, सगे संबंधियों व मित्रों के साथ होली के रंग खेलते हैं, वहीं देवभूमि उत्तराखंड

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सरोवरनगरी में बसंत पंचमी पर 24 वर्षों बाद हुआ यह आयोजन

-श्रीराम सेवक सभा के तत्वावधान में 1994 के बाद आयोजित हुआ सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार नवीन समाचार, नैनीताल, 10 फरवरी 2019।

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ग्लोबलवार्मिंग का प्रभाव ! तीन माह पूर्व ही “काफल पाको पूसा…!!!” 🤔

नवीन समाचार, नैनीताल, 9 जनवरी 2019। कुमाऊं के सुप्रसिद्ध लोकगीत ‘बेड़ू पाको बारों मासा, ओ नरैंण काफल पाको चैता’ में

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साफ-सफाई का सन्देश देता ‘खतडु़वा’ आया, सर्दियां लाया

-विज्ञान व आधुनिक बौद्धिकता की कसौटी पर भी खरा उतरता है यह लोक पर्व, साफ-सफाई, पशुओं व परिवेश को बरसात

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स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का लोकपर्व घी-त्यार, घृत संक्रांति, ओलगिया…

प्रकृति एवं पर्यावरण से प्रेम व उसके संरक्षण के साथ ही अभावों में भी हर मौके को उत्साहपूर्वक त्योहारों के

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उत्तराखंड के कुमाऊं-गढ़वाल को जोड़ने के लिए इस बड़ी कोशिश में है सरकार

-इस हेतु प्रयासरत वन मंत्री डा. हरक सिंह रावत ने कहा कंडी मार्ग बन कर रहेगी, बरसात पूर्व व बाद

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177 साल के नैनीताल में कुमाउनी रेस्टोरेंट की कमी हुई पूरी

-पूरी तरह कुमाउनी थीम पर स्थापित किया गया है 1938 में स्थापित अनुपम रेस्टोरेंट -अब यहां लीजिये कुमाउनी थाली के

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जागेश्वर मंदिर समूह बना कुमाऊं विवि का आधिकारिक प्रतीक

नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय ने सातवीं से 14वीं शताब्दी में बने देश के 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक, 125 मंदिरों के

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उत्तराखण्ड की पत्रकारिता का इतिहास

आदि-अनादि काल से वैदिक ऋचाओं की जन्मदात्री उर्वरा धरा रही देवभूमि उत्तराखण्ड में पत्रकारिता का गौरवपूर्ण अतीत रहा है। कहते

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आस्था के साथ ही सांस्कृतिक-ऐतिहासिक धरोहर भी हैं ‘जागर’

इस तरह ‘जागर’ के दौरान पारलौकिक शक्तियों के वसीभूत होकर झूमते हें ‘डंगरिये’ image description कुमाऊं के जटिल भौगोलिक परिस्थितियों

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राजुला-मालूशाही और उत्तराखंड की रक्तहीन क्रांति की धरती, कुमाऊं की काशी-बागेश्वर

पौराणिक काल से ऋषि-मुनियों की स्वयं देवाधिदेव महादेव को हिमालय पुत्री पार्वती के साथ धरती पर उतरने के लिए मजबूर

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1830 में मुरादाबाद से हुई कुमाउनी रामलीला की शुरुआत

-कुमाऊं की रामलीला की है देश में अलग पहचान नवीन जोशी, नैनीताल। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में होने वाली कुमाउनी रामलीला की

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गोविंद बल्लभ पंत : हिमालय सा व्यक्तित्व और दिल में बसता था पहाड़

लखनऊ, दिल्ली की रसोई में भी कुमाऊंनी भोजन बनता था, पर्वतीय लोगों से अपनी बोली- भाषा में करते थे बात  नवीन

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कुमाऊं : पाषाण युग से रहा है यायावरी का केंद्र

पाषाण युग से यायावरी का केंद्र रहा है कुमाऊं -पाषाणयुगीन हस्तकला को संजोए लखु उडियार से लेकर रामायण व महाभारत काल

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