नाबालिग लड़की की प्रताड़ना के मामले में बर्खास्त उत्तराखंड की न्यायिक अधिकारी की बहाली पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से किया इनकार

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नवीन समाचार, नई दिल्ली, 19 मई 2026 (Supreme Court on UK Judicial Officer)। उत्तराखंड (UTTARAKHAND) की एक महिला न्यायिक अधिकारी को नाबालिग घरेलू सहायिका से कथित प्रताड़ना के मामले में बर्खास्त किये जाने और बाद में बहाली से जुड़े प्रकरण में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SUPREME COURT OF INDIA) ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय की उस अपील में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें न्यायिक अधिकारी की बहाली को चुनौती दी गयी थी। हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वह मामले के तथ्यों पर नहीं, बल्कि विभागीय कार्रवाई की कानूनी प्रक्रिया में पाई गयी त्रुटियों के आधार पर निर्णय दे रहा है।

मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी के बिना कार्रवाई पर उठे सवाल

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने की। न्यायिक अधिकारी की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता ने तर्क दिया कि विभागीय कार्रवाई शुरू करने से पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की विधिवत मंजूरी नहीं ली गयी थी।

अधिवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों ने संबंधित महिला अधिकारी के विरुद्ध साजिश रची थी। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने माना कि किसी भी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए सक्षम प्राधिकारी की स्पष्ट अनुमति अत्यंत आवश्यक है।

रजिस्ट्रार जनरल की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई में न्यायिक अधिकारी की ओर से कहा गया कि विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए मुख्य न्यायाधीश की ओर से कोई लिखित आदेश उपलब्ध नहीं था। वहीं उच्च न्यायालय की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि रजिस्ट्रार जनरल ने मुख्य न्यायाधीश से दूरभाष पर अनुमति प्राप्त होने की जानकारी दी थी।

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सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि रजिस्ट्रार जनरल ने अपनी शक्तियों का गलत उपयोग किया, क्योंकि मुख्य न्यायाधीश की स्वीकृति के बिना किसी न्यायिक अधिकारी को आरोपपत्र जारी नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि विभागीय कार्रवाई प्रारंभ करने की प्रक्रिया विधिसम्मत नहीं थी, इसलिए उस आधार पर आगे की कार्रवाई भी प्रभावित हो गयी।

हाईकोर्ट की अपील खारिज, बहाली में हस्तक्षेप से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय की प्रशासनिक पीठ की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें छह जनवरी 2026 को उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा दिये गये निर्णय को चुनौती दी गयी थी।

खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि वह विभागीय कार्रवाई और उसके बाद न्यायिक अधिकारी की बहाली को निरस्त करने के लिए विवादित आदेश के संचालनात्मक हिस्से में हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं है। साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि उसका निर्णय केवल विधिक प्रक्रिया से संबंधित प्रश्नों पर आधारित है, न कि मामले के तथ्यों पर।

हरिद्वार में तैनाती के दौरान सामने आया था मामला

Supreme Court on UK Judicial Officer पूर्व सिविल जज दीपाली शर्मा के प्रार्थना पत्र को हाईकोर्ट ने किया खारिज
फाइल फोटो

मामले के अनुसार हरिद्वार में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर तैनात दीपाली शर्मा के विरुद्ध जनवरी 2018 में एक गुमनाम शिकायत प्राप्त हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि वह एक नाबालिग लड़की को घरेलू सहायिका के रूप में रखकर शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित कर रही हैं।

शिकायत हरिद्वार के जिला जज को भेजी गयी थी। जिला जज ने मौके का निरीक्षण कर रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें कहा गया कि नाबालिग लड़की के शरीर पर लगभग 20 चोटों के निशान मिले थे। इसके बाद संबंधित न्यायिक अधिकारी को निलंबित किया गया और विभागीय जांच के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

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मेडिकल साक्ष्यों और प्रक्रिया में मिली थीं कमियां

बाद में न्यायिक अधिकारी की अपील पर उच्च न्यायालय ने विभागीय प्रक्रिया में कई कमियां पायीं। न्यायालय ने पाया कि मूल चिकित्सीय प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था और संबंधित दस्तावेजों पर चिकित्सक के हस्ताक्षर भी नहीं थे।

सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि जब तक विभागीय कार्रवाई को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीशों की समिति से विधिवत स्वीकृति नहीं मिलती, तब तक ऐसी कार्रवाई वैध नहीं मानी जा सकती। यह निर्णय न्यायिक प्रशासन, विभागीय अनुशासन और विधिक प्रक्रिया के पालन से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांतों को रेखांकित करता है।

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